अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी का भारत का दावा एक हफ्ते के भीतर हवा हो गया!

 15 मई 2022


भारत सरकार का एक और फैसला लोगों को हैरान भी कर रहा है, और अनाज की कमी का सामना कर रही दुनिया को सदमा भी पहुंचा रहा है। लेकिन खुद हिन्दुस्तान के भीतर अभी यह साफ नहीं है कि केन्द्र सरकार ने एक हफ्ते के भीतर अपनी खुद की नीतिगत घोषणाओं पर इतना बड़ा यूटर्न क्यों लिया है? दुनिया में गेहूं की एक तिहाई सप्लाई अकेले यूक्रेन-रूस से होती थी, और अब वहां चल रही जंग की वजह से वहां से कुछ भी अनाज निकलना बंद है। ऐसे में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है, और दुनिया की निगाहें भारत की ताजा फसल पर लगी हुई थी। हिन्दुस्तानी किसान, हिन्दुस्तानी कारोबारी, सभी को यह उम्मीद थी कि बढ़े हुए अंतरराष्ट्रीय दामों पर उनका गेहूं दूसरे देशों में हाथों हाथ लिया जाएगा, और सबको कमाई होगी। खुद सरकार ने इसी हफ्ते गेहूं रिकॉर्ड निर्यात के लक्ष्य की घोषणा की थी, और यह कहा था कि भारत अपने कारोबारी प्रतिनिधि मंडल को किन-किन देशों में भेजने जा रहा है जिससे कि निर्यात को मजबूत करने के नए तरीके निकाले जा सके। लेकिन हफ्ता भी पूरा नहीं गुजरा, और केन्द्र सरकार ने गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया।

दुनिया के कई विकसित देशों ने भारत के इस फैसले पर अफसोस जाहिर किया है। जी-7 देशों ने खुलकर भारत के इस फैसले की निंदा की है। जर्मन कृषि मंत्री ने कहा है कि अगर हर देश इसी तरह निर्यात प्रतिबंध लगाते चलेगा तो उससे हालात बहुत बुरे होंगे। दुनिया को हिन्दुस्तानी यूटर्न पर हैरानी इसलिए भी हो रही है कि भारत में इस बरस गर्मी का मौसम आने के पहले पड़ी भयानक गर्मी से गेहूं की फसल घट जाने का अनुमान कई हफ्ते पहले ही आ चुका था। भारत की अपनी घरेलू जरूरत, यहां लोगों को सरकारी राशन में मुफ्त या रियायती दिया जाने वाला अनाज भी सरकार की फाइलों में अच्छी तरह दर्ज था। सरकार के पास अनाज का कितना स्टॉक है, और अगले बरस की फसल आने तक कितने स्टॉक की जरूरत रहेगी, किसी प्राकृतिक विपदा की नौबत में कितना अनाज सुरक्षित रखा जाना जरूरी है, ये तमाम आंकड़े कृषि अर्थव्यवस्था और अनाज के कारोबारी में लगे आम लोगों की भी जुबान पर हैं। इसलिए यह कल्पना नहीं की जा सकती कि भारत सरकार में बैठे हुए पूरी तरह से जानकार लोगों को इस एक हफ्ते में अचानक कोई नई जानकारी मिली है जिससे कि सरकार का रूख इतना बदल गया है।

इस तस्वीर को देखने के कई अलग-अलग पहलू हैं। पहली बात तो यह कि आज दुनिया में जब दसियों करोड़ लोगों के भूख से मरने की नौबत आई हुई है, उस वक्त हिन्दुस्तान को अपना अंतरराष्ट्रीय सरोकार भी निभाना चाहिए। दूसरी बात यह कि निर्यात पर रोक लगने से भारतीय किसान को भी उसकी उपज का अच्छा दाम नहीं मिल सकेगा, और इसीलिए किसान संगठनों से लेकर कांग्रेस पार्टी तक ने सरकार के इस निर्यात प्रतिबंध का विरोध किया है। कांग्रेस नेता पी.चिदम्बरम ने सार्वजनिक रूप से इस प्रतिबंध को किसान-विरोधी कहा है, और कहा है कि आज बढ़े हुए दामों पर निर्यात से जो फायदा किसानों को हो सकता था सरकार उन्हें उससे वंचित कर रही है। उनका कहना है कि सरकार खुद गेहूं की खरीदी करने में पीछे रही है, और इसीलिए आज वह निर्यात को रोक रही है। दूसरी तरफ देश में गरीबों को मुफ्त या रियायती अनाज देने के हिमायती तबके की प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है कि सरकार की कल्याण योजनाओं में जाने वाले अनाज को लेकर हालात क्या हैं, और गरीबों को ध्यान में रखते हुए सरकार को अनाज कितना बचाकर रखना चाहिए।

लेकिन इन सबसे परे सबसे अधिक सदमा पहुंचाने वाली बात केन्द्र सरकार के फैसले का तरीका है। चार दिन पहले जो हिन्दुस्तानी अनाज निर्यात का एक नया रिकॉर्ड बनाने की घोषणा कर रही थी, जिसने देशों की शिनाख्त कर ली थी कि किन देशों में गेहूं निर्यात संभावना के लिए हिन्दुस्तानी प्रतिनिधि मंडल जाएंगे, और सरकार की निर्यात घोषणा के पहले से भी दुनिया को उम्मीद थी कि रूस-यूक्रेन से आई कमी की भरपाई में भारत मददगार होगा। ऐसी तमाम बातों को चार दिन के भीतर ही कूड़े के ढेर में डाल देने का केन्द्र सरकार का यह फैसला समझ से परे है, यह लापरवाह, मनमाना, और सरोकारविहीन फैसला लगता है। न तो इससे हिन्दुस्तानी किसान खुश हैं, और न ही अंतरराष्ट्रीय बिरादरी। भारत वैसे भी यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर अपनी चुप्पी की वजह से दुनिया के एक बड़े हिस्से की आलोचना झेल रहा है। बहुत से लोगों को यह निराशा हो रही है कि भारत विश्व शांति के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं कर रहा है, या कोई भी कोशिश नहीं कर रहा है। भारत के बारे में ऐसा भी लग रहा है कि उसने अपने लोगों की जरूरतों को सबसे ऊपर रखा है, और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से वह पीछे हट गया है। उस विश्वधारणा में अब गेहूं को लेकर सरकार का फैसला और जुड़ गया है। आज जब दुनिया में अनाज की नौबत यह है कि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की मदद से जिन देशों में लोग जिंदा हैं, उन देशों में भी अब अनाज की कमी के चलते हर व्यक्ति को एक वक्त का खाना देने के बजाय कुछ आबादी को दोनों वक्त का खाना देकर जिंदा रखा जा रहा है, और कुछ लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया जा रहा है कि सबकी मौत के बजाय कुछ को जिंदा रखना बेहतर है। ऐसी भयानक नौबत के वक्त हिन्दुस्तान पहले तो खुद होकर अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही और जिम्मेदारी का दावा करता है, और फिर हफ्ता गुजरने के पहले ही इतना बड़ा फैसला बदल लेता है जिससे दुनिया की भूख जुड़ी हुई है। भारत सरकार का यह फैसला हमारे जैसे लोगों को भी सदमा देता है जो कि भारत को आजाद इतिहास में अंतरराष्ट्रीय मुखिया देखते आए हैं, और जिन्हें आज भी इस देश से अधिक जिम्मेदार रहने की उम्मीद थी।

(Daily Chhattisgarh)

दौलतमंद-ताकतवर मुजरिम सस्ते में क्यों छोड़े जाते हैं?

  15 मई 2022

 

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वाली तीन जजों की एक बेंच ने मध्यप्रदेश के एक एबीवीपी पदाधिकारी को हाईकोर्ट से मिली जमानत रद्द कर दी, और हफ्ते भर में सरेंडर करने के लिए कहा। जबलपुर में एक छात्रा से बलात्कार के आरोपी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक नेता को जब हाईकोर्ट से जमानत मिली थी, तो शहर में ‘भैय्या इज बैक’ के बैनर-होर्डिंग लगाए गए थे। इस पर बलात्कार-पीडि़ता छात्रा की ओर से जमानत रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई गई थी, तो वहां पर मुख्य न्यायाधीश ने इस पर भारी नाराजगी के साथ आरोपी के वकील से कहा था कि क्या आप जश्न मना रहे हैं? अदालत ने यह माना था कि बैनरों पर जिस तरह का महिमामंडन किया गया है, और जैसे नारे लिखे गए हैं, उससे समाज में अभियुक्त की ताकत का अंदाज लगता है। इससे शिकायतकर्ता के मन में डर पैदा होना स्वाभाविक है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कम से कम दस साल  की सजा वाले इस अपराध में इस तरह के बेशर्म बर्ताव ने शिकायतकर्ता के मन में डर पैदा किया है, इससे निष्पक्ष सुनवाई की संभावना खत्म होती है, और गवाहों को प्रभावित करने की संभावना पैदा होती है।

अदालत का यह एक शानदार रूख है जो कि देश में अंधाधुंध ताकत रखने वाले मुजरिमों का बेशर्म हौसला घटाता है, और कमजोर तबके के पीडि़तों के मन में एक उम्मीद जगाता है। इस अखबार में हम लगातार इस बारे में लिखते हैं कि जब मुजरिम किसी बड़े ओहदे पर बैठा हुआ हो, सामाजिक या राजनीतिक ताकत वाला हो, उसके पास बहुत सी दौलत हो, तो उसके जुर्म पर अधिक बड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए। फिर अगर ऐसे ताकतवर मुजरिम के जुर्म के शिकार कमजोर लोग हों, गरीब या महिलाएं हों, प्रकृति या जानवर हों, तो भी उनके लिए ऐसी जुर्म की आम सजा के मुकाबले अधिक कड़ी सजा का इंतजाम रहना चाहिए। यह बात समझने की जरूरत है कि कानून की नजर में सबको एक बराबर देखने और रखने की गलती खत्म की जानी चाहिए। कानून को मुजरिम की ताकत को घटाने का काम भी करना चाहिए, और समाज से गैरबराबरी को हटाने का काम भी करना चाहिए। हमने पहले इसी जगह यह लिखा है कि अगर ताकतवर और संपन्न तबके के किसी मुजरिम से किसी गरीब को नुकसान होता है, तो कानून को इस तरह बदलना चाहिए कि बाकी सजा के साथ-साथ उसकी संपन्नता का एक हिस्सा भी गरीब को मिले। मिसाल के तौर पर अगर कोई अरबपति या करोड़पति किसी गरीब लडक़ी से बलात्कार करे, तो जब वह साबित हो जाए, तब उसकी दौलत का एक हिस्सा, एक बड़ा हिस्सा उस लडक़ी को मिलना चाहिए। भारत के कानून में ऐसे फेरबदल की जरूरत है। आज किसी जुर्म के लिए किसी गरीब को जितनी सजा होती है, किसी अरबपति को भी उतनी ही सजा होती है, जबकि पैसे वाले के पास पुलिस और गवाह को खरीदकर, सुबूत और जज को खरीदकर बच निकलने की बड़ी गुंजाइश रहती है, और बड़ी दौलत शायद ही कभी सजा पाने देती है।

अब हिन्दुस्तान की संसद से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह संपन्न तबके के खिलाफ इस तरह का कोई कानून बनाएगी। इसकी पहली वजह तो यह है कि पिछले दशकों में संसद और विधानसभाओं में घोषित रूप से करोड़पति लोगों का अनुपात बढ़ते-बढ़ते अब आसमान पर पहुंच गया है। अब संसद में एक तबका तो अरबपति सांसदों का भी है, और ऐसा ताकतवर तबका, या कि देश की ताकतवर नौकरशाही ऐसा कानून बनने नहीं देगी जो कि उनके वर्गहितों के खिलाफ रहेगा। किसी नौकरशाह को उसके बलात्कार पर अधिक कड़ी सजा हो, अधिक बड़ा जुर्माना देना पड़े, ऐसे कानून को बनाने की पहल वह नौकरशाही क्यों करेगी? संपन्नता के साथ यह एक बड़ी दिक्कत रहती है कि वह अपने आपमें एक वर्ग का बाहुबल बन जाती है, और कमजोर तबकों के खिलाफ सामंती मिजाज से जुल्म तेज करने लगती है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट में कभी-कभी ऐसे मुख्य न्यायाधीश भी आते हैं जो कि संविधान के प्रति अपनी जिम्मेदारी को अपने बुढ़ापे के इंतजाम से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। रिटायर होने के बाद बरसों तक सहूलियतों को जारी रखने का लालच जिन्हें नहीं रहता है, वैसे ही जज सरकार की मर्जी के खिलाफ भी कोई फैसले दे पाते हैं। ऐसे ही किसी जज को इस किस्म के मुद्दे को उठाना चाहिए कि एक गरीब और एक अमीर, एक कमजोर और एक ताकतवर को किसी जुर्म पर एक सरीखी सजा कैसे दी जा सकती है? और यह भी कि जुर्म करने वाले संपन्न की दौलत का एक बड़ा हिस्सा जुर्म के शिकार को क्यों न दिया जाए?

भारत जैसे गैरबराबरी वाले समाज में वैसे भी किसी ताकतवर या संपन्न के कटघरे तक पहुंचने की संभावना बहुत कम रहती है। ऐसे में जब बिना किसी शक के अदालत ऐसे किसी को सजा के लायक पाए, तो उसकी संपन्नता की सारी हेकड़ी भी निकाल देनी चाहिए, और उसकी दौलत की ताकत का बेहतर इस्तेमाल पीडि़त परिवार या समाज के लिए होना चाहिए। कानून की नजर में बराबरी ऐसी ही सोच से साबित हो सकती है, न कि हर किसी को एक बराबर सजा देने से कोई बराबरी साबित होगी। दौलत को दी गई सजा से मुजरिम का बाकी परिवार भी प्रभावित होगा, और संपन्नता की बददिमागी को घटाने के लिए यह जरूरी भी है।

देश में एक ऐसी संसद की जरूरत है जो कि अलग-अलग किस्म के जुर्म पर संपन्न मुजरिम की दौलत का एक अनुपात जुर्माने के रूप में जब्त और वसूल करने का कानून बना सके। बलात्कार साबित होने पर कैद के साथ-साथ एक चौथाई दौलत बलात्कार की शिकार को मिले, या हत्यारा साबित होने पर संपन्न की आधी दौलत पीडि़त परिवार को मिले, तो ही कोई इंसाफ हो सकेगा।

इंसाफ की देवी को आंखों पर पट्टी बंधी हुई दिखाया जाता है, लेकिन कानून को इतना अंधा भी नहीं होना चाहिए कि वह संपन्नता की बददिमागी को सजा देने की न सोच पाए।

(Daily Chhattisgarh)

 

बात की बात, 13 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)

...इस बुलडोजरी-जुल्म के खिलाफ जाएं तो जाएं कहां?

13 मई 2022


मध्यप्रदेश का डिंडौरी जिला छत्तीसगढ़ के करीब है, और इसकी पहचान एक आदिवासी इलाके के रूप में होती है। लेकिन अभी चार दिन पहले की एक खबर बताती है कि ऐसे इलाके में भी हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक तनाव इतना बढ़ गया है, और मध्यप्रदेश की भाजपा की शिवराज सिंह सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में बुलडोजर को अल्पसंख्यकों के खिलाफ जिस तरह एक राजकीय हथियार बनाकर चल रही है, वह नौबत कितनी भयानक हो सकती है। एक हिन्दू लडक़ी और मुस्लिम लडक़े के बीच स्कूल के समय से मोहब्बत चली आ रही थी, और दोनों के परिवारों को भी यह बात मालूम थी। लेकिन लडक़ी का परिवार इस शादी के लिए तैयार नहीं था, इसलिए लडक़ी खुद घर छोडक़र चली गई और उसने फोन करके लडक़े को बुलाया, और दोनों ने जाकर एक हिन्दू मंदिर में शादी कर ली। इस पर लडक़ी के परिवार ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई और हिन्दू साम्प्रदायिक संगठनों ने प्रदर्शन करते हुए प्रशासन से यह मांग की कि इस लडक़े के परिवार के घर-दुकान गिराए जाएं। चूंकि भारत में हिन्दुत्व के सबसे कट्टर राज, उत्तरप्रदेश से यह सिलसिला शुरू हो चुका है कि मुस्लिमों को खत्म करने के लिए उनके सिर की छत और उनके रोजगार को बुलडोजर से खत्म कर दिया जाए, इसलिए हिन्दुत्व टीम के उपकप्तान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी इसी श्लोक का पाठ करते हैं, और उन्होंने जगह-जगह यही काम किया भी है। यह किसी और का आरोप नहीं है बल्कि डिंडौरी के कलेक्टर रत्नाकर झा ने खुद होकर कई तस्वीरें पोस्ट की हैं, और यह लिखा है- डिंडौरी जिले में छात्रा के अपहरण के मामले में आरोपी आसिफ खान के दुकान और मकान को जमींदोज कर दिया गया है। दो दिन तक आरोपी आसिफ खान की दुकानों सहित उसके अवैध मकान पर कार्रवाई की गई है। इसके साथ माफियामुक्तएमपी का हैशटैग भी लगाया गया है, और इस ट्वीट को सीएममध्यप्रदेश को टैग भी किया गया है। कलेक्टर ने लिखा है कि उन्होंने कार्रवाई करते हुए बुलडोजर/जेसीबी चलवाकर दुकानों और मकान को तोड़ दिया है। अब हिन्दू लडक़ी और मुस्लिम लडक़े की शादी पर साम्प्रदायिक संगठन तो अभी तक खुद बुलडोजर नहीं चला पा रहे हैं, लेकिन उनके लिए यह अधिक सहूलियत की बात है कि उनकी फरमाईश को प्रशासन विविध भारती की तरह पूरा कर रहा है, और सरकारी खर्च पर, पुलिस की मौजूदगी में मुस्लिमों के घर-दुकान जमींदोज किए जा रहे हैं। इस लडक़े के परिवार को पूरा गांव छोडक़र चले जाना पड़ा है, और रिश्तेदारों के यहां दिन गुजार रहे हैं। परिवार का कहना है कि 1992 में पंचायत ने सभी की सहमति से उन्हें यह घर आबंटित किया था।

हिन्दुस्तान में इन दिनों चल रहे बुलडोजर-इंसाफ पर सुप्रीम कोर्ट का रूख भी बड़ा ही हैरान करने वाला है। सीपीएम की नेता बृन्दा करात दिल्ली में मुस्लिमों बस्तियों पर बुलडोजर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची हुई हैं, और उन्हें अदालत ने प्रभावित पक्ष मानने से इंकार कर दिया, और हाईकोर्ट जाने कहा है। तब तक दिल्ली में छांट-छांटकर मुस्लिमों इलाकों में बुलडोजर चलाना जारी है, अधिकतर जगहों पर लोगों का कहना है कि उन्हें कोई नोटिस नहीं मिला था। अब डिंडौरी के मामले से तो यह जाहिर है कि हिन्दू-मुस्लिम शादी के चार दिन के भीतर अगर प्रशासन बड़े गर्व के साथ मुस्लिम परिवार के मकान-दुकान को जमींदोज करने की कामयाबी लिख रहा है, और मध्यप्रदेश को माफियामुक्त कराने का दंभ भी दिखा रहा है, तो इसके लिए अब क्या किसी अमरीकी अदालत में जाकर अपील की जाए? अगर हिन्दुस्तान में बड़ी अदालतों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास है, तो अब तक मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को खुद होकर इस मामले में राज्य सरकार और डिंडौरी कलेक्टर को नोटिस जारी करना था, और पूछना था कि दो वयस्क लोगों की शादी में कौन सी माफिया हरकत शामिल है, और किस तरह प्रशासन किसी के मकान-दुकान को जमींदोज करने का काम कर सकता है? अगर अदालत इतना भी पूछने का सरदर्द नहीं ले रही है, तो फिर इंसाफ की गुंजाइश कम ही दिखती है। कायदे की बात तो यह होती कि सीधे सुप्रीम कोर्ट को ऐसे नोटिस जारी करने थे, और पगड़ी बांधे प्रोफाइल फोटो वाले कलेक्टर को कटघरे में बुलाना था। अदालतों को और कुछ नहीं तो कम से कम यह तो सोचना ही चाहिए कि एक बुलडोजर उनका विकल्प बना दिया गया है, और हिन्दुस्तान में न्यायपालिका का एकाधिकार एक कलेक्टर या म्युनिसिपल कमिश्नर छीन ले रहे हैं। ऐसा लगता है कि आंखों पर पट्टी बांधी हुई न्याय की देवी की आत्मा गुजर चुकी है, और एक मुर्दा बदन से तराजू टंगा रह गया है।

सुप्रीम कोर्ट बृन्दा करात के मामले की सुनवाई करते हुए इस बात को जाने क्यों अनदेखा कर रहा है कि भाजपा के राज वाले कई प्रदेशों में एक सिलसिले से ऐसे बुलडोजर चल रहे हैं। फिर हिन्दुस्तान में बीते कई दशकों में धीरे-धीरे करके अल्पसंख्यक समुदायों की रिहाईश हर शहर में कुछ चुनिंदा इलाकों में होती चली गई है। ऐसी मुस्लिम बस्तियों को कई शहरों में साम्प्रदायिक जुबान में मिनी पाकिस्तान कहा जाता है, और यहां तक म्युनिसिपल की सहूलियतें, या राज्य सरकार की इलाज और पढ़ाई की सहूलियतें बहुत कम पहुंच पाती हैं। ऐसे में मुस्लिम इलाकों की शिनाख्त एकदम साफ रहती है, और अब जब सरकारी बुलडोजरों को मुस्लिमों के कपड़े सुंघाकर उनके खिलाफ छोड़ा जा रहा है, तो भी इस नौबत को देखने से सुप्रीम कोर्ट इंकार कर रहा है। जब लोगों की जिंदगी भर की कमाई, रोजगार का अकेला जरिया, सिर छुपाने की अकेली छत, इन सबको बड़े गर्व के साथ खत्म किया जा रहा है, तब भी सुप्रीम कोर्ट के माथे पर शिकन नहीं आ रही है। ऐसे ही बुलडोजर किसी दिन असहमति वाले जजों के गाऊन सुंघाकर उनके पीछे छोड़े जाएंगे, तो उस दिन जजों के पास कोई नोटिस जारी करने के कलम-कागज भी नहीं बचेंगे।

यह नौबत ऐसी दिख रही है कि हिन्दुस्तानी अदालतों से कोई राहत न मिलने पर अब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय या संयुक्त राष्ट्र संघ में अपील की जाए, और अभी कम से कम राजद्रोह के नए मामले दर्ज करने पर रोक लगी है, इसलिए ऐसी अपील करने वालों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा तुरंत दर्ज नहीं हो सकेगा। लेकिन आज जिस तरह धर्म देखकर बुलडोजर हांका जा रहा है, उसके खिलाफ अदालतों में जैसा सन्नाटा दिख रहा है, वह नौबत लोकतंत्र में बर्दाश्त करने लायक नहीं है। ऐसी अदालती चुप्पी और अनदेखी के खिलाफ भी लोगों को सडक़ों पर आना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 12 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)

निकम्मे और भ्रष्ट को जनता के पैसों पर कब तक ढोना जायज होगा?

12 मई 2022


रेलवे की खबर है कि मोदी सरकार ने रेल मंत्रालय के 19 अफसरों को जबरदस्ती वीआरएस दे दिया जिनमें 10 तो संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी थे। रेलवे ने पिछले 11 महीनों में 75 बड़े अफसरों को वीआरएस दिया है। इनके बारे में कहा गया है कि ये ईमानदारी से काम नहीं कर रहे थे, नालायकी दिखा रहे थे, या उनके काम को लेकर दूसरी शिकायतें थीं। अब इस बात से एक सवाल यह उठता है कि केन्द्र सरकार अफसरों के इसी दर्जे, संयुक्त सचिव स्तर पर बिना किसी इम्तिहान, बिना किसी मुकाबले लोगों की सीधी भर्ती भी कर रही है। लेटरल एंट्री कहे जाने वाले ऐसे दाखिले को लेकर लोगों के मन में वैसे भी यह सवाल खड़ा हुआ है कि यह यूपीएससी सरीखी परीक्षा में बराबरी का अवसर पाने का मौका लोगों से छीनता है, और सरकार मनचाहे लोगों की भर्ती कर रही है। ऐसे में बड़ी संख्या में अफसरों को नौकरी से निकालना भी इससे जोडक़र देखा जाना चाहिए कि सरकार जिन लोगों को नापसंद कर रही है, या सचमुच ही जिनका काम खराब है, उन्हें निकाला जा रहा है। इन दोनों बातों को एक साथ देखें तो केन्द्र सरकार की नौकरशाही में एक तेज रफ्तार बदलाव आ रहा है, और इसके नफे या नुकसान दोनों ही गिनाए जा सकते हैं।

लेकिन आज हम इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों को लेकर आम जनता के मन में लगातार यह नाराजगी और शिकायत रहती है कि ये लोग जनता के पैसों पर तनख्वाह पाते हैं, सहूलियतें पाते हैं, लेकिन काम की इनकी संस्कृति जनविरोधी रहती है। सोशल मीडिया पर लोग इस बात को लिखते आए हैं कि सरकारी अमला काम न करने की तनख्वाह लेता है, और काम करने की रिश्वत। और यह बात बहुत गलत भी नहीं है। हर विभाग के हर अफसर-कर्मचारी के पास रिश्वत लेने की गुंजाइश शायद न रहती हो, लेकिन हिन्दुस्तान में रिश्वत का सिलसिला किसी बदहाल तालाब पर फैली हुई जलकुंभी सरीखा है। लोगों को याद होगा कि सरकारी दफ्तरों में काम न करने की जो संस्कृति है उस पर कई हिन्दी टीवी सीरियल बन चुके हैं, और आम जनता मुसद्दीलाल सरीखी बदहाल भटकती रहती है। अब ऐसे में सरकारी नौकरी के लोगों को रिटायर होने की उम्र तक नौकरी की सुरक्षा देना क्या ठीक है?

प्रशासन के जानकार विशेषज्ञ कई किस्म की बातें कर सकते हैं, लेकिन वैसी जानकारी से नावाकिफ हमारे सरीखे मामूली समझ के लोग यह महसूस कर सकते हैं कि पूरी जिंदगी की नौकरी की गारंटी से सरकारी अमला निकम्मा हो जाता है। यही अमला किसी दर्जे का काम निजी दफ्तरों और दुकानों में इससे एक चौथाई तनख्वाह पर करने को तैयार रहता है, और चार गुनी तनख्वाह की हसरत लिए हुए सरकारी नौकरी कोशिश करते रहता है। निजी नौकरी में जहां कोई गारंटी नहीं होती है, कोई मजदूर कानून लागू नहीं होते हैं, वहां लोग मेहनत से काम करते हैं। और जब सरकार में सारी हिफाजत हासिल रहती है, एक कर्मचारी की सरकार पर लागत निजी क्षेत्र के मुकाबले चार गुना आती है, तो भी यह अमला काम नहीं करता। यह सरकार में भी है, और सरकारी क्षेत्र के बैंकों में भी है। एक सरकारी बैंक तो काम न करने के लिए इस कदर बदनाम है कि अभी जब एलन मस्क ने ट्विटर खरीदा, तो लोगों ने मजाक में एक ट्वीट गढ़ा कि मस्क ने ट्वीट किया कि उसने भारत के इस सबसे बड़े सरकारी बैंक को खरीदने का प्रस्ताव रखा, तो बैंक ने जवाब दिया कि अभी लंच चल रहा है, बाद में आना।

मुद्दे की बात पर आएं तो हमारा यह मानना है कि सरकारी नौकरी कई कड़ी शर्तों के साथ शुरू होनी चाहिए। तीस-पैंतीस बरस की सरकारी नौकरी रहती है, और इसे चार हिस्सों में बांटना चाहिए, और हर सात-आठ बरस के बाद कर्मचारी और अधिकारी का मूल्यांकन होना चाहिए, और सबसे खराब काम करने वाले लोगों की छंटनी करने का नियम रहना चाहिए। यह बात कर्मचारी संघों के नेताओं को बहुत खराब लगेगी, लेकिन जब वे आम जनता की नजर से देखेंगे तो सरकारी दफ्तरों में बैठे हुए निकम्मे, और ऊपर से भ्रष्ट लोगों से जनता को जो तकलीफ होती है, तब उन्हें हमारी बात का तर्क समझ आएगा। सरकारी नौकरी का कोई हिस्सा ऐसी सुरक्षा का नहीं रहना चाहिए कि लोग मनमाना भ्रष्टाचार करके भी कुर्सी पर बने रहें। हर आठ बरस में लोगों का प्रमोशन भी हो, और उसके ठीक पहले उनका मूल्यांकन हो। जिनका काम ठीक नहीं हो ऐसे एक चौथाई लोगों को हटाने का कानून रहना चाहिए। अगले आठ बरस बाद बाकी लोगों में से फिर एक चौथाई को हटा दिया जाए, और यह सिलसिला रिटायर होने तक चलता रहे। इससे कम किसी बात से हिन्दुस्तान के सरकारी कामकाज को सुधारना मुमकिन नहीं है।

हिन्दुस्तान में सत्ता की राजनीति, और सरकारी नौकरी, इन दोनों के बीच भ्रष्टाचार की एक मजबूत भागीदारी कायम हो चुकी है। इन दोनों ही मोर्चों पर जब तक बुनियादी सुधार नहीं होगा, तब तक जनता के हिस्से का पैसा इसी तरह डूबते रहेगा। आज देश का कानून जिस तरह भ्रष्ट और मुजरिम लोगों के साथ है, उन्हें अंत तक हिफाजत देते चलता है, वैसे में यह जरूरी है कि सरकारी नौकरी की सुरक्षा खत्म की जाए, और जिस तरह नौकरी के लिए एक दाखिला इम्तिहान होता है, उसी तरह नौकरी जारी रखने के लिए भी हर आठ बरस में एक मूल्यांकन हो जिससे कि लोगों को काम करने का प्रोत्साहन मिलता रहे। आज तो सरकारी कामकाज में हालत यह है कि सबसे काबिल और सबसे नालायक, इन दोनों किस्म के लोगों के बीच रिटायर होने तक कोई खास फर्क नहीं हो पाता है। बेहतर काम करने का कोई प्रोत्साहन सरकार में नहीं रहता है, और भ्रष्ट और नालायक होने से भी कोई नुकसान नहीं होता है। केन्द्र सरकार ने जिस तरह बड़ी संख्या में अफसरों को हटाया है, उसे हम पहली नजर में कोई बदनीयत नहीं मान रहे, और जिस तरह खेतों में से जंगली घास को हटाया जाता है, उसी तरह सरकार से बेकार अफसर-कर्मचारी हटाए जाने चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 11 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)

राजद्रोह का कानून, न तो इस देश को जरूरत है, और न ही संभालने लायक लोग हैं

11 मई 2022


सुप्रीम कोर्ट में अभी राजद्रोह कानून को लेकर बहस चल रही है। और यह बहस दो वकीलों की बीच में नहीं चल रही, यह अदालत और सरकारी वकील के बीच चल रही है। 1870 में आजादी के आंदोलन को कुचलने के लिए अंगे्रजों का लाया गया कानून आज डेढ़ सदी बाद भी आजाद हिंदुस्तान की पौन सदी पूरी होने के मौके पर जंगली घास की फसल सरीखे लहलहा  रहा है। देश और प्रदेशों की सरकारें एक-एक बयान पर, एक-एक कार्टून पर, एक-एक ट्वीट पर इस कानून का इस्तेमाल कर रही हैं, मानो आजाद हिंदुस्तान के किसी नागरिक के कुछ शब्द देश की सरकार को पलटने का काम करने जा रहे हैं। लोगों के शब्दों की इतनी कीमत तो कभी नहीं थी। अंगे्रजों के वक्त भी गांधी और नेहरू की कही और लिखी बातों पर उनके खिलाफ इस कानून का ऐसा अंधाधुंध इस्तेमाल नहीं हुआ था जैसा कि आज चल रहा है। आज जब हम इस मुद्दे पर लिख रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार को इस बात का जवाब देना है कि यह कानून क्यों जारी रहना चाहिए, और अगर वह इस कानून पर पुनर्विचार कर रही है, तो वह पुनर्विचार होने तक राज्यों को इसके इस्तेमाल से रोक क्यों नहीं रही है?

अभी दोपहर आई खबर के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह कानून के तहत देश में चल रहे तमाम मामलों की कार्रवाई तब तक के लिए रोक दी है जब तक केंद्र सरकार इस कानून के प्रावधानों पर पुनर्विचार नहीं कर लेता।

जब कोई ताकत राज करती है, तो उसे द्रोह का डर सताते रहता है। फिर चाहे वह लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार ही क्यों न हो, जिसका कि अधिकतम कार्यकाल 5 बरस का ही हो सकता है। दरअसल होता यह है कि हिंदुस्तान की संवैधानिक व्यवस्था के चलते हुए कोई पार्टी सत्ता पर 33 बरस लगातार रहने के दिन भी देखती है, तो कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री 18-20 बरस तक भी लगातार रह लेते हैं। लोगों को राजद्रोह का खतरा शायद 5 बरस के कार्यकाल पर तो कम लगता होगा, लेकिन जब कार्यकाल की उम्मीद दशकों तक उडऩे लगती है, तो फिर ऐसे खतरे अधिक डराने लगते होंगे। दुनिया के बहुत से सभ्य लोकतंत्र अपने-आपको ऐसे 18वीं सदी वाले सामंती कानूनों से आजाद कर चुके हैं, लेकिन हिंदुस्तानियों की गुलाम-मानसिकता उन्हें गोरे अंगे्रज मालिकों के पखाने का टोकरा सिर पर ढोने का गौरव दिलाती रहती है, और अंगे्रजों की छोड़ी गई सर्द देश की पोशाक में आज उबलते हिंदुस्तान की अदालत में जज और वकील इस कानून पर बहस कर रहे हैं। गुलाम मानसिकता लोगों को हिंदुस्तान की जुबान से दूर करती है, इस देश के गरीबों से दूर करती है, और लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी बराबरी के हक से दूर करती है। इसलिए सत्ता पर बैठे हुए परले दर्जे के भ्रष्ट और दुष्ट लोग भी देश के जागरूक लोगों को उनका मुंह खुलने पर उसमें राजद्रोह के कानून पर तपाकर पिघलाया गया सीसा उसी तरह भर देते हैं, जिस तरह एक वक्त हिंदुस्तान में शूद्र के कानों में वेद के वाक्य पड़ जाने पर उनमें पिघला सीसा भर देने का कानून था। आज अगर इस देश का एक छात्रनेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में गृह मंत्री अमित शाह का कहा हुआ शब्द, जुमला, दुहराता है, तो केंद्र सरकार के साथ-साथ हाईकोर्ट के जज भी इस छात्रनेता के मुंह में पिघला हुआ सीसा भर देने पर आमादा दिखते हैं। राजद्रोह का कानून ताकतवर के हाथ में हर कमजोर के खिलाफ, हर अकेले, हर जागरूक के खिलाफ अपने गलत कामों को बचाने के लिए ढाल की तरह है, यह एक अलग बात है कि इसे ढकोसले के लिए लोकतंत्र को बचाने के औजार की तरह दिखाया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट में अभी चल रही बहस के दौरान सरकार शायद इसलिए इस पर पुनर्विचार का तर्क देकर इसकी सुनवाई को टालना चाह रही है कि कुछ ऐसे जज तब तक रिटायर हो जाएं जो कि सरकार को अपने हमदर्द नहीं लगते हैं। अदालतों में ऐसी धूर्तता एक आम तरकीब रहती है, और इसे भांपते हुए ही इस मामले में याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल ने टालने की इस तरकीब का विरोध किया है और कहा है कि अदालत की कार्रवाई इसलिए नहीं रोकी जा सकती कि सरकार उस पर विचार करने की बात कर रही है। लेकिन इस मामले में वकील कपिल सिब्बल का एक तर्क उनकी पार्टी के लिए घातक साबित हुआ है जिसमें उन्होंने कहा कि नेहरू ने कहा था कि हम जितनी जल्दी राजद्रोह कानून से छुटकारा पा लें, उतना अच्छा है। बिना कहे हुए कांगे्रस पार्टी के बड़े-बड़े मंत्रालय संभाल चुके कपिल सिब्बल ने यह मंजूर कर लिया, याद दिला दिया कि नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक अनगिनत सरकारें चलाते हुए भी कांगे्रस पार्टी ने इस कानून को खत्म नहीं किया था। जाहिर है कि मौका मिलते ही केंद्र सरकार के वकील ने सिब्बल के जवाब में कहा कि हम वही करने की कोशिश कर रहे हैं जो नेहरू नहीं कर सके थे।

अभी सुप्रीम कोर्ट से आ रही ताजा जानकारी बता रही है कि केंद्र सरकार ने उसके पुनर्विचार तक इस कानून के तहत दर्ज मामलों पर कार्रवाई रोकने का विरोध किया है, और यह सुझाया है कि राजद्रोह के मामले पुलिस अधीक्षक की पड़ताल के बाद दर्ज करने की व्यवस्था की जाए। केंद्र सरकार का यह तर्क कॉमेडी शो जैसा लगता है क्योंकि आज तो पुलिस अधीक्षक ही नहीं, उनसे चार दर्जा ऊपर के अफसर भी सत्ता के सामने पांवपोंछना बने हुए बिछे रहते हैं, और सत्ता को नाखुश करने वाले कार्टूनिस्ट का सिर तोडऩे को एक पैर पर खड़े रहते हैं। हिंदुस्तान में राजनीतिक सत्ता का जो हाल है उसे देखते हुए इस तरह के कानून को इन बददिमाग और बेदिमाग हाथों में नहीं दिया जा सकता। पूरे देश में राजद्रोह के कानून का जिस कदर भयानक राजनीतिक और साम्प्रदायिक इस्तेमाल हो रहा है, वह किसी आतंकी समूह के हाथ परमाणु हथियार देने सरीखा है। इस लोकतंत्र को न तो ऐसे कानून की जरूरत है, और न ही इस लोकतंत्र की सत्ता ऐसा कानून संभालने के लायक है। अभी इस पल सुप्रीम कोर्ट के जज सुनवाई से बाहर आकर बंद कमरे में अपनी कार्रवाई तय कर रहे हैं, लेकिन उसके पहले ही हम इसके बुनियादी पहलू पर लिख रहे हैं जो कि अदालत के आज के रूख से अलग है।

(Daily Chhattisgarh)