दीवारों पर लिक्खा है, 9 अक्टूबर 2023


 (Daily Chhattisgarh)

जख्मी इजराइल से हमदर्दी तो ठीक है, लेकिन इससे जुड़े बहुत से और भी मुद्दे

9 अक्टूबर 2023  

    

इजराइल पर हमास के हमले के जवाब में इजराइल के गाजापट्टी पर इजराइल का हमला भयानक है। हमास तो फिलीस्तीन में बसा हुआ एक आतंकी संगठन है, जो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है, और जिसे दुनिया आतंकी संगठन ही मानती है, लेकिन इजराइल तो संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य देश है, जो कि दुनिया के बाकी देशों के साथ कूटनीतिक संबंधों वाला भी है। इसलिए उसकी कार्रवाई एक देश की कार्रवाई की तरह होनी चाहिए। आज वह हमास के आतंकी ठिकानों पर हवाई हमलों के नाम पर गाजा के 20 लाख से अधिक आम नागरिकों की रिहायशी बस्तियों पर भी अंधाधुंध हमले कर रहा है, और मुस्लिम अरब देशों के खिलाफ जो पश्चिमी देश कई वजहों से एक रणनीति पर चलते हैं, वे आज इजराइल के साथ हैं जिसने हमास के आतंकी हमले में हजार-पांच सौ मौतें झेली हैं। उसने इसे अपने पर हमास की थोपी हुई जंग माना है, और हमास को तबाह करने का बीड़ा उठाया है। बार-बार पश्चिमी दुनिया इसकी 11 सितंबर के उस आतंकी हमले की मिसाल देते हुए चर्चा कर रही है जिसमें ओसामा-बिन-लादेन के विमानों ने न्यूयॉर्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर की इमारत में विमान घुसाकर उसे ध्वस्त कर दिया था। वह किसी देश पर आतंकी हमले के इतिहास की सबसे बड़ी मिसाल बना हुआ है, और इजराइल इसे अपने पर उसी किस्म का हमला मान रहा है। 

लेकिन हमास के इस आतंकी हमले के पीछे की वजहों को अनदेखा करके दुनिया किसी सुख-चैन के मुकाम पर नहीं पहुंच सकती। इजराइल की रोज की फौजी हुकूमत अगर फिलीस्तीन के लोगों को आए दिन मारती है, उन्हें अपनी ही जमीन पर इंसानों से गया-बीता बनाकर रखा है, तो उसकी हिंसक और आतंकी प्रतिक्रिया तो किसी न किसी दिन होनी ही थी। लेकिन एक देश के रूप में इजराइल की प्रतिक्रिया मुस्लिम अरब देशों के बीच यह फिक्र खड़ी करेगी कि एक मुस्लिम देश के बेकसूर नागरिकों पर दशकों से चली आ रही इजराइली आतंकी हिंसा को देखते हुए बाकी मुस्लिम देश चुप बैठे रहें कि फिलीस्तीन सरीखे गरीब और कमजोर मुस्लिम देश का साथ दें? इसलिए हमास का यह ताजा हमला सैकड़ों जिंदगियों को खत्म करने वाला तो है, लेकिन साथ-साथ यह दुनिया को एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर सकता है कि क्या फिलीस्तीनियों पर इजराइलियों का दशकों का रोजाना का हमला आगे भी अनदेखा किया जाना चाहिए? 

दुनिया के जो देश आज इजराइली मौतों को लेकर उसके साथ खड़े हैं, जिनमें हिन्दुस्तान भी एक है, उनकी प्रतिक्रिया बेकसूर फिलीस्तीनियों को हवाई हमले में मारने पर क्या होगी, यह भी देखना होगा। क्या ऐसा कोई फौजी हमला जायज हो सकता है जो आतंकी ठिकानों को खत्म करने के लिए किया बताया जा रहा हो, और जो आतंकियों और बेकसूर नागरिकों में कोई फर्क न करता हो? लोगों को याद होगा कि भारत ने भारत में एक आतंकी हमला करने के आरोप में पाकिस्तान पर एक सर्जिकल स्ट्राईक करने की बात कही थी, और कहा था कि यह आतंकियों के प्रशिक्षण केन्द्र पर किया गया हवाई हमला था। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने बताया था कि वहां पर कोई आतंकी प्रशिक्षण केन्द्र नहीं था, और हिन्दुस्तानी हवाई हमले में कोई मौत नहीं हुई, सिर्फ एक कौंवा मरा था। अब अगर हिन्दुस्तानी हवाई हमले में पाकिस्तान की किसी रिहायशी बस्ती के सैकड़ों लोग मारे गए होते, तो क्या वे मौतें जायज कही जातीं? 11 सितंबर के हमले के बाद अमरीका ने जिस तरह कई देशों पर हवाई हमले किए, अपनी फौज भेजी, वहां सत्ता पलट करवाया, उनसे किसका भला हुआ, खुद अमरीका का भी कोई फायदा उससे नहीं हुआ, और इन तमाम देशों से अमरीकी फौजों को पूरी नाकामयाबी के साथ छोडक़र जाना पड़ा। इसलिए किसी आतंकी हमले का बदला लेने के नाम पर जख्मी देश अगर दूसरे देश के बेकसूर लोगों पर हवाई हमला करता है, और आतंकियों को मारने के नाम पर सैकड़ों बेकसूर नागरिकों को मारता है, तो आज तो दुनिया के कई देश इजराइल को पूरी छूट देकर खड़े हुए हैं, लेकिन यह कौन से सभ्य लोकतंत्र का सुबूत है कि एक गरीब और लाचार देश में एक गुंडे देश के हवाई हमले से बेकसूर लाशें गिर रही हैं? अमरीका ने जब म्यांमार पर हुए आतंकी हमले का बदला लिया, तो उसने कई देशों में मरने वाले बेकसूर दसियों हजार लोगों के बारे में यही तर्क दिया था कि यह कोलैटरल डैमेज है, यानी गेहूं के साथ घुन पिस जाने की तरह। आज इजराइली हमलों में जो कोलैटरल मौतें हो रही हैं, वे फिर एक ऐसी पीढ़ी खड़ी करेंगी, जो अपने जीते-जी इजराइल से दुश्मनी भूल नहीं पाएगी। 

कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह सही मौका है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिलीस्तीन और इजराइल के झगड़े पर सोच-विचार होना चाहिए, और उसका एक शांतिपूर्ण समाधान निकालना चाहिए। फिलीस्तीनी लोग अपनी ही जमीन पर शरणार्थी बने हुए हैं, और उन्हें हर दिन बेदखल करके वहां इजराइली कॉलोनियां बनाने से दुनिया का यह हिस्सा कभी भी अमन-चैन नहीं देख पाएगा। पश्चिमी देश इजराइल के साथ खड़े हैं, लेकिन इस नौबत के पीछे इजराइल की जो हमलावर नीति दशकों से चली आ रही है, और जो लगातार फिलीस्तीनियों से जिंदा रहने का हक छीन रही है, उस बारे में इन देशों ने कभी कुछ नहीं किया, और फिलीस्तीनियों को इजराइली गुंडागर्दी और आतंक के रहम पर छोड़ रखा था। 

इजराइल जैसे महफूज और ताकतवर देश पर हुआ यह आतंकी हमला यह साफ करता है कि आतंक के लिए किसी देश की फौज जितनी ताकत नहीं लगती, बहुत कम ताकत से भी आतंकी हमले हो सकते हैं। इससे यह भी साबित होता है कि अधिकतर आतंकियों को दुनिया में कहीं न कहीं से मददगार भी हासिल हो सकते हैं। इसलिए तमाम देशों को अपनी-अपनी जमीन पर, या अपने पड़ोसियों के साथ कोई भी जुल्म करने के पहले याद रखना चाहिए कि जुल्म का जवाब बेकाबू और खतरनाक हो सकता है क्योंकि फौजें तो आत्मघाती नहीं होतीं, आतंकी आत्मघाती हो सकते हैं, अक्सर होते हैं। आज भी जो ताकतें इजराइल को खुली छूट देने की हिमायती हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि उनकी सारी ताकत सिर्फ फौजों के बदौलत हैं, वह ताकत आतंकी हमलों के मुकाबले नहीं हैं, और इजराइल में अभी-अभी यह साबित हुआ है। पूरी दुनिया में खुफिया निगरानी, सुरक्षा, और फौजी कार्रवाई की हर तरह की टेक्नालॉजी बेचने वाला दुनिया का यह बड़ा कारोबारी आज जिस तरह जख्मी पड़ा है, उससे उसकी बाजारू साख भी चौपट हुई होगी। इजराइल अपने शोकेस में ही नंगा हो गया है। फिलीस्तीनी जनता के रिहायशी इलाकों में उसका हमला यही बताता है कि वह बचाव में नाकामयाबी के बाद अब हमले की साख बचाकर रखना चाहता है। दुनिया को ऐसी तमाम बातों को समझना चाहिए, और मौके की नजाकत को समझते हुए फिलीस्तीनी मुद्दे का समाधान निकालना चाहिए। वरना दूसरे देशों के शोक संदेशों का कोई मतलब नहीं है। हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिजली की रफ्तार से इजराइल को अपनी हमदर्दी भेजी है। इससे अधिक लाशें मणिपुर में गिर जाने के बाद भी 75 दिनों तक उनका मुंह भी नहीं खुला था। इसलिए दुनिया की प्रतिक्रिया के शब्दों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 08 अक्टूबर, 2023



 

चुनाव जीतने देश-प्रदेश को ही दांव पर लगाने का खेल

8 अक्टूबर 2023  

    

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिसे रेवड़ी कहा है, और जिसे अलग-अलग राजनीतिक दल अपने-अपने कब्जे वाले राज्यों में जनकल्याणकारी कार्यक्रम कह रहे हैं, उस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। एक चर्चित वकील अश्विनी उपाध्याय बहुत से मुद्दों पर जनहित याचिकाएं लगाते रहते हैं, और उन्होंने चुनावी घोषणाओं के तहत राजनीतिक दलों द्वारा जनता को मुफ्त में दिए जाने वाले तोहफों के खिलाफ रोक लगाने की मांग सुप्रीम कोर्ट से की है। अदालत ने इसे लेकर राज्य सरकारों से पूछा है कि वे कर्ज लेकर चुनावी तोहफे क्यों बांट रहे हैं? अभी जिन पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें से मध्यप्रदेश, और राजस्थान सबसे अधिक कर्ज में डूबे हुए हैं। एमपी पर कर्ज 4 लाख करोड़ रूपए से अधिक हो गया है, और शिवराज सरकार ने अभी-अभी चार बार कर्ज लिया है। दूसरी तरफ राजस्थान में भी कर्ज 5.37 लाख करोड़ से अधिक हो गया है। आरबीआई की जानकारी के मुताबिक देश में पंजाब के बाद राजस्थान सबसे अधिक कर्ज में डूबा हुआ राज्य है। और ये दोनों राज्य अपनी जनता को क्या-क्या मुफ्त में दे रहे हैं, उसके दो-दो पेज के इश्तहार हर दिन छत्तीसगढ़ के अखबारों में भी छप रहे हैं जहां के लोग इन दोनों प्रदेशों के लिए वोट डालने वाले नहीं हैं।

अब सवाल यह उठता है कि अंग्रेजी में जिसे फ्रीबीज कहा जा रहा है, यह हिन्दी में रेवड़ी, मतदाताओं को सीधे फायदा पहुंचाने की इन घोषणाओं की सीमा क्या रहे? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद चाहे इसे रेवड़ी कहते रहें, उनकी सरकार की तरफ से भी लगातार ऐसी रियायतों और सहूलियतों की घोषणा की जा रही है। उनका शायद ही कोई बड़ा कार्यक्रम चुनावी राज्यों में ऐसा हो रहा हो जहां पर ये घोषणाएं न हों। आखिर भारत जैसे संघीय ढांचे में राज्यों के इस किस्म के फैसलों पर क्या कोई रोक लग सकती है? क्या यह रोक केन्द्र और राज्यों के किसी मिलेजुले फोरम पर तय हो सकती है? या क्या पार्टियों के आपसी संबंध इस हद तक कड़वे हो चुके हैं कि अब कोई भी सहमति सिर्फ किसी अदालती हुक्म से ही हो सकती है? लोगों को याद होगा कि मनमोहन सरकार के समय तक देश में एक योजना आयोग था जिसमें राज्य सरकारें जाकर अपने राज्य के हक और अपनी योजनाओं की चर्चा करती थीं, और देश के जाने-माने अर्थशास्त्री उन पर विचार-विमर्श करते थे। वह एक ऐसा मंच था जहां पर प्रदेशों को केन्द्र से किसी योजना को मंजूर करवाने के लिए, रकम पाने के लिए अपने मौजूदा फैसलों के बारे में जवाब भी देना होता था। आज हालत यह है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार केन्द्र सरकार की किसी सार्वजनिक परियोजना में अपना हिस्सा देने से मना कर रही है कि उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, तो सुप्रीम कोर्ट को केजरीवाल सरकार से हिसाब मांगना पड़ रहा है कि उसने विज्ञापनों पर कितना खर्च किया है। 

क्या आज मध्यप्रदेश और राजस्थान सरीखे जो राज्य चार-पांच लाख करोड़ रूपए के कर्ज में डूब गए हैं, उनसे भी देश में कोई यह हिसाब ले सकते हैं कि वे दूसरे राज्यों के आम मतदाताओं के सामने अपने राज्य के छोटे-छोटे फैसलों के महंगे इश्तहार क्यों कर रहे हैं? इससे मध्यप्रदेश या राजस्थान की जनता का क्या भला हो रहा है? या फिर चुनाव के बाद सरकार बना लेने वाले नेताओं को तमाम किस्म की मनमानी करने का हक मिल जाता है? राज्य की अर्थव्यवस्था को देखते हुए उसके बजट का कितना हिस्सा सरकारी अमले पर (स्थापना व्यय) करना चाहिए, कितना खर्च जनता को सीधे फायदे पहुंचाने वाले कामों पर, और कितना खर्च दीर्घकालीन ढांचागत योजनाओं पर करना चाहिए? क्या अब यह अनुपात भी अदालतें तय करेंगी? क्योंकि योजना आयोग जैसी संस्था को मोदी सरकार ने खत्म करके नीति आयोग नाम का एक छोटा सा दफ्तर छोड़ दिया है, जो कि राज्यों को कुछ समझाने की, उन्हें राय देने की कोई ताकत नहीं रखता। 

अब अगर देश में कुछ राज्य बंदरगाहों की वजह से, या खदानों की वजह से दूसरे राज्यों के मुकाबले अधिक संपन्न रहेंगे, तो क्या इन राज्यों को अपनी जनता को बेहिसाब सीधे फायदे पहुंचाने का हक रहेगा? या फिर जिस तरह कर्ज लेकर आज कुछ राज्य वोटरों को खुश करने में जुटे हुए हैं, क्या उसकी बेहिसाब आजादी राज्य सरकारों और राज्य की पार्टियों को होनी चाहिए? आखिर इसकी सीमा क्या होगी? क्या देश के अमीर और गरीब राज्यों के बीच बहुत बड़ा फासला राष्ट्रीय एकता के लिए नुकसानदेह नहीं होगा? क्या प्रदेशों में दस-बीस साल में पूरी होने वाली किसी बड़ी जनकल्याणकारी योजना पर कोई काम ही नहीं किया जाएगा कि उसके एवज में पांच बरस के भीतर होने वाले चुनावों में तो कोई फायदा मिल नहीं सकेगा? ऐसी कई बातें हैं। दिक्कत यह है कि आज देश में किसी भी तरह से चुनाव जीत लेना सबसे बड़ी चुनौती मान ली गई है। गरीबी से जीतना, अभाव से जीतना, बेरोजगारी और महंगाई से जीतना अहमियत नहीं रखता, सिर्फ चुनाव जीतना मायने रखता है। यह नौबत हिन्दुस्तान को गड्ढे में डाल रही है। जब सत्तारूढ़ पार्टियां अपने-अपने राज्य में जनता के खजाने का आखिरी सिक्का भी लुटा देने के बाद कर्ज लेकर जनता के तलुवे सहलाने में लग गई हैं, और यूपी-पंजाब की ऐसी सरकारी योजनाओं के इश्तहार दूर-दूर के प्रदेशों में छप रहे हैं, तो लोकतंत्र के नाम पर क्या इसकी आजादी भी दी जा सकती है, दी जानी चाहिए? 

एक बहुत बड़ा फैसला जिसे लुभाने वाला भी कहा जा सकता है, और रिटायर्ड सरकारी कर्मचारियों की भलाई का भी कहा जा सकता है, वह ओल्ड पेंशन स्कीम का है। हिमाचल चुनाव के पहले कांग्रेस ने इसकी घोषणा की थी, और चुनावी वायदा किया था, इस पहाड़ी राज्य में नौकरीपेशा लोग बहुत हैं, और कांग्रेस को इसका फायदा हुआ। इसके पहले वह अपने दूसरे राज्यों में इसकी घोषणा कर चुकी थी, और बाद में भी यह घोषणा जारी है। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि कांग्रेस के ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार मोंतेक सिंह अहलूवालिया ने ओल्ड पेंशन स्कीम के खतरे बताए थे, और कहा था कि इसमें देश डूब जाएगा। मनमोहन सिंह के समय नई पेंशन योजना लागू हुई, और उन्हीं की पार्टी की राज्य सरकारों ने इसे खारिज करते हुए कर्मचारियों को खुश करने के लिए पुरानी योजना को लागू किया है जिसका बोझ कोई भी अर्थव्यवस्था ढो नहीं पाएगी। 

हिन्दुस्तान और इसके प्रदेशों में बहुत सी पार्टियां और उनकी सरकारें चुनावों को ध्यान में रखकर इतने बुरे फैसले ले रही हैं कि इतने लोकतांत्रिक हक देश की अर्थव्यवस्था की नाकामयाबी की गारंटी सरीखे लग रहे हैं। देखते हैं सब कुछ बर्बाद होने में और कितने चुनाव लगेंगे। 

(Daily Chhattisgarh) 

इजराइल पर फिलीस्तीनी आतंकी संगठन हमास के हमले से उठे खतरे, और सबक

8 अक्टूबर 2023

 शनिवार सुबह फिलीस्तीन की गाजापट्टी से इजराइल पर अचानक एक बड़ा और अभूतपूर्व हमला हुआ। फिलीस्तीन अलग-अलग टुकड़ों में बंटा हुआ देश है जो देशकों से इजराइली हमलों का शिकार है। वहां के लोगों को बेदखल करके इजराइल वहां फौजी ताकत से अपने लोगों को जबर्दस्ती बसा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ दर्जन भर बार इजराइली फौजी कार्रवाईयों के खिलाफ प्रस्ताव देख चुका है लेकिन इजराइली गुंडागर्दी के पक्के साथी अमरीका सरीखे देश के वीटो के चलते संयुक्त राष्ट्र कभी भी फिलीस्तीनियों को कोई इंसाफ नहीं दे पाया। बल्कि अमरीका के अंतरराष्ट्रीय दबदबे के चलते फिलीस्तीन-इजराइल के आसपास के दूसरे देश भी कमजोर फिलीस्तीनियों की मदद नहीं कर पाते, और इजराइल उन्हें बंदूक की नोंक पर बेदखल करते हुए अपने लोगों को वहां बसाते चल रहा है। इस बरस अब तक दो सौ से ज्यादा फिलीस्तीनियों को इजराइल मार चुका है, और यहां यह गिनाना भी जरूरी है कि जवाबी हमलों में 30 इजराइली भी मारे गए हैं। दुनिया को समझने के लिए यह जरूरी है कि यह लड़ाई दिए और तूफान की है, अमरीकी गिरोहबंदी के साथ इजराइल की ताकत दुनिया के एक सबसे बड़े हमलावर की है, और कल फिलीस्तीनी जमीन से वहां पर काबिज एक आतंकी संगठन हमास ने इजराइल पर जो हमला किया है, वह एक किस्म से आत्मघाती है क्योंकि इसके जवाब में कुछ घंटों के भीतर इजराइल ने जिस तरह से हवाई हमले किए हैं, उससे बचाव का कोई जरिया गाजापट्टी के बेकसूर लोगों के पास नहीं है, और वहां फिलीस्तीनी सरकार का नहीं, हमास नाम के आतंकी संगठन का राज है। 

कल का हमला किसी ताजा घटना को लेकर नहीं था, दशकों से फिलीस्तीनियों पर जो इजराइली जुल्म किया जा रहा है, और जिससे उन्हें बचाने के लिए पूरी दुनिया में किसी के पास न कोई ताकत है, न कोई दिलचस्पी है। इस तरह लगातार पीढ़ी-दर-पीढ़ी बेमौत मरते हुए फिलीस्तीनियों को अब यह समझ आ चुका है कि वे सिर पर कफन बांधे बिना, और मौत की परवाह किए बिना अगर कोई हमला कर सकते हैं, तो इजराइल का नुकसान करने का वही एक जरिया है। फिलीस्तीन के अमन-पसंद लोगों से लेकर वहां के हमास सरीखे आतंकी संगठनों तक सबने यह मान लिया है कि दुनिया की कोई ताकत उन्हें इंसाफ नहीं दिला सकती क्योंकि अमरीका नाम का दुनिया का सबसे बड़ा गुंडा इजराइल के पीठ पर हाथ रखे खड़े रहता है। इसलिए अब निराश और हताश, हर किस्म के फिलीस्तीनी उम्मीदें छोड़ चुके हैं, और उनमें से अधिकतर लोग इजराइली फौजी ज्यादतियां झेलते रहते हैं, जिनकी रोज की जिंदगी भी इजराइली बंदूकों की नोंक पर है, जो अपने ही घर में बेघर कर दिए गए हैं। ऐसे में उनमें से एक तबका अगर आतंकी हमले को इंसाफ पाने का अकेला जरिया मान बैठा है, तो कल का हमला उन्हीं का किया हुआ, और उसी निराशा से उपजा हुआ हमला है। हमास ने इस हमले के साथ यह कहा कि अब बहुत हो चुका है, और अब और बर्दाश्त करने का कोई मतलब नहीं है। यहां पर यह लिखना भी प्रासंगिक होगा कि हमास ने इस हमले के बाद कहा है कि उसे ईरान का समर्थन हासिल है। और ईरान में जिस तरह जश्न मनाया जा रहा है, उससे लग रहा है कि ईरान खुलकर फिलीस्तीन और हमास का साथ दे रहा है। ईरान ने कहा है कि यह उत्पीडऩ झेल रहे फिलीस्तीनियों की मुहिम है जो उन्होंने अपने हक के लिए छेड़ी है। और ईरान ने इसे आत्मरक्षा बताते हुए मुस्लिम देशों से अपील की है कि वो फिलीस्तीनियों के हक का साथ दें। इस हमले के बाद फिलीस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास, जो कि हमास के खिलाफ हैं, उन्होंने कहा है कि फिलीस्तीनियों को यह हक है कि वे उनकी जमीन पर कब्जा करने वालों के खिलाफ अपना बचाव करें। हमास ने भी यही कहा है कि इस हमले का मकसद इजराइली कब्जे को रोकना है। हमास ने कहा कि वे लोग हमारे इलाकों पर रोज अपनी बस्तियां बना रहे हैं, हमारी जमीनें ले रहे हैं, हमारे लोगों को मार रहे हैं, लेकिन मिश्र, कतर, या संयुक्त राष्ट्र संघ की मध्यस्थता फिलीस्तीनियों के किसी काम नहीं आ रही है, और इजराइल को संदेश देने के लिए हमास ने यह हमला किया है। इजराइल जो कि पूरी दुनिया में जासूसी, खुफिया तकनीक, और हथियारों के लिए एक सबसे ताकतवर देश माना जाता है, जिसे आतंकविरोधी खुफिया कार्रवाई के लिए बदनाम देश समझा जाता है, उसे कल फिलीस्तीनी जमीन से हमास के लड़ाकों ने जिस तरह हाथ से बनाए रॉकेट चलाकर हवाई हमले से घेरा, और इजराइली चौकसी और सरहद को पार करते हुए जिस तरह समंदर और जमीन के रास्ते हमास के लड़ाके इजराइल में घुसे, वहां लोगों को मारा, हमले किए, और शायद दर्जनों लोगों का अपहरण करके लौटे हैं, वह इजराइल के लिए एक शर्मनाक कामयाबी भी है कि उसकी सारी विख्यात ताकत धरी रह गई। लेकिन जैसी कि उससे उम्मीद की जाती थी, अपने सैकड़ों लोगों को खोने के बाद उसने गाजापट्टी पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए, और हमास को खत्म करने के नाम पर रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया, और अभी तक के आंकड़े बतलाते हैं कि दोनों तरफ सैकड़ों लोग मारे गए हैं। इजराइल ने इसे अपने देश पर एक जंग करार दिया है, और उसका उसी तरह जवाब देने की बात कही है। दूसरी तरफ अमरीका और हिन्दुस्तान ने खुलकर इजराइल का साथ दिया है, और इसका एक मतलब यह भी है कि हमास के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर इजराइल अगर आज फिलीस्तीनी रिहायशी बस्तियों पर बम गिरा रहा है, तो इजराइल के हिमायती तमाम देश बेकसूर नागरिकों की ऐसी मौतों को जायज मानकर उसकी अनदेखी करने वाले हैं। 

दुनिया का यह छोटा सा हिस्सा बड़ी-बड़ी ताकतों की फौजी रणनीतियों का खिलौना भी बना हुआ है, और दुनिया के दो कट्टर धर्मों के लोगों के धार्मिक टकराव का मैदान भी। फिलीस्तीन पर महात्मा गांधी भी अपने वक्त काफी कुछ लिख गए थे, और उन्होंने बार-बार फिलीस्तीनियों के हक की वकालत की थी। हिन्दुस्तान में उदारीकरण के पहले तक सरकारें फिलीस्तीनियों के हक के साथ रहती थीं, और मनमोहन सिंह की सरकार के वक्त से भारत और इजराइल के कारोबारी रिश्तों ने भारत की विदेश नीति तय की थी। और मोदी सरकार के आने के बाद तो जाहिर है कि यह सरकार पूरी तरह इजराइल के साथ है। 

आज जब इन दोनों देशों में संघर्ष चल ही रहा है, हजारों जख्मियों का इलाज या तो चल रहा है, या इलाज उन्हें नसीब नहीं है, ऐसे में दुनिया को एक बार यह भी सोचना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के बार-बार के फैसले भी अगर फिलीस्तीनियों को हक नहीं दिला पा रहे हैं, और इजराइलियों की गुंडागर्दी को नहीं रोक पा रहे हैं, तो फिर क्या दुनिया का यह हिस्सा इजराइल के खिलाफ मुस्लिम देशों की कोई अभूतपूर्व एकजुटता देखेगा, या ईरान और इजराइल को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देगा? जो भी हो आज संयुक्त राष्ट्र चिकित्सा विज्ञान में पेनेसिलिन की तरह बेअसर हो चुका है, और यह दुनिया के लिए एक खतरनाक नौबत है। लाठी के दम पर ही जर, जोरू, जमीन, को कब्जाने की वह पुरानी व्यवस्था अगर 21वीं सदी में जारी रहना है, तो फिर देशों को लोकतांत्रिक होने की खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए। देशों को यह भी समझना चाहिए कि किसी एक देश, बिरादरी, या तबके को लगातार जुल्म का शिकार बनाने पर वह एक दिन दुनिया के सबसे अधिक लैस फौजी गुंडे पर भी हमला कर सकता है, और उसकी सारी ताकत को नाकामयाब साबित कर सकता है। इस बात से दुनिया के बाकी देशों और तबकों को भी सबक लेना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 7 अक्टूबर 2023


 (Daily Chhattisgarh)

ईरान की नर्गिस को नोबल शांति पुरस्कार की बड़ी अहमियत..

7 अक्टूबर 2023  

    

नोबल शांति पुरस्कार के लिए ईरान की एक महिला आंदोलनकारी नर्गिस मोहम्मदी का नाम घोषित किया गया है। वे वहां पर बरसों से जेल में बंद हैं क्योंकि सरकार उनके मुद्दे पसंद नहीं करती है। महिलाओं पर जुल्म के खिलाफ वे लड़ते रहती हैं, और अभी जो खबर आई है उसके मुताबिक ईरान की सरकार उन्हें 13 बार गिरफ्तार कर चुकी है, 5 बार उन्हें सजा सुनाई गई है, और 31 बरस की कैद से वे गुजर रही हैं। उनके दो बच्चे अपने पिता के साथ फ्रांस में रह रहे हैं, और मां 8 बरस से उनसे दूर जेल में बंद है, और वे बेटे-बेटियों से मिली भी नहीं हैं। ईरान में महिलाओं के हक की लड़ाई आसान नहीं है, क्योंकि वहां अपने आपको क्रांतिकारी कहने वाली इस्लामिक सरकार इस्लाम के एक कट्टर तौर-तरीकों से चलती है जिनमें महिलाओं के लिए हिजाब बांधकर रखना अनिवार्य है, और ऐसा न करने पर उनकी गिरफ्तारी हो सकती है, उन्हें जेल होती है, और ऐसी ही एक युवती की पिछले बरस कैद में संदिग्ध मौत हो गई थी, और उसके बाद से ईरान में आंदोलन भडक़ उठे थे। अभी भी ईरान की महिलाएं हिजाब के नियमों को तोड़ते हुए सार्वजनिक प्रदर्शन कर रही हैं, और सरकार पर यह तोहमत लग रही है कि उसने लड़कियों के बीच दहशत फैलाने के लिए लड़कियों के स्कूलों में रहस्यमय तरीके से गैस छोड़ी थी जिससे बहुत सी लड़कियां बीमार भी हुई थीं। ऐसी घटनाएं दर्जनों स्कूलों में अलग-अलग शहरों में हुई थीं, और यह माना जा रहा है कि सरकार के अलावा इसे और कोई नहीं करवा सकता था। 

आज नर्गिस मोहम्मदी को नोबल शांति पुरस्कार मिलना ईरान की तमाम आंदोलनकारी महिलाओं का सम्मान है। इतनी विपरीत परिस्थितियों में रहते हुए भी नर्गिस ने जेल में और कैदियों से बातचीत को दर्ज किया है, और उनकी लिखी एक किताब भी सामने आई है। वे ईरान में एक मानवाधिकार संगठन में काम कर रही थीं, और जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों की मदद करने के आरोप में उन्हें एक से अधिक बार सजा हुई है। फिलहाल वे 12 बरस की कैद काट रही हैं, और दूसरी कई सजाएं भी उन्हें सुनाई जा चुकी हैं। नर्गिस को मिला यह पुरस्कार दुनिया में महिलाओं की आजादी और उनके हक की लड़ाई का एक प्रतीकात्मक सम्मान है। ईरान और उसके समर्थक देश नोबल शांति पुरस्कार को पश्चिमी देशों के प्रभाव वाला पुरस्कार कह सकते हैं, लेकिन उससे इस सच्चाई पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि नोबल पुरस्कार कई बार दुनिया के कुछ बड़े शांतिपूर्ण संघर्षों और सामाजिक न्याय की लड़ाईयों की तरफ सबका ध्यान खींचते रहता है। 

यह भी कुछ अजीब सी बात है कि एक तरफ तो गांधी का नाम नोबल शांति पुरस्कार के लिए बार-बार लिस्ट में आया, लेकिन उन्हें कभी दिया नहीं गया। जब गांधी की हत्या हुई तो उसके बाद का नोबल शांति पुरस्कार किसी को भी नहीं दिया गया, क्योंकि बार-बार गांधी का नाम खारिज करने वाली नोबल शांति पुरस्कार कमेटी गांधी की हत्या से हिली हुई थी। दूसरी तरफ अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को बिना किसी चर्चा के, बिना किसी न्यायसंगत आधार के नोबल शांति पुरस्कार दे दिया गया था, जिससे वे खुद भी चौंक गए थे। और यह तथ्य तो इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है जिस वक्त उन्हें 2009 का नोबल शांति पुरस्कार मिला, उस वक्त उन्हीं के आदेशों से सात अलग-अलग देशों पर बम बरसाए गए थे। इनमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, लीबिया, यमन, सोमालिया, इराक, और सीरिया थे। एक सबसे अधिक बमबारी करने वाले अमरीकी राष्ट्रपति को भी शांति के लिए किसी योगदान के बिना नोबल शांति पुरस्कार दिया गया था। इससे परे भी कुछ और मौके रहे जब नोबल शांति पुरस्कार विवादों से घिरा रहा, लेकिन आज ईरान की महिला आंदोलनकारी को इसे देने की घोषणा दुनिया में संघर्षरत महिलाओं का सम्मान है, और उनके हक पर इस सम्मान से एक बार फिर चर्चा हो सकेगी, होगी। 

ईरान में महिलाओं की लड़ाई सिर्फ उस देश में महिलाओं के हक का मुद्दा नहीं है, बल्कि इस्लाम के नाम पर महिलाओं पर एक गैरबराबरी लादने वाले बहुत से देशों में महिलाओं पर चल रहे जुल्म की तरफ भी इससे ध्यान जाएगा। ऐसे देश अपने आपको कहीं लोकतांत्रिक कहते हैं, तो कहीं वे तालिबान के कब्जे वाले अफगानिस्तान की तरह के हैं, जहां लड़कियों से स्कूल जाने का हक भी छीन लिया गया है, और महिलाओं को काम करने की इजाजत भी नहीं है। आज अफगानिस्तान दुनिया के अधिकतर देशों के लिए इसी महिला-नीति की वजह से अछूत बना हुआ है, लेकिन अड़ा हुआ है। आज दुनिया के अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संगठन चाहकर भी अफगानिस्तान के जरूरतमंद लोगों की मदद नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि अफगानिस्तान महिलाओं को कोई अधिकार देना नहीं चाह रहा है, और इसके बिना दुनिया के देश उसे किसी तरह की मान्यता नहीं दे रहे, और अंतरराष्ट्रीय संगठन वहां काम नहीं कर पा रहे। 

ईरान की महिला आंदोलनकारी को कल घोषित नोबल शांति पुरस्कार दुनिया भर की महिलाओं के मुद्दों को उठाने वाला साबित होगा। दुनिया के इतिहास में ऐसी कुछ और महिलाएं भी रही हैं, और उनसे दुनिया भर की महिलाओं को हौसला मिला है। आज मोटेतौर पर महिलाओं के संघर्ष का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम महिलाओं तक सीमित है, और दुनिया को इस पर गौर करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

एक जनगणना ने सैकड़ों बरस से रूकी हुई बहस को जिंदा कर दिया है...

6 अक्टूबर 2023  

    

बिहार की जातीय जनगणना ने देश की हजारों बरस से चली आ रही व्यवस्था की चर्बी पर जोर डाला है। वे लोग भी अब जातीय व्यवस्था पर बात कर रहे हैं जो कि हजारों बरस से चली आ रही मनुवादी व्यवस्था के तहत फायदे की जगह पर थे, सवर्ण थे, दूसरों को कुचलने वाले तबकों के थे, और उस व्यवस्था से बहुत संतुष्ट भी थे। अब एकाएक उन्हें विशेषाधिकारों का यह फौलादी ढांचा चरमराते दिख रहा है, इसलिए उनकी बेचैनी बहुत अधिक है। वी.पी.सिंह के शब्दों में कहें तो जिन पैरों में चमड़े के तल्ले वाले जूते थे, और जिनके तले दूसरे कुचलते रहते थे, अब एकाएक उनके पैरों से जूते उतर गए हैं, और जूते गांठने वाले तबके जूते पहनने का हक मानने लगे हैं, तो एकाएक दहशत सरीखी हो गई है। इसका सबसे बड़ा नजारा सोशल मीडिया पर देखने मिल रहा है। 

कल तक के ट्विटर, और आज के एक्स नाम के माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म पर अंधाधुंध बहस चल रही है, और मनु के वंशज अपने तर्क दे रहे हैं, और मनु से जख्मी हुए तबके अपने तर्क। बिहार के जाति के आंकड़ों ने सोए हुए लोगों को जगा दिया है, और सबको अपने हक सूझ रहे हैं। जो लोग अब तक नाजायज हकों पर कब्जा करके बैठे हुए थे, वे अपनी आने वाली पीढिय़ों को सामाजिक न्याय मिलने की आशंका से भर गए हैं। लेकिन यह सिलसिला थमना अब उसी तरह मुश्किल है जिस तरह केदारनाथ, उत्तराखंड, हिमाचल, या अभी सिक्किम में पहाड़ी नदी उफान पर रहती है, ढलान की तरफ दौड़ती है, और उसे थामना नामुमकिन होता है। आज जाति व्यवस्था की इस पहाड़ी नदी के जंगली उफान से सबसे अधिक परेशान वे तबके हैं जिन्होंने इन नदियों के किनारे सवर्णों के मंदिर बनाए हुए थे, और दलित-आदिवासी के बाद अब ओबीसी जनजागरण से ये मंदिर ही सबसे पहले बह रहे हैं। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित बहुत से लोग इसे देश को बांटने वाला काम कह रहे हैं। और सोशल मीडिया पर उनके दसियों लाख भक्तजन भी इसी सोच को चारों तरफ फैला रहे हैं कि यह एक भारतविरोधी काम है। देश में जातीय जनगणना उसे टुकड़ों में बांट डालेगी। चूंकि राहुल गांधी ने इसे सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है, और पूरे देश में इसे करवाने की घोषणा की है, इसलिए यह हमला मोदी खेमे की तरफ से राहुल और इंडिया गठबंधन पर है। लेकिन जो हकीकत हजारों बरस के जुल्मों के बाद भी जमीन पर बनी हुई है, वह अगर अब तक खतरा नहीं बनी थी, अब तक वह गुलामी की हीनभावना की शिकार थी, तो आज महज गिनती हो जाने से वह कैसे खतरनाक हो सकती है? और मनुवादी व्यवस्था के तहत जिन दलितों को सबसे अधिक कुचला गया था, जिन आदिवासियों को रामकथाओं में बंदर बना दिया गया था, वे लोग अगर सवर्ण तबकों के लिए आज तक खतरा नहीं बने, तो आज एकाएक ओबीसी जनजागरण कैसे खतरा बन सकता है? लेकिन जिन लोगों को ये नए आंकड़े खतरा लग रहे हैं, उनकी आशंकाओं में भी झांका जा सकता है। 

दलित और आदिवासी आरक्षण देश की आजादी के आसपास से चले आ रहा था, और वे तबके सवर्ण तबकों से बहुत दूर भी थे, सवर्ण-बेइंसाफी के शिकार होकर कमजोर भी थे, और उनके लिए तय किए गए आरक्षण से भी उनका बहुत भला नहीं हो रहा था। लेकिन ओबीसी तबका तो दलित और आदिवासी के ठीक ऊपर है, और सवर्णों के ठीक नीचे है। इसलिए ओबीसी से सवर्ण सोच को खतरा पड़ोसी से खतरे सरीखा हो रहा है। और दलित-
आदिवासी से खतरा दूर की चमार बस्ती या जंगल में बसे लोगों से खतरे सरीखा दूर का था। अब ओबीसी तबका आरक्षण के मौजूदा, और आगे हो सकने वाले आरक्षणों का फायदा उठाने के लिए अधिक ताकतवर रहेगा, और वह हर किस्म से सवर्णों को टक्कर देने के करीब रहेगा। इसलिए जाति आधारित यह जनगणना सवर्ण-बेचैनी की एक बड़ी वजह है। दलित और आदिवासी आरक्षण तो चले आ रहा था, यह ओबीसी तबका देश का सबसे बड़ा बवाल रहेगा, और संसद और विधानसभाओं में आरक्षण की बात जब होगी, तो यह ओबीसी तबका ही अब तक के अनारक्षित चले आ रहे बहुत बड़े उस हिस्से में सबसे बड़ा हिस्सा मांगेगा जिस पर अब तक अनुपातहीन तरीके से सवर्णों का कब्जा चले आ रहा है। यह नौबत, या इस तरह की नौबत पूरी दुनिया में कहीं भी हमेशा नहीं चलती है, और वंचित तबके कभी न कभी अपने हक पाते हैं। इसलिए भारत में आज मनुवाद की सवर्ण व्यवस्था के सबसे बड़े संरक्षक, आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत को भी अब यह लग रहा है कि आरक्षण और सौ-दो सौ बरस जारी रह जाए तो सवर्णों को उससे बर्दाश्त करना चाहिए। हालांकि मोहन भागवत का यह ताजा चर्चित बयान बिहार की जातीय जनगणना के पहले का है, और वह मोटेतौर पर ओबीसी से जुड़ा हुआ नहीं है, लेकिन अब जब ओबीसी के दानवाकार आंकड़े एक हकीकत बनकर सामने आए हैं, तो मोहन भागवत का बयान शायद उस पर भी लागू होना चाहिए। 

देश में सवर्ण तबके की हड़बड़ाहट और दहशत नाजायज और गैरजरूरी है। अवसरों पर उनका एकाधिकार ही नाजायज था, और अब अगर वह टूट रहा है, तो उसे लेकर सच्चाई को मानने की कोशिश करनी चाहिए, और यह मान लेना चाहिए कि लोकतंत्र में आज एक नई सामाजिक चेतना आई है, और सदियों से चले आ रही सामाजिक बेइंसाफी के दिन अब लद गए हैं। आने वाला वक्त एक-एक करके तमाम प्रदेशों, या पूरे देश में जातीय जनगणना का रहेगा, और अब तक के सवर्ण-कुलीन तबकों को, अपने लिए अवसरों के खुले मैदान का बड़ा हिस्सा छोडऩा पड़ेगा। स्कूल-कॉलेज से लेकर नौकरियों और संसद-विधानसभा तक सभी जगहों पर कुछ तबकों को कुर्सियां खाली करनी पड़ेंगी, और सदियों से खड़े हुए कुछ लोगों को बैठने की जगह मिलेगी। फिलहाल यह भी एक अच्छी बात है कि जातियों के आंकड़ों को लेकर लोगों के बीच सामाजिक हकीकत की लंबी और आक्रामक बहस चल रही है, और इससे अन्याय का इतिहास सामने आने का मौका मिलेगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 6 अक्टूबर 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दरबारी-चापलूस मीडिया के युग में खटकता खरा और ईमानदार मीडिया..

5 अक्टूबर 2023  

   

भारत की एक समाचार-विचार वेबसाइट, न्यूजक्लिक को लेकर सरकार पिछले कई महीनों से एक जांच चला रही थी। सरकार का कहना है कि इसमें विदेशी पूंजीनिवेश के नियमों को तोड़ा गया है। यह मामला वैसे ही जांच एजेंसियों और अदालत तक पहुंचा हुआ था, लेकिन दो दिन पहले दिल्ली में इससे जुड़े हुए वेतनभोगी, और बाहरी पत्रकारों पर पुलिस के जो छापे पड़े वे हक्का-बक्का करने वाले हैं। करीब 30 लोगों पर सुबह-सुबह छापे पड़े, और उनके लैपटॉप, मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए, उनसे सुबह से शाम तक पूछताछ चलती रही। पत्रकारों को तो शाम तक छोड़ दिया गया, लेकिन इस वेबसाइट के संचालक एक दूसरे बड़े अफसर को पुलिस ने शाम तक गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी आतंकविरोधी एक कड़े कानून, यूएपीए के तहत की गई है जिसमें जमानत होने में महीनों और बरसों तक लग जाते हैं। यूएपीए कानून का पहले भी बेजा इस्तेमाल होने का आरोप लगाते हुए पत्रकार इसे हटाने की मांग कर रहे थे, और मानवाधिकार आंदोलनकारी इसे कुचलने का एक अधिकार मान रहे थे। मोदी सरकार का रूख मीडिया को लेकर, खासकर असहमत मीडिया को लेकर कुछ अधिक ही कड़ा है, और आज देश का मीडिया दो खेमों में बंट गया है, सरकार, खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रशंसकों का मीडिया देश में गोदी मीडिया कहा जाता है, और बाकी बचा छोटा सा हिस्सा मीडिया कहा जा सकता है जिस पर तरह-तरह की जांच एजेंसियां अभी टूट पड़ी हैं, और लंबे समय से यही सिलसिला चल रहा है। 

लेकिन अभी न्यूजक्लिक के मामले को लेकर पत्रकारों की जो प्रतिक्रिया सामने आई है वह लोकतंत्र के लिए खतरे के सुबूत सरीखा है। बहुत से मीडिया संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को कल एक लंबी चिट्ठी लिखकर मीडिया पर हो रहे सरकारी हमलों की तरफ उनका ध्यान खींचा है, और उनसे दखल देने की उम्मीद की है। मीडिया से जुड़े हुए तमाम प्रतिष्ठित संगठनों ने इन छापों को सरकारी आतंक करार दिया है, और कहा है कि किसी संस्थान के दर्जनों पत्रकारों पर आतंक में शामिल होने का आरोप लगाना बहुत ही नाजायज बात है, और यह मीडिया को कुचलने के अलावा और कुछ नहीं है। दो दिन पहले के इन छापों को बड़ी मनमानी का एक बड़ा सुबूत करार दिया गया है, और याद दिलाया गया है कि दुनिया में प्रेस की आजादी की 180 देशों की लिस्ट में भारत 161वीं जगह पर पहुंच गया है। 2002 में भारत इस लिस्ट में 150वीं जगह पर था। मीडिया संगठनों ने पिछले दो दिनों में इस बात को उठाया है कि पिछले कुछ बरसों में लगातार ऐसे मीडिया संस्थानों पर सरकारी एजेंसियों की छापेमारी हुई है जिन्होंने जायज वजहों से भी केन्द्र सरकार की आलोचना की थी। 

किसी लोकतंत्र में मीडिया आजाद नहीं रह सकता अगर देश के कुछ सबसे बड़े कारोबारी हजारों करोड़ रूपए डालकर रातोंरात मीडिया कारोबारी बन जाते हैं। इसके बाद केन्द्र या राज्य सरकारों के लिए यह आसान हो जाता है कि वे अपने-अपने प्रभाव और अधिकार क्षेत्र में बाकी मीडिया संस्थानों को खरीदकर, या कुचलकर काबू में कर लें। यह नौबत देश के कुछ प्रदेशों में भी है, लेकिन केन्द्र सरकार इस पैमाने पर बहुत ऊपर साबित हो रही है। दरअसल कोई भी सरकार जब चुनावों में अपार बहुमत पाकर सत्ता पर आती है, वह लगातार सत्ता पर बनी रहती है, तो उसे आलोचना, जरा सी भी आलोचना बहुत खटकने लगती है। उसे लगता है कि यह आलोचना उसे मिले जनसमर्थन का नोटिस नहीं ले रही है। एक बड़े टीवी समाचार चैनल के पिछले दिनों भोपाल में हुए कार्यक्रम में एक लोकगायिका नेहा सिंह राठौर से मंच पर ही चैनल की एंकर बहस कर रही थी कि जो नेता लाखों वोटों की लीड से जीतकर आते हैं, उनकी आलोचना कैसे की जा सकती है? सफलता चाहे वह किसी भी तरीके से, किसी भी कीमत पर पाई गई हो, वह सिर चढ़ती ही है। और फिर जब गोदी मीडिया, भक्त मीडिया, चापलूस मीडिया की बड़ी मौजूदगी आसपास हो, तो फिर सत्ता को यह बात और खटकती है कि कुछ गिने-चुने बचे हुए लोग किस तरह उसके खिलाफ हो सकते हैं? 

जब देश में लोकतंत्र इतना कमजोर हो जाए कि जनधारणा की किसी सरकार को परवाह न रह जाए, जब नेता अपने आपमें आत्ममोहन के शिकार हों, जब चापलूसों और दरबारियों की भीड़ हो, तो फिर आलोचना करने वाले मीडिया को कुचलना आसान हो जाता है। और ऐसे वक्त समझ आता है कि देश में अलोकतांत्रिक कानूनों की मौजूदगी सबसे पहले आजादी के हिमायती लोगों को कुचलने के काम ही आती है। इसलिए यह भी समझने की जरूरत है कि ऐसी नौबत आने के पहले भी देश में आतंक के नाम पर चलाए जा रहे उन अलोकतांत्रिक कानूनों को खत्म करवाना चाहिए जो लोगों को बिना किसी सुनवाई बरसों तक कैद रखने के लिए लगातार इस्तेमाल किए जाते हैं। कुछ बहुत चर्चित मामले हों, जिनमें कुछ बड़े वकील बिना फीस लिए शामिल हो जाएं, तो भी जमानत होने में बरसों लग जा रहे हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने अभी कुछ अरसा पहले लोकतंत्र में मीडिया की आजादी की अहमियत पर काफी कुछ कहा था। अभी कल मीडिया संगठनों ने मुख्य न्यायाधीश को लिखी खुली चिट्ठी में उनकी कही हुई बातें याद दिलाई हैं। सुप्रीम कोर्ट की दखल से कम, और किसी चीज से सरकारी मनमानी कार्रवाई पर कोई रोक लगते दिख नहीं रही है। यह ऐसा मौका है जब अदालत को हालात को असाधारण मानते हुए कुछ असाधारण कार्रवाई करनी चाहिए, सरकार से जवाब-तलब करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)