सरकारी अस्पतालों में थोक में होती मौतों के पीछे की वजहें समझें

4 अक्टूबर 2023  

   

महाराष्ट्र के नांदेड़ के सरकारी अस्पताल में पिछले 48 घंटों में 31 मरीजों की मौत हुई है जिनमें 16 बच्चे हैं, इनके अलावा 71 मरीजों की हालत गंभीर बताई जा रही है। अस्पताल ने यह कहा है कि वहां डॉक्टरों या दवा की कोई कमी नहीं है, और इस बात पर जोर दिया है कि मरीजों पर इलाज का असर नहीं हुआ। मामले की जांच के लिए कमेटी बनाई गई है, और इसे लेकर सभी तबकों में बड़ी फिक्र हो रही है। अलग-अलग पार्टियों के नेता महाराष्ट्र की सरकार के प्रति अपने रूख के मुताबिक बयान दे रहे हैं, लेकिन उन सबसे परे यह समझने की जरूरत है कि अस्पताल जिन नवजात शिशुओं को बहुत कम वजन के साथ पैदा होने वाला बता रहा है, वे भी तो कुपोषण की शिकार माताओं के बच्चे रहे होंगे। 

इन बातों के बीच एक दूसरी खबर पर भी ध्यान देने की जरूरत है। देश में मेडिकल शिक्षा, और सरकारी अस्पतालों में इलाज इन दोनों का हाल भयानक है। अभी कुछ दिन पहले इस अखबार के यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर इस बारे में एक रिपोर्ट भी थी कि किस तरह दक्षिण भारत में नई मेडिकल सीटों पर नेशनल मेडिकल कमीशन ने रोक लगा रखी है कि उत्तर भारत के प्रदेश दक्षिण की बराबरी नहीं कर पा रहे हैं। अब इसके साथ एक दूसरी खबर आई है कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने 2022-23 में मूल्यांकन के दौरान अधिकतर मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी (शिक्षक) और सीनियर रेजीडेंट डॉक्टरों को सिर्फ कागजों पर पाया है। मतलब यह कि वे असल में काम नहीं कर रहे थे, और कमीशन की औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए उन्हें नौकरी पर दिखाया जा रहा था। कमीशन ने यह भी पाया कि ऐसे चिकित्सा शिक्षकों और चिकित्सकों की हाजिरी कम से कम 50 फीसदी होने की शर्त कहीं भी पूरी नहीं हो रही है। यह हाल मेडिकल कॉलेज और उनके अस्पतालों का है, तो बाकी सरकारी अस्पतालों के हाल को और आसानी से समझा जा सकता है। 

आज जब देश में चिकित्सा शिक्षा की यह हालत है, और हमने एक जानकार डॉ.सजल सेन से इस बारे में बात की थी तो उनका कहना था कि दक्षिण भारत के मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने पर रोक लगाना नाजायज है क्योंकि वहां पर चिकित्सा शिक्षा की हालत उत्तर भारत से बेहतर है। अब अगर देश के कॉलेजों में पढ़ाने के लिए डॉक्टरों की कमी है, वे आधे भी नहीं हैं, उनसे जुड़े हुए अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी है, देश भर के ग्रामीण इलाकों में काम करने के लिए सरकारी डॉक्टर नहीं हैं, और ऐसे में मेडिकल कमीशन इस बात पर जुटा हुआ है कि दक्षिण में चिकित्सा शिक्षा, और चिकित्सा सेवा दोनों राष्ट्रीय औसत से अधिक क्यों हैं, उत्तर भारत से बहुत अधिक क्यों हैं, तो यह बड़ी खराब नौबत है। अगर उत्तर भारत में जरूरत के मुताबिक मेडिकल कॉलेज नहीं खुल पाए हैं, और राष्ट्रीय स्तर, 10 लाख की आबादी पर सौ एमबीबीएस सीटों से चिकित्सा शिक्षा बहुत पीछे चल रही है, तो ऐसी घिसटती हुई नौबत की वजह से दक्षिण भारत का आगे बढऩा भी रोक देना निहायत बेवकूफी की बात है। उत्तर भारत में अगर मेडिकल कॉलेज बढ़ाने हैं, तो वहां काम करने के लिए डॉक्टर भी दक्षिण भारत से ही तो मिलेंगे। 

दूसरी बात यह कि महाराष्ट्र में अभी जो मौतें हो रही हैं, उनको देखते हुए ऐसा लगता है कि चिकित्सकों, अस्पताल की दूसरी सहूलियतों, और बाकी इंतजामों में भी कहीं न कहीं कमी बनी हुई है जो कि थोक में ऐसी मौतें हो रही हैं। अगर मौतें एक साथ इतनी बड़ी संख्या में नहीं हुई रहतीं, तो यह पता भी नहीं चला होता। इसलिए आज देश को एक मानकर, जहां से भी जितने चिकित्सक तैयार हो सकते हैं, उनके लिए कोशिश करनी चाहिए। आज तो यूक्रेन, रूस, चीन, बांग्लादेश, और नेपाल जैसे देशों से भी डॉक्टरी की पढ़ाई करके हिन्दुस्तानी लौटते हैं, और यहां पर काम करते हैं। अब अगर हिन्दुस्तानी छात्र-छात्राओं को चिकित्सा शिक्षा के लिए दूसरे देश भी जाना पड़ता है, तो इससे बेहतर तो यही है कि वे बाकी प्रदेशों से दक्षिण भारत ही चले जाएं। क्योंकि उत्तर भारत कॉलेज नहीं बना पा रहा है, मेडिकल सीटें नहीं बढ़ा पा रहा है, इसलिए देश के अधिक सक्षम राज्य भी आगे न बढ़ सकें, यह तो बहुत ही खराब सोच है, और इससे राष्ट्रीय एकता भी कमजोर होगी। वैसे भी उत्तर और दक्षिण के बीच एक अघोषित विभाजन रेखा खिंची हुई है, और आने वाले लोकसभा डी-लिमिटेशन में भी उत्तर-दक्षिण का विभाजन और अधिक गहरा होने वाला है क्योंकि दक्षिण में आबादी के अनुपात में लोकसभा सीटें घटेंगी, और उत्तर भारत में गैरजिम्मेदार जनसंख्या बढ़ोत्तरी के चलते सीटें बढ़ेंगी। ऐसे में दक्षिण की बेहतर शिक्षा व्यवस्था की भी एक सीमा बांध देना बहुत समझदारी की बात नहीं है। 

आज हालत यह है कि देश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भी डॉक्टर और प्राध्यापक फर्जी दिखाए जाते हैं। यह हालत भी तब है जब चिकित्सा शिक्षकों को 70 बरस की उम्र तक काम करने की छूट मिली हुई है। सरकारी इंतजाम में डॉक्टर अपने लिए तय घंटों तक भी काम नहीं करते हैं, और अधिकतर जगहों पर प्राइवेट प्रैक्टिस में लगे रहते हैं। इसलिए सरकारी कागजों में दिखने वाली चिकित्सा-क्षमता सच्चाई से बहुत दूर रहती है। केन्द्र सरकार को खुद राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के आंकड़ों को देखते हुए तुरंत ऐसी नीति बनानी चाहिए कि अगले 20-25 बरस में उत्तर भारत अपनी क्षमता बढ़ा सके, और आबादी के अनुपात में मेडिकल सीटों को ला सके। लेकिन तब तक तो देश को दक्षिण भारत की तरफ देखना ही होगा, और इससे परहेज करना दक्षिण के तो कम नुकसान का होगा, उत्तर भारत के, और बाकी भारत के अधिक नुकसान का होगा। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 अक्टूबर 2023


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भारत की 21वीं सदी का आगे का सफर बिहार से शुरू होता है

3 अक्टूबर 2023  

   

बिहार ने 23 बरस बाद देश में एक बार फिर जाति के मुद्दे को जिंदा कर दिया है। 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके ओबीसी आरक्षण की राह खोली थी, और बिहार के ओबीसी राजनीति करने वाले नीतीश-लालू के गठबंधन ने जातीय जनगणना करवाकर देश में हडक़म्प मचा दिया है। इसके आंकड़े लोगों को चौंकाने वाले हैं, ओबीसी की गिनती जितनी मानी जाती थी, उससे काफी ज्यादा निकली है, और अनारक्षित वर्ग जितना बड़ा माना जाता था, उससे काफी छोटा निकला है। इससे आने वाले वक्त में कई किस्म के फैसले बदलेंगे। इस रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण का फॉर्मूला, और उसकी अधिकतम सीमा को एक बार फिर बदलने की बात होगी। राजनीतिक दलों के सामने भी यह मजबूरी रहेगी कि उम्मीदवारी तय करते हुए वे अलग-अलग जाति और धर्म के अनुपात का ख्याल रखें। हमारा ख्याल है कि जिन पांच राज्यों में अभी विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें उम्मीदवारी तय करते हुए पार्टियों को कम से कम बिहार की इस रिपोर्ट को देखना तो होगा, फिर चाहे इन पांच राज्यों में अभी ऐसी कोई जनगणना न हुई हो। 

भारत बड़ी विविधताओं वाला देश है, और इसके कोई दो राज्य बिल्कुल एक सरीखी जातीय आबादी वाले नहीं हैं। लेकिन बिहार की मिसाल अब बाकी प्रदेशों में कम से कम ओबीसी आबादी के लिए एक उत्साह की वजह रहेगी क्योंकि पढ़ाई और नौकरी में मिलने वाला, पंचायत और म्युनिसिपल चुनाव में मिलने वाला ओबीसी आरक्षण अभी संसद और विधानसभाओं में लागू नहीं है, जो कि सत्ता का मुख्य केन्द्र हैं। ऐसे में ओबीसी अपनी आबादी दिखाकर अलग-अलग प्रदेशों में उसके अनुपात में राजनीतिक हक भी मांग सकता है, और आरक्षण का अनुपात भी बदल सकता है। यहां पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि इंडिया-गठबंधन के एक प्रमुख नेता राहुल गांधी, और कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता सोनिया गांधी ने संसद के भीतर जातीय जनगणना कराने की मांग की थी। बाद में राहुल ने संसद के बाहर भी लगातार इस बात को दुहराया है, और सार्वजनिक वायदा किया है कि इंडिया-गठबंधन की सरकार बनते ही पूरे देश में जातीय जनगणना करवाई जाएगी। 

अभी बिहार की जनगणना के आंकड़े देखें तो 63 फीसदी ओबीसी के अलावा दलित-आदिवासी आरक्षित आबादी को देख लें, तो उसके बाद कुल साढ़े 15 फीसदी अनारक्षित तबका बचता है। अलग-अलग राज्यों में ये आंकड़े अलग-अलग रहेंगे, लेकिन बिहार की इस जनगणना से पूरे देश में ओबीसी राजनीतिक-आरक्षण का रास्ता शुरू हो गया है। कुछ लोगों ने यह भी लिखना शुरू किया है कि आबादी के अनुपात में बिहार में अभी के अनारक्षित तबके को साढ़े 15 फीसदी आरक्षण दे दिया जाए, और बाकी आरक्षित तबकों के लोगों को जैसे बांटना हो, बांट लें। ऐसी नौबत आ भी सकती है क्योंकि आज तो तमाम ताकतवर कुर्सियों पर आज के अनारक्षित तबके हावी हैं। राहुल गांधी ने पिछले दिनों संसद और बाहर एक बात जोर-शोर से सामने रखी थी कि भारत सरकार के 90 सचिवों में से कुल 3 ओबीसी हैं। ये सचिव ही देश का बजट तय करते हैं, सरकार की बहुत सी नीतियां बनाते हैं, कार्यक्रम बनाते हैं, और देश पर राज करते हैं। अब अगर इनमें ओबीसी समुदाय का यह अनुपात है, तो यह फिक्र की बात तो है ही। 

जिन लोगों को ऊंची जातियों के लोगों में ही प्रतिभा दिखती है, उन्हें अपनी सोच कुछ सुधारनी चाहिए। न अंबेडकर ऊंची जाति के थे, और न ही तमिलनाडु के सबसे महान मुख्यमंत्री कामराज। इस देश में नेताओं से परे भी हर किस्म के काम में हर किस्म की जाति और धर्म के लोग अपनी खूबियों को साबित कर चुके हैं। इसलिए जातियों का दंभ अब खत्म कर देने की जरूरत आ गई है। जिस तरह भारत में नीची कही जाने वाली जातियों को हिकारत से देखा जाता है, उसी तरह अमरीका जैसे देश में काले रंग को हिकारत से देखते हैं। वैसे देश में बराक ओबामा दो-दो बार राष्ट्रपति चुने गए, और अभी वहां एक भारतवंशी और अश्वेत मां-बाप की संतान कमला हैरिस उपराष्ट्रपति हैं। इसलिए किसी नस्ल से किसी प्रतिभा का कोई लेना-देना नहीं रहता है। दूसरी तरफ हमने देखा है कि हिन्दुस्तान के अधिकतर सबसे बड़े मुजरिम ऊंची कही जाने वाली जातियों के रहे हैं। ऐसी ही एक जाति का जिक्र करके राहुल गांधी अदालत से सजा पाए हुए हैं, इसलिए हम किसी खास जाति का जिक्र करना नहीं चाहते हैं। लेकिन हाल के बरसों में सबने देखा है कि उत्तरप्रदेश के कुछ सबसे कुख्यात मुजरिम सबसे ऊंची कही जाने वाली जाति के रहे हैं। इसलिए अब वक्त आ गया है कि मनुस्मृति में किए गए जातियों के बखान से उबरकर वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक तरीके से चीजों को देखा जाए। 

दूसरी बात यह भी है कि जातीय जनगणना को अगर हाल के बरसों में सामने आए डीएनए निष्कर्षों से जोडक़र देखें, तो भारत की जातियों की जड़ों की जानकारी बहुत से लोगों को हैरान कर सकती हैं, सदमा पहुंचा सकती हैं। भारत में ऊंची समझी जाने वाली कुछ जातियों का डीएनए दूसरे देशों का मिला है, और इससे हो सकता है कि उनका जाति-दंभ कुछ खतरे में भी पड़ जाए। इस बारे में बहुत सी वैज्ञानिक रिपोर्ट किताबों की शक्ल में सामने आ चुकी हैं, इसलिए यहां पर उसके बारे में अधिक लिखने की जरूरत नहीं है। लेकिन बिहार की जातीय जनगणना को लेकर आज देश में जो बहस छिड़ी है, वह एक ही तरफ जाते हुए दिखती है कि जिस जाति की जितनी आबादी है, उसका उतना ही हक होना चाहिए। लोकतंत्र में हर व्यक्ति का बराबर एक-एक वोट ही होता है, और हर व्यक्ति के अवसर भी बराबर होने चाहिए। आबादी के अनुपात में आरक्षण से आज की ऊंची कही जाने वाली जातियों को अपना बड़ा नुकसान होते दिखेगा, क्योंकि आज वे अधिक अवसरों पर काबिज हैं, लेकिन बढ़ती हुई सामाजिक-राजनीतिक चेतना के चलते यह अनुपातहीन व्यवस्था अंतहीन तो चलनी भी नहीं थी, और बिहार ने शायद इस व्यवस्था के खात्मे को एक फास्टट्रैक पर डाल दिया है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 अक्टूबर 2023


 (Daily Chhattisgarh)

गांधी के नाम पर पाखंड बंद हो, और विदेशियों को राजघाट ले जाना भी

2 अक्टूबर 2023  

  आज गांधी जयंती पर गांधी के नाम की सबसे अधिक चर्चा सरकार और राजनीति के लोग कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने आपको गांधीवादी या गांधी का अनुयायी-प्रशंसक साबित करना जरूरी सा रहता है। इस देश में आज लोगों की सोच चाहे कितनी ही बेईमान क्यों न हो गई हो, दिखावे और पाखंड के लिए पूजा तो गांधी की ही करनी पड़ती है। जब दुनिया भर के मेहमान भारत आते हैं तो सरकार को भी उन्हें राजघाट ही ले जाना पड़ता है, गोडसे या सावरकर के स्मारकों पर उन्हें नहीं ले जाया जा सकता। इसलिए आज जैसे-जैसे गांधी के नाम की चर्चा हो रही है, वैसे-वैसे यह भी याद पड़ता है कि गांधी के नामलेवा लोग किस हद तक गांधी से दूर हो चुके हैं। तमाम मौके विसंगतियों और विरोधाभासों को उजागर करते हैं, गांधी जयंती और आजादी की सालगिरह, या संविधान लागू करने के गणतंत्र दिवस के मौके ऐसे ही हैं जो कि जलसों और हकीकतों में विरोधाभास को बढ़-चढक़र बताते हैं। 

आज प्रधानमंत्री सहित देश के दूसरे बहुत से नेता राजघाट जा चुके होंगे, या अपनी-अपनी तरह से गांधी को श्रद्धांजलि दे चुके होंगे। लेकिन इस गरीब देश के लिए गांधी ने जो सादगी और किफायत की राह दिखाई थी, उस राह को मानो सत्ता ने उसके सामने दीवार खड़ी करके छुपा दिया है कि वह आईने की तरह सत्ता के ऐशोआराम को उसका चेहरा न दिखाती रहे। गांधी की तस्वीरें, उसके इश्तहार और वीडियो, और गांधी की तारीफ में बड़ी-बड़ी बातें लोगों के ढकोसले को और अधिक हद तक उजागर करती हैं। जिस गांधी ने मन, वचन, और कर्म, इन सबकी ईमानदारी पर जोर दिया, आज उसके नाम की रोटी खाने वाले लोग इनमें से किसी एक के प्रति भी ईमानदार नहीं दिखते। यह बात बहुत सालती है कि यह देश हर किस्म के पाखंडों का इतना आदी हो चुका है कि बहुत से लोगों को तो गांधी के स्मरण के नाम पर मक्कार लोगों की बातों में कुछ भी अटपटा नहीं लगता। ऐसा लगता है कि जिस तरह रिश्वत लेने-देने में गांधी की तस्वीर वाले नोटों का इस्तेमाल होता है, और ऐसे नोटों को गांधी का अपमान नहीं माना जाता, उसी तरह गांधी के नाम पर बड़े-बड़े पाखंडों की सालाना परंपरा भी लोगों को अटपटी नहीं लगती।

आज जब गांधी की सोच के ठीक खिलाफ जाकर सत्ता और राजनीति लोगों के साथ भेदभाव करती हैं, धार्मिक नफरत और साम्प्रदायिकता फैलाती हैं, हिंसा को बढ़ावा देती हैं, और धर्म के नाम पर आतंक फैलाती हैं, तो वह बात भी अब 21वीं सदी के दूसरे दशक में नवसामान्य हो चुकी है, यही अब भारतीय सोच और भारतीय जीवनशैली रह गई है। कुछ अरसा पहले इस अखबार को दिए एक इंटरव्यू में गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने कहा था कि नोटों पर से गांधी की फोटो हटा देनी चाहिए। हमें लगता है कि गांधी के नाम पर साल में दो बार जन्म और मृत्यु का दिन मनाना भी बंद हो जाना चाहिए, क्योंकि जो गांधी का नाम लेने के हकदार अब भी बचे हैं, वे सबसे गरीब, सबसे बेबस लोग ऐसे हैं जिनका गांधी के नाम के जलसों से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता। जो सबसे कमजोर तबका है, जिसे गांधी ने एक वक्त हरिजन कहा था, और जिसने बाद में इस नाम पर आपत्ति की थी, और अपने आपको दलित कहता है, उस तबके, उस किस्म के दूसरे कमजोर तबके, अल्पसंख्यक धर्मों के लोग आज सत्ता और राजनीति के जितने बुरे निशाने पर हैं, वह देखकर दिल बैठने लगता है। ऐसे में इस देश को बार-बार गांधी का वारिस होने का नाटक करना भी क्यों चाहिए? आज यह देश जिस परले दर्जे का कलंकित हो चुका है, आज संविधान की शपथ लेने वाले बड़े-बड़े लोग जिस तरह संसद के भीतर साम्प्रदायिक और हिंसक गालियां बक रहे हैं, बड़े-बड़े मुजरिम सरकार, राजनीति, और संसद में ऊंचे ओहदों पर हैं, उसे देखते हुए सरकारी दफ्तरों में गांधी की तस्वीर भी क्यों लगानी चाहिए? 

और सरकारी दफ्तरों से याद आया कि आज देश की बड़ी अदालतें सरकारी दफ्तरों की साजिशों, वहां के जुर्म के खिलाफ ही जूझती रहती हैं, सरकारें रात-दिन अदालत को अपने झूठ से बरगलाने में लगी रहती हैं, ऐसे सरकारी दफ्तरों में गांधी की फोटो क्यों लगानी चाहिए? जब देश-प्रदेश की सरकारें लगातार मुजरिमों की तरह काम करती हैं, और दिखावा जनकल्याण का करती हैं, तो फिर वे चाहे गांधी के हत्यारों की तस्वीरें टांग लें, गांधी की तस्वीर को सरकारी दफ्तरों में टांगना तो गांधी को मरने के बाद भी सलीब पर टांगने सरीखा है, कम से कम मर चुके गांधी पर इतनी तो रहम करनी चाहिए कि हर बरस दो-चार बार यह याद न दिलाया जाए कि देश गांधी की सोच के कितने खिलाफ चल रहा है। 

हमारा यह भी मानना है कि आज देश की राजनीतिक ताकतें इस बात की हकदार नहीं हैं कि विदेशों से आने वाले मेहमानों को वे राजघाट ले जाकर गांधी के नाम पर बेवकूफ बनाएं। यह कुछ उसी किस्म का है कि एक परिवार के नौजवान बेटे बूढ़े मां-बाप को वैसे तो भूखे मारें, प्रताडि़त करें, लेकिन जब बाहर से मेहमान आएं तो मां-बाप को ठीक-ठाक कपड़े पहनाकर मेहमानों को ले जाकर मां-बाप के पांव छुआएं। आज इस देश में कितनी सरकारें ऐसी हैं जो कि अपनी चाल-चलन के चलते, अपनी सोच के चलते गांधी का नाम भी लेने की हकदार हैं? जो सरकारें लगातार नफरती एजेंडे पर चल रही हैं, जिन्होंने अभी दस बरस पहले तक बड़ी मुश्किल से देश में धर्म के ताने-बाने से कपड़े को बुना था, उसे इन दस बरसों में तार-तार कर दिया गया है। इस देश को एक धर्मराज्य की तरह बना दिया गया है, और अपने धर्म, और सौतेले धर्म या दुश्मन धर्म के बीच ऐसी नफरत खड़ी करने वाले लोगों को राजघाट का रणनीतिक इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए। गांधी को जो करना था वो करते-करते, उसी वजह से गोली खाकर चले गए। अब उनकी हत्या करने वाली सोच को उनका कफन बेचकर राजनीति नहीं करने देनी चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 2 अक्टूबर, 2023



 

चुनाव के वक्त सरकारी और निजी पैसों के ऐसे हिंसक इस्तेमाल को रोकें


1 अक्टूबर 2023  

  केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अभी कहा है कि वे आने वाले लोकसभा चुनाव में न तो पोस्टर-बैनर लगवाएंगे, न किसी को चाय पिलाएंगे, जिसे वोट देना है दे, जिसे न देना है वो न दें। उन्होंने कहा कि वे चुनावों में रिश्वत नहीं लेते, और न किसी को कुछ देते हैं। उन्होंने पहले एक वक्त यह भी कहा था कि वोटर खाता सबका है, लेकिन वोट उसी को देता है जिसे देना होता है। उन्होंने बताया था कि एक बार उन्होंने एक-एक किलो मटन बांटा था, लेकिन चुनाव हार गए थे। आज की इस खबर पर सोचने की जरूरत इसलिए है कि आज देश के पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव काले बादलों की तरह मंडरा रहे हैं। सरकारी स्तर पर योजनाओं और कार्यक्रमों की बौछार चल रही है कि वोटरों के दिल का कोई कोना सूखा न रह जाए। नेताओं के अपने होर्डिंग और पोस्टर जिधर नजर जाए, उधर बदसूरती फैलाते दिख रहे हैं। तमाम संपन्न पार्टियों के वे नेता अपने चेहरों से सडक़ों को पाट दे रहे हैं जो कि अपनी पार्टी की टिकट पाने के लिए उम्मीद से हैं। जाहिर है कि टिकट पाने वाले लोगों का सार्वजनिक जगहों पर हमला इससे कई गुना अधिक होगा। इन दिनों जो चर्चा सुनाई पड़ती है उसके मुताबिक टिकट दिलवाने के लिए पार्टी के कुछ बड़े नेता करोड़ों रूपए उगाही भी कर रहे हैं, और टिकट चाहने वाले लोग उन्हें लाखों रूपए के तोहफे भी दे रहे हैं। कुल मिलाकर माहौल दो नंबर से लेकर दस नंबर तक के पैसों की अश्लील और फूहड़ नुमाइश का होकर रह गया है, और अभी पार्टियों के उम्मीदवार भी आने बाकी हैं, चुनाव प्रचार शुरू होना भी बाकी है। 

नेताओं और उनकी पार्टियों के बीच मचा हुआ यह घमासान बताता है कि जिन्होंने पांच बरस काम किया हो उनमें, और जिन्होंने कुछ न किया हो, उनमें भी हड़बड़ी एक सरीखी है, दोनों ही किस्म के लोग बदहवास हैं क्योंकि बड़ी पार्टी की टिकट और मौत का कोई भरोसा नहीं रहता है कि वह कब किसके ऊपर आकर गिरे। ऐसे में बहुत से नेताओं को यही ठीक लगता है कि मतदान के 15-20 दिन पहले मिलने वाली टिकट के बाद हर पल वे इतना अंधाधुंध खर्च करें कि वोटर उसी के सैलाब में बह जाए। खुद सरकारों की, यानी सत्तारूढ़ पार्टियों की ऐसी ही हड़बड़ी दिख रही है। कई पार्टियां तो अपनी राज्य सरकारों की कामयाबी के कई-कई पन्नों के इश्तहार दूसरे प्रदेशों के अखबारों में छपवा रही हैं मानो वहां से भी वोटर वोट देने आएंगे। और यह सब कुछ जनता के पैसों से हो रहा है। प्रदेशों में सत्तारूढ़ पार्टियां अपने प्रदेशों में तो बड़े अखबारों को इश्तहारों से पाट चुकी हैं, मानो यह अपने खिलाफ कुछ न छपने की गारंटी सी हो। और इस हड़बड़ी में सरकारों को यह भी नहीं दिख रहा है कि एक पाठक की एक दिन में कामयाबी की कहानियां पढऩे और बर्दाश्त करने की क्षमता कितनी है, किसी एक की जिंदगी में इनके लिए जगह कितनी है। इन सबसे लगता है कि पांच बरस का कार्यकाल सरकारों ने कामयाबी से पूरा नहीं किया है, और आखिरी के एक-दो महीनों की हड़बड़ी कुछ इस तरह की है कि देर रात की आखिरी ट्रेन पकड़ रहे हों। 

यह सिलसिला दो किस्म के पैसों को उजागर करता है। एक तो निजी कालेधन को जिससे कि सडक़ किनारे खम्भों पर पोस्टर और होर्डिंग लगाकर लोगों की नजरों को उनसे ढांक दिया जाता है। दूसरा यह कि किसी एक पार्टी के राज वाले राज्य के सरकारी इश्तहारों के पैसों से दूसरे प्रदेशों में भी इश्तहार दिए जा रहे हैं क्योंकि वहां पार्टी विपक्ष में है, और वहां उस पार्टी के राज वाले प्रदेश की कामयाबी दिखाकर वोटरों को प्रभावित किया जा रहा है। खुद अपने-अपने प्रदेशों में सत्तारूढ़ पार्टियां अपनी सरकारों के खर्चों से अंधाधुंध चुनावी प्रचार करने में लगी हैं, और लोकतंत्र में यह सत्ता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, इस पर न चुनाव आयोग, न किसी और का कोई काबू है। यह पूरा सिलसिला वोटरों और मीडिया को सत्ता के असर के सैलाब में बहा देने का है। साथ ही इस हड़बड़ी का सुबूत भी है कि पांच बरस के किए-कराए पर सरकार को खुद ही अधिक भरोसा नहीं है, और आज वह जनता के पैसों को इस तरह, इस हद तक झोंक रही है। 

ऐसे में नितिन गडकरी जैसे नेता की बात मायने रखती है कि वे न पोस्टर छपवाएंगे, न लोगों को कुछ खिलाएंगे-पिलाएंगे। कम से कम एक बड़े नेता ने तो ऐसा नैतिक साहस दिखाया है, कि उसके अपने चेहरे को कदम-कदम पर चिपकाने के बजाय काम ऐसा करके दिखाए कि जिसे पूरा देश देखे, जिसकी पूरे देश में तारीफ हो। और जो बात उन्होंने पहले कही थी वह भी एकदम सही है कि वोटर पैसे और सामान तो सबसे ले लेते हैं, लेकिन वोट उसी को देते हैं जिसे देना चाहिए। इस बात को बाकी लोगों को भी याद रखना चाहिए कि अगर आपके काम कामयाब हैं, तो फिर आपको कदम-कदम पर अपने पोस्टर लगाने की जरूरत नहीं है, हर टीवी चैनल पर दिन भर छाए रहने, हर अखबार में अपने कई पन्ने छपवाने की जरूरत नहीं है। लेकिन जहां काम में कमजोरी रहती है, वहां पर फिर लोग अंधाधुंध सहारा ढूंढने लगते हैं, और अभी तो चुनाव कई हफ्ते दूर है, और बदहवासी का यह आलम चारों तरफ छा चुका है। 

केन्द्र और राज्य सरकारों के इश्तहार देने, प्रचार करने की मर्जी पर कोई कानूनी काबू नहीं है। दिल्ली में जब केजरीवाल सरकार ने एक सार्वजनिक योजना में केन्द्र सरकार के साथ राज्य की तरफ से रकम देने से मना कर दिया, तो अभी कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से उसके दिए जा रहे विज्ञापनों का हिसाब मांगा। अब ऐसा लगता है कि चुनाव के वक्त सरकारों के विज्ञापनों के खर्च को लेकर किसी तरह के कोई नियम बनने चाहिए ताकि अखबार और टीवी चैनलों में से जो लोग अपनी आत्मा बेचना न चाहें, वे भी मुकाबले में कहीं टिक सकें। चुनाव प्रचार के दौरान उम्मीदवारों के खर्च पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग कहने को तो देश भर से बड़े-बड़े अफसरों को खर्च-पर्यवेक्षक बनाकर भेजता है, लेकिन पूरे प्रदेश को पता रहता है कि किस-किस बड़े नेता की सीट पर सीमा से सौ-सौ गुना अधिक खर्च होने जा रहा है। यह खर्च अगर किसी को नहीं दिखता है, तो वह सिर्फ चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक को नहीं दिखता। यह नौबत भी बदलनी चाहिए क्योंकि खर्च की ऐसी सुनामी के सामने किसी ईमानदार उम्मीदवार के पांव नहीं टिक सकते। चुनाव का वक्त लोगों की जुबानी हिंसा का भी रहता है, और इसके साथ-साथ सरकारी पैसों, और निजी कालेधन के हिंसक इस्तेमाल का भी रहता है। इसका क्या इलाज निकाला जा सकता है जनता को भी सोचना चाहिए, क्योंकि चुनाव आयोग तो अब सरकार के किसी विभाग की तरह हो गए हैं, जो कि नेता के मातहत उसकी मर्जी का काम करते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

 

धरती पर जिंदा हैं दूसरे ग्रह के प्राणियों सरीखे भी कुछ इंसान

 1 अक्टूबर 2023

 

दक्षिण अमरीकी देश उरुग्वे का दिल को छू लेने वाला एक समाचार है जहां मारिया नाम की 29 बरस की एक शिक्षिका अपने स्कूली बच्चों को पढ़ाने के लिए हर दिन दो सौ किलोमीटर से ज्यादा का सफर करती है। और यह सफर कार से करना आसान नहीं है क्योंकि वह बहुत महंगा पड़ेगा, दुपहिया से आना-जाना आसान नहीं है क्योंकि वह खतरनाक होगा, गांवों के इलाकों में सडक़ें बहुत खराब हैं। वह आती-जाती गाडिय़ों से लिफ्ट लेकर आती-जाती है। अपने घर से 108 किलोमीटर दूर इस स्कूल आने-जाने के लिए उसे कई गाडिय़ां बदलनी पड़ती हैं, सडक़ किनारे रूककर अगली गाड़ी का रास्ता देखना पड़ता है, उनसे अपील करनी पड़ती है, और कुछ लोग मददगार निकलते हैं तो वह स्कूल पहुंच पाती है। उसके पास कार है भी नहीं, और होती तो भी वह उसके ईंधन का खर्च नहीं उठा पातीं। स्कूल पहुंचने पर उसे कुल दो बच्चे पढ़ाने होते हैं क्योंकि वहां वे ही दो बच्चे हैं। चार बरस की जूलियाना, और 9 बरस का बेंजामिन। ये दोनों बच्चे ग्रामीण मजदूरों के बच्चे हैं, और अगर मारिया उन्हें पढ़ाने नहीं पहुंचेगी तो उनकी पढ़ाई का और कोई जरिया नहीं होगा। हर दिन टुकड़े-टुकड़े में उसका सफर जाते हुए दो घंटे, और आते हुए दो घंटे का होता है, और बाकी वक्त स्कूल में पढ़ाना। 

इसे देखकर कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक शिक्षिका की सोशल मीडिया पर आई तस्वीर याद पड़ती है। बस्तर के पत्रकार तामेश्वर सिन्हा ने लक्ष्मी नेताम नाम की एक सहायक शिक्षक की फोटो ट्विटर पर पोस्ट की थी जो पिछले 15 बरस से एक खतरनाक नदी को पार करके, कमर से ऊपर तक भीगकर अपनी प्राइमरी स्कूल पहुंचती हैं, और बच्चों को पढ़ाती हैं। 

ऐसे कुछ और लोग भी अलग-अलग विभागों में होंगे, अलग-अलग देशों या प्रदेशों में होंगे, जो कि अपने काम को ही किसी धार्मिक रस्म रिवाज, या मान्यता की तरह पूरा करते होंगे, लगातार समर्पित रहते होंगे। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान जैसे देश में सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा कामचोरी और भ्रष्टाचार के लिए जाना जाता है, और थोड़ा-बहुत जो काम होता भी है, वह उसी घटिया क्वालिटी का होता है जिस घटिया क्वालिटी का सामान सरकारें खरीदती हैं। हमारे आसपास हर दिन ऐसी अनगिनत खबरें छपती हैं, जिनमें करोड़ों रूपए लगाकर सरकारों और म्युनिसिपलों ने गैरजरूरी काम करवाए, फिजूल के सामान खरीदे, और बिना एक दिन भी इस्तेमाल हुए वे पड़े-पड़े खराब हो गए, खत्म हो गए। सरकारों में मानो किसी की कोई जवाबदेही ही नहीं रह गई है, और कितनी बातों को लेकर कोई अदालत जा सकते हैं? और अदालतें सरकार तो चला नहीं सकतीं, इनको चलाने का जिम्मा और उसका हक तो निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को ही है जो कि सरकारी अफसर-कर्मचारी के साथ मिलकर गब्बर का गिरोह चलाए जैसे काम कर रहे हैं। 

ऐसे में लगता है कि उरुग्वे की वह टीचर, या बस्तर की यह शिक्षिका, इनकी मेहनत करने, अपनी जिंदगी को जिम्मेदारी के लिए समर्पित कर देने की प्रेरणा आती कहां से है? जब चारों तरफ भ्रष्टाचार और नालायकी का अंधेरा छाया हुआ हो, तब कोई इंसान इतनी समर्पित भावना से काम कैसे करते रह सकते हैं? यह बात हैरान भी करती है, और परेशान भी करती है। 

आज ही सुबह की एक दूसरी खबर है कि झारखंड में स्कूली बच्चों के मां-बाप स्कूल में शिक्षकों की मांग को लेकर जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे हैं। खुद सरकार के आंकड़े बताते हैं कि एक तिहाई सरकारी स्कूलें ऐसी हैं जहां पर कुल एक शिक्षक है। मां-बाप का कहना है कि पांचवीं में पढऩे वाले बच्चे भी लिख-पढ़ नहीं पाते हैं, ऐसे में वे ऐसी स्कूलों से पढक़र निकलने के बाद भी मजदूरी करने के अलावा किसी काम के नहीं रहेंगे। अब इसे क्या कहा जाए? यह तो खुद झारखंड के ही आदिवासी नेताओं की चलाई जा रही सरकार है जिन पर सैकड़ों करोड़ के भ्रष्टाचार के मामले भी चल रहे हैं। जाहिर है कि अगर इतने बड़े भ्रष्टाचार किए गए हैं, तो उन्हें करने में भी सरकार चला रहे लोगों का वक्त लगा होगा, और फिर काली कमाई को बचाने और ठिकाने लगाने में भी मेहनत करनी पड़ती होगी। ऐसे में सरकारी काम करने के लिए अगर वक्त और ताकत नहीं बच रहे हैं, तो इसमें भी हैरानी की कोई बात नहीं है। 

छोटे-छोटे शिक्षकों, किसी गांव-देहात में काम कर रहे समर्पित सरकारी डॉक्टर, और ऐसे ही इक्का-दुक्का दूसरे लोगों को देखकर लगता है कि दुनिया इन्हीं, और ऐसे ही लोगों के कंधों पर चल रही है, बाकी बड़े-बड़े लोगों के कंधे अपनी काली कमाई के बोरों को लादे हुए चल रहे हैं, और वे जनता का बोझ ढोने के लिए खाली नहीं हैं। भारत के किसी भी औसत प्रदेश में अधिकतर जगहों पर सरकार और म्युनिसिपल, पंचायत और दूसरे दफ्तरों का हाल इतना खराब है कि कहीं भी लोग ईमानदारी की उम्मीद भी नहीं करते हैं। सबको मालूम है कि कितने सरकारी बजट में कितना हिस्सा लूटपाट में जाएगा। पटवारी से लेकर कलेक्टर तक के दफ्तर पहुंचने वाले लोगों को यह मालूम रहता है कि किस काम के लिए उन्हें कितनी रिश्वत का इंतजाम करके जाना है।
 
ऐसे में अपना दिल बहलाने के लिए हम उरुग्वे और बस्तर की इन शिक्षिकाओं की कहानियों को दूसरे ग्रह से आए हुए लोगों की कहानियों की तरह पढ़ते हैं, सुनते हैं, और सुनाते हैं। इनका कम से कम हिन्दुस्तान जैसे देश के सरकारी इंतजाम से कोसों दूर का भी कोई रिश्ता नहीं है। और लोग जिस उत्सुकता और दिलचस्पी से दूसरे ग्रह के प्राणियों और उडऩ तश्तरियों के बारे में पढ़ते हैं, उसी दिलचस्पी से गांधी सरीखे ईमानदार इन छोटे-छोटे कर्मचारियों के बारे में पढऩा चाहिए, और उन्हें प्रणाम करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 अक्टूबर 2023


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