एक लाड़ले बच्चे से परे स्कूल शिक्षा में कुछ नहीं
2 फरवरी 2023
छत्तीसगढ़ की दो छोटी-छोटी घटनाएं अलग-अलग
इलाकों की स्कूलों की हैं, लेकिन इन्हें मिलाकर लिखने की जरूरत है।
गरियाबंद के ग्रामीण इलाके में पांचवीं के एक छात्र की शिक्षिका ने माचिस
की तीली जलाकर उसके गले पर रख दिया जिससे जख्म हो गया है। परिवार ने शिकायत
अफसर से की है, शिक्षिका का कहना है कि बच्चा कम बोलता है, उसे चंचल बनाने
के लिए उसने यह टोटका किया था। स्कूल में दो ही शिक्षक हैं, एक पहले से
किसी दुर्घटना में जख्मी है, और अब यह शिक्षिका भी छुट्टी पर चली गई है,
स्कूल बंद हो गया। एक दूसरे मामले में कोरबा जिले के एक सरकारी आवासीय
विद्यालय में एक छात्र को घर से लौटने में देर हुई, तो हॉस्टल अधीक्षक ने
दूसरे सीनियर छात्रों से इस छात्र की चप्पलों से पिटाई करवाई, इस लडक़े को
भी जिला अस्पताल में भर्ती किया गया है, और मामले की जांच की जा रही है।
छत्तीसगढ़ में बहुत सी स्कूलों से ऐसे वीडियो सामने आते हैं जिनमें शिक्षक
शराब के नशे में धुत्त स्कूल में बैठे हुए हैं, या फर्श पर पड़े हुए हैं,
और उनके आसपास बच्चे बैठे हुए हैं। अधिकतर मामलों में यह हाल सरकारी
स्कूलों में ही हैं जहां पर जवाबदेही नहीं के बराबर है। सरकारी स्कूलों के
ऐसे हाल पर सोचने की जरूरत है, और इसीलिए हम आज यहां यह चर्चा छेड़ रहे
हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक स्कूल शिक्षा से जुड़े हुए तमाम पहलू परले दर्जे के भ्रष्टाचार के शिकार रहे हैं। मंत्री से लेकर अफसरों तक, और स्कूलों में काम करने वाले लोगों तक भ्रष्टाचार बहुत बुरी तरह फैला हुआ है। पिछली भाजपा सरकार के समय की बात हो, या आज की कांग्रेस सरकार की बात हो, स्कूलों की फर्नीचर-खरीदी से लेकर वहां दोपहर के सरकारी खाने तक, तमाम मामलों में भ्रष्टाचार इतना आम है, और इतना बड़ा है कि जिम्मेदार लोगों का तमाम ध्यान बस इसी में लगे रहता है कि इस विभाग को कैसे दुहा जा सकता है। इसमें सहूलियत की बात यह भी रहती है कि विभाग से जुड़े हुए बच्चे जुबान खोल नहीं सकते, भ्रष्टाचार को समझते नहीं हैं, और सरकारी स्कूलों के बच्चों के गरीब मां-बाप की अधिक जुबान होती नहीं है। इसलिए जिस तरह निजी स्कूलों में पालक-शिक्षक बैठक होती है जिसमें बच्चों के मां-बाप स्कूलों की कमियों और खामियों को गिनाते हैं, उस तरह का कुछ सरकारी स्कूलों में नहीं होता जहां पर कि गरीब परिवारों के बच्चों को अहसान करने के अंदाज में पढ़ाया जाता है।
कोई भी ऐसा विभाग जिसमें मंत्री से लेकर नीचे तक तमाम लोगों की दिलचस्पी अधिक से अधिक वसूली और उगाही में रहती है, विभाग को इस हद तक दुह लिया जाता है कि उसके थन से खून निकलने लगे, तो फिर विभाग के काम, पढ़ाने में भला किसकी दिलचस्पी रह सकती है? और छत्तीसगढ़ में जिस तरह शिक्षाकर्मियों के भरोसे पढ़ाई चलती है, जिनका कि जिले के बाहर कोई तबादला भी नहीं हो सकता, वहां पर वे शिक्षाकर्मी पढ़ाने जाते भी हैं या नहीं, यह जानकारी भी कम से कम ग्रामीण इलाकों में तो नहीं रहती है। यह सिलसिला शिक्षा की बुनियाद को इतना खोखला कर गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों के ज्ञान के एक मूल्यांकन में छत्तीसगढ़ बहुत ही पिछड़ा हुआ मिला है कि यहां के बच्चे अपनी कक्षा से कई क्लास नीचे की भी जानकारी नहीं रखते हैं। यह दिक्कत इसलिए भी है कि सरकार और समाज में जरा सी भी ताकत रखने वाले लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं, और सरकारी स्कूलों से किसी ताकतवर के परिवार पर फर्क नहीं पड़ता।
छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक दूसरी चीज भी हो रही है। सरकार ने स्वामी आत्मानंद के नाम पर चुनिंदा सरकारी स्कूलों को अंग्रेजी स्कूल बनाना शुरू किया है। अब तक ऐसे कई सौ अंग्रेजी स्कूल बन चुके हैं जिनके लिए मौजूदा सरकारी स्कूलों में से सबसे अच्छे ढांचे वाले स्कूल छांटकर उन्हें आत्मानंद अंग्रेजी स्कूल बना दिया गया है। इनके लिए अलग से शिक्षक नियुक्त किए गए हैं, या मौजूदा शिक्षकों में से जो बेहतर हैं, उन्हें आत्मानंद स्कूल भेजा गया है। जिलों में कलेक्टरों के हांके चलने वाले डीएमएफ (जिला खनिज निधि) से अंधाधुंध पैसा आत्मानंद स्कूलों को आलीशान बनाने में खर्च किया जा रहा है, और ऐसे स्कूलों की तस्वीरें स्कूल विभाग की कामयाबी की तरह फैल रही हैं। हकीकत यह है कि पढ़ाई को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से करवाने के लिए चुनिंदा स्कूलों पर ऐसे किसी खर्च की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि अंग्रेजी पढ़ाने के लिए बेहतर इमारत नहीं लगती, बहुत बेहतर फर्नीचर नहीं लगता। सरकार इन बरसों में शायद पांच फीसदी स्कूलों को भी अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं बना पाई है, और बाकी तकरीबन तमाम गरीब बच्चे टूटी-फूटी स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जिनकी मरम्मत तक नहीं हो रही है, क्योंकि सरकार का पूरा ध्यान आत्मानंद अंग्रेजी स्कूलों पर है।
हिन्दी भाषी इलाके की सरकार की अंग्रेजी भाषा को लेकर इतनी हीनभावना समझ से परे है। एक वक्त हिन्दुस्तान पर राज करने वाले अंग्रेजों की भाषा सिखाने के लिए आज बाकी स्कूलों का हक छीनकर अंग्रेजी के लिए इतने महंगे ढांचे तैयार करना अपनी खुद की भाषा को लेकर एक हीनभावना के अलावा और कुछ नहीं है। प्रदेश में विपक्षी भाजपा को भी इस बात की समझ नहीं है कि 95 फीसदी से अधिक गरीब बच्चों के हक छीनकर अगर 5 फीसदी अंग्रेजी बच्चों को दिया जा रहा है, तो यह सामाजिक विसंगति उठाना विपक्ष की जिम्मेदारी है। लेकिन छत्तीसगढ़ में सामाजिक समानता के मोर्चे पर विपक्ष के मुर्दा रहने का यह पहला मौका नहीं है, जब भाजपा की सरकार पन्द्रह बरस थी, तब विपक्षी कांग्रेस पार्टी भी गरीबों के हक के मुद्दों पर कुछ ऐसी ही थी, और वही वजह थी कि भाजपा लगातार तीन विधानसभा चुनाव, तीन लोकसभा चुनाव, और तीन म्युनिसिपल चुनाव जीत सकी थी।
सरकारी स्कूल शिक्षा इतने गरीब तबके का मुद्दा है कि शायद ही कोई विधायक अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाते होंगे। स्कूलों की हालत खराब है, और सरकार मानो बच्चों की एक पूरी पीढ़ी का वक्त गुजार देने के लिए इन स्कूलों को किसी तरह चला रही है, इनका उत्कृष्टता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। ऐसे माहौल में अब सरकार का लाड़ला बच्चा आत्मानंद स्कूल के नाम पर उसके तमाम साधन-सुविधाओं का अकेला हकदार बन गया है, और प्रदेश में बाकी स्कूलों की बदहाली की चर्चा करने वाले लोग भी नहीं रह गए हैं, विपक्ष में भी नहीं।
एक मुसलमान आतंकी का मस्जिद पर हमला, 83 मौतें, और इससे निकले सबक...
31 जनवरी 2023
पाकिस्तान के पेशावर में एक मस्जिद पर कल
आत्मघाती हमला हुआ, और हमलावर ने अपनी विस्फोटक जैकेट के धमाके से मस्जिद
की इमारत का एक हिस्सा भी गिरा दिया, और 83 लोगों की मौत की खबर है। पुलिस
लाईन की इस मस्जिद में दोपहर को नमाज पढऩे इक_ा हुए अधिकतर लोग पुलिस के
थे, और मारे जाने वाले लोग भी वही हैं। यह इलाका पेशावर का सबसे अधिक
हिफाजत वाला इलाका माना जाता है। वहां के धार्मिक-आतंकी संगठन
तहरीक-ए-तालिबान ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। पाकिस्तान का यह संगठन
पड़ोस के अफगानिस्तान के तालिबानियों के साथ तालमेल से काम करता है, और
अफगान सरकार से पाकिस्तान की कुछ सरहदी मुद्दों को लेकर तनातनी भी चल रही
है। टीटीपी नाम का यह संगठन पाकिस्तान में अधिक कट्टर इस्लामी कानूनों को
लागू करने के लिए हथियारबंद आंदोलन चलाता है।
पाकिस्तान लगातार धार्मिक कट्टरता वाले आतंकी हमलों का शिकार होते रहता है। हर बरस ऐसे कई बड़े हमले होते हैं जिनमें सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। दो-चार मौतों की तो खबर भी मुल्क से बाहर नहीं जाती। यह पाकिस्तान अभी पौन सदी पहले तक आज के हिन्दुस्तान का एक हिस्सा था, और अंग्रेजों ने जाते-जाते इसे दो मुल्कों में बांट दिया था। तब से लेकर अब तक पाकिस्तान धर्म के आधार पर चलने वाला एक देश रहा, और आतंकी हमलों से परे भी पाकिस्तान की आम जिंदगी में धार्मिक कट्टरता हर दिन अपना दखल रखती है। वहां पर न सिर्फ गैरमुस्लिम लोग, बल्कि मुस्लिम समुदाय के भीतर के कुछ ऐसे सम्प्रदायों के लोग जो कि कट्टर इस्लामियों को पसंद नहीं आते हैं, वे भी आए दिन मारे जाते हैं। यह तो बात हुई मौतों के आंकड़ों की, लेकिन इससे परे भी रोजाना की सामाजिक जिंदगी में धार्मिक कट्टरता हिंसा पैदा करती ही रहती है। आए दिन वहां से खबरें आती हैं कि किसी ईसाई को मारा गया, तो किसी हिन्दू लडक़ी का अपहरण करके उसे मुस्लिम बनाकर उससे शादी कर ली गई।
यह धर्म का एक आम मिजाज है कि वह कट्टरता की तरफ बढ़ते ही चलता है। जिस तरह किसी धार्मिक कार्यक्रम या धर्मस्थल के लाउडस्पीकर लगातार तेज होते जाते हैं, क्योंकि उनके आम हल्ले से लोगों पर असर होना बंद सा होने लगता है, इसलिए वे अधिक तेज होकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहना चाहते हैं। पाकिस्तान में इस धार्मिक कट्टरता ने पहले तो देश में सभी धर्मों की बराबरी खत्म की, बहुसंख्यक धर्म ने देश पर अपना एकाधिकार जमाया, आसपास के देशों में भी बढ़ती चली गई धार्मिक कट्टरता का असर हुआ, और पड़ोस के हिन्दुस्तान की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के खिलाफ पाकिस्तान में जैसे मजहबी फतवे तैरते रहे, उनसे भी वहां की जनता का दिमाग हिन्दू विरोधी होते गया, और नतीजतन वह मुस्लिम कट्टरपंथी भी होते गया।
यह कहानी सिर्फ पाकिस्तान की नहीं है, दूसरी जगहों पर भी धार्मिक कट्टरता और हिंसा साथ-साथ आगे बढ़ते हैं। हिन्दुस्तान में आज हिन्दू बहुसंख्यक हैं, और वे एक साम्प्रदायिक सोच की आग में झोंक भी दिए जा रहे हैं। उन्हें एक रंग को हिन्दू रंग मान लेने और देश में साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के फिजूल के काम में झोंक दिया गया। फिर बाद में लोगों ने सैकड़ों वीडियो निकालकर याद दिलाया कि एक हिन्दू अभिनेत्री ने अपने हिन्दू बदन पर जो भगवा-केसरिया बिकिनी पहनी थी, वैसी भगवा-केसरिया बिकिनी और दूसरे उत्तेजक कपड़े पहनी हुई अभिनेत्रियों के साथ निहायत ही फूहड़ और अश्लील डांस करते हुए भाजपा के बड़े-बड़े सांसद फिल्में करते आए हैं। बेशरम रंग का यह मुद्दा छेडऩा खुद भाजपा को भारी पड़ा क्योंकि उसके अपने लोगों के इसी बेशरम रंग के भुलाए जा चुके सैकड़ों वीडियो फिर ताजा हो गए, लोगों को समझ आ गया कि धार्मिक रंग के नाम पर एक फिजूल की नफरत फैलाई जा रही थी, और एक मुस्लिम अभिनेता शाहरूख खान की पठान नाम की फिल्म हिन्दुस्तान के हिन्दू बहुसंख्यक दर्शकों के बीच इतिहास की सबसे बड़ी हिट भी हो गई। पाकिस्तान को देखकर भी हिन्दुस्तान में धर्मान्धता फैलाने पर आमादा लोगों को अगर कोई सबक नहीं मिल रहा है, तो किसी दिन उन्हें कोई धमाका मिल सकता है। हिंसा को लगातार बढ़ाते जाने से वह किसी समस्या का समाधान नहीं होती, वह और बड़ा खतरा बन जाती है, हिन्दुस्तान में आज यही होते हुए दिख रहा है। देश के लोग इतने खाली और बेकार बैठे हैं, उनमें मनोबल और महत्वाकांक्षा की इतनी कमी है कि वे धर्म के नाम पर अपने पीढिय़ों के पड़ोसी का सिर तोड़ देने के लिए तैयार हो रहे हैं। आज अगर हिन्दुस्तान में चुनाव जीतने के लिए कोई हिन्दू वोटों का इस तरह से ध्रुवीकरण करना चाहते हैं कि मुस्लिमों से नफरत करवाकर हिन्दू वोट पा लिए जाएं, तो वोट तो मिल सकते हैं, लेकिन शांति की गारंटी नहीं मिल सकती। और यह मानना सिवाय बेवकूफी और क्या होगा कि 140 करोड़ आबादी में 20 करोड़ मुस्लिम, दसियों करोड़ दलित, दसियों करोड़ आदिवासी, इन सबको प्रताडि़त करके, सबको कुचलकर, सब पर एक आक्रामक हिन्दुत्ववादी जीवनशैली लादकर इस देश को चैन से रखा जा सकता है। लोगों को पाकिस्तान के आज के मजहबी आतंक के साथ हिन्दुस्तान की तुलना कुछ नाजायज लग सकती है, लेकिन लोगों को अगर भविष्य के लिए, आने वाली पीढिय़ों के लिए कोई सबक लेना है, तो वह अपने से अधिक खतरा झेल रहे देशों को देखकर ही लिया जा सकता है। आज हिन्दुस्तान का रूख जिस तरफ है, वह रूख बहुत खतरनाक है, और वह रूख पाकिस्तान जैसे ही किसी भविष्य की ओर इशारा करता है। यह भी समझने की जरूरत है कि आतंकी हमलों के लिए बराबरी की आबादी जरूरी नहीं होती है, दर्जन भर लोग भी दसियों लाख की आबादी पर आतंकी हमले कर सकते हैं, लोगों को थोक में मार सकते हैं। इससे बचने और बचाने का अकेला तरीका यही है कि देश के लोगों में धार्मिक कट्टरता खत्म की जाए, धर्मान्धता खत्म की जाए, धर्म के नाम पर हिंसा को मंजूरी देना खत्म किया जाए, और कानून के राज को सबसे ऊपर माना जाए। हिन्दुस्तान आज ऐसी कुछ बुनियादी जरूरतों से खिलवाड़ करते दिख रहा है, इसके नतीजे में आज तो धार्मिक ध्रुवीकरण से धार्मिक जनगणना की तरह के चुनावी नतीजे मिल रहे हैं, लेकिन चुनावों से परे रोज की जिंदगी एक खतरनाक मंजिल की तरफ बढ़ भी रही है। यह भी नहीं समझना चाहिए कि हिन्दुस्तान जैसे देश में धार्मिक आतंक हिन्दू-मुस्लिम होकर खत्म हो जाएगा, जैसा कि पाकिस्तान में देखने मिल रहा है, एक धर्म के भीतर भी दो समुदाय एक-दूसरे को थोक में मार सकते हैं।
इस ऐतिहासिक पदयात्रा के बाद राहुल क्या करें?
30 जनवरी 2023
कांग्रेस सांसद और पार्टी के सबसे
महत्वपूर्ण नेता राहुल गांधी की कन्याकुमारी से शुरू हुई पदयात्रा 136
दिनों में 12 राज्यों, 2 केन्द्र प्रशासित प्रदेशों के 75 जिलों से होती
हुई कश्मीर के श्रीनगर में तिरंगा फरहाने के साथ खत्म हुई। 3500 किलोमीटर
से अधिक की यह पदयात्रा 116 दिन रोजाना 23-24 किलोमीटर चली। जब यह शुरू हुई
तो इसके नारे, नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो, को लेकर राहुल गांधी का मखौल
उड़ाया गया, और बहुत से लोगों को इसकी कामयाबी पर शक था। लेकिन सफर
जैसे-जैसे आगे बढ़ा, राहुल को मिलने वाला जनसमर्थन एक सैलाब की तरह बढ़ते
चले गया। कांग्रेस पार्टी तो इसके साथ थी ही, लेकिन दूसरी पार्टियों के भी
दर्जनों नेता अलग-अलग दिनों पर इसमें शामिल हुए, रास्ते के गांव-कस्बे और
शहर के लोग सडक़ों पर उमड़ पड़े, और राहुल गांधी इतने महीनों तक सिर्फ
मोहब्बत और दिल जोडऩे, नफरत छोडऩे की बात दुहराने वाले हाल के हिन्दुस्तान
के अकेले नेता बने। इस पदयात्रा का किसी चुनाव से कोई रिश्ता नहीं था, और
वही मानो सबसे अच्छी बात थी। इसके बीच दो राज्यों में चुनाव हुए, लेकिन
राहुल तकरीबन वहां से दूर ही रहे, और अपनी पदयात्रा में लगे रहे।
हिन्दुस्तान के आज के मुख्यधारा के कहे जाने वाले तथाकथित मीडिया ने इससे एक दूरी बना रखी थी, लेकिन सोशल मीडिया की मेहरबानी से बिना किसी आडंबर के एक आम इंसान की तरह राहुल हर दिन दर्जनों तस्वीरों में लोगों के सामने आते रहे, लोगों से जुड़ते रहे, और लोग उनसे जुड़ते रहे। राहुल को इस पदयात्रा में मिले अपार जनसमर्थन की वजह से जो लोग उन्हें आज विपक्ष का सबसे बड़ा या सर्वमान्य नेता मानने और बताने की चूक कर रहे हैं, वे इस पदयात्रा की अहमियत को घटा भी रहे हैं। जहां तक हमें समझ पड़ता है, यह पदयात्रा ठीक अपने नारे को पूरा करते हुए आज टुकड़े-टुकड़े किए जा रहे हिन्दुस्तान को बचाने के लिए, सहेजने और जोडऩे के लिए निकाली गई थी, और उसने अपना वह मकसद हैरानी की हद तक पूरा किया है। जिस तरह आम तबकों के लोग, हर धर्म के लोग, हर उम्र के आदमी-औरत, और बच्चे राहुल के साथ कुछ दूर चलने के लिए होड़ करते रहे, उनसे लिपटकर पिघलते रहे, वह देखना अद्भुत रहा। आज के वक्त जब इस देश में पोशाक से जाति और धर्म पहचानने का फतवा दिया जा रहा है, तब राहुल एक सम्पूर्ण हिन्दुस्तानी की तरह, हर हिन्दुस्तानी के गले मिलते रहे, अनगिनत लोगों के हाथ थामकर उन्हें साथ चलाते रहे, और इसके बदले देश के लोगों के लिए मोहब्बत के अलावा उन्होंने कुछ नहीं मांगा।
आज जब देश के बड़े-बड़े नेता मुंह खोलते हैं, और तेजाबी, साम्प्रदायिक नफरत की लपट निकलती है, वैसे में तकरीबन पांच महीने हर दिन 10-12 घंटे लोगों के बीच रहना, हर दिन अनगिनत लोगों से बात करना, पदयात्रा में जाने कितनी बार प्रेस से बात करना सब होते रहा, लेकिन न तो राहुल ने अपनी लोकप्रियता को लेकर कोई दावे किए, न ही अपनी अहमियत बखान करने की कोशिश की, और न ही उन्होंने भविष्य को लेकर इस यात्रा के योगदान का कोई दावा किया। हर मायने में वे एक आम इंसान की तरह रहते और चलते दिखे, और दाढ़ी और टी-शर्ट का उनका यह नया अवतार आज देश का सबसे चर्चित चेहरा बना हुआ है। जब उनके अगल-बगल के तमाम नेता, और दर्जनों सुरक्षा कर्मचारी ऊनी कपड़ों से लदे हुए थे, तब भी राहुल गांधी जिस तरह महज एक टी-शर्ट में चल रहे थे, उसने भी उन्हें लोगों की हैरानी का सबब बना दिया। उन्होंने इसकी जो वजह बताई, वह भी दिल छू लेने वाली थी कि उन्होंने ठंड में तीन गरीब बच्चियों को फटे कपड़़ों में देखा जिनके पास पहनने को गर्म कपड़े नहीं थे, तब उन्होंने तय किया कि जब तक वे कंपकंपाने नहीं लगेंगे, तब तक एक टी-शर्ट ही पहनेंगे, और वे पूरी ही पदयात्रा में वैसे ही रहे।
राहुल की पदयात्रा को गांधी की किसी पदयात्रा से जोडक़र देखना राहुल के साथ ज्यादती होगी। कल उन्होंने श्रीनगर में पदयात्रा पूरी की है, और आज गांधी पुण्यतिथि है। लेकिन गांधी से तुलना के लिए एक लंबे इतिहास और बहुत ऊंची महानता की जरूरत पड़ती है, और राहुल की किसी बात से ऐसा नहीं लगता है कि वे खुद अपनी इस पदयात्रा का महिमामंडन चाहते हैं। उनकी पार्टी के लोगों को भी चाहिए कि राहुल को महान दिखाने के फेर में कोई ऐसे दावे न करें जिनसे कि उनकी कामयाबी को शिकस्त मिले। देश के लोगों ने महीनों तक राहुल गांधी को आम लोगों के बीच बिना किसी आडंबर के, और बिना फैशन परेड के, बिना नफरत की कोई बात किए, और बिना कोई दावे किए देखा है, और इस अभूतपूर्व स्थिति को बिना कुछ कहे एक अहसास की तरह बने रहने देना चाहिए, बजाय फिजूल की बातें करके उसके असर को खत्म करने के। कांग्रेस के कुछ लोगों ने राहुल को विपक्ष का प्रधानमंत्री का चेहरा बताने का अतिउत्साह भी इसी दौरान दिखाया है, और ऐसी बातों ने राहुल का नुकसान करने के अलावा कुछ नहीं किया है। ऐसा कहने वाले लोगों ने हिन्दुस्तान में प्रचलित एक पुरानी कहावत नहीं सुनी है कि सूत न कपास, जुलाहों में ल_मल_ा। इस यात्रा को किसी भी चुनावी मकसद और संभावना से जोडक़र देखना अपने मन के भीतर तो लोग कर सकते हैं, लेकिन बयानों में इसे लेकर कुछ भी कहना न सिर्फ राहुल और कांग्रेस के खिलाफ जाएगा, बल्कि लोकतंत्र के भी खिलाफ जाएगा। एक लोकतांत्रिक देश में उसके सबसे नाजुक दौर में सिर्फ चुनावों को ध्यान में रखकर बयानबाजी किसी के लिए अच्छी नहीं है।
राहुल गांधी को लोगों से मिलने का यह सिलसिला जारी रखना चाहिए। इस हौसलेमंद नौजवान से अब यह उम्मीद करना कुछ ज्यादती होगी कि वह गुजरात से उत्तर-पूर्व तक एक और पदयात्रा निकाल ले, हालांकि देश को आज इसकी जरूरत है, भारत को जोडऩे की जरूरत गुजरात से असम तक भी है। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है तो भी राहुल गांधी को उन प्रदेशों का दौरा करना चाहिए जो कि भारत जोड़ो पदयात्रा के रास्ते में नहीं आए थे। जितने राज्यों में वे गए हैं, उससे डेढ़ गुना राज्य अभी बाकी हैं, और कांग्रेस का संगठन तो हर राज्य में है। इसलिए राहुल गांधी इनमें से हर राज्य में जाकर वहां पार्टी के बैनर से परे भी आम लोगों से बात कर सकते हैं, अपना संस्मरण सुना सकते हैं, और लोगों की बात सुन सकते हैं। हो सकता है कि ऐसे हर प्रदेश में वे एक-एक दिन पैदल चल लें, और उसके पहले और बाद लोगों से बात कर लें। उन्हें अगले कुछ वक्त कांग्रेस के घरेलू पचड़ों से परे रहना चाहिए, और देश के माहौल को बेहतर बनाने के लिए शुरू की गई अपनी कोशिश को जारी रखना चाहिए। इस सर्द पदयात्रा में हजारों किलोमीटर का यह टी-शर्ट में पैदल सफर राहुल को तपाकर अधिक मजबूत कर गया है, और अगला काफी वक्त राहुल को चुनावी राजनीति से परे रहकर देश के लोगों में नफरत खत्म करने, और मोहब्बत जगाने में लगाना चाहिए। आज भारतीय राजनीति में ऐसे किरदार की जगह खाली थी, उसे बीते इन महीनों में राहुल ने बखूबी भरा है, और उन्हें यही सिलसिला कुछ और वक्त जारी रखना चाहिए। लोगों को इससे चुनावी हासिल का हिसाब नहीं लगाना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में इंसानियत और मोहब्बत चुनावी फतह से ऊपर की बातें हैं।
काले को मारा काले पुलिस अफसरों ने ही, सब पर चढ़ गया सत्ता की ताकत का रंग
29 जनवरी 2023
अमरीका के टेनेसी राज्य में पुलिस ने अपनी
एक स्पेशल यूनिट को भंग कर दिया है। इस यूनिट की एक टीम के पांच अफसरों को
पिछले हफ्ते एक काले नौजवान को बुरी तरह पीटने के आरोप में, उसकी मौत हो
जाने के बाद, नौकरी से निकाल दिया गया है। यह पूरी हिंसक पिटाई एक
सार्वजनिक जगह पर वीडियो में दर्ज हुई है, और यह वीडियो सामने आने के बाद
इस पुलिस के नाम पर थूका जा रहा था। इस मामले को लेकर अमरीका में कई शहरों
में विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे, और लोग पुलिस के आतंक की कुछ पुरानी कुख्यात
वारदातों को भी इस सिलसिले में याद कर रहे थे। अश्वेत की मार-मारकर हत्या
के इस मामले में तकनीकी रूप से कोई नस्लभेद नहीं है, क्योंकि मारने वाले
तमाम पुलिस-अफसर अश्वेत ही थे। अमरीका में नस्लभेद के माहौल में काले लोग
अपने को काला कहलाना पसंद करते हैं, क्योंकि उनका यह मानना है कि उनकी
पहचान श्वेत लोगों से तुलना करते हुए अश्वेत के रूप में नहीं होनी चाहिए,
काले के रूप में होनी चाहिए। अमरीका बुरी तरह से नस्लभेद का शिकार देश है,
फर्क सिर्फ यही है कि वहां का कानून इसके खिलाफ तेजी से काम करता है।
अब एक काले नौजवान को सडक़ पर ट्रैफिक जांच करते हुए पांच काले पुलिस वालों ने मार-मारकर मार डाला, तो क्या यह पूरी तरह नस्लभेद से परे का मामला है? इस मामले को हिन्दुस्तान से लेकर अमरीका तक सत्ता की ताकत के साथ जुड़े हुए लोगों के मिजाज को देखकर समझने की जरूरत है। खुद अमरीका का एक सर्वे यह कहता है कि जब किसी काले पर जुल्म की वारदात होती है, तो पुलिसवर्दी के काले लोग भी पीछे नहीं रहते। हिन्दुस्तान की राजनीति और सत्ता में ऊपर आए हुए लोगों को देखें, तो उनके बीच भी यही बात दिखती है कि वे चाहे दलित-आदिवासी तबकों की रिजर्व सीटों से लडक़र आ जाएं, चाहे उन तबकों के वोटों को पाकर आ जाएं, जब वे सत्ता पर आ जाते हैं, तो उनका मिजाज सत्ता का हो जाता है। कोई दलित या आदिवासी अफसर किसी दलित या आदिवासी का जायज काम भी नाजायज रिश्वत लिए बिना करते हों, ऐसा सुनने में नहीं आता। सत्ता तक पहुंचने के लिए जाति की जिस सीढ़ी का इस्तेमाल किया जाता है, लोग सबसे पहले उसी सीढ़ी को लात मारकर गिराते हैं, ताकि उनकी बिरादरी के दूसरे लोग उन सीढिय़ों से उनकी बराबरी तक न पहुंच जाएं।
सत्ता का मिजाज ऐसा होता है कि जो महिलाएं सत्ता पर पहुंचती हैं, वे भी सत्ता पर बैठे हुए मर्दों की तरह ही सोचने लग जाती हैं, और हिन्दुस्तान के संदर्भ में देखें तो बलात्कार की शिकार महिलाओं के खिलाफ जितने बयान मर्दों के आते हैं, उनसे कुछ ही कम बयान औरतों के भी आते हैं। अगर महिलाओं को दूसरी महिलाओं की, उनके हकों की फिक्र होती, तो फिर सोनिया गांधी, ममता बैनर्जी, जयललिता, मायावती, और महबूबा की पार्टियां मिलकर महिला आरक्षण विधेयक को कब का कानून बनवा चुकी रहतीं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि भारतीय संसदीय राजनीति पर हावी मर्दों का दिल औरतों की बराबरी मानने के खिलाफ हमेशा अड़े रहा, और महिलाएं पार्टी की अध्यक्ष रहते हुए भी, उन पर मालिकाना हक रखते हुए भी कोई कोशिश करते नहीं दिखीं।
अमरीका में काले पुलिस अफसरों के हाथों एक गरीब काले नौजवान की इस तरह हत्या से उस देश और बाकी दुनिया में यही सवाल उठ खड़े होते हैं कि सत्ता की ताकत, ओहदे की ताकत, क्या लोगों को अपनी जाति, अपने धर्म, और अपने रंग के प्रति भी संवेदनशील नहीं छोड़ती है? सत्ता लोगों की बुनियादी सोच को ही बदल देती है, और वह औरत-मर्द का फर्क भी खत्म कर देती है। अभी साल भर के भीतर की बात है, बंगाल में एक नाबालिग लडक़ी से बलात्कार के मामले में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने ऐसी गैरजिम्मेदारी का बयान दिया था कि जिसे लोगों ने जमकर धिक्कारा। ममता ने इस बलात्कार पर सवाल उठाया और कहा- ‘यह खबर बताती है कि एक नाबालिग की बलात्कार की वजह से मौत हो गई है, क्या आप इसे बलात्कार कहेंगे? क्या वह गर्भवती थी, या उसका किसी से कोई प्रेम-प्रसंग था? क्या इसकी जांच हुई है? मैंने पुलिस से जांचने कहा है। मुझे बताया गया है कि इस लडक़ी का किसी लडक़े के साथ कोई चक्कर था, और परिवार को इसके बारे में मालूम था। अगर एक जोड़े में कोई संबंध है, तो क्या मैं उसे रोक सकती हूं?’ एक मुख्यमंत्री की हैसियत से, और एक महिला होते हुए लोगों ने इस बयान को जमकर धिक्कारा था। लेकिन अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग महिला लीडर, या उनकी पार्टी के पुरूष लीडर ऐसे बयान देते हैं, और इनसे यही साबित होता है कि महिलाएं भी अपनी पार्टी की लीडर बनने के बाद महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता कुछ या बहुत हद तक खो बैठती हैं। ताकत एक नशा होता है, और इसके असर से बचना मुश्किल होता है। अगर सरकारों में बैठे दलित या आदिवासी अफसर और कर्मचारी ही दलित और आदिवासी जनता के काम बिना रिश्वत लिए करने लगते, उनके काम करवाने के लिए कुछ मेहनत करते होते, तो आज इन दबे-कुचले तबकों की हालत इतनी खराब नहीं होती। किसी समाज से आकर ताकत के ओहदे तक पहुंचने वाले लोगों को उनके समाज का प्रतिनिधि मानना ठीक नहीं है, वे सिर्फ सत्ता के प्रतिनिधि होकर रह जाते हैं।
एक बार असम सीएम से सहमत होने का मौका...
29 जनवरी 2023
असम के भाजपा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा
देश भर में घूम-घूमकर साम्प्रदायिकता की बातें करने के लिए जाने जाते हैं,
और वे भाजपा के मुख्यमंत्रियों के बीच भी हिन्दुत्व के सबसे आक्रामक
नेताओं में से एक हैं। इसलिए अभी उन्होंने दो अलग-अलग बयानों में जो कहा
उन्हें जोडक़र देखने की जरूरत है। पहले उन्होंने एक बयान में मुस्लिम
लड़कियों के कमउम्र में शादी कर दिए जाने के खिलाफ कहा था, और कहा था कि जो
आदमी 14 बरस से कम की लड़कियों से शादी करते हैं उन पर बच्चों के सेक्स
शोषण के कानून, पॉक्सो एक्ट, के तहत कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा
उन्होंने यह भी कहा था कि जो 14 से 18 बरस की उम्र की लड़कियों से शादी
करेंगे उन पर बाल विवाह कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी। और अब उन्होंने
मानो उसी बात का विस्तार करते हुए कहा है महिलाओं के लिए मां बनने की सही
उम्र 22 से 30 साल के बीच हो सकती है, और 30 के आसपास पहुंच रही महिलाओं को
जल्द शादी कर लेनी चाहिए।
कोई भी बात उसे कहने वाले की साख और नीयत से जोड़े बिना देख पाना मुमकिन नहीं होता। असम मुख्यमंत्री सरमा लगातार मुस्लिमों के खिलाफ अभियान चलाते रहते हैं इसलिए उनकी बात को समझना आसान है कि मुस्लिम विवाह कानून के तहत कम उम्र में लड़कियों की शादी की छूट को खत्म करने की वकालत वे कर रहे हैं। लेकिन मुस्लिमों से अपने परहेज के चलते वे जो भी कह रहे हैं, उनसे परे सुप्रीम कोर्ट भी कुछ महीने पहले सरकार से राष्ट्रीय महिला आयोग की एक पिटीशन पर जवाब मांग चुका है कि मुस्लिम लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र भी बाकी धर्मों की लड़कियों की तरह की जानी चाहिए। इस्लाम के प्रावधानों और मुस्लिम समाज के प्रचलित रीति-रिवाजों के चलते बहुत कम उम्र की मुस्लिम लड़कियों की शादी कर दी जाती है, और बहुत से मामलों में तो गरीब नाबालिग मुस्लिम लडक़ी की शादी किसी पैसे वाले बहुत बूढ़े से भी कर दी जाती है।
अब हम कुछ देर के लिए इन दो मुद्दों से हिमंत बिस्वा सरमा को अलग कर देते हैं, और इन मुद्दों पर सोचते हैं। क्या हिन्दुस्तान के भीतर मुस्लिम समाज के रीति-रिवाजों को जारी रखने के लिए, या उसके नाम पर औरतों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना जायज है? क्या बालिग होने के पहले ही उनकी शादी कर दी जानी चाहिए? असम में 31 फीसदी से अधिक लड़कियों की कम उम्र में ही शादी हो जाती है, और करीब 12 फीसदी लड़कियां बालिग होने के पहले ही मां बन जाती हैं। ये दोनों ही आंकड़े राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक हैं, और यह मानने में अधिक दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि असम की मुस्लिम आबादी की वजह से वहां पर ये आंकड़े इतने अधिक हैं।
अब असम, मुख्यमंत्री, और भाजपा या हिन्दू-मुस्लिम की बात को छोड़ दें, और मुस्लिम लडक़ी को एक इंसान अगर मानें, तो यह सोचना जरूरी है कि क्या 13-14 बरस की उम्र में, या उससे भी कम उम्र में किसी लडक़ी की शादी कर देनी चाहिए? तब तक तो न उसकी स्कूल की पढ़ाई पूरी होती है, न ही वह घर की एक गुलाम से अधिक कोई और काम करने लायक तैयार हो पाती है। ऐसी लडक़ी कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाती है, और वह लगातार अपने से उम्र में खासे बड़े या दुगुनी-तिगुनी, चारगुनी उम्र के पति की गुलाम बनकर रहने, और जिंदगी के आखिरी के कई बरस विधवा रहकर मरने के लायक ही बन पाती है। ऐसे में एक भाजपा मुख्यमंत्री कहे, या कोई हिन्दुत्ववादी कहे, जो भी कहे, क्या इस बात को नाजायज कहा जा सकता है कि देश में हर धर्म की लडक़ी की शादी की न्यूनतम उम्र 18 बरस होनी चाहिए? और इस मामले में अलग-अलग धर्मों की लड़कियों के हक एक सरीखे माने जाने चाहिए? 18 बरस के उम्र में भी किसी लडक़ी के आत्मनिर्भर होने की संभावना बहुत कम रहती है, आज की दुनिया में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके किसी काम के लायक बनने में और अधिक उम्र गुजर जाती है, लेकिन 18 बरस की उम्र तो लडक़ी की मां बनने लायक भी नहीं रहती। कम उम्र में मां बनने पर ऐसी मां और उसके बच्चों के बचने की संभावना भी कम रहती है। इस मेडिकल तथ्य को अनदेखा करके आज अगर किसी अल्पसंख्यक समुदाय के रिवाजों का सम्मान करने के लिए उसे 10-12 बरस की लडक़ी की शादी की छूट दी जाती है, तो ऐसी संभावित मां और उसके संभावित बच्चों की जिंदगी और सेहत दोनों को खतरे में डाला जाता है।
सामाजिक रीति-रिवाज अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग कई किस्म के रहते हैं। हिन्दुओं में ही एक वक्त सतीप्रथा को मान्यता थी, बालविवाह होते ही थे, लेकिन इनके खिलाफ कानून बनाकर इनको रोका गया, और लड़कियों और महिलाओं के अधिकार की हिफाजत की गई। समाज की प्रचलित धारणाओं में अगर सुधार करने को किसी समाज की धार्मिक मान्यताओं में दखल मान लिया जाएगा, और उससे मुंह चुराया जाएगा, तो सुधार तो कभी हो ही नहीं सकेगा। आज हिन्दुस्तान में अलग-अलग धर्मों में कई किस्म की बातों को लेकर कानून के रास्ते सुधार आए हैं। मुस्लिम समाज में ही हमेशा से प्रचलित तीन तलाक की प्रथा को मोदी सरकार ने एक कानून बनाकर खत्म किया। लडक़े-लड़कियों के बिना शादी किए साथ रहने के आधुनिक चाल-चलन को सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी। समलैंगिकता को हिन्दुस्तान में सामाजिक कलंक ठहरा दिया गया था, और अंग्रेजों के वक्त के कानून ने उसे जुर्म भी करार दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे जुर्म के दायरे से बाहर किया।
लोगों को याद रखना चाहिए कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, और इंदिरा की हत्या के बाद के चुनाव में उन्हें अभूतपूर्व, और ऐतिहासिक संसदीय बाहुबल दिया था, तब उन्होंने कांग्रेस के अल्पसंख्यकपरस्त नेताओं के दबाव में सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो का फैसला पलट दिया था, और संसद में कानून बनाकर मुस्लिम मर्दों के सामने समर्पण कर दिया था। इसलिए धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर कभी सरकार, कभी अदालत, और कभी समाज, इनकी अलग-अलग या मिलीजुली कोशिशों से सुधार आते हैं, और अगर आज असम की भाजपा सरकार की कोशिशों से मुस्लिम लड़कियों को इंसान की तरह जिंदा रहने का एक हक मिल सकता है, तो इसमें भाजपा के राजनीतिक हितों को देखने के पहले मुस्लिम आबादी के आधे हिस्से, तमाम मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं के हित देखने की जरूरत है।
असम मुख्यमंत्री ने लड़कियों के मां बनने की जो उम्र सुझाई है, वह चिकित्सा विज्ञान की सुझाई हुई उम्र है। अब एक कट्टर मुस्लिमविरोधी अगर कोई वैज्ञानिक बात करे, तो उसका विरोध करने के लिए विज्ञान को खारिज कर देना जायज नहीं है। जच्चा-बच्चा की मौत घटाने के लिए, दोनों की सेहत बचाने के लिए अगर चिकित्सा विज्ञान कोई उम्र बता रहा है, तो उस उम्र को धर्मों के भीतर प्रचलित रिवाज से परे भी देखने की जरूरत है। यह बात तो है ही कि अगर लडक़ी की शादी कम उम्र में होगी, तो उसके बच्चे भी कम उम्र में होंगे, और सबकी जिंदगी को अधिक बड़ा खतरा रहेगा। इसके साथ इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने बिना किसी लडक़ी को शादी नाम की एक गुलामी में झोंक देना उसके खिलाफ सबसे बड़ी नाइंसाफी है।
कृत्रिम बुद्धि इतनी सहज हासिल होने के कई खतरे
28 जनवरी 2023
आज चाहे हॅंसी-मजाक में सही, कई डॉक्टरों के
ऐसे असली या मजाकिया नोटिस देखने में आते हैं कि गूगल पर पढक़र आए लोगों के
सवालों के लिए अलग से फीस ली जाएगी। दरअसल इंटरनेट पर सबसे अधिक इस्तेमाल
होने वाले सर्च इंजन गूगल पर किसी जानकारी को ढूंढने को ही अब ढूंढना मान
लिया गया है। गूगल अब ब्रांड नहीं रह गया, वह अब एक क्रिया बन गया है,
तलाशने का समानार्थी शब्द बन गया है। लोगों को स्कूल-कॉलेज के प्रोजेक्ट
पूरे करने हो, या किसी इंटरव्यू की तैयारी करनी हो, उन्हें सबसे आसान और आम
सलाह यही मिलती है कि गूगल कर लो। ऐसा माना जाता है कि लोगों की अधिकतर
जरूरतों की जानकारी इस सर्च इंजन पर निकल आती है। इसके बाद इंटरनेट पर एक
दूसरी वेबसाइट विकिपीडिया है जो कि विश्व ज्ञानकोश है, और उस पर मिली
अधिकतर जानकारी आमतौर पर सही मानी जाती है। लोगों की आम जरूरतें इस पर पूरी
हो जाती हैं, और खास जरूरतों के लिए दूसरी वेबसाइटें भी इंटरनेट पर हैं।
सहूलियत के ऐसे माहौल के बीच अचानक एक नई वेबसाइट आई है जो कि इंटरनेट पर काम करने वाला एक एआई एप्लीकेशन है, एआई का मतलब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस। चैटजीपीटी नाम की यह वेबसाइट 2021 तक की जानकारी से लैस है, और इस पर जाकर लोग मनचाही फरमाइश कर सकते हैं। कोई उस पर नासा या इसरो के लिए एक निबंध लिखने कह सकते हैं, कोई भूपेश बघेल पर कविता लिखने की फरमाइश कर सकते हैं, और कोई रमन सिंह पर कविता लिखवाकर यह पा सकते हैं कि इस एप्लीकेशन में सिर्फ नाम बदलकर दोनों की तारीफ में एक ही कविता खपा दी है। लेकिन अभी कुछ महीनों के भीतर इस वेबसाइट या एप्लीकेशन की शोहरत ऐसी हो गई है कि अमरीकी विश्वविद्यालयों में इम्तिहान में पूछे जाने वाले सवालों के जवाब इस पर बनाए जा रहे हैं, और इसका आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जानकारी ढूंढकर, अपनी खुद की भाषा में तकरीबन सही जवाब बनाकर कुछ सेकेंड में ही पेश कर दे रहा है। लोग जिस रफ्तार से पढ़ सकते हैं उससे कई गुना रफ्तार से यह जवाब गढक़र पेश करता है। अभी कुछ प्रमुख विश्वविद्यालयों ने चैटजीपीटी के जवाबों को आंकने की कोशिश की, तो उन्होंने पाया कि बिजनेस मैनेजमेंट जैसे कई कोर्स के इम्तिहानों के जवाब अगर इस वेबसाइट से बनवाए जाएं, तो भी लोग बी या बी माइनस (शायद सेकेंड डिवीजन) से पास हो जाएंगे। और चैटजीपीटी अपने इस्तेमाल करने वाले के सवालों से, इंटरनेट पर रोज जुडऩे वाली जानकारियों से अपने आपको लैस करते चलता है, सीखते चलता है, और हर दिन उसके जवाब पहले से बेहतर हो सकते हैं।
आज मीडिया में भी ऐसा माना जा रहा है कि आम रिपोर्टिंग आने वाले दिनों में हो सकता है कि ऐसे ही किसी सॉफ्टवेयर से होने लगे, और उसमें बुनियादी जानकारी डाल देने से कम्प्यूटर तुरंत ही समाचार बनाकर पेश कर देगा। आज भी चैटजीपीटी पर जानकारियां डालने से वह तुरंत रिपोर्ट बनाकर दे देता है। आने वाला वक्त बिजली की रफ्तार से किसी भी विषय पर लिख देने वाले ऐसे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैस रहेगा, और दुनिया में मौलिक लेखन के लिए यह एक बड़ा खतरा रहेगा। आज ही पश्चिम के विकसित विश्वविद्यालयों में यह चर्चा छिड़ी हुई है कि चैटजीपीटी जैसे औजारों को देखते हुए अब इम्तिहान लेने के तरीकों में तुरंत बदलाव करना पड़ेगा, क्योंकि अब सवालों के लंबे जवाब लिखने, या निबंध लिखने के ढंग से इम्तिहान बेकार हो जाएंगे क्योंकि कुछ पल में ही लोग दुनिया के किसी भी विषय पर ऐसा निबंध पा सकते हैं। ऐसा ही हाल पत्र-पत्रिकाओं या मीडिया की दूसरी जगहों पर लिखने वालों का भी होगा, क्योंकि उनसे बेहतर लिखा हुआ पल भर में पेश हो जाएगा, तो उनकी जरूरत क्या रह जाएगी?
आज डिजिटल टेक्नालॉजी पर टिकी हुई पढ़ाई वैसे भी सीखने और जवाब देने की मौलिकता खोती चल रही है। लोग गूगल पर एक किस्म के जवाब ढूंढते हैं, और मशीनी अंदाज में जवाब लिखते हैं। और अब तो हर किसी के लिए अलग-अलग किस्म से लिखे हुए जवाब चैटजीपीटी जैसी वेबसाइटों पर बढ़ते ही चलेंगे, और इससे सीखने का सिलसिला भी बहुत बुरी तरह प्रभावित होगा। मूल्यांकन करने वाले लोगों को यह समझ ही नहीं आएगा कि जवाब या इम्तिहान देने वाले लोगों ने क्या खुद लिखा है, और क्या उनके लिए चैटजीपीटी जैसे सॉफ्टवेयर ने लिखा है।
हजारों बरस में दुनिया ने भाषा सीखी, दुनिया भर के विषयों पर जानकारी हासिल की, उनका विश्लेषण किया, और ज्ञान को समझ में तब्दील किया। अब रातों-रात एक ऐसी मुफ्त की सहूलियत लोगों के फोन और कम्प्यूटर पर पहुंच गई है कि उसने हजारों बरस के विकास की बराबरी कुछ सेकेंड में करने की कोशिश की है। अभी बस उसने भाषा और ज्ञान को सीखा है, लिखना सीखा है, लेकिन फिर भी वह है तो कृत्रिम ही। उसे दो बिल्कुल अलग-अलग सोच के नेताओं पर कविता लिखते हुए नाम बदलने के अलावा कुछ और बदलना नहीं सूझता। यहां पर आकर वह बेवकूफ है। लेकिन दुनिया में मूल्यांकन के अधिकतर तरीके भी इसी तरह के या इसी दर्जे के बेवकूफ हैं। इसलिए कृत्रिम बुद्धि का बनाया हुआ माल भी बाजार में तकरीबन तमाम जगहों पर काम कर जाएगा, खप जाएगा। बहुत ही कम ऐसी जगहें रहेंगी जहां पर मौलिकता का सम्मान होगा, उसकी जरूरत होगी, और उसे परखा जा सकेगा। फिलहाल एक जानकार ने नसीहत यह दी है कि लोग अपने जिन मोबाइल फोन से लेन-देन का काम करते हैं उन पर आर्टिफिशियल इंटेलीजेेंस के कोई भी एप्लीकेशन डाउनलोड न करें क्योंकि वे फोन पर आपके तमाम काम से लगातार सीखते चलते हैं, और हो सकता है कि वे आपके बैंकों के पासवर्ड भी सीख जाएं, जो कि आगे जाकर हैकरों के हाथ लग जाएं। इसलिए यह कृत्रिम बुद्धि लोगों को इस एप्लीकेशन की शक्ल में मुफ्त में हासिल तो है, लेकिन दुनिया में जैसा कहा जाता है कि कुछ भी मुफ्त नहीं होता, इसे भी सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए। और स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय को भी ऐसी तकनीक को अपनी परंपरागत परीक्षा प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती मानना चाहिए कि इसके बाद अब उनके दिए जा रहे ज्ञान और लिए जा रहे इम्तिहान की शक्ल क्या होनी चाहिए।



