कुछ अलग-अलग खबरों-बातों के जोडऩे से उभरती हकीकत!

 24 अगस्त 2025

कुछ हफ्ते पहले देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की एसटी-एससी, और ओबीसी के लिए आरक्षित कुर्सियों की खबर आई थी कि इनमें से 80 फीसदी से अधिक खाली पड़ी हैं। अनुसूचित जनजाति के प्रोफेसर पद तो 83 फीसदी खाली हैं। इससे यह भी जाहिर होता है कि सरकार इन तबकों के लिए आरक्षित जितने पदों का यह मतलब निकालती है कि उन पर काम करने वाले लोग अपने बच्चों को भी आगे बढ़ा पा रहे होंगे, वह मतलब जायज नहीं है। दो बिल्कुल ही अलग-अलग खबरें और हैं जिन पर गौर करना चाहिए। एक खबर में कल ही राहुल गांधी ने यह कहा है कि देश की सबसे बड़ी निजी यूनिवर्सिटियों में दलित छात्रों का अनुपात एक फीसदी से कम है, आदिवासी छात्रों का अनुपात आधे फीसदी से भी कम है, और ओबीसी छात्रों का अनुपात 11 फीसदी है। उन्होंने कहा कि ये आंकड़े उनके नहीं है, बल्कि शिक्षा पर संसदीय स्थाई समिति के रिपोर्ट के हैं जिसने देश के चार निजी ‘इंस्टीट्यूट ऑफ इमिनेंस’ का सर्वे किया है। उन्होंने कहा कि संसदीय समिति ने यह साफ कहा है कि निजी शिक्षा में भी आरक्षण का कानून जरूरी है। इस बात से परे राहुल गांधी ने राजनीतिक बयान भी दिया है, लेकिन वह हमारी आज की इस चर्चा का मुद्दा नहीं है। एक अलग खबर और है, जिसे मैक्सेसे सम्मान प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय ने आज फेसबुक पर पोस्ट किया है। इस पोस्टर में सोशलिस्ट छात्रसंघ, और सोशलिस्ट युवजन सभा ने आंबेडकर, लोहिया, गांधी, जयप्रकाश, कर्पूरी ठाकुर, ज्योतिबा फूले, जैसे लोगों की तस्वीरों के साथ यह मांग की है कि सिर्फ सरकारी विद्यालय में पढऩे वाले को ही सरकारी नौकरी मिले। समान शिक्षा प्रणाली लागू की जाए।

अब इन तीन बिल्कुल अलग-अलग बातों का आपस में कोई सीधा रिश्ता नहीं है, लेकिन इन तीनों का भारत की सामाजिक हकीकत से लेना-देना है जो कि इन तीनों बातों को बहुत तल्खी के साथ बताती है। मोदी सरकार ने जिन चार निजी विश्वविद्यालयों को ‘इंस्टीट्यूट ऑफ इमिनेंस’ का दर्जा दिया था, उसके पीछे बड़े-बड़े औद्योगिक घराने हैं। वहां दाखिला कितनी फीस पर होता है, वह एक अलग मुद्दा है, लेकिन उनके आंकड़ों को देखने के बाद अगर संसद की कमेटी निजी शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के महत्व को दुहरा रही है, तो इस संसदीय समिति की सोच और भावना के साथ इन संस्थानों, और ऐसे दूसरे संस्थानों में दलित-आदिवासी, और ओबीसी छात्र-छात्राओं के अनुपात को देखना जरूरी है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की कुर्सियों पर एसटी-एससी और ओबीसी की गैरमौजूदगी समाज की बहुत ही कड़वी हकीकत बताती है। फिर ऊपर के पैराग्राफ में आखिरी बात समाजवादी-लोकतांत्रित सोच के छात्र और नौजवान संगठनों की उठाई हुई है कि सरकारी नौकरियां सिर्फ उन्हें मिलें जो सरकारी स्कूलों में पढक़र निकले हैं। जाहिर है कि निजी स्कूलों में महंगी शिक्षा पाकर निकलने वाले छात्र, बाद में महंगी कोचिंग पाकर हर किस्म की नौकरी पाने में आगे बढ़ जाते हैं, और गरीब बच्चे इन मुकाबलों में बराबरी के मैदान पर भी नहीं आ पाते। लोगों को याद होगा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने बरसों पहले यह फैसला भी दिया था कि सत्तारूढ़ नेताओं और अफसरों के बच्चों के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि वे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ें। जज की सोच यह थी कि सरकारी स्कूलों की खराब हालत सुधारने में ऐसा नियम मददगार हो सकता है कि सत्ता हांकने वाले लोगों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे, तो उनके मां-बाप की यह मजबूरी भी रहेगी कि वे इन स्कूलों को सुधारें। यह एक किस्म की समाजवादी सोच का फैसला था, जो कि लोकतांत्रिक-मानवीयता के हिसाब से अच्छा था, हालांकि हमने अपने अखबार में उसी समय यह लिखा था कि यह फैसला संवैधानिक रूप से सही नहीं है, और इस पर अमल नहीं हो सकेगा। वही हुआ भी।

आज देश में अधिकतर सत्तारूढ़ लोगों के बच्चे महंगे स्कूल-कॉलेज में पढ़ते हैं, और जो सचमुच ही अधिक तनख्वाह, या अधिक ऊपरी कमाई वाले लोग हैं, उनके बच्चे विदेशी विश्वविद्यालयों में पढऩे चले जाते हैं। ऐसे सत्तारूढ़ तबकों के बहुत से लोग देश के गरीब लडक़ों और नौजवानों को धार्मिक पाखंड में झोंककर और जोतकर रखते हैं क्योंकि उनके पास अच्छी तालीम पाने की कोई प्रेरणा नहीं रहती, और किसी तरह पढ़-लिखकर बेरोजगार बनने से उन्हें कुछ हासिल भी नहीं होता। धर्म और जाति के नाम पर इस पीढ़ी को सडक़ों पर उन्माद में झोंक दिया जाता है, और ऐसी भीड़ में अधिकतर लडक़े-युवक दलित-आदिवासी, और ओबीसी तबकों के ही रहते हैं। जिन तबकों को पढ़ाई में हर कदम पर आरक्षण का फायदा मिलना चाहिए, वे धर्मान्धता में उलझा दिए गए हैं, जाहिर है कि ऊपर जाकर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों से लेकर ऊंची पढ़ाई तक में उनकी कुर्सियां खाली हैं। कांवर से केन्द्रीय विश्वविद्यालय की प्रोफेसरी तक का सफर आसान तो हो नहीं सकता है। और अब ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग को चुनावी घोषणापत्र में इस सामाजिक सच्चाई की जानकारी भी उम्मीदवारों से मांगकर मतदाताओं को देना चाहिए कि उम्मीदवार के बच्चे किन स्कूल-कॉलेजों में पढक़र किन विश्वविद्यालयों तक पहुंचे हैं, और अब क्या कर रहे हैं। इस जानकारी को पाकर हो सकता है कि ऐसे नेताओं के फतवों पर अपनी जवानी उन्मादी-कुर्बानी में झोंकने के बजाय लोग यह सोच सकेंगे कि नेताओं के बच्चे क्यों कांवड़ यात्रा में नहीं हैं, क्यों फौज में नहीं हैं। 

धर्म और जाति ये दो ऐसे बड़े मुद्दे हैं जिन्हें छेडक़र पूरी की पूरी नौजवान पीढ़ी को सडक़ों पर लाया जा सकता है, उनके हाथों को किताबों और कम्प्यूटर से दूर करके, उनमें धार्मिक झंडे-डंडे थमाए जा सकते हैं, और उन्हें इस अफसोस या मलाल से स्थाई रूप से मुक्त रखा जा सकता है कि वे अच्छी पढ़ाई और अच्छी नौकरी क्यों नहीं पा सकते। आज की यह बात कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, यह विशुद्ध रूप से, और पूरी तरह एक सामाजिक मुद्दा है, और समाज के अलग-अलग तबकों को अपनी हकीकत, और अपनी जगह समझनी होगी। देश में जाति जनगणना के बाद यह सवाल और तल्खी से उठेगा, और इस जनगणना के सवालों में आदिवासियों को किधर गिना जाएगा, उन्हें अलग-अलग धर्मों में, या अलग-अलग जातियों में गिना जाएगा, या जैसा कि आदिवासियों के बीच से लंबे समय से यह मांग हो रही है कि उनके लिए एक सरना कोड लागू किया जाए, वैसा कुछ होगा? 

इन तमाम बातों से परे यूपी के लखनऊ की एक खबर आई है जहां सरकार के किसी संपूर्ण समाधान दिवस शिविर में अफसरों के सामने एक बुजुर्ग महिला ने अपनी भयानक जिंदगी रखी, और बताया कि उसके पति का 25 साल पहले निधन हो गया, तो गांव के ही अशोक और अनमोल तिवारी घर आए, और उसके 10 साल के बेटे राममिलन को यह कहकर उठा ले गए कि उसके दादा ने तीन सौ रूपए उधार लिए थे, जिसे अपनी जिंदगी में उसका बेटा, यानी इस बच्चे का बाप अदा नहीं कर सका, इसलिए अब 10 साल का यह लडक़ा उनके पास मजदूरी करेगा। इस बूढ़ी महिला का कहना है कि 25 साल से उसके बेटे को बंधक बनाकर उससे मजदूरी करवाई जा रही है, और इस महिला को मरा हुआ दिखाकर उसका मकान बेच डाला, और अब परिवार की जमीन को भी हड़पने की तैयारी है। यह देश में एक सबसे ताकतवर मानी जाने वाली योगी सरकार के राज का हाल है। 

इस देश के मीडिया से अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसके मालिकाना हक से लेकर उसमें समाचार-विचार लिखने वाले, और उनके ऊपर के फैसले लेने वाले लोगों में एसटी-एससी, और ओबीसी गिनती के हैं। इसके लिए किसी जाति-जनगणना की जरूरत भी नहीं है, अखबारी पन्नों पर, और टीवी के समाचार बुलेटिनों में, मालिक, संपादक, लेखक-पत्रकार, और रिपोर्टर-एंकर के जितने नाम आते हैं, उन नामों को ही लिखते चलिए, और अपने सामान्य ज्ञान के आधार पर उनके जात-धरम की गिनती कर लीजिए। फिर देश की आबादी में इन जात-धरमों का अनुपात देखकर हिसाब लगा लीजिए कि क्या विचारों के कारोबार में वंचित तबकों को कोई हक मिलता है? तो इस हिसाब-किताब के बाद आपका केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के खाली पदों, और निजी विश्वविद्यालयों में एसटी-एससी, ओबीसी के अनुपात का दर्द जाता रहेगा। अधिक बुरा हाल देखकर उससे कुछ कम बुरा हाल भी अच्छा लगने लगता है, भारत में यही सामाजिक हकीकत है, लेकिन इसके ठीक-ठीक अहसास, और इससे आजादी पाने की भी जरूरत है। अगर सचमुच ही लोकतांत्रिक-न्याय की बात करें, तो इस सोच में क्या बुराई है कि सरकारी नौकरियां उन्हीं को मिलें जो सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं?

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अगस्त 2025



 

फौज की पोशाकों से अर्धनारीश्वर बनना!

24 अगस्त 2025 

 

अभी अमिताभ बच्चन के एक लोकप्रिय कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति में विशेष आमंत्रित मेहमानों के दर्जे में भारतीय फौज की उन महिला अधिकारियों को अमिताभ के सामने बिठाया गया जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मीडिया को ब्रीफ किया था। उस बात की भी कुछ लोगों ने आलोचना की थी कि फौज की जिम्मेदारियों का इस तरह से लोक-लुभावनीकरण नहीं किया जाना चाहिए। खैर, वह बात आई-गई हुई, अब दिल्ली में मिस यूनिवर्स बनी स्मृति छाबड़ा का एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें वे कर्नल सोफिया कुरैशी, और विंग कमांडर व्योमिका सिंह दोनों को टू-इन-वन दिखा रही हैं। वे भारत के प्रतीक, शायद इंडिया-गेट की प्रतिकृति के नीचे एक फौजी यूनिफॉर्म पहनकर परेड के अंदाज में चलकर आती हैं, और फौजी सलामी देती हैं। इसमें एक बड़ी दिक्कत यह है कि वे जो यूनिफॉर्म पहने दिखती हैं, वह शिव के अर्धनारीश्वर रूप की तरह आधी थलसेना की है, और आधी वायुसेना की। कोई और कार्यक्रम रहता, मिस यूनिवर्स किसी और धर्म की रहती, तो अब तक उसका किसी पड़ोसी देश का वीजा बन गया रहता। अब सवाल यह उठता है कि लोकप्रियता के लुभावने अभियानों में फौज का कितना इस्तेमाल करना चाहिए? 

दुनिया भर में फौज की टीमें उनका हौसला बरकरार रखने के लिए, उन्हें फिटनेस की तरफ बढ़ाने के लिए तरह-तरह के रोमांचक अभियानों में लगाई जाती हैं। कहीं वे पर्वतारोहण करती हैं, कहीं वे समंदर पर अकेले बोट के सफर पर चली जाती हैं। लेकिन इसका रोमांच और हौसले से सीधा लेना-देना रहता है। फौज के लोग आमतौर पर स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस की परेड जैसे कार्यक्रमों तक सीमित रखे जाते हैं। ऐसे में कौन बनेगा करोड़पति तक फौज का जो विस्तार हुआ, वह मिस यूनिवर्स की रैम्पवॉक-परेड तक बिखर गया। कुछ लोगों को इसमें कुछ भी गलत नहीं लगेगा, लेकिन जिस फौज को अपनी संवेदनशील भूमिका को ध्यान में रखते हुए अपने दायरे को सीमित रखना चाहिए, जिसे सोशल मीडिया से भी दूर रहने को कहा जाता है, इधर-उधर दोस्ती करने से भी जिसे रोका जाता है, उसे, या उसकी वर्दी को अर्धनारीश्वर की तरह पेश करना फौज की गंभीरता को कम करना है या नहीं, उस बारे में भी सोचना चाहिए। अभी वह विवाद तो खत्म हुआ ही नहीं है जिसमें मध्यप्रदेश के एक भाजपा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर की मीडिया प्रभारी कर्नल सोफिया को मंच से चीख-चीखकर आतंकियों की बहन कहा था, और जो सुप्रीम कोर्ट की बड़ी कड़ी फटकार के बाद भी माफी मांगने के लिए भी तैयार नहीं हैं। 

फौज को लेकर न तो कोई राष्ट्रवादी उन्माद जायज है, और न ही फौज का कोई मनोरंजक इस्तेमाल। फौज को उसकी पूरी जरूरी-गंभीरता के साथ अलग-थलग रहने देना चाहिए। देश वैसे भी इस विवाद को बरसों से झेल रहा है कि फौज से निकलने के बाद अफसरों का तुरंत ही राजनीति में आ जाना, और चुनाव लडऩा कितना जायज है, और कितना नहीं। यह बात सिर्फ फौजी अफसरों के लिए हो रही हो ऐसा भी नहीं है, यह बात जजों के बारे में भी हो रही है कि एक दिन पहले तक राजनीतिक रूझान वाले मामलों पर सक्रियता से फैसले देने वाले जज कार्यकाल के बीच इस्तीफा देकर अगले दिन एक राजनीतिक दल में आ जाएं, और उसके उम्मीदवार बनकर चुनाव भी लड़ लें। फौज हो या अदालत, इनको घरेलू जमीन पर, और अपने दायरे में किसी लगाव या दुराव से परे रहना चाहिए। एक वक्त था जब सरहद पर जवानों के मनोरंजन के लिए सुनील दत्त और नरगिस जैसे कलाकार लगातार वहां जाते थे। अब फौजी अफसर ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बोलने के लिए देश के सबसे बड़े, और खालिस बाजारू टीवी कार्यक्रम पर जा रहे हैं। इस सिलसिले की संवेदनशीलता हो सकता है कि बहुत लोगों को समझ भी न आए क्योंकि आम जनता जटिल पहलुओं को समझने से अपने आपको आजाद रखती है, और यह भी मानकर चलती है कि किसी जटिलता का अस्तित्व भी नहीं है। लेकिन जब जिंदगी के किसी एक दायरे में किसी संवेदनशील सरहद को पार किया जाता है, तो उसकी मिसाल का कई और जगहों पर बेजा इस्तेमाल भी होता है। 

जिस तरह आईएएस अफसरों पर यह बंदिश रहती है कि वे नौकरी छोडऩे के बाद कुछ वक्त तक किसी निजी कंपनी में काम नहीं कर सकते। यह बंदिश तो रहती ही है कि जिस कंपनी से उनका सरकारी नौकरी में रहते हुए कोई वास्ता पड़ा हो, वहां तो तुरंत बिल्कुल ही नहीं जा सकते। ऐसे में अभी जब कुछ अरसा पहले एक केन्द्रीय जांच एजेंसी का एक अफसर नौकरी छोडक़र तुरंत ही देश की एक सबसे बड़ी, और खासी विवादास्पद कंपनी में चले गया तो भी लोगों ने जायज और नाजायज के सवाल उठाए। आखिर में हम इसी बात को दोहराना चाहते हैं कि फौज और अदालत जैसी जगहों से निकलकर, या इन जगहों पर रहते हुए भी लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे कहां जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं, या क्या कह रहे हैं। लोकतंत्र में जो महत्वपूर्ण संस्थान हैं, उन्हें विवादों से एकदम ही दूर रहना चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अगस्त 2025



 

स्कूलों में चाकू-पिस्तौल, गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़, और उत्तराखंड तक एक हाल

23 अगस्त 2025 

 

दो दिन पहले गुजरात की राजधानी अहमदाबाद के एक स्कूल में 8वीं के छात्र ने 10वीं के छात्र को चाकू मार दिया और उसकी मौत के बाद स्कूल में घुसकर लोगों ने जमकर तोडफ़ोड़ की। चाकू मारने वाले इस छात्र के मोबाइल फोन से दूसरे छात्र की बातचीत भी सामने आई है जिसमें मौत की खबर मिलने पर भी यह चाकूबाज लडक़ा बेफिक्र रहता है। आज गुजरात के एक और जिले में चाकूबाजी हुई, वहां भी 8वीं के छात्र ने 10वीं के एक छात्र को चाकू घोंप दिया, और घायल लडक़ा अस्पताल में है। लेकिन गुजरात ऐसा अनोखा राज्य नहीं है, छत्तीसगढ़ में रायपुर, बिलासपुर जैसे कई शहरों में स्कूलों में चाकूबाजी धड़ल्ले से चल रही है, और कहीं उसके वीडियो सामने आते हैं, तो कहीं खून से लहूलुहान छात्रों की तस्वीरें आती हैं। उत्तराखंड की एक अलग खबर है कि 9वीं कक्षा का एक छात्र होमवर्क पूरा न करने पर टीचर की डांट से खफा था, और वह घर से टिफिन में देसी पिस्तौल लेकर गया, और उस टीचर पर गोली चलाकर उसे जख्मी कर दिया। टीचर अभी अस्पताल में है, और छात्र स्कूल छोडक़र भाग गया। 

यहां पर दो चीजें अलग-अलग चर्चा के लायक हैं, पहली तो यह कि स्कूली छात्रों के बीच हिंसा इतनी क्यों बढ़ रही है? दूसरी बात यह कि स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं से परे भी चाकू का इतना इस्तेमाल क्यों हो रहा है? इन दोनों के पीछे सोशल मीडिया पर डाली जा रही रील का भी असर है, पेशेवर मुजरिमों से लेकर शौकिया शेखी बघारने वाले लोगों तक को वीडियो बना-बनाकर जगह-जगह पोस्ट करना इतना पसंद है कि लोग अपने खुद के जुर्म के वीडियो डाल रहे हैं, यह जानते-समझते कि ऐसे ही वीडियो पर कार्रवाई करना पुलिस के आसान इसलिए हो जाता है कि वे सीधे-सीधे सुबूत भी रहते हैं, और जहां से पोस्ट किए गए हैं, वे फोन नंबर या इंटरनेट कनेक्शन भी तुरंत ही पुख्ता सुबूत बन जाते हैं। हर दिन ऐसे कई लोग गिरफ्तार होते हैं, और उससे सैकड़ों गुना अधिक लोग अपने ऐसे ही जुर्म पोस्ट करते रहते हैं। शायद समाज में हिंसक ताकत का ऐसा प्रदर्शन एक फैशन बन गया है, और इन दिनों इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया पर अपनी रील बना-बनाकर डालने वाले स्कूली बच्चों से लेकर नौजवान और अधेड़ लोगों तक को अपने जुर्म के वीडियो भी शान का सामान लगते हैं। हर दिन आवारा और मवाली लडक़ों के वीडियो आते रहते हैं जिनमें वे पिस्तौल और चाकू दिखाते हुए, अपने आपको डॉन कहते हुए दिखते हैं, और कमउम्र के या नौजवान बाकी लोगों पर भी ऐसी ही हरकत करने का एक मानसिक दबाव बन जाता है। फिर कब सिर्फ वीडियो के लिए लाए गए चाकू-कट्टा असल हिंसा का सामान बन जाते हैं, यह पता भी नहीं चलता। 

स्कूल के छात्रों के बीच हिंसा इतनी बढऩे की दो वजहें हमें और लगती हैं। जिन राज्यों में पढ़ाई-लिखाई से जिंदगी में आगे बढऩे का बहुत अधिक लेना-देना नहीं रहता है, वहां पर मां-बाप की छाती पर मूंग दलते हुए टीनएजर्स और नौजवान स्कूल-कॉलेज में जाते जरूर हैं, लेकिन उनके सामने पढ़ाई के लिए कोई प्रेरणा नहीं रहती। पढ़-लिखकर क्या होगा जब नौकरी के लिए तो रिश्वत देनी ही होगी! ऐसी सोच में जीने वाले लडक़े-लड़कियों के बीच हिंसा आसानी से पनप जाती है, और हिंसा से परे के दूसरे किस्म के जुर्म भी। अभी हमारे पास उत्तर भारत, या हिन्दी राज्यों के स्कूली छात्रों के जुर्म के आंकड़ों की दक्षिणी राज्यों से तुलना नहीं है, लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि जिन राज्यों में पढ़ाई-लिखाई का आगे की जिंदगी से सीधा रिश्ता रहता है, वहां स्कूल-कॉलेज की उम्र में इस तरह के जुर्म कम होते होंगे क्योंकि पढ़ाई उनके लिए मायने रखती है।

दूसरी बात यह भी लगती है कि सरकारी या गैरसरकारी, किसी भी किस्म की स्कूलों में अब शिक्षकों का छात्र-छात्राओं से पहले सरीखा रिश्ता नहीं रह गया है। अब क्लासरूम की पढ़ाई से परे बहुत अधिक मेहनत करना शिक्षक-शिक्षिकाओं के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि मेहनत करने का नतीजा दिख रहा है कि किस तरह होमवर्क के मुद्दे पर टीचर को गोली खानी पड़ी है। कुछ बहुत महंगी निजी स्कूलों में तो परामर्शदाता रहते भी होंगे, लेकिन अब सरकारी स्कूलों में तो जहां शिक्षक भी पूरे नहीं हैं, हैं तो वे दारू पीकर पड़े हैं, ठेके पर दूसरे को पढ़ाने के लिए रख लिया है, लड़कियों से छेडख़ानी कर रहे हैं, तो वे छात्र-छात्राओं को हिंसा के प्रति क्या जागरूक करेंगे? एक किस्म से स्कूली उम्र के बच्चे न मां-बाप के काबू के रह जाते, और न स्कूल के। वे बस अपने हमउम्र बच्चों के साथ बुरी आदतें सीखने के लिए आजाद रहते हैं, और उनमें से कुछ तब पकड़ाते हैं जब वे कोई बड़ा जुर्म कर बैठते हैं। वरना इसी उम्र के लडक़े-लड़कियों के बीच सेक्स के जुर्म होते हैं, वीडियो बनाकर ब्लैकमेलिंग चलती है। 

भारत में आज सरकारों की प्राथमिकता जुर्म दर्ज होने के बाद जांच और सजा तक सीमित है, या फिर महापुरूषों की जीवनियां पढ़ाने तक। ये बच्चे आज मोबाइल की मेहरबानी से हर दिन कई घंटे जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर गुजारते हैं, वहां पर इन्हें दिखने वाली सामग्री पर सरकार या समाज का कोई काबू नहीं है। और तो और जो कमउम्र बच्चे स्कूटर-मोटरसाइकिलों पर स्कूल जाते हैं, उन पर हेलमेट अनिवार्य करने जैसी मामूली सी बात भी स्कूल लागू नहीं करते, और सरकार उस पर कोई कार्रवाई नहीं करती। ट्रैफिक-नियम तोडऩे से जो दुस्साहस मिलता है, वह बाकी-कानून तोडऩे तक, और जुर्म करने तक जारी रहता है, और कोई अगर यह सोचे कि छात्रों के बीच चाकूबाजी को मैटल डिटेक्टर लगाकर रोका जा सकता है, तो वह गलतफहमी होगी। कानून की इज्जत किस्तों या कतरों में नहीं आती, वह आती है तो मिजाज में आती है, नहीं तो फिर दूर चली जाती है। इसलिए राज्य सरकारों को, या कि निजी स्कूल संचालकों को अपने छात्र-छात्राओं के बीच कानून के सम्मान का मिजाज ही बनाना पड़ेगा, उन्हें हेलमेट जैसी छोटी चीज से भी कानून की इज्जत सिखानी होगी, वरना बढक़र वह चाकूबाजी तक पहुंच रही है। सरकारों को पुलिस और अदालत से परे भी इस बारे में सोचना होगा, वरना यह सिलसिला बढ़ते ही चलेगा। अब तो बहुत सारे लोग अपनी हिंसा के वीडियो पोस्ट करते हुए यह परवाह भी नहीं करते कि यह उनके जुर्म का पुख्ता सुबूत भी है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अगस्त 2025



 

कुत्तों पर सुप्रीम फैसला पलटा, अब सडक़ें उनकी

22 अगस्त 2025 

 

देश भर में सडक़ और फुटपाथ के कुत्तों के बारे में पिछले पखवाड़े सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज एक बड़ी बेंच ने पलट दिया है। दो जजों की बेंच ने 11 अगस्त को दिल्ली-एनसीआर इलाके की म्युनिसिपलों, और सरकारों को कहा था कि सडक़ों से तमाम कुत्तों को उठाकर उन्हें बनाए गए बाड़ों में रखा जाए, और वापिस नहीं छोड़ा जाए। जजों ने सडक़ों पर बच्चों और आम लोगों को कुत्तों द्वारा बहुत बुरी तरह काटने की घटनाओं पर फिक्र जाहिर करते हुए यह कड़ा फैसला दिया था, जिस पर पशुप्रेमियों ने सार्वजनिक प्रदर्शन भी किया, और सुप्रीम कोर्ट तक दुबारा दौड़ भी लगाई। जनभावनाओं को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश ने तीन जजों की एक नई बेंच बनाई, जिसने आज सुबह फैसले को पलटकर यह कहा कि कुत्तों को जिस इलाके से उठाया जाए, उसी इलाके में नसबंदी-टीकाकरण के बाद उन्हें वापिस छोड़ा जाए। इससे परे अदालत ने यह भी कहा कि हर इलाके में फुटपाथी कुत्तों को खाना खिलाने की जगह तय की जाए, और उस जगह के अलावा दूसरी जगहों पर उन्हें खाना देने पर जुर्माना लगाया जाए। 

अदालत का यह फैसला दिल्ली शहर में पशुप्रेमियों के प्रदर्शन, विरोध, और उनके रोने-धोने के वीडियो की प्रतिक्रिया दिखता है। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट में किसी भी आदेश या फैसले को अधिक बड़ी बेंच पलट सकती है, और ऐसा बहुत से मामलों में होता है, लेकिन यह फैसला उन लोगों के असर में, उन लोगों द्वारा लिया हुआ है जो कि कारों में चलते हैं। जो गरीब और आम लोग सडक़ों पर पैदल चलते हैं, साइकिल या किसी और दुपहिया पर चलते हैं, या विकलांग हैं, और बैसाखियों के साथ चलते हैं, उन्हें इस फैसले से निराशा होगी, क्योंकि उन पर हिंसक कुत्तों का खतरा मंडराता ही रहेगा। पिछले पखवाड़े का फैसला दिल्ली-एनसीआर इलाके के लिए दिया गया था, आज के फैसले को पूरे देश के लिए लागू किया गया है, और सभी राज्यों को अदालत ने निर्देश भेज दिए हैं। 

पशुप्रेमियों के तर्क यह है कि सार्वजनिक जगहों पर कुत्तों की मौजूदगी हमेशा से रहती आई है, और वे समाज का हिस्सा हैं, उन्हें कैदी की तरह किसी बाड़े में नहीं रखा जा सकता। राहुल गांधी भी दिल्ली के कार सवार तबकों की तरह कुत्तों पर रोक के खिलाफ खुलकर सामने आए हैं। दूसरी तरफ आम जनता का हाल यह है कि उसे कुत्ते दौड़ा रहे हैं, काट रहे हैं, और आम लोग सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल कई मायनों में नहीं कर पाते हैं। हमने पिछले फैसले की तारीफ की थी, और उसे देश भर में लागू करने की वकालत की थी। आज का यह फैसला उसके ठीक खिलाफ है। (ऐसे में आज फिर इस पर लिखते हुए यह साफ कर देना जरूरी है कि इस संपादक को अभी कुछ हफ्ते पहले सडक़ के कुत्ते ने काटा, और उसके बाद एक महीने में पांच इंजेक्शन लगवाने पड़े। चूंकि कॉलोनी के उसी हिस्से में 50-60 और कुत्ते हैं जिन्हें खिलाने के लिए लोग आते ही रहते हैं, इसलिए इस हादसे के बाद इस संपादक का शाम-रात उस इलाके में रोज घंटे-दो घंटे पैदल चलने का सिलसिला पूरी तरह खत्म हो गया है क्योंकि अगर बारी-बारी से हर कुत्ता काटना तय करेगा, तो बाकी पूरी जिंदगी हर हफ्ते इंजेक्शन में ही गुजरेगी। )

हम अपने अखबार में सोशल मीडिया पर पोस्ट एक विकलांग आंदोलनकारी का एक लेख आज ही छाप रहे हैं कि बैसाखियों पर चलने वाले लोगों को कुत्तों से किस तरह खतरा रहता है, और उनके हमले से गिर जाने के बाद वे अपने आपको बचा भी नहीं पाते हैं। कुछ ऐसा ही हाल बच्चों, और बुजुर्गों पर कुत्तों के झपटने से होता है, वे भी अपने को नहीं बचा पाते। साइकिल और दूसरे दुपहियों पर चलने वाले लोगों के पीछे कुत्ते कई बार दौड़ते हैं, और संतुलन और आपा खोकर ऐसे लोग गिरते हैं। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इन सबकी सडक़ों पर मौजूदगी की गारंटी कर दी है, तो लोग अपने आपको बचाकर चलें, बचा नहीं सकते, तो फिर न चलें, क्योंकि अब तो टेलीफोन और मोबाइल एप्लीकेशन से हर चीज घर पर बुलाई जा सकती है, हालांकि कुत्तों के काटने के बाद लगने वाले एंटीरैबीज इंजेक्शन की डोर-डिलीवरी अभी शुरू नहीं हुई है।

जिन लोगों को यह लगता है कि कुत्ते हमेशा से समाज का हिस्सा रहे हैं, उन्हें इतिहास पढऩा चाहिए कि इंसानों ने एक जंगली जानवर को पालतू और घरेलू बनाकर उन्हें आज के कुत्तों की तरह ढाला था। लेकिन वे कुत्ते सार्वजनिक नहीं होते थे, वे उनके परिवार का हिस्सा होते थे, शिकार पर उनका साथ देते थे, उनके जानवरों की रखवाली करते थे। आज भारत के तमाम शहर, गांव-कस्बों में जो खतरा है, वह पालतू कुत्तों से नहीं है, वह सडक़ों के कुत्तों से है, जो कि समाज का हिस्सा नहीं बनाए गए थे, घरों से निकाल दिए जाने पर, या बेकाबू आबादी बढऩे पर वे बढ़ते चले गए, और आज कोई भी इंसान उनके लिए जवाबदेह नहीं हैं। यह सिलसिला खतरनाक है, और सुप्रीम कोर्ट के जजों ने शायद बहुत पहले से सार्वजनिक सडक़ों पर रोज का काम पैदल करना छोड़ दिया है। फौलादी कारों के भीतर झपटते कुत्तों के जबड़ों की धार का पता नहीं चलता है।  

किसी भी रिहायशी बस्ती में घूमने निकलने वाले लोगों, या कामकाज से आने-जाने वाले लोगों की जिंदगी ऐसे कुत्तों की वजह से खतरे में है, वे आशंका में भरे हुए किसी इलाके में जाते हैं, और सरकारी अस्पतालों में कई जगह इंजेक्शन नहीं रहते, और रहने पर भी उन्हें लगवाने के लिए लोगों को घंटों का वक्त लगता है। जो गरीब और मजदूर लोग हैं, उनके लिए पांच-पांच बार अस्पताल जाना भी आसान नहीं रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने आज के अपने फैसले में सडक़ों पर कुत्तों को खिलाने के खिलाफ हिदायत दी है, लेकिन यह आदेश अमल के लायक नहीं है। आज जब सडक़ों पर हो रहे दंगे-फसाद को रोकने के लिए भी पुलिस नाकाफी है, ट्रैफिक को पुलिस देख नहीं पा रही है, म्युनिसिपलें शहरों को साफ नहीं कर पा रही हैं, हाईवे पर हादसों में इंसान और जानवर थोक में मर रहे हैं और हाईकोर्ट भी कुछ नहीं करवा पा रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के लिए तो यह कहना आसान है कि तय की हुई जगहों पर ही लोग कुत्तों को खिलाएंगे, और बाकी सडक़ों पर नहीं खिलाएंगे। इस बात पर अमल कौन करवा सकते हैं? और घने बसे हुए शहरों के बीच में कुत्तों को खिलाने के लिए जिस जगह को तय किया जाएगा, उसके आसपास के लोगों के लिए जो नया खतरा खड़ा होगा, जो नई दिक्कत खड़ी होगी, उसका सुप्रीम कोर्ट क्या इलाज करेगा? कुत्तों को सडक़ों से हटाने, उनकी लगातार नसबंदी करने, और दूसरे तरीकों से उनकी आबादी बढऩा रोकने के अलावा और कोई चारा नहीं है। पशुप्रेमियों को चाहिए कि जब तक सरकारी कोशिशों से आबादी कम नहीं होती तब तक वे अपने घर-परिवार में सडक़ के कुछ कुत्तों को ले जाएं, और उन्हें वहां पालें। वे खुद कारों में घूमें, और गरीब लोगों को कुत्तों के रहमोकरम पर धकेल दें, यह नाजायज बात है। 

कुत्ते समाज में चाहे जो जगह रखते आए हों, आज अगर वे पालतू नहीं हैं, उनके लिए कोई व्यक्ति जिम्मेदार नहीं हैं, तो उन्हें आम जनता पर इस तरह छोड़ देना उस जनता के सार्वजनिक जीवन के हक के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने जितनी कागजी बातें कही हैं, उनका भारत में सरकार और म्युनिसिपलों की हकीकत के साथ कोई रिश्ता नहीं है। सडक़ों पर आज मंडराता खतरा जारी रहेगा, और कुत्तों की बढ़ती हुई आबादी लगातार खतरा भी बढ़ाती रहेगी। हो सकता है कि पांच-दस साल बाद कुछ जजों को कुत्ते काटें, तो उसके बाद उन्हें आम जनता की तकलीफ का अहसास हो।  

(Daily Chhattisgarh)

राज्यपाल-राष्ट्रपति पर समय सीमा के खिलाफ सरकारी लड़ाई कहां तक?

 21 अगस्त 2025 

 

सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर बहस चल ही रही है कि किसी विधानसभा के पास किए हुए विधेयक को रोकने का अधिकार राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास कितने समय के लिए होना चाहिए? यह बहस सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से आगे बढ़ी जिसमें अदालत ने इसके लिए तय किया कि राज्यपाल और राष्ट्रपति एक समय सीमा के भीतर विधेयकों पर फैसला लें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के अभी तक के चले आ रहे असीमित अधिकारों की एक सीमा तय की। और इसी के साथ तमिलनाडु के जिस मामले को लेकर यह सुनवाई चल रही थी, वहां भी एनडीए के मनोनीत राज्यपाल हैं, राज्य सरकार केन्द्र की एनडीए सरकार के खिलाफ है, और यह बात केन्द्र सरकार को बहुत ही बुरी तरह खल गई कि राज्यपालों को बरसों तक विधेयकों पर बैठने का हक नहीं मिले। इसे लेकर मामला जब राष्ट्रपति तक पहुंचा, और सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि राष्ट्रपति भी तीन महीने के भीतर राज्यपाल के भेजे हुए ऐसे किसी विधेयक पर फैसला ले लें, तो फिर राज्यपाल की तरफ से भी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर राय ली गई, और केन्द्र सरकार ने तो अदालत में इसका बहुत जमकर विरोध किया कि यह अदालत के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं है कि वह राज्यपाल और राष्ट्रपति के फैसलों की समय सीमा तय करे। 

कुछ महीने पहले जब सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया था, उस वक्त भी हमने उसकी तारीफ में जमकर लिखा था कि राज्यपाल हो या राष्ट्रपति, उनके अधिकार कहीं भी अलोकतांत्रिक नहीं हो सकते। ये दोनों ओहदे तो बने ही लोकतंत्र के तहत हैं, और भारत का संविधान भी लोकतंत्र के तहत ही बना है। संविधान लोकतंत्र से ऊपर नहीं है, और इसीलिए समझदार लोग इस बात को कहते हैं कि संविधान के शब्दों के साथ-साथ उसकी एक भावना भी होती है। केन्द्र सरकार राज्यपाल और राष्ट्रपति के अधिकारों को असीमित बनाने के लिए अदालत में बहुत ही अलोकतांत्रिक, और हास्यास्पद तर्क दे रही है। जिस पर अभी सुनवाई चलते बीच ही हम एक बार फिर लिख रहे हैं, ताकि पाठकों के सामने इस बहुत महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर हम अपनी सोच और समझ सामने रख सकें। सुप्रीम कोर्ट में कल इस पर चल रही बहस के दौरान केन्द्र सरकार के वकील ने कहा कि राज्यपाल के पास से बिल को मंजूरी नहीं मिलने का मतलब है कि वह बिल समाप्त हो गया। पांच जजों की संविधानपीठ ने इस पर कहा कि अगर विधेयक लौटाए बिना राज्यपाल रोककर अंतहीन रख सकते हैं, तो इसका मतलब तो यह हो जाएगा कि जनता के द्वारा निर्वाचित सरकारें अब राज्यपाल की मर्जी से चलेंगी। मुख्य न्यायाधीश ने केन्द्र सरकार के वकील से पूछा कि जो सरकार कह रही है उसका मतलब तो यह है कि बहुमत से चुनी गई सरकार राज्यपाल की मनमानी की मोहताज होगी। बेंच के एक जज ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राज्यपाल अनुमति देने से इंकार करें, और विधेयक खत्म हो जाए। इस पूरे मामले पर ऐसी दिलचस्प बहस चल रही है कि आम लोगों को भी खबरों में उसे पढऩा चाहिए, या अगर वे अंग्रेजी समझ सकते हैं, और सुप्रीम कोर्ट की इस मामले की कार्रवाई का प्रसारण हो तो उसे देखना चाहिए।

हम तो लोकतंत्र की भावना को लेकर अपनी पिछली बात को दुहरा भी रहे हैं, और आगे भी बढ़ा रहे हैं कि राज्यपाल हो या राष्ट्रपति, उन्हें लोकतंत्र में तानाशाह के हक नहीं दिए जा सकते। भारत की संवैधानिक व्यवस्था को समझने की जरूरत है। राज्यपाल पूरी तरह से केन्द्र सरकार के मातहत काम करते हैं, और संवैधानिक रूप से उन्हें कागजों पर राष्ट्रपति के प्रति जवाबदेह भी बताया जाता है। यह बात बिल्कुल साफ-साफ लिखी गई है कि राष्ट्रपति के कोई भी फैसले केन्द्रीय मंत्रिमंडल के लिए गए फैसलों के मुताबिक ही रहते हैं। ऐसे में जाहिर है कि राज्यपाल जो कि केन्द्र सरकार द्वारा मनोनीत रहते हैं, केन्द्र सरकार को रिपोर्ट करते हैं, केन्द्र के प्रति जवाबदेह रहते हैं, वे केन्द्र सरकार के ही एक किस्म से एजेंट रहते हैं जो कि अंग्रेजीराज में रहते थे। जहां कहीं राज्य की निर्वाचित सरकार केन्द्र की निर्वाचित सरकार से असहमति वाली रहती है, वहां पर राज्यपाल तिकड़म के खेल खेलते हैं, सरकारों को अस्थिर करने का काम करते हैं, दलबदल के खेल में वे खेल प्रशिक्षक बनकर मैदान को सुबह पांच बजे भी खोल देते हैं, जैसा कि महाराष्ट्र में हुआ था। भारत की लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था में राज्यपाल और राष्ट्रपति ये दोनों ही केन्द्र सरकार की मर्जी से काम करते हैं, और इनके ओहदों को सुर्खाब के कितने ही पर खोंस दिए जाएं, ये केन्द्र के मनोनीत रहते हैं, और केन्द्र के ताबेदार रबरस्टाम्प रहते हैं। इनके रहमोकरम पर निर्वाचित सरकार और विधानसभा के भेजे गए विधेयकों को छोडऩे का मतलब उन्हें सीधे-सीधे केन्द्र सरकार के रहमोकरम पर छोड़ देना है। 

अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों का बहुमत लोकतंत्र का सम्मान करेगा, तो केन्द्र सरकार की सारी आपत्तियों को सिरे से खारिज कर देगा। लेकिन पूरी दुनिया में जगह-जगह जब सरकारों की दखल जज बनाने में रहती है, तो जजों की दिलचस्पी उन सरकारों की पसंद-नापसंद से जुड़ जाती है। भारत के सुप्रीम कोर्ट के जजों के बारे में हम अलग से कोई बात कहना नहीं चाहते, लेकिन बहुत से ऐसे मुख्य न्यायाधीश हुए हैं, या दूसरे जज हुए हैं जिनकी सरकार के प्रति एक खास रहमदिली की चर्चा होती ही रही है। अब पांच जजों की इस बेंच में बहुमत की रहमदिली लोकतंत्र के साथ है, या कि सरकार के साथ है, इसका कोई अंदाज हमें नहीं है। फिर भी केन्द्र सरकार आज देश के अधिकतर राज्यों में अपनी सरकारों को देखते हुए, और सौ फीसदी राजभवनों में अपने मनोनीत राज्यपालों की वजह से, अपनी बनाई हुई राष्ट्रपति को देखते हुए इन दो ओहदों को तानाशाह बनाने पर उतारू दिख रही है। यह सिलसिला कोई भी लोकतांत्रिक संवैधानिकपीठ खारिज करेगी ही। आने वाले हफ्तों या महीनों में इस मामले पर फैसला होगा, और यह भी हो सकता है कि उस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट की किसी और बड़ी बेंच तक इसे ले जाया जाए क्योंकि केन्द्र सरकार जिस स्तर पर इस मामले को लड़ रही है, वह हार जाने पर यहीं पर थम नहीं जाएगी। यह मामला लोगों के लोकतांत्रिक-शिक्षण के लिए एक बहुत अच्छा मामला है, और आम लोगों को भी इस बहस में दिलचस्पी लेना चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अगस्त 2025



 

बिना नाम, 140 करोड़ का सोना तिरूपति में दान!

20 अगस्त 2025 

 

आन्ध्र के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने अभी एक बेनाम दानदाता के तिरूपति मंदिर को दिए गए दान की जानकारी दी जो कि शायद इस मंदिर को मिलने वाला एक सबसे बड़ा चढ़ावा है। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति ने भगवान वेंकटेश्वर से आशीर्वाद मांगकर कारोबार शुरू किया था, और उसमें उसे बड़ी कमाई हुई। उसने अपनी कंपनी के 60 फीसदी शेयर बेचे, और उससे उसे 6 हजार करोड़ रूपए मिले। उसने समाज और तिरूपति मंदिर का उपकार चुकाने के लिए मंदिर में करीब 140 करोड़ रूपए दाम का 121 किलो सोना दिया है। इस मंदिर में देव प्रतिमा को हर दिन सोने के जो गहने पहनाए जाते हैं, वे 120 किलो के रहते हैं, यह जानकार इस दानदाता ने उससे अधिक सोना दिया है, और अपना नाम भी नहीं बताया है। लोगों को यह बात पहले से पता भी होगी कि दक्षिण भारत में, और तिरूपति के दूसरे राज्यों में बसे भक्तों के बीच भी यह बात प्रचलन में है कि वे अपने कारोबार में भगवान वेंकटेश्वर को भागीदार बनाते और बताते हैं, और फिर कमाई का एक हिस्सा इस मंदिर को चढ़ा देते हैं। 

बिना वाहवाही और नाम कमाए कोई व्यक्ति अगर दान करे, तो उसका अधिक महत्व भी होता है। दुनिया में कई जगहों पर लोग दान तो करते हैं, लेकिन अपने या परिवार के नाम के ट्रस्ट बना लेते हैं, और फिर उसके मार्फत अपनी कमाई का एक हिस्सा समाज को देते हैं। लोगों को याद होगा कि किस तरह दुनिया के कुछ सबसे बड़े कारोबारी, वारेन बफेट और बिल गेट्स ने अपनी आधी, या उससे भी अधिक संपत्ति समाज के लिए देना तय किया, और वे लगातार दान देते चल रहे हैं। ये कारोबारी दुनिया के दूसरे अतिसंपन्न लोगों को भी इस बात के लिए हौसला देते हैं कि वे भी समाज को लौटाने का काम करें। भारत में भी कई ऐसे बड़े कारोबारी हैं जो अपनी संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज को दे रहे हैं, और खुद बहुत सादगी की जिंदगी जीते हैं। अजीम प्रेमजी ने हजारों करोड़ रूपए समाज पर बेहतरी के लिए खर्च करना जारी रखा है, और वे खुद विमान की इकॉनॉमी क्लास में चलते हुए देखे जाते हैं। वे अपनी दौलत का बहुत बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं, और उनका फाउंडेशन सात राज्यों में साढ़े तीन लाख स्कूलों में वे शिक्षकों को ट्रेनिंग देने का काम करता है, और उनके दान की रकम अविश्वसनीय किस्म की है। उनके मुकाबले इस देश में सैकड़ों गुना बड़े दौलतमंद भी अपनी जेब के कुछ सिक्कों जितना दान भी नहीं करते हैं। भारत में एक दिक्कत यह लगती है कि लोग, अधिकतर लोग धर्म के नाम पर ही जेब से पैसा निकालते हैं, किसी मंदिर, या किसी बाबा के लिए वे मोटा दान देने तैयार हो जाते हैं, लेकिन समाज के सबसे जरूरतमंद तबकों की सीधी भलाई के लिए कोई सामाजिक संगठन बनाने, या किसी साख वाले सामाजिक संगठन को सीधे दान देने वाले लोग कम हैं। इसलिए अजीम प्रेमजी सरीखे लोगों का एक ऐतिहासिक महत्व है, और वे हो सकता है कि देश के दूसरे अरब-खरबपतियों के लिए एक मिसाल भी बन सकें।

कल की ही खबर है कि अजीम प्रेमजी फाउंडेशन ने छत्तीसगढ़ सरकार के साथ एक एमओयू किया है जिसके तहत वह अंबिकापुर में और धरमजयगढ़ में अस्पताल बनाएगा, बालिकाओं को उच्च शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप देगा, और अभी चलाए जा रहे चार सौ झूलाघरों को बढ़ाकर ढाई-तीन हजार झूलाघरों तक ले जाएगा। आज देश में किसी भी धर्म के दानदाताओं में अजीम प्रेमजी का योगदान बेमिसाल है, और इस बात से देश के जिन भी हमलावर तबकों को कोई नसीहत मिल सकती है, उन्हें लेनी चाहिए। इस मौके पर हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि कई किस्म के संगठन जरा सी कोई सामाजिक मदद करके अपने ढेर सारा प्रचार जुटाते हैं। कहीं-कहीं से ऐसी तस्वीरें भी सामने आती हैं जिनमें अस्पताल में भर्ती मरीज को एक केला या सेब थमाते हुए दर्जन भर लोग अपनी फोटो खिंचवाते हैं। गरीबों की बहुत मामूली मदद का ऐसा अश्लील नगदीकरण करने वाले लोगों को वाहवाही की जगह धिक्कार मिलनी चाहिए, ऐसे लोगों को यह भी देखना चाहिए कि तिरूपति में कल 140 करोड़ का चढ़ावा चढ़ाने वाले ने अपना नाम भी उजागर करना पसंद नहीं किया। ऐसे लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि विमान की सबसे मामूली सीट पर सफर करने वाले अजीम प्रेमजी कितने बड़े दानदाता हैं, और कई देशों में अपने बेटे की शादी का जलसा मनाने वाले, उस एक शादी पर हजारों करोड़ रूपए खर्च करने वाले खरबपति का दान का क्या रिकॉर्ड है। चाहे अमरीका के अतिसंपन्न लोग हों, चाहे योरप के, उनमें से हजारों लोग इकट्ठे होकर अब अपनी सरकारों से यह मांग भी कर रहे हैं कि अतिसंपन्नता पर टैक्स बढ़ाना चाहिए क्योंकि आज क्षमता के बावजूद ऐसे लोगों पर टैक्स बहुत ही कम है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प सरीखे लोग बहुत बड़े कारोबारी होने के बाद भी इतनी तिकड़मों से टैक्स चुराते हैं कि अमरीकी अदालतों में उनके खिलाफ मामले बड़ी संख्या में चल रहे हैं। 

अच्छी समाजसेवा करने वाले कोई धर्मस्थान हों, धार्मिक संगठन हों, ऐसा बहुत कम होता है। इसलिए लोगों को बिना धार्मिक भावना के सीधे समाज सेवा करने वाले लोगों को, संगठनों को दान देना चाहिए, या उनके दान का आकार बहुत बड़ा हो, तो उन्हें अजीम प्रेमजी फाउंडेशन जैसी संस्था बनाकर दान का सद्उपयोग करना चाहिए। धर्म का दान अगर चर्च के रास्ते भी किसी देश पहुंचता है, तो बहुत से मामलों में वह धर्मांतरण में इस्तेमाल होता है। इसलिए धर्म का चक्कर ही बेकार है। लोगों को सीधे भरोसेमंद संगठन छांटने चाहिए, या खुद होकर मदद के लायक लोगों को ढूंढकर उनकी मदद करनी चाहिए। आपके पास अगर निजी जरूरतों से अधिक पैसा है, और उस पैसे का समाज के जरूरतमंद लोगों के लिए कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा है, तो यह आपकी हिंसा के बराबर है। पैसे पर सांप के कुंडली मारकर बैठने की कहावत चलती है, लेकिन सांप को तो नाहक बदनाम किया जाता है, इंसान ही अधिकतर ऐसी कुंडली मारकर बैठते हैं। उनके मरने के बाद उनकी इज्जत कहावतों के सांप जितनी ही रहती है।  

(Daily Chhattisgarh)