बद से शुरू होने वाली गालियों की पूरी फेहरिस्त बयान कर सकती है ट्रंप...

 24 सितंबर 2025 

 

दुनिया में किसी को बेदिमाग कहना भी उसका एक किस्म से अपमान होता है, क्योंकि दिमाग तो सबके पास रहता है, फिर भी जिनमें बुद्धि की बड़ी कमी दिखती है, उन्हें बोलचाल में बेदिमाग कह दिया जाता है। फिर जो अपनी बुद्धि का बेजा इस्तेमाल ही करते हैं, उन्हें बददिमाग कह दिया जाता है। इससे परे कुछ लोग जो सनक में आकर कोई भी उटपटांग बात करते हैं, गलत-सलत फैसला ले लेते हैं, उन्हें सनकी कहा जाता है। ऐसे करीब डेढ़ सौ अलग-अलग विशेषणों को जोडक़र ही ट्रंप का परिचय दिया जा सकता है। कहने के लिए यह आदमी दुनिया के सबसे ताकतवर देश के सबसे ताकतवर ओहदे पर बैठा है, लेकिन यह पूरी तरह से तानाशाह हो चुका है, और इसने सबसे पहले तो अमरीकी लोकतंत्र को हरा दिया है। डोनल्ड ट्रंप ने पिछले राष्ट्रपति चुनाव को हारने के बाद जिस कबीलाई अंदाज में अपने समर्थकों को अमरीकी संसद पर हमला करने के लिए भडक़ाया था, उसके मामले-मुकदमे तो अमरीकी अदालतों में चल ही रहे हैं। इस आदमी की बदचलनी के मुकदमे भी अदालत में साबित हो चुके हैं, और यह बहुत ही उटपटांग किस्म का लोकतंत्र है कि ट्रंप के कुसूरवार साबित होने के बावजूद उसे कोई सजा नहीं हुई है। वह टैक्स चोरी के मामलों से घिरा हुआ है, बदजुबानी की उसकी मिसालें तरह-तरह की रिकॉर्डिंग में घूमती ही रहती हैं। आज की दुनिया में बद से शुरू होने वाले सबसे अधिक शब्द अगर किसी एक आदमी (इंसान लिखने से हम परहेज कर रहे हैं क्योंकि उसके साथ कुछ किस्म के मानवीय गुणों के जुड़े होने की उम्मीद जुड़ी रहती है) पर लागू होते हैं, तो वह डोनल्ड ट्रंप हैं। आप इंटरनेट, या एआई पर बद से शुरू होने वाले शब्दों को ढूंढें, तो उस फेहरिस्त से आपको ट्रंप की पूरी तस्वीर मिल पाएगी।

फिलहाल पिछले दो दिनों में इस कमीने इंसान ने कई किस्म की घटिया बातें कही हैं। अमरीका में नफरत फैलाने वाले एक संकीर्णतावादी प्रचारक, के कत्ल को उसने बिना किसी बुनियाद के अपने विरोधियों से जोडक़र उनको कातिल साबित करने की कोशिश की है। लेकिन यह तो कम घटिया हरकत थी, कल जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में ट्रंप को 15 मिनट बोलने का मौका मिला, तो उसने 56 मिनट से अधिक बकवास की। पूरी तरह से बेमौके, बेबुनियाद आरोप लगाते हुए उसने दुनिया के तमाम देशों की मौजूदगी में ब्रिटेन की राजधानी लंदन के मुस्लिम मेयर सादिक खान पर हमला किया। एक ब्रिटिश शहर के मेयर से दुनिया के तमाम देशों का क्या लेना-देना था? लेकिन ट्रंप अपनी नफरत और अपनी हमलावर जुबान का यह कातिल मेल मानो डॉक्टरी सलाह पर दिन में चार बार अपने मुंह से निकालता है, और राजनीतिक विश्लेषक हर दिन यह सोचते रह जाते हैं कि इन चारों में से सबसे अधिक घटिया कौन सी बात थी। ट्रंप ने योरप में प्रवासियों के संकट पर कहा- मैं लंदन को देखता हूं जहां एक बेहद खराब मेयर है, एक बहुत ही खराब मेयर। वे लंदन को शरिया कानून की ओर ले जाना चाहता है और वह एक अलग देश बन गया है।

अभी पिछले हफ्ते ट्रंप ब्रिटेन के दौरे पर था, और उसने सार्वजनिक रूप से कहा था कि लंदन का मेयर सादिक खान दुनिया के सबसे खराब मेयर में से है, और मैंने उनसे वहां मेरे स्वागत में न आने के लिए कहा है। मुझे लगता है कि वे आना चाहते थे लेकिन मैं नहीं चाहता कि वे आएं। सादिक खान लंदन के पहले मुस्लिम मेयर हैं, और उनके ऑफिस में ट्रंप के शरिया कानून वाले बयान के जवाब में कहा है- हम उनके (ट्रंप के) नफरत से भरे और दकियानूसी सोच वाले बयानों को जवाब देकर अहमियत देना नहीं चाहते। लंदन दुनिया का सबसे बेहतरीन शहर है जो प्रमुख अमरीकी शहरों की तुलना में अधिक सुरक्षित है। हमें खुशी है कि अमरीकी नागरिक रिकॉर्ड संख्या में लंदन में बसने आ रहे हैं। ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने सोशल मीडिया पर लिखा- सादिक खान लंदन में शरिया कानून लागू करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। वे ऐसे मेयर हैं जो (समलैंगिकों, और एलजीबीटीक्यू की) प्राइड मार्च में शामिल होते हैं, जो अलग-अलग पृष्ठभूमि और विचारों के लिए खड़े होते हैं, जो हमारे शहर को बेहतर बना रहे हैं, और हमें गर्व है कि वे हमारे मेयर हैं।

किसी देश की राजधानी में पहुंचने वाला दूसरे देश का राष्ट्रपति उस राजधानी के मेयर को लेकर इस तरह की घटिया और गंदी, नफरती और हिंसक बातें करे, और खुलकर यह कहे कि वह नहीं चाहता कि (उस शहर का प्रथम नागरिक) मेयर उसके स्वागत भोज में आए। पिछली आधी सदी की हमारी अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ और याददाश्त में ऐसा घटिया और कोई बयान दुनिया के किसी तानाशाह ने भी नहीं दिया, लेकिन गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स को इस गंदे आदमी का कार्यकाल पूरा होने पर यह तय करने के लिए एआई की मदद लेनी होगी कि उसका सबसे घटिया बयान कौन सा था।

लेकिन दूसरे देशों के साथ ट्रंप जो कर रहा है, वह उसके अपने देश के साथ कुछ अधिक हद तक हो रहा है। हम किसी टोने-टोटके पर भरोसा नहीं करते, लेकिन यह मानते हैं कि लोगों के अच्छे और बुरे काम लौटकर उनके पास जरूर आते हैं, चक्रवृद्धि ब्याज सहित। अमरीकी वोटरों ने जिस तरह इस घटिया आदमी को चुना था, उसके दाम आज हर अमरीकी चुका रहे हैं। अमरीका में लोकतंत्र को तबाह करके ऐसा बना दिया गया है जैसाकि वह फिलिस्तीन के गाजा की इमारतें हों। लोकतंत्र के इस मलबे पर खड़े रहकर यह बददिमाग आदमी (इंसान लिखना ठीक नहीं है) जिस तरह अमरीका की हर परंपरा को खत्म कर रहा है, वहां की अर्थव्यवस्था को खत्म कर रहा है, दुनिया भर में अमरीका के पिछली आधी सदी में कमाए गए दोस्तों को खत्म कर रहा है, अमरीकी साख को खत्म कर चुका है, दुनिया में सामाजिक सरोकार की अपनी जिम्मेदारी को इस माफियानुमा कारोबारी ने गटर में बहा दिया है, इन सब बातों को देखकर लगता है कि गाजा में आधे लाख से अधिक जो बेकसूर औरत-बच्चे इजराइली हमलों में, अमरीकी बमों से मारे गए हैं, उन सबकी सामूहिक बद्दुआ अमरीका को लग रही है, और अमरीका आज अपने इतिहास के सबसे अस्थिर दौर से गुजर रहा है, तबाही की तरफ बढ़ रहा है। जहां तक भारत के लिए ट्रंप के रुख की बात है, तो यह आदमी अब तक 35-40 बार यह झूठ बोल चुका है कि उसने भारत और पाकिस्तान के बीच जंग रुकवाई है। ये दोनों ही देश इस बात का खंडन कर चुके हैं, लेकिन बेशर्म ट्रंप की जुबान बंद होने का नाम नहीं लेती है, और इस झूठ के सहारे वह नोबल शांति पुरस्कार की सीढ़ी चढऩे की कोशिश कर रहा है, खुलकर कई बार यह बोल चुका है कि वह यह पुरस्कार चाहता है। अमरीकी इतिहास का यह सबसे घटिया राष्ट्रपति जिस अंदाज में हर दिन हजार-पांच सौ बेकसूर फिलिस्तीनियों का कत्ल करवा रहा है, उसके बाद भी उसे नोबल शांति पुरस्कार पाने की हसरत है, यह बात हैरान करती है।

कल ट्रंप ने अमरीका के भीतर यह दावा किया कि जो बहुत ही आम दर्द निवारक दवा पैरासिटामॉल है, उसके गर्भवती महिलाओं के इस्तेमाल से उनके होने वाले बच्चों को एक गंभीर बीमारी, ऑटिज्म का खतरा रहता है। कल के कल विश्व स्वास्थ्य संगठन, अमरीकी डॉक्टरों के एसोसिएशन, और भारतीय डॉक्टरों ने कहा है कि यह सबसे सुरक्षित दवा है, और ट्रंप एक पूरी तरह से अवैजानिक बात कह रहे हैं। घर-घर में इस्तेमाल होने वाली इस दवा को लेकर दहशत फैलाने का ट्रंप का यही गैरजिम्मेदारी का अंदाज कोरोना वैक्सीन के समय भी था, और ट्रंप समर्थकों में से बहुत से लोग वैक्सीन के खिलाफ अभियान चला रहे थे। इस आदमी की गैरजिम्मेदार सोच की एक बड़ी मिसाल यह है कि कोरोना वैक्सीन के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाने वाले रॉबर्ट कैनेडी जूनियर को ट्रंप ने अपना स्वास्थ्य मंत्री बनाया है। जो व्यक्ति कोरोना के दौर में अमरीकियों की सेहत पर अपनी गैरजिम्मेदार बयानबाजी से सबसे बड़ा खतरा खड़ा कर चुका था, वह ट्रंप का स्वास्थ्य मंत्री है।

कुल मिलाकर इस आदमी के बारे में लिखना न चाहते हुए भी हर कुछ दिनों में इसके इतने सारे हिंसक बयान इक_े हो जाते हैं कि उन पर लिखना पड़ता है। आज दुनिया के समझदार देश, और उन देशों के समझदार नेता बदजुबान ट्रंप के साथ किसी तरह की मुंहजोरी में नहीं उलझ रहे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि यह बद्तमीज कब क्या बैठेगा इसका ठिकाना नहीं है। दुनिया का यह गब्बर रामगढ़ नाम की दुनिया में कब किसे क्या कहेगा, किसके सिर में गोलियां उतार देगा, इसका ठिकाना तो है नहीं, यह कहते हुए हम गब्बर नाम का किरदार गढऩे वाले सलीम-जावेद से माफी भी चाहते हैं।

अभी ट्रंप के कार्यकाल को करीब साढ़े तीन बरस बचे हैं, दुनिया में इस ट्रंपकालीन अमरीका के खिलाफ तरह-तरह के छोटे-बड़े समूह बनने जरूरी हैं ताकि अमरीकी गुंडागर्दी का ठीक से जवाब दिया जा सके। भारत के चीन और रूस दोनों के साथ तालमेल के बाद ट्रंप का मिजाज कभी जमीन पर आ टिकता है तो कभी उसकी बददिमागी आसमान पर पहुंच जाती है। भारत, सहित दुनिया के तमाम देशों को इस अस्थिर दिमाग वाले मवाली से दूर और सावधान रहना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

गाडिय़ों पर जात-धरम की नुमाइश पर जुर्माना तो करें

23 सितंबर 2025 

 

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को देखते हुए उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने अभी एक आदेश निकाला है जो कि जाति व्यवस्था से लदे हुए उत्तरप्रदेश के लिए बड़ी अटपटी बात होगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभी 16 सितंबर को यह निर्देश दिया है कि सडक़ों पर चलने वाली किसी गाड़ी पर जाति के नाम, नारे, या स्टिकर नहीं होने चाहिए। किसी भी तरह से गाड़ी चलाने वाले या मालिक की जाति की नुमाइश नहीं होनी चाहिए। अदालत ने कहा है कि ऐसे किसी भी जाति प्रदर्शन पर मोटर व्हिकल एक्ट के तहत कार्रवाई की जाए। इसके अलावा हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस के दस्तावेजों में, किसी नोटिस में, जब तक जाति का उल्लेख कानूनी रूप से जरूरी न हो, (जैसे एसटी-एससी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में जाति के आधार पर अलग कानून से कार्रवाई होती है) तब तक किसी की जाति का उल्लेख न किया जाए। अब यूपी सरकार ने पुलिस और अदालती रिकॉर्ड से जाति का कॉलम हटाने का आदेश निकाला है, और गाडिय़ों पर किसी भी जाति का जिक्र होने पर जुर्माना हो सकता है। सरकार ने यह भी कहा है कि सोशल मीडिया पर जाति गौरव, या जातियों के बीच मनमुटाव बढ़ाने वाले कंटेंट पर निगरानी की जाए, और कार्रवाई की जाए। यूपी सरकार ने तो यह भी कहा है कि पूरे राज्य में जाति आधारित रैलियों, और राजनीतिक आयोजनों पर रोक लगाई जा रही है। देश के मोटरवाहन अधिनियम में वाहनों पर जाति या धर्म से संबंधित कोई भी स्टिकर लगाना गैरकानूनी है, इसमें पांच सौ रूपए से लेकर पांच हजार रूपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। पिछले बरस 13 सितंबर के यूपी हाईकोर्ट के आदेश में धर्म संबंधी स्टिकर पर भी कार्रवाई करने की बात की गई थी, और कहा गया था कि सरकार जाति-धर्म से जुड़े सभी स्टिकर, बोर्ड, झंडे तुरंत हटवाए, और चालान करने के अलावा जरूरत होने पर गाड़ी जब्त भी की जाए।

अब यह मामला तो इलाहाबाद हाईकोर्ट और यूपी सरकार का है, लेकिन मोटरवाहन अधिनियम तो पूरे देश पर एक सरीखा लागू है। उसी के प्रावधानों को अदालत ने कड़ाई से लागू करने के लिए कहा है। इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्याय क्षेत्र से बाहर भी बाकी देश में भी इस पर अमल होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अलग मामलों में इसी तरह के आदेश दिए हैं कि गाडिय़ों पर जाति-धर्म, राजनीतिक पार्टी, या निजी पहचान के चिन्ह लगाना कानून गलत है। दिल्ली पुलिस ने 2022 में एक अभियान चलाकर जात-धरम के स्टिकर हटवाए थे। मध्यप्रदेश में 2023 में हाईकोर्ट के आदेश पर ऐसी ही कार्रवाई हुई थी। राजस्थान में 2022 में ऐसा किया गया था। हरियाणा और पंजाब में 2021-22 से पुलिस ऐसी कार्रवाई कर रही है, वहां हाईकोर्ट ने कहा था कि ऐसे स्टिकर जातिवाद और हिंसा को बढ़ावा देते हैं। इस तरह यह बात साफ है कि मोटरवाहन अधिनियम से लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों तक बार-बार यह बात सामने आई है कि गाडिय़ों पर जात-धरम की नुमाइश करना गैरकानूनी है, और जुर्माने से लेकर गाड़ी जब्ती तक कई तरह की कार्रवाई की जा सकती है। 

अब हम जमीनी हकीकत पर आएं, तो न सिर्फ निजी गाडिय़ों पर, बल्कि सरकारी गाडिय़ों पर भी जात-धरम की नुमाइश धड़ल्ले से चलती है। मुस्लिमों के बीच जो शुभ संख्या मानी जाती है, वह 786 ऐसी बहुत सी सरकारी गाडिय़ों में नंबर प्लेट पर दिखती है जिन्हें सत्तारूढ़ नेता या अफसर अपने कार्यकाल में खरीदते हैं। अब यह धर्म से जुड़ा हुआ अंक जरूर है, लेकिन यह आरटीओ का दिया हुआ नंबर भी है। हो सकता है कि यह मामला मोटरवाहन अधिनियम, और अदालतों के आदेशों में न आए, लेकिन इस एक संख्या से लोगों को यह तो दिख ही जाता है कि यह किस धर्म के व्यक्ति की गाड़ी होने की संभावना है। लेकिन आरटीओ की दी हुई नंबर प्लेट से परे अगर देखें, तो उत्तर भारत के राज्यों में, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में दसियों लाख गाडिय़ां ऐसी हैं जिनमें जात और धर्म के स्टिकर लगे हैं, किसी धर्म के  आराध्य की तस्वीरों के स्टिकर लगे हैं, तरह-तरह के धार्मिक नारे लिखे हैं। बहुत सी गाडिय़ां तो हम अपने आसपास ही ऐसी देखते हैं जिनमें नंबर प्लेट की जगह ब्राम्हण, ठाकुर, कुर्मी, जैसी कई तरह की जातियां लिख दी जाती हैं। कई गाडिय़ां ऐसी रहती हैं जिनकी नंबर प्लेटों पर नंबर तो नहीं रहता, लेकिन सिक्ख धर्म का निशान लगाया हुआ रहता है। और तो और अब तो कुछ ऐसे नंबर हैं जिनके अंकों को नंबर प्लेट पर इस तरह तोड़-मरोडक़र लिखा जाता है कि वे अंक नहीं दिखते, राम दिखते हैं। जात और धरम की नुमाइश, किसी भी ताकतवर, या अर्जी-फर्जी संगठनों के असली-नकली पदनामों वाली तख्तियां गाडिय़ों पर लगा दी जाती हैं, और ऐसी कई तख्तियां तो नंबर प्लेट की जगह लगा दी जाती हैं। मानवाधिकार के नाम पर देश में ढेर सारे फर्जी संगठन बने हैं, और उनके नाम, पदनाम के जिक्र वाली ऐसी नंबर प्लेट गाडिय़ों पर लगा दी जाती हैं जिनके पीछे पुलिस विभाग के रंग का बैकग्राउंड भी रहता है। मतलब यह कि अपनी असली या नकली ताकत की नुमाइश का कोई भी मौका लोग नहीं छोड़ते हैं। 

हम तो दशकों से इस बात के खिलाफ लिखते चले आ रहे हंै, और देश का मोटरवाहन अधिनियम भी सरकारों पर यह जिम्मेदारी डालता है कि यह सिलसिला खत्म किया जाए, लेकिन निर्वाचित सरकारों के किसी भी जात, धरम, संगठन पर कार्रवाई करते हुए हाथ कांपने लगते हैं। बड़े-बड़े जात-धरम के झंडे गाडिय़ों पर लहराते रहते हैं, और सरकारों को इन्हें अनदेखा करना सहूलियत का काम लगता है। नतीजा यह होता है कि सडक़ों पर न सिर्फ आम जनता, बल्कि ट्रैफिक पुलिस भी ध्यान से यह देख लेती है कि ट्रैफिक-गुंडागर्दी करने वाले लोग किस जात-धरम के हैं, और उन्हें धरने पर उनके किस नेता का फोन तुरंत आ जाएगा। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट बहुत सारे मामलों में सक्रिय है, और सरकार को कटघरे में खड़े रखता है। यह मामला सामाजिक जीवन में जात, धरम, ओहदे जैसे भेदभाव को बढ़ाने वाला है, और छत्तीसगढ़ के हाईकोर्ट को भी देश के कानून को यहां कड़ाई से लागू करने के लिए राज्य सरकार से हलफनामा लेना चाहिए। जात और धरम का जहर इतना अधिक फैल चुका है कि उसकी नुमाइश उसे और फैलाती है। अदालती दखल के बिना सरकार कुछ भी नहीं करेगी।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 सितंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)




 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 सितंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

क्रिकेट को लेकर तनातनी, पहले से बढ़ाए उन्माद का नतीजा, अभी और खतरे

22 सितंबर 2025 

 

मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक कुछ पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाडिय़ों की तस्वीरें और उनके वीडियो छाए हुए हैं जिनमें वे भारत के साथ हुए क्रिकेट मैच के दौरान तरह-तरह के इशारों से भारत की खिल्ली उड़ाते दिख रहे थे। कभी वे बल्ले को बंदूक की तरह दिखा रहे थे, तो कभी हाथों से हवाई जहाज गिरा देने के इशारे कर रहे थे कि किस तरह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कहा जा रहा है कि पाकिस्तान ने भारत के आधा दर्जन लड़ाकू विमान गिराए हैं। इनके अलावा हाथों की कुछ हरकतें अश्लील भी मानी जा रही है। इस टूर्नामेंट में इसके पहले भी पहले मैच के बाद भारत के खिलाडिय़ों ने पाकिस्तान के खिलाडिय़ों से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था जिसे खेलकूद की दुनिया में अशिष्टता माना जा रहा था। भारत में बहुत से तबकों की प्रतिक्रिया यह रही कि पहलगाम हमले के बाद और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान से जो तनातनी चल रही थी, पाकिस्तान पर भारत सरकार ने जो आरोप लगाए थे, उन्हें देखते हुए पाकिस्तान के साथ मैच खेलना ही नहीं था। भारत की नदियों से पाकिस्तान को जाने वाले पानी को लेकर भारत सरकार ने शुरू से कहा था  कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते। ऐसे में भारत में बहुत से लोगों का यह मानना था कि पाकिस्तान के साथ क्रिकेट क्यों खेला जाए?

भारत सरकार की तरफ से यह सफाई दी गई थी कि चूंकि यह टूर्नामेंट दो देशों के बीच का नहीं था, बल्कि यह कई देशों के बीच का था, इसलिए भारत का इसमें खेलने से मना करना मुमकिन नहीं था। इस सरकारी कथन के जवाब में लोगों ने दुनिया के इतिहास के बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय, और बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंटों की लिस्ट गिना दी थी कि कब और किस देश ने कौन से टूर्नामेंट का बहिष्कार किया था। लोगों ने इस बात के लिए भी आलोचना की थी कि क्रिकेट के साथ विज्ञापनों और स्पांसरशिप की कमाई जुड़ी रहती है, प्रसारण से भी कमाई होती है, इसलिए सिर्फ कमाई को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान से मैच का बहिष्कार नहीं किया गया। खैर, हम दो देशों के बीच के रिश्तों में गैरजरूरी बहिष्कार के खिलाफ रहते आए हैं, और भारत सरकार के कथन से सहमति या असहमति से परे हमारा यह मानना है कि सरहद पर चल रहे तनाव से खेलकूद, कला, संस्कृति, फिल्म, टेलीविजन, साहित्य को अलग भी रखा जा सकता है। हमने इस बात की भी वकालत की थी कि पाकिस्तान से बड़ी संख्या में जो जरूरतमंद लोग बड़े इलाज के लिए हिन्दुस्तान आते हैं, उसे जारी रखा जाना चाहिए। आम लोगों की आवाजाही चलने देनी चाहिए। लेकिन दोनों देशों ने अपनी-अपनी जमीन पर जब नफरत के फतवे हवा में गूंजते हैं, तो अक्ल किनारे धरी रह जाती है। राष्ट्रवादी और युद्धोन्मादी उन्माद लोगों के तर्क और न्याय की समझ को ढांक लेते हैं। ऐसे में हर चीज के बहिष्कार के फतवे होने लगते हैं, और इस बार के तनाव से पहले भी भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले तनाव के बाद से कारोबार पर रोक चली आ रही थी, जिससे इन दोनों ही देशों का बड़ा आर्थिक नुकसान हो रहा था।

अगर कुछ लोगों को लगता है कि सरहद की लड़ाई, या दूसरे की जमीन पर आतंकी हमले गैरफौजी, गैरराजनीतिक मामलों के बहिष्कार से थम जाएंगे, तो यह नासमझी की बात है। हम तो खून और पानी साथ-साथ बहने या न बहने जैसी बात के भी खिलाफ हैं। हम पड़ोसी देश के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने के हिमायती हैं क्योंकि देश गरीब हो या अमीर हो, पड़ोसी से दुश्मनी बड़ी महंगी पड़ती है। और पाकिस्तान के क्रिकेट-बहिष्कार से भारत को भला क्या ही हासिल हो गया रहता, आज पाकिस्तान ने सऊदी अरब से जो फौजी संधि की है, वह हमारे हिसाब से तो पाकिस्तान के परमाणु बम बनाने के बाद का सबसे ताकतवर फौजी फैसला है। अगर किसी सरकार, या राजनीतिक ताकत का बस चलता, तो उन्हें ऐसी किसी संधि को रोकने की कोशिश करनी थी, लेकिन वह तो हुआ नहीं, अब क्रिकेट या टीवी कलाकारों के बहिष्कार से सिर्फ फतवों का पेट भरता है, देश की हिफाजत नहीं बढ़ती। आज पाकिस्तान-सऊदी फौजी पैक्ट से सऊदी की अथाह दौलत का जितना कुछ भी सहारा दीवालिया पाकिस्तान को मिलेगा, वह कम नहीं रहेगा, और सऊदी को अपने दुश्मनों के किसी हमले, या उनके साथ जंग की नौबत में पाकिस्तान की परमाणु हथियार क्षमता का पूरा साथ मिलेगा। इधर हिन्दुस्तान के लोग पाकिस्तान से क्रिकेट के खिलाफ रोना रो रहे हैं, और उधर शायद भारत सरकार को पाक-सऊदी इस नए याराना की खबर भी नहीं हुई। जब भी कोई देश गैरजरूरी और सतही भावनात्मक, या चर्चित मुद्दों में उलझ जाता है, तो वह असल खतरों को अनदेखा करने की कीमत पर ही ऐसा कर पाता है। 

भारत और पाकिस्तान दोनों ही सरकारों के सामने अपनी जनता को संतुष्ट करना, अपने आपको राष्ट्रवादी साबित करना, अपने को पड़ोसी देश से अधिक ताकतवर साबित करना पड़ता है। यह चुनावी और राजनीतिक मजबूरी सरकारों को गैरजरूरी विवादों में उलझाकर रखती है, और सरकारें देश की सुरक्षा जरूरतों से परे महज जनधारणा प्रबंधन में लग जाती हैं। फिर भी हम इस बात का जिक्र करना चाहेंगे कि जब क्रिकेट को लेकर, पहलगाम, और ऑपरेशन सिंदूर को लेकर दोनों ही देशों में उन्माद चल रहा था, उस बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ यह ऐतिहासिक और असाधारण मिलिट्री पैक्ट किया है, जो कि उसकी बहुत बड़ी कामयाबी है। भारत के तमाम उन्मादी तबकों को यह देखना चाहिए कि पिछले कई दशक के उनके उन्माद से न तो पाकिस्तान का परमाणु हथियार संपन्न होना रूक पाया, न ही चीन का असाधारण समर्थन मिलना रूका, और न ही अभी सऊदी के साथ उसकी यह संधि रूकी। किसी भी समझदार देश को सतही उन्माद में अपनी जनता को उलझाकर नहीं रखना चाहिए, क्योंकि उन्माद को कोई समाज, संगठन, सरकार बढ़ा भर सकते हैं, घटा नहीं सकते। और बढ़े हुए उन्माद का हाल एक बड़े किए गए काल्पनिक राक्षस सरीखा रहता है, जिसका पेट भरना लोगों की जिम्मेदारी हो जाती है। भारत और पाकिस्तान में जनता का पड़ोसी देशों के खिलाफ पैदा किया गया, और बढ़ाया गया उन्माद ऐसा ही हो चुका है कि दोनों देश परस्पर नफे के बजाय उन्मादी नुकसान को झेलते हुए अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं, और अपनी ही कमर तोड़ रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 सितंबर 2025



 

हिंसानियत में डूबे कुछ हिन्दुस्तानियों के लिए हॉलैंड से आया है एक संदेश

 21 सितंबर 2025

हॉलैंड की संसद में कल एक महिला सांसद ने खलबली मचा दी जब वे फिलीस्तीन के झंडे के रंगों का ब्लाऊज पहनकर वहां पहुंची। जाहिर तौर पर यह टॉप फिलीस्तीन के साथ हमदर्दी और एकजुटता दिखाने के लिए था। सदन के भीतर स्पीकर वहां की धुर दक्षिणपंथी पार्टी के थे, और उन्होंने इस पर आपत्ति की, और कहा कि सांसदों के कपड़े निष्पक्ष रहने चाहिए। लेकिन यह महिला सांसद सदन से बाहर जाने के पहले कुछ वक्त अपने अधिकार और जिम्मेदारी पर अड़ी रही। उसने स्पीकर को चुनौती भी दी कि अगर वह नियम तोड़ रही है तो उसे शारीरिक रूप से सदन से निकाल दिया जाए, लेकिन फिर वह वहां से बाहर चली गई।

फिर जब वह सदन में लौटी तो उसने तरबूज की तस्वीर वाला टॉप पहन रखा था जो कि फिलीस्तीन का ही प्रतीक माना जाता है। तरबूज का छिलका हरे रंग का होता है, भीतर गूदा लाल होता है, बीज काले होते हैं, और छिलके और गूदे के बीच का रंग सफेद होता है। इस तरह तरबूज फिलीस्तीनी झंडे के हर रंगों वाला होता है। अब इस पर विरोध करने का हक सदन में किसी को नहीं था, और सदन की कार्रवाई का यह पूरा हिस्सा सोशल मीडिया पर उसे पूरी दुनिया की तारीफ दिला रहा है, लगभग पूरी दुनिया की, मुझे यह उम्मीद नहीं करना चाहिए कि फिलीस्तीनियों की मौत का जश्न मनाते हुए लोगों को भी इस महिला का यह हौसला सुहा रहा होगा।

हॉलैंड की डच-पॉलिटिक्स इन दिनों दक्षिणपंथियों के उभार की शिकार है, और सदन में जब कुछ लोगों ने फिलीस्तीनी झंडे वाले पिन अपने कोट या टाई पर लगा रखे थे, दक्षिणपंथी सांसदों ने गाजा में इजराइली बंधकों के समर्थन में पीली रिबीन बांध रखे थे। हॉलैंड में आज सरकार ने गाजा में इजराइली फौजी कार्रवाई को जनसंहार मानने से इंकार कर दिया है, और वहां के कई सांसद इसका विरोध कर रहे हैं। इस सांसद, एस्थर आउवहांड, ने अपने देश की सरकार की नैतिक मुर्दानगी का विरोध करने के लिए फिलीस्तीनियों के साथ ऐसी एकजुटता दिखाई थी।

अपने देश की सरकार की नीतियों के खिलाफ जाकर, देश के बहुसंख्यक ईसाई तबके की नाराजगी का खतरा उठाकर भी एक महिला सांसद ने यह हौसला दिखाया है। अभी मेरे पास यह लिखने की कोई वजह नहीं है कि हॉलैंड की ईसाई बहुसंख्यक जनता इस महिला सांसद के साथ रहेगी, या उसके विरोध करेगी, फिर भी राजनीतिक रूप से मैंने इसे खतरा उठाना लिखा है। अब लिखते-लिखते जब मैं इस बारे में पढ़ रहा हूं तो भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय मीडिया के आंकड़े बता रहे हैं कि हॉलैंड की 65 फीसदी आबादी अपनी सरकार की इजराइल-गाजा नीति के खिलाफ है। हॉलैंड का मीडिया बताता है कि कुल 18 फीसदी लोग सरकारी नीति का समर्थन कर रहे हैं। 60 फीसदी वोटर चाहते हैं कि वहां का मंत्रिमंडल इजराइल के खिलाफ अधिक कड़ा प्रस्ताव पारित करे। 59 फीसदी लोग यह मानते हैं कि इजराइली कार्रवाई अनुपातहीन है। आधे से ज्यादा डच आबादी यह मानती है कि हॉलैंड को, इजराइल को हथियारों की सप्लाई बंद कर देना चाहिए, और इजराइली सामानों का बहिष्कार भी करना चाहिए। 33 फीसदी लोग तुरंत ही एक फिलीस्तीनी राज्य को मान्यता देने के पक्ष में हैं, और इससे भी अधिक लोग वहां पर मानवाधिकार कुचले जाने को लेकर फिक्रमंद हैं। आधी से ज्यादा आबादी यह मानती है कि इजराइल नस्लभेद कर रहा है। आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा, 64 फीसदी यह मानता है कि गाजा में तुरंत युद्धविराम होना चाहिए, और यह भी कि गाजा में जितनी मानवीय मदद की जरूरत है उतनी जाने देने की इजाजत इजराइल दे।

हॉलैंड के आंकड़े बताते हैं कि वहां पर 6 फीसदी आबादी मुस्लिम है, जाहिर है कि मतदाताओं में इससे अधिक अनुपात तो मुस्लिम वोटरों का हो नहीं सकता। फिर भी वहां के बहुत से सांसद और कुछ पार्टियां इजराइली हिंसा और जुल्म के खिलाफ अपने ईसाई, या नास्तिक हो चुके वोटरों के बीच एक तकरीबन सौ फीसदी मुस्लिम गाजा के साथ खड़ी हुई है। जिन पार्टियों ने सार्वजनिक रूप से इजराइल का जमकर विरोध किया है, उनमें आधा दर्जन राजनीतिक दल हैं, और संसद की डेढ़ सौ सीटों में से करीब 45 सांसद इन पार्टियों के हैं।

मैं फिलीस्तीन के मुद्दे पर इतनी बारीकी से इसलिए पढ़ और लिख रहा हूं कि गाजा पर इजराइली जुल्म, अवैध कब्जे, और फौजी हमलों के खिलाफ जख्मी फिलीस्तीनियों से एकजुटता दिखाने के लिए एशिया से गाजा गए हुए एक अमन-कारवां में कोई 15 बरस पहले मैं भी शामिल था। मैं उस वक्त बीबीसी-लंदन, और कुछ दूसरे मीडिया संस्थानों के लिए साथ-साथ रिपोर्टिंग भी कर रहा था, और अपने हुनर से फोटोग्राफी भी कर रहा था। मैंने इजराइलियों के जुल्म के शिकार लोगों को रूबरू देखा हुआ है, उनकी बातें सुनी हुई हैं। हमारे ठीक पहले एक दूसरा शांति-कारवां वहां गया था, और उस पर इजराइली हमले में करीब 12 लोग मारे गए थे। हमारे कारवां पर भी फौजी हमले, या किसी और किस्म के हमले की आशंका बनी हुई थी, लेकिन इजराइल ने ऐसा कोई हमला इसलिए नहीं किया कि हममें 50 से अधिक हिन्दुस्तानी थे, और भारत इजराइली निर्यात का आधे से अधिक का अकेला खरीददार है। दुनिया का कोई समझदार कारोबारी इतने बड़े ग्राहक देश के बहिष्कार का खतरा नहीं उठाता।

लेकिन हॉलैंड की इस बहादुर महिला सांसद, और हमारे सरीखे कारवां की याद से परे आज की हिन्दुस्तान की एक और वजह है जिससे इस बारे में यहां लिखना हो रहा है। आज इस देश में मुस्लिमों से नफरत करने वाले बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि इस बात पर खुश हैं कि गाजा में हो, या कहीं और, मुस्लिम जहां भी मारे जा रहे हैं, वे धरती पर से घट तो रहे हैं। यह एक अलग बात है कि ऐसी हिंसक और नफरती सोच रखने वाले लोग आज एक अखंड भारत की कल्पना भी करते हैं जिससे बांग्लादेश, पाकिस्तान सब आज के भारत में मिल जाएंगे। उन्हें यह समझ नहीं पड़ता कि इन दोनों मुस्लिम-बहुल देशों को मिलाकर बने अखंड भारत में मुस्लिमों का अनुपात तो बहुत अधिक बढ़ जाएगा, और इसके साथ-साथ न तो नफरतियों को नापसंद लोगों को पाकिस्तान धकेला जा सकेगा, और न ही आज जिन्हें बांग्लादेशी घुसपैठिया कहा जाता है, उन्हें कहीं निकाला जा सकेगा।

मुस्लिमों की मौत की कामना तो सार्वजनिक रूप से करने में भी बहुत से लोगों को हिचक नहीं है, और न ही अखंड भारत के सपने से ऐसे लोग अभी तक जाग रहे हैं। ऐसे ही लोगों को बताने के लिए आज का यह लिखना जरूरी है कि 6 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले हॉलैंड में एक गैरमुस्लिम महिला सांसद सत्ता की मर्जी के खिलाफ जाकर, संसद के स्पीकर की चेतावनी को अनदेखा करके फिलीस्तीनियों का साथ देने इस तरह कपड़े बदल-बदलकर भी अपनी नीतियां कायम रख रही है। आज की दुनिया में जो शक्ति संतुलन है, उसमें फिलीस्तीन और इजराइल के बीच कुछ भी करने में भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं रह गई है। और जब इस देश की उस मोर्चे पर कोई ताकत नहीं है, कोई अहमियत नहीं है, तो इस देश में इजराइल के पक्ष में हवन करने, और फिलीस्तीनी बच्चों की लाशों की पोटलियों की तस्वीरों पर खुशियां मनाने वाले लोगों की भी इजराइल को कोई जरूरत नहीं है।

दुनिया में नस्लवादी जनसंहार करने के लिए इतिहास के एक सबसे बड़े मवाली और गैंगस्टर डोनल्ड ट्रम्प की अगुवाई में इजराइल अकेला काफी है। लेकिन इतिहास ऐसे लोगों को दर्ज करता है जिन्होंने ऐतिहासिक मानवीय चुनौतियों के दौर में क्या कहा था, और क्या किया था। पौन सदी-एक सदी पहले का भारत का इतिहास गवाह है कि गांधी ने फिलीस्तीनियों के हक के बारे में, और इजराइलियों के अवैध कब्जे के बारे में क्या लिखा था। आज मासूम और बेकसूर फिलीस्तीनियों की मौत पर जो हिन्दुस्तानी मुस्लिम घटने की खुशी मना रहे हैं, उन्हें भी इतिहास दर्ज करते चल रहा है। मैं अभी यह कहने की हालत में नहीं हूं कि इंसानियत की बर्बादी के बेगाने जश्न में नाचते हुए ये हिन्दुस्तानी दीवाने गिनती या अनुपात में कितने है, लेकिन ये दर्ज अच्छी तरह हो रहे हैं। जिस तरह किसी कब्र के पीछे लगे पत्थर में यह दर्ज होता है कि वहां कौन दफन हैं, इन लोगों के नाम इंसानियत की कब्र के पीछे के पत्थर पर दर्ज रहेंगे।

छप्परफाड़ कमाई की चाह दिमाग किनारे बैठा देती है

21 सितंबर 2025 

 

पूरे देश से ही इन दिनों ऐसी खबरें आ रही हैं कि शेयर बाजार में पूंजीनिवेश का झांसा देकर, या क्रिप्टोकरेंसी में पैसा लगाकर, किसी चिटफंड कंपनी का सदस्य बनाकर लोगों को लूटा जा रहा है। यह लूट ठगी या जालसाजी से थोड़ी सी अलग इसलिए है कि डिजिटल अरेस्ट करने की धमकी देकर, जिन लोगों को ब्लैकमेल किया जाता है, निचोड़ लिया जाता है, उनसे ये मामले अलग हैं। ये मामले अधिक रकम कमाने की लालच में लोगों के खुद पूंजीनिवेश करने के हैं। इनमें दिया गया धोखा थोड़ा अलग किस्म का है, लेकिन अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी लुटाकर, नोटों के पेड़ पाने की लालच में ऐसा करने वाले लोग कम नहीं हैं। कल भी छत्तीसगढ़ के दुर्ग में एक आदमी-औरत पकड़ाए हैं जिन्होंने शेयर बाजार से अंधाधुंध कमाई का झांसा देकर लोगों से 12 करोड़ रूपए ठग लिए। शेयर बाजार में नामौजूद कंपनियों के नाम पर लोगों ने धोखा खाया। पिछले पांच बरस से हम हर हफ्ते चिटफंड कंपनियों के लोगों की गिरफ्तारियां देखते आ रहे हैं, लेकिन गिरफ्तारियों से बावजूद डूबी हुई रकम तो अब वापिस आ नहीं सकती।

आज बैंकों और कुछ दूसरे सरकारी वित्तीय संस्थाओं की बहुत सी भरोसेमंद योजनाएं हैं जिनमें लोग पैसा जमा करके, या लगाकर ठीकठाक कमाई कर सकते हैं। इनमें से जो योजनाएं शेयर मार्केट में पूंजीनिवेश की हैं, उनमें भी लोगों के पास यह अलग-अलग पसंद रहती है कि वे कुछ अधिक कमाई के लिए कुछ अधिक खतरे वाली कंपनियों में पूंजीनिवेश करना चाहते हैं, या अधिक सुरक्षित कंपनियों में पूंजीनिवेश वाली कम मुनाफे की योजनाओं में पैसा डालना चाहते हैं। खतरों से खेलने की ये सीमाएं सरकारी और बड़े निजी बैंकों में मौजूद हैं, और योजनाओं में काफी हद तक सीमाओं और संभावनाओं की जानकारी भी दी जाती है। ऐसी पॉलिसी या डिपॉजिट स्कीम बेचने के लिए इन सबके एजेंट भी हैं, लेकिन जो भी वित्तीय संस्थान धोखाधड़ी की नीयत नहीं रखते हैं, वे सपने नहीं दिखा सकते, वे सीमाएं और संभावनाएं बता सकते हैं। इस बीच लोगों को सपने देखने की चाह ऐसी रहती है कि वे जालसाजों की दिखाई राह पर दौड़ पड़ते हैं। आज चारों तरफ जो लोग जालसाजी के शिकार हैं, वे ऐसे ही लोग हैं जो कि नोटों का पेड़ पाने के लिए जमीन में नोट दफन करके उसे खाद-पानी देने को तैयार हो जाते हैं, और जालसाज उन नोटों को लेकर रफूचक्कर हो जाते हैं।

हम सरकार की कुछ दूसरी कमियों और खामियों की चर्चा तो करते रहते हैं जिनकी वजह से जालसाजी और धोखाधड़ी पनपती और बढ़ती हैं, लेकिन पूंजीनिवेश को लेकर हम यह नहीं कह सकते कि सरकार, या सरकार के मान्यता प्राप्त भरोसेमंद बैंकों की कमी है, उनकी योजनाएं नहीं हैं, इसलिए लोग जालसाजों की पूंजीनिवेश योजना की तरफ जाने को मजबूर होते हैं। भारत में आज सरकार की मान्यता प्राप्त और सरकारी निगरानी वाली हजारों योजनाएं लोगों के सामने हैं, लेकिन किसी भी कानूनी और जायज योजना की तरह उनके मुनाफे की एक सीमा है। और लोगों की टकसाल की रफ्तार से कमाई की हसरत ऐसी है कि उसे लेकर एक पुराना फिल्मी गाना याद आता है, कई बार यूं ही देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोडऩे लगता है...। इस गाने में जिस प्रेम का जिक्र है, उसे अगर कमाई की चाहत की तरह देखें, तो लोग अपनी बुद्धि की सुझाई गई सीमा रेखा को अक्सर तोडऩे लगते हैं क्योंकि उन्हें किसी जालसाज के दिखाए गए हसीन सपनों की मृगतृष्णा हकीकत लगने लगती है।

अब कोई अनपढ़ हो, अखबारों से परे हो, तो उसे जालसाजी से अनजान रहने का संदेह का लाभ दिया जा सकता है। लेकिन जो लोग हर दिन के अखबार में एक-एक दर्जन जालसाजी की खबरें पाते हैं, वे भी अगर पहला मौका मिलते ही अगले जालसाज को अपनी सारी बचत देने को बेताब रहते हैं, तो उन्हें कौन बचा सकते हैं? अखबार आज भी अधिकतर आबादी को हासिल हैं। और अगर अखबार खुद ही किसी जालसाजी की योजना में हिस्सेदार न हों, तो वे दूसरी जालसाजी की खबरें भी छापते रहते हैं। कुल मिलाकर आज के इस डिजिटल दौर में लोगों को छपे हुए शब्दों से परे भी खबरें हासिल हैं, और उन्हें पढक़र सबक लेने को विलासिता मानते हुए 40 फीसदी जीएसटी भी नहीं है। ऐसे में अगर लोग आज भी अपनी मेहनत, या हराम की दौलत को दांव पर लगाने के लिए बेसब्र और उतारू रहते हैं, तो क्या किया जा सकता है? किसी को फर्जी ओटीपी भेजकर उसका बैंक खाता खाली कर देना एक अलग किस्म का जुर्म है, और उस जुर्म के शिकार मोटी कमाई की चाह में पूंजीनिवेश नहीं करते हैं। लेकिन जालसाजों की फर्जी योजनाओं में रातों-रात छप्परफाड़ कमाई की उम्मीद में अवैध प्लॉटिंग की जमीन खरीदने वाले जानते-बूझते लोगों की तरह पैसा लगाने वालों को कौन बचा सकते हैं? अवैध प्लॉटिंग में तो फिर भी प्लॉटिंग अवैध रहती है, जमीन के टुकड़े का अस्तित्व तो रहता है, फर्जी पूंजीनिवेश में तो फर्जी, पूंजी, और निवेश, ये तीनों ही शब्द फर्जी रहते हैं।

फिर भी चाहे लोग अपनी बेवकूफी से पैसा डुबा रहे हों, घूम-फिरकर सरकार की कुछ तो जिम्मेदारी आती ही है। सरकार को ऐसी फर्जी योजनाओं के प्रति जनता को जागरूक करने के अभियान तरह-तरह से चलाने चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद अपने प्रसारणों में कहा है कि डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई चीज भारत में नहीं है, इसके बावजूद हर दिन देश में सैकड़ों लोग डिजिटल अरेस्ट होने के लिए बेचैन रहते हैं। ऐसे लोगों को जालसाजों और धोखेबाजों से बचाना आसान काम तो नहीं है, फिर भी सरकार को नए तरीके ढूंढने चाहिए। प्रधानमंत्री का एडवांस में दिया गया भरोसा भी जहां काम न कर रहा हो, वहां कोई और राह ढूंढी जाए, क्योंकि जालसाजी और धोखाधड़ी होने के बाद सारी कानूनी और अदालती कार्रवाई करना तो सरकार के ही मत्थे आता है।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 सितंबर 2025



 

पाक-सऊदी सैन्य-समझौते के खतरे समझने की जरूरत

20 सितंबर 2025 

 

किसी देश के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितों के बारे में वहां की जनता को भी अपनी सरकार के बयान से परे फिक्र रखनी चाहिए। सरकारों की अपनी सीमाएं रहती हैं कि वे सार्वजनिक रूप से क्या कहें, और क्या न कहें। हर सरकार तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प सरीखी गैरजिम्मेदार नहीं हो सकतीं, कि मुंह खोले और बकवास करे। इसलिए जनता को अपनी सरकार के कहे बिना भी कई चीजों को समझते रहने की कोशिश करनी चाहिए। अब अभी भारत के पड़ोसी, और फौजी मामलों में सबसे बड़े दुश्मन देश पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ एक अभूतपूर्व और चौंकाने वाला फौजी समझौता हुआ है। इस सैन्य समझौते के तहत अब पाकिस्तान और सऊदी अरब एक-दूसरे पर हुए किसी भी हमले की नौबत में उसे अपने पर हमला मानेंगे। पाकिस्तान ने चार कदम आगे बढक़र यह भी कहा है कि उसकी परमाणु क्षमता भी सऊदी अरब के साथ रहेगी। अभी तक इस समझौते की शब्दावली सामने नहीं आई है, लेकिन यह बात साफ है कि ये दोनों देश फौजी मामलों में एक-दूसरे के इतने करीब कभी नहीं थे। भारत के लिए यह फिक्र की बात इसलिए है कि पाकिस्तान परमाणु हथियार संपन्न, और आर्थिक रूप से विपन्न देश है, और सऊदी अरब परमाणु हथियार के बिना है, लेकिन उसका बहुत बड़ा खजाना है। एक सहज बुद्धि से इन दो बातों को जोडक़र देखें तो ऐसा लगता है कि यह खाली पड़े पीपल को बेघर भूत मिलने सरीखा है, एक को घर मिला, और दूसरे को किराएदार।

हम अभी इस पूरे मामले की जटिलता को समझने की कोशिश ही कर रहे हैं, क्योंकि फिलीस्तीन पर हमला करते-करते अभी इजराइल ने फिलीस्तनी संगठन हमास के नेताओं को मारने के नाम पर एक मुस्लिम देश कतर पर जिस तरह हवाई हमले किए, उससे नुकसान तो बहुत कम हुआ, लेकिन मुस्लिम देश हड़बड़ाकर जिस तरह एक साथ बैठे हैं, वैसा शायद ही पहले कभी हुआ हो। गाजा में 65 हजार लोगों का कत्ल हो गया, लेकिन मुस्लिम देशों के चेहरों पर शिकन नहीं पड़ी, लेकिन संपन्न देशों के बीच के एक देश कतर पर जरा सा हवाई हमला हुआ, तो इस्लामिक देश इकट्ठे होकर इस्लामिक नाटो बनाने की बात करने लगे। लोगों को मालूम ही है कि नाटो एक सैनिक संगठन है जिसमें योरप के देशों के साथ-साथ अमरीका भी है, और यह संगठन हाल के बरसों की लड़ाई में यूक्रेन का साथ दे रहा है, और रूस के खिलाफ खड़ा हुआ है। इसी किस्म का कोई संगठन इस्लामिक देशों के बीच बन सके, यह बहुत आसान शायद न हो, लेकिन भारत के लोगों को यह याद रखना चाहिए कि अगर ऐसा कोई संगठन बनता है, तो पाकिस्तान तो उसका अनिवार्य हिस्सा रहेगा, और भारत उसके बाहर ही रहेगा। ऐसे में परमाणु हथियार संपन्न पाकिस्तान रणनीतिक महत्व किसी भी तरह के इस्लामिक सैनिक संगठन में बहुत अधिक रहेगा, और हो सकता है कि यह उसकी मौजूदा फटेहाली का एक समाधान भी हो सके। यह बात कहना बहुत तर्कसंगत और न्यायसंगत तो नहीं होगा, लेकिन इस तस्वीर को देखने का एक सहज नजरिया यह भी हो सकता है कि अतिसंपन्न इस्लामिक देशों के हाथ आज के अतिविपन्न पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की ताकत एक किस्म से भुगतान पर हासिल रहेगी।

यह पूरी तस्वीर बहुत ही बिखरी हुई, और विशाल है, इसलिए हम सिर्फ इसके कुछ हिस्सों की चर्चा कर रहे हैं, कोई निष्कर्ष नहीं निकाल रहे हैं। सउदी अरब पाकिस्तान के साथ से हासिल किसी भी तरह की ताकत से ईरान और इजराइल, दोनों परस्पर दुश्मन देशों के खिलाफ अपना बाहुबल बढ़ा सकता है। इस तस्वीर में कुछ विरोधाभासी बातें भी हैं कि सऊदी अरब अमरीका से भी ठीक रखेगा, लेकिन इजराइल के खिलाफ रहेगा। आज इजराइल पर यह खतरा मंडरा रहा है कि अगर पाकिस्तान की परमाणु क्षमता तक सऊदी अरब की पहुंच हो गई है, तो यह सीधे-सीधे इजराइल के अस्तित्व पर एक खतरा भी है। दूसरी तरफ मुस्लिम देशों के संगठन इजराइल के खिलाफ तो हैं, लेकिन सारे के सारे देश इजराइल से फौजी-दुश्मनी निभाना चाहते हों, ऐसा भी नहीं है। इस तरह बड़े जटिल और विसंगतियों भरे हुए मुस्लिम देशों के आपसी रिश्तों पर यह ताजा पाक-सऊदी फौजी समझौता क्या फर्क डालेगा, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन यह बात तय है कि इजराइल और अमरीका अपने मुस्लिम-विरोधी रूख के चलते तमाम मुस्लिम देशों को एक साथ बैठने का एक मौका जुटाकर दे रहे हैं, और इनकी संपन्नता किस तरह एक फौजी ताकत में बदल सकती है, यह आने वाला वक्त बताएगा।

इससे जुड़े हुए एक और पहलू पर सोचने की जरूरत है। दुनिया के कुछ बड़े राजनीतिक विश्लेषक पहले भी इस बात को लिखते आए हैं कि दुनिया में आज मुस्लिम और ईसाई बहुसंख्यक देशों के बीच सभ्यता, और संस्कृति का एक टकराव चल रहा है। इस्लामी सभ्यता, और पश्चिमी सभ्यता के बीच के टकराव का नतीजा था कि न्यूयॉर्क की इमारतों पर ओसामा-बिन-लादेन के विमानों का हमला हुआ था, और उसके पहले इराक और अफगानिस्तान पर, सीरिया और दूसरे मुस्लिम ठिकानों पर अमरीकी और पश्चिमी (ईसाई) देशों का हमला हुआ था। इसलिए मुस्लिम और ईसाई दुनिया के बीच भी आज इजराइल की वजह से एक नया ध्रुवीकरण हो सकता है, जिसका विश्लेषण हमारे लिए बहुत आसान नहीं है, लेकिन तमाम संबंधित देशों के लोगों को अपनी सरकार के घोषित बयानों से परे जाकर भी इस बारे में पढऩा चाहिए, और सोचना-समझना चाहिए।

ट्रम्प नाम के एक बेदिमाग और बददिमाग की वजह से आज पूरी दुनिया में भूचाल सा आया हुआ है, किसी देश के पैर टिक नहीं पा रहे हैं कि ट्रम्प की अगली बददिमागी से क्या होगा। हमें यह बात तो साफ लग रही है कि संपन्न मुस्लिम देशों की एक धेले की हमदर्दी भी गरीब फिलीस्तीन के साथ नहीं है, लेकिन कतर पर इजराइली हवाई हमले से अब इस्लामिक देशों की नैतिकता पर छाई हुई चर्बी पर कुछ जोर पड़ रहा है। देखते हैं आगे और किस-किस तरह के गठबंधन होते हैं। फिलहाल तो पाक-सऊदी सैन्य-समझौते की वजह से आज इस्लामिक दुनिया के हाथ मानो डेढ़ सौ से अधिक परमाणु हथियार लगे हैं। और देखना है कि चीन, रूस, और अमरीका सहित बाकी नाटो का रूख इस बदले हुए शक्ति संतुलन की तरफ कैसा रहता है। 

(Daily Chhattisgarh)