गुरू गोविंद दोनों खड़े, एआई के लागूं पांव...

 05 सितंबर 2025 

 

शिक्षक दिवस पर भारत में आज के दिन परंपरागत रूप से शिक्षकों के संस्मरण और उनके गुणगान छपते हैं। कुछ महानतम वैज्ञानिकों की कही या लिखी गई, या महज उनके नाम से प्रचलित और प्रचारित बातें भी सोशल मीडिया पर देखने मिल रही है कि अच्छे शिक्षक वे नहीं होते जो बच्चों को सिखाते हैं, बल्कि वे होते हैं जो बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। किसी एक लेखक-शिक्षक ने आज फेसबुक पर यह भी लिखा है कि शिक्षक की परंपरागत भूमिका एआई के आने के बाद अब एकदम से बदल गई है क्योंकि एआई के बाद लोगों को उस तरह सीखने की जरूरत भी नहीं रह गई है जैसी कि पहले थी। अब जरा सोचें, कि पहले पहाड़े की किताब आती थी, और लोग न सिर्फ दो-चार-आठ-दस का पहाड़ा पढ़ते थे, याद करते थे, बल्कि वे सवैया और डेढ़ैया जैसे कुछ पहाड़े भी पढ़ते थे जो सवा या उससे ज्यादा गुना का हिसाब रहता था। अब केलकुलेटर आए, तो पहाड़ा याद करना निरर्थक हो गया। पहाड़े की जो किताब बालभारती के साथ जबर्दस्ती बेची जाती थी, वह अप्रासंगिक हो गई। अब हिसाब-किताब के लिए इम्तिहानों में भी केलकुलेटर की छूट मिलने लगी है, मतलब यह कि अब पहाड़ा याद रखने की जरूरत नहीं है। इसी तरह इंटरनेट, गूगल, और विकिपीडिया आने के बाद सामान्य ज्ञान की बहुत सारी बातें, ऐतिहासिक और दूसरे किस्म के तथ्य याद रखने की जरूरत नहीं है क्योंकि पलक झपकते पूरी जानकारी स्क्रीन पर रहती है। इसलिए याददाश्त का वह हिस्सा भी अब गुरूमंत्र नहीं रह गया। एआई के बाद तो तस्वीर और बहुत दूर तक बदलने वाली है, या कि बदल चुकी है।

हमने एआई से ही पूछा कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस आ जाने के बाद अब स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई में क्या फर्क आएगा? उसने इस सवाल और इसके पूछे जाने के वक्त की तारीफ की, और कहा कि एआई हर छात्र-छात्रा के सीखने के तरीके, और उसके प्रदर्शन का अलग-अलग विश्लेषण कर सकता है, और हर छात्र-छात्रा के लिए अलग-अलग पाठ तैयार कर सकता है, उनकी क्षमता और जरूरत के मुताबिक उस रफ्तार से पढऩे की सामग्री बना सकता है। किसी एक छात्र-छात्रा को विषय के जिस हिस्से में दिक्कत हो, उसके लिए उस हिस्से का पाठ्यक्रम एआई बढ़ा सकता है, और जिस हिस्से में उन्हें बड़ी आसानी हो, उस हिस्से से उन्हें तेजी से आगे बढ़ा सकता है। किसी छात्र-छात्रा की गलतियों को एआई तुरंत पकडक़र उन्हें सुधारने के अलग-अलग तरीके तब तक बता सकता है, जब तक उन्हें वह बात ठीक से समझ न आ जाए। इससे स्कूल या क्लासरूम की पढ़ाई जिसमें कि हर किसी के लिए एक सरीखी ताकत लगाई जाती है, वह तस्वीर बदल जाएगी, और छात्र-छात्राओं के लिए एआई निजी ट्यूशन जैसे काम करने लगेगा, मानो वह उन्हीं को अकेले को पढ़ा रहा हो।

एआई ने ही यह भी सुझाया है कि आज शिक्षकों का बहुत सा समय छात्र-छात्राओं को अभ्यास देने में लगता है, और बाद में उन्हें जांचने-परखने में। एआई इस सारे काम को बड़ी आसानी से पल भर में कर सकता है ताकि शिक्षकों के लिए बहुत सा समय बच जाए। इस बचे हुए समय का इस्तेमाल शिक्षक सचमुच पढ़ाने में, प्रेरणा देने में, कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता में इस्तेमाल कर सकते हैं। एआई स्कूलों की हाजिरी जैसे दूसरे बहुत सारे काम खुद कर सकता है ताकि तमाम छात्र-छात्राओं से जुड़ी हुई जानकारियों को दर्ज करने, और जवाब-तलब करने का बोझ शिक्षकों पर से हट जाए। इसके अलावा एआई खुद शिक्षकों के ज्ञान, और उनकी क्षमता को बढ़ाने का काम भी कर सकता है, वे पल भर में जानकारी पाकर उसे अपनी मर्जी और समझ से ढाल सकते हैं, और अपने खास अंदाज में क्लासरूम में रख सकते हैं।

एआई ने अपनी सहूलियतें गिनाते हुए आगे कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ऐसे आभासी शिक्षक और चैटबोट सामने रख चुका है जिनसे छात्र-छात्राएं 24 घंटे में कभी भी कोई भी सवाल पूछ सकते हैं, जवाब पाकर उससे जुड़े और सवाल भी पूछ सकते हैं, जब तक, तब तक कि उनकी जरूरत पूरी न हो जाए। एआई किसी लिखी गई सामग्री को पढक़र भी सुना सकता है ताकि आंखों पर जोर कम पड़े, और सिर्फ कानों से काम चल जाए।  जिन लोगों ने एआई का अधिक इस्तेमाल नहीं किया है, वे इस बात को समझ सकते हैं कि यह गूगल की तरह सिर्फ सर्च करके, या विकिपीडिया की तरह उसमें पहले से दर्ज जानकारी को सामने रखने का काम नहीं करता, बल्कि विश्लेषण भी करता है, लिखता भी है, पहले से लिखे हुए का रूपांतरण भी कर देता है, इस तरह यह सर्चइंजन की अगली पीढ़ी नहीं है, बल्कि यह एक अलग ही बुद्धि है, जो कि छलांगें लगाकर इंसान की बुद्धि को पार करने की रफ्तार से आगे बढ़ रही है। जहां तक स्कूल-कॉलेज की किताबों, और पढ़ाई से मिलने वाले ज्ञान की बात है, तो इन मामलों में एआई काफी हिस्से में शिक्षक-शिक्षिकाओं से बेहतर साबित होगा। फिर भी व्यक्तित्व का कुछ ऐसा मौलिक हिस्सा रहेगा जिसे कि एआई नहीं पा सकेगा। यही मौलिकता शिक्षकों को दूर तक ले जाएगी, या कि इस काम में बने रहने में मदद करेगी।

कुछ महीने पहले से ब्रिटेन से ऐसी खबरें आ रही हैं कि वहां एआई ने चिकित्सा वैज्ञानिकों को कैंसर मरीजों की ऐसी दवाइयां बनाने में मदद की है जो कि किसी एक खास मरीज के लिए ही बनी है। अब हर मरीज की जरूरत के लिए एआई अलग-अलग दवा बना सकता है जो कि उसके लिए अधिकतम फायदे की, और न्यूनतम नुकसान की होगी। यह महीनों से शुरू हो चुका है, और कैंसर के बहुत से मरीज अकेले उनके लिए बनी हुई दवा पा रहे हैं, और यह सिर्फ एआई से मुमकिन हो पाया है। अब स्कूल-कॉलेज में भी हर छात्र-छात्रा की क्षमता और दिलचस्पी के मुताबिक अगर एआई अलग कोर्स, किताब, व्याख्यान, सवाल-जवाब तैयार कर दे, तो यह एक किस्म की क्रांति रहेगी। अभी तक तो पूरी की पूरी क्लास के लिए ये चीजें एक जैसी रहती हैं, और गिने-चुने शिक्षक-शिक्षिका ही ऐसे रहते हैं जो कि अलग-अलग बच्चों की अलग-अलग जरूरतों को आंककर उनके लिए ये बारीकियां अलग करते हैं। अब एआई से अगर यह होने लगता है, तो यह शिक्षण में उत्कृष्टता की एक अभूतपूर्व स्थिति रहेगी, जिसकी कल्पना भी अभी नहीं की जा सकती।

शिक्षक दिवस पर एआई का महज गुणगान करने से तस्वीर पूरी नहीं बनेगी। आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ने बहुत से लोगों के सोचने-समझने, और रचनात्मक लेखन, कल्पनाशील काम का बोझ खुद उठाना शुरू कर दिया है। इससे लोगों के दिमाग पर जोर पडऩा कम होने लगा है, और एआई उनके हिस्से का काम करके उन्हें, उनके दिमाग को अलाल बनाते चल रहा है। इस खतरे को अनदेखा करना भी ठीक नहीं है क्योंकि इससे इंसान की सोचने की, कल्पना की वह क्षमता मंद पड़ती चल रही है जो कि दसियों हजार साल में विकसित हुई है, और अभी पिछले साल-दो साल में ही जो कुछ लोगों के कामकाज में कुछ या अधिक हद तक गैरजरूरी हो रही है। इस खतरे के बीच से एक औजार का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है, यह देखना एक बड़ी समझ की बात होगी। एआई फिलहाल तो एक दुधारी तलवार की तरह है जिससे जरूरत की कटाई तो आसानी से हो रही है, लेकिन दूसरी तरफ हाथ कटने का खतरा भी उतना ही बड़ा मौजूद है। आज शिक्षक दिवस पर इस मुफ्त के शिक्षक को याद करना जरूरी है क्योंकि अगले शिक्षक दिवस तक यह कितनी जिंदगी पर काबिज हो चुका रहेगा, इसका अंदाज अभी खुद एआई भी नहीं लगा पा रहा है।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 5 सितंबर 2025

 



दीवारों पर लिक्खा है, 4 सितंबर 2025



 

जीएसटी सरलीकरण के साथ रियायतों से त्यौहारी उत्साह..

04 सितंबर 2025 

 

केन्द्र सरकार ने जीएसटी के कई स्लैब घटाकर अब कुल दो स्लैब रखे हैं जिनमें 99 फीसदी सेवा और सामान आ जाएंगे। बहुत थोड़े से गिने-चुने दारू-तम्बाकू किस्म के सामानों के लिए बहुत अधिक जीएसटी वाला एक स्लैब पहले भी था, और अभी भी रखा गया है। लेकिन जिंदगी की तकरीबन तमाम चीजें अब 5 फीसदी, और 18 फीसदी जीएसटी के दायरों में आ जाएंगी। सरकार का दावा है कि पहले जो दूसरी स्लैब चली आ रही हैं, उन्हें इन दो स्लैब में मिला दिया गया है, और हर सामान या सेवा पर टैक्स पहले के मुकाबले कम होगा, या उतना ही बना रहेगा। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि लोग त्यौहारों के इस मौसम में खर्च का अपना जो बजट रखते हैं, उसमें तो कोई कटौती करेंगे नहीं, और जो कुछ भी बचत होगी, उससे अतिरिक्त खरीददारी ही होगी, और बाजार में उतना ही पैसा आएगा। कुछ लोगों का यह भी अनुमान है कि इससे बाजार में अधिक रकम आएगी, और अर्थव्यवस्था का चक्का घूमेगा। 

जीएसटी जब से लागू हुआ था तब से उसकी विसंगतियों ने लोगों को बड़ा परेशान किया था, लेकिन अब जब सारे कारोबारियों ने जीएसटी हिसाब-किताब का सिस्टम बना लिया है, तब स्लैब घटाकर कुल दो स्लैब कर देना उनके काम को आसान ही करेगा। ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार को बीते बरसों में जीएसटी से उम्मीद से भी अधिक, छप्पर फाडक़र जितनी कमाई हुई है, उसके चलते उसने अब कुछ रियायतें देने की सोची है। इसके पीछे बिहार, और बंगाल के चुनावों को प्रभावित करने की नीयत भी हो सकती है, अमरीकी टैरिफ की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था पर जो बोझ पड़ रहा है, उससे लोगों को उबारने के लिए भी जीएसटी रियायत दी गई है, ऐसा भी कुछ लोगों का मानना है। तीसरी बात यह कि सरकार की जिन-जिन बातों को लेकर आलोचना हो रही थी, उस तरफ से जनता का ध्यान हटाने के लिए भी ऐसा किया गया हो सकता है। जो भी वजह हो, यह तो सरकार के हाथ में ही रहता है कि वह कब कौन से फैसले लेकर जनता के बीच चल रही कोई सुगबुगाहट या नाराजगी दूर करने की कोशिश करे। 

हम बहुत सी छोटी-छोटी चीजों पर घटे हुए जीएसटी की अधिक चर्चा करना नहीं चाहते क्योंकि वह तो खबरों में आ चुकी बात है, लेकिन जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा इन दोनों पर अब तक लग रहे 18 फीसदी जीएसटी को खत्म कर देना एक बड़ी बात है, जिससे बीमा प्रीमियम घट जाएगा, और लोग अपनी जिंदगी का, और इलाज के लिए बीमा करवाने की तरफ बढ़ेंगे। आज देश की आधी आबादी के पास भी जीवन और इलाज बीमा नहीं है। दूसरी तरफ बड़ी कारों, बहुत बड़े इंजन की मोटरसाइकिलों, और तम्बाकू पान-मसाला, कोल्डड्रिंक, इन सबको 40 फीसदी जीएसटी में रखा गया है, जो कि अच्छी बात है। इससे किसी उच्च-मध्यवर्गीय तबके का भी कोई लेना-देना अनिवार्य रूप से नहीं है, बाकी अपने नशे और शौक के लिए तो गरीब भी अगर तम्बाकू-गुटखा खाए, तो वह कैंसर के सरकारी इलाज का टैक्स भी देते चले। बुरी लत, और महंगे शौक के कुछ सीमित सामानों पर लगा यह टैक्स जायज ही दिखता है। 2017-18 के जीएसटी संग्रह से 2024-25 का जीएसटी संग्रह दोगुना से अधिक बढ़ गया है। 

आम जनता को किसी समझदारी की बात सिखाना तालाब तक घोड़े को ले जाकर पानी पिलाने के मुकाबले अधिक मुश्किल काम है। इसलिए हमारे यह कहने का कोई खास मतलब रहेगा नहीं कि जिन लोगों ने अपना बीमा नहीं कराया है, वे जीएसटी से होने वाली बचत से अपनी जिंदगी और अपनी सेहत का बीमा करवा लें। मौत और बीमारी पहले से चिट्ठी लिखकर नहीं आते, और देश की शायद तीन चौथाई से अधिक आबादी इस खर्च के लिए तैयार नहीं रहती है। परिवार के किसी कमाऊ सदस्य की मौत के लिए तो शायद 90 फीसदी आबादी तैयार न हो। ऐसे में बीमा टैक्सफ्री कर दिया गया है, तो लोगों को जीएसटी की बचत का उसमें पूंजीनिवेश करना चाहिए। हम यह बात इसलिए भी सुझा रहे हैं कि हेल्थ बीमा करने वाली कंपनियों के लिए भारत में एक रेगुलेटरी एजेंसी बनाई गई है, लेकिन उसकी सारी कोशिशों के बावजूद आज भी देश में अधिक उम्र तक पहुंच गए लोगों के लिए नया बीमा पाना असंभव सा है। इसलिए सबके भले के लिए यह है कि कम या अधिक, अपनी जरूरत और क्षमता के मुताबिक इलाज-बीमा हर किसी को उम्र रहते, और बीमारियों से घेरने के पहले करवा लेना चाहिए, ताकि जिंदगी का आखिरी हिस्सा अभाव और तनाव में न गुजरे। 

जीएसटी का यह फेरबदल 22 सितंबर से लागू होने जा रहा है। केन्द्र और राज्य सरकारों को बाजार और कारखानों पर यह नजर भी रखनी चाहिए कि वहां से सामान घटे हुए जीएसटी के साथ निकलें, और सही रेट पर ही उन्हें बेचा जाए। भारत का आम तजुर्बा यह है कि टैक्स घट जाता है, लेकिन ग्राहक तक नहीं पहुंचता। और जब बढ़ता है, तो अपने असली बोझ के मुकाबले अधिक बोझ के साथ ग्राहक तक पहुंच जाता है। यहां पर सरकार के संबंधित विभागों को यह देखना होगा कि फेरबदल का यह दौर ग्राहकों के लिए नुकसान का न हो जाए। यही दौर त्यौहारों के वक्त बाजार की खरीददारी का भी रहेगा। इतना जरूर है कि दीवाली के वक्त लोगों को टैक्स से कुछ राहत मिलेगी। साथ ही सरकार को यह भी देखना चाहिए कि इतनी निगरानी के बाद भी जीएसटी चोरी साथ-साथ चलती ही रहती है। जीएसटी चोरों से सिर्फ सरकार को नुकसान नहीं होता, बाजार में उन्हीं के सरीखा कारोबार करने वाले दूसरे लोगों को भी इससे नुकसान होता है जो कि जीएसटी भरकर काम करते हैं। मोदी सरकार की जीएसटी योजना आलोचना का दौर झेल चुकी है। उसके बाद के बरसों में धीरे-धीरे यह व्यवस्थित भी होती गई, और सरकारों की कमाई भी अंधाधुंध बढ़ी। अब इसके सरलीकरण के साथ यह लोगों के लिए बोझ कुछ कम कर रही है, और कारोबारियों को ग्राहकों तक यह फायदा जाने देना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

ऐसा तानाशाह चुना था, अब अमरीका भुगते...

 03 सितंबर 2025 

 

अमरीका में ट्रम्प के कुछ बड़े करीबी रहे सहयोगी उन पर यह आरोप लगा रहे हैं कि अपने पारिवारिक कारोबार को बढ़ाने के लिए वे पाकिस्तान के साथ हमबिस्तर हो रहे हैं, और भारत से दूरियां खड़ी की हैं। इनमें ट्रम्प के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे हुए दो लोग हैं, और एक वरिष्ठ सांसद ने भी ऐसी ही बात कही है। अमरीकी शासन व्यवस्था बड़ी अजीब है, वहां राष्ट्रपति को संविधान में ही तानाशाह सरीखे हक दे दिए गए हैं, उसे संसद में जाना नहीं पड़ता, वहां जवाबदेही नहीं रहती, और संसद राष्ट्रपति का कुछ बिगाड़ भी नहीं सकती। जब तक बजट या संविधान संशोधन जैसे कुछ मामले न हो, राष्ट्रपति को संसद की जरूरत भी नहीं रहती। ट्रम्प ने यह भी साबित कर दिया है कि बड़ी लोकतांत्रिक समझी जाने वाली अमरीकी शासन प्रणाली में किस तरह राष्ट्रपति अदालतों के भी पर कतर सकता है, और अदालत से मुजरिम से मुजरिम साबित होने के बाद भी राष्ट्रपति बन सकता है। अमरीकी लोकतंत्र के विरोधाभास, उसकी विसंगतियां, और उसमें तानाशाही की संभावनाएं अमरीकी इतिहास में पहली बार इस बुरी तरह सामने आ रही हैं। आज की ही खबरें बताती हैं कि अमरीकी कारोबार के कुछ बहुत बड़े लोग ट्रम्प के सख्त खिलाफ हो गए हैं, और उन्होंने अमरीका को तानाशाही की तरफ बढऩे का खतरा याद दिलाया है। ऐसा लगता है कि अभी भारत के साथ व्यापार शर्तों में मनमानी करके ट्रम्प ने भारत को जिस तरह चीन और रूस के खेमे में धकेल दिया है, उससे भी अमरीकी लोग परेशान हैं, कि यह दुनिया में अमरीका के खिलाफ जाता हुआ एक शक्ति संतुलन है। 

हमारे पाठकों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले हमने लिखा था कि रूस, भारत, चीन, और ब्राजील को मिलकर एक साथ आना चाहिए, और उससे अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की मनमानी पर लगाम लग सकेगी। पिछले चार-छह दिनों में चीन में ठीक यही नजारा देखने मिला है। आज अमरीकी राष्ट्रपति का एक सलाहकार भारत को याद दिला रहा है कि वह लोकतांत्रिक देश है, और वह चीन और रूस सरीखे तानाशाही वाले देशों के साथ जा रहा है, जबकि उसे अमरीका के साथ रहना चाहिए था। इस सलाहकार को पहली सलाह तो खुद अमरीकी राष्ट्रपति को देनी थी कि वह एक लोकतांत्रिक नेता और देश की तरह बर्ताव करे, दुनिया के सबसे बड़े मवाली की तरह नहीं जो कि अलग-अलग शहरों में नशे के धंधे, चकलाघर, जुआघर, और सट्टे के कारोबार का एकाधिकार बांटने के लिए अपने मर्जी से सबसे कम या अधिक महीना बांधता है। ट्रम्प न सिर्फ एक फौजी तानाशाह की तरह काम कर रहा है, बल्कि वह एक माफिया सरगना की तरह भी काम कर रहा है। इसलिए उसके किसी सलाहकार का दुनिया को लोकतांत्रिक-नैतिकता सिखाने का कोई हक नहीं बनता। चीन में अभी हुए शंघाई सहयोग संगठन के कार्यक्रम में ईरान नहीं था, लेकिन अमरीका के खिलाफ दुनिया में जब भी कोई गठबंधन बनेगा, ईरान उसमें शामिल होना चाहेगा। इसी तरह उत्तर कोरिया बाकी दुनिया के लिए अछूत बना हुआ है, वह अमरीकी आर्थिक प्रतिबंधों का शिकार है, लेकिन वह रूस का फौजी साथी है, और यूक्रेन के मोर्चे पर रूस की फौज में हजारों उत्तर कोरियाई सैनिक भी शामिल थे। अभी भी चीन और रूस के साथ उत्तर कोरिया के तानाशाह की तस्वीरें दुनिया में एक बदले हुए माहौल को दिखा रही हैं।

अमरीकी लोकतंत्र जिस तरह के पूंजीवाद पर खड़ा है, उसके नुकसान उसे अभी देखने मिल रहे हैं। किसी राष्ट्रपति का पूरा परिवार कारोबार में लगा हुआ है, और देश की विदेश नीति, अलग-अलग देशों के साथ उसके सौदे और उसकी शर्तें, इन सबमें राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के परिवार के हितों का ध्यान रखा जा रहा है। यह बात ट्रम्प के आलोचक नहीं, बल्कि ट्रम्प के सबसे करीबी सहयोगी रहे लोग बोल रहे हैं। फिर अभी कुछ महीने पहले तक जो ट्रम्प की नाक के बाल थे, टेस्ला और एक्स के मालिक एलन मस्क अपने कारोबार की मनमानी दुनिया की सरकारों पर थोप रहे थे, और बिना किसी सरकारी जिम्मेदारी के वे अमरीका पहुंचे हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ अपने पूरे परिवार सहित मिले थे। जाहिर है कि यह मुलाकात पहले से तय थी क्योंकि मोदी मस्क के बच्चों के लिए तोहफे लेकर गए थे। ट्रम्प का बेटा, ट्रम्प का दामाद, ये सब दुनिया भर के देशों में, वहां की सरकार, और वहां के कारोबार के साथ तरह-तरह के सौदों में लगे हुए हैं। हितों का ऐसा खुला टकराव भारत जैसे देश में सोचा भी नहीं जा सकता, लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था के चलते अमरीका में यह धड़ल्ले से चल रहा है। दुनिया के कुछ और लोकतंत्र में दबे-छुबे, पर्दे के पीछे कारोबार के साथ सरकार की हमबिस्तरी चलती है, लेकिन अमरीका में ट्रम्प ने मानो न्यूयॉर्क के टाईम स्क्वायर पर सरकार और कारोबार के लिए एक पलंग लगवा दिया था। 

हो सकता है कि आने वाले कुछ बरस भारत को कई किस्म का लंबा-चौड़ा घाटा झेलना पड़े, लेकिन ट्रम्प नाम के बददिमाग तानाशाह के लिए भारत जैसा देश और तो कुछ कर भी नहीं सकता था। इस देश ने हवन किए, ट्रम्प का चुनाव प्रचार किया, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अबकी बार ट्रम्प सरकार जैसा हैरान करने वाला नारा लगाया, इसके बाद भी ट्रम्प ने हिन्दुस्तान को दर्जनों बार बेइज्जत किया। उसका हाल कुछ दशक पहले मुम्बई पर राज करने वाले दाऊद इब्राहिम सरीखा है कि वह आज कुछ भी कर सकता है। लेकिन यह वक्त भारत के लिए अपने आत्मसम्मान को बचाने, और रूस सरीखे अपने पुराने देखे, परखे, और खरे दोस्त के साथ जाने का है। वामपंथियों को गाली देते हुए जिन लोगों का गला दिन में तीन-चार बार सूख जाता है, उन्हें पुतिन और शी के साथ मोदी की घरोबे की तस्वीरें अच्छी तो नहीं लगेंगी, लेकिन ऐसा लगता है कि ट्रम्प के रहते भारत के लिए यही तस्वीर बेहतर है। फिलहाल इस तस्वीर से भारत के छोटे-छोटे दुकानदारों को राहत है कि इस दीवाली उनकी दुकानों से चीनी झालरों को निकालकर तोडफ़ोड़ नहीं होगी, और भारत में चलने वाले चीनी रेस्त्रां भी तोडफ़ोड़ से बचेंगे, और मुम्बई के मिडलैंड चाईना जैसे बड़े रेस्त्रां के कर्मचारियों को भी कुछ बरस पिटाई से आजादी रहेगी, ऐसा लगता है। एक बददिमाग तानाशाह ने चौथाई सदी में मेहनत से सुधरे हुए भारत-अमरीकी रिश्तों को किस रफ्तार से तबाह किया है, यह देखने लायक है, लेकिन यह दुनिया के बाकी देशों के मुखिया लोगों के लिए एक बड़ा सबक भी है, दूसरे देशों के साथ रिश्तों के मामले में भी, और अपने ही देश के भीतर राज-काज के लिए भी।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 3 सितंबर 2025



 

कन्या-शिक्षा में बड़े शानदार योगदान को मैग्सेसे पुरस्कार

02 सितंबर 2025 

 

एशिया का नोबल पुरस्कार कहा जाने वाला मैग्सेसे पुरस्कार इस बरस भारत की एक गैरसरकारी संस्था ‘एजुकेट गर्ल्स’ को मिला है जिसकी संस्थापक सफीना हुसैन कन्या-शिक्षा के लिए लगातार लगती रहती है। 1957 में फिलीपींस के राष्ट्रपति रैमन मैग्सेसे की स्मृति में यह पुरस्कार हर बरस चार वर्गों में लोगों या संस्थाओं को दिया जाता है। इस बार भारत के इस कन्या-शिक्षा एनजीओ को यह सम्मान मिलने से भारत में लड़कियों की कुल जमा स्थिति, और उनकी पढ़ाई की हालत के बारे में एक बार फिर चर्चा छिड़ सकती है, छिडऩी चाहिए। सफीना हुसैन ने 2007 से राजस्थान से काम शुरू किया, और 50 गांवों से शुरू पायलट प्रोजेक्ट के तहत ग्रामीण लड़कियों को स्कूल लाने, या स्कूल छोड़ चुकी लड़कियों को वापिस लाने, और उन्हें वहां पर बनाए रखने पर मेहनत की। अब तक यह राजस्थान, और बाहर करीब 30 हजार गांवों तक पहुंच चुका है, और 20 लाख से अधिक लड़कियां इस कोशिश से स्कूल वापिस आई हैं। इस संस्था के आंकड़े बताते हैं कि इसकी कोशिशों से स्कूल पहुंचने या लौटने वाली लड़कियों में से 90 फीसदी ने पढ़ाई जारी रखी है। सफीना दिल्ली में पैदा हुईं, और एक मौसी की मदद से उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामी से पढ़ाई की, फिर अमरीका में कुछ काम किया, और फिर भारत आकर सामाजिक क्षेत्र में काम शुरू किया। 2007 में राजस्थान के पाली जिले में समाज के सहयोग से, और सरकारी स्कूलों के साथ मिलकर शुरू यह प्रोजेक्ट लड़कियों की जिंदगी में एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। 

आने वाले दिनों में लोगों को सफीना हुसैन और उनके संगठन के बारे में काफी कुछ पढऩे और सुनने मिलेगा, लेकिन हम आज उनके उठाए मुद्दे को लेकर आगे बात करना चाहते हैं कि भारत में लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई की क्या चुनौतियां हैं? राजस्थान, हरियाणा, या उत्तर भारत के कई दूसरे प्रदेशों और क्षेत्रों में परिवार और समाज ही लडक़े-लड़कियों में बड़ा फर्क करते हैं। घर के रोजाना के खानपान से लेकर, इलाज की जरूरत पडऩे पर लडक़ी का इलाज परिवार की प्राथमिकता नहीं रहती। लड़कियां पढऩे में लडक़ों के मुकाबले अधिक गंभीर और तेज रहती हैं, मौका मिलने पर वे मेरिट लिस्ट, दाखिला इम्तिहान, या नौकरी में भी लडक़ों से आगे रहती हैं, लेकिन घर के भीतर से शुरू भेदभाव उनकी क्षमता और संभावना दोनों के पर कतरने में लगे रहता है, और देश के, खासकर उत्तर भारत, और हिन्दी प्रदेशों में लड़कियों के साथ भेदभाव अधिक हद तक हिंसक रहता है, यही वजह है कि दक्षिण भारत और महाराष्ट्र में लड़कियां उत्तर के मुकाबले अधिक आगे बढ़ती हुई दिखती हैं। लेकिन पूरे देश में जो एक समस्या एक सरीखी है वह खेल के मैदान, क्लासरूम, प्रयोगशाला, और किसी भी दूसरी स्कूल-कॉलेज की गतिविधि में लड़कियों पर लडक़ों और पुरूषों की ओर से मंडराते हुए खतरे की है। अड़ोस-पड़ोस से लेकर रिश्तेदारों तक, और स्कूल-कॉलेज से लेकर नौकरी या कामकाज की जगह तक लड़कियों को भेदभाव के अलावा शोषण का भी शिकार होना पड़ता है, और भारतीय सामाजिक और न्याय व्यवस्था ने इंसाफ मिलने की गुंजाइश पहाड़ की चढ़ाई जैसी रहती है। ऐसे में स्कूल शिक्षा से लेकर बाद में किसी कामकाज तक लडक़ी और महिला पर मंडराता हुआ खतरा उनके आगे बढऩे की संभावनाओं को सीमित करते रहता है। 

लेकिन सफीना हुसैन की जिस कोशिश को यह बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है, वह किसी राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी की सोच से परे, कई पार्टियों के शासन वाले राज्यों में बराबरी से चल रही है, और सरकारों के साथ मिलकर चल रही है। यह तालमेल जरूरी इसलिए भी है कि भारत में कई तरह के सामाजिक कार्यक्रम और आंदोलन इसलिए दम तोड़ देते हैं कि वे अपने बुनियादी एजेंडे से परे जाकर सरकार या राजनीतिक व्यवस्था से एक टकराव की तरफ मुड़ जाते हैं। अब किसी भी व्यक्ति या संस्था की ताकत और क्षमता सीमित रहती हैं, इसलिए इस बात पर गौर करना जरूरी रहता है कि सरकारें, या पार्टियां किसी से टकराव के बिना संस्थाओं को अपने बुनियादी मुद्दे की पहली प्राथमिकता को ही आखिरी प्राथमिकता भी बनाना चाहिए। अब कुछ लोगों को यह लग सकता है कि छात्राओं को स्कूल पहुंचाने वाली संस्था को स्कूलों के दूसरे मुद्दे भी उठाना चाहिए, और पाठ्यक्रम में हो रहे फेरबदल पर भी बात करनी चाहिए। लेकिन जो संस्था ऐसा करेगी, वह सरकार और सत्तारूढ़ पार्टियों के निशाने पर आ जाएगी, और बच्चियों को स्कूल पहुंचाने की उसकी कोशिश किनारे कर दी जाएगी। ऐसे में हम इस बात को महत्वपूर्ण मानते हैं कि पिछले दो दशक में सफीना हुसैन और उनके संगठन ने कई राज्यों में अपना काम फैलाया, और वहां आती-जाती राजनीतिक ताकतों से अपने को अछूता भी रखा। 

इस बात से यह भी सीखने मिलता है कि हर किसी को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए। किसी भी तरह के सामाजिक आंदोलन एक बहुत ही जटिल सामाजिक व्यवस्था के भीतर ही जन्म लेते हैं, पनपते हैं, और अपना मकसद पूरा करने की कोशिश करते हैं। प्रमुख सामाजिक आंदोलनकारियों, और संगठनों को गैरजरूरी विवाद से बचकर भी रहना चाहिए। भारत में आज अजीम प्रेमजी फाउंडेशन जिन कई दायरों में काम कर रहा है, उनमें स्कूल-शिक्षा भी एक है। वह शिक्षा में उत्कृष्टता में लगा हुआ है, और किसी प्रदेश में कांग्रेस की सरकार रहे, भाजपा की, या किसी और पार्टी की, यह संगठन वहां बिना किसी राजनीतिक दुराग्रह के काम जारी रखता है। यह समझ कई दूसरे संगठनों को भी विकसित करनी होगी जो कि अपने बुनियादी मकसद से भटककर राजनीति का हिस्सा बनने लगते हैं, और फिर सरकारों से टकराव में अपना मूल काम खो बैठते हैं। जिन लोगों को राजनीतिक जागरूकता का काम करना है, वे घोषित रूप से वही काम करें, लेकिन अगर वे इलाज के लिए, या पढ़ाई के लिए काम करते हैं, तो राजनीतिक एजेंडा अलग रखकर काम करें। एक मुस्लिम महिला की कोशिशें देश के कई राज्यों में इस हद तक कामयाब हुई हैं, इसके पीछे उनकी सुलझी हुई प्राथमिकताओं का हाथ भी समझना होगा। आज की यह बातचीत कुछ तो कन्या-शिक्षा के महत्व के बारे में है, और कुछ सामाजिक कार्यक्रम चलाने वालों के बारे में।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 2 सितंबर 2025



 

दीवारों पर लिक्खा है, 1 सितंबर 2025



 

ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के खिलाफ हिंसक फतवों की रैलियों से निकले सबक

 01 सितंबर 2025 

 

ऑस्ट्रेलिया में कल का दिन भारी टकराव का रहा। सिडनी, मेलबोर्न सहित बहुत से बड़े शहरों में अप्रवासियों के खिलाफ रैलियां निकलीं, और ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों ने हजारों की संख्या में सडक़ों पर आकर बहुत बुरे नस्लवादी प्रदर्शन किए। पश्चिम के मीडिया में इन्हें नवनाजीवादी प्रदर्शन कहा गया जो कि दूसरे देशों से आए हुए लोगों की राष्ट्रीयता, उनके धर्म, और उनके रंग पर निशाना बनाते हुए थे। इनके पीछे सिर्फ वहां के राष्ट्रवादी और नस्लवादी संगठन ही नहीं थे, विपक्ष के कई नेता भी इसमें शामिल हुए, और उन्होंने भी उत्तेजक और भडक़ाऊ बातें कहीं। योरप के कुछ देशों की तरह ऑस्ट्रेलिया में भी हाल के बरसों में दक्षिणपंथी उग्रवाद बढ़ते चल रहा है, और इसी साल की शुरूआत में देश की संसद में नाजी सलामी को कैद के लायक जुर्म बनाया है। कई जगहों पर अपने आपको राष्ट्रवादी कहने वाले ऐसे लोगों के प्रदर्शन के खिलाफ दूसरे प्रदर्शनकारियों के सडक़ों पर उतर जाने से आपस में टकराव भी हुए। ऑस्ट्रेलिया में वन-नेशन नाम की पार्टी लगातार राष्ट्रवादी उग्रवाद को बढ़ा रही है, और इसे वहां के कुछ दूसरे धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने नफरत की सौदागर पार्टी कहा है। कुछ दूसरे नेताओं ने इसे विभाजन बोने वाली हरकत बताया है, और ऑस्ट्रेलिया के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने वाले लगातार बढ़ते उग्रवाद का दर्जा दिया है। 

इटली, जर्मनी, फ्रांस की तरह ऑस्ट्रेलिया में भी दूसरे देशों से आकर काम करने वाले लोगों के खिलाफ एक तनाव खड़ा हो रहा है। लेकिन ‘मार्च फॉर ऑस्ट्रेलिया’ नाम से किए गए ऐसे प्रदर्शनों में नफरत की भाषा में ऑस्ट्रेलिया के लोगों को भी थोड़ा हक्का-बक्का कर दिया है। लोग इन्हें ऑस्ट्रेलिया की बहुसांस्कृतिक सामाजिकता के खिलाफ मान रहे हैं, और इन्हें लेकर फिक्रमंद हैं। दरअसल अमरीकी राष्ट्रपति पद पर पहुंचने के बाद से डोनल्ड ट्रम्प ने जिस तरह दूसरे देशों से वहां पहुंचे लोगों के खिलाफ नफरत और हिंसा की बातें कहीं, उनकी गूंज दुनिया में कई दूसरी जगहों पर भी हुई। शुरूआती महीनों में ट्रम्प के दाएं हाथ रहे एलन मस्क ने तो जर्मनी के चुनावों में वहां की सबसे दक्षिणपंथी और नस्लवादी पार्टी को खूब बढ़ावा दिया, और उसकी जीत की कामना की। ट्रम्प की पहचान ही एक घोर राष्ट्रवादी और नस्लवादी की है जिसे दूसरे देशों से आए लोग इतने नापसंद हैं कि अमरीकी अर्थव्यवस्था चौपट हो जाने की कीमत पर भी वह अमरीका से बाहरी मजदूरों और कामगारों को निकाल रहा है। ट्रम्प के शुरूआती हफ्ते ऐसे वैध-अवैध रूप से आए हुए, और शायद अधिक वक्त तक ठहर चुके लोगों को अमरीकी फौजी विमानों में सामानों की तरह लादकर, हथकड़ी-बेड़ी से जकडक़र उनके देशों में छोडऩे के रहे। भारत में भी ऐसे कई विमान देखे जिनमें हथकड़ी-बेड़ी से जकड़े हुए हिन्दुस्तानी लाकर यहां पटके गए थे। 

आज दुनिया में एक देश की प्रतिक्रिया दूसरे देश पर भी होती है। योरप के देशों की प्रतिक्रिया अमरीका में हुई, और भारत में आज जिस तरह अवैध बांग्लादेशियों के नाम पर एक आक्रामक सरकारी कार्रवाई चल रही है, उसकी प्रतिक्रिया पड़ोस के देशों पर भी हो रही है, और इस देश में उन लोगों के बीच भी हो रही है जो बांग्लादेशियों की तरह भारत की बांग्ला जुबान बोलते हैं, और मुस्लिम होने की वजह से उन्हें बांग्लादेशी कहकर सरहद के पार फेंक दिया जा रहा है। दुनिया के एक देश की कट्टरता, और चुनावों में उसकी सफलता से दुनिया के दूसरे देशों में ऐसी ही मिसालें बढ़ती चल रही हैं, और लोगों को याद होगा कि किस तरह ट्रम्प के संग रहते हुए मस्क ने सार्वजनिक रूप से हिटलर की नाजी सलामी दी थी। अभी का ऑस्ट्रेलिया का ताजा प्रदर्शन भारत के लोगों के खिलाफ अधिक था, और वहां बड़ी संख्या में पहुंचे हुए और काम कर रहे भारतवंशियों को ऑस्ट्रेलिया में रोजगार खा लेने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया की खबरें बताती हैं कि ट्रम्प से प्रेरणा लेकर लोग आप्रवासियों के खिलाफ हिंसक हो रहे हैं। वहां के स्थानीय लोगों में भी एक हिटलरी सोच वाले लोग अपने आपको देश के कानून से ऊपर मानते हैं, और वे सरकार के आदेशों, और कानूनों के खिलाफ मनमानी करते हैं। अब इस सोच के लोग लगातार उग्रवादी, और हिंसक भी होते चल रहे हैं, और कानून जगह-जगह अपने हाथ में ले रहे हैं। यह सब देखकर लगता है कि दुनिया के एक देश से हिंसा का नारा जब उठता है, तो उसकी गूंज कई देशों में वहां के स्थानीय मुद्दों को लेकर फैलती है। 

अमरीका दूसरे देशों से आए हुए वैध-अवैध कामगारों को अधिक रफ्तार से निकालकर अब खेतों से लेकर कारखानों तक, और हाथ से होने वाले तमाम कामों में कामगारों की कमी का शिकार हो गया है। भारत में भी जिस रफ्तार से बांग्लादेश से आए हुए लोगों को निकाला जा रहा है, उस रफ्तार से तो शिनाख्त भी मुमकिन नहीं है, और यही नतीजा है कि इसी देश के दूसरे प्रदेशों के लोगों को कई प्रदेशों से निकाल-निकालकर बांग्लादेश भेज दिया गया, या गिरफ्तार कर लिया गया। इससे देश के नागरिकों के बुनियादी हक कुचले जा रहे हैं कि वे किसी भी प्रदेश में जाकर काम कर सकते हैं। यह हिंसक नौबत सिर्फ बांग्लादेशी होने से जुड़ी हुई नहीं है, मुस्लिम होने से भी जुड़ी हुई है, और सरकारों का यह अभियान राष्ट्रीयता के विवाद से आगे बढक़र धर्मआधारित हो चला है। जब भारत के भीतर ऐसा एक तनाव खड़ा हुआ है, तो ऑस्ट्रेलिया हो, या अमरीका, इन जगहों पर अपने नागरिकों को बचाने के लिए अधिक बोलने का नैतिक अधिकार भी भारत का नहीं रह जाता। साम्प्रदायिकता, उग्र राष्ट्रवाद, नस्लभेद जैसी हिंसक सोच के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि इसे बढ़ावा देना आसान रहता है, लेकिन जिस दिन इनके फतवे देने वाली राजनीतिक ताकतें अपनी हरकतों को रोकना चाहती हैं, उस दिन उन्हें पता लगता है कि उनके देश में नौबत अब उनके काबू में नहीं रह गई है।

दुनिया के सौ से अधिक देशों में भारत के लोग बसे हुए हैं, और काम कर रहे हैं। दर्जनों देश ऐसे हैं जहां पर हिन्दुस्तानी लोग दसियों हजार से अधिक संख्या में हैं। जब भारत दुनिया के सामने एक तंगदिल देश की मिसाल पेश करता है, तो फिर उसके पास दुनिया के बाकी देशों से भारतवंशियों के लिए उदारता की उम्मीद करने की जुबान भी नहीं रह जाती। दुनिया के बहुत से देशों में एक-एक करके नस्लभेदी और हिटलरवादी सरकारें बन रही हैं। यह पूरी दुनिया के सामाजिक ताने-बाने के खिलाफ है, और इससे दुनिया रहने के लिए एक बहुत बुरी जगह बनती जा रही है। हर देश को इस पर अलग-अलग भी फिक्र करनी होगी, क्योंकि अपनी जमीन पर स्थाई और निरंतर तनाव खड़ा करके कोई सरकार अपने देश को ठीक से नहीं चला सकती।   

(Daily Chhattisgarh)