चीनी ऐप पर रोक लगाने इतनी लंबी लिस्ट बनाने की क्या जरूरत थी?

 6 फरवरी 2023


भारत और चीन के बीच सरहद पर बने हुए तनाव के चलते चीन के कई किस्म के कारोबार पर पिछले बरसों में रोक लगाई गई जिनमें सबसे अधिक चर्चित रहा मोबाइल ऐप पर रोक लगाना। टिक-टॉक जैसे लोकप्रिय मोबाइल ऐप पर भारत में रोक लगाई गई और अमरीका सरीखे बहुत से देशों में इस पर रोक लगाने की मांग हो रही है। अब कल भारत सरकार ने 232 मोबाइल ऐप पर रोक लगाई है जिनमें से अधिकतर चीनी हैं। इनमें बड़ा हिस्सा मोबाइल ऐप के मार्फत सट्टा लगाने और जुआ खेलने का था, और सौ के करीब ऐसे ऐप थे जो कि ऑनलाईन कर्ज देते थे, और गुंडागर्दी से उनकी वसूली होती थी। कर्जदार को इतना प्रताडि़त किया जाता था कि आंध्र और तेलंगाना में ऐसे बहुत से लोग आत्महत्या कर चुके हैं। इनमें से कोई भी बात नई नहीं है, और बरसों से ये खबरें में बनी हुई हैं, लेकिन केंद्र सरकार का काम करने के तरीके और उसकी रफ्तार का हाल यह है कि सूचना तकनीक से जुड़े ऐसे ऑनलाईन जुर्म पर रोक लगाने में उसे बरसों लग जाते हैं, दूसरी तरफ बीबीसी की एक डाक्यूमेंट्री पर रोक लगाने में उसे कुछ घंटे ही लगते हैं।

चीन से जुड़े हुए किसी भी मोबाइल ऐप को लेकर पूरी दुनिया में यह फिक्र बनी रहती है कि उसके मार्फत जुटाया जाने वाला डेटा चीन के सर्वरों पर इकट्ठा होता है, और उसका इस्तेमाल बाकी देशों के लोगों की जासूसी करने में किया जाता है। अब भारत में जिन दो किस्मों के चीनी मोबाइल ऐप पर अभी रोक लगाई गई है उसे देखें तो एक अजीब सी बात सामने आती है। पहले लोग ऑनलाईन सट्टा लगाएं, या जुआ खेलें, और फिर उन्हें ऑनलाईन खड़े-खड़े कर्ज देने वाले एप्लीकेशन आ जाएं। क्या यह महज एक संयोग है, या फिर यह धंधा जोड़े में चल रहा है? ठीक वैसे ही जैसे जो लोग बाजार में सोने के गहने खरीद चुके हैं, उनके पास गहने गिरवी रखने के इश्तहार आने लगें। एक मजाक की बात यह भी है कि अमिताभ बच्चन हफ्ते के कुछ दिन गहनों का इश्तहार करते हैं, और कुछ दिन गहने गिरवी रखने वाली साहूकार कंपनियों का। तो क्या चीनी मोबाइल ऐप की एक किस्म में जुए-सट्टे में फंसे लोगों को संभावित कर्जदार मानकर उन्हें कर्ज देने के मोबाइल ऐप में फांसा जाता है?

दुनिया भर में यह फिक्र तो चलती ही रहती है कि ऑनलाईन कामकाज पर दुनिया के इतने कारोबारी निगरानी रखते हैं कि अभी वॉट्सऐप पर किसी के जूते की चर्चा करें, तो वॉट्सऐप के मालिक फेसबुक अपने पेज पर जूतों का इश्तहार दिखाने लगते हैं। लेकिन इस फिक्र से परे जो बहुत सीधा-सीधा खतरा हिंदुस्तान में लोगों पर छाया हुआ है वह चीनी या हिंदुस्तानी, कई किस्म के धोखाधड़ी और जालसाजी के मोबाइल ऐप, वॉट्सऐप संदेशों, एसएमएस और टेलीफोन कॉल के मार्फत लोगों को धोखा देने और ठगने का है। आज लोगों के बैंक खाते बात की बात में खाली हो जा रहे हैं, और बहुत से लोगों को तो उसकी खबर भी नहीं हो रही है। खुद भारत सरकार का हाल देखें तो 232 ऐसे खतरनाक एप्लीकेशन एक साथ बंद किए जा रहे हैं, जबकि इनमें से हर किसी की शिनाख्त तो अलग-अलग हुई होगी, अलग-अलग समय पर हुई होगी। इतनी लंबी लिस्ट बनने के पहले हर एप्लीकेशन को शिनाख्त होते ही बंद करने का एक इंतजाम अगर किया जाता, तो हो सकता है कि लाखों लोग लुटने से बच गए होते। सरकार का एक ऐसा ढांचा होना चाहिए जो कि ऐसे किसी भी एप्लीकेशन पर जल्द से जल्द फैसला लेकर उसे अलग-अलग रोक सके। यह तो कुछ ऐसा मामला हो गया कि जब किसी शहर में चालीस अलग-अलग कत्ल हो जाएं, तब जाकर पुलिस कातिलों की तलाश शुरू करे। थोक में ऐसे कार्रवाई सरकार की सहूलियत की हो सकती है, लेकिन ऐसी सहूलियत से परे का एक ऐसा ढांचा बनाना चाहिए जो ठगों और जालसाजों को तुरंत रोक सके। आज हर हिंदुस्तानी के पास झारखंड के जामताड़ा नाम के गांव या कस्बे से आए दिन फोन आते हैं, और उनके बैंक खातों को लूटा जाता है। यह जुर्म मोबाइल फोन और सिम कार्ड के जरिए होता है, लेकिन सरकार अपने सारे साइबर औजार रहते हुए भी, जगहों की शिनाख्त हो जाने के बाद भी मुजरिमों पर हाथ डालने में महीनों और बरसों लगा रही है। एक तरफ तो शरीफ लोगों के सिम कार्ड खरीदने के लिए कई किस्म के पहचान पत्र लगते हैं, दूसरी तरफ एक-एक मुजरिम दर्जनों और सैकड़ों सिम कार्ड इस्तेमाल करते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें जुर्म की इस पूरी मशीन को तोड़ क्यों नहीं पा रही हैं, यह समझ से परे है।

हिंदुस्तान में जैसे-जैसे डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ते चल रहा है, लोग ऑनलाईन काम और कारोबार करते जा रहे हैं, वैसे-वैसे साइबर जुर्म का खतरा भी बढ़ते चल रहा है, और लोग ऐसे जुर्म के शिकार होते चल रहे हैं। सरकार को रात-दिन काम करने वाली एक ऐसी सरकारी मशीनरी के बारे में सोचना चाहिए जो कि देश के भीतर से भी ठगी-जालसाजी करने वाले लोगों को पकड़े। छत्तीसगढ़ में ही पिछले जाने कितने महीनों से ऑनलाईन सट्टेबाजी के एक मोबाइल ऐप, महादेव आईडी की चर्चा है जिसमें सैकड़ों छोटे-छोटे से लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है, कुछ करोड़ रुपये जब्त भी किए गए हैं, लेकिन जिसके बारे में चर्चा है कि उसे चलाने वाले छत्तीसगढ़ के ही कुछ बहुत ताकतवर लोग हैं, और इस सट्टेबाजी में लोगों के दसियों हजार करोड़ रुपये लूट लेने की चर्चा है, जिसके मुकाबले अब तक जब्त रकम जुर्म का छिलका भी नहीं है। अब महीनों से लोग पकड़ा भी रहे हैं, और हिंदुस्तानी टेलीफोन और इंटरनेट से वह जुर्म चलते भी जा रहा है, तो इसका मतलब यह है कि केंद्र और राज्य सरकार में से किसी का ढांचा ही कमजोर है। चीन के साथ तनाव के चलते वहां से चलने वाले मोबाइल ऐप बंद कर देना लोगों के लुटने का अंत नहीं हो सकता, इसके लिए इस देश में ही बसे हुए महादेव जैसे सट्टेबाजी-धोखेबाजी के ऐप पर भी रोक लगाना होगा।

(Daily Chhattisgarh)

बेअसर हो चुकीं अदालत के राज में दम तोड़ती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

5 फरवरी 2023

 

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी पर बनाए गए कुछ कार्टून सोशल मीडिया पर महज औरों को फॉरवर्ड कर देने के जुर्म में गिरफ्तार एक विश्वविद्यालय प्रोफेसर को बंगाल की एक जिला अदालत ने सरकारी मुकदमे से 11 बरस बाद बरी किया है। 2012 में जाधवपुर विश्वविद्यालय के इस प्रोफेसर को सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री की आलोचना वाले कार्टून किसी को ईमेल करने के जुर्म में आईटी एक्ट की धारा 66-ए के तहत गिरफ्तार किया गया था, और जमानत पर वे रिहा हो पाए थे। यह कानून 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार देते हुए इसे खारिज कर दिया था, लेकिन अदालत में मुकदमा चलते ही रहा। अब प्रोफेसर की याचिका पर यह मामला खारिज हुआ, और दी गई जमानत भी छोड़ी गई। इस प्रोफेसर को टीएमसी के गुंडे-कार्यकर्ताओं ने पीटा भी था, उनका तो कुछ नहीं बिगड़ा। इस मामले को बंगाल भाजपा ने लोकतंत्र की जीत बताया है, और ममता बैनर्जी को सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा है। भाजपा का कहना है कि यह सरकार के मुंह पर तमाचा है, और इससे उसे सबक लेना चाहिए। 

यह खबर अडानी नाम की सुनामी के बीच किधर से आई और बहकर कहां चली गई, यह किसी को पता भी नहीं चल पाया। कुछ अखबारों में यह खबर छपी जरूर, लेकिन जब गिनी-चुनी खबरें सिर चढक़र बोलती हैं, तो दूसरी खबरों के हिस्से की जगह और वक्त दोनों ही छीन लेती हैं। अडानी ने कुछ ऐसा ही किया है। हालांकि देश में कई दूसरे किस्म की खबरों को अडानी की खबरों पर लादने की कोशिश जरूर की गई, लेकिन यह सुनामी इतनी बड़ी थी, और है, कि कामयाबी नहीं मिली। 

अब कुछ वक्त जरूर निकल गया है, लेकिन एक पखवाड़े बाद सही, बंगाल की मुख्यमंत्री और एक कार्टून आगे बढ़ाने की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यापक मुद्दे पर लिखे जाने की जरूरत है। यह मामला पूरी तरह से अनोखा मामला भी नहीं है क्योंकि दूसरे कुछ राज्यों में भी सत्ता पर काबिज लोगों ने इस तरह की कार्रवाई की है। छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक तरफ तो मीडिया के एक कार्यक्रम में एक स्थानीय व्यंग्यकार को किताब छपवाने के लिए दो लाख रूपये मंजूर किए थे, और दूसरी तरफ मुख्यमंत्री के खिलाफ समझे जाने वाले प्रतीकात्मक तीखे व्यंग्य लिखने वाले एक वेबपोर्टल के व्यंग्यकार को गिरफ्तार भी किया गया था। और प्रतीकों में लिखे गए राजनीतिक असंतोष को एक कांग्रेस कार्यकर्ता की तरफ से असंतोष फैलाकर सरकार को नुकसान पहुंचाने की साजिश की रिपोर्ट लिखाई गई थी, और कुछ घंटों के भीतर ही इस व्यंग्यकार को गिरफ्तार कर लिया गया था। और ये दोनों बातें कुछ महीनों के भीतर ही हुई थीं। इसलिए सत्ता के बर्दाश्त को लेकर किसी एक पार्टी पर अधिक तोहमत लगाना जायज नहीं होगा। और पूरे देश में कहीं भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में जरा सी आलोचना गैरसरकारी सजा का सैलाब ला देती है। सोशल मीडिया पर ऐसे आलोचकों के खिलाफ हिंसक और अश्लील बेहिसाब हमले शुरू हो जाते हैं, और अधिकतर लोगों का यह मानना है कि यह भाजपा के आईटी सेल की तरफ से किए जाने वाले हमले रहते हैं। एक ही वक्त पर हजार-हजार लोग गंदी गालियां, हिंसक धमकी, और मां-बहन के लिए अश्लील बातें लिखी हुई वही की वही, एक सरीखी गलतियों वाली ट्वीट करने लगते हैं, तो जाहिर है कि इनके पीछे कोई न कोई संगठित ताकत तो रहती है। 

लोकतंत्र एक बड़ी सुहावनी व्यवस्था है, तब तक, जब तक कि उसमें लोगों को मिली आजादी का निशाना सत्ता न बन जाए। जब तक लोग विपक्ष में रहते हैं, तब तक वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती रहते हैं, लेकिन जब वे सत्ता पर आते हैं, और कार्टून या व्यंग्य के स्वाभाविक निशाने पर रहते हैं, तो आजादी से उनकी मोहब्बत कमजोर होने लगती हैं, धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। हिन्दुस्तान के राजनीतिक इतिहास को जानने वाले बताते हैं कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने वक्त के कार्टूनिस्टों का हौसला बढ़ाते रहते थे कि वे उनके साथ कोई नरमी न बरतें। लेकिन असुरक्षा की भावना से घिरी हुई इमरजेंसी के पहले की इंदिरा गांधी ने कार्टून और व्यंग्य को कुचलकर रख दिया था। दुनिया का इतिहास यह बताता है कि कार्टून और व्यंग्य से सबसे अधिक दहशत तानाशाहों को होती है जिन्हें वे साजिश लगते हैं। 

लेकिन हिन्दुस्तानी कानून पर एक नजर डालने की जरूरत है जिसके तहत एक कार्टून आगे बढ़ाने वाले प्रोफेसर को 11 बरस तक अदालत का सामना करना पड़ा, सत्ता के गुंडों के हाथों मार तो खानी ही पड़ी। यह बात भी हैरान करती है कि 2015 में सुप्रीम कोर्ट आईटी एक्ट की जिस धारा 66-ए को असंवैधानिक करार दे चुका था, उसके तहत 2023 तक मुकदमा जारी था। जब देश में सत्ता अपनी पुलिस के मार्फत अभिव्यक्ति को इस तरह कुचल सकती है, और अदालतें दस-दस बरस तक कोई राहत नहीं दे सकतीं, तो फिर यह देर अपने आपमें एक सजा रहती है, और सरकार जज भी रहती है, और जल्लाद भी। 

अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने का दंभ भरते नहीं थकने वाले हिन्दुस्तान को दरअसल आईने यह देखना चाहिए कि उसके घर इस लोकतंत्र की इज्जत कितनी है। आकार बड़ा होने से किसी चीज की इज्जत नहीं बढ़ जाती, इज्जत पाने के लिए खूबी की जरूरत होती है। आज योरप के बहुत से देश दुनिया के सबसे बुरे आतंकी हमलों का सामना करते हुए भी अपने देश के कार्टूनिस्टों को बचाने के लिए चट्टान की तरह खड़े हुए हैं। वे अपने देश में संविधान के तहत मिली हुई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने वाले लोगों का सम्मान करते हैं, फिर चाहे उनके कार्टूनों की वजह से उन पर मजहबी आतंकी हमले करके लोगों को थोक में ही क्यों न मार दिया जाए। ऐसे बहुत से लोकतंत्र हैं जो कि सलमान रुश्दी जैसे लेखक को न सिर्फ शरण देते हैं, बल्कि उनकी हिफाजत का पूरा इंतजाम भी करते हैं। ये देश आबादी और इलाके के हिसाब से हिन्दुस्तान के किसी एक छोटे प्रदेश जितने भी हो सकते हैं, लेकिन वहां लोकतंत्र का स्तर बहुत ऊंचा है। 

लोकतंत्र तंगदिली पर नहीं चल सकता, और न ही सत्ता की, बहुसंख्यक आबादी की असहिष्णुता से चल सकता है। लोकतंत्र गौरवशाली परंपराओं का नाम रहता है, दरियादिली का नाम रहता है, अपनी जिम्मेदारी और दूसरे के अधिकार का सम्मान करने का नाम रहता है। अभी 2021 की ही बात है कि मोदी सरकार ने एक प्रमुख कार्टूनिस्ट मंजुल के ट्विटर पेज के खिलाफ बंदिश लगाने के लिए ट्विटर को कानूनी चि_ी लिखी थी। इस पर ट्विटर ने इस कार्टूनिस्ट को यह जानकारी भेजते हुए सुझाया था कि वे खुद भारत सरकार के लिखे हुए पर गौर कर सकते हैं, और कानूनी मदद जुटा सकते हैं। 

हिन्दुस्तान में सुप्रीम कोर्ट को अधिक खुलासे के साथ ऐसा फैसला करने की जरूरत है जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक सचमुच की आजादी मिल सके, और संविधान का यह बुनियादी अधिकार एक सत्ता के दबाव में थानेदार की कुर्सी की गद्दी के नीचे दम न तोड़े।  

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 5 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

सत्ता की वफादार पुलिस और बलि का बकरा बनी बेकसूर जनता की कहानी

 5 फरवरी 2023


लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब दिल्ली में केन्द्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया के पास नागरिक संशोधन कानून के खिलाफ चल रहे विरोध-प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई थी, तो केन्द्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने कई छात्रों और दूसरे लोगों को गिरफ्तार किया था। इन पर हिंसा के आरोप लगाए गए थे। इनमें अधिकतर नाम मुस्लिम थे। इनमें से सबसे चर्चित नाम जेएनयू के छात्र शरजील इमाम का था जिस पर राजद्रोह और दंगा भडक़ाने वाले भाषण का जुर्म लगाया गया था। यह होनहार छात्र आईआईटी से कम्प्यूटर इंजीनियर है, और जेएनयू से पीएचडी कर रहा है। अभी दिल्ली के साकेत कोर्ट के जज अरुल वर्मा ने दिसंबर 2019 के एक मामले से ऐसे 10 छात्रों को बरी कर दिया है जो लगातार जेल में चले आ रहे थे। अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि पुलिस जुर्म करने वाले असली मुजरिमों को पकडऩे में नाकाम रही, लेकिन इन लोगों को बलि के बकरे के तौर पर गिरफ्तार किया। जज ने कहा कि इस तरह की पुलिस कार्रवाई ऐसे नागरिकों की आजादी को चोट पहुंचाती है जो अपने मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए जुटते हैं। फैसले में लिखा गया है कि इन छात्रों (तमाम मुस्लिम) को इस तरह के लंबे और कठोर मुकदमे में घसीटना देश और क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के लिए अच्छा नहीं है। जज ने कहा यह बताना जरूरी है कि असहमति और कुछ नहीं बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 में निहित प्रतिबंधों के अधीन भाषण देने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अमूल्य मौलिक अधिकार का विस्तार है। जज ने कहा ये एक ऐसा अधिकार है जिसे बरकरार रखने की हमने शपथ ले रखी है। जब भी कोई चीज हमारी अंतरात्मा के खिलाफ जाती है तो हम उससे मानने से इंकार कर देते हैं। अपना कर्तव्य समझते हुए हम ऐसा करने से इंकार करते हैं। ये हमारा फर्ज बन जाता है कि हम किसी ऐसी बात को मानने से इंकार करें जो हमारी अंतरात्मा के खिलाफ है। जज वर्मा ने देश के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ की हाल की एक टिप्पणी का भी हवाला दिया है जिसमें कहा गया था कि सवाल करने और असहमतियों के लिए जगह खत्म करना राजनीतिक, आर्थिक, और सामाजिक तरक्की के आधार को खत्म करना है। इसलिए लिहाज से असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है। जज वर्मा ने आगे लिखा, इसका मतलब ये है कि असहमतियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, न कि उन्हें कुचलना चाहिए, हालांकि असहमति शांतिपूर्ण होनी चाहिए, और हिंसा में तब्दील नहीं होनी चाहिए।  

हिन्दुस्तान में केन्द्र सरकार के मातहत दिल्ली की पुलिस, और उत्तरप्रदेश में भाजपा की योगी सरकार की पुलिस ने बहुत से मामलों में मुस्लिमों को इसी तरह फर्जी मामलों में घेरा है, और एक के बाद एक कई मुकदमे दायर करके लोगों की रिहाई को अंतहीन तरीके से रोक रखा है। अदालतों ने इन सरकारों की पुलिस की ऐसी साजिशों का भांडाफोड़ होने के बाद भी सरकारों के रूख में कोई फर्क नहीं है क्योंकि संदेह का लाभ देते हुए अदालतें जांच एजेंसियों के खिलाफ आमतौर पर कोई कार्रवाई नहीं करती हैं। इसलिए सत्ता के दबाव में पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियां लोगों को विचाराधीन कैदी बनाकर ही सजा दिलवाने का काम करती हैं। और अब तो हाल ऐसा हो गया है कि इसे सत्ता का दबाव कहना भी ठीक नहीं है, बहुत से राज्यों में, बहुत सी पार्टियों की सरकारों के मातहत आज पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियां खुद होकर सत्ता की सेवा करने में ऐसी जुट जाती हैं कि सत्ता को मुंह भी नहीं खोलना पड़ता। जांच एजेंसियां और पुलिस जब एक चापलूस निजी सेवक की तरह काम करके मोटी कमाई करने का एक जरिया ढूंढ निकालती हैं, तो फिर कोई बड़े पेशेवर मुजरिम भी जुर्म करने में उनकी बराबरी नहीं कर सकते। ऐसे ही रूख का नतीजा है कि हिन्दुस्तान में बेकसूर लोग बरसों तक जेल काट रहे हैं, और आमतौर पर जिला अदालतों के जज उन्हें रिहा करने का हौसला भी नहीं दिखा पाते हैं। पिछले बरसों में इस देश ने छात्र आंदोलनकारियों, सामाजिक आंदोलनकारियों, कॉमेडियन और कार्टूनिस्ट, सोशल मीडिया पर सक्रिय जागरूक लोगों को कुचलने का ऐसा सिलसिला देखा है जो बताता है कि लोकतंत्र इस देश में एक कागजी सामान होकर रह गया है, और अमल में उसकी कोई जगह रखने की नीयत सरकारों की नहीं रहती है। 

हमारा ख्याल है कि जब अदालतें यह पाती हैं कि पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियां बदनीयत से कोई काम कर रही थीं, तो उनकी जवाबदेही कटघरे में तय होनी चाहिए। जब अदालत यह पा रही है कि बेकसूर छात्रों को बलि का बकरा बनाया गया, उन पर राजद्रोह जैसे मुकदमे चलाए गए, तो फिर ऐसी पुलिस को महज एक आलोचना के साथ छोड़ देना ठीक नहीं है। ऐसी पुलिस को ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि सत्ता की फरमाईश पर वह ऐसा अगला जुर्म करने के पहले चार बार सोचे, और अपने भविष्य की फिक्र करे। अदालती आलोचना से किसी वर्दी पर कोई आंच नहीं आती, बल्कि ऐसी आलोचना को ऐसी पुलिस अपने राजनीतिक आकाओं को दिखाकर उनसे वाहवाही और पा सकती है। 

हिन्दुस्तान में पुलिस सुधार की बातें होते पीढिय़ां गुजर गई हैं, और एक वक्त अंग्रेज सरकार की पुलिस में जिस तरह हिन्दुस्तानी सिपाही उसके वफादार थे, उसी तरह आज की तथाकथित लोकतांत्रिक सरकारों में आज पुलिस सत्ता पर काबिज लोगों की बदनीयत के प्रति वफादार रहती है। यह सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए, क्योंकि इसके बिना बेकसूर लोग बरसों तक जेल में कैद रहेंगे, राजद्रोह जैसी तोहमतें झेलेंगे, और इंसाफ नाम के अजगर को करवट बदलने में ही कई बरस लग जाएंगे।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 4 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

वायु प्रदूषण का खतरा दुनिया के शतरंज मैचों के फैसलों की रफ्तार पर

  4 फरवरी 2023


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के जिस महंगे और सरकारी रिहायशी इलाके शंकर नगर में अफसरों और मंत्रियों के बंगले हैं वहां अभी दो दिन पहले, एक आम दिन पर वायु प्रदूषण का पीएम 2.5 का स्तर 138 था, पीएम 2 का मतलब हवा में प्रदूषण के बारीक कण। एक पर्यावरण एक्टिविस्ट के मुताबिक विश्व स्वास्थ्य संगठन के पैमाने पर यह 5 होना चाहिए था, अधिकतम 40 होना चाहिए था। यह हाल कारखानों से दूर चौड़ी सडक़ों वाले इलाके का है। अब इसी शहर का एक बड़ा हिस्सा कारखानों का है, और फौलाद के बहुत अधिक प्रदूषण पैदा करने वाले कारखानों का है। उस इलाके में लाखों मजदूर रहते हैं, और रोजाना लाखों मजदूर कई किस्म के कारखानों में भी काम करते हैं। इसलिए वहां प्रदूषण का क्या हाल होगा इसके सरकारी आंकड़ों पर कोई भरोसा करना ठीक नहीं है। लेकिन पूरे हिन्दुस्तान में 21 ऐसे शहर हैं जो कि दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित देशों की फेहरिस्त का हिस्सा हैं। दुनिया में सबसे अधिक वायु प्रदूषण वाले 20 शहरों में से 13 हिन्दुस्तान में हैं। हिन्दुस्तान में कम से कम 14 करोड़ लोग ऐसी हवा में सांस लेते हैं जो कि डब्ल्यूएचओ की बताई सीमा से दस गुना अधिक प्रदूषित है। एक वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक वायु प्रदूषण से हिन्दुस्तान में हर बरस 20 लाख समय पूर्व जन्मे बच्चों की मौत होती है। विकिपीडिया के आंकड़ों के मुताबिक वायु प्रदूषण का आधा हिस्सा उद्योगों से है, एक चौथाई से कुछ अधिक हिस्सा वाहनों के प्रदूषण से है, 17 फीसदी हिस्सा फसलों के ठूंठ जलाने से है, और 5 फीसदी हिस्सा बाकी वजहों से है। 

दो दिन पहले की एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक रिपोर्ट यह कहती है कि प्रदूषित हवा में खेल रहे शतरंज खिलाडिय़ों के फैसले उससे बुरी तरह प्रभावित होते हैं, वे जल्द फैसले नहीं ले पाते, गलतियां बार-बार करते हैं, और बड़ी-बड़ी करते हैं। मैनेजमेंट साईंस नाम की एक पत्रिका में प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट में शतरंज टूर्नामेंट के बंद कमरों के भीतर के प्रदूषण को नापकर वहां खेल रहे खिलाडिय़ों की चली जा रही चालों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया, तो उसका यह नतीजा निकला। आज दुनिया के बड़े-बड़े शतरंज खिलाड़ी, जिनमें भारत के कुछ दिग्गज खिलाड़ी भी हैं, वे मैच के वक्त अपने आसपास के वायु प्रदूषण को नापने लगे हैं, क्योंकि इससे उनका खेल प्रभावित हो रहा है। अब देखें तो ऐसे टूर्नामेंट तो बेहतर शहरों में, बेहतर हॉल के भीतर तकरीबन साफ हवा में होते हैं, लेकिन वहां भी अगर हवा में पीएम 2.5 जैसा प्रदूषण अधिक है, तो इससे खिलाडिय़ों के फैसलों पर सीधे-सीधे असर पड़ता है। यह रिसर्च रिपोर्ट दुनिया के एक सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, एमआईटी के एक प्राध्यापक की लिखी हुई है। इसमें पिछले 20 बरस के शतरंज मुकाबलों का अध्ययन किया गया है, और यह नतीजा निकालते हुए दूसरी वजहों, जैसे कि शोरगुल, तापमान में फेरबदल के प्रभावों को अलग कर दिया गया था। 

अब इन दो बातों को मिलाकर देखें तो ऐसा लगता है कि जितने तरह का प्रदूषण लोगों की जिंदगी पर हावी है, वह लोगों के काम और फैसलों की क्षमता को पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रभावित कर रहा है। हिन्दुस्तान में अगर वायु प्रदूषण से हर बरस 20 लाख से अधिक जन्म पूर्व पैदा बच्चे मर रहे हैं, तो बाकी लोगों पर मौत से कम जो असर हो रहा होगा, उसकी कल्पना अधिक मुश्किल नहीं है। आज सचमुच में रईस और ताकतवर लोग, कामयाब पेशेवर लोग किसी प्रदूषित देश या शहर में रहना नहीं चाहते, अगर वहां रहना उनकी मजबूरी न हो। लोग साफ-सुथरे शहरों में रहना चाहते हैं, जहां प्रदूषण उनकी जिंदगी खत्म न करे, और उनकी जिंदगी की क्वालिटी, और काम की क्वालिटी बेहतर हो सके। हवा के साथ दिक्कत यह है कि वह शहर के एक हिस्से में अगर बहुत खराब है, तो शहर के दूसरे हिस्से में वह लाख तरकीबें आजमाने पर भी बहुत अच्छी नहीं हो सकती। इसलिए अगर किसी शहर में बहुत प्रदूषण है, तो उस शहर को हांकने वाले लोग बेहतर इलाकों में रहते हुए भी उससे पूरी तरह नहीं बच सकते। शतरंज का खेल तो बहुत तेज रफ्तार से फैसले लेने का रहता है, और एक सीमित समय के भीतर लोगों के बहुत सी चालें चलनी पड़ती हैं, इसलिए लोगों के फैसलों की तेजी को आंकना हो पाता है। लेकिन असल जिंदगी में गाड़ी चलाते हुए अचानक किसी हादसे से बचने का फैसला लेने में अगर प्रदूषण की वजह से देरी हो रही है, तो ऐसी होने वाली मौतों की वजहों को देखते हुए कोई वायु प्रदूषण के बारे में सोचेंगे भी नहीं। 

ऐसा लगता है कि यह दुनिया अब बेहतर पर्यावरण के बीच जीने वाले लोगों और खराब पर्यावरण से प्रभावित लोगों के बीच एक दिखाई न देने वाला मुकाबला भी बन गई है। अगर प्रदूषित हवा से जिंदगी में तमाम वक्त एक फर्क पड़ रहा है, तो प्रदूषित शहरों की पीढिय़ां एक किस्म से साफ शहरों से पीछे रह जाने का खतरा तो रखती ही हैं। यह पूरा प्रदूषण पिछली कुछ सदियों का ही है, जब से मशीनें बनीं, कारखाने चले, और सडक़ों पर गाडिय़ां आईं। इसलिए यह सब कुछ इंसान की पिछली सौ पीढिय़ों के भीतर की ही बात है। इतने कम वक्त में दुनिया की आबादी का एक बहुत बड़ा गरीब हिस्सा बहुत गंभीर प्रदूषण का शिकार हो गया है, और अपने आर्थिक पिछड़ेपन के साथ-साथ वह सेहत के ऐसे पिछड़ेपन का भी शिकार हुआ दिखता है जो कि कुपोषण से शुरू हुआ है, और प्रदूषण के साथ पल-बढ़ रहा है। ऐसे में कारखानों और गाडिय़ों के प्रदूषण को कम करके प्रदूषण के तीन चौथाई हिस्से में से काफी कुछ घटाया जा सकता है। सरकारें हांकने वाले लोगों को यह सोचने पर मजबूर करने के लिए जानकार लोगों का इस पर लिखना जरूरी है, इसकी चर्चा करना जरूरी है, और इसके लिए अदालतों का ध्यान खींचना भी जरूरी है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

..अडानी सरकार के गले की हड्डी बन चुका है, इसकी एक स्वतंत्र जांच से कम कुछ नहीं

 3 फरवरी 2023


लोकसभा का यह सत्र शुरू होते ही थम गया है क्योंकि विपक्ष ने आज देश में खड़े सबसे बड़े आर्थिक खतरे को लेकर उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। यह मांग संयुक्त संसदीय समिति से भी हो सकती है, और सुप्रीम कोर्ट के किसी जज की निगरानी में भी हो सकती है। आज संसद के दो सत्र शुरू तो हुए हैं, लेकिन अडानी का मुद्दा सरकार का पीछा नहीं छोडऩे वाला है। एक कंपनी के शेयरों के दाम गिरने को लेकर संसद की फिक्र का कोई सामान नहीं बनना चाहिए था लेकिन अडानी के साथ दिक्कत यह है कि एलआईसी और देश के सरकारी बैंकों के दसियों हजार करोड़ रूपये इसमें लगे हुए हैं। फिर यह भी है कि सरकारी बैंकों और एलआईसी को अगर नुकसान हो रहा है, तो वह बोझ जनता पर ही जाता है, इनकी अपनी कोई जेब नहीं होती है। इसलिए जनता के पैसों को अगर इन बड़ी सरकारी कंपनियों में बैठे हुए लोग अडानी जैसी संदिग्ध कंपनी में झोंकते हैं, तो इस पर सरकार की संसद में जवाबदेही बनती है। इसके अलावा जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अडानी के खिलाफ ऐसे आरोप लगते हैं कि इस कंपनी ने अपने खाता-बही में आंकड़ों का चमत्कार दिखाकर, कई बातों को छुपाकर, कई बदनाम देशों के मार्फत रहस्यमय रकम लाकर अपने कारोबार को इस तरह बढ़ाया है, तो ऐसे आरोपों के साथ-साथ जब भारत में प्रचलित यह आम धारणा जोड़ दी जाए कि ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सबसे पसंदीदा और कृपापात्र कंपनी है, तो फिर इस पर लगे आरोपों की जांच नीचे के स्तर पर तो नहीं हो सकती। फिलहाल बाजार में इस कंपनी का जो भ_ा बैठा है, उसे देखते हुए इसमें सरकारी कंपनियों के पूंजीनिवेश देखते हुए इसकी एक पारदर्शी जांच की जरूरत है। फिर कांग्रेस प्रवक्ता जयराम नरेश ने मांग की है कि एक स्वतंत्र जांच से ही एलआईसी, एसबीआई जैसी अन्य संस्थाएं बचाई जा सकती हैं जिन्हें पीएम ने अडानी समूह में निवेश करने के लिए बाध्य किया। जयराम रमेश का यह आरोप इन तथ्यों पर आधारित है कि पिछले तीन बरस में एलआईसी और सरकारी बैंकों ने अडानी में अपना पूंजीनिवेश कई गुना बढ़ाया है। 

अब जो उद्योग समूह अपनी आधा दर्जन से अधिक कंपनियों के साथ भारतीय शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनी है, वह वैसे भी बहुत से नियमों से बंधी रहती है। इसके बाद जब वह सरकारी संस्थाओं से पूंजीनिवेश पा रही है, तो भी उससे पारदर्शिता की उम्मीद की जाती है। फिर जैसा कि अमरीकी फर्म हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट में अडानी पर आरोप लगाया गया है कि इसने दसियों हजार करोड़ संदिग्ध देशों की रहस्यमय कंपनियों से बहुत रहस्यमय तरीके से लाने का काम किया है, तो यह बात भी अपने आपमें एक बड़ी ऊंची जांच के लायक है। इस कंपनी में देश की आम जनता का भी काफी पैसा लगा हुआ है, और उन निजी पूंजनिवेशकों के हितों को बचाने के लिए भी यह सरकार की जवाबदेही है कि वह अडानी की जांच करे। यह जाहिर है कि मौजूदा जांच एजेंसियां सरकार के साथ इतनी घुली-मिली हैं कि वे सरकार की एक पसंदीदा कंपनी की जांच ठीक से नहीं कर सकतीं। इसलिए देश के सामने अगर इतना बड़ा आर्थिक खतरा खड़ा हुआ है, तो ऐसी जांच करवाना सरकार की एक जिम्मेदारी है। इसके पहले भी हम देख चुके हैं कि किस तरह से देश के कई बड़े-बड़े कारोबारी सरकारी बैंकों से दसियों हजार करोड़ निकालकर या तो देश छोडक़र भाग गए हैं, या उन्होंने पैसा किसी तरह बाहर भेज दिया है, और अब कानून के साथ लुकाछिपी खेल रहे हैं। 

अडानी का बहुत सारा पूंजीनिवेश सरकार से ही सार्वजनिक संपत्तियों को खरीदकर किया गया है। एयरपोर्ट, बंदरगाह जैसे एकाधिकार वाले कारोबार को जिस अंदाज में अडानी ने हासिल किया है, उस पर भी देश के लोग हैरान हैं। इससे परे अडानी ने हिमाचल में सेब खरीदने जैसा काम शुरू किया है, और छोटे लोगों को इस कारोबार से बाहर कर दिया है। छत्तीसगढ़ में अडानी का नाम लगातार खबरों में बने रहता है कि वह पहले से कोयले के कारोबार में है, जिसमें उसने कई तरकीबों से हक से बहुत अधिक कोयला निकालकर बेचा है, और छत्तीसगढ़ के स्थानीय कारखाने इस कारोबार को बहुत अच्छी तरह देखते आए हैं क्योंकि वे ऐसा कोयला खरीदते आए हैं। अब छत्तीसगढ़ के हसदेव के सबसे घने जंगलों को काटकर वहां कोयला खदान से राजस्थान सरकार के लिए कोयला निकालने का काम भी अडानी को मिला है, और यह आज छत्तीसगढ़ का एक सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है जिसमें राज्य की भूपेश सरकार भी घिर गई है। 

अभी कुछ हफ्तों पहले जब अडानी ने एनडीटीवी खरीदा, तो भी देश के लोग इस फिक्र में पड़ गए कि इतने बड़े-बड़े कारखानेदार अगर मीडिया खरीद लेंगे, तो फिर उसकी आजादी का क्या होगा? इससे पहले मुकेश अंबानी ने एक बड़े मौजूदा मीडिया कारोबार को एक दिन में हजारों करोड़ रूपये देकर ले लिया था, और अब अडानी। मीडिया कारोबार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गुंजाइश विवादास्पद कारोबारियों के बड़े पूंजीनिवेश के साथ जिंदा नहीं रह सकती। फिर जब ऐसे कारोबारियों पर सरकारी कृपा भी बरसने की जनधारणा हो, तो फिर ऐसे मीडिया की विश्वसनीयता क्या रह जाती है। भारत में अगर इतने बड़े-बड़े कारोबारी इतने बड़े-बड़े सरकारी पूंजीनिवेश पाकर, और दसियों हजार करोड़ रूपये का सरकारी कर्ज पाकर, और रहस्यमय तरीकों से बदनाम देशों से लाखों करोड़ का पूंजीनिवेश लाकर अगर बही-खातों में हेराफेरी करके बाजार में अपनी साख बना रहे हैं, तो फिर ऐसे कारोबार जांच का मुद्दा तो हैं ही। सरकार को खुद भी अपनी साख बचाए रखने के लिए अडानी की एक पारदर्शी जांच होने देना चाहिए। और इसके साथ-साथ एलआईसी और सरकारी बैंकों को अपनी पूंजीनिवेश और दिए हुए कर्ज को लेकर अधिक सावधान भी रहना चाहिए कि उनका खतरा कम से कम हो। आज इन सरकारी बैंकों और एलआईसी के करोड़ों ग्राहकों का नफा-नुकसान ऐसे पूंजीनिवेश से जुड़ा हुआ है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 2 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

एक लाड़ले बच्चे से परे स्कूल शिक्षा में कुछ नहीं

 2 फरवरी 2023


छत्तीसगढ़ की दो छोटी-छोटी घटनाएं अलग-अलग इलाकों की स्कूलों की हैं, लेकिन इन्हें मिलाकर लिखने की जरूरत है। गरियाबंद के ग्रामीण इलाके में पांचवीं के एक छात्र की शिक्षिका ने माचिस की तीली जलाकर उसके गले पर रख दिया जिससे जख्म हो गया है। परिवार ने शिकायत अफसर से की है, शिक्षिका का कहना है कि बच्चा कम बोलता है, उसे चंचल बनाने के लिए उसने यह टोटका किया था। स्कूल में दो ही शिक्षक हैं, एक पहले से किसी दुर्घटना में जख्मी है, और अब यह शिक्षिका भी छुट्टी पर चली गई है, स्कूल बंद हो गया। एक दूसरे मामले में कोरबा जिले के एक सरकारी आवासीय विद्यालय में एक छात्र को घर से लौटने में देर हुई, तो हॉस्टल अधीक्षक ने दूसरे सीनियर छात्रों से इस छात्र की चप्पलों से पिटाई करवाई, इस लडक़े को भी जिला अस्पताल में भर्ती किया गया है, और मामले की जांच की जा रही है। छत्तीसगढ़ में बहुत सी स्कूलों से ऐसे वीडियो सामने आते हैं जिनमें शिक्षक शराब के नशे में धुत्त स्कूल में बैठे हुए हैं, या फर्श पर पड़े हुए हैं, और उनके आसपास बच्चे बैठे हुए हैं। अधिकतर मामलों में यह हाल सरकारी स्कूलों में ही हैं जहां पर जवाबदेही नहीं के बराबर है। सरकारी स्कूलों के ऐसे हाल पर सोचने की जरूरत है, और इसीलिए हम आज यहां यह चर्चा छेड़ रहे हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक स्कूल शिक्षा से जुड़े हुए तमाम पहलू परले दर्जे के भ्रष्टाचार के शिकार रहे हैं। मंत्री से लेकर अफसरों तक, और स्कूलों में काम करने वाले लोगों तक भ्रष्टाचार बहुत बुरी तरह फैला हुआ है। पिछली भाजपा सरकार के समय की बात हो, या आज की कांग्रेस सरकार की बात हो, स्कूलों की फर्नीचर-खरीदी से लेकर वहां दोपहर के सरकारी खाने तक, तमाम मामलों में भ्रष्टाचार इतना आम है, और इतना बड़ा है कि जिम्मेदार लोगों का तमाम ध्यान बस इसी में लगे रहता है कि इस विभाग को कैसे दुहा जा सकता है। इसमें सहूलियत की बात यह भी रहती है कि विभाग से जुड़े हुए बच्चे जुबान खोल नहीं सकते, भ्रष्टाचार को समझते नहीं हैं, और सरकारी स्कूलों के बच्चों के गरीब मां-बाप की अधिक जुबान होती नहीं है। इसलिए जिस तरह निजी स्कूलों में पालक-शिक्षक बैठक होती है जिसमें बच्चों के मां-बाप स्कूलों की कमियों और खामियों को गिनाते हैं, उस तरह का कुछ सरकारी स्कूलों में नहीं होता जहां पर कि गरीब परिवारों के बच्चों को अहसान करने के अंदाज में पढ़ाया जाता है। 

कोई भी ऐसा विभाग जिसमें मंत्री से लेकर नीचे तक तमाम लोगों की दिलचस्पी अधिक से अधिक वसूली और उगाही में रहती है, विभाग को इस हद तक दुह लिया जाता है कि उसके थन से खून निकलने लगे, तो फिर विभाग के काम, पढ़ाने में भला किसकी दिलचस्पी रह सकती है? और छत्तीसगढ़ में जिस तरह शिक्षाकर्मियों के भरोसे पढ़ाई चलती है, जिनका कि जिले के बाहर कोई तबादला भी नहीं हो सकता, वहां पर वे शिक्षाकर्मी पढ़ाने जाते भी हैं या नहीं, यह जानकारी भी कम से कम ग्रामीण इलाकों में तो नहीं रहती है। यह सिलसिला शिक्षा की बुनियाद को इतना खोखला कर गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों के ज्ञान के एक मूल्यांकन में छत्तीसगढ़ बहुत ही पिछड़ा हुआ मिला है कि यहां के बच्चे अपनी कक्षा से कई क्लास नीचे की भी जानकारी नहीं रखते हैं। यह दिक्कत इसलिए भी है कि सरकार और समाज में जरा सी भी ताकत रखने वाले लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं, और सरकारी स्कूलों से किसी ताकतवर के परिवार पर फर्क नहीं पड़ता। 

छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक दूसरी चीज भी हो रही है। सरकार ने स्वामी आत्मानंद के नाम पर चुनिंदा सरकारी स्कूलों को अंग्रेजी स्कूल बनाना शुरू किया है। अब तक ऐसे कई सौ अंग्रेजी स्कूल बन चुके हैं जिनके लिए मौजूदा सरकारी स्कूलों में से सबसे अच्छे ढांचे वाले स्कूल छांटकर उन्हें आत्मानंद अंग्रेजी स्कूल बना दिया गया है। इनके लिए अलग से शिक्षक नियुक्त किए गए हैं, या मौजूदा शिक्षकों में से जो बेहतर हैं, उन्हें आत्मानंद स्कूल भेजा गया है। जिलों में कलेक्टरों के हांके चलने वाले डीएमएफ (जिला खनिज निधि) से अंधाधुंध पैसा आत्मानंद स्कूलों को आलीशान बनाने में खर्च किया जा रहा है, और ऐसे स्कूलों की तस्वीरें स्कूल विभाग की कामयाबी की तरह फैल रही हैं। हकीकत यह है कि पढ़ाई को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से करवाने के लिए चुनिंदा स्कूलों पर ऐसे किसी खर्च की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि अंग्रेजी पढ़ाने के लिए बेहतर इमारत नहीं लगती, बहुत बेहतर फर्नीचर नहीं लगता। सरकार इन बरसों में शायद पांच फीसदी स्कूलों को भी अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं बना पाई है, और बाकी तकरीबन तमाम गरीब बच्चे टूटी-फूटी स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जिनकी मरम्मत तक नहीं हो रही है, क्योंकि सरकार का पूरा ध्यान आत्मानंद अंग्रेजी स्कूलों पर है। 

हिन्दी भाषी इलाके की सरकार की अंग्रेजी भाषा को लेकर इतनी हीनभावना समझ से परे है। एक वक्त हिन्दुस्तान पर राज करने वाले अंग्रेजों की भाषा सिखाने के लिए आज बाकी स्कूलों का हक छीनकर अंग्रेजी के लिए इतने महंगे ढांचे तैयार करना अपनी खुद की भाषा को लेकर एक हीनभावना के अलावा और कुछ नहीं है। प्रदेश में विपक्षी भाजपा को भी इस बात की समझ नहीं है कि 95 फीसदी से अधिक गरीब बच्चों के हक छीनकर अगर 5 फीसदी अंग्रेजी बच्चों को दिया जा रहा है, तो यह सामाजिक विसंगति उठाना विपक्ष की जिम्मेदारी है। लेकिन छत्तीसगढ़ में सामाजिक समानता के मोर्चे पर विपक्ष के मुर्दा रहने का यह पहला मौका नहीं है, जब भाजपा की सरकार पन्द्रह बरस थी, तब विपक्षी कांग्रेस पार्टी भी गरीबों के हक के मुद्दों पर कुछ ऐसी ही थी, और वही वजह थी कि भाजपा लगातार तीन विधानसभा चुनाव, तीन लोकसभा चुनाव, और तीन म्युनिसिपल चुनाव जीत सकी थी। 

सरकारी स्कूल शिक्षा इतने गरीब तबके का मुद्दा है कि शायद ही कोई विधायक अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाते होंगे। स्कूलों की हालत खराब है, और सरकार मानो बच्चों की एक पूरी पीढ़ी का वक्त गुजार देने के लिए इन स्कूलों को किसी तरह चला रही है, इनका उत्कृष्टता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। ऐसे माहौल में अब सरकार का लाड़ला बच्चा आत्मानंद स्कूल के नाम पर उसके तमाम साधन-सुविधाओं का अकेला हकदार बन गया है, और प्रदेश में बाकी स्कूलों की बदहाली की चर्चा करने वाले लोग भी नहीं रह गए हैं, विपक्ष में भी नहीं। 

(Daily Chhattisgarh)