सोलह बरस पुरानी दोस्ती का गला काट दिया धर्म ने

 22  दिसंबर 2022


भाजपा की एक प्रवक्ता नुपूर शर्मा ने मोहम्मद पैगंबर के बारे में एक आपत्तिजनक बयान दिया था, और सोशल मीडिया पर उसका समर्थन करते हुए अमरावती के एक दुकानदार उमेश कोल्हे ने एक पोस्ट किया था। इस पोस्ट के बाद कई लोगों ने मिलकर उमेश कोल्हे का कत्ल कर दिया था। ऐसा शक था कि सीसीटीवी कैमरों पर कैद मारने वाले लोग मुस्लिम थे जिन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किए हुए समर्थन के बदले यह कत्ल किया था। अब एनआईए ने अपनी जांच रिपोर्ट पेश की है, और इस बीच उसने अमरावती के ही एक मुस्लिम समुदाय, तब्लीगी जमात के ग्यारह लोगों को गिरफ्तार किया था, और अभी चार दिन पहले उसने कोर्ट में चार्जशीट पेश की है जिसके मुताबिक उमेश कोल्हे के एक सोलह बरस पुराने दोस्त यूसुफ  ने ही अपनी जमात के बाकी लोगों के साथ मिलकर यह कत्ल किया। चार्जशीट कहती है कि डॉ. यूसुफ उमेश कोल्हे का पुराना दोस्त था, और यूसुफ की बहन की शादी में मदद की जरूरत थी तो उमेश कोल्हे ने ही मदद की थी।

अभी हम एनआईए की रिपोर्ट को सच मानते हुए आगे की बात लिख रहे हैं। और यह जिक्र जरूरी इसलिए है कि हिन्दुस्तान में कभी-कभी जांच एजेंसियां जांच के नाम पर साजिश करते हुए भी मिली हैं, और किसी बेकसूर को फंसाते हुए भी। फिलहाल इस घटना, और अदालत में पेश इस चार्जशीट से कुछ लिखने की जरूरत लगती है। नुपूर शर्मा नाम की भाजपा की प्रवक्ता ने एक टीवी चैनल के लाईफ टेलीकास्ट के दौरान मोहम्मद पैगंबर के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें कहीं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट तक ने देश में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने के लिए जिम्मेदार कहा। नुपूर शर्मा का सिर काटने के लिए कुछ लोगों और संगठनों ने फतवे भी जारी किए, और तब से अब तक वे सामने नहीं आई हैं, या आ पाई हैं। जिस तरह के साम्प्रदायिक रूझान के साथ भाजपा की इस प्रवक्ता ने निहायत अवांछित, नाजायज, और भडक़ाऊ बातें कही थीं, वे बातें उनकी बाकी बकवास के साथ मेल खाती हुई थीं। उनका मकसद मुस्लिमों को जख्मी करना था, और वे अपने मकसद में कामयाब भी हुईं, अनहोनी बस यही हुई कि वे इस चक्कर में देश का कानून तोड़ बैठीं, और कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों को उन्होंने इतना अधिक विचलित कर दिया कि उन्होंने नुपूर शर्मा का सिर काटने का फतवा जारी कर दिया। अब जैसा कि सोशल मीडिया पर होता है, हर भडक़ाऊ बात के समर्थन में अनगिनत लोग जुट जाते हैं, और यह साबित करने लगते हैं कि उनके पास दिल-दिमाग चाहे न हों, उनके पास किसी भडक़ाऊ बात को आगे बढ़ाने के लिए उंगलियां जरूर हैं। कुछ ऐसा ही अमरावती के उमेश कोल्हे से हुआ, या उन्होंने किया। और इसके जवाब में स्थानीय मुस्लिम कट्टरपंथियों ने उनकी जान ले ली। चूंकि ये सभी ग्यारह कातिल मुस्लिमों के एक ही सम्प्रदाय के थे, इसलिए जाहिर है कि उनका धार्मिक आधार पर एक-दूसरे से मिलना-जुलना भी रहा होगा, और वे धर्म के आधार पर जुड़े हुए लोग थे।

अब इससे यह तो साबित होता है कि धर्म के नाम पर जहां-जहां नफरत और आक्रामकता है, वहां-वहां लोगों में एकजुटता बड़ी तेजी से हो जाती है। नुपूर शर्मा को न जानते हुए भी उमेश कोल्हे ने उसका समर्थन किया, और उमेश कोल्हे के कत्ल के लिए दस तब्लीगी एकजुट हो गए। यह धर्म का आम मिजाज है कि वह घायल होने के लिए एक पैर पर खड़े रहता है, और अपने धर्म की तथाकथित रक्षा करने के नाम पर किसी भी तरह की हिंसा करने को तैयार रहता है। जब-जब हिन्दू बहुत अधिक एकजुट होते हैं, एक बात बड़ी तेजी से उभरती है कि हिन्दुत्व खतरे में है। जब हिन्दू अलग-अलग रहते हैं, धार्मिक आयोजन कम होते हैं, तब हिन्दुत्व कभी खतरे में नहीं रहता। जब मुस्लिम एक कामगार की शक्ल में काम करते हैं, तब तक इस्लाम खतरे में नहीं रहता क्योंकि उनके पास काम करने की अपनी जरूरत रहती है। लेकिन जब कभी धार्मिक आधार पर वे जुटते हैं, इस्लाम खतरे में पडऩे लगता है। धर्म का मिजाज किसी दूसरे धर्म की दहशत दिखाकर अपने लोगों को एक करने, और फिर उन्हें दुहने का रहता है। धर्म के जो एजेंट ईश्वर और धर्मालु के बीच काम करते हैं, उनका अस्तित्व इसी पर टिका रहता है कि धर्मालुओं की भीड़ अपने को असुरक्षित महसूस करती रहे। अगर आस्थावान सुखी और सुरक्षित हो गए, उनके सिर पर कोई खतरा उन्हें नहीं दिखा, उन्हें अगर किसी दूसरे धर्म के लोगों का खतरा नहीं गिनाया जा सका, तो फिर वे अपने ईश्वर और उसके एजेंट के झांसे में कैसे आएंगे? इसलिए जिस तरह एक पुरानी कहानी में लोगों को भेडिय़ा आया-भेडिय़ा आया कहकर डराया जाता था, उसी तरह आज विधर्मी आया-विधर्मी आया कहकर डराया जाता है। यह डर लोगों को एकजुट करता है, संगठित करता है, और फिर जैसा कि धर्म का आम मिजाज रहता है, वह लोगों को नफरतजीवी और हिंसक भी बनाता है। उनसे दूसरों पर हमले करवाता है क्योंकि धर्म सहअस्तित्व को नहीं मानता। हर धर्म एकाधिकार की सोच पर काम करता है, और दूसरे धर्म को खतरा और खतरनाक मानता है। पूरी दुनिया में धर्मों का विस्तार इसीलिए किया गया कि बहुत अधिक लोगों से हिंसा करना मुमकिन नहीं था, और जब लोग अपने धर्म में आ जाएं, तो फिर उनसे हिंसा की जरूरत क्या है। दुनिया के इतिहास में धर्मों का विस्तार बहुत ही खूनी जंगों से भरा हुआ है, और वह जंग अलग-अलग शक्लों में आज भी जारी है।

हम सोशल मीडिया पर हर कुछ हफ्तों में दिल को छू लेने वाली असल जिंदगी की ऐसी कहानी पढ़ते हैं कि हिन्दू और मुस्लिम दोस्तों ने, समाज के लोगों ने दूसरे के लिए क्या किया। अब इस बीच जब इंसानियत पर धर्म हावी हुआ, तो उसने सोलह बरस पुरानी दोस्ती की भी परवाह नहीं की, और दोस्ती और इंसानियत का गला काटकर धर दिया। यह बिल्कुल धर्म के मिजाज के मुताबिक है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब जम्मू में एक छोटी सी मुस्लिम खानाबदोश लडक़ी के साथ एक मंदिर में पुजारी समेत आधा दर्जन हिन्दू लोगों ने बलात्कार किया था, और फिर उस बच्ची को मार डाला था, तो वहां के हिन्दू समाज ने राष्ट्रीय झंडा लेकर बलात्कारियों को बचाने के लिए जुलूस निकाले थे, और बड़े-बड़े भाजपा नेता उसमें शामिल हुए थे। वह भी धर्म का एक मिजाज था जिसने एक छोटी सी बच्ची के साथ मंदिर में पुजारी और दूसरे लोगों द्वारा बलात्कार और हत्या को अनदेखा कर दिया था, और अपने धर्म के हत्यारे-बलात्कारियों को बचाने के लिए सडक़ों पर औरत-बच्चों को लिए हुए जुलूस निकालने लगा था, यह सिलसिला लंबे समय तक चला था, और उस मुस्लिम बच्ची के परिवार को कोई वकील मिलने से भी  बाकी हिन्दू वकील रोक रहे थे। आखिर में जिस महिला वकील ने उसका मुकदमा लिया, उसे कई किस्म का सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा।

दुनिया में दोस्ती को बहुत ऊंचा माना जाता है, लेकिन अमरावती की इस घटना ने साबित किया है कि धर्म की हिंसा दोस्ती का भी गला काट सकती है। इसलिए लोगों को अपनी जिंदगी में धर्म की अहमियत के बारे में चौकन्ना रहने की जरूरत है क्योंकि ईश्वर के प्रति निजी आस्था जब सार्वजनिक जीवन में संगठित होकर एक हमलावर तेवरों की शक्ल ले लेती है, तो फिर वह किसी भी हद तक हिंसक हो सकती है। धर्म की यह डरावनी हिंसा इंसानों को समझनी चाहिए जिन्होंने शेर को बनाकर प्राण फूंकने की एक कहानी की तरह धर्म को गढ़ तो लिया है, लेकिन वह धर्म आज उन्हें ही खा जा रहा है।

(Daily Chhattisgarh)

 

अमरीकी संसद पर हमले की संसदीय जांच कमेटी ने कहा ट्रंप पर क्रिमिनल केस चले

 21  दिसंबर 2022


अमरीकी संसद की एक जांच कमेटी ने पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को चुनाव हारने के बाद 6 जनवरी को संसद पर हुए हमले को उकसाने और हमलावरों की मदद करने का कुसूरवार मानते हुए अमरीका के न्याय विभाग से सिफारिश की है कि ट्रंप पर कुछ अपराधों को लेकर आपराधिक मुकदमा चलाना चाहिए। अठारह महीने से यह संसदीय समिति संसद पर हमले की जांच कर रही थी, और उसने ट्रंप पर चार आरोपों को सही पाया है। कमेटी के सामने ट्रंप के बहुत से सहयोगियों के भी शपथपूर्वक बयान हुए थे, और जांच कमेटी ने ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद भी थे। कमेटी ने डेढ़ सौ पेज की रिपोर्ट में कहा है कि संसद और सरकार के खिलाफ विद्रोह को उकसाने, विद्रोहियों की मदद करने, उन्हें मदद का वायदा करने, सरकारी और संसदीय कामकाज में बाधा डालने, अमरीका के साथ धोखा करने, और गलत बयान देने की साजिश के लिए आपराधिक मुकदमा चलाया गया। लोगों को याद होगा कि 6 जनवरी 2021 को जब ट्रंप चुनाव हार चुके थे, और जो बाइडन अगले राष्ट्रपति की शपथ लेने को थे, तब ट्रंप के हजारों समर्थक आदिम हमलावरों की शक्ल में संसद में घुस गए थे, तोडफ़ोड़ और आगजनी की थी, सांसदों को टेबिलों के नीचे छुपकर जान बचानी पड़ी थी, और टीवी पर यह सब हिंसा देखते हुए ट्रंप अपने सहयोगियों की भी यह सलाह तीन घंटे से अधिक तक अनसुनी करते रहे कि उन्हें अपने समर्थकों को हिंसा रोकने के लिए कहना चाहिए। बल्कि ट्रंप सार्वजनिक रूप से जो बयान दे रहे थे, वे चुनावों को फर्जी करार देने वाले, और इस हमलावर भीड़ को देशभक्त बताने वाले थे। इस कमेटी ने संसद पर हमले और टीवी पर हमला देखते ट्रंप को उनके कमरे से देखने वाले हजार से ज्यादा लोगों के बयान लिए थे, और ऐसे तमाम हलफिया बयानों में डेढ़ बरस का समय लगा था। छह जनवरी को करीब 24 घंटे यह हमला चलते रहा, और इसमें पांच लोगों की मौत हुई थी, और सौ से अधिक घायल हुए थे। यह दो बरस के भीतर का इतिहास है इसलिए आज के अधिकतर लोगों को इसकी याद भी होगी।

अमरीका की व्यवस्था के तहत न्याय विभाग संसद और सरकार से परे भी फैसले लेता है, और सरकार का विभाग होने के बावजूद वह कानूनी मामलों में खुद फैसले लेता है। इसके मुखिया वहां के अकादमी जनरल होते हैं, जो सीधे राष्ट्रपति को रिपोर्ट करते हैं। अमरीकी परंपराएं बताती हैं कि इसके हर फैसले पर जरूरी नहीं है कि अमरीकी राष्ट्रपति की सहमति लगी हो। लोगों को यह भी याद होगा कि ट्रंप के घर पर छापा मारकर अमरीका की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एफबीआई ने सैकड़ों अतिगोपनीय कागजात जब्त किए थे जो कि रद्दी के गट्ठों में पड़े हुए थे, उनके घर पर बिखरे हुए थे। उसे लेकर भी उन पर मुकदमा चलाने की बात चल ही रही थी कि अब यह संसदीय कमेटी की रिपोर्ट आ गई है।

एक तरफ तो अमरीका में आजादी का हाल यह है कि चुनाव हारा हुआ राष्ट्रपति संसद पर हमला करवा सकता है, चुनावों को धोखाधड़ी करार दे सकता है, और लोगों को अराजकता और बगावत के लिए भडक़ा सकता है कि वे इन नतीजों को न मानें। दूसरी तरफ मौजूदा राष्ट्रपति पर भी संसद महाभियोग चला सकती है, इतिहास में चला चुकी है, और ट्रंप पर अगर ये आपराधिक मुकदमे चलते हैं तो हो सकता है कि उनका बाकी जिंदगी किसी भी चुनाव लडऩे का हक खतम ही हो जाए। इस तरह आज अमरीका एक अभूतपूर्व हालात का सामना कर रहा है जिसमें ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी उनके खिलाफ आवाज उठ रही है, लोग उनका विरोध कर रहे हैं। और सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति जो बाइडन अपनी गिरती हुई लोकप्रियता के बाद भी वहां हाल में हुए मध्यावधि चुनावों में उम्मीद से अधिक जीत पा चुके हैं, और ट्रंप के करीबी समझे जाने वाले, उनके छांटे हुए रिपब्लिकन उम्मीदवार चुनाव हार चुके हैं।

ट्रंप ने अपने चार बरस के कार्यकाल में लगातार परले दर्जे के एक दकियानूसी और संकीर्णतावादी नेता की तरह घोर नस्लवादी रूख दिखाया, देश के अल्पसंख्यकों के हक कुचलने की कोशिश की, दूसरे देशों से आने वाले प्रवासी कामगारों के खिलाफ जंग सी छेड़ दी, और गरीबों के खिलाफ अपना वैसा ही रूख दिखाया जैसा कि कोई पक्का कारोबारी दिखा सकता है। यहां तक भी बात उनकी पार्टी और उनकी विचारधारा की हो सकती थी, लेकिन ट्रंप पर लगे हुए कई दूसरे आरोप बताते हैं कि उन्होंने चुनावी चंदे का इस्तेमाल अपने वकीलों पर किया, कारोबार में टैक्स चुराने तरह-तरह की धोखाधड़ी की, एक सनकी बादशाह की तरह अमरीकी सरकार को हांकने की कोशिश की, जिन कारोबारियों से वे असहमत थे, उनके खिलाफ तरह-तरह की जांच शुरू करने के लिए अपने अफसरों को उकसाया, और तमाम ऐसी बातें कीं जो कि अमरीकी लोकतंत्र में मंजूर नहीं की जाती हैं। लेकिन यह बददिमागी बढ़ते-बढ़ते चुनावी नतीजों को खारिज करने तक पहुंच गई, और जनता के फैसले के खिलाफ खुली हिंसक बगावत करवाने तक। नतीजा यह हुआ कि उनके हिंसक समर्थकों ने संसद पर ऐसा भयानक हमला किया जैसा कि हॉलीवुड की किसी फिल्म में ही सोचा जा सकता था, असल अमरीका में नहीं।

अमरीकी न्याय विभाग को ट्रंप के खिलाफ ऐसे गंभीर अपराधों के पुख्ता सुबूतों का इस्तेमाल करना चाहिए, और उन्हें अदालत के कटघरे तक ले जाना चाहिए। शायद ऐसा होगा भी। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी भी ट्रंप की हरकतों से थकी हुई है, और उसके भी कई लोग यह चाहते हैं कि अगले चुनाव में ट्रंप को राष्ट्रपति बनाने के लिए फिर काम करने की नौबत न आए, और ट्रंप से इस तरह छुटकारा मिल जाए। जब पार्टी राजनीतिक रूप से ट्रंप से छुटकारा नहीं पा सक रही है, तब वह अदालत की किसी कार्रवाई की वजह से मिल सकने वाले ऐसे छुटकारे को काम का समझ सकती है। वैसे भी अमरीकी लोकतंत्र में बाकी ट्रंप सरीखे लोगों को यह सबक मिलना चाहिए कि लोकतंत्र पर ऐसा जानलेवा हमला करके किसी की जगह दुबारा कोई निर्वाचित दफ्तर नहीं हो सकता, जेल ही हो सकती है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 दिसंबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 दिसंबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

अमरीकी संसद पर हमले की संसदीय जांच कमेटी ने कहा ट्रंप पर क्रिमिनल केस चले

20  दिसंबर 2022


अमरीकी संसद की एक जांच कमेटी ने पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को चुनाव हारने के बाद 6 जनवरी को संसद पर हुए हमले को उकसाने और हमलावरों की मदद करने का कुसूरवार मानते हुए अमरीका के न्याय विभाग से सिफारिश की है कि ट्रंप पर कुछ अपराधों को लेकर आपराधिक मुकदमा चलाना चाहिए। अठारह महीने से यह संसदीय समिति संसद पर हमले की जांच कर रही थी, और उसने ट्रंप पर चार आरोपों को सही पाया है। कमेटी के सामने ट्रंप के बहुत से सहयोगियों के भी शपथपूर्वक बयान हुए थे, और जांच कमेटी ने ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद भी थे। कमेटी ने डेढ़ सौ पेज की रिपोर्ट में कहा है कि संसद और सरकार के खिलाफ विद्रोह को उकसाने, विद्रोहियों की मदद करने, उन्हें मदद का वायदा करने, सरकारी और संसदीय कामकाज में बाधा डालने, अमरीका के साथ धोखा करने, और गलत बयान देने की साजिश के लिए आपराधिक मुकदमा चलाया गया। लोगों को याद होगा कि 6 जनवरी 2021 को जब ट्रंप चुनाव हार चुके थे, और जो बाइडन अगले राष्ट्रपति की शपथ लेने को थे, तब ट्रंप के हजारों समर्थक आदिम हमलावरों की शक्ल में संसद में घुस गए थे, तोडफ़ोड़ और आगजनी की थी, सांसदों को टेबिलों के नीचे छुपकर जान बचानी पड़ी थी, और टीवी पर यह सब हिंसा देखते हुए ट्रंप अपने सहयोगियों की भी यह सलाह तीन घंटे से अधिक तक अनसुनी करते रहे कि उन्हें अपने समर्थकों को हिंसा रोकने के लिए कहना चाहिए। बल्कि ट्रंप सार्वजनिक रूप से जो बयान दे रहे थे, वे चुनावों को फर्जी करार देने वाले, और इस हमलावर भीड़ को देशभक्त बताने वाले थे। इस कमेटी ने संसद पर हमले और टीवी पर हमला देखते ट्रंप को उनके कमरे से देखने वाले हजार से ज्यादा लोगों के बयान लिए थे, और ऐसे तमाम हलफिया बयानों में डेढ़ बरस का समय लगा था। छह जनवरी को करीब 24 घंटे यह हमला चलते रहा, और इसमें पांच लोगों की मौत हुई थी, और सौ से अधिक घायल हुए थे। यह दो बरस के भीतर का इतिहास है इसलिए आज के अधिकतर लोगों को इसकी याद भी होगी।

अमरीका की व्यवस्था के तहत न्याय विभाग संसद और सरकार से परे भी फैसले लेता है, और सरकार का विभाग होने के बावजूद वह कानूनी मामलों में खुद फैसले लेता है। इसके मुखिया वहां के अकादमी जनरल होते हैं, जो सीधे राष्ट्रपति को रिपोर्ट करते हैं। अमरीकी परंपराएं बताती हैं कि इसके हर फैसले पर जरूरी नहीं है कि अमरीकी राष्ट्रपति की सहमति लगी हो। लोगों को यह भी याद होगा कि ट्रंप के घर पर छापा मारकर अमरीका की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एफबीआई ने सैकड़ों अतिगोपनीय कागजात जब्त किए थे जो कि रद्दी के गट्ठों में पड़े हुए थे, उनके घर पर बिखरे हुए थे। उसे लेकर भी उन पर मुकदमा चलाने की बात चल ही रही थी कि अब यह संसदीय कमेटी की रिपोर्ट आ गई है।

एक तरफ तो अमरीका में आजादी का हाल यह है कि चुनाव हारा हुआ राष्ट्रपति संसद पर हमला करवा सकता है, चुनावों को धोखाधड़ी करार दे सकता है, और लोगों को अराजकता और बगावत के लिए भडक़ा सकता है कि वे इन नतीजों को न मानें। दूसरी तरफ मौजूदा राष्ट्रपति पर भी संसद महाभियोग चला सकती है, इतिहास में चला चुकी है, और ट्रंप पर अगर ये आपराधिक मुकदमे चलते हैं तो हो सकता है कि उनका बाकी जिंदगी किसी भी चुनाव लडऩे का हक खतम ही हो जाए। इस तरह आज अमरीका एक अभूतपूर्व हालात का सामना कर रहा है जिसमें ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी उनके खिलाफ आवाज उठ रही है, लोग उनका विरोध कर रहे हैं। और सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति जो बाइडन अपनी गिरती हुई लोकप्रियता के बाद भी वहां हाल में हुए मध्यावधि चुनावों में उम्मीद से अधिक जीत पा चुके हैं, और ट्रंप के करीबी समझे जाने वाले, उनके छांटे हुए रिपब्लिकन उम्मीदवार चुनाव हार चुके हैं।

ट्रंप ने अपने चार बरस के कार्यकाल में लगातार परले दर्जे के एक दकियानूसी और संकीर्णतावादी नेता की तरह घोर नस्लवादी रूख दिखाया, देश के अल्पसंख्यकों के हक कुचलने की कोशिश की, दूसरे देशों से आने वाले प्रवासी कामगारों के खिलाफ जंग सी छेड़ दी, और गरीबों के खिलाफ अपना वैसा ही रूख दिखाया जैसा कि कोई पक्का कारोबारी दिखा सकता है। यहां तक भी बात उनकी पार्टी और उनकी विचारधारा की हो सकती थी, लेकिन ट्रंप पर लगे हुए कई दूसरे आरोप बताते हैं कि उन्होंने चुनावी चंदे का इस्तेमाल अपने वकीलों पर किया, कारोबार में टैक्स चुराने तरह-तरह की धोखाधड़ी की, एक सनकी बादशाह की तरह अमरीकी सरकार को हांकने की कोशिश की, जिन कारोबारियों से वे असहमत थे, उनके खिलाफ तरह-तरह की जांच शुरू करने के लिए अपने अफसरों को उकसाया, और तमाम ऐसी बातें कीं जो कि अमरीकी लोकतंत्र में मंजूर नहीं की जाती हैं। लेकिन यह बददिमागी बढ़ते-बढ़ते चुनावी नतीजों को खारिज करने तक पहुंच गई, और जनता के फैसले के खिलाफ खुली हिंसक बगावत करवाने तक। नतीजा यह हुआ कि उनके हिंसक समर्थकों ने संसद पर ऐसा भयानक हमला किया जैसा कि हॉलीवुड की किसी फिल्म में ही सोचा जा सकता था, असल अमरीका में नहीं।

अमरीकी न्याय विभाग को ट्रंप के खिलाफ ऐसे गंभीर अपराधों के पुख्ता सुबूतों का इस्तेमाल करना चाहिए, और उन्हें अदालत के कटघरे तक ले जाना चाहिए। शायद ऐसा होगा भी। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी भी ट्रंप की हरकतों से थकी हुई है, और उसके भी कई लोग यह चाहते हैं कि अगले चुनाव में ट्रंप को राष्ट्रपति बनाने के लिए फिर काम करने की नौबत न आए, और ट्रंप से इस तरह छुटकारा मिल जाए। जब पार्टी राजनीतिक रूप से ट्रंप से छुटकारा नहीं पा सक रही है, तब वह अदालत की किसी कार्रवाई की वजह से मिल सकने वाले ऐसे छुटकारे को काम का समझ सकती है। वैसे भी अमरीकी लोकतंत्र में बाकी ट्रंप सरीखे लोगों को यह सबक मिलना चाहिए कि लोकतंत्र पर ऐसा जानलेवा हमला करके किसी की जगह दुबारा कोई निर्वाचित दफ्तर नहीं हो सकता, जेल ही हो सकती है।

(Daily Chhattisgarh)

एक फिल्मी अंदाज में सुखद अंत वाला विश्व फुटबॉल मेसी के नाम...

  19 दिसंबर 2022

 

दुनिया के बहुत से सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में तो लोगों के स्वस्थ मनोरंजन और रोमांच के लिए बहुत कुछ रहता है, लेकिन जो देश धर्म, जाति, खानपान, पोशाक की नफरत में डूबे रहते हैं, वहां स्वस्थ मनोरंजन की गुंजाइश बड़ी कम हो जाती है। ऐसे देशों के लिए भी बीती रात बहुत अहमियत वाली थी क्योंकि फुटबॉल के विश्वकप फाइनल में जो दो टीमें मैदान पर थीं, उनमें न कोई बेशरम रंग दिख रहे थे, और न ही शर्मीले, दोनों में से किसी टीम में ऐसा मजहब ही दिख रहा था कि जिसकी वजह से उसकी हार की हसरत पाल ली जाए। नतीजा यह हुआ कि हिन्दुस्तान में भी बीती रात तकरीबन तमाम लोगों ने फुटबॉल का मजा लिया, और खासकर उन लोगों ने भी जिनका सुबह से रात तक का वक्त नफरत में भीगा हुआ रहता है। कल के इस मैच में नफरत के लायक कुछ नहीं था, और यह हिन्दुस्तान के एक तबके के लिए बड़ा दुर्लभ मौका था।

विश्वकप फुटबॉल का कल का फाइनल गजब का था। किसी हिन्दी फिल्म की कहानी की तरह मैच शुरू होने के पहले से इन दोनों देशों से परे के अधिकतर देशों या लोगों के खयालों में यह बात बसी हुई थी कि अर्जेंटीना के खिलाड़ी लियोनेल मेसी का यह आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच है, और इसके बाद रिटायर हो जाने की घोषणा वे खुद कर चुके हैं। वे बहुत किस्म के रिकॉर्ड बनाने में अपने देश के अपने पहले के एक महानतम खिलाड़ी माराडोना की बराबरी कर चुके थे, और सिर्फ विश्वकप जीतना उनके नाम पर दर्ज नहीं था। इस टूर्नामेंट के शुरू होने के पहले से यह एक बहुत बड़ा खतरा था कि 35 बरस की उम्र में आकर मेसी यह आखिरी विश्वकप खेल रहे थे, और अगर इस बार उनकी टीम नहीं जीतती, तो वे विश्वकप जीतने के सपने को लिए लिए अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से बिदा हो जाएंगे। यह नौबत बड़ी फिल्मी थी, और खासकर तब जब इस बार के टूर्नामेंट में अर्जेंटीना की टीम शुरुआत में ही सऊदी अरब से हार गई थी। इस मैच के बाद लोगों को इस टीम से उम्मीदें खत्म हो चली थीं, लेकिन इसने बीती रात गजब का खेल दिखाया, और विश्वकप भी जीता, और सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का गोल्डन बॉल पुरस्कार भी मेसी को मिला। यह सब कुछ उनकी जिंदगी के इस आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच में हुआ, जिसमें यह सब हुए बिना भी वे घर लौट सकते थे। किसी हिन्दी फिल्म की कहानी की तरह आखिर में जाकर जिस तरह हीरो और हीरोईन मिलते हैं, उसी तरह मेसी और उनकी यह आखिरी और सबसे बड़ी कामयाबी एक-दूसरे से मिले!

किसी खेल या टूर्नामेंट के बारे में विचारों के इस कॉलम में लिखने की हमें शायद ही कभी सूझती है, लेकिन खेल की तकनीकी बारीकियों से परे की बातों पर तो लिखा ही जा सकता है। कल के ही मैच को देखें तो मेसी की तरह ही दस नंबर की जर्सी पहने हुए फ्रांस के स्टार खिलाड़ी किलियन एमबापे का दर्द हार के बाद देखने लायक था। दर्शकों में मौजूद फ्रांस के राष्ट्रपति ने जिस तरह अपनी हारी हुई टीम के बीच मैदान पर पहुंचकर देर तक एमबापे को लिपटाकर दिलासा दिलाया, वह भी देखने लायक था। लेकिन इस फ्रांसीसी सितारे के लिए फुटबॉल की जिंदगी अभी खत्म नहीं हो रही है। वह अभी महज 23 बरस का है, उसके नाम ढेर अंतरराष्ट्रीय गोल करना दर्ज है, और ऐसा माना जाता है कि वह अगले कई और विश्वकप खेलने की संभावना रखता है। इसलिए अगर कल उसकी टीम विश्वकप नहीं जीत पाई, तो यह मेसी की तरह संभावनाओं का अंत नहीं था, अभी उसके सामने फुटबॉल की दुनिया की इस सबसे बड़ी ट्रॉफी को उठाने का बहुत सा मौका बाकी है। इसलिए कल की इस जीत-हार की एक खूबी यह रही कि आखिरी मौके वाले मेसी को मौका मिला, और बिल्कुल जवान खिलाड़ी एमबापे को इस मुकाबले में भी गोल दागने का।

कल के इस मुकाबले से परे, इस बार के विश्वकप में पहली बार एक अफ्रीकी टीम सेमीफाइनल तक पहुंची। मोरक्को ने एक नया रिकॉर्ड कायम किया, अफ्रीका के पौने चार करोड़ आबादी वाले इस देश ने जिस तरह लोगों का दिल जीता, और सेमीफाइनल तक पहुंचने का एक रिकॉर्ड बनाया, उससे भी बाकी दुनिया के बहुत से देशों को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। दुनिया के 32 देशों की टीमें इसमें शामिल हुईं, और इनमें मोरक्को जैसा कम आबादी का देश भी था, लेकिन हिन्दुस्तान जैसा 140 करोड़ आबादी का विश्वगुरू इन 32 टीमों में नहीं था। आबादी के हिसाब से वह दुनिया में दूसरे नंबर पर है, यहां पर फुटबॉल अच्छा-खासा खेला भी जाता है, लेकिन शायद क्रिकेट की दीवानगी की वजह से, या कुछ और वजहों से यह 32 टीमों में भी शामिल नहीं था। एक तरफ क्रिकेट जैसा खेल जिसके लिए सब कुछ खासा महंगा लगता है, दूसरी तरफ फुटबॉल जो कि सबसे ही सस्ता खेल है, जिसे बचपन से हिन्दुस्तानी बच्चे गली-गली खेलते हैं, लेकिन जब फुटबॉल के अंतरराष्ट्रीय मुकाबले की बात आती है, तो हिन्दुस्तान दुनिया के नक्शे से गायब ही है। और फुटबॉल का इतिहास बताता है कि 1950 में आखिरी बार हिन्दुस्तान फुटबॉल वल्र्डकप मुकाबले में दाखिल हो रहा था कि आयोजक फीफा को पता लगा कि भारतीय टीम फुटबॉल के जूते नहीं पहनेगी, और नंगे पैर खेलेगी, तो उसमें भारत के खेलने पर रोक लगा दी थी। वह दिन है, और आज का दिन है कि भारत फिर कभी फुटबॉल विश्वकप में खेलने लायक दर्जा नहीं पा सका। और इस बार तो अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल एसोसिएशन फेडरेशन (फीफा) ने भारतीय फुटबॉल फेडरेशन को उसके घरेलू मामलों की वजह से कुछ वक्त के लिए सस्पेंड भी कर दिया था। इस देश में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खेलने की भी लंबी परंपरा है, लंबा इतिहास है, लेकिन जब फीफा ने विश्वकप के लिए टीमों को छांटा, और 32 टीमों की सीमा थी, तो उसमें हिन्दुस्तान का नंबर 106 था। मोरक्को से 37 गुना अधिक आबादी वाला यह देश 106 नंबर पर रहा, और मोरक्को इस टूर्नामेंट में खेलते हुए सेमीफाइनल तक पहुंचा।

हिन्दुस्तान जैसे देश को अपने देश में इस खेल की एक मजबूत बुनियाद होते हुए, इतनी बड़ी आबादी होते हुए भी दुनिया में 106 नंबर पर होने के बारे में सोचना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि आज जब क्रिकेट के अलावा हॉकी जैसे दूसरे खेलों में भी भारत को कामयाबी और शोहरत मिल रही है, यहां की महिला खिलाड़ी भी बढ़-चढक़र कामयाब हो रही हैं, ओलंपिक और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में हिन्दुस्तान थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ रहा है, तो फुटबॉल जैसे कम खर्च वाले खेल की इस देश में बुनियाद कैसे मजबूत हो सकती है। फिलहाल जिन लोगों ने कल रात का यह फाइनल मैच नहीं देखा होगा, उन लोगों को इसका कोई रिपीट टेलीकास्ट जरूर देखना चाहिए, और यह भी देखना चाहिए कि अर्जेंटीना जैसे देश को इस जीत से कितना गौरव हासिल हुआ है। क्रिकेट से परे एक सस्ते और आसान खेल में भी संभावनाएं ढूंढनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 दिसंबर 2022


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सरकार को मालूम है चीन से आयात की हकीकत लेकिन..

 18 दिसंबर 2022

 

हर बरस दीवाली पर रौशनी के लिए लगने वाली चीनी झालरों, और होली पर प्लास्टिक की चीनी पिचकारियों का कारोबार करने वाले छोटे-छोटे लोग दहशत में रहते हैं कि त्यौहारी बाजार शुरू होने के ठीक पहले अगर भारत-चीन सरहद पर कोई बड़ा बखेड़ा हो गया तो उनका कारोबार धरे रह जाएगा। झंडे-डंडे लिए हुए राष्ट्रवादी लोग बाजारों पर टूट पड़ेंगे, और चीनी सामानों के बहिष्कार के फतवे हवा में तैरने लगेंगे। पिछले बरसों में ऐसा हुआ भी है, और छोटे-छोटे दुकानदार ऐसे सामानों के साथ फंस गए। अब नए आंकड़े बतलाते हैं कि चीन से आयात हाल के तीस महीनों में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। जब सरहद पर हिन्दुस्तानी-चीनी फौजों के बीच कड़ा संघर्ष हुआ था, और दोनों तरफ से दर्जनों लोग मारे गए थे, तब से अब तक केन्द्र सरकार की एक असाधारण चुप्पी इस मामले पर बनी हुई है, लेकिन चीन से भारत में आयात लगातार बढ़ते ही चल रहा है। इस मामले पर आज लिखने की जरूरत इसलिए है कि अरूणाचल प्रदेश में चीनी सरहद पर हुए ताजा संघर्ष के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यह सवाल उठाया कि भारत-चीन के साथ व्यापार बंद क्यों नहीं करता? उन्होंने कहा कि चीन से आयात होने वाला ज्यादातर सामान भारत में बनता है, आयात बंद करने से चीन को सबक मिलेगा, और भारत में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

बहुत सी राष्ट्रवादी ताकतें समय-समय पर यह मांग करती रहती हैं, और उनका गुस्सा सडक़ किनारे चीनी किस्म के खानपान बेचने वाले ठेलों पर भी उतरता है। 2020 में गलवान घाटी के टकराव के बाद से चीन से आयात लगातार बढ़ते चल रहा है, और यह इस दौर में हुआ है जब भारत सरकार चीजों को भारत में बनाने का अभियान चला रही है।

लेकिन कारोबार को भावनाओं, और राष्ट्रवादी उन्माद से अलग करके देखने की जरूरत है। केजरीवाल की बात मानकर अगर चीन से आयात बंद कर दिया जाता है, तो सवाल यह उठता है कि हिन्दुस्तान में जो चीनी सामान कच्चेमाल की तरह बुलाया जाता है, और यहां उससे दूसरे सामान बनाकर घरेलू बाजार में, या विदेशों में बेचा जाता है, उसका क्या होगा? चीन से आयात तो कम हो सकता है, लेकिन फिर हिन्दुस्तान उस रेट पर कच्चामाल कहां से पाएगा? और अगर चीन के बहिष्कार के फेर में हिन्दुस्तानी सामानों का दाम बढ़ते चलेगा, तो उसका अंतरराष्ट्रीय बाजार कहां रहेगा? इस तरह के फतवे देना बड़ा आसान रहता है, लेकिन किसी भी देश की सरकार, और वहां का कारोबार इस बात को बेहतर समझते हैं कि आज की दुनिया में देशों की एक-दूसरे पर निर्भरता कितनी बनी हुई है। आज अगर जंग के मैदान में अमरीका और चीन आमने-सामने खड़े होते हैं, और एक-दूसरे से कारोबार बंद होता है, तो चीन से अधिक अमरीका तबाह होगा क्योंकि वहां चीजों का बनना ही थम जाएगा। आज चीन के मुकाबले अगर अमरीका ताइवान को बचाने में अपनी ताकत झोंकता है, तो उसकी वजह फौजी न होकर कारोबारी है क्योंकि ताइवान का दुनिया में चिप बनाने में एकाधिकार सा है, और अमरीका के पास उसका कोई विकल्प नहीं है। आज का अंतरराष्ट्रीय कारोबार ऐसी बहुत सी मजबूरियों से भरा हुआ है, और सिर्फ राष्ट्रवादी उन्माद से आर्थिक फैसले नहीं लिए जा सकते।

आम जुबान में कहें तो यह समझने की जरूरत है कि चीन से सौ रूपये का कच्चामाल मंगाकर उससे कुछ और बनाकर हिन्दुस्तान अगर दो सौ रूपये में उसे बाहर बेचता है तो यह सौ रूपये हिन्दुस्तानी कामगारों और कारोबारियों के बीच बंटता है, सरकार को टैक्स मिलता है। चीन से सौ रूपये का आयात बंद कर देना आसान है, लेकिन उसके बाद हिन्दुस्तानी अर्थव्यवस्था इसमें वेल्यूएडिशन का सौ रूपया पाना भी खो बैठेगी। इसलिए सरहद को लेकर राजधानियों में जंग के फतवे देने वाले लोग अलग होते हैं, और अर्थव्यवस्था को चलाने वाले लोग अलग होते हैं। यही आर्थिक मजबूरी रहती है जो चीन से लंबे समय बाद हुए सरहदी संघर्ष के बाद भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज तक इस सिलसिले में चीन का नाम भी नहीं लिया, चीन को एक शब्द के रूप में भी इस्तेमाल नहीं किया। हालांकि चीन को आंखें दिखाने के बारे में बहुत कुछ कहा गया, लेकिन पर्दे के पीछे जो हुआ वह तो चीन से लगातार खरीददारी बढ़ते चलना ही हुआ है। हम पाकिस्तान से भी कारोबारी रिश्ते खत्म करने के हिमायती नहीं हैं, आज जो योरप यूक्रेन को रूस के खिलाफ लगातार फौजी मदद कर रहा है, वह आज भी रूस से खरीदी गई गैस और डीजल-पेट्रोल पर चल रहा है। हिन्दुस्तान में अगर एक ग्राहक के रूप में चीन से आयात किया है, तो वह फिक्र की बात है, लेकिन अगर उसने एक कारोबारी के रूप में कच्चामाल आयात किया है, तो वह एक अच्छी बात है। अपने देश में जब तक उस दर्जे का, उस रेट पर कच्चामाल न बनने लगे, तब तक चीन से परहेज के नाम पर देश के कारोबार को ही बंद कर देना चीन का बहिष्कार नहीं होगा, हिन्दुस्तान की आत्महत्या होगी।

लेकिन केन्द्र सरकार के अभी सामने आए आंकड़ों से युद्धोन्मादी और राष्ट्रवादी फतवेबाजों के मुंह कुछ बंद होने चाहिए। चीन सिर्फ सरहद पर खड़े हुए फौजी नहीं हैं, चीन वहां के कारोबारी शहरों में बसे हुए कारोबारी भी हैं जिनसे लेन-देन करना भारत की मजबूरी है। बहिष्कार से चीन की बोलती बंद कर देना, और उसे सबक सिखा देना बचकानी बात है। आज चीन पूरी दुनिया का सबसे बड़ा कारखाना है, सबसे बड़ा निर्यातक है, चीन के बिना आज पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था एक दिन में ठप्प पड़ सकती है, आज ब्रिटेन जैसे देश में सरकार इस फिक्र में डूबी है कि चीन से परे कौन से और रास्ते निकाले जा सकते हैं। ऐसे में हिन्दुस्तान को लोगों का ध्यान बंटाने के लिए चीन की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए उसे चीन की जरूरत और अधिक है। देश के किसी जानकार अर्थशास्त्री या किसी संस्था को यह अंदाज निकालकर लोगों के सामने रखना चाहिए कि चीनी कच्चेमाल का प्रतिस्पर्धी हिन्दुस्तानी विकल्प कितने बरसों में बन पाएगा, किस रेट का रहेगा, और उसके इस्तेमाल के बाद बने भारतीय सामानों का रेट कितना हो जाएगा, और क्या वे घरेलू बाजार या विदेशों में मुकाबला कर सकेंगे? लेकिन सरकारों की दिलचस्पी उन्मादी नारों के बीच ऐसी समझदारी की बातों में नहीं रहती है, और इस तरह की व्याख्या करने वाले किसी गैरसरकारी संगठन को भी लोग चीन का दलाल कहने लगेंगे। फिर भी हिन्दुस्तानियों की उत्तेजना शांत करने के लिए ऐसा हिसाब-किताब किसी को जरूर करना चाहिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था का कितना हिस्सा चीन से आयात से जुड़ा हुआ है। अपना असली कद देखकर उन्मादी नारे शायद वैसे भी कम हो जाएंगे, अगर पिछले तीस महीनों के चीन से आयात के आंकड़ों से कम नहीं हुए हैं तो।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 दिसंबर


 (Daily Chhattisgarh)

सुप्रीम कोर्ट से केन्द्र का यह टकराव मासूम नहीं

  18 दिसंबर 2022

 

सुप्रीम कोर्ट को लेकर केन्द्र सरकार का रूख एक पहेली की तरह बना हुआ है। पिछले कई महीनों से केन्द्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू तरह-तरह के कार्यक्रमों में या मीडिया से बात करते हुए जिस तरह सुप्रीम कोर्ट की आलोचना कर रहे हैं, वह एक सिलसिले के रूप में देखने पर कोई मासूम हरकत नहीं लगती है। इसके पीछे कोई सोची-समझी बात है, और अदालत से केन्द्र सरकार का सतह के नीचे चलता कोई टकराव दिख रहा है। उन्होंने जजों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई कॉलेजियम प्रणाली की कड़ी आलोचना की, फिर कुछ और मामलों में अदालत के बारे में तरह-तरह की असहमति जताई। अभी उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को यह नसीहत दी कि उसे जमानत के मामलों को, और जनहित याचिकाओं को नहीं सुनना चाहिए क्योंकि उनमें बहुत वक्त लगता है। फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जजों की लंबी छुट्टियों के बारे में कहा इससे वहां चल रहे मुकदमों के लोगों को बड़ी असुविधा होती है। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ तुर्की-ब-तुर्की जवाब भी दे रहे हैं।

इससे कम से कम एक यह बात तो समझ में आती है कि केन्द्र सरकार चन्द्रचूड़ के साथ उतनी सहूलियत महसूस नहीं कर रही है जितनी वह पिछले मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित के साथ महसूस करती थी। जजों की अपनी निजी राय रहती है, और सरकारें यह अंदाज लगा लेती हैं कि उसकी दिलचस्पी के मामलों में किस जज का क्या रूख रहेगा। इसी को देखते हुए केन्द्र सरकार कॉलेजियम के भेजे हुए नामों को मंजूरी देने के पहले उन्हें महीनों या बरसों तक टांगकर रखती है ताकि जिन जजों या वकीलों के नाम भेजे गए हैं, उनकी सोच अगर सरकार को माकूल नहीं लगती है, तो उन्हें मंजूरी न दी जाए। नतीजा यह होता है कि ऐसी लिस्ट में से कई वकील थककर अपने नाम वापिस ले लेते हैं क्योंकि उन्हें यह समझ आ जाता है कि वे एक तारीख के बाद जज बनने पर कभी चीफ जस्टिस नहीं बन पाएंगे। अभी हाल में ही ऐसे कई लोगों ने अपने नाम वापिस ले लिए हैं। जजों की खाली पड़ी हुई कुर्सियों और सरकार के पास कॉलेजियम की भेजी गई फेहरिस्त का जब साथ-साथ साल-दो-साल इंतजार चलता है तो जाहिर है कि अदालत में मामलों का ढेर बढ़ते चलेगा। लेकिन मौजूदा सरकार को नामों की ऐसी लिस्ट को एक-दो बरस तक भी रोकने से कोई परहेज नहीं है। मुख्य न्यायाधीश सार्वजनिक कार्यक्रम में भी इस बात को उठा चुके हैं, और अब तो ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट भी जनता के बीच अपनी स्थिति को रख देना चाहता है कि सरकार की किन बातों से उसके काम पर असर पड़ रहा है। फिर यह भी लगता है कि भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभों में से दो, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच अधिकारों को लेकर भी एक खींचतान चल रही है। यह नौबत तब और गंभीर हो जाती है जब लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ, विधायिका, अपने भीतर सत्तारूढ़ पार्टी के असीमित बाहुबल के चलते भारतीय लोकतंत्र को अब दो स्तंभों का ही बना चुका है। अब देश में सरकार और अदालत इन्हीं दो का मतलब रह गया है क्योंकि संसद में न तो कोई विपक्ष कोई ताकत रखता, और न ही सरकार को उसकी कोई परवाह ही है। ऐसी हालत में सरकार अपने संसदीय बाहुबल के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट से दो-दो हाथ करने को उतावली दिख रही है। लेकिन आज के मुख्य न्यायाधीश सरकार के इस रूख के सामने झुकते हुए भी नहीं दिख रहे हैं।

दरअसल भारतीय संविधान जब बना, उस वक्त शायद देश में ऐसी संसदीय स्थिति की कल्पना नहीं रही होगी कि संसद में लगातार एक ही पार्टी का इतना बड़ा बहुमत जारी रहेगा, जो कि देश की तकरीबन तमाम विधानसभाओं तक भी फैला हुआ रहेगा। ऐसा बाहुबल सत्तारूढ़ पार्टी की सोच को संविधान संशोधन में बदलने की ताकत रखता है, और इसीलिए आज हिन्दुस्तान कई किस्म के नए कानूनों को देख रहा है, केन्द्र-राज्य संबंधों में नई तनातनी झेल रहा है, और अब केन्द्र में सत्तारूढ़ ताकतों को शायद यह लग रहा है कि ऐसे अभूतपूर्व जन-बहुमत के रहते हुए भी सुप्रीम कोर्ट अगर एक प्रतिबद्ध-न्यायपालिका के रूप में काम नहीं कर रहा है, तो क्यों नहीं कर रहा है? लोगों को याद होगा कि प्रतिबद्ध-न्यायपालिका शब्द का पिछला या पहला इस्तेमाल इमरजेंसी के दौरान हुआ था जब तानाशाह हो चुकी इंदिरा सरकार और सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी न्यायपालिका से यह उम्मीद कर रही थी कि उसे सरकार के नजरिए से प्रतिबद्ध होकर चलना चाहिए। आज केन्द्रीय कानून मंत्री के लगातार बयानों से अगर सीधे-सीधे यह मतलब नहीं भी निकल रहा है, तो भी इससे सीधे-सीधे उसी दौर की याद आ रही है।

हम केन्द्र और सुप्रीम कोर्ट में किसी टकराव की चाहत के बिना यह उम्मीद जरूर करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ देश के संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता रखे, और अगर उसके शब्दों के बीच व्याख्या की गुंजाइश है, तो जजों को अपने सरोकार सरकार के साथ नहीं, जनता के साथ जोडऩे चाहिए। लोकतंत्र में जैसे-जैसे सरकार मजबूत होती है, संसद एकतरफा होती है, वैसे-वैसे सुप्रीम कोर्ट को अपनी जिम्मेदारी को अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत भी होती है। आज का यह दौर देश की सरकार के साथ-साथ देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर एक विचारधारा की ताकतों के एकाधिकार की कोशिश का दौर दिख रहा है। केन्द्र सरकार इसमें बहुत हद तक कामयाब भी हुई है, और मोदी सरकार के इन आठ बरसों में तकरीबन तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर लगभग-प्रतिबद्धता की नौबत आ चुकी है। यह वक्त एक बहुत जिम्मेदार और मजबूत रीढ़ वाले सुप्रीम कोर्ट की जरूरत का है, और चूंकि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल पर्याप्त बाकी है, इसलिए इतिहास इस दौर को गौर से दर्ज करेगा।

(Daily Chhattisgarh)