सरकारों में गजब का संगठित भ्रष्टाचार, और एक नई पहल की जरूरत

05 मार्च 2025 

 

छत्तीसगढ़ विधानसभा में सरकार तो भाजपा की है, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक ही अनगिनत मामले उठा रहे हैं जिनमें सरकार के स्तर पर बड़ा भ्रष्टाचार हुआ है। इनमें से कुछ मामले पिछले सवा साल के भाजपा सरकार के कार्यकाल के हैं, लेकिन अधिकतर मामले पिछली कांग्रेस सरकार के समय के हैं, जिन्हें लेकर कांग्रेस विधायकों की बोलती बंद रहती है क्योंकि उन्हीं की सरकार के चलते यह सब भ्रष्टाचार हुआ था। लेकिन ऐसा एक सबसे बड़ा संगठित अपराध सरकार को सबसे बड़ा चूना लगाने वाला कल विधानसभा में खूब उठाया गया, और उसके बाद सरकार को अपने एक डिप्टी कलेक्टर को सस्पेंड करना पड़ा। रायपुर जिले के ही अभनपुर इलाके में केन्द्र सरकार के भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत रायपुर-विशाखापट्टनम के बीच बन रहे इकॉनॉमिक कॉरीडोर के लिए किसानों की जमीन ली गई थी। 2019 में कांग्रेस सरकार के दौरान किसानों की जमीनों के सरकारी रिकॉर्ड में कई-कई टुकड़े कर दिए गए, और इन्हें अलग-अलग नामों से चढ़ा दिया गया। छोटे टुकड़ों का मुआवजा अधिक रेट पर मिलता है, और जिन जमीनों का कुल 35 करोड़ रूपए मुआवजा बनना था, उसे बढ़ाकर सवा तीन सौ करोड़ से ऊपर पहुंचा दिया गया। सरकारी अफसर ने बाकी अमले के साथ मिलकर संगठित रूप से यह भ्रष्टाचार किया था, और चर्चा यह भी थी कि इसमें दूसरे बहुत से नेता और अफसर शामिल थे। 32 टुकड़ों को 247 छोटे टुकड़ों में बांटकर केन्द्र सरकार को ढाई सौ करोड़ से अधिक का चूना लगाया गया था, और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत ने इस मामले को उठाया था। विधानसभा में यह जानकारी आई कि केन्द्र सरकार के राष्ट्रीय सडक़ प्राधिकरण ने रायपुर कलेक्टर से इसकी रिपोर्ट मांगी थी जिसमें यह साजिश उजागर हुई। इसके आधार पर राज्य सरकार ने उस वक्त के प्रभारी डिप्टी कलेक्टर को सस्पेंड किया है। इसी के साथ-साथ कुछ और दूसरे भ्रष्टाचार भी सामने आए हैं, और इनमें से एक बस्तर के घोर नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले का मामला है जहां पर बैंक सुविधा कम रहने से आदिवासियों को तेन्दूपत्ता का भुगतान नगद करने की खास छूट है, और वहां वन विभाग ने जिले के सबसे बड़े अफसर, डीएफओ की अगुवाई में करोड़ों की संगठित लूट की है। इस मामले में अखिल भारतीय वन सेवा के अफसर, डीएफओ को सस्पेंड किया गया है, जो कि इस स्तर के अधिकारी के साथ कभी-कभार ही होने वाली बात है। एक तीसरा मामला अभी विधानसभा में उठा ही है कि प्रदेश में जिस जशपुर जिले को नागलोक कहा जाता है, वहां से भी अधिक सांप काटने से मौत के मामले बिलासपुर में दर्ज किए गए हैं, और विधायकों का कहना है कि इनमें बड़ी संख्या में फर्जी मामले हैं।

भ्रष्टाचार छत्तीसगढ़ सरकार की रग-रग में समाया हुआ है। खासकर पिछले पांच बरस की कांग्रेस सरकार के दौरान जितना संगठित भ्रष्टाचार हुआ है, और जिनमें से बहुत से मामले जांच एजेंसियों के मार्फत अभी अदालतों में चल रहे हैं, उन्हें देखना भयानक है। बहुत पहले देश के एक सबसे चर्चित व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा था कि एक बार कोई व्यक्ति अदालत पहुंच जाए, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने आपको अपने वकील से बचाने की रहती है। इसी तरह आज के हालात देखें तो सरकार को सबसे बड़ी चुनौती अपने आपको अपने ही भ्रष्ट अफसरों और कर्मचारियों से बचाने की रहती है। जिनको सरकार से एक सुरक्षित नौकरी मिलती है, काम की सहूलियतें मिलती हैं, समाज में दबदबा मिलता है, वे ही लोग सरकार की हर योजना में पलीता लगाने में लगे रहते हैं। सरकारी अमले का भ्रष्टाचार इस हद तक संगठित रहता है कि सत्तारूढ़ पार्टी चाहे बदल जाए, सत्ता के दलाल वही के वही बने रहते हैं, और अफसर नए सत्तारूढ़ नेताओं को रातोंरात कमाई की संभावना बताकर उनके शुभचिंतक बन जाते हैं। यह सिलसिला खत्म होते नहीं दिखता है, किसी सरकार में यह कम रहता है, किसी में ज्यादा रहता है, लेकिन सरकारी अमले की खुली भागीदारी से चलने वाली संगठित साजिशें खत्म तो कभी नहीं होतीं। ऐसे में कल ही हमने छत्तीसगढ़ के बजट पर इसी जगह लिखा था कि सरकार को अपने ढांचे में निरंतर चलने वाले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एक निगरानी एजेंसी बनानी चाहिए जो कि संगठित भ्रष्टाचार और फिजूलखर्ची, बर्बादी और घटिया काम पर नजर रख सके, और बर्बादी होने के पहले ही सरकार को कार्रवाई सुझा सके।

अब केन्द्र सरकार की सडक़ योजना के लिए जमीन लेने की लागत को जिस अफसर और कर्मचारियों ने दस गुना पहुंचा दिया, उन्हें जरा सा भी डर नहीं लगा। करीब ढाई सौ करोड़ के घोटाले का यह मामला भूपेश सरकार के पहले ही साल का दिखाई पड़ रहा है। और ऐसा हो नहीं सकता कि सत्तारूढ़ नेताओं की भागीदारी के बिना इतना बड़ा भ्रष्टाचार कोई एक डिप्टी कलेक्टर अकेले कर ले। इसके पहले भी कई दूसरे जिलों में ऐसे मामले सामने आए हैं जब लोगों की निजी जमीन का अनिवार्य अधिग्रहण होना था, और उसके ठीक पहले उन जमीनों की कागजी खरीद-बिक्री दिखाकर, या पारिवारिक बंटवारा दिखाकर उनके छोटे-छोटे टुकड़े किए गए ताकि उनका कई गुना अधिक रेट से मुआवजा मिल सके। विधानसभा में तो अभी एक डिप्टी कलेक्टर को सस्पेंड किया है, लेकिन केन्द्र सरकार की जनसुविधा की इस महत्वाकांक्षी योजना को एक आपराधिक साजिश रचकर जिन लोगों ने भी फायदा उठाया है, वैसे दस-बीस और लोगों को भी जेल भेजना चाहिए, और उनकी जमीन-जायदाद की बिक्री करके एक ऐसी मिसाल कायम करना चाहिए कि आगे किसी और का ऐसा हौसला न हो। वैसे तो पिछले पांच बरस के भ्रष्टाचार के जितने मामले जांच एजेंसियों के रास्ते अदालतों में पहुंचे हुए हैं, उन्हें देखकर आज के सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों, नेताओं और सत्ता के दलालों का हौसला पस्त होना चाहिए क्योंकि दो-दो बरस से बड़े-बड़े आला अफसर और सत्ता की गोद में बैठे नेता-कारोबारी बिना जमानत जेल में पड़े हुए हैं, और उनकी सैकड़ों करोड़ की जमीन-जायदाद ईडी और आईटी में अटैच भी हो चुकी है। लेकिन जिनको इससे सबक न मिले, उन पर नजर रखने के लिए सरकार को आर्थिक अपराध और भ्रष्टाचार की एक नई निगरानी एजेंसी बनाना चाहिए क्योंकि आज की एसीबी-ईओडब्ल्यू यह काम करने में कामयाब नहीं हो पाई है। जो शिकायतें इन दो एजेंसियों के पास पहुंचती हैं उन्हीं पर कार्रवाई होती है, इसके साथ-साथ एक निगरानी एजेंसी भी चाहिए क्योंकि सरकार का पैसा लुट जाने के पहले ही उसका पता लगा सके। यह बात तो तय है कि सरकार में भ्रष्टाचार पानी पर तैरती जलकुंभी की तरह सबको दिखता है, सबको पता रहता है, और अगर इसे कोई अनदेखा करते हैं, तो वह सत्ता पर ऊपर बैठे लोग ही करते हैं। यह सिलसिला तोडऩा चाहिए, और जांच एजेंसी का काम शुरू होने के पहले ही निगरानी एजेंसी बनाकर उसे मजबूत करना चाहिए। आज लोगों का अंदाज यह है कि सरकारी खर्च का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार और घटिया सामान-निर्माण में बर्बाद होता है, एक मजबूत निगरानी एजेंसी बड़ा सस्ता सौदा होगी।

(Daily Chhattisgarh)

बजट में हर तबके के लिए कुछ न कुछ, लेकिन बजट के खर्च की निगरानी बहुत जरूरी...

  04 मार्च 2025 

 

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार का दूसरा बजट कल विधानसभा में पेश हुआ। एक सबसे नौजवान मंत्री, वित्त मंत्री ओपी चौधरी, शासन और प्रशासन दोनों की अच्छी जानकारी रखने वाले हैं, और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उन्हें बजट बनाने के लिए खुला हाथ भी दिया था। बजट में प्रदेश के तमाम वंचित, और जरूरतमंद तबकों के लिए बारीकी से कुछ न कुछ किया गया है, तो वह बजट पर एक आदिवासी मुख्यमंत्री की छाप भी दिखती है, जो ख़ुद वंचित बचपन से उठकर इस कुर्सी तक पहुँचा है। वित्त मंत्री ओपी चौधरी का पहला, और पिछला बजट तो कुल दो महीने की तैयारी का बजट था, लेकिन इस बार उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तर्ज पर शब्दों के प्रथमाक्षरों को लेकर एक ‘गति’ वाला बजट सामने रखा है, उनकी गति का मतलब सुशासन, तेज ढांचा विकास, टेक्नोलॉजी, और औद्योगिक विकास के अंग्रेजी शब्द हैं। इस बजट को एक नजर देखने से ऐसा लगता है कि राज्य के हर शहर-कस्बे, हर इलाके, हर तबके के लिए इसमें कुछ न कुछ दिया गया है।

हम अभी बजट की बारीकियों पर जाना नहीं चाहते क्योंकि वह लंबी लिस्ट कल से छपती चली जा रही है, लेकिन उसके एक खास पहलू पर खुलासे से चर्चा करना चाहते हैं। वित्त मंत्री ने रायपुर, नया रायपुर, दुर्ग-भिलाई, और राजनांदगांव के 800 से अधिक गांवों, और बीस शहर-कस्बों को मिलाकर स्टेट कैपिटल रीजन बनाने की बात कही है। हालांकि इस बार के बजट में इसके महज सर्वे और योजना के लिए कुल 5 करोड़ रुपए रखे हैं। यह देश की राजधानी के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की तर्ज पर छत्तीसगढ़ की राजधानी और उसके इर्द-गिर्द के एकमुश्त विकास की योजना है, जो बहुत महत्वाकांक्षी हो सकती है, और नया रायपुर योजना की तरह अनुपातहीन खर्चीली भी हो सकती है। प्रदेश की करीब एक तिहाई आबादी इस क्षेत्र में बसी हुई है, और इसके बाहर के भी दसियों लाख लोग हर दिन इस क्षेत्र में आते-जाते हैं। ऐसे में विधानसभा क्षेत्रों, संसदीय सीटों और म्युनिसिपल-पंचायतों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के तंग नजरिए से ऊपर उठकर अगर विशुद्ध योजनाशास्त्री के नजरिए से इस योजना को नहीं बनाया जाएगा, तो यह सत्तारूढ़ नेताओं की तुष्टिकरण का एक निरर्थक और भारी फिजूलखर्ची का सामान बन जाएगा। ऐसे किसी भी विशाल इलाके के जटिल विकास की दीर्घकालीन योजनाएं आसान नहीं होती हैं, और इन्हें किसी चुनिंदा योजनाशास्त्री को उपकृत करने के लिए उसे देने के बजाय देश के सबसे अच्छे योजनाशास्त्रियों को देना चाहिए। इसके लिए देश में शहरी विकास के जानकारों का एक सम्मेलन भी किया जाना चाहिए। हमने नया रायपुर का बेहद खर्चीला विकास देखा हुआ है जो कि हजारों करोड़ की लागत के बाद भी आज भी पांच-दस फीसदी भी इस्तेमाल नहीं हो रहा है।

सरकार को किसी भी ऐसे खर्च के पहले यह याद रखना चाहिए कि इस प्रदेश की जनता सरकारी धान खरीदी की वजह से आज खुशहाल दिख रही है, वरना यहां प्रति व्यक्ति आय बहुत कम दिखती। गऱीबों के हक़ के पैसों से विकराल आकार की योजना बनाने के पहले उसकी उपयोगिता और उत्पादकता तौल लेनी चाहिए। राज्य राजधानी क्षेत्र का मतलब राजनांदगांव से लेकर नया रायपुर तक एक मेट्रो की योजना भी होगी, और हो सकता है कि इसके लिए राज्य सरकार को रायपुर शहर के बीच स्काईवॉक नाम की अपनी अधूरी पड़ी हुई योजना को पूरा करने की जिद छोडऩा भी पड़े, क्योंकि शहर के बीचों-बीच बहुत ही सीमित उपयोग वाले ऐसे स्कॉईवॉक के बाद शहर के बीच से किसी तरह की मेट्रो शायद निकल नहीं पाएगी।

दूसरी बात हम पहले भी कई बार बजट के तुरंत बाद लिख चुके हैं कि बजट का एक छोटा सा हिस्सा राज्य सरकार को सरकारी अमले के भ्रष्टाचार, और प्रदेश में आर्थिक अपराधों की रोकथाम के लिए रखना चाहिए। इस बजट में इसका जिक्र तो दिख रहा है, लेकिन एक ऐसी एजेंसी की जरूरत है जो भ्रष्टाचार हो जाने के पहले ही खुफिया तंत्र और निगरानी से सरकार और जनता दोनों को सचेत कर सके। इसके बिना 1 लाख 65 हजार करोड़ रुपए के इस बजट का कितना हिस्सा भ्रष्टाचार, फिजूलखर्ची, और घटिया निर्माण में बर्बाद होगा, यह अंदाज लगाना बहुत मुश्किल भी नहीं है। हम अभी बजट के एक-एक काम की तुलना पिछली सरकारों के अलग-अलग बजट से नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार, और वित्त मंत्री ओपी चौधरी को ऐसी तरकीबें जरुर सोचना चाहिए कि जिस मद के लिए जितनी रकम रखी गई है, उस रकम का उस मद में अधिकतम इस्तेमाल हो सके, हम पिछले बरसों के सरकारी भ्रष्टाचार की कहानियां अखबारों में पढ़-पढक़र थक गए हैं। फिर यह बात भी सोचने लायक है कि जिस सरकारी अमले ने पिछले बरसों में परले दर्जे का यह भ्रष्टाचार किया था, वही अमला तो आज भी सरकार चला रहा है। भ्रष्टाचार की पुख्ता बिछी हुई पटरी पर ट्रेन दौड़ाना बहुत से लोगों के फायदे का काम हो सकता है, ऐसे लालच को रोककर इसी सरकारी अमले को, और राज्य की राजनीतिक संस्कृति को ईमानदार बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है, और इस लंबे-चौड़े बजट की कामयाबी इस चुनौती से पार पाए बिना नहीं हो सकेगी।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 मार्च 2025



 

आधुनिक विकास को पीछे धकेलने तिरुपति ले आया किसी शास्त्र की भावना!

  03 मार्च 2025 

 

देश के एक सबसे बड़े हिन्दू तीर्थ, तिरुपति ट्रस्ट की तरफ से केन्द्र सरकार से अनुरोध किया गया है कि इस मंदिर की पहाड़ी, तिरुमाला के ऊपर से किसी भी तरह के विमानों का उडऩा बंद करवाया जाए, और इसे ‘नो फ्लाई जोन’ घोषित किया जाए। इस पर केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राममोहन नायडू ने मीडिया से कहा है कि वे अधिकारियों से बात कर रहे हैं, ताकि विमानों के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता तय किया जाए। उन्होंने कहा कि बहुत से तीर्थस्थानों की तरफ से ऐसे अनुरोध मिले हैं, और हम यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि इनमें क्या-क्या किया जा सकता है। मंदिर ट्रस्ट ने केन्द्र सरकार को लिखकर कहा है कि मंदिर की पवित्रता, सुरक्षा-चिंताएं, और भक्तों की भावनाएं देखते हुए इसके ऊपर से किसी भी तरह के विमान उडऩे पर रोक लगाई जाए। ट्रस्ट का कहना है कि इस मंदिर की पवित्रता, उसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए तुरंत ही ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए। मंदिर ट्रस्ट ने अपने अनुरोध के समर्थन में अगम शास्त्र का हवाला दिया है कि अगम नियमों के मुताबिक मंदिर की पवित्रता सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, और उसके आसपास किसी भी तरह का विघ्न पैदा होने से उसके आध्यात्मिक वातावरण पर फर्क पड़ता है। रिकॉर्ड बताता है कि 2016 में आन्ध्रप्रदेश सरकार ने भी केन्द्र सरकार से ऐसी ही अपील की थी जिसे केन्द्र ने यह कहते हुए खारिज किया था कि इससे तिरुपति एयरपोर्ट तक विमानों की आवाजाही सीमित हो जाएगी। उस वक्त विमानन मंत्री जयंत सिन्हा ने लिखा था कि तिरुपति एयरपोर्ट के आसपास की भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए वैसे ही वहां पर केवल एक ही रनवे काम करता है, और किसी भी तरह के और प्रतिबंध लगाने से इस महत्वपूर्ण एयरपोर्ट तक आवाजाही प्रभावित होगी। अब केन्द्रीय विमानन मंत्री आन्ध्र की तेलुगु देशम पार्टी के हैं, उनकी पार्टी आन्ध्र पर सत्तारूढ़ है, और केन्द्र की मोदी सरकार इसी पार्टी के सहयोग से चल रही है।

अब जिस तरह की धार्मिक भावनाओं का जिक्र करते हुए यह मांग की जा रही है, उसके बारे में यह भी सोचने की जरूरत है कि क्या इसका कोई अंत होगा? आगे चलकर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को लेकर, बोधगया के बोधिवृक्ष को लेकर, कोलकाता के काली मंदिर को लेकर, अजमेर की दरगाह को लेकर, गुजरात के सोमनाथ मंदिर, ओडिशा के पुरी मंदिर को लेकर इसी तरह की मांग उठ सकती है। हर जगह धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं, और अगर ऐसे हर तीर्थस्थान के ऊपर से विमानों की आवाजाही का रास्ता बदला जाएगा, तो वह हवाई यातायात के लिए एक अलग किस्म का खतरा बन जाएगा। आज तमाम विमान सबसे छोटे रास्ते पर सफर करते हैं, और जिन देशों के रिश्ते अच्छे नहीं रहते हैं, उन्हें छोडक़र दूसरे रास्ते से आने-जाने पर बहुत सारा अतिरिक्त खर्च होता है, अतिरिक्त समय लगता है। भारत तो कदम-कदम पर तीर्थों से भरा हुआ देश है, और यहां पर इस तरह की कोई भी रोक आगे चलकर हो सकता है कि कई तरह की हवाई दुर्घटनाओं की एक वजह बन जाए। आज शायद दिल्ली में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति निवास या कुछेक फौजी ठिकानों, परमाणु केन्द्रों को ही ऐसी उड़ानों से मुक्त रखा गया है। इसके बारे में बहुत जानकारी अभी हमारे पास नहीं है, लेकिन दुनिया भर में धार्मिक स्थलों के ऊपर से उड़ानों पर रोक का कोई ध्यान नहीं पड़ता है। फिर भारत के नक्शे को अगर देखें तो हर कुछ सौ किलोमीटर पर किसी न किसी धर्म के प्रमुख उपासना स्थल हैं, और फिर खजुराहो सरीखे पुरातत्व के महत्व के बहुत से केन्द्र भी देश भर में बिखरे हुए हैं।

जिस तरह तिरुपति ट्रस्ट ने किसी शास्त्र का हवाला देकर यह सब कहा है, वह अपने आपमें एक भयानक नौबत है। आज कोई भी ट्रस्ट आधुनिक सुविधाओं, और टेक्नॉलॉजी को मना नहीं करता है। बिजली, इंटरनेट, कम्प्यूटर, सीसीटीवी कैमरे, गैस-चूल्हे, से किसी को परहेज नहीं है। किसी ट्रस्ट को ऑनलाईन बुकिंग या दान से परहेज नहीं है, और हर प्रमुख तीर्थस्थान पर हर दिन लाख-लाख लोगों के लिए प्रसाद या भोजन तैयार करने में भी हर तरह की टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल होता है। धर्म हर तरह की टेक्नॉलॉजी का भरपूर इस्तेमाल भी करता है, और आस्था को जब चाहे तब विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के मुकाबले खड़ा भी कर देता है। अभी-अभी निपटे महाकुंभ में सरकार ने ही बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल भीड़ के इंतजाम में किया गया था। जाहिर है कि यह मानवीय क्षमताओं से परे टेक्नॉलॉजी पर आधारित बात थी, और धर्म का उससे कोई टकराव भी नहीं था। पहाडिय़ों के बीच बसे हुए एयरपोर्ट पर एक हिस्से से प्लेन और हेलीकॉप्टर का उडऩा रोक देने से खतरे भी बढ़ेंगे, और शायद एयरपोर्ट की क्षमता भी घट जाएगी। आज जब पौन सदी से यह व्यवस्था चली आ रही है, तो अब आज उसमें यह नया बखेड़ा खड़ा करना धार्मिक आस्था की बात नहीं है, सत्तारूढ़ पार्टी और गठबंधन-भागीदार के बाहुबल का प्रदर्शन अधिक है कि वे ऐसा कुछ भी करवा सकते हैं। एक तरफ तो आन्ध्र के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू दुनिया भर की आधुनिक टेक्नॉलॉजी का केन्द्र आन्ध्र को बनाने में 25 बरस पहले अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए भी लगे हुए थे। लेकिन आज लोकलुभावनी लोकप्रियता पाने के लिए इस तरह की मांग दुनिया के विकास और प्रगति के खिलाफ सोच है। हो सकता है कि मोदी सरकार को अपने दो मददगारों में से एक की ऐसी बेतुकी मांग को पूरा करने के लिए कुछ सोचना पड़े, लेकिन यह एक बहुत खराब परंपरा होगी, और धीरे-धीरे जब जिस राज्य के विधानसभा चुनाव होंगे, तब उस राज्य के सबसे बड़े तीर्थस्थान को नो फ्लाई जोन बनाने को चुनावी मुद्दा बना लिया जाएगा।

यह सब आधुनिक विकास को नकारने और खारिज करने की हरकत है, और इसे शुरूआत में ही खत्म करना चाहिए। धर्म ने हिन्दुस्तान की आम जिंदगी को एक बड़े बादल की तरह ढांक लिया है, और जिंदगी की बहुत सी बुनियादी जरूरतों, और जरूरी मुद्दों को पीछे धकेल दिया है। तिरुपति की यह मांग असल जिंदगी को धक्का देकर हाशिए पर फेंक देने जैसी होगी, इससे न तो ईश्वर का कोई भला हो सकता, न भक्तों का। बल्कि भक्तों के लिए खतरा खड़ा होगा, उनकी दिक्कतें बढ़ेंगी, और उस इलाके के हवाई सफर की संभावनाएं सीमित होंगी।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 मार्च 2025



 

इस आईएएस की तनख्वाह काटकर उसके मानसिक इलाज की जरूरत

02  मार्च 2025 

तमिलनाडु के एक जिले के कलेक्टर ए.पी.महाभारती को तीन बरस की एक बच्ची पर हुए यौन हमले में उस बच्ची को ही जिम्मेदार ठहराने के बयान के बाद मौजूदा ओहदे से हटा दिया गया है। अभी एक कार्यक्रम में उन्होंने यौन उत्पीडऩ की शिकार तीन साल की एक बच्ची के बारे में सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा कि इस बच्ची ने 16 साल के लडक़े के मुंह पर थूका था जिसके बाद उन पर यौन हमला हुआ। यह कार्यक्रम बच्चों को यौन हमलों से बचाने के लिए पुलिस अफसरों की एक दिन की ट्रेनिंग का था, और इसमें कलेक्टर को भी बोलने का मौका दिया गया था। कलेक्टर ने अभी 24 फरवरी को ही एक आंगनबाड़ी में तीन बरस की बच्ची पर 16 साल के लडक़े के यौन हमले की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वह बच्ची भी गलती पर थी, उसने लडक़े के मुंह पर थूका था इसलिए ऐसी घटनाओं को दोनों तरफ से देखना चाहिए। जब चारों तरफ से नेताओं ने कलेक्टर के इस बयान पर हमले किए तो सरकार ने उसे हटाकर बिना कोई काम दिए बिठा दिया। भाजपा से लेकर सीपीएम तक तमाम पार्टियों ने इस अफसर की जमकर निंदा की थी।

इस देश में अफसरों से लेकर जजों तक में सामाजिक सरोकारों, न्याय और मानवीय मूल्यों की समझ बड़ी कमजोर है। इन्हें नौकरी के इम्तिहानों के रास्ते छांट लिया जाता है, और इनमें इंसानियत की किसी परख को नहीं आंका जाता। यही वजह है कि एक हाईकोर्ट का जज अदालत के परिसर में ही आयोजित एक धार्मिक संगठन के कार्यक्रम में अल्पसंख्यकों के खिलाफ गंदी जुबान में नफरती बयान देता है, और उसके बाद फिर अदालती फैसलों के लिए बैठ जाता है। अफसरों में अनगिनत ऐसे लोग हैं जिनमें समाज के विशेष सुरक्षा प्राप्त, कमजोर तबकों के लिए हिकारत है। महिलाओं के खिलाफ, दलितों या आदिवासियों के खिलाफ, विकलांगों या मानसिक कमजोर लोगों के खिलाफ ऊंची-ऊंची कुर्सी पर बैठे लोगों के मन नफरत से भरे हुए रहते हैं। ऐसे में सरकारी और अदालती कामकाज में इंसाफ होने की गुंजाइश बहुत कम बच जाती है।

हमारा ख्याल है कि किसी को अखिल भारतीय सेवा का अफसर, या राज्य सेवा का अफसर, या अदालती जज बनाने के पहले उनकी राजनीतिक (दलगत नहीं), सामाजिक, लैंगिक समझ को बारीकी से जांचना-परखना चाहिए, और जहां इंसाफ की उनकी समझ कमजोर दिखे, उन्हें शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए भेजना चाहिए। जिन अफसरों को अदालती, या सरकारी कामकाज के बीच में किसी एक धर्म की प्रतिष्ठा को बढ़ाने, और दूसरों को खारिज करने में कुछ गलत नहीं लगता है, उन्हें एक लंबी ट्रेनिंग के लिए भेज दिया जाना चाहिए। पता नहीं देश की प्रशासन और पुलिस अकादमियों में इन लोगों को क्या सिखाया जाता है कि ये राजनीतिक दलों की नफरती सोच का झंडा-डंडा लेकर चलने लगते हैं। मध्यप्रदेश में हाईकोर्ट को यह कहना पड़ता है कि पुलिस थानों में किसी धर्म के उपासना स्थल बनाना गलत है, और अदालत के कहे बिना सरकार के अफसरों को इसमें कुछ भी अटपटा नहीं लगता। इसी तरह जब किसी आदिवासी के चेहरे पर पेशाब की जाती है, तो अफसर सत्तारूढ़ पार्टी की इस पेशाब को बचाने में लग जाते हैं, उसकी धार को सहलाने लगते हैं कि कहीं सत्ता की भावनाओं को चोट न लग जाए। अफसरों में सामाजिक न्याय की इतनी कमजोर समझ उन्हें बर्खास्त कर देने लायक रहनी चाहिए, लेकिन आज की भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकतर लोगों को तो इसमें कुछ अटपटा भी नहीं लगता।

देश के एक प्रमुख और चर्चित आईएएस अफसर ने यूपीएससी के इम्तिहान में बैठने के पहले दो बरस तक गांधी शांति प्रतिष्ठान में काम किया था, और गांवों की जिंदगी को, सामाजिक हकीकत को करीब से देखा था। उनका कहना था कि एक संपन्न परिवार से आकर सीधे कलेक्टरी तक पहुंच जाने पर उन्हें गांव की जमीनी हकीकत से वाकिफ होने का मौका ही नहीं मिलता, और उनकी सोच विकसित नहीं हो पाती। लेकिन ऐसे कितने लोग हैं जो कि सरकारी नौकरी में आने के बाद सत्तारूढ़ सोच की चापलूसी से परे सामाजिक न्याय की बात भी सोचते हों? अपनी कमाऊ, या ताकतवर कुर्सी की फिक्र में वे जिस तरह सत्ता को नापसंद कमजोर तबकों को भी कुचलने के लिए एक पैर पर खड़े रहते हैं, वह देखना एक भयानक नजारा रहता है। सच तो यह है कि ऐसे समझौतापरस्त और आत्मजीवी, भ्रष्ट और संवेदनाशून्य अफसर अगर न रहें, तो सत्तारूढ़ नेता, पार्टी, या गठबंधन मनमानी कर ही न सकें। नेता की मर्जी को भांपकर जो अफसर बुलडोजर लेकर बेकसूर, मासूम, की तरफ दौड़ पड़ते हैं, उन्हीं अफसरों की वजह से यह सिलसिला चल पाता है।

तमिलनाडु के जिस आईएएस अफसर के इस अमानवीय बयान से आज की यह बात लिखना शुरू हुआ है, उसकी सोच को देखें, शायद उसकी शौच इसके मुकाबले कम बदबूदार होगी। ऐसे व्यक्ति को बंद कमरे के किसी ऐसे काम में ही लगाना चाहिए, जहां जिंदा इंसानों से उसका कोई वास्ता ही न पड़ता हो। उसे जमीनों के नक्शे, या सरकारी रिकॉर्ड रूम जैसी कोई जिम्मेदारी देकर किसी खस्ताहाल दफ्तर के पीछे के कमरे में अगले कई बरस रखना चाहिए, और मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता के पास उसे उसकी तनख्वाह के पैसों से ही भेजना चाहिए। फिर जब मनोचिकित्सकों का बोर्ड यह प्रमाणित करे कि उसमें इंसानियत लौट आई है, तब उसे बच्चों और महिलाओं से दूर के किसी विभाग में रखना चाहिए।

मेरा ख्याल है कि अदालत के जज हों, या कि अफसर, या कि किसी विभाग को संभालने वाले मंत्री हों, उनके विभाग से जुड़े हुए इंसानों, दूसरे प्राणियों, और कुदरत के खिलाफ अगर उनके मन में कोई पूर्वाग्रह है, तो उन्हें वैसा कोई जिम्मा दिया ही नहीं जाना चाहिए, वरना उसके खिलाफ जनहित याचिका लेकर अदालत जाना चाहिए। अब पल भर को सोचें कि डोनल्ड ट्रम्प अगर हिन्दुस्तान का नेता, या अफसर होता, तो जिस तरह से वह पर्यावरण बचाने की कोशिशों को दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन-फ्रॉड कहता है,  क्या उसे पर्यावरण मंत्री या सचिव बनाना जायज रहता? जो नेता, अफसर महिलाओं के खिलाफ गंदी जुबान में बात करते हैं, क्या उन्हें कभी भी महिलाओं से जुड़े हुए मामलों का मंत्री, सचिव बनाना जायज होगा? सरकारी अधिकारी या जज लोकतंत्र पर स्थाई बोझ रहते हैं, इसलिए उनकी नौकरी बात-बात पर खत्म तो नहीं की जा सकती, लेकिन इतना तो किया ही जा सकता है कि उनकी चरित्रावली में यह लिख दिया जाए कि वे किस तरह के काम करने के लायक नहीं हैं। निर्वाचित नेताओं को मंत्री या किसी आयोग का मुखिया बनाते समय भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनके पूर्वाग्रह ऐसे विभागों की जिम्मेदारियों के खिलाफ तो नहीं हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 2 मार्च 2025



 

नेता-अफसरों के भ्रष्टाचार से बनते हैं योजनाओं के टापू, बिना आगे-पीछे जुड़े

 02 मार्च 2025 

 

छत्तीसगढ़ विधानसभा के चल रहे इस सत्र में सत्तारूढ़ भाजपा विधायकों के उठाए गए सवालों से पल भर को तो ऐसा लगता है कि मानो वे अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ हैं, लेकिन फिर बारीकी से मुद्दे को समझें तो समझ आता है कि इसमें अधिकांश हमले पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुए, या अधूरे रह गए कामों को लेकर है। फिर भी इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए जरूरी है कि लोकतंत्र में एक पार्टी या गठबंधन की सरकार का जाना, और दूसरी पार्टी या गठबंधन की सरकार का आना एक लगातार सिलसिला रहता है, और सरकार के कामकाज को इस फेरबदल के साथ सीखना जरूरी रहता है। अगर पिछली सरकार के कार्यकाल की चर्चा ही न की जाए, तो हर सरकार यह सोचकर लापरवाह हो जाएगी कि उसकी गलतियां, और उसके गलत काम उसके कार्यकाल के साथ ही दफन हो जाएंगे। हम तो अपने इस कॉलम में लगातार यह भी सुझाते रहे हैं कि हर सरकार के कार्यकाल के बाद एक जांच आयोग बैठना चाहिए जिसमें आम जनता जाकर उस कार्यकाल के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतें कर सके। जिस तरह सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट लगातार बनती है, उसी तरह एक जांच आयोग भी रहना चाहिए जिसके रिटायर्ड जज को निष्पक्ष रूप से नियुक्त करने की एक प्रक्रिया रहनी चाहिए, और उसे अगले एक या दो बरस में पिछले कार्यकाल के सारे भ्रष्टाचार पर एक श्वेत पत्र जैसा जारी करने का अधिकार रहना चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट सरकार के हर विभाग के कामकाज पर नहीं आती, और कुछ चुनिंदा विभागों की चुनिंदा अनियमितताओं पर ही आती है। इसलिए आज छत्तीसगढ़ विधानसभा में सत्तापक्ष पिछली विपक्षी सरकार के कामकाज को जिस तरह कुरेद रहा है, उसे महज संसदीय चर्चा तक सीमित रखने के बजाय हम उसकी न्यायिक जांच की एक नियमित प्रक्रिया सुझा रहे हैं।

फिलहाल जो मुद्दे वहां उठे हैं उनमें एक विभाग के सैकड़ों मामले हैं जिनमें गांव-गांव तक शहर के वार्ड-वार्ड तक पानी सप्लाई के अधूरे पड़े प्रोजेक्ट हैं। कम शब्दों में अगर कहा जाए तो जहां न पानी का कोई स्रोत था, न पाईप लाईन डली थी, वहां टंकियां बना दी गईं। इस तरह के अधूरे काम सरकारों के अनगिनत विभागों में होते हैं। हमने पिछले हफ्तों में इसी जगह पर लिखा था कि स्वास्थ्य विभाग सरकारों का एक सबसे भ्रष्ट विभाग रहता है, और छत्तीसगढ़ के अस्तित्व की इस चौथाई सदी में हम लगातार यह देखते आ रहे हैं कि जिन जगहों पर विशेषज्ञ डॉक्टर और टेक्नीशियन नहीं हैं, वहां के लिए मशीनें खरीद ली गईं, जहां ऐसे लोग हैं, वहां मशीनें नहीं ली गईं, जहां मशीनें नहीं हैं, उनके लिए केमिकल खरीद लिए गए, इस तरह जहां भूत नहीं है, वहां पीपल खरीद लिया गया, और जहां पीपल है, वहां भूत नहीं खरीदे गए। यह सिलसिला दूसरे भी कई विभागों में चलते रहता है। कहीं पर फ्लाईओवर बनना है, तो उसमें आने वाली कुछ जमीन खरीदे बिना काम शुरू हो जाता है, कहीं पुल की सडक़ बनती है, तो पुल नहीं बनता, कहीं पुल बनता है, तो सडक़ नहीं बनती। इस तरह का बेमेल काम बहुत से विभागों में होता है। अभी एक-दो दिन पहले ही हमने इसी जगह लिखा है कि शहरों में पानी की सप्लाई बढऩे के आंकड़े सरकार के पास रहते हैं, लोगों के निजी ट्यूबवेल का अंदाज भी सरकार के पास रहता है, लेकिन नालियों के निकासी के पानी को साफ करने की क्षमता इस अनुपात विकसित नहीं की जाती। एक तरफ आने वाले कई बरसों के लिए पानी सप्लाई की योजना के आंकड़े रहते हैं, लेकिन घरों और दूसरी जगहों से निकलने वाले गंदे पानी के आंकड़ों में इस बढ़ी हुई सप्लाई के आंकड़े नहीं जोड़े जाते, मानो यह भाप बनकर उड़ जाने वाला पानी हो।

सिर्फ एक सरकार से दूसरी सरकार तक गलतियों और गलत कामों के आंकड़े ठीक नहीं है, इन्हें एक तर्कसंगत अंत तक ले जाना जरूरी है, और सच तो यह है कि सरकार एक स्थाई मशीनरी रहती है, जिसे राजनीतिक फेरबदल से परे भी लगातार अपना काम करना चाहिए, ऐसे में राजनीतिक-भ्रष्टाचार के अलावा और कौन सी वजह हो सकती है जिसकी वजह से सरकारी अफसर और बाकी अमला गलत तरीके से काम करें। हमारा ख्याल है कि जिम्मेदार अफसरों पर जब तक कड़ी कार्रवाई, और उनसे वसूली का स्थाई और नियमित इंतजाम नहीं होगा, जनता के खून-पसीने से आए हुए, उसकी हक के पैसों की ऐसी बर्बादी जारी रहेगी। चूंकि निर्वाचित विधायक बनकर मंत्री बनने वाले नेताओं के दस्तखत बहुत कम फाईलों पर रहते हैं, इसलिए अधिकतर वित्तीय जिम्मेदारी अफसरों की ही रहती है। सरकारों के साथ दिक्कत यह है कि अफसरों के भ्रष्टाचार पूरी तरह साबित होने लायक रहने पर भी सरकार जांच की इजाजत नहीं देती, इजाजत देती है तो जांच को उसी तरह भ्रष्ट कर दिया जाता है जिस तरह भूपेश सरकार में नान मामले में शुक्ला-टूटेजा को बचाने के लिए धरती से आसमान तक को एक कर दिया गया था, और जांच रिपोर्ट अगर पूरी तरह भ्रष्ट-अफसर के खिलाफ रहती है, तो भी सरकार मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं देती। मुकदमा शुरू होता है, तो उसके बाद निचली अदालत से सजा पाकर भी ऊपर की अदालत में अपील का जो लंबा सिलसिला चलता है, उसके ऊपर भ्रष्ट और दुष्ट अफसरों को इतना भरोसा रहता है कि उनके जीते-जी उन्हें जेल नहीं जाना पड़ेगा। इस भरोसे को तोडऩे की जरूरत है। हर सरकार के अपने कुछ पसंदीदा भ्रष्ट हो सकते हैं, लेकिन दूसरी पार्टी के पसंदीदा भ्रष्ट लोगों को सजा दिलवाने और जेल भिजवाने का काम तो किया ही जा सकता है। इससे भी सरकार के भीतर गंदगी कुछ छंटेगी, और भ्रष्ट लोगों का हौसला कुछ पस्त होगा।

फिलहाल सरकार के हर विभाग में, हर प्रोजेक्ट में सीएजी के ऑडिट की तरह यह जांच होनी चाहिए कि बिना तैयारी के टुकड़े-टुकड़े में सरकार की रकम कैसे बर्बाद की जाती है। आज नई चमचमाती सडक़ बनती है, और दो दिन के भीतर पाईप या केबल डालने के लिए उसे खोद दिया जाता है। आज जहां डामर की सडक़ बनी है, उसके ऊपर साल-दो-साल में सीमेंट की सडक़ बनाई जाती है, और जहां सीमेंट की सडक़ रहती है उस पर डामर चढ़ाया जाता है। सडक़ किनारे की फुटपाथी जमीन पर कभी पेवर ब्लॉक लगाए जाते हैं, तो कभी उनके ऊपर सीमेंट या डामर चढ़ा दिया जाता है। जनता के पैसों की ऐसी बर्बादी को लेकर जनता की तरफ से भी एक ऑडिट होना चाहिए, सरकार के भीतर भी किसी भी खर्च की मंजूरी के पहले उसके पहले और बाद की कड़ी को जांचने की जिम्मेदारी तय होना चाहिए कि यह खर्च काम आ पाएगा या नहीं, या आगे-पीछे की कडिय़ों के बिना अधूरा पड़े रह जाएगा। दिक्कत यह है कि जो नेता और अफसर इस सरकार या पिछली सरकार में ऐसे तमाम घोटालों के लिए जिम्मेदार रहते हैं, वे शान से अपना हँसता हुआ नूरानी चेहरा कैमरों के सामने दिखाते हुए घूमते रहते हैं, और जनता के पैसे सरकार उसी अंदाज में डुबाती है जिस अंदाज में चिटफंड कंपनियां डुबाती हैं।

(Daily Chhattisgarh)

ट्रम्प की धमकियों से डरे बिना जेलेंस्की खाना छोड़ लौट गए

01 मार्च 2025 

 

अभी से कुछ घंटे पहले अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के बीच हुई मुलाकात एक बहस में बदलते हुए जिस तरह मीडिया के कैमरों के सामने आई है, और जिस तरह से उसका वीडियो चारों तरफ फैला है, वह हक्का-बक्का करता है। अमेरिकी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों बैठकर जिस तरह से यूक्रेन के राष्ट्रपति पर दबाव डाल रहे थे, यूक्रेन के राष्ट्रपति को अमेरिका की मनमानी शर्तों को मानने के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहे थे, वह भयानक था। अमेरिकी विदेश मंत्री भी लगातार यूक्रेन के राष्ट्रपति को अपमानित करने पर लगे हुए थे। इसके पहले ऐसा कोई नजारा दो देशों के प्रमुख लोगों के बीच खड़ा हुआ हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। और खासकर जब किसी दूसरे देश का राष्ट्रपति आया हो तो उस मेजबान दफ्तर के मुखिया को मेहमान के साथ ऐसा बर्ताव कभी भी नहीं करना चाहिए। यह कूटनीति अगर तो छोड़ दें, तो भी यह तो सामान्य शिष्टाचार के भी खिलाफ है। जिस तरह से यूक्रेन के राष्ट्रपति को अपमानित करके वहां से तकरीबन निकाल ही दिया गया, उससे यह पता चलता है कि अमेरिका आज पूरी दुनिया के लिए किस-किस्म का हमलावर तेवर रखता है और किस तरह वह पूरी दुनिया को एकध्रुवीय बनाकर चलना चाहता है, ताकि सब कुछ उसकी मर्जी से हो।

यूक्रेन को नाटो के सदस्य यूरोपीय देशों ने फौजी मदद की थी जिसकी वजह से वह रूस के हमले के सामने खत्म हो जाने के बजाय उसे एक आत्मरक्षा की जंग में तब्दील कर पाया था। और पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पूरी तरह से यूक्रेन के साथ खड़े रहने का वायदा किया था, और ऐसा ही वायदा नाटो के दूसरे यूरोपीय सदस्यों ने भी किया था। यही वजह है कि तीन दिनों में जंग को खत्म कर देने का रूसी राष्ट्रपति पुतिन का दावा तीन बरस बाद भी अभी तक पूरा नहीं हो पाया। लेकिन ट्रम्प ने इस बात को चुनाव के पहले ही एक बहुत बड़ा मुद्दा बनाया था कि वे यूक्रेन की जंग को 24 घंटे में खत्म करवा देंगे, अमेरिका का जो पैसा यूक्रेन को जा रहा है उसको खत्म कर देंगे, और उन्होंने ठीक वही किया है। उन्होंने चुनाव के पहले अमेरिकी जनता के सामने जो वायदा किया था वह उसी को पूरा कर रहे हैं। लेकिन इससे दुनिया का नक्शा जिस तरह से बदल रहा है, वह अभी किसी को समझ नहीं पड़ रहा है। आज हालात यह है कि दुनिया के इतिहास में सबसे लंबे समय से एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी या दुश्मन चले आ रहे रूस और अमेरिका, यूक्रेन जैसे सबसे बड़े मुद्दे पर एक साथ दिख रहे हैं। ट्रम्प सौ कदम आगे जाकर आज रुस का वकील बन बैठा है, और उसे उसके यूक्रेन पर अवैध कब्जे पर मालिकाना हक दिलाने का फैसला लिखने वाले जज भी बन गया है, और जल्लाद भी। और तो और, जो चीन और अमेरिका एक दूसरे के मुकाबले खड़े रहते हैं, वह चीन भी अमेरिका और रूस के साथ इस मामले पर खड़ा हो गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की दखल से, गुंडागर्दी से यह शांति समझौता किया जाए। दरअसल यह कोई शांति समझौता है नहीं, यह यूक्रेन को रूस के हाथ बेच देने की एक रणनीति है और यूक्रेन की खदानों पर कब्जा करने के लिए जिस बेशर्म अंदाज से अमेरिकी राष्ट्रपति ने धमकी दी है, उसने तो अंतरराष्ट्रीय शिष्टाचार को पूरी तरह से खत्म कर दिया है।

कल की बैठक में भी ट्रम्प ने जेलेंस्की को जिस तरह से यह बार-बार कहा कि वहां की खदानों का आधा हिस्सा अमेरिका के हवाले किया जाए ऐसा तो दुनिया में किसी देश ने किसी देश से नहीं कहा था। फिर जो अमेरिका अपने देश के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों की बड़ी बात करता है जिसने बड़ी सी स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी लगाकर रखी है, वह यूक्रेन की लिबर्टी को, फिलिस्तीन की लिबर्टी को, और दुनिया में जो देश ट्रंप को नापसंद होगा उन तमाम देशों की लिबर्टी को जिस अंदाज में खत्म कर रहा है, बंदूक की नोंक पर, परमाणु बमों की नोंक पर, आर्थिक प्रतिबंधों की नोंक पर जिस तरह से खत्म कर रहा है, उससे ऐसा लगता है कि अमेरिका को अब किसी स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी की जरूरत नहीं है। आज तो खुद अमेरिकी जनता की कोई लिबर्टी देश के भीतर नहीं बची है। राष्ट्रपति ट्रंप का एक गैर सरकारी सलाहकार जो कि निर्वाचित संसद तक नहीं है, वह एलन मस्क अपनी सनक से यह तय कर रहा है कि किस तरह लाखों अमेरिकियों की नौकरी खत्म हो जानी चाहिए, और किस तरह दशकों से अमेरिका की मदद से दुनिया के दूसरे देशों में जिस तरह एड्स के मरीजों को दवाइयां मिल रही हैं, एड्स की जांच हो रही है, उन सबको यूएसएड नाम की संस्था की ग्रांट पूरी तरह खत्म कर दी गई है। एड्स के ऐसे तमाम मरीज के लिए जो मदद जाती थी उसको खत्म कर दिया गया है, आज उन दूसरे मरीजों के लिए रातों-रात कोई दूसरा इंतजाम भी नहीं हो सकता। यह समझ आता है कि अमेरिका ने लंबे समय से चली आ अपनी परंपरागत अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही को पल भर में पहने हुए कपड़े की तरह उतारकर फेंक दिया है।

अभी इस मामले के एक दूसरे सकारात्मक और दिलचस्प पहलू की तरफ देखना चाहिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति की ऐसी बदसलूकी के बाद राष्ट्रपति भवन छोडक़र बिना खाना खा निकल गए यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की का यूरोप के कई देशों ने, और वहाँ के बड़े-बड़े देशों ने जिस तरह से साथ दिया है, वह काबिले तारीफ है। दोस्तों को किसी कमजोर वक्त पर पटक नहीं दिया जाता है, यह बात यूरोप की यह देश साबित कर रहे हैं। दूसरी तरफ जो लोग अमेरिका से दोस्ती की वकालत करते हैं उनको यह समझना चाहिए कि ट्रंप के बाद भी अगर कोई इसी तरह का सनकी बददिमाग तानाशाह अगर आएगा, तो वह किसी भी पुरानी दोस्ती, किसी भी पुराने गठबंधन की अपनी भागीदारी को पल भर में खत्म करेगा। फिलहाल हमने बात शुरू की थी यूरोप की, तो यूरोप में जर्मनी और फ्रांस जैसे बड़े देशों ने यह कहा है कि वे यूक्रेन के साथ खड़े हुए हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति ने तथ्य की बात कही है, उन्होंने कहा कि हमला करने वाला रुस है, यूक्रेन नहीं। जर्मनी के चांसलर ने कहा है कि यूक्रेन जर्मनी और यूरोप पर भरोसा कर सकता है। जर्मनी के अगले संभावित चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने एक्स पर एक पोस्ट में जेलेंस्की का साथ देते हुए कहा है कि हमें इस युद्ध में कभी भी हमलावर और पीडि़त को लेकर भ्रमित नहीं होना चाहिए। पोलैंड ने यूक्रेन का साथ दिया है वहां के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टास्क करने खुलकर कहा है कि यूक्रेन अकेला नहीं है, उन्होंने सोशल मीडिया पर यह लिखा- प्रिय जेलेंस्की, प्रिय यूक्रेनी दोस्तों, आप अकेले नहीं हैं। ऐसा ही समर्थन चेक गणराज्य ने भी किया है। फ्रांस के राष्ट्रपति ने कहा है कि रूस आक्रामक है, और यूक्रेन के लोग आक्रामकता के शिकार हैं। उन्होंने कहा कि हमें उन लोगों का सम्मान करना चाहिए जो शुरू से संघर्ष करते रहे। नीदरलैंड्स ने कहा है कि यूक्रेन के लिए उनके देश का समर्थन कम नहीं हुआ है और वह रूस द्वारा शुरू की गई आक्रामकता का अंत चाहते हैं। स्पेन के प्रधानमंत्री ने कहा है-यूक्रेन, स्पेन आपके साथ खड़ा हुआ है।

विश्व इतिहास में मवाली किस्म के किसी राष्ट्रपति, चाहे वह अमेरिका का ही राष्ट्रपति क्यों ना हो, उसका नाम सम्मान से दर्ज नहीं होता क्योंकि दुनिया का इतिहास सभ्यता का इतिहास है, और इस सभ्यता को एक हमलावर सभ्यता की तरफ ले जाने वाले लोगों का नाम कालिख से लिखा जाता है। ट्रम्प का नाम विश्व इतिहास में इस तरह लिखा जाएगा जिस तरह इजराइल के प्रधानमंत्री का नाम लिखा जाएगा, जिस तरह से हिटलर का नाम लिखा गया था, जिस तरह से अफ्रीका के कुछ देशों के तानाशाहों का नाम लिखा गया था, उनकी एक लंबी फेहरिस्त है। लेकिन अमेरिका जो कि अपने तथाकथित लोकतांत्रिक मूल्यों और परंपराओं को लेकर लंबे समय से एक अहंकारी की तरह जीता था, आज उसका अहंकार चूर-चूर हो गया है। उसके निर्वाचित राष्ट्रपति ने मानवता के खिलाफ, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के खिलाफ, अमेरिका की अपनी लंबे समय से की गई प्रतिबद्धता के खिलाफ, जिस तरह की हरकत की है वह बहुत भयानक है। हम इस पूरे मामले की जटिलता पर अभी टिप्पणी नहीं कर रहे हैं कि आगे क्या होगा, लेकिन हम यूरोप की तारीफ करना चाहते हैं कि जिस तरह से वह एक कमजोर पड़ते हुए देश, यूक्रेन के साथ खड़ा हुआ है, सच के साथ खड़ा हुआ है, हमलावर रूस के खिलाफ खड़ा हुआ है, और बिना ट्रम्प की परवाह किए हुए ट्रम्प की मनमर्जी के खिलाफ भी यूरोप खड़ा हुआ है, यह काबिले तारीफ बात है। अब दुनिया के सामने एक नए तालमेल का मौका आकर खड़ा हुआ है कि रूस और अमेरिका अगर एक हो रहे हैं अगर वह मिलजुल कर एक नया शक्ति संतुलन बनाना चाहते हैं, तो इस गिरोहबंदी के खिलाफ दुनिया के बाकी देशों को अपना भला सोचना चाहिए। वह भला चीन यूरोप और बाकी देश यह किस तरह से कर सकते हैं यह सोचना अभी आसान नहीं है क्योंकि विश्व इतिहास में ऐसी कोई नौबत पहले आई नहीं थी। लेकिन रूस के साथ अपने रिश्ते मजबूत रखते हुए भी चीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक बड़ी ताकत की तरह उभरते चल रहा था, और आगे उसका उभरना जारी रहेगा, ऐसा लगता है। यह तस्वीर बहुत ही धुंध भरी हुई है अभी हमको भी समझ नहीं आ रहा है कि आज से साल 2 साल बाद कौन सा देश किसके साथ रहेगा, लेकिन फिलहाल यह बात तो तय है कि एक मवाली के अंदाज में यूक्रेन के राष्ट्रपति की बाँह मरोडक़र वहां की खदानों पर कब्जा करने की ट्रंप की खुली कोशिश को यूक्रेनी राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया है और यह नौबत एक छोटे कमजोर और जंग झेल रहे देश की बहादुरी बताती है। देखते हैं आगे क्या होता है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 मार्च 2025