हारे देश की जीते देश को मां की गाली देने की मुहिम का मतलब समझें..

5  सितंबर  2022
     हिन्दुस्तान के सोशल मीडिया को भाड़े की फौज कहकर कोसा जाता है कि दो-दो रूपये लेकर लोग ट्वीट करते हैं, और जिस पर हमला करने को कहा जाए उसे बलात्कार की धमकियां तक देते रहते हैं। अब यह इस देश के राष्ट्रवादियों के लिए सोचने की बात होनी चाहिए कि ऐसी हिंसक और अश्लील धमकियां देने वाले, सोशल मीडिया की हवा में जहर और नफरत घोलने वाले लोगों में से बहुतायत में लोग अपने प्रोफाइल फोटो में, अपने परिचय में, अपने राष्ट्रवादी और हिन्दुत्ववादी होने का दावा क्यों करते हैं? अगर ये लोग राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का बेजा इस्तेमाल करने वाले और झूठा प्रोफाइल बनाने वाले लोग हैं, तो आज तो देश की सरकार ही राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व की हिमायती है, और वह ऐसे लोगों की शिनाख्त करने की कानूनी ताकत भी रखती है। ऐसी कानूनी ताकत के बाद भी जब सोशल मीडिया पर दसियों लाख लोग साम्प्रदायिक हिंसा और नफरत को फैलाने का ओवरटाइम करते रहते हैं, तो फिर उन्हें पकडऩे और सजा देने में ढिलाई से क्या साबित होता है? 

आज इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि कल पाकिस्तान की क्रिकेट टीम ने हिन्दुस्तान की टीम को एक बड़े मैच में हराया, और उसके तुरंत बाद से हिन्दुस्तान के अनगिनत ट्विटर हैंडलों से पाकिस्तान के नाम मां की गाली का हैशटैग बनाकर उसके खिलाफ अंधाधुंध जहर उगलना शुरू कर दिया गया। जब हिन्दुस्तान की जमीन से रात-दिन राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का गुणगान करने वाले लोग तिरंगे झंडे की प्रोफाइल फोटो लगाए हुए यह गंदगी फैला रहे हैं, तो यह राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का झंडा लेकर चलने वाले लोगों की जिम्मेदारी हो जाती है कि वे अपने इन हिमायती साथियों को काबू करें। मैच हारने वाले देश के लोग अगर मैच जीतने वाले देश को मां की गालियां बकते हैं, तो वे गालियां बकने वालों को ही लगती हैं। 

लेकिन पहले देश के भीतर एक धर्म के खिलाफ, एक राजनीतिक विचारधारा के खिलाफ, एक नेता के खिलाफ नफरत और हिंसा भडक़ाने का नतीजा यह होता है कि आज ऐसे लोग क्रिकेट में हार को बर्दाश्त करने के बजाय मां-बहन की गालियों पर उतर आए हैं, और यह सडक़ पर बेनाम चेहरे के मुंह से निकली हुई गालियां नहीं हैं, ये सोशल मीडिया पर किसी नाम और चेहरे से निकली हुई गालियां हैं जिनका साइबर सुबूत भी मौजूद है। और जब देश की सरकार और इनकी हिमायती विचारधारा इन पर कोई कार्रवाई नहीं करती है, तो नतीजा यह होता है कि हिन्दुस्तानी टीम का एक खिलाड़ी एक कैच छोड़ देने की वजह से सोशल मीडिया पर लाखों लोगों द्वारा खालिस्तानी करार दिया जा रहा है। जो सोच अपने देश के लोगों को इंसानी लहू पिला-पिलाकर पालती है, उसे ऐसे इंसानखोर ही नसीब होते हैं जो कि लहू का अगला कटोरा लाने वाले को ही चीरकर खा जाएं। आज इस देश के एक गैरमुस्लिम खिलाड़ी को, सिक्ख खिलाड़ी को खालिस्तानी करार दिया जा रहा है। जिन्हें पाकिस्तान और मुस्लिमों को गाली दिलवाना ठीक लगते रहा, उन्हें इस नौबत के लिए तैयार रहना चाहिए कि आज देश के एक सिक्ख खिलाड़ी को भी खालिस्तानी आतंकी और देश का गद्दार कहा जा रहा है। इसके बाद अगली बारी हिन्दू धर्म के करीब के दूसरे धर्मों की रहेगी, उसके बाद हिन्दू धर्म के भीतर के कहे जाने वाले दलित-आदिवासियों को गद्दार करार दिया जाएगा। नफरत के साथ दिक्कत यह है कि वह प्राण फूंके गए शेर की तरह रहती है, और उसे खाने को कोई न कोई लगते हैं। नतीजा यह होता है कि जब पाकिस्तान की मां को 25-50 लाख गालियां दी जा चुकी हैं, तब एक हिन्दुस्तानी सिक्ख की बारी आ गई, और नफरत को इस देश के भीतर रोकने का कोई जरिया भी नहीं रह गया। 

जिन लोगों को यह लगता है कि सोशल मीडिया पर पाकिस्तान को मां की गालियां देकर वे क्रिकेट में हार का बदला ले लेंगे, वे लोग और उनकी औलादें जिंदगी में कभी कोई मैच नहीं जीत पाएंगे क्योंकि खेल के बजाय उन्हें गाली की ताकत पर भरोसा हो गया है। और सोशल मीडिया पर ही किसी समझदार ने यह भी याद दिलाया है कि पाकिस्तान को मां की गालियां बकने वाले लोग यह भी तो सोचें कि पाकिस्तान की मां आखिर है कौन? यह सवाल पूछने वाले ने जो नहीं लिखा है, उसे भी याद दिला देना ठीक होगा कि पाकिस्तान की मां तो वह अखंड भारत है जिसका सपना ये राष्ट्रवादी हिन्दुत्ववादी देख रहे हैं। अब वे सोचें कि ये गालियां आखिर किसके नाम लिखा रही हैं!   हिन्दुस्तान की जो सोच अपने मुंह मियां मि_ू होकर विश्वगुरू होने का दावा करती है, उसके नाम कल यह तो लिखा ही गया है कि खेल में हारने के बाद इस देश के लोगों ने जीतने वाली टीम के देश को मां की गाली देने में विश्व रिकॉर्ड बनाया है। अगर यही विश्वगुरू होना है, तो फिर क्या इसी संस्कृति पर यह देश गौरव करने जा रहा है? 

जब पूरे देश को नफरत और हिंसा का ऐसा खून मुंह लगा दिया गया है, तो यहां के बाकी लोगों को भी सावधान हो जाना चाहिए। ये लोग अभी तक तो अपनी हिंसक सोच से असहमत हिन्दुस्तानियों की मां-बहनों के नाम बलात्कार की धमकियां रात-दिन पोस्ट करते आए हैं, और अब वह बढक़र इस देश के एक खिलाड़ी तक पहुंच गई हैं। इस देश की जो सरकार ट्विटर के साथ देश की अदालतों तक में मुकदमे लड़ रही है कि बहुत सी सामग्री हटाई जाए, वह सरकार कल ट्विटर पर मां की गाली के इस हैशटैग को देखते हुए चुप थी, उसने ट्विटर से यह नहीं कहा कि इस हैशटैग को हिन्दुस्तान में ब्लॉक किया जाए। जब सरकार खुली आंखों से यह सब देखते हुए कोई भी कार्रवाई नहीं करती है, न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर, और न ही देश के नाम को कालिख पोतने वाले ऐसे हिंसक हिन्दुस्तानियों पर, तो फिर यह मानने की कोई वजह नहीं रह जाती कि यह सरकार इन गालियों से असहमत है। सरकार की तो यह कानूनी और संवैधानिक जिम्मेदारी ही है कि वह नफरत के खिलाफ कार्रवाई करे, लेकिन हिन्दुस्तानी सोशल मीडिया पर नफरत के जिस सैलाब को जिस तिरंगे झंडे के साथ बढ़ावा दिया जा रहा है, वह एक भयानक नजारा है, और अगर कुछ लोगों को यह लगता है कि यह देश आगे जाकर लोगों के लिए महफूज नहीं रह जाएगा, तो उन्हें गलत नहीं लगता है, यह देश आज भी उदार विचारधारा के लिए, लोकतांत्रिक सोच के लिए, सामाजिक इंसाफ के नजरिये के लिए महफूज नहीं रह गया है। क्रिकेट कोई ऐसी खबर नहीं है जो कि सरकार को न दिखे, और पाकिस्तान के साथ हिन्दुस्तान के रिश्ते ऐसे नहीं है कि सरकार पाकिस्तान के खिलाफ हिन्दुस्तान में चल रहे ऐसे किसी अभियान को न देखे। यह नौबत इस देश के चेहरे पर कालिख पोत चुकी है, और तथाकथित विश्वगुरू को अपनी इस गंदगी के बारे में सोचना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

मंदिर और भक्त का रिश्ता दुकानदार और ग्राहक का

4 सितम्बर 2022

 

देश के विख्यात तिरूपति मंदिर को लेकर कई बार यह आलोचना सामने आती है कि मंदिर ट्रस्ट अलग-अलग दाम की टिकटें बेचकर भक्तों और दर्शनार्थियों को अलग-अलग तेजी से दर्शन करवाता है। इसके अलावा कई किस्म की पूजा के लिए और भी महंगी टिकटें रहती हैं, और फिर देश-प्रदेश की सरकार या देश के कारोबार के अडानी-अंबानी जब मंदिर पहुंचते हैं तो तमाम लोगों को रोककर मंदिर के ट्रस्टी इनकी खातिर करके इन्हें देव-दर्शन के लिए ले जाते हैं, इनके लिए अलग सब इंतजाम किया जाता है, और दिन-दिन भर से कतार में लगे हुए लोगों को और देर तक रूकना पड़ता है। इस मंदिर की टिकटों की व्यवस्था कुछ अधिक विवादास्पद है, वरना देश के हर तीर्थस्थान में नेताओं और अफसरों, बड़े कारोबारियों और नामी-गिरामी लोगों के लिए देश के एक सबसे बेशर्म शब्द, वीआईपी, नाम से दर्शन का अलग इंतजाम रहता है।
ऐसे में अभी तमिलनाडु के एक उपभोक्ता कोर्ट ने तिरूपति देव स्थानन ट्रस्ट को एक भक्त को भुगतान लेने के बाद 14 बरस इंतजार करवाने के बाद भी उसकी चाही गई वस्त्रलंकारा सेवा का मौका न देने पर 50 लाख का मुआवजा देने का हुक्म दिया है। इस मंदिर ट्रस्ट के खिलाफ उपभोक्ता कोर्ट में यह पहला ही मुकदमा था, और यह ट्रस्ट के खिलाफ गया। एक भक्त ने 2006 में मंदिर ट्रस्ट को 12,250 रूपये देकर 2020 में देवता की वस्त्रलंकारा सेवा की बुकिंग की थी। कोरोना लॉकडाउन की वजह से वह दिन आकर चले गया, और मंदिर भुगतान के एवज में भक्त को पूजा में रहने का मौका नहीं दिला पाया। अब कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया है कि या तो मंदिर एक साल के भीतर उसे इस पूजा में शामिल करने का मौका दे, या फिर उसे 50 लाख मुआवजा दे। तिरूपति मंदिर ट्रस्ट को साल में तीन हजार करोड़ रूपये तक दान और टिकटों से मिलते हैं। इसमें से हजार करोड़ रूपये तो नगद चढ़ावे से आता है। मंदिर प्रसाद भी बेचता है, दर्शन भी बेचता है, और वहां जाने वाले लोग जानते होंगे कि और क्या-क्या चीजें बिकती हैं।

मंदिर में दर्शनों को बेचना किसी भी तरह से गलत नहीं है। जिसके पास अधिक पैसा है, उसे भगवान तक जाने का रास्ता जल्दी मिलना चाहिए, गरीबों को चाहिए कि जिस तरह सडक़ों पर से किसी तथाकथित वीआईपी के आने-जाने पर उन्हें किनारे होकर काफिले को रास्ता देना पड़ता है, ठीक वैसा ही रास्ता ट्रस्टियों के घेरे में पहुंचने वाले तथाकथित बड़े लोगों के लिए उसे देना ही चाहिए। कोई अगर यह सोचे कि भगवान के घर में गरीब और अमीर के बीच भेदभाव ठीक नहीं है, तो यह बुनियादी बात समझ लेना चाहिए कि धर्म तो बनाया ही इस हिसाब से गया है कि वह ताकतवर लोगों की सेवा करे, और गरीबों को मानसिक गुलामी में कैद रखकर उन्हें ताकतवरों की सेवा के लिए तैयार रखे। बात महज तिरूपति के मंदिर की नहीं है, धर्म का सारा मिजाज ही राजा या सेठ की गुलामी करने का है, और गरीबों को लाकर उनका गुलाम बनाने का है। धर्मों के बड़े-बड़े प्रवचन होते हैं, टीवी के आस्था वाले चैनलों पर बहुत से धर्मप्रचारक घंटे-घंटे भर बकवास करते हैं, और वे यही सिखाते हैं कि इस जन्म में मिल रही तकलीफें पिछले जन्म के उनके पाप का नतीजा है, और इस जन्म में बिना लालच किए, बिना स्वार्थ के, बिना किसी वासना के मालिक का भगवान मानकर सेवा करें, तो अगला जन्म सुख से भरा हुआ होगा। कुछ धर्मों में राजा को ईश्वर का दर्जा दिया गया है ताकि लोगों को राजा की तमाम ज्यादतियों को भी ईश्वर की दी हुई सजा मानकर बर्दाश्त करने की ताकत दी जा सके।

अगर अफीम के नशे की तरह धर्म का नशा लोगों को करवाया हुआ न रहे, तो राजा से लेकर मालिक तक की ज्यादतियों के खिलाफ बहुत से लोग खड़े हो सकते हैं, और संगठित हो सकते हैं। इसी खतरे को खत्म करने के लिए धर्म और ईश्वर की धारणा का आविष्कार किया गया, और जो कि दुनिया में सबसे कामयाब आविष्कार माने जाने वाले चक्के से भी अधिक कामयाब है, और इसमें दुनिया में शोषण का और अधिक बड़ा, और फौलादी चक्का चला रखा है जिसके नीचे हजारों बरस से सबसे गरीब, सबसे कमजोर, महिलाएं कुचले जा रहे हैं, और उन्हें दर्द का अहसास भी नहीं होता है क्योंकि उन्हें पाप और पुण्य की धारणा में जकडक़र रखा गया है, उन्हें बार-बार यह समझाया जाता है कि उन्होंने पिछले जन्म में पाप किए होंगे जिसका नतीजा उन्हें इस जन्म में मिल रहा है, और इसके लिए उन्हें न तो राजा को कोसना चाहिए, और न ही मालिक को। धर्म की यह धारणा दुनिया भर से लोगों को उनके धर्मस्थानों की तरफ ले जाती है, और दुनिया से सामाजिक इंसाफ को खत्म करने में तमाम धर्म अलग-अलग रंगों के लबादे पहनकर एक सा काम करते हैं।
अफ्रीका के जंगलों में बसे हुए लोगों की अपनी कबीलाई आस्थाएं थीं जो कि किसी भी आधुनिक और संगठित धर्म से बिल्कुल अलग थीं। लेकिन जब बाद में ईसाई वहां पहुंचे, तब का एक लतीफा बनाया गया है कि जब पादरी वहां पहुंचा, तो लोगों के पास जमीनें थीं, और पादरी के हाथ में बाइबिल थी। कुछ बरसों के बाद पादरी और चर्च के पास जमीनें थीं, और लोगों के हाथ बाइबिल थी। आज दुनिया भर में धार्मिक संस्थानों के पास जितनी रकम है, जितना खजाना है, उससे दुनिया की गरीबी दूर हो सकती है। लेकिन गरीबों को ही झांसा दे-देकर उनके गिने-चुने कौर में से आस्था नाम का जो जीएसटी वसूल कर लिया जाता है, उससे धर्मगुरू आलीशान महलों में रहते हैं, भक्तों से बलात्कार करते हैं, वोटरों को गुलाम बनाने का संगठित माफिया चलाते हैं, और लोकतंत्र के सभी हांकने वालों को हांकते हैं।
हालत यह है कि हिन्दुस्तान में आज भी हिन्दू धर्म के भीतर यह बहुत बड़ा मुद्दा बना हुआ है कि किस मंदिर में दलितों को दाखिला है, और किसमें नहीं। यह भी मुद्दा बना हुआ है कि दलितों और महिलाओं को कब पुजारी बनने मिलेगा, और कब उनमें से किसी को शंकराचार्य बनाया जा सकेगा। धर्म के खड़ाऊ तले कुचले जाने वाले दलितों और महिलाओं से धर्म का मोह नहीं छूट रहा है। यह धर्म नाम की साजिश की सबसे बड़ी कामयाबी है कि वह जिन लोगों को लात मार-मारकर कुचलता है, वे लोग उसके पांव पडऩे के लिए उतावले रहते हैं। हिन्दुस्तान में हिन्दुओं के बीच बहुत से सुधारवादी आंदोलन हुए हैं, लेकिन उन आंदोलनकारियों को धीरे-धीरे फिर धर्म और भगवान जैसा दर्जा दे दिया गया है। कबीर ने आज से सैकड़ों बरस पहले बिना किसी कानूनी हिफाजत के धर्म के आडंबरों के खिलाफ कड़ी मुहिम चलाई थी, वे दुनिया के धार्मिक इतिहास के सबसे बड़े सुधारवादी व्यक्ति थे, लेकिन आज उनकी नसीहतों को ताक पर धरकर, उन्हें ही भगवान बनाकर उन्हीं आडंबरों में उनकी उपासना को जकड़ दिया गया है, जिसके खिलाफ वे अपनी पूरी जिंदगी लड़ते रहे।
अभी तिरूपति के मामले में उपभोक्ता कोर्ट के फैसले से यह बात खुलकर साबित हुई है कि मंदिर और भक्त का रिश्ता यहां पर आकर दुकानदार और ग्राहक का रिश्ता हो गया है। अब लोगों को अपने-अपने धर्म के भीतर के इंतजाम को इस कसौटी पर कसना चाहिए कि उनका ईश्वर किस तबके पर मेहरबानी करता है, किसके साथ खड़े रहता है, किसे बेसहारा छोड़ देता है। जिन लोगों को पाप और पुण्य की धारणा में बांधकर स्वर्ग और नर्क पर भरोसा दिलाया जाता है, उनके बारे में किसी समझदार ने यह लिखा था कि मरकर स्वर्ग-नर्क जाकर कोई लौटे नहीं, और जीते-जी स्वर्ग-नर्क दिखता नहीं, तो फिर इसके बारे में जानकारी कहां से मिली है? इस झांसे को जो नहीं समझेंगे, वे अफीम चाटे हुए गुलामों से बेहतर नहीं रहेंगे, और अपने परिवार पर बलात्कार को ईश्वर की कृपा भी मानकर चलेंगे।


(Daily Chhattisgarh)

 

दाने-दाने पर लिक्खा होना चाहिए खाने वाले का नाम, न कि देने वाले का नाम...

4  सितंबर  2022
   

केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण दो दिन पहले तेलंगाना के एक जिले में राशन दुकान देखने पहुंचीं तो उन्हें वहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर नहीं दिखी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से, वीडियो-कैमरों के सामने कलेक्टर को खूब फटकार लगाई कि जो केन्द्र सरकार राशन पर इतनी रियायत देती है, उसके प्रधानमंत्री का फोटो यहां लगाने में किसको दिक्कत हो सकती है? उन्होंने कलेक्टर को चेतावनी दी कि उनके (भाजपा के) लोग आकर फोटो लगाएंगे, और यह कलेक्टर की जिम्मेदारी होगी कि उस तस्वीर को न कोई हटा सके, और न ही कोई उसको नुकसान पहुंचा सके। उन्होंने कलेक्टर की जिम्मेदारी के दायरे के बाहर के कई सवाल किए, और कलेक्टर का इम्तिहान लेने के अंदाज में राशन-रियायत के आंकड़े पूछे। इस पूरे वक्त भाजपा के लोग उनके साथ थे, और वे बिना रूके देर तक कलेक्टर को फटकार लगाती रहीं।

तेलंगाना में सत्तारूढ़ टीआरएस पार्टी और उसके मुख्यमंत्री के.चन्द्रशेखर राव कुछ दूसरे दक्षिणी मुख्यमंत्रियों की तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्र सरकार के कटु आलोचक हैं। सार्वजनिक रूप से केसीआर मोदी के खिलाफ जितनी आलोचना करते हैं, उतनी आलोचना शायद ही कोई दूसरे मुख्यमंत्री करते हों। निर्मला सीतारमण के इस बर्ताव के बाद टीआरएस कार्यकर्ताओं ने जगह-जगह गैस सिलेंडरों पर मोदी की तस्वीर वाले पोस्टर चिपकाकर यह नारा लोगों को याद दिलाया, मोदीजी-1105 रूपये। और उन्होंने निर्मला सीतारमण के नाम से इन तस्वीरों को पोस्ट करते हुए पूछा कि वे प्रधानमंत्री की फोटो चाहती थीं न?

जिन लोगों ने केन्द्रीय वित्तमंत्री का यह वीडियो देखा है वे उनके व्यवहार को लेकर भी हैरान हैं। राशन दुकानों का इंतजाम राज्य सरकार की जिम्मेदारी, और उसके अधिकार क्षेत्र का मामला रहता है। इसलिए वहां पर किसी नेता के पोस्टर लगाए जाएं या नहीं, यह राज्य सरकार के तय करने का मामला है। खासकर एक ऐसे प्रदेश में जो कि प्रधानमंत्री का बहुत प्रशंसक नहीं है, वहां एक कलेक्टर को यह राजनीतिक चेतावनी देना कि भाजपा के लोग आकर फ्लैक्स लगाकर जाएंगे, और उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए, यह बात केन्द्र-राज्य संबंधों के मुताबिक कोई अच्छी बात नहीं थी। लोगों को याद होगा कि कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पसंदीदा समझे जाने वाले एक समाचार चैनल के स्टार-एंकर ने जब तमिलनाडु के वित्तमंत्री से इस बात को लेकर कड़े सवाल-जवाब चालू किए कि प्रधानमंत्री के कहने के बावजूद तमिलनाडु उनके निर्देशों का पालन क्यों नहीं कर रहा है, तो वित्तमंत्री ने समाचार बुलेटिन के इस जीवंत प्रसारण में बड़े सरल तर्कों से जिस तरह इस एंकर और उसकी पसंदीदा केन्द्र सरकार को एक साथ फटकारा था, वह देखने लायक नजारा था। उसने एंकर से सवाल किए कि प्रधानमंत्री अपने किस संवैधानिक अधिकार से राज्यों को ऐसे निर्देश दे सकते हैं, उनकी अपनी ऐसी कौन सी विशेषज्ञता है जिससे कि वे ऐसे निर्देश देने के हकदार बनते हैं, उनकी ऐसी कौन सी आर्थिक कामयाबी है जिससे कि कोई राज्य उनकी बात को सुने? तमिलनाडु के वित्तमंत्री ने इस दिग्गज एंकर को विनम्र शब्दों में फटकारते हुए याद दिलाया कि तमिलनाडु आर्थिक पैमानों पर भारत सरकार से बेहतर काम करके दिखा रहा है, उसे प्रधानमंत्री के कोई निर्देश क्यों मानने चाहिए?

दरअसल केन्द्र सरकार में या किसी राज्य में व्यक्ति पूजा जब सिर चढक़र बोलने लगती है, तो ऐसे व्यक्ति के भक्तजन बाकियों से यह उम्मीद करते हैं कि वे भी कीर्तन में शामिल हों। लेकिन निर्मला सीतारमण ने जिस तेलंगाना के एक जिले की राशन दुकान पर कलेक्टर को फटकारा, और वहां पर भाजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा जिले की हर राशन दुकान पर मोदी के फ्लैक्स लगवाने की घोषणा की, उस तेलंगाना के मुख्यमंत्री अपने सार्वजनिक कार्यक्रमों में मोदी की पुरानी घोषणाओं के वीडियो और आज की हकीकत दिखाते हुए प्रधानमंत्री की खासी आलोचना करते ही रहते हैं। बागी तेवरों वाले ऐसे प्रदेश में राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में दखल देकर वित्तमंत्री ने तेलंगाना सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी को मोदी की नाकामयाबी गिनाने का एक मौका और दे दिया। दरअसल किसी भी देश-प्रदेश में जनता के पैसों से होने वाले काम का श्रेय किसी व्यक्ति को देना वैसे भी जायज नहीं है। और हिन्दुस्तान का मीडिया जनता के खजाने से किए जा रहे खर्च को किसी सत्तारूढ़ नेता द्वारा दी गई सौगात लिखने में ओवरटाइम करता है। जनता को उसका हक मिले, और उसे सौगात की तरह लिखा जाए, तो इसका मतलब जनता को खैरात के अंदाज में कुछ दिया जा रहा है। इसी को कुछ हफ्ते पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी के लोगों ने संसद के बाहर और भीतर रेवड़ी करार दिया था, और लोगों ने आनन-फानन यह याद दिला दिया था कि किस तरह हिन्दुस्तानी बैंकों के बड़े उद्योगपतियों के दस लाख करोड़ से अधिक के कर्ज माफ किए गए हैं, और सवाल पूछा था कि क्या यह भी रेवड़ी है?

किसी मंदिर या मठ में प्रसाद के रूप में पैकेट में दी जाने वाली रेवड़ी पर तो किसी देवता या मठाधीश की फोटो लगाना जायज होगा, लेकिन जब जनता के पैसों से ही उसे उसका बुनियादी हक दिया जा रहा है, तो देश के किसी भी नेता को उसे अपनी या अपनी सरकार की दी हुई खैरात क्यों साबित करना चाहिए? व्यक्ति पूजा का यह पूरा सिलसिला अलोकतांत्रिक है, और जब सरकारी खर्च पर इसे चलाया जाता है, तो वह खर्च तो आपराधिक रहता ही है। हिन्दुस्तान की राजनीतिक संस्कृति से देश-प्रदेश में व्यक्ति पूजा खत्म होनी चाहिए, और जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान होना चाहिए। ऐसी ही नौबत में भारत में राजनीतिक विचारधाराओं की विविधता का महत्व समझ आता है जब केन्द्र और राज्य के अलग-अलग नेता एक-दूसरे से सवाल करने के लायक अभी भी बचे दिखते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

स्वामियों के बलात्कारी होने पर हैरानी क्यों हो?

3  सितंबर  2022
 

कर्नाटक में एक और धार्मिक सेक्सकांड सामने आया है। इस बार वहां भारी राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव रखने वाले एक लिंगायत मठ के स्वामी शिवमूर्ति को मठ की आश्रम-स्कूल की नाबालिग दलित छात्राओं के यौन शोषण की शिकायत आने, और मजिस्ट्रेट के सामने इन लड़कियों का हलफिया-बयान हो जाने के बाद यह गिरफ्तारी की गई है। यह मठ कर्नाटक के सबसे ताकतवर मठों में से एक माना जाता है, और कर्नाटक के राजनीतिक दल स्तब्ध हैं कि वे क्या कहें। एक नेता, पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के वी.एस.येदियुरप्पा ने इसे स्वामी के खिलाफ राजनीतिक साजिश कहा है, और इसे झूठा केस बताया है। हर किसी को डर है कि इस स्वामी की आलोचना करना राजनीतिक रूप से आत्मघाती हो सकता है क्योंकि कर्नाटक में लिंगायत आबादी 17 फीसदी है। जिस तरह बापू कहे जाने वाले आसाराम के अनगिनत राजनेता भक्त थे, उसी तरह लिंगायत मठों के स्वामियों के भी बड़े-बड़े नेता अनुयायी होते हैं। इस स्वामी की तस्वीरें अभी कुछ समय पहले ही कांग्रेस के मुखिया राहुल गांधी को दीक्षा देते हुए सामने आई थीं। खबरें बताती हैं कि  लिंगायत मठ जाति व्यवस्था के खिलाफ कुछ सुधारवादी काम भी करते हैं, जिनमें गरीबों के लिए स्कूल चलाने जैसी बातें शामिल हैं। लेकिन अब मठ की ही स्कूल की छात्राओं की यह शिकायत सामने आई है, और इस मामले में हॉस्टल वार्डन की भी गिरफ्तारी हुई है।

यहां यह बात याद रखना चाहिए कि दुनिया भर में धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए बहुत से लोग तरह-तरह के सेक्स-अपराध करते पकड़ाते हैं। इनमें से अधिकतर ऐसे रहते हैं जो कि अपने धर्म या सम्प्रदाय की परंपराओं के मुताबिक शादियों से दूर रहते हैं। जाहिर है कि देह की जरूरत पर वे जीत हासिल नहीं कर पाते, और अपने कमजोर वक्त में वे पिघलकर किसी पर बिछ जाते हैं। वैटिकन के तहत आने वाले चर्चों में बच्चों के यौन शोषण का बड़ा लंबा इतिहास है, और ऐसी शिकायतों के सुबूत दर्ज हो जाने के दशकों बाद जाकर चर्च ने इन्हें माना, और इनके लिए माफी मांगी। लेकिन चर्च से परे अमरीका में हिन्दू धर्म के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन, इस्कॉन के गुरूकुलों में बच्चों का यौन शोषण अच्छी तरह दर्ज है, और इसके ऊपर गंभीर रिसर्च-लेख भी लिखे गए हैं। लोगों ने हिन्दुस्तान की सडक़ों पर भी इस हरे कृष्ण आंदोलन के ब्रम्हचारियों को गाडिय़ों को रोक-रोककर इस्कॉन की किताबों को बेचते हुए देखा है। अब जिस धर्म या सम्प्रदाय में लोगों के ब्रम्हचारी होने की शर्त हो, वहां पर इस तरह के सेक्स-अपराध होते ही रहते हैं। भारत में कितने ही धर्मगुरू इसी तरह पकड़ाए गए हैं, इनमें सबसे चर्चित तो आसाराम है जिसने अपने सम्प्रदाय की एक स्कूल के छात्रावास की एक नाबालिग लडक़ी से बलात्कार किया था, और वह मामला कई बार सुप्रीम कोर्ट तक जाकर भी आसाराम को जमानत नहीं दिला पाया है, और सजा में मिली कैद जारी है। इसलिए जिस धर्म में जिनके ब्रम्हचर्य की शर्त रहती है, उन्हें आपस में एक-दूसरे के लिए, या बाकी भक्तों के लिए खतरा मानकर ही चलना चाहिए। जिन लोगों से उनके धर्म की व्यवस्था यह उम्मीद रखती है कि वे सारा वक्त ईश्वर की आराधना में लगाएंगे, उनका सारा वक्त अगर सेक्स की सोच में गुजरता है, तो ऐसे ब्रम्हचर्य से उस धर्म का क्या भला होता है?

लोगों को याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले ही मध्यप्रदेश में उमा भारती के करीबी एक ओबीसी नेता ने हिन्दू धर्म के प्रवचनकर्ताओं के बारे में यह कहा कि प्रवचन करते हुए भी उनकी नजरें सामने बैठी हुईं महिलाओं में से सुंदर महिलाओं पर टिकी रहती है, और बाद में वे उनके घर खाने-ठहरने का जुगाड़ जमाने में लगे रहते हैं। ऐसी चर्चाएं सभी धर्म के बाबाओं, ब्रम्हचारियों, और गुरुओं के बारे में आम रहती हैं। लोगों को कुछ बरस पहले का स्वामी नित्यानंद का अपनी शिष्या के साथ का एक सेक्स-वीडियो याद होगा जिसमें वे एक अभिनेत्री के साथ बिस्तर पर सेक्स में जुटे दिखते हैं। अब यह स्वामी बलात्कार के आरोपों में अंतरराष्ट्रीय पुलिस, इंटरपोल का ब्लूनोटिस झेल रहा है, और दुनिया भर में इसकी तलाश की जा रही है। वह हिन्दुस्तान छोडक़र भाग गया, और बाद में एक किसी टापू पर उसने कैलाश नाम का अपना खुद का एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की घोषणा की।

छोटे स्तर पर देखें तो धर्म से जुड़े हुए अंधविश्वासों पर पलने वाले तांत्रिक जैसे लोग भी किसी का भूत उतारने के नाम पर, तो किसी का इलाज करने के नाम पर बलात्कार करते मिलते हैं, और जैसा कि हिन्दुस्तान का आम चलन है, ऐसे अधिकतर मामलों में पारिवारिक और सामाजिक दबाव में मामले पुलिस तक नहीं जा पाते, और उन्हें दबाकर, भुलाकर छोड़ दिया जाता है। जो लोग धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए लोगों के आसपास रहते हैं, उन्हें अपने, और अपने परिवार के लोगों की हिफाजत का ख्याल रखना चाहिए। धर्म के आसपास कोई भी सुरक्षित नहीं रह सकते, सिवाय मुजरिमों के। हर किस्म के मुजरिमों को पाप से बचने का रास्ता बताने वाले धर्म उन्हीं की सबसे अधिक हिफाजत कर पाते हैं क्योंकि प्रायश्चित पर खर्च करवाने का एक रिवाज है। धर्म के लोग जब बलात्कारी हो जाएं, तब उसमें हैरानी की कोई बात नहीं रहती, क्योंकि जब लोगों की आस्था अंधविश्वास की तरह मजबूत हो जाती है, तो उसका शोषण करने से बाबा और बापू से लेकर पादरी तक कौन चूकेंगे?

 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 2 सितंबर 2022


ट्विन टॉवर के गिरने से मिले सबक से बाकी देश भी जागरूक हो...

 

  2 सितंबर  2022

देश की राजधानी दिल्ली के इलाके में उत्तरप्रदेश में सरकारी भ्रष्टाचार और बिल्डर माफिया की ताकत ने मिलकर सैकड़ों करोड़ के जो अवैध टॉवर बनाए थे, वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले और कड़े रूख के चलते गिराने पड़ गए। देश भर में बिल्डर माफिया बहुत सी जगहों पर इसी तरह गुंडागर्दी से अवैध निर्माण करते हैं, उन्हें लोगों को बेचकर निकल जाते हैं। यह मामला किसी तरह सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सका, और उस पर कार्रवाई हो सकी। ऐसा अंदाज है कि इन दो इमारतों में जो नौ सौ फ्लैट बनाकर बेचने के लिए लोगों से रकम ले ली गई थी, उसके दाम सात सौ करोड़ रूपये से अधिक थे। जिस वक्त इन्हें विस्फोटक लगाकर उड़ाया जा रहा था, सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातें लिखी जा रही थीं कि इन इमारतों को राजसात करके वहां पर कोई समाजसेवा का काम शुरू कर देना चाहिए, और इन्हें बनाने में देश का जो पैसा लगा है उसे बर्बाद नहीं होने देना चाहिए। सौ मीटर ऊंची ये दो इमारतें करीब तीस-तीस मंजिल की थीं, और देश की राजधानी के इलाके में यह एक सबसे बड़ी बिल्डर-गुंडागर्दी थी जिसे मिट्टी में मिला देने का सबक बहुत से लोगों को मिलेगा।

जिन लोगों को यह लगता था कि इन इमारतों का कोई समाजसेवी उपयोग होना चाहिए, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि यह जगह इस रिहायशी कॉलोनी के बगीचे के लिए सुरक्षित थी, और वहां सुप्रीम कोर्ट भी उसका कोई और इस्तेमाल नहीं कर सकता था। उस जगह पर आसपास के उन हजारों लोगों का ही हक था जिन्होंने उस कॉलोनी में मकान खरीदे थे, और अब खाली हुई इस जगह पर बगीचा पाना जिनका हक था। अदालत में यह मामला नौ बरस तक चला था, और उसके बाद जाकर सुप्रीम कोर्ट से यह फैसला हुआ, और ये गैरकानूनी इमारतें गिराई गईं। यह तो वहां के निवासी संपन्न थे जो उन्होंने इतनी लंबी लड़ाई लड़ी, वरना किसी गरीब इलाके के लोग तो नौ बरस सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने की ताकत भी नहीं रखते। ऐसे में यह मामला देशभर के प्रदेशों के सामने, म्युनिसिपलों के सामने एक नजीर की तरह रहना चाहिए कि ग्राहकों को धोखा देने वाले बिल्डरों का क्या हाल किया जाना चाहिए।

इसी तरह के मामलों के अदालत के बाहर निपटारे का काम राज्यों में बनाई गई रेरा नाम की संस्था कर सकती है जहां पर किसी भी बिल्डर या कॉलोनाइजर के खिलाफ ग्राहक जा सकते हैं, और उनके साथ हुई बेईमानी के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं। राज्यों में बनाई गई संवैधानिक संस्था के अधिकार देखें, तो वे बेईमान बिल्डरों को जेल भेजने लायक हैं। उनके कारोबार को बंद करवा देने के लायक हैं, उनके बैंक खाते जब्त कर देने के लायक हैं। अलग-अलग प्रदेशों में कम या अधिक कार्रवाई भी रेरा की सुनवाई के बाद हो रही है, और जहां पर यह संस्था ईमानदारी और सक्रियता से काम कर रही है, वहां पर बिल्डर माफिया पर मजबूत शिकंजा कस रहा है।

आज हिन्दुस्तान में रिहायशी या कारोबारी इमारतें बनाकर उनमें जगह बेचने का कारोबार कई किस्म की राजनीतिक और गुंडागर्दी की ताकत से लैस है। इन ताकतों को अदालतों में चलने वाले मामलों पर बड़ा भरोसा रहता है कि वहां से उनके खिलाफ कोई फैसला होने तक तो शिकायतकर्ता की जिंदगी ही खत्म हो जाएगी। इस मामले में भी देश की सबसे बड़ी अदालत में भी अगर नौ बरस लगे थे, तो बिल्डर के वकीलों की तरकीबों और ताकत का अंदाज लगाया जा सकता है। दूसरी तरफ रेरा जैसी संस्था को जो अधिकार दिए गए हैं उनमें हो सकता था कि नौ महीनों में ही इस बिल्डर के बैंक खातों पर रोक लग जाती, वहां जमा रकम वहीं पड़ी रह जाती, और उस हालत में बिल्डर इस हड़बड़ी में रहता कि रेरा में फैसला जल्दी हो जाए। देश के कानून में अदालतों से परे कई किस्म के मामलों को तेजी से निपटाने के लिए कहीं ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, कहीं प्राधिकरण बनाए गए हैं। देश की निचली अदालतें दो लीटर दूध में मिलावट का फैसला करने में तीस-तीस बरस ले रही हैं, दूसरी तरफ उपभोक्ता फोरम जैसी ग्राहक पंचायतें कुछ महीनों में ही इनका निपटारा कर सकती हैं। लोगों के बीच इस बात को लेकर जागरूकता भी रहनी चाहिए कि देश में उनके अधिकारों के लिए अदालतों से परे कौन-कौन सी संस्थाएं बनी हैं, और उनका इस्तेमाल कैसे हो सकता है।

हम छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में देखते हैं जहां कुछ गिने-चुने बिल्डरों और कॉलोनाइजरों को छोड़ दें, तो अधिकतर का काम बड़े पैमाने पर गैरकानूनी है। इनके खिलाफ इनके ग्राहकों को संगठित होकर शिकायत करनी चाहिए, और जो इलाके ऐसे प्रोजेक्ट से प्रभावित होते हैं, उन्हें भी कानूनी लड़ाई लडऩी चाहिए। दो-चार धोखेबाज कारोबारी हर प्रदेश में इस तरह की सजा पाएंगे, जेल भेजे जाएंगे, तो पूरा कारोबार सुधर जाएगा। देश में कानूनी विकल्प आसानी से हासिल हैं, और लोगों को अदालतों से अब तक मिली निराशा को छोडक़र इन नए विकल्पों का फायदा उठाना चाहिए।

 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 सितंबर 2022

 

(Daily Chhattisgarh)

नैतिकता के बोझ से मुक्त हिन्दुस्तानी लोकतंत्र अब..

1 सितंबर  2022

पुर्तगाल में एक भारतवंशी गर्भवती पर्यटक महिला को वहां के सबसे बड़े अस्पताल में ले जाया गया, लेकिन वहां उसे भर्ती नहीं किया गया, और दूसरे अस्पताल भेजा गया। लेकिन दूसरे अस्पताल पहुंचने के पहले हार्टअटैक से उसकी मौत हो गई। इस बात को अपनी निजी कामयाबी मानते हुए वहां की स्वास्थ्य मंत्री डॉ. मार्ता टेमिडो ने इस्तीफा दे दिया है। खबरें बताती हैं कि वे 2018 से स्वास्थ्य मंत्री थीं, और कोरोना के दौर में उन्होंने हालात बहुत अच्छी तरह सम्हाले थे। अपने विभाग या अपनी सरकार की किसी बहुत बड़ी चूक की वजह से अपनी कुर्सी छोड़ देना हिन्दुस्तान में कुछ दशक पहले तक एक लोकतांत्रिक परंपरा मानी जाती थी, और किसी बड़ी रेल दुर्घटना के बाद रेलमंत्री इस्तीफा देते थे, हालांकि कोई मंत्री खुद तो रेलगाड़ी चलाते नहीं हैं, न ही वे सिग्नल देते पटरियों के किनारे रहते हैं, लेकिन कानूनी जवाबदेही से परे नैतिक जवाबदेही का दायरा बड़ा होता है, और उसे मानने वाले लोग सचमुच के बड़े लोग होते हैं। आज जब किसी कुर्सी पर तब तक चिपके रहना, जब तक कि कानून के लंबे हाथ आकर टेंटुआ दबाकर घसीटकर न ले जाएं, का चलन है, तब हिन्दुस्तान में नैतिकता के अधिकार पर इस्तीफे की बात भी सुने लंबा अरसा गुजर गया है। पिछले दिनों किसान आंदोलन के दौरान जब एक केन्द्रीय मंत्री के बददिमाग और खूनी बेटे ने अपनी गाड़ी से किसानों को कुचलकर मार डाला था, तब उसकी गिरफ्तारी और चार्जशीट के बाद भी, देश भर से मांग उठने के बाद भी इस बेशर्म मंत्री ने कुर्सी नहीं छोड़ी थी। बिहार और गुजरात जैसे शराबबंदी वाले राज्यों में लोग थोक में जहरीली शराब पीकर मरे हैं, लेकिन इसके लिए किसी जिम्मेदार ने कोई इस्तीफा नहीं दिया। आज सत्ता पर पहुंच गए लोग जिस तरह कुर्सी से चिपककर बैठते हैं, उसे देखकर देह में चिपक जाने वाली जोंक भी शरमा जाती है कि वह मुकाबले में कहीं नहीं टिकती।

हिन्दुस्तानी लोकतंत्र अब पूरी तरह से अदालत से सजा मिल जाने के ठीक पहले तक सत्ता का मजा पाते रहने वाली हो गई है। अब या तो सरकार और पार्टी के मुखिया ही किसी की कुर्सी छीन लें, तो अलग बात है, अपने खुद के जुर्म किसी को यह अहसास नहीं कराते कि उन्हें अपनी पार्टी और सरकार को और अधिक बदनाम न करना चाहिए, न होने देना चाहिए। इस बुनियादी इंसानियत की जगह भी आज लोगों के नैतिक मूल्यों में नहीं रह गई है। जो लोग, बड़े-बड़े ताकतवर मंत्री भी, जिन बड़े जुर्मों में पकड़ा रहे हैं, वे भी आखिरी सांस तक सत्ता पर बने रहना चाहते हैं, और शर्मिंदगी के साथ चुप घर बैठने का सिलसिला खत्म ही हो गया है। और बेशर्मी का यह सिलसिला बहुत नया भी नहीं है। मायावती और लालू यादव सरीखे लोग सैकड़ों करोड़ की अनुपातहीन सम्पत्ति के मामले में अपने कुनबे सहित पकड़ाए जा चुके हैं, एक पांव अदालत में है, और एक पांव पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी पर है, और भविष्य जेल में है, लेकिन पार्टी के सुप्रीमो बने हुए हैं। उधर दक्षिण में जयललिता की अथाह काली कमाई का यही हाल था, देश भर में जगह-जगह नेताओं की दौलत भ्रष्टाचार की आदी जनता को भी हक्का-बक्का करने की ताकत रखती है। रबर स्लीपर पहनने वाली, बिना कलफ की सादी साड़ी वाली ममता बैनर्जी की सादगी किस काम की जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे उनके मंत्री की महिलामित्र के घर से पचास करोड़ के नोट निकलते हैं?

हिन्दुस्तान की राजनीति में जिम्मेदारी, वफादारी, ईमानदारी, इन सबका विसर्जन कर दिया गया है। अब लोग कालेधन की गुंडागर्दी से पार्टी में आगे बढ़ते हैं, साम्प्रदायिकता और जातिवाद की हिंसा से बड़े नेता बनते हैं, और चापलूसी या कुनबापरस्ती से बड़े ओहदे पाते हैं। फिर बड़े ओहदों की ताकत से वे और बड़ी गुंडागर्दी करते हैं, अपने पसंदीदा मुजरिमों को कारोबारी बनवाते हैं, और अपना भविष्य तिजौरियों में महफूज रखते हैं। यह सिलसिला इतना आम हो गया है, और जनता का एक बड़ा हिस्सा इनको लोकतंत्र मानने का इतना आदी हो गया है कि इनमें से कोई खामी लोगों को चुनाव नहीं हरवाती। इसलिए अब लोग इस परले दर्जे के बेशर्म हो गए हैं कि उनके मंत्रालय के मातहत, या उनके देश-प्रदेश में कितने भी बुरे काम होते रहें, वे खुद कितनी भी बड़ी गलतियां करते रहें, उनके मन में कभी भी कुर्सी से हटने का कमजोर खयाल नहीं आता। हिन्दुस्तान के नेता अब अपनी मुसीबत को देखते हुए कभी यह कहते हैं कि उनका फैसला जनता की अदालत में होगा, और कभी यह कहते हैं कि उनका फैसला कानून की अदालत में होगा। जिस अदालत में वे हार जाते हैं, वहां से निकलकर वे दूसरी अदालत का रूख करने लगते हैं।

जेलों से निकले संगठित हत्यारों और बलात्कारियों का माला और मिठाई से, तिलक और आरती से स्वागत करने वाला समाज अब किसी भी तरह की नैतिकता के बोझ से मुक्त हो गया है। लोकतंत्र अब पूरी तरह अदालतों के फैसलों से तय होने लगा है, यह एक अलग बात है कि अदालतों में फैसला देने वाले लोग किस तरह तय होने लगे हैं, यह भी लगातार खबरों में है, और वे किन वजहों से कैसे फैसले देते हैं, यह भी खबरों में है। जिस देश में लोकतंत्र की सभी संस्थाएं एक संगठित माफिया की तरह मिलकर काम करने लगें, उस देश में सुरंग के आखिरी सिरे पर दिखती रौशनी की एक किरण सरीखी भी रौशनी नहीं दिखती। हिन्दुस्तान का लोकतंत्र आज एक ऐसे ही पूर्ण सूर्यग्रहण से ढंक गया दिखता है, और यह ग्रहण घटता नहीं दिख रहा है। इसलिए एक मौत को लेकर देश की स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे जैसी खबरें हमें दुनिया के दूसरे देशों से ही मिलती रहेंगी, जहां सूर्यग्रहण इतना पूर्ण नहीं होगा।

 (Daily Chhattisgarh)