दीवारों पर लिक्खा है, 5 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)

अपने बच्चों को रोज ऐसी एक अच्छी खबर पढक़र सुनाएँ

 5 मई 2022


दुनिया भर से तमाम किस्म की बुरी खबरें आकर मीडिया पर राज करती हैं क्योंकि यह माना जाता है कि बुरी खबरें अधिक चलती हैं, अधिक बिकती हैं, लेकिन दूसरी तरफ कुछ अच्छी खबरें भी बिकती हैं और लोगों के दिल को छू जाती हैं। अब जैसे उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के काशीपुर नाम के छोटे शहर की एक खबर है। वहां एक व्यक्ति अपनी जमीन मुस्लिम समाज को ईदगाह के लिए देना चाहता था। लाला ब्रजनंदन रस्तोगी 2003 में गुजर गए और इस काम को पूरा नहीं कर पाए। अब उनकी बेटियों ने अपने पिता की इच्छा के मुताबिक 21 एकड़ जमीन जो कि करीब सवा करोड़ रुपए की होती है, ईद के ठीक पहले मुस्लिम समाज को तोहफे में दे दी। इस बार की ईद की नमाज बृजनंदन रस्तोगी के लिए दुआ करते हुए की गई। एक तरफ तो हिंदुस्तान भर में भाई-भाई के बीच महाभारत की तरह, या अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच किसी विवादित धर्म स्थान को लेकर ऐसी खबरें आती हैं कि सुई की नोक के बराबर जमीन भी नहीं दी जाएगी, देशभर के अपने महफूज घरों में बैठे हुए लोग यह नारा लगाते हैं कि दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे। ऐसी खबरों के बीच अच्छी खबरें गर्मी के मौसम में ठंडी हवा के झोंके की तरह आती हैं, और बहुत से ऐसे गुरुद्वारे और मंदिर हैं जहां पर लोगों ने मुस्लिमों को इफ्तार की दावत के लिए या रोजे तोडऩे के लिए जगह दी गई। बहुत से ऐसे गुरुद्वारे हैं जहां पर बाढ़ या तूफान की वजह से तबाह इलाकों के मुस्लिमों के खाने और रहने का इंतजाम किया गया, उनके नमाज पढऩे का इंतजाम किया गया। ऐसी अच्छी खबरें भी चारों तरफ से आती हैं, ये गिनती में कम रहती हैं, लेकिन दिल को अधिक छू जाती हैं।

मीडिया का एक बड़ा हिस्सा हिंसा और कमीनेपन की खबरों को अधिक प्रमुखता से छापता या दिखाता है, क्योंकि यह माना जाता है कि ऐसी खबरें बिकती अधिक हैं। लेकिन यह बात हकीकत है नहीं। लोगों की नीचता और कमीनगी की बातें पल भर के लिए तो एक सनसनीखेज सुर्खी बन जाती हैं, लेकिन लंबे समय तक असर नहीं करतीं। अब सवाल यह उठता है कि अच्छी खबरों के लिए जगह निकल पाए इसके पहले कुछ लोग रोजाना के अपने पेशे की तरह अगर हिंसा और कमीनगी की घटिया बातें कह-कहकर सुर्खियों को छीनने लगें, तो फिर अच्छी खबरों को जगह कहां मिलेगी? ऐसा लगता है कि आज कुछ लोग एक पेशेवर अंदाज में हर दूसरे-चौथे दिन कहीं से एक ऐसा बखेड़ा खड़ा करवाते हैं जो दो-चार दिन या हफ्ते भर खबरों पर कब्जा करके रखें और टीवी के न्यूज़ बुलेटिन उन्हीं पर अपनी बहसें करते रहें। यह सिलसिला कब तक चलेगा, कितना चलेगा, इसे कौन बदल सकता है, कौन रोक सकता है। यह समझना कुछ मुश्किल है क्योंकि ऐसा लगता है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा उसे थमाए गए एक एजेंडे के तहत जिंदगी के लिए निहायत गैरजरूरी, निहायत सतही मुद्दों से टीवी की स्क्रीन पाटकर रख देता है ताकि जिंदगी के असली और जलते-सुलगते मुद्दे पल भर के लिए भी वहां दाखिल ना हो जाएं।

क्या सचमुच ही मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इस कदर बिक चुका है कि वह उसे थमाए गए हुक्मनामे पर अमल करते हुए अपनी बिकी हुई आत्मा को, उसके एक कतरे को भी वापस पाने की कोशिश नहीं करता? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो अच्छी खबरों के अवसर को खत्म होते देखकर मन में उठते हैं। अभी दो दिन पहले ही एक खबर आई कि किस तरह अपने एक किसी करीबी को एक सडक़ दुर्घटना में बिना हेलमेट मरते देखने के बाद कोई एक व्यक्ति अपना घर-बार बेचकर भी लोगों को हेलमेट बांटने का काम कर रहा है, और अगर सोशल मीडिया पर आई जानकारी सही है तो वह अब तक 55 हजार लोगों को हेलमेट बांट चुका है। ऐसे ही बहुत से लोग रहते हैं जो जरूरतमंद मरीजों के लिए खून का इंतजाम करते घूमते रहते हैं, बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपना खुद का खून हर तीसरे महीने तब तक देते रहते हैं जब तक उनकी बढ़ती उम्र या किसी बीमारी की वजह से डॉक्टर उन्हें मना नहीं कर देते हैं। कुछ लोग हैं जो दाह संस्कार का इंतजाम करते हैं, कफन-दफन का जिम्मा लेते हैं, और जो गुमशुदा लाशें मिलती हैं, उन्हें ठिकाने लगाते हैं। कोरोना महामारी के पूरे दौर में जब मरघटों पर दो-दो, तीन-तीन दिनों की कतारें लगी हुई थीं उस वक्त भी लोग वहां पर रात-दिन काम करके अंतिम संस्कार कर रहे थे, जब परिवारों के लोग अपनों का आखिरी चेहरा देखने से भी बच रहे थे तब कुछ दूसरे लोग ऐसे थे जो अनजानी लाशों को जलाते हुए रात और दिन एक कर रहे थे। अब एक सवाल मन में यह आता है कि ऐसी अच्छी खबरों और अच्छी मिसालों का असर लोगों पर क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या इसलिए नहीं हो पा रहा है कि देश में और जो बड़ी-बड़ी मिसालें हैं, वे ऐसे किसी नेक काम को बढ़ावा नहीं देती हैं, और वह इस कदर घटिया काम करते हुए लोगों के सामने अपने आपको रखती हैं कि लोगों को लगता है कि घटिया काम करना ही उनका मार्गदर्शन है? जिस समाज में कुछ लोग अनजाने लोगों के लिए किडनी भी देने के लिए तैयार हो जाते हैं, जहां अपने किसी गुजरते हुए ब्रेन डेड हो चुके परिजन के सभी अंग दूसरों को देने के लिए तैयार हो जाते हैं, वहां पर अगर महामारी के बीच वेंटिलेटर खरीदने के काम में घोटाला और भ्रष्टाचार करने वाले लोग भी मौजूद हैं, तो क्या उनकी मिसालें लोगों के दिल-दिमाग पर इतनी हावी हो जाती हैं कि वे नेक काम करने के बजाए लूट को मिसाल मान लेते हैं?

आज हिंदुस्तान में हर त्यौहार एक बड़ा सामाजिक तनाव और खतरा लेकर आने लगा है। एक वक्त था जब सभी धर्मों के लोग मिलजुल कर सभी धर्मों के त्योहार मना लेते थे लेकिन अब बहुत से बड़े लोगों ने, प्रमुख लोगों ने और नेताओं ने, राजनीति, धर्म, और समाज के बड़े-बड़े नेताओं ने इतनी हिंसक बातें करके इतनी खराब मिसालें सामने रखी हैं कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा उसी में झुलस रहा है और उसको राष्ट्रीयता मान रहा है, उसे अपने धर्म का गौरव मान रहा है। ऐसे में उत्तराखंड के एक शहर से आई यह खबर एक राहत की बात है जहां बेटियां अपने बाप की इच्छा पूरी करने के लिए सवा करोड़ की जमीन मुस्लिम समाज को दे रही हैं, जिन्हें कि बहुत से लोग सिर्फ बेइज्जती, तोहमत, और मौत देना चाहते हैं। सरकारों से कोई उम्मीद नहीं है, और मीडिया की शायद यह प्राथमिकता नहीं है, ऐसे में लोगों को सोशल मीडिया पर उन्हें मुफ्त में मिली हुई जगह का इस्तेमाल नेक नीयत के ऐसे कामों को बढ़ावा देने के लिए करना चाहिए, इनके बारे में लगातार लिखना चाहिए और अपने बच्चों को इन बातों को पढक़र सुनाना चाहिए ताकि वे टीवी पर महज नफरत की बातें सुनते न रह जाएं, बल्कि अच्छी बातें भी सीख पाए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 4 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)

हंगामा है क्यों बरपा, राहुल के एक शादी की दावत में जाने से?

  4 मई 2022


राहुल गांधी के बारे में किसी सनसनीखेज दिखती खबर का आना उनके विरोधियों और आलोचकों के लिए अच्छे दिन आ जाने से भी अच्छा होता है। अभी उनका एक वीडियो आया जिसमें वे किसी एक पार्टी में खड़े दिख रहे हैं जहां आसपास कुछ विदेशी हैं, कुछ संगीत चल रहा है, पास में एक महिला खड़ी है, और इसके साथ यह जानकारी थी कि वे नेपाल में एक शादी की दावत में थे। विरोधियों को इससे अधिक और लगता क्या है, नफरत को तिल का ताड़ बनाने में खाद नहीं लगता। इस बात को हिन्दुस्तान के हालात से, राजस्थान के जोधपुर में चल रहे साम्प्रदायिक तनाव से, भारत में कांग्रेस पार्टी की बदहाली से जोडक़र देखा गया, और भाजपा के सबसे बड़े प्रवक्ताओं ने यह हमला बोल दिया कि कांग्रेस नेता अपने घर को सम्हालना छोडक़र नाईट क्लब में पार्टी कर रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने इस पर साफ किया कि राहुल गांधी अपनी एक दोस्त, एक अंतरराष्ट्रीय पत्रकार, सीएनएन की पूर्व संवाददाता की शादी में काठमांडू गए हैं।

कांग्रेस प्रवक्ता ने भाजपा के नेताओं से यह भी सवाल किया कि आज सुबह तक तो इस देश का कानून यह था कि आप अपने रिश्तेदारों या दोस्तों की शादी के समारोह में शामिल हो सकते हैं, हो सकता है कि कल से गृहस्थ बनना और शादी समारोह में हिस्सा लेना जुर्म हो जाए क्योंकि ये आरएसएस को पसंद नहीं है। कांग्रेस के लोगों और आम लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी याद दिलाया कि राहुल गांधी तो शादी के एक न्यौते पर एक मित्र देश नेपाल में एक समारोह में गए थे, वे बिना बुलाए एक शत्रु देश में जन्मदिन का केक काटने नहीं गए थे जैसे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नवाज शरीफ के घर की दावत में पाकिस्तान पहुंच गए थे।

जब देश नफरत के आधार पर दो या दो से अधिक हिस्सों में बांट दिया गया हो, तो फिर लोगों का किसी सच से या किसी इतिहास से कुछ लेना-देना नहीं रहता। एक शादी की दावत में पहुंचे हुए राहुल गांधी को लेकर भाजपा के नेताओं ने इतना बवाल खड़ा किया है कि मानो यह किसी किस्म की बदचलनी हो। राहुल गांधी तो किसी क्लब में चल रही इस पार्टी में अपने दोनों हाथ अपने मोबाइल फोन पर रखे हुए दिख रहे हैं, उनके हाथ में गर कोई ग्लास होता, तो उनके आलोचक अब तक दारू के ब्रांड की अटकलें भी लगाते रहते। राहुल गांधी और उनके परिवार ने सार्वजनिक रूप से अब तक कोई भी अशोभनीय काम नहीं किया है। पूरा परिवार अपनी जिंदगी को लेकर बहुत सावधानी से चलता है, और अगर किसी मौके पर राहुल गांधी पर यह तोहमत लगाने की बात भी उनके विरोधियों को सूझ रही है कि वे राजस्थान में साम्प्रदायिक तनाव को छोडक़र विदेश गए हुए हैं, तो कम से कम भाजपा के लोगों को तो यह याद रखना चाहिए कि पिछले बरसों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सौ-पचास बार विदेश गए हैं, और हर बार देश के किसी न किसी हिस्से में कोई न कोई तनाव तो चलते ही रहता है। फिर भाजपा के प्रवक्ताओं और पदाधिकारियों को यह भी साफ करना चाहिए कि क्या किसी नाईट क्लब की पार्टी में जाना देश की संस्कृति के खिलाफ है?

राहुल गांधी तो बिना शराब वहां दिख रहे थे, लेकिन हिन्दुस्तान में भाजपा के कुछ सबसे बड़े नेता भी अपने निजी जीवन में आसपास के कई लोगों से अपने पीने को लेकर खुले हुए थे। राहुल गांधी पर बहुत ही घटिया हमले के जवाब में हम यहां पर भाजपा के उन नेताओं के नाम गिनाना नहीं चाहते जिनके महिलाओं से भी संबंध रहे, जिन्होंने खुलकर यह कहा कि वे अविवाहित हैं, लेकिन कुंवारे नहीं, जिनके पीने के बारे में अब तक दर्जन भर से अधिक जीवनियों में लिखा जा चुका है, और दर्जनों इंटरव्यू में करीबी जानकारों ने कहा हुआ है। ऐसे में किसी नेता के घोषित तौर पर, सार्वजनिक इंतजाम के बीच एक शादी के खुले समारोह में जाना अगर एक बखेड़े का सामान बनाया जा रहा है, तो फिर ऐसा सामान किस पार्टी के किस नेता के घर-परिवार से बरामद नहीं किया जा सकता?
लेकिन आज हिन्दुस्तान में बेरोजगारी जितनी अधिक है, और धार्मिक-साम्प्रदायिक आधार पर नफरत जितनी अधिक फैलाई जा चुकी है, उसमें राहुल-सोनिया के बारे में कुछ भी कहकर बखेड़ा खड़ा किया जा सकता है। अपने देश की मान्य संस्कृति के

मुताबिक अगर सोनिया गांधी इटली में अपने छात्र जीवन में किसी रेस्त्रां या बार में वेट्रेस का काम करती थीं, तो उसे हिन्दुस्तान में उनके विरोधी एक कलंक की तरह पेश करते हैं। अपने पढऩे और जीने के लिए छात्र जीवन से ही कुछ घंटे काम करके कमाई करने की गौरवशाली परंपरा की जरूरत उन लोगों को जरूर नहीं पड़ती है जो कि हिन्दुस्तान के नेताओं की औलाद हैं, और यहां के पैसों पर विदेशों में पढऩे जाते हैं। बाकी तो पश्चिम के देशों में अरबपतियों के बच्चे भी कॉलेज की पढ़ाई करते हुए काम करते ही हैं।

राहुल गांधी पर एक शादी में जाने पर जिस तरह के ओछे हमले किए जा रहे हैं, वे इन आलोचकों की सोच का पाखंड अधिक उजागर कर रहे हैं। किसी देश में भाजपा के इतिहास के एक सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी जिस तरह खुलकर अपनी एक शादीशुदा महिला मित्र के पूरे परिवार को अपने सरकारी घर में बसाकर रखते थे, उसकी बेटी को उन्होंने प्रधानमंत्री-परिवार के रूप में राजकीय मान्यता दे रखी थी, उसे लेकर भी कभी कांग्रेस या दूसरे गैरभाजपाई दलों ने कोई ओछे हमले नहीं किए थे। अलग-अलग बहुत सी पार्टियों में बहुत से नेताओं की निजी जिंदगी में सामाजिक पैमानों से परे की बातें रहती हैं जो कि सार्वजनिक भी होते रहती हैं, लेकिन राहुल गांधी के एक दावत में जाने में तो ऐसा कुछ भी नहीं दिखता जिसे लेकर उनकी आलोचक पार्टी इतनी उत्तेजना में आ जाए! दरअसल हिन्दुस्तान में शिष्टाचार के पैमानों को बुलडोजर से कुचलकर खत्म कर दिया गया है, और बेशर्मी का बैनर टांग दिया गया है। जब तक हिन्दुस्तानी जनता का एक हिस्सा फुटपाथी मदारी के जुमलों पर जुटने वाली भीड़ की तरह बना रहेगा, तब तक ऐसे ओछे हमले भी जारी रहेंगे।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)

सत्तर बरस की औसत उम्र वाले हिन्दुस्तानी 350 बरस इंतजार करें कोर्ट-फैसले का?

 3 मई 2022


प्रधानमंत्री और देश के मुख्यमंत्रियों के साथ हुई एक बैठक में देश के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना ने अदालतों पर बोझ के बारे में आंकड़े सामने रखे जिनके मुताबिक देश की निचली, जिला अदालतों में चार करोड़ से ज्यादा केस चल रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि जिला अदालतों से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जजों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और वहां पर नियुक्ति का जिम्मा सरकारें पूरा नहीं कर रही हैं। उन्होंने जिला अदालतों का हाल बताया कि प्रति लाख आबादी पर देश में दो जज हैं, और बढ़ती मुकदमेबाजी का बोझ निपटाने के लिए ये बहुत नाकाफी है। देश के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री और देश की मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में यह तकलीफ जाहिर की।

देश में अदालतों का हाल इतना खराब है कि वहां से किसी को इंसाफ की कोई उम्मीद नहीं रहती। 2018 में आई नीति आयोग की एक रिपोर्ट में यह कहा गया था कि उस वक्त अदालतों में लंबित 2.9 करोड़ मुकदमों के निपटारे में 324 साल लगने वाले थे। अब चार बरस में 4.7 करोड़ मामले अदालतों में हो गए हैं। अब शायद ताजा अंदाज लगाया जाए तो शायद इनके निपटने में साढ़े तीन सौ साल लगेंगे। जिस देश में इंसानों की औसत उम्र 70 बरस से कम ही है वहां पर अगर इंसाफ के लिए साढ़े तीन सौ बरस रूकने की सलाह किसी को दी जाए, तो लोग अदालतों के बजाय मुहल्ले के गुंडे को सुपारी देकर उससे अपनी पसंद का इंसाफ पाने की कोशिश करेंगे। वैसे भी आज भारत के अदालती इंतजाम में पसंद का फैसला पाने की संभावना ताकतवर और संपन्न तबके की ही अधिक होती है, कमजोर के इंसाफ पाने की गुंजाइश बहुत ही कम होती है।

मुख्य न्यायाधीश ने अदालतों के भ्रष्टाचार के बारे में न तो कुछ कहना था, और न उन्होंने कुछ कहा। लेकिन हिन्दुस्तानी अदालतों में इतने धीमे सिलसिले की एक वजह अदालती भ्रष्टाचार भी है जहां पर बाबुओं से लेकर जजों तक को रिश्वत देकर मनचाहे मामलों को मनमानी लेट करवाया जा सकता है। और एक बार लेट होने का यह सिलसिला जो शुरू होता है, तो फिर पांच लीटर दूध में मिलावट के मामले में फैसला आने में 27 बरस लगने पर हमने कुछ हफ्ते पहले ही इसी जगह पर लिखा था कि जिस मामले में प्रयोगशाला में तय होने वाले रासायनिक सुबूत के आधार पर फैसला होना था, उसमें भी चौथाई सदी लग गई, तो फिर पलटने वाले गवाहों, पुलिस जैसी कई मामलों में भ्रष्ट हो जाने वाली जांच एजेंसी, लोगों के गवाह खरीदने की ताकत के चलते हुए बाकी किस्म के मामलों में इंसाफ की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है। हम मुख्य न्यायाधीश की जजों की कमी की फिक्र को भी कम अहमियत देते हैं, और नीति आयोग के अंदाज को भी पल भर के लिए किनारे रखना चाहते हैं, इस जरूरी बात पर पहले चर्चा करना चाहते हैं कि भारत के अदालती मामले सबसे अधिक संख्या में राज्यों की पुलिस से निकलकर आते हैं, जो कि घोर साम्प्रदायिक, या जातिवादी, या भ्रष्ट, या राजनीतिक दबावतले दबी हुई रहती हैं, और उनसे जांच और मुकदमे में ईमानदारी की उम्मीद कम ही की जाती है। इसलिए जजों की कमी का तर्क तो ठीक है, लेकिन उससे परे न्याय की प्रक्रिया में जहां-जहां कमियां और खामियां हैं, उनकी भी मरम्मत करने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री ने इस मौके पर यह गिनाया कि उनकी सरकार ने पिछले सात बरसों में देश में गैरजरूरी हो चुके 14 सौ से अधिक पुराने कानूनों को खत्म किया है। उनकी यह शिकायत भी रही कि राज्यों के अधिकार क्षेत्र के ऐसे गैरजरूरी हो चुके कानूनों को राज्यों ने खत्म नहीं किया है। हिन्दुस्तान की न्याय व्यवस्था लागू न किए जा सकने वाले, या जानबूझकर लागू न किए जाने वाले कानूनों से लदी हुई है। यह सिलसिला भी खत्म होना चाहिए। इस देश में अंग्रेजों की छोड़ी गई गंदगी को सिर पर ढोने में हिन्दुस्तानियों के एक ताकतवर तबके को बड़ा फख्र हासिल होता है। यहां समलैंगिकता को अभी हाल तक जुर्म रखा गया था, और इसे जुर्म करार देने वाले अंग्रेज अपने देश में इस दकियानूसी सोच से जमाने पहले छुटकारा पा चुके थे। ऐसे ही बहुत से और कानून है जिनमें से एक पर अभी आज-कल में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है, हिन्दुस्तानियों के खिलाफ अंग्रेजों का बनाया हुआ राजद्रोह का कानून आज तक इस लोकतंत्र की सरकारें अपने ही लोगों की असहमति के खिलाफ, सरकार की आलोचना के खिलाफ इस्तेमाल कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट को इसे खारिज करना चाहिए ताकि केन्द्र सरकार और बहुत सी राज्य सरकारें जो अलोकतांत्रिक मनमानी कर रही हैं, उन्हें यह अहसास हो सके कि वे काले हिन्दुस्तानियों पर राज कर रही गोरी सरकार नहीं हैं।

इसलिए हम हिन्दुस्तान की न्याय व्यवस्था की इस धीमी रफ्तार, और उसकी बेइंसाफी, बेरहमी को सिर्फ जजों की कमी से जोडक़र नहीं देखते, बल्कि मामलों को अदालत तक ले जाने वाली पुलिस की बुनियादी खामियों से जोडक़र भी देखते हैं, अदालतों के अपने भ्रष्टाचार से भी जोडक़र देखते हैं, और अदालतों के कम्प्यूटरीकरण, जेलों के साथ उनकी वीडियो सुनवाई, उसकी कार्रवाई को ऑनलाईन करने, और उसकी पूरी प्रक्रिया से भ्रष्ट मानवीय दखल को हटाने से भी जोडक़र देखते हैं। सत्ता पर बैठे हुए दुष्ट और भ्रष्ट किस्म के मुजरिम नेताओं के लिए यह बात सहूलियत की रहती है कि अदालतों की रफ्तार धीमी रहे, और नेताओं के मर जाने तक उनकी सरकारों का भ्रष्टाचार सजा न पा सके। शायद यही आत्महित सत्तारूढ़ नेताओं को जजों की कुर्सियां भरने से रोकता है। देश के मुख्य न्यायाधीश को अदालतों से जुड़े तमाम पहलुओं पर देश की जनता के सामने सब कुछ साफ-साफ पेश करना चाहिए क्योंकि यह उसकी जिंदगी, और उसके लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी हुई बात है।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 2 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)

यह प्रशांत किशोर की नई पहल है, या नया पैंतरा?

 2 मई 2022


वैसे तो प्रशांत किशोर की आज की ताजा मुनादी पर कुछ लिखना जल्दबाजी होगी क्योंकि उन्होंने आज सुबह एक ट्वीट किया है जिसमें उन्होंने लिखा है- लोकतंत्र में एक सार्थक भागीदार बनने और जनसमर्थक नीति को आकार देने का मेरा दस साल का सफर रोलर-पोस्टर की सवारी (उतार-चढ़ाव) की तरह रहा है। अब मैं एक पन्ना पलट रहा हूं, और अब वक्त है असली मालिक, यानी जनता के पास जाने का ताकि मुद्दों को और ‘जन सुराज’ को बेहतर तरीके से समझा जा सके। शुरूआत बिहार से।

प्रशांत किशोर पर अभी-अभी दो बार लिखना कांग्रेस के सिलसिले में हुआ है, और वे इससे अधिक विचार के लायक फिलहाल नहीं थे, लेकिन आज की उनकी यह घोषणा कई तरह के कयास शुरू कर गई है। उन्होंने अभी कुछ ही दिन पहले कहा था कि वे 2 मई तक अपने अगले कदम की जानकारी दे देंगे, और उन्होंने उस बिहार से ‘कुछ’ शुरू करने की घोषणा की है जिस बिहार में वे नीतीश कुमार की जेडीयू के दूसरे नंबर के पदाधिकारी भी रहे हैं। लेकिन जिस तरह रेगिस्तान में रेत के टीले रातोंरात अपनी जगह बदल देते हैं, और शाम किसी जगह दिखते हैं, सुबह तक वे कहीं और पहुंच जाते हैं, उसी तरह प्रशांत किशोर पिछले कई चुनावों में लगातार अलग-अलग पार्टियों के लिए रणनीति बनाते रहे हैं, और किसी पार्टी की विचारधारा से उनका कुछ लेना-देना नहीं रहा। वे एक पेशेवर वकील की तरह हर किस्म के मुवक्किलों का केस लड़ते रहे, और उनकी जीत में मदद करते रहे। अब अगर वे राजनीति या चुनावी रणनीति बनाने से परे कुछ करने जा रहे हैं, और अपने बूते, अपने खुद के किसी कार्यक्रम पर अमल करने जा रहे हैं, तो यह उनका एक नया अध्याय होगा। लोगों को याद होगा कि एक वक्त सीएसडीएस नाम के गैरसरकारी सामाजिक अध्ययन संस्थान में काम करने वाले योगेन्द्र यादव टीवी पर चुनावी नतीजों की अटकल लगाते-लगाते, नतीजों का विश्लेषण करते-करते सक्रिय राजनीति में आए, और स्वराज इंडिया नाम की पार्टी बनाई। यह पार्टी चुनावों में तो कहीं नहीं पहुंच पाई, लेकिन योगेन्द्र यादव लगातार सामाजिक मोर्चों पर सक्रिय हैं, और किसान आंदोलन में वे भीतर तक जुड़े रहे।

अब भारतीय लोकतंत्र में आज के मौजूदा हालात में यह बात सोचने की है कि प्रशांत किशोर जैसे विचारधाराविहीन रणनीतिकार कोई पार्टी बनाकर, या बिना पार्टी बनाए कोई आंदोलन छेडक़र जनता के बीच क्या कर सकते हैं? इसकी सबसे करीब की मिसाल इस पल योगेन्द्र यादव दिखते हैं जो कि इन्हीं किस्म की भूमिकाओं से होते हुए आज देश के सामाजिक आंदोलनों का एक अनिवार्य हिस्सा दिखते हैं। तो क्या प्रशांत किशोर भी देश के कुछ मुद्दों को उठाने में कामयाब होंगे? हो सकता है कि आज हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में भाजपा के अश्वमेध यज्ञ के अंधाधुंध दौड़ रहे घोड़े को थामना किसी नई पार्टी के बस का न हो, लेकिन हम लोकतंत्र में छोटी और नई पार्टी की भूमिका को कम नहीं आंकते हैं। राजनीतिक दलों या सामाजिक आंदोलनों की भूमिका महज कुछ या अधिक सीटों पर चुनाव जीत जाने तक सीमित नहीं रहती। ऐसे तबके देश के लोकतंत्र के लिए जरूरी मुद्दों को उठाने के काम भी आते हैं जिन्हें कई बार कोई बड़ी पार्टी उठाना नहीं चाहती क्योंकि सबके बड़े-बड़े हित उन पार्टियों से जुड़ जाते हैं। बड़े कारोबार और सरकार मिलकर जिस तरह देश में जनधारणा प्रबंधन या जनमत गढऩे के कारोबार को भी काबू में कर चुके हैं, उन्हें देखते हुए ऐसे वैचारिक, सैद्धांतिक, और प्रतिबद्ध आंदोलनों की जरूरत हमेशा ही बने रहेगी जो कि सोशल मीडिया पर मुफ्त में हासिल कुछ जगह का इस्तेमाल करके सरकार-कारोबार की गिरोहबंदी उजागर कर सकें। हो सकता है कि प्रशांत किशोर बिना किसी पार्टी की चुनावी रणनीति बनाए लोगों के बीच मुद्दों को उठाने में कामयाब हो सकें ताकि जनता का फैसला बेहतर जानकारी और बेहतर समझ पर आधारित हो। आज हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियां और नेता जुमलों की जुबान बोलते हैं जिनका हकीकत से उतना ही लेना-देना रहता है जितना कि रामदेव का 35 रूपये का पेट्रोल और मोदी के 15-15 लाख का रहा। ऐसे में मुद्दों के संदर्भ, देश की दशा और दिशा, लोगों और पार्टियों के उछाले नारों की सच्चाई, ऐसे बहुत सारे पहलू हैं जिस पर एक व्यापक जनजागरण की जरूरत है। यह जनजागरण सत्ता की सीधी गलाकाट लड़ाई से परे की छोटी पार्टियां भी कर सकती हैं, लेकिन न जाने क्यों वामपंथी दल भी बरसों में एक बार बुलडोजर के सामने खड़े हो पाते हैं, बाकी तो सत्ता और बाहुबल की भागीदारी फर्म के बुलडोजर जनता को कुचलते रहते हैं, और पार्टियां दूर बैठीं नजारा देखती रहती हैं। इसलिए इस देश में स्वामी अग्निवेश, ज्यां द्रेज, योगेन्द्र यादव, अरुन्धति राय, स्वरा भास्कर जैसे लोगों की जरूरत हमेशा ही बनी रहेगी जो कि कमजोर तबकों की आवाज को मजबूती दे सकें, और मजबूत तबकों की दहाड़ की दहशत में आए बिना सीना तानकर खड़े हो सकें। अगर प्रशांत किशोर की आज की मुनादी जनजागरण में कुछ मदद कर सकती है, तो वह एक नये राजनीतिक दल के मुकाबले अधिक काम की रहेगी। आज तो ऐसे सामाजिक आंदोलनकारियों की जरूरत है जो कि चुनाव के मौकों पर, और दो चुनावों के बीच भी, पार्टियों और सरकारों की नीयत उजागर कर सकें, जनता की ओर से ऐसे सवाल उठा सकें जो जनता को या तो सूझते नहीं हैं, या जिन्हें उठाने की जनता की आवाज नहीं है। योगेन्द्र यादव की पार्टी की कामयाबी उनकी जीती हुई सीटों से लगाना गलत होगा, वे कुछ न जीतकर भी गलत की जीत का खतरा घटा सकते हैं, और बेहतर की जीत की संभावना बढ़ा सकते हैं। लोकतंत्र इन्हीं दो सिरों के बीच घटाने और बढ़ाने की कोशिशों का नाम है। यह तो आने वाले दिन बताएंगे कि प्रशांत किशोर के दिल-दिमाग में क्या है, लेकिन चूंकि वे राजनीति को बहुत से पेशेवर नेताओं से भी बेहतर समझते हैं, इसलिए उन्हें, और उनकी तरह के कई और लोगों को पार्टियों और नेताओं के राजनीतिक चरित्र का भांडाफोड़ करना चाहिए ताकि जनता कोई बेहतर फैसला ले सके। अब तक प्रशांत किशोर जनमत को प्रभावित करने, या कड़े शब्दों में कहें तो झांसा देने के काम को कामयाबी से करते आए हैं, लेकिन अब अगर वे सुराज की बात कर रहे हैं, तो उन्हें जनजागरण का काम करना होगा, फिर चाहे वह चुनावी रहे, या कि गैरचुनावी।

(Daily Chhattisgarh)

 

जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ असम की साजिश के खतरे

 1 मई 2022


गुजरात के एक दलित नौजवान निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी को असम की एक अदालत ने जमानत दी है जिसमें एक मामले में जिग्नेश की जमानत के बाद आनन-फानन एक दूसरा मामला गढक़र उनकी गिरफ्तारी को जारी रखने की साजिश असम पुलिस ने की थी। जिग्नेश की पहली गिरफ्तारी प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए की गई एक ट्वीट को लेकर असम में एक भाजपा नेता की शिकायत पर दर्ज एफआईआर के आधार पर की गई थी, और इस गिरफ्तारी के लिए असम पुलिस गुजरात जाकर जिग्नेश को गिरफ्तार करके लाई थी। लेकिन इस सतही मामले में उनकी जमानत का आसार था, और शायद इसीलिए वहां की पुलिस ने एक महिला पुलिस अधिकारी से जिग्नेश के खिलाफ एक रिपोर्ट लिखाई कि गिरफ्तारी के दौरान जिग्नेश ने उससे छेडख़ानी की या बदसलूकी की। ट्वीट पर जमानत मिलने के बाद जब जिग्नेश को आनन-फानन फिर गिरफ्तार किया गया तो इस दूसरे मामले की सुनवाई करते हुए जज ने यह पाया कि महिला पुलिस अधिकारी ने रिपोर्ट में कुछ बात लिखाई थी, और मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान में कुछ अलग बात लिखाई थी। इस पर अदालत ने कहा कि जिग्नेश मेवाणी को पुलिस ने फंसाया है, और पुलिस की इस मनमानी पर रोक जरूरी है। कोर्ट ने इस साजिश के लिए पुलिस को कड़ी फटकार लगाई, और कहा कि अगर पुलिस की मनमानी नहीं रोकी गई तो यह राज्य एक पुलिस स्टेट बन जाएगा। अदालत ने यह भी सुझाव दिया है कि असम पुलिस को किसी को हिरासत में लेने की रिकॉर्डिंग करने के लिए बॉडी कैमरा पहनने कहा जाए और गाडिय़ों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं ताकि गिरफ्तारी दर्ज हो सके। जज ने यह भी कहा कि इस महिला अधिकारी की गवाही को देखते हुए लग रहा है कि जिग्नेश मेवाणी को किसी न किसी तरह हिरासत में बनाए रखने के लिए यह मामला बनाया गया है। जज ने यह भी कहा कि पुलिस की ओर से ऐसे आरोपियों को गोली मारकर उनकी हत्या करने या उन्हें घायल करने के मामले राज्य में नियमित हो गए हैं, और हाईकोर्ट पुलिस को सुधारने का निर्देश दे सकता है।

यह मामला छोटा नहीं है। जिस गुजरात में चुनाव होने जा रहे हैं, वहां पर एक विधायक को सत्तारूढ़ भाजपा के एक दूसरे राज्य की पुलिस द्वारा इस तरह गिरफ्तार करना, और फिर जमानत मिलने पर उसे साजिश करके एक झूठे मामले में फंसाकर रखना लोकतंत्र के लिए एक फिक्र की बात है। और जिग्नेश ने प्रधानमंत्री के खिलाफ किए गए एक ट्वीट में यह लिखा था कि मोदी गोडसे को गॉड मानते हैं। अब यह तो उनका अपना एक नजरिया है, और इसमें एक राजनीतिक आलोचना तो है, लेकिन इसमें न तो कोई बात अलोकतांत्रिक है, और न ही इसमें कोई जुर्म बनता। आज देश भर में जगह-जगह जिस तरह आक्रामक हिन्दुत्व से जुड़े हुए लोग गोडसे की पूजा कर रहे हैं, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपनी भाजपा की सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने जिस तरह से गोडसे की स्तुति करते हुए गांधी को गालियां दी थी, और जिस पर उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह बात कुछ लोगों के मन में मोदी की एक अलग तस्वीर बना सकती है, और हो सकता है कि मोदी और भाजपा इस तस्वीर से सहमत न हों। लेकिन लोकतंत्र में आलोचना और असहमति को लेकर बहुत तंगदिली नहीं चलती। चार दिनों के भीतर इस मुद्दे पर हमें दुबारा लिखना पड़ रहा है क्योंकि एक छात्र नेता उमर खालिद की जमानत अर्जी की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के दो जजों ने जिस तरह उमर खालिद के प्रधानमंत्री के खिलाफ जुमला शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति की थी, वह भी हैरान करने वाली थी, और उसे लेकर हमने इसी जगह लिखा भी था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में 2015 में सबसे पहले इस शब्द का इस्तेमाल अमित शाह ने किया था, और फिर मानो उनके शब्द को दुहराते हुए ही देश के लाखों लोगों ने इस शब्द का इस्तेमाल मोदी के लिए शुरू किया। जिस तरह उन जजों को उमर खालिद जुमला शब्द का आविष्कारक लगा, उसी तरह असम की पुलिस को यह लग रहा है कि मोदी को गोडसे को गॉड मानने वाला कहना एक जुर्म है।

लोकतंत्र राज्यों की पुलिस के ऐसे बेदिमाग, बददिमाग, और साजिशाना तौर-तरीकों से नहीं चल सकता। देश के हर राज्य की पुलिस के हाथ में किसी को गिरफ्तार करने का अधिकार है। आज अगर बंगाल की पुलिस जाकर गुजरात के किसी विधायक को गिरफ्तार करके ले आए कि उसकी ट्वीट ममता बैनर्जी के लिए अपमानजनक है, तो इस किस्म के सिलसिले देश को कहां ले जाएंगे? अभी-अभी आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार की पुलिस दिल्ली आकर केजरीवाल के पुराने साथी और एक वक्त आम आदमी पार्टी में रहे कुमार विश्वास से पूछताछ करके लौटी क्योंकि उन्होंने कुछ समय पहले पंजाब में मतदान के ठीक पहले यह बयान दिया था कि एक वक्त उनसे केजरीवाल ने कहा था कि वे या तो पंजाब के मुख्यमंत्री बनेंगे, या फिर खालिस्तान के प्रधानमंत्री। और ऐसा लगता है कि मानो कुमार विश्वास की बात को सही साबित करने के लिए अभी दो दिन पहले पंजाब में खालिस्तान समर्थकों ने एक आक्रामक प्रदर्शन का ऐलान किया था, और वहां की शिवसेना ने अपनी छोटी मौजूदगी के बावजूद उसका आमने-सामने विरोध किया। अब क्या पंजाब सरकार के खिलाफ शिवसेना के महाराष्ट्र में कोई जुर्म दर्ज किया जाए कि वहां देश विरोधी प्रदर्शन हुए हैं, और यह पंजाब सरकार का राजद्रोह है?

अगर देश के संघीय ढांचे में केन्द्र और राज्यों के बीच राजनीतिक असहमति की वजह से राज्यों की पुलिस का ऐसा इस्तेमाल होने लगेगा जिसे कि एक छोटा जज भी साफ-साफ देख पा रहा है, तो यह इस्तेमाल देश में एक अभूतपूर्व संवैधानिक टकराव खड़ा करेगा जिससे उबर पाना मुश्किल होगा। आज देश में आधा दर्जन से अधिक अलग-अलग विचारधाराओं की राज्य सरकारें हैं। यह बात ठीक है कि अधिकतर राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, लेकिन दूसरी पार्टियां भी कहीं-कहीं सत्तारूढ़ हैं, और अगर हर राज्य पुलिस के ऐसे नाजायज इस्तेमाल पर उतारू हो जाए, तो सोशल मीडिया पर पोस्ट देख-देखकर विपक्षी पार्टियों, असहमत नेताओं को गिरफ्तार करके लाने, और फिर गिरफ्तारी के दौरान पुलिस से छेडख़ानी जैसे और फर्जी मामले दायर करने का कोई अंत नहीं होगा। यह तो अच्छा हुआ कि मामले को किसी बहुत बड़ी अदालत तक पहुंचने की जरूरत नहीं पड़ी, और असम की बदनीयत पुलिस की साजिश जमानत के दौरान ही उजागर हो गई। उसी राज्य के जज को राज्य के पुलिस के खिलाफ इतनी कड़वी बातें कहनी पड़ी हैं कि उससे राज्य सरकार की साजिश उजागर होती है। असम के भाजपा-मुख्यमंत्री ने पिछले महीनों में देश की एकता और अखंडता के खिलाफ जितनी हिंसक बातें कही हैं, उन्हें लेकर तो देश के अलग-अलग बहुत से गैर-भाजपा राज्यों में जुर्म दर्ज हो सकता है, और फिर क्या मुख्यमंत्रियों की गिरफ्तारी के लिए दिल्ली में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन का इस्तेमाल किया जाएगा जहां पर हर राज्य की पुलिस दूसरे मुख्यमंत्रियों के लिए वारंट लेकर खड़ी रहेगी?

आज दूसरी दिक्कत यह भी है कि हिन्दुस्तान का तमाम सोशल मीडिया लोगों के खिलाफ हिंसक धमकियों के साफ-साफ जुर्म से भरा पड़ा है, लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती है। इस देश ने एक बड़ा मजबूत सूचना-तकनीक कानून तो बना लिया है, लेकिन उसे छांट-छांटकर अपने को नापसंद लोगों के खिलाफ इस्तेमाल तक सीमित रखा गया है। यह सिलसिला अगर दूर नहीं होगा, तो इस देश में राज्यों की पुलिस का इस्तेमाल आलोचना और असहमति की मुठभेड़-हत्या के लिए किया जाएगा, और पहली मौत लोकतंत्र की होगी, हो भी रही है, जिन लोगों को जानवर को धीरे-धीरे काटकर मारने का तरीका नापसंद है, वे लोग आज लोकतंत्र को उसी तरीके से जिबह कर रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)

अवांछित विवादों से घिरती और उबरती ब्रिटिश संसद

  1 मई 2022


ब्रिटेन की सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी के एक सांसद नील पेरिश को एक संसदीय जांच का सामना करना पड़ रहा था जिसमें उनके खिलाफ दूसरी महिला सांसदों की यह शिकायत थी कि वे संसद की कार्रवाई के दौरान अपनी सीट पर बैठे हुए मोबाइल फोन पर पोर्नोग्राफी देख रहे थे। अब जब संसद की जांच आगे बढ़ रही थी, और उनसे अधिक बारीक सवाल-जवाब अधिक खुलासे से होने जा रहे थे, तो उन्होंने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि उन्होंने एक क्षणिक पागलपन (मूमेंट ऑफ मैडनेस) में यह गलत काम किया था। और उन्होंने यह भी मंजूर किया कि एक बार ऐसा करने के बाद दूसरे बार फिर वैसा ही करना उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी। उन्होंने कहा कि पहली बार तो यह एक हादसा था, लेकिन दूसरी बार यह अक्षम्य अपराध था।

65 बरस के इस निर्वाचित संसद सदस्य को पार्टी ने इन आरोपों के सामने आने के बाद निलंबित कर दिया था, और 12 बरस का उनका संसदीय जीवन खतरे में पड़ गया था। पार्टी ने उनके इस्तीफे का स्वागत किया है।

ब्रिटिश पार्लियामेंट तरह-तरह के विवादों का सामना कर रही है। अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं जब ब्रिटिश पुलिस ने अपनी जांच में यह पाया कि प्रधानमंत्री निवास पर पीएम बोरिस जॉनसन का जन्मदिन मनाते हुए उन्होंने खुद और उनके साथियों ने कोरोना-लॉकडाउन के प्रतिबंध तोड़े थे, और पुलिस ने इस पर इन सब पर जुर्माना भी लगाया है। इस मुद्दे को लेकर भी प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग की जा रही थी। इसके बाद वित्तमंत्री, भारतवंशीय ऋषि सुनाक पर यह आरोप लगा कि उनकी पत्नी गैरब्रिटिश नागरिक के रूप में अपनी कमाई दूसरे देशों में बताकर ब्रिटेन में टैक्स बचा रही है, और यह ब्रिटेन का नुकसान है। यह विवाद आगे बढ़ा तो उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति ने बिना रियायत पूरा टैक्स खुद होकर पटाने की घोषणा की। उनकी यह ‘कानूनी’ टैक्स बचत पति ऋषि सुनाक के मंत्री दर्जे के लिए भी असुविधा की थी, और दूसरी तरफ भारत में सबसे अधिक साख वाले कारोबारी, उनके पिता नारायण मूर्ति के लिए भी अप्रिय थी जो कि किसी भी विवाद से परे रहते हैं। ऋषि सुनाक ने अपने खुद के अमरीकी रिश्तों को लेकर एक विवाद खड़ा होने पर उसकी जांच की मांग खुद होकर प्रधानमंत्री से की है।

एक दूसरा मामला जो अधिक विवादास्पद है वह संसद में विपक्ष की उपनेता एंजेला रेयनर को लेकर है जिन पर ऐसे आरोप लगाए गए हैं कि वे प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान ठीक सामने दूसरी तरफ बैठे हुए अपने पैरों को एक के ऊपर एक चढ़ाते और हटाते हुए अपनी टांगों की तरफ प्रधानमंत्री का ध्यान खींचकर उन्हें विचलित करने की कोशिश ठीक उसी तरह करती हैं जिस तरह एक अमरीकी फिल्म बेसिक इंस्टिंक्ट में एक अभिनेत्री का विख्यात सीन है। इस बात को कई लोगों ने ब्रिटिश संसद में महिलाओं के लिए अपमानजनक भी माना, और जिस अखबार डेली मेल ने ऐसी रिपोर्ट छापी थी उसे संसद ने नोटिस भेजकर बयान देने बुलाया भी है। यह अलग बात है कि अखबार ने संसद के इस नोटिस पर जाने से इंकार कर दिया है, लेकिन ब्रिटिश संसद में महिला की टांगों के ऐसे कथित इस्तेमाल का एक विवाद खड़ा तो हुआ ही है।

अब जिस ब्रिटिश संसद की तर्ज पर हिन्दुस्तानी संसद काम करती है, वहां के निर्वाचित सदन की सीटों के रंग की सीटें हिन्दुस्तानी निर्वाचित सदन, लोकसभा में है, और ब्रिटिश मनोनीत सदन की सीटों के रंग की सीटें हिन्दुस्तानी उच्च सदन, राज्यसभा में है। जहां बड़ी छोटी-छोटी सी बातों की नकल की गई है, वहां पर एक बात का बड़ा फर्क है। प्रधानमंत्री निवास पर वहां पर उस वक्त काम कर रहे लोगों के बीच केक कटना भी पुलिस जांच का मुद्दा हो गया, और प्रधानमंत्री सहित उनके सहकर्मियों पर जुर्माना ठोंका गया। क्या हिन्दुस्तान में कोई प्रधानमंत्री, या किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री के बारे में यह कल्पना भी की जा सकती है, कि उनकी कोई मामूली सी जांच भी ऐसी शिकायतों पर हो सकती है? आमतौर पर तो हिन्दुस्तान में पुलिस से यही उम्मीद की जाती है कि पीएम हाऊस से लेकर सीएम हाऊस तक अगर किसी लाश को ठिकाने लगाना हो तो वफादार पुलिस उसमें हाथ बंटाएगी। भारत में ही एक प्रदेश की विधानसभा में ढेर से विधायक पोर्नो देखते मिले थे, और सब अपनी जगह पर कायम हैं। यह तो संसद में सवाल पूछने को लेकर रिश्वत लेते हुए लोग स्टिंग ऑपरेशन के कैमरों पर कैद थे, इसलिए कुछ सांसदों की सदस्यता गई, वरना भारतीय संसद और विधानसभाओं में किसी सदस्य के खिलाफ कोई कार्रवाई होते किसी को याद नहीं। और यह भी कि नैतिक आधार पर इस्तीफे वाली परंपरा को हिन्दुस्तानी लोग ब्रिटिश संसद से लाए जरूर थे, लेकिन बाद के दशकों में हिन्दुस्तानी संसदीय व्यवस्था ने ऐसी परंपरा को देशद्रोही करार देकर देश निकाला दे दिया था।

आज जब दुनिया के सभ्य लोकतंत्रों में नैतिकता के पैमाने बढ़ते जा रहे हैं, उन पर अमल बढ़ते जा रहा है, तब भारतीय राजनीति नैतिकता से पूरी तरह आजाद हो चुकी है। लोकतंत्र की इस नाजायज औलाद से तकरीबन तमाम पार्टियों और तकरीबन तमाम सदनों ने छुटकारा पा लिया है, किसी ने इसे पास के घूरे पर फेंक दिया है, किसी ने इसे करीब के गटर में डाल दिया है। यह सिलसिला भारतीय संसदीय राजनीति को स्तरहीन और घटिया बनाते चल रहा है। और जहां तक घटियापन का सवाल है, उसमें हमेशा ही और नीचे गिरने की गुंजाइश रहती है, और वह गिरना अभी जारी है।

ब्रिटिश संसद के इन ताजा विवादों को देखें, तो वे अपने आपमें खराब हैं, लेकिन संसदीय व्यवस्था और राजनैतिक नैतिकता का हाल यह है कि वे इनमें से किसी भी मुद्दे को दबा-छुपाकर नहीं रख रहे हैं, बल्कि उनसे जूझ रहे हैं, उन्हें मंजूर कर रहे हैं, और सुधार की कोशिश कर रहे हैं। जब तक इंसान रहेंगे, तब तक गलतियां और गलत काम दोनों ही होते रहेंगे, इंसान के बेहतर बनने का सुबूत यही होता है कि वे किस तरह अपनी गलतियों और गलत कामों से उबरते हैं। हिन्दुस्तानी लोग अपने-अपने प्रदेशों और पूरे देश के विधायकों और सांसदों से जुड़े हुए विवाद याद करके देखें कि उन पर उन नेताओं, और उनकी पार्टियों का क्या रूख रहा। किसी देश का संसदीय विकास 20 हजार करोड़ के नए संसद परिसर से नहीं होता है, बल्कि संसदीय परंपराओं के अधिक गरिमामय होने, और अधिक लोकतांत्रिक होने से होता है। बहस के बजाय बहुमत के ध्वनिमत की गूंज को संभालने के लिए 20 हजार करोड़ की छत कुछ महंगी नहीं है?

(Daily Chhattisgarh)