मां के दूध में यूरेनियम प्रदूषण भी इस देश के लोगों को जगा नहीं रहा!

25 नवंबर 2025 

 

बिहार की एक रिपोर्ट अगर सिर्फ किसी अखबार या टीवी चैनल की रहती, तो उसे सनसनीखेज कहकर खारिज किया जा सकता था। लेकिन यह रिपोर्ट कुछ वैज्ञानिक संस्थानों की शोध रिपोर्ट पर आधारित है, और देश की एक सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरण संस्था, सीएसई की पत्रिका डाऊन टू अर्थ की अपनी स्वतंत्र रिपोर्ट पर आधारित है, इसलिए इसे खारिज करना आसान नहीं है। बिहार के अलग-अलग कई जिलों में माताओं के दूध के नमूनों की जांच की गई, और उनमें यूरेनियम का प्रदूषण पाया गया। यह बहुत खतरनाक बात इसलिए है कि दुधमुंहे शिशु पूरी तरह मां की दूध पर निर्भर रहते हैं, और उसमें अगर यूरेनियम आकर उन बच्चों के लिए खतरा खड़ा कर रहा है, तो उन बच्चों के लिए इसका कोई विकल्प भी तो नहीं है। 

इस मामले में किए गए सर्वे, अध्ययन, और शोध से यह पता लगा है कि जितनी भी माताओं के दूध की जांच की गई, उनमें सभी में यूरेनियम मिला है। यह जमीन के नीचे से आने वाले पानी में आने वाला प्रदूषण है, और ये सारी माताएं ऐसे ही पानी पर निर्भर हैं। छोटे बच्चे अपनी माताओं के मुकाबले भी ऐसे प्रदूषण के लिए अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उनके शरीर का वजन कम होता है, उनके अंग, और उनका मस्तिष्क विकसित नहीं हुआ रहता, और उनकी पाचन शक्ति पेट में गई भारी धातुओं को आसानी से बाहर नहीं निकाल सकती। यूरेनियम के प्रदूषण से बच्चों की किडनी पर असर होता है, उन पर स्नायुसंबंधी (न्यूरोलॉजिकल) असर होता है, कैंसर का खतरा रहता है, और भी कई किस्म की गंभीर बीमारियां उनको हो सकती हैं। सीएसई के एक शोध के मुताबिक बिहार के 11 जिलों में भूजल में यूरेनियम की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुझाई गई सीमा से बहुत ऊपर है, कई जिलों में तो यह दो-ढाई गुना से भी अधिक है। रिपोर्ट बताती हैं कि बिहार में गंगा तट के इलाके ऐसे प्रदूषण के लिए अधिक जाने जाते हैं। फिर भी डॉक्टरों का कहना है कि खतरे के बावजूद इन बच्चों से मां का दूध छुड़ाना नहीं चाहिए, क्योंकि उसका कोई बेहतर विकल्प इन बच्चों के लिए अभी उपलब्ध नहीं है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट कहती है कि भूजल में प्रति लीटर में 30 माइक्रोग्राम से अधिक यूरेनियम मां के दूध में पहुंच सकता है। बिहार के जिलों में यह 66, 77, और 82 माइक्रोग्राम/लीटर तक मिला है। 

अब देश के अलग-अलग हिस्सों में जमीन के भीतर के पानी में कई किस्म के खतरनाक प्रदूषण बने हुए हैं। छत्तीसगढ़ के ही गरियाबंद जिले के सुपेबेड़ा में प्रदूषित पानी की वजह से किडनी खराब होने से लगातार मौतें होती हैं, और करोड़ों खर्च करने के बाद भी वहां पानी से इस प्रदूषण को खत्म करने, या साफ पानी पहुंचाने का काम नहीं हो पाया है। देश के बहुत से हिस्सों में भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, ऐसे बहुत से नुकसानदेह रसायन मिले हुए हैं, और अलग-अलग इलाकों से भयानक तस्वीरें आती हैं जिनमें कहीं लोगों के दांत खराब हो गए हैं, कहीं उनकी हड्डियां कमजोर हो गई हैं, और बदन में पानी से जूझने वाली किडनी तो कई मामलों में खराब हो जाती है जो कि चेहरे से दिखती नहीं है। सरकार के ही कुछ आंकड़े बताते हैं कि देश में 16 करोड़ से अधिक लोगों को सुरक्षित पानी नहीं मिल रहा है। भयानक रसायनों के जमीन के नीचे के भंडारों से परे कई जगहों पर खेती में इस्तेमाल होने वाले, कारखानों में काम में लाए जाने वाले रसायनों को बह-बहकर भूजल में जाते पाया गया है, और उससे कैंसर जैसे खतरनाक रोग भी लोगों को हो रहे हैं। 

जिन लोगों को यह लगता है कि वे अपने लिए घरों में तरह-तरह के महंगे फिल्टर लगाकर अपने पीने के पानी को साफ कर लेंगे, उन्हें यह समझना चाहिए कि उनके खाए जाने वाले फल और सब्जी भी प्रदूषित पानी से उगते हैं, और रासायनिक प्रदूषण उनमें से होते हुए बदन के भीतर पहुंचता रहता है। फल-सब्जी, या फसल में छिडक़ा जाने वाला, खेतों में जमीन में डाला जाने वाला रसायन और जहर भी घूम-फिरकर पानी तक भी पहुंचता है, और फसलों के रास्ते तो इंसानों के बदन में आता ही है। जहर से परे माइक्रोप्लास्टिक भी हर तरह के पानी में घुसकर लोगों के बदन में आता है, और अब वह इंसानों के खून में घूम रहा है, उनके दिमाग के भीतर भी पहुंच रहा है। 

प्रदूषण जब तक लोगों की जिंदगियां खत्म नहीं करता, तब तक लोग उसकी परवाह नहीं करते। लेकिन आज हालत यह है कि दिल्ली में हवा जितनी जहरीली हो गई है, सिर्फ उसी की वजह से दस-बीस लाख लोग दिल्ली में मर रहे हैं, और लोगों की उम्र 8 बरस तक घट जा रही है। ये बातें हम किसी पार्टी के नेता के आरोपों से निकालकर नहीं कह रहे हैं, बल्कि ये वैज्ञानिक रिपोर्ट कहती हैं। यह नौबत किसी एक पार्टी के देश-प्रदेश में राज होने पर अचानक रातोंरात नहीं आ गई है, यह धीरे-धीरे बढ़ते हुए जहर का नतीजा है। यह सिलसिला हिन्दुस्तान में बहुत अधिक खतरनाक इसलिए है कि यहां औद्योगिक प्रदूषण पर किसी तरह का सरकारी, या अदालती काबू नहीं है। पर्यावरण के नियमों पर अमल इतना कमजोर है कि हर फैक्ट्रियां, जहर बनाने वाली हर कंपनी अपनी मर्जी का काम कर पाती हैं, और उन पर कोई रोक-टोक नहीं है। छत्तीसगढ़ में ही शराब बनाने वाले कुछ कारखाने अपना भयानक प्रदूषण सीधे नदी में डाल रहे हैं, उनसे मरी हुई लाखों मछलियां तैरती हुई मिली हैं, हाईकोर्ट उस पर खफा भी हुआ है, लेकिन कारखाने और कारोबार की सेहत पर कोई आंच नहीं आई है। 

मां के दूध में यूरेनियम मिलने पर भी अगर यह देश नहीं जागता है, तो इसे अगले सैकड़ों-हजारों बरस के लिए प्रदूषण की शिकार पीढिय़ां मिलना तय है। आज तो ऐसी भी पूरी वैज्ञानिक जानकारी नहीं है कि ऐसे प्रदूषण के शिकार लोगों की अगली कितनी पीढिय़ां प्रभावित रहेंगी। यह सिलसिला सरकार के भरोसे इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता कि रोकथाम के सरकारी इंतजाम परले दर्जे के भ्रष्टाचार से लदे रहते हैं। अदालत के भरोसे इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता कि जहर के कारोबारियों के महंगे वकील अदालत में जो चाहे साबित करते रहते हैं। जनता में जागरूकता की इतनी कमी है कि जहर का असर उसे आंखों से जब दिखने भी लगता है, तब भी वह शांत बैठी रहती है। इस देश के दुधमुंहे बच्चों का कोई वोट तो है नहीं कि उनकी सीधी फिक्र की जाए। फिर भी दुनिया का इतिहास जब लिखा जाएगा, तब बेजुबान बच्चों के साथ ऐसा जुल्म करने वाली पीढ़ी का नाम बड़े-बड़े काले अक्षरों में दर्ज होगा। क्या किसी को सचमुच इसकी फिक्र रह गई है? 

(Daily Chhattisgarh)     

दीवारों पर लिक्खा है, 24 नवंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

बुनियादी मतभेदों के साथ शादी की शुरूआत ही क्यों?

24 नवंबर 2025 

 

भोपाल के फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए एक ऐसा मामला पहुंचा है जिसमें महिला को यह शिकायत है कि बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाला उसका पति सिर के बालों में पीछे चुटैया रखता है, जो कि उसे सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ लगती है, और इसलिए वह तलाक चाहती है। उसका कहना है कि शादी के पहले उसे उम्मीद थी कि शादी के बाद इसे कटाने को मान जाएगा, लेकिन उसके न मानने पर अब पत्नी अपने मां-बाप के पास रहती है, और तलाक चाहती है। एक दूसरे मामले में पति ने तलाक की अर्जी लगाई है कि पत्नी रात-दिन पूजा में लगी रहती है। इस तरह के मामले देश की अलग-अलग फैमिली कोर्ट में आते ही रहते हैं। एक पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने किसी अनजान नंबर पर हाय लिखकर एक स्माइली भेजी, इसलिए अब उसे तलाक चाहिए। घर में खाना पकाने को लेकर तनातनी बहुत से तलाक-प्रकरणों की आम वजह है। मुम्बई का एक मामला ऐसा है जिसमें शादी के पहले पति-पत्नी दोनों मांसाहारी थे, और शादी के बाद अब पत्नी शाकाहारी हो गई है, और पति को भी मांस खाने से रोक रही है। तलाक चाहने वाले एक पति का आरोप है कि पत्नी ने उसके मां-बाप और बहन को फोन पर ब्लॉक कर रखा है, और मिलने भी नहीं देती। कुत्ता पालने या न पालने को लेकर कई जोड़ों के बीच तनातनी तलाक तक पहुंचती है। बरसों तक देहसंबंध न बनाना तलाक के लिए पर्याप्त आधार माना जाता है। दिल्ली की लडक़ी की शादी राजस्थान में हुई, और गर्मियों में भी वहां एसी नहीं था, इस आधार पर अदालत ने तलाक मंजूर कर दिया कि जीवनशैली का यह एक बड़ा फर्क है। लखनऊ के एक मामले में पत्नी ने शादी के बाद सोशल मीडिया से पति का सरनेम हटा दिया, और अपना शादी के पहले का सरनेम इस्तेमाल करने लगी, इस पर पति ने तलाक मांग लिया।

इस तरह की सैकड़ों किस्में हैं जो कि पति-पत्नी के बीच कलह की वजह रहती हैं, और बहुत से मामलों में ये तलाक तक पहुंचती हैं। तलाक तो फिर भी ठीक है, बहुत से मामलों में ये वजहें विवाहेत्तर संबंधों तक पहुंच जाती है, और उसके बाद तरह-तरह की हिंसा की वजह भी बनती हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि अगर शादी के पहले जोड़े के दोनों लोगों को किसी पेशेवर विवाह-परामर्शदाता के साथ बिठा दिया जाता, तो शायद एक-दो घंटे में यह समझ आ जाता कि एक-दूसरे की कौन-कौन सी बातें नापसंद हैं, और कौन-कौन सी बातों पर जोड़ीदार को कोई भी समझौता मंजूर नहीं होगा। अगर टेबिल पर ये तमाम बातें साफ-साफ हो जाएं, तो न केवल बहुत सारे तलाक की नौबत टल सकती है, बल्कि गृहकलह कम हो सकता है, हिंसा तो कम हो ही सकती है। लेकिन भारत में या तो लडक़ा-लडक़ी खुद एक-दूसरे के साथ उठते-बैठते एक-दूसरे को पसंद कर लेते हैं, और फिर बात परिवार की मर्जी से, या मर्जी के खिलाफ शादी तक पहुंच जाती है। लेकिन डेटिंग या दोस्ती के इस दौर में ताजा-ताजा प्यार की आंखें कुत्ते के नवजात पिल्लों की आंखों की तरह खुली नहीं रहती हैं, और एक-दूसरे की खामियां दिखती नहीं हैं, और लोग अपनी-अपनी खामियां छुपाते भी चलते हैं। फिर यह भी है कि दोस्ती या मोहब्बत के इस दौर में दोनों परिवारों की जटिलताएं, कमाई के साधन, बुरी आदतों की कोई अधिक चर्चा होती नहीं। और शादी के बाद जोड़ों के बीच जब बदन से निकलने वाली हर किस्म की गंध, और हर किस्म की आवाज के साथ जीना रोज की जरूरत बन जाता है, तब असली दिक्कतें सामने आने लगती हैं, और या तो बर्दाश्त करते हुए लोगों के मन भड़ास से भरे रहते हैं, या फिर वे अलग होने तक पहुंच जाते हैं। 

इस बारे में लिखते हुए अभी हमें मालूम नहीं है कि शादी के पहले ऐसे जोड़ों के सुखी साथ की संभावनाओं को आंकने के लिए कोई मोबाइल ऐप या कोई वेबसाइट मुफ्त में हासिल है या नहीं। आज कोई परामर्शदाता भी कम्प्यूटर पर ऐसे प्रोग्राम को देखकर ही दोनों को सामने बिठाकर सवाल करेंगे, या अलग-अलग बात करके। कुल मिलाकर शादी के बाद आने वाले तमाम किस्म के संभावित टकराव को पहले ही सुलझा लेने में समझदारी हो सकती है। एक बार शादी हो जाए, बच्चे हो जाएं, कोई संयुक्त संपत्ति लेना हो जाए, उसके बाद तलाक में कई किस्म की दिक्कतें आती हैं। लोगों का मिजाज शादी के पहले जो रहता है, वह भी बाद में बदल सकता है, और अभी तक हमने बेवफाई या बदचलनी का जिक्र नहीं किया है, जो कि बहुत से जोड़ों के बीच तनाव की एक बड़ी वजह रहती है। आज के जमाने में लडक़े-लड़कियां दोनों ही बाहर रहते हैं, पढ़ते हैं, काम करते हैं, और मिलते-जुलते हैं। ऐसा शादी के पहले से शुरू होता है, और शादी के बाद भी चलते रहता है। इसलिए कब किसी की पिछली जिंदगी की कोई दफन मोहब्बत कब्र फाडक़र निकल आए, और भूतपूर्व पर वर्तमान में कब्जा करने की हसरत दिखाए, यह भी अंदाज लगाना पहले से मुमकिन नहीं रहता। फिर भी ऐसे तमाम असुविधाजनक सवाल कोई भी पेशेवर परामर्शदाता शादी के पहले तो कर ही सकते हैं, और यह अंदाज लगा सकते हैं कि जोड़ों के बीच सामंजस्य किन मुद्दों पर कितना हो सकेगा, और कहां पर कोई समझौता नहीं होगा। 

लोगों को याद होगा कि हम हर कुछ महीनों में इस बात की भी चर्चा करते हैं कि कुंडली मिलाने के बजाय लोगों को लडक़े-लडक़ी की मेडिकल जांच रिपोर्ट मिलवाना चाहिए, ताकि शादी के पहले ही एक-दूसरे के बारे में मौजूदा बीमारियों का पता लग सके। इससे आगे आने वाली कई किस्म की जेनेटिक-जटिलताएं भी घट सकती हैं, और लोग एक अधिक भरोसेमंद और सेहतमंद साथ निभा सकते हैं। उसके साथ-साथ अब हम इस बात को भी जोडऩा चाहते हैं कि ऐसे पेशेवर विवाह-परामर्शदाता रहने चाहिए जो कि शादी टूटने की नौबत को घटाने के काम आ सके। एक तलाक, या जोड़ों का अलग रहना समाज की उत्पादकता को भी प्रभावित करता है, और दोनों परिवार, अगली पीढ़ी के बच्चे, इन सबका भी सुख तबाह होता है। इसलिए अगर ऐसे पेशेवर लोग समाज में नहीं हैं, तो सरकारों को भी चाहिए कि वे इंटरनेट पर ऐसी इंटरएक्टिव वेबसाइट बनाकर दें जिसमें लडक़ा-लडक़ी दोनों कुछ सवालों के जवाब देते जाएं, और उनके जवाबों के आधार पर उनसे आगे सवाल किए जाएं, और इनके आधार पर एक-दूसरे से सवाल-जवाब चलते रहें। आज एआई के जमाने में यह सब बड़ा आसान हो गया है। वैसे तो सवालों की ऐसी फेहरिस्त रहे, तो उसके सवाल-जवाब किसी भी एआई औजार में डालने पर वह भी सुझा सकता है कि यह जोड़ी कारगर रहेगी या नहीं। आज से ही जहां पर शादी कामयाब होने की संभावना कम दिखती हो, वहां पर वक्त बर्बाद करना शुरू करने के पहले लोगों को एक बार दुबारा सोच लेना चाहिए, वरना अब तो इस देश में खुदकुशी भी जुर्म नहीं रह गई है, और मतभेदों के बाद भी जोड़े चाहें, तो वे अपनी जिंदगी को प्रयोग में झोंक सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)     

सार्वजनिक जगहों के बाजारू दोहन के खिलाफ भी कोई हैं?

23 नवम्बर 2025

यह बात है तो लोकल, लेकिन आज के वक्त किसी भी लोकल बात की एक ग्लोबल संभावना भी रहती है, और किसी ग्लोबल बात की लोकल संभावना। शायद इसीलिए बहुत बरस पहले मैंने अपने ब्लॉग का नाम इन दोनों को मिलाकर बने हुए एक शब्द, ग्लोकल पर रखा था। अब अमरीका में चार-चार बरस के लिए सरकार चुनी जाती है, कुछ देशों में पांच बरस के लिए। भारत भी उन्हीं में से है, और यहां केन्द्र, राज्य, म्युनिसिपल, और पंचायत सरकारें पांच-पांच बरस के लिए बनती हैं। माना तो यही जाता है कि जनता के एक बार वोट देने के बाद ये सरकारें पांच बरस तक काम करें, लेकिन राजभवन और विधानसभा अध्यक्ष के दफ्तर 21वीं सदी के ऐसे नए नीलामघर बन गए हैं कि सरकारें कई बार कार्यकाल पूरा नहीं कर पातीं। लेकिन वह एक अलग बहस का मुद्दा हो जाएगा, आज मेरे इर्द-गिर्द छत्तीसगढ़ में जो मुद्दा है, वह तो पांच बरस पूरी चलने वाली सरकारों के साथ भी आने वाली दिक्कत का मुद्दा है। 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल एक सरकारी कॉलेज के विशाल मैदान का बेजा इस्तेमाल करके वहां पर बनाए गए एक खानपान के बाजार को तोड़ दिया गया। इस पर म्युनिसिपल के करोड़ों खर्च हुए थे, और पिछली कांग्रेस सरकार के वक्त भाजपा के स्थानीय विधायक जो कि उस समय भूतपूर्व विधायक थे, वे इसके खिलाफ अड़े हुए थे। कल उन्होंने इसे तुड़वाकर दम लिया। उनकी आपत्ति यह नहीं थी कि एक मैदान के बड़े हिस्से को घेरकर बाजार क्यों बनाया गया, उनकी आपत्ति यह थी कि वहां पर कुछ और बनाया जाना चाहिए था। कांग्रेस और भाजपा की सत्ता के बीच फंसे हुए इस बाजार के कल हट जाने के बाद भी आज यह आवाज कहीं से नहीं आ रही कि खेल के एक मैदान का एक बड़ा हिस्सा काटकर जो पूरी तरह से अनैतिक और गैरकानूनी इस्तेमाल किया गया था, उस इस्तेमाल को ही खत्म किया जाना चाहिए था। जमीन चाहे सरकार की हो, अगर वह मैदान के इस्तेमाल में आ रही है, आधी सदी से उसका यही उपयोग बना हुआ है, तो कोई सरकार भी वहां बाजार नहीं बना सकती। लेकिन हाईकोर्ट तक जाकर किसी ने यह मुद्दा नहीं उठाया। बात अहंकारों के टकराव तक सीमित रह गई कि शहर के किस मैदान को काटकर कौन वहां चौपाटी बनाए, कौन अपने लोगों को दुकानें बांटे, कौन उसका श्रेय ले। 

इसी राजधानी रायपुर में प्रदेश का एक सबसे बड़ा जंगला, फौलादी स्काईवॉक सात बरस बाद अब आगे बनना शुरू हो रहा है। उसे भाजपा सरकार के ताकतवर मंत्री रहे राजेश मूणत ने बनवाना शुरू किया था, और वह शहर के कुछ सबसे व्यस्त सडक़-चौराहों पर आवाजाही के लिए हवा में टंगा हुआ पुल सरीखा था। कांग्रेस की भूपेश सरकार पांच बरस तक यही तय नहीं कर पाई थी कि उसे पूरा करना है, या उसे गिराना है। अब भाजपा की सरकार बनी, तो इसी पार्टी की पिछली सरकार का बनवाया हुआ यह ढांचा पूरा करना उसकी जिम्मेदारी भी थी, और इस बार विधायक बन जाने पर भी मंत्री नहीं बनाए गए राजेश मूणत का दबाव भी था। भाजपा के ही पिछले मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह इस बार विधानसभा अध्यक्ष हैं, और मूणत उन्हीं के करीबी सहयोगी रहे, इसलिए मूणत की प्रतिष्ठा के इस प्रोजेक्ट को पूरा करना सरकार पर एक बड़े दबाव सरीखा था। अब उसके लिए ठेका हो गया है, और काम आगे बढ़ रहा है। हालांकि जानकारों का यह कहना है कि शहर के बीचोंबीच बनने जा रहे इस गैरजरूरी माने जा रहे स्काईवॉक की वजह से शहर के बीच से कभी कोई मेट्रो नहीं जा पाएगी, या कोई फ्लाईओवर नहीं बन पाएगा। उन संभावनाओं को यह फौलादी ढांचा खत्म कर देता है। लेकिन सरकारों की अपनी राजनीतिक पसंद रहती हैं, और लोकतंत्र निर्वाचित सरकारों को कैसे भी फैसले लेने की छूट देता है। 

अब जिस तरह शहर में या बाकी प्रदेश में एक सरकार की पसंद, प्रतिष्ठा, और उसके अहंकार के प्रोजेक्ट पांच बरस के बाद अगर दुबारा तय किए जाएंगे, तो प्रदेश में सारे ही निर्माण पुर्जे खोलकर दुबारा कहीं और खड़े करने वाले ही बनाने चाहिए। इमारतों की जगह शामियाने बनाने चाहिए, और लोहे की जगह बांस का इस्तेमाल करना चाहिए। कोई भी सरकार आते ही शुरू के छह महीनों में अपनी पसंद से ऐसे अस्थाई ढांचे खड़े कर ले, पिछले ढांचे खुलवा दे, और इस काम में मनरेगा की मजदूरी भी मंजूर कर दे तो कई लोगों को रोजगार भी मिल जाएगा। 

ऐसा लगता है कि जब एक-एक करके कोई सरकार केन्द्र, राज्य, म्युनिसिपल, और वार्ड तक, चार इंजन की सरकार हो जाती है, तो उसमें मुसाफिर डिब्बे लगाने की कोई जरूरत भी नहीं रह जाती। जब चार-चार इंजन की सरकार चल रही है, तो फिर पांच बरस जनता की क्या जरूरत है? वह तो पैदल भी चल सकती है, उसने हजारों किलोमीटर पैदल चलकर दिखाया हुआ भी है। एक रेलगाड़ी में चार इंजनों का असर अब देखने मिल रहा है, जब म्युनिसिपल के फैसलों का जनता से कोई लेना-देना नहीं रह गया। राज्य सरकार और म्युनिसिपल एक ही पार्टी की सरकारों के हैं, इसलिए उनके बीच भी आपस में किसी जवाब-तलब की जरूरत नहीं रह गई है। 

कांग्रेस के बीते पांच बरस के शासन में एक-एक तालाब, एक-एक बगीचे, एक-एक मैदान को काट-काटकर उसमें बाजार बना दिए गए, और ऐसे बाजारों को सत्ता पर बैठे लोगों ने कैसी-कैसी कमाई का जरिया बना लिया, यह चर्चा भी हवा में बनी हुई हैं। बहुत से लोग अब इन सार्वजनिक जगहों पर घूमने भी जाना नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें बर्बाद कर दिया गया है, और सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के कई फैसले, कई आदेश भी सार्वजनिक जगहों का यह बाजारूकरण नहीं रोक पाए। बहुत अधिक राजनीतिक ताकत बहुत अधिक बददिमागी भी पैदा करती है, और हमने अलग-अलग सरकारों के वक्त अलग-अलग मामलों में इसके पुख्ता सुबूत देखे हैं। इसलिए बहुत अधिक स्थिरता, नीचे से ऊपर तक एक ही पार्टी के राज जैसी बातें हमें जितना भरोसा दिलाती हैं, उससे कहीं अधिक आशंकाओं से भर देती हैं। 

किसी पार्टी या नेता की क्या पसंद है, किस सरकार के वक्त क्या किया गया है, ऐसी छोटी बातों पर गौर किए बिना एक बुनियादी बात पर लोगों को सवाल खड़े करने चाहिए कि सार्वजनिक जगह का बेजा इस्तेमाल करने का अधिकार निर्वाचित लोगों, और अफसरों को किसने दिया है? नेता तो पांच बरस के लिए निर्वाचित होते हैं, अफसर तो शायद इससे आधे वक्त के लिए ही किसी कुर्सी पर आते हैं, लेकिन जो लोग प्रदेश और शहर के, गांव-कस्बे के पुराने बाशिंदे हैं, जिनकी पूरी जिंदगी यहीं गुजरी है, उन लोगों की कोई भी राय किसी बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में लेने की जरूरत किसी को नहीं लगती, अगर सत्ता अपने पर उतर आती है तो। 

आज हमारी दिक्कत यह है कि एक बेजा इस्तेमाल को हटाकर दूसरे बेजा इस्तेमाल की तैयारी चल रही है, जबकि मैदान से अधिक जायज कोई दूसरा इस्तेमाल हो नहीं सकता था। अगर कोई हाईकोर्ट में ऐसे मामलों को सही तरीके से रखे, तो तालाबों, बगीचों, मैदानों की बाजारू घेराबंदी, उनका कांक्रीटीकरण, उनका बाजारूकरण सब तुड़वा दिया जाएगा। आज जगह-जगह पुराने ऐतिहासिक मैदानों को चारों तरफ से काट-काटकर छोटा कर दिया गया है, सौ-सौ साल पुराने बगीचों के भीतर इमारतें बना दी गईं, और अलग-अलग धर्मों के धर्मस्थल भी। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। ऐसे जनसंगठनों की जरूरत है जो कि जानकार, और विशेषज्ञों की मदद लेकर सार्वजनिक जगहों के इस्तेमाल पर कानूनी और तकनीकी विश्लेषण लोगों के सामने रख सके, और शहर-कस्बों को हमेशा के लिए बर्बाद होने से बचा सके। आज एक निर्माण टूटने से खाली हुई जगह पर दूसरा निर्माण शुरू होने के पहले उस पर अदालती रोक की कोशिश होनी चाहिए। 

इनको मालूम है जातियों की हकीकत लेकिन...

23 नवंबर 2025 

 

अभी-अभी बिहार के चुनाव निपटे तो जातियों की चर्चा इस प्रदेश की राजनीति को लेकर, और समाज के बाकी दायरों को लेकर भी खूब बढ़-चढक़र हुई। इस बीच एक रिपोर्ट बिहार के जातिवाद पर इस चुनाव के पहले की भी सामने आई। देश के एक प्रतिष्ठित मैनेजमेंट संस्थान, आईआईएम बेंगलोर के एक अध्ययन में यह पाया गया है कि बिहार के सरकारी स्कूलों में अलग-अलग जातियों के छात्र परीक्षाओं में जो नंबर पाते हैं, उन बच्चों के शिक्षकों की धारणाएं उनसे अलग रहती हैं, और वह जातियों से प्रभावित रहती हैं। पिछड़ी जातियों के छात्र-छात्राओं की क्षमता को उनके परीक्षा-परिणामों के मुकाबले भी कम आंका जाता है, और आईआईएम का यह अध्ययन कहता है कि यह शिक्षकों के ‘मूल्यांकन पक्षपात’ की वजह से होता है। तथाकथित शिक्षकों से जब परीक्षा परिणामों से परे छात्रों का अपने अंदाज से मूल्यांकन करने कहा गया, अगड़ी जातियों के शिक्षकों का अंदाज पिछड़ी जातियों के बच्चों के प्रतिकूल ही रहा। पिछड़ी जातियों के जिन बच्चों के अंक सवर्ण छात्रों के बराबर थे, उन्हें भी शिक्षक के गैरइम्तिहानी मूल्यांकन में सवर्ण बच्चों से कमजोर बताया गया। आईआईएम के इस शोध को करने वाले दो वरिष्ठ प्राध्यापक सोहम साहू, और ऋत्विक बनर्जी थे, जिन्होंने बिहार के 105 सरकारी स्कूलों के आंकड़ों का विश्लेषण किया, और छात्रों, शिक्षक, परिवारों, और स्कूलों का विस्तृत सर्वेक्षण भी किया। शोधकर्ताओं का यह निष्कर्ष है कि ऐसा पूर्वाग्रही आंकलन लंबे समय में पिछड़ी जातियों, जिसमें ओबीसी से परे एसटी-एससी भी शामिल हैं, छात्र-छात्राओं का आत्मविश्वास तोड़ता है और धीरे-धीरे जाकर एक असली शैक्षणिक अंतर पैदा होने लगता है। उन्होंने इसे पिग्मेलियन इफेक्ट कहा है जिसमें टीचर की अपेक्षाएं ही छात्रों के नतीजे तय करने लगती हैं। 

अभी हम एक जिम्मेदार संस्थान के दो वरिष्ठ शोधकर्ताओं की इस रिपोर्ट की अधिक बारीकियों पर जाना नहीं चाहते, लेकिन इससे जुड़ी हुई, और इससे बिल्कुल अलग भी, एक दूसरी खबर पर जाना चाहते हैं, जो कि मध्यप्रदेश से आई है। यह खबर वहां पर सिविल जज-2022 की परीक्षा के बारे में है जिसमें आदिवासियों के लिए 121 पद आरक्षित थे, लेकिन चयन एक का भी नहीं हुआ। मध्यप्रदेश में आदिवासी आबादी 20 फीसदी है, और संख्या डेढ़ करोड़ से अधिक है। यह भी 15 बरस पहले की 2011 की जनगणना का कहना है। अब अगर डेढ़-दो करोड़ आबादी में सिविल जज बनने के लिए 121 आदिवासी भी तैयार नहीं हो पाए, या उन्हें छांटा नहीं गया, तो यह बहुत ही शर्मनाक नौबत है। दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस नौबत को देखकर बड़ा सख्त रूख दिखाया, और अदालत ने दिसंबर तक नई चयन सूची पेश करने के लिए कहा है। इस मामले में सामाजिक न्याय के लिए बने वकीलों के एक संगठन ने अदालत में अपील की थी, और कहा था कि आदिवासी वर्ग के प्रतियोगियों पर सामान्य वर्ग के बराबर कटऑफ लागू कर दिया गया था। न्यूनतम योग्यता में छूट नहीं दी, और साक्षात्कार में कम अंक देकर भेदभाव दिखाया गया। इस इम्तिहान में सरकार की अपनी बनाई हुई शर्तों के खिलाफ जाकर एसटी-एससी प्रतियोगियों पर गलत शर्तें लागू की गईं। 

बिहार के स्कूलों और मध्यप्रदेश के इस इम्तिहान का आपस में कोई सीधा संबंध नहीं है, सिवाय इसके कि इससे यह साबित होता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। जिन लोगों को यह लगता है कि जाति व्यवस्था टूट चुकी है, आरक्षण खत्म कर देना चाहिए, उनकी इस सोच से ही उनके जाति-वर्ग का अंदाज लगाया जा सकता है। एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आज से करीब 35 साल पहले एक इंटरव्यू में जाति व्यवस्था खत्म हो जाने के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा था कि जिन लोगों के पांव में बूट है, उन्हें जिनके पांव कुचले जाते हैं, उनका दर्द पता नहीं चलता। आज जाति की हालत वैसी ही है। जिन्हें अगड़ी जातियां कहा जाता है, उन्हें अपनी जातियों पर बात-बात पर अहंकार होने लगता है, वे बात-बात में एसटी-एससी, और आरक्षण पाने वाली ओबीसी को सरकारी दामाद कहने लगते हैं, उनकी जुबान, चेहरे के भाव, और आवाज से हिंसक हिकारत टपकने लगती है। उन्हें कुछ मिनट सुन लें तो यह समझ आ जाता है कि आरक्षित वर्गों के वकीलों और उनके तर्कों को सुनने की जरूरत ही नहीं है, अनारक्षित वर्ग के लोगों की हिंसक बातें ही उनके खिलाफ वकील की तरह खड़ी रहती है। देश में यह नौबत जाने कब सुधरेगी, जल्द तो सुधरने का कोई आसार नहीं है। 

भारत में दलित प्रताडऩा की घटनाएं होती ही रहती हैं। अभी जून के महीने में ओडिशा के गंजाम जिले में दो दलितों के बाल काटे गए, उन्हें घास खाने और नाली का गंदा पानी पीने के लिए मजबूर किया गया। हिमाचल में 12 साल एक दलित लडक़े ने जातिगत प्रताडऩा की वजह से खुदकुशी कर ली। ऐसी घटनाएं कई जगह होती रहती है। जिस तमिलनाडु में दलितों की हिमायती राज्य सरकार है वहां अभी कुछ अरसा पहले 19 साल के दलित नौजवान को जातिगत गालियों के साथ पीटा गया, और उसकी मौत हो गई। बिहार के मुजफ्फरपुर में एक दलित नाबालिग लडक़ी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, और उसे झाडिय़ों में फेंक दिया गया। इसी के समानांतर एक दूसरा सुहाना सफर चलते रहता है दलित पर्यटन का। अलग-अलग जगह, अलग-अलग पार्टियों के नेता दलितों के घर जाकर वहां शायद बाहर से लाए गए बर्तन और पकवानों के भोज पर बैठकर दलित-उद्धार का दिखावा करते हैं। देश में ऐसे दलित पर्यटन की घटनाएं साल भर में अधिक होती हैं, या दलित प्रताडऩा की घटनाएं, यह मुकाबला देख पाना आसान नहीं है। और फिर नेताओं और पार्टियों की राजनीतिक नीयत को देखें, तो लगता है कि दलित के घर खाना भी एक किस्म से दलित शोषण और प्रताडऩा ही है, फिर चाहे वह किसी भी पार्टी के नेता क्यों न करते हों। 

बिहार से लेकर मध्यप्रदेश होकर हम पूरे देश में जातिवाद के मुद्दे पर एक नजर डाल रहे हैं, और उन लोगों की सोच पर हैरान हो रहे हैं जिन्हें लगता है कि देश में जातिवाद खत्म हो चुका है, अब आरक्षण खत्म कर देना चाहिए। उनका ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)     

राज्यपाल-राष्ट्रपति पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बुरा सदमा पहुंचाता है..

22 नवंबर 2025 

 

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के एक फैसले को पलटते हुए अभी एक बड़ी बेंच ने राष्ट्रपति के भेजे हुए एक संदर्भ पर अपनी राय सुनाई कि राष्ट्रपति और राज्यपालों के पास गए हुए विधेयकों पर उनके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती। इसके पहले दो जजों की एक बेंच ने यह फैसला दिया था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को विधेयक उनके पास पहुंचने के बाद तीन महीने के भीतर उस पर अपना फैसला देना चाहिए। केन्द्र सरकार इस फैसले के बहुत खिलाफ थी, और उसने जजों को याद दिलाया था कि संविधान में इन दो संवैधानिक पदों के लिए समय सीमा तय करना अदालत के अधिकार क्षेत्र के बाहर है। ऐसे मामले अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग राज्यों में उठते ही रहते हैं जहां सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन से केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के राजनीतिक विरोध रहते हैं। ऐसी नौबत रहने पर राज्यपाल या राष्ट्रपति केन्द्र सरकार की मर्जी से राज्य विधानसभाओं से पास किए गए विधेयकों को मंजूरी देने के बजाय उन्हें गद्दे के नीचे दबाकर उस पर सो जाते हैं। कुछ राज्यों में तो कई साल पहले से विधेयक राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास पड़े हुए हैं, और जनता द्वारा निर्वाचित विधायकों वाली विधानसभा सिवाय इंतजार करने के और कुछ नहीं कर सकती है। ऐसे में जब कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय की थी, तब हमने उस फैसले की तारीफ करते हुए यह लिखा था कि यह इन दो संवैधानिक पदों की जनता के प्रति जवाबदेही भी तय करने वाला फैसला है, और इन पदों को सरकार के असर से परे का मानना इसलिए ठीक नहीं है कि राज्यपाल तो केन्द्र सरकार के मनोनीत किए हुए होते हैं, और राष्ट्रपति भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिशों के मुताबिक काम करने को मजबूर रहते हैं। ऐसे में केन्द्र का गठबंधन उसे नापसंद किसी भी राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में पास करवाए गए विधेयक को अंतहीन रोक सकता है, और सामने ही दिख रहा है कि रोकते आया है। 

सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला मुख्य न्यायाधीश बी.आर.गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की बेंच का है, और उसने साफ कर दिया है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को बिलों को मंजूरी देने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की जा सकती। 111 पेज का यह बहुत ही निराशाजनक फैसला घोर अलोकतांत्रिक है, और केन्द्र सरकार को तानाशाही के सारे अधिकार देता है। ये दोनों ही पद पूरी तरह से केन्द्र सरकार के काबू के, और उसके मातहत सरीखे पद हैं। राज्यपाल और राष्ट्रपति को बेमुद्दत हक देना केन्द्र सरकार के हाथ में केन्द्र सरकार को तानाशाह बना देने के अलावा और कुछ भी नहीं है। आज की बात आज केन्द्र पर सवार गठबंधन को लेकर नहीं है, यह बात जनता द्वारा निर्वाचित विधानसभाओं के पारित विधेयकों के कानून बनने के जनता के परोक्ष अधिकार की बात है। जनता किसी विधेयक के लिए सीधे वोट नहीं देती, लेकिन उसके निर्वाचित विधायकों का एक बहुमत ऐसे विधेयक के साथ जब होता है, तभी वह पास होकर मंजूरी के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास जाता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान के लिखे हुए शब्दों की व्याख्या हो सकता है, लेकिन यह लोकतंत्र की भावना के ठीक खिलाफ है। जस्टिस गवई रिटायर होते-होते ऐसा फैसला क्यों कर गए हैं, इसे वे ही जाने। इस बेंच में उनके ठीक बाद जस्टिस बनने वाले जज भी हैं। सुप्रीम कोर्ट तो देश की सबसे बड़ी संवैधानिक अदालत है, और इसका हक संविधान की व्याख्या करना भी रहता है। कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट अगर संविधान के प्रावधानों को छू नहीं पाता, तो भी फैसले में उनके खिलाफ टिप्पणी जरूर करता है। ऐसा करने के लिए जजों में कुछ हौसले की भी जरूरत पड़ती है, और उन्हें रिटायर होने के बाद के लिए मोह-माया से मुक्त भी रहना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट का दो दिन पहले का यह फैसला बहुत ही निराश करता है। संविधान एक मुर्दा दस्तावेज नहीं रहता, वह शब्दों के साथ-साथ भावनाओं का पुलिंदा भी रहता है, और इसीलिए उस पर आधारित बातों के लिए कहा भी जाता है कि इन लैटर, एंड स्पिरिट। ऐसा लगता है कि पांच जजों की इस बेंच ने राष्ट्रपति और केन्द्र सरकार के वकीलों के संविधान के दिए गए संदर्भों के शब्द ही पढ़े हैं, लोकतंत्र की भावना का इस्तेमाल नहीं किया है। 

सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच की यह व्याख्या हक्का-बक्का करती है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती। अपने फैसले की इज्जत बचाने के लिए इस फैसले में लिखा गया है कि राज्यपाल विधेयक को रोक सकते हैं, लेकिन अनावश्यक देरी का कारण स्पष्ट न हो, तो कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है। राष्ट्रपति के उठाए गए सवालों में से अधिकांश पर कोर्ट ने कहा है कि न्यायपालिका विधायी प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती। लोकतंत्र में किस तरह एक राजनीतिक सरकार के तहत काम करने वाले दो लोगों को ऐसे असीमित अधिकार दिए जा सकते हैं? आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट की कोई और बड़ी बेंच इस फैसले पर पुनर्विचार करेगी, और उसमें जज कड़ा और खरा बोलने और लिखने वाले रहेंगे, तो यह फैसला पलट दिया जाएगा। हम कानून और संविधान की बारीकियों में उलझे बिना यह सोचते हैं कि किसी राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास विधानसभा से पारित विधेयक पहुंचने के बाद उन्हें तीन महीने से अधिक का वक्त क्यों लगना चाहिए? राज्यपाल के पास कानूनी सलाहकार रहते हैं, वे केन्द्र सरकार के वकीलों से भी सलाह ले सकते हैं। जनता की निर्वाचित विधानसभा के पारित विधेयक पर अगर राज्यपाल 90 दिन में भी फैसला नहीं ले सकते, तो वे जनता के पैसों की बर्बादी करते हुए इस कुर्सी पर क्यों बैठे हैं? कानूनी और संवैधानिक सलाह-मशविरा तो कुछ दिनों के भीतर ही हो सकता है, तीन महीने के और बाद जाकर तो महज राजनीति हो सकती है, जो कि हो रही है। एक आदिवासी समुदाय से आई हुई राष्ट्रपति ने जब यह संदर्भ सुप्रीम कोर्ट को भेजा, और उससे संवैधानिक राय मांगी, तो भी यह बड़ी हैरानी की बात इसलिए थी कि क्या वे निर्वाचित विधानसभा के अधिकारों को केन्द्र सरकार के इशारे पर नीचा दिखाने की हिमायती हो गई हैं? जनता के पैसों पर जो राज्यपाल और राष्ट्रपति राजसी ठाठ से जीते हैं, उस जनता के जीवन को प्रभावित करने वाले विधेयकों को क्या ये सामंती सहूलियतों वाले लोग बिस्तर की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं? 

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बारे में दो दिनों से हमने जितनी भी बार सोचा है, न्यायपालिका को लेकर हमारी शर्मिंदगी बढ़ती चली जा रही है। यह किसी मुजरिम को बचाने के लिए उसके वकील द्वारा निकाले गए कानूनी दांव-पेच सरीखा फैसला लगता है, यह जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान करने वाला तो किसी कोने से नहीं लगता। राज्यपाल तो केन्द्र सरकार के मनोनीत रहते हैं, और उसी के राजनीतिक एजेंट की तरह राजभवनों को चलाते हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रपति भी केन्द्र और राज्यों के सांसदों और विधायकों के बहुमत से बनकर आते हैं, और बनने के तुरंत बाद वे पूरे कार्यकाल केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर काम करते हैं। ऐसे व्यक्ति आम जनता की निर्वाचित विधानसभा के फैसलों को अंतहीन पड़े रहने दें, तो फिर उन्हें तनख्वाह किस बात की मिलती है? हर किसी को काम करना चाहिए, कल के दिन किसी सरकारी दफ्तर के बाबू कहें कि उन्हें भी तीन या छह महीने में जब समय मिलेगा, तब वे काम करेंगे, तो कैसा लगेगा? जनता के पैसों से तनख्वाह और सहूलियतें पाने वाले राज्यपाल और राष्ट्रपति का आचरण मन, वचन, और कर्म से लोकतांत्रिक रहना चाहिए, उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाकर संविधान के मोटे-मोटे शब्दों की आड़ में लुका-छिपी नहीं खेलनी चाहिए। लोकतंत्र की बुनियादी बात यह है कि किसी को भी अलोकतांत्रिक अधिकार नहीं होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट अपने इस खराब फैसले के लिए इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होगा।

(Daily Chhattisgarh)    

दीवारों पर लिक्खा है, 21 नवंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)




 

मुस्लिम महिला के हक पर सुप्रीम चर्चा जारी, जज 21वीं सदी ध्यान रखें

21 नवंबर 2025 

 

सुप्रीम कोर्ट में अभी मुस्लिम समाज में महिला के हक के खिलाफ प्रचलित एक प्रथा पर सुनवाई हो रही है। अदालत ने एक मुस्लिम मर्द के वकील से यह पूछा है कि तलाक-ए-हसन नाम की प्रथा क्या सभ्य समाज में जारी रहनी चाहिए? यह मामला एक पत्रकार बेनजीर हिना का दायर किया हुआ है जिसमें कहा गया है कि मुस्लिम महिला को तलाक देने का यह तरीका तर्कहीन, मनमानी, और असंवैधानिक है जो कि महिलाओं के सम्मान, और समानता के अधिकार के खिलाफ है। बीते बरसों में भारत में मुस्लिम महिलाओं से जुड़े हुए कई मामले अदालतों में आए, इनमें से एक, तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को 2017 में अदालत ने असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद मोदी सरकार ने तीन तलाक को गैरकानूनी करार देने वाला एक कानून बनाया जो 1 अगस्त 2019 से लागू हो गया। इसके बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई चुनावी रैलियों में कहा था कि मुस्लिम मां-बहनों को तीन तलाक के जुल्म से आजादी दिलानी है। इस कानून में ऐसा करने वाले मुस्लिम मर्द को तीन साल तक की कैद, और जुर्माने का प्रावधान किया गया था। इसके लागू होने के बाद से देश में तीन तलाक देने वाले हजारों मर्दों के खिलाफ उनकी बीवियों की तरफ से पुलिस रिपोर्ट हुई है, और मुकदमे चल रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट में तलाक की एक दूसरी किस्म के खिलाफ मामला पहुंचा है। 

भारत में 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधान चले आ रहे हैं। इनमें से बहुत से प्रावधान महिलाओं के हक के खिलाफ हैं। देश में कुछ अलग-अलग प्रदेशों ने मुस्लिमों को इस कानून के तहत नाबालिग लड़कियों की शादी करने की मिली हुई छूट को खत्म करना शुरू किया है, और हमने अपने अखबार में तीन तलाक को सजा के लायक बनाने का भी समर्थन किया था, और नाबालिग लड़कियों की इस्लामिक कानून के हवाले से शादी करने के खिलाफ भी बार-बार लिखा है, अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर इसके खिलाफ कई बार कहा है। आज भी सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के इस दूसरे तरीके के खिलाफ कड़ा रूख दिखाया है, और कहा है कि पति की तरफ से उसका वकील ही महिला को तलाक के तीन नोटिस एक-एक महीने के फासले से भेजकर शादी को खत्म कर सकता है, यह आज के वक्त पर सही कैसे माना जा सकता है? अदालत ने यह भी कहा है कि हर महिला के पास कानूनी लड़ाई लडऩे की ताकत नहीं होती है। 

मुस्लिम महिला के तलाक के बाद उसका वही पति अगर दुबारा उससे शादी करना चाहे, तो उसके लिए हलाला नाम का एक रिवाज है जिसके तहत उस औरत को पहले किसी और मर्द से शादी करनी पड़ती है, फिर उससे तलाक लेना पड़ता है, तब जाकर वह अपने पिछले पति से दुबारा निकाह कर सकती है। इस प्रथा के नाम पर मुस्लिम महिलाओं का कई जगह बहुत बुरा शोषण होता है। मुस्लिम मर्द को चार बीवियां रखने का हक है, और यह बात भी मुस्लिम महिला के हक मारने वाली रहती है। मुस्लिम लड़कियों को अपने भाईयों के मुकाबले आधा हक ही मिलता है, और मुस्लिम विधवा को भी कानून के तहत बहुत कम हक मिलता है। तलाक के बाद मुस्लिम महिला को कोई स्थाई गुजारा-भत्ता नहीं मिलता। रूपए-पैसे के कुछ मामलों में मुस्लिम कानून में दो औरतों की गवाही एक मर्द की गवाही मानी जाती है। ऐसे कई बेइंसाफ कानूनों को बदलने की मांग मुस्लिम महिला संगठन लंबे समय से करते आ रहे हैं, और मुस्लिम समाज के बाहर हमारे सरीखे लोग भी इन बातों को बार-बार उठाते हैं। 

कर्नाटक की स्कूल-कॉलेज की छात्राओं पर वहां की पिछली भाजपा सरकार के वक्त हिजाब पहनने पर यह कहते हुए रोक लगाई गई थी कि यह स्कूली पोशाक का हिस्सा नहीं है। सरकार की इस रोक के खिलाफ मुस्लिम समुदाय सुप्रीम कोर्ट तक गया, लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। हमने इस मुद्दे पर शुरू से अंत तक यही लिखा था कि कोई समुदाय हिजाब की शर्त पर अडक़र अपनी लड़कियों को स्कूल-कॉलेज से निकाल देने का काम करता है, तो वह परले दर्जे की मर्दाना बेअक्ली है। दुनिया में बहुत से ऐसे इस्लामिक या मुस्लिम देश हैं जहां पर हिजाब की कोई बंदिश नहीं है, बुर्के की कोई बंदिश नहीं है। इस पर भी अगर मुस्लिम मर्द अपने समाज की महिलाओं को यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि यह उनका हक है, तो यह एक मर्दानी कामयाबी है, और सदियों से उसकी गुलाम चली आ रही महिलाओं की नासमझी भी है। जिस बोझ को मुस्लिम महिला का हक करार देने में मर्द कामयाब हो गए हैं, उस साजिश को भी समझना चाहिए, और समाज सुधार के रास्ते, या कानून के रास्ते, सिर्फ महिलाओं पर लादे जाने वाले ऐसे रिवाज खत्म किए ही जाने चाहिए। यह कोई हक नहीं है एक बोझ है। एक वक्त राजस्थान में हिन्दू महिला के पति के गुजर जाने पर उसे भी साथ-साथ सती कर देने की घटना होती थी, और उसे हिन्दू महिला का हक करार दिया जाता था। बाद में कानून बनाकर उसके इस तथाकथित हक को खत्म किया गया है। 

किसी भी लोकतंत्र में किसी भी धर्म के ऊपर औरत और मर्द की बराबरी रहनी चाहिए। लैंगिक समानता, मानवाधिकार, गरिमा से जीने का हक, इन सब पर किसी तरह का मोलभाव नहीं किया जाना चाहिए। इन बातों को नॉन-निगोशिएबल मानकर चलना चाहिए, कि इन पर कोई समझौता नहीं हो सकता। और इसके बाद ही किसी धार्मिक रीति-रिवाज के कानूनी होने या न होने पर बात होनी चाहिए। एक नाबालिग लडक़ी की शादी कर देने का हक लोकतंत्र में किसी को नहीं मिलना चाहिए, चाहे वह मुस्लिम बेटी के मां-बाप ही क्यों न हों। बुनियादी मानवाधिकार, और लोकतांत्रिक न्याय किसी भी धार्मिक कानून से ऊपर रहने चाहिए। एक वक्त तो हिन्दू लडक़े-लड़कियों का भी धड़ल्ले से बाल विवाह होता था, बाद में कानून बनाकर उसे गैरकानूनी करार दिया गया, लेकिन आज भी उस कानून पर अमल के लिए सरकार को समाज से संघर्ष करना पड़ता है। 

सिर्फ अल्पसंख्यक हो जाने से किसी समुदाय को ऐसे धार्मिक अधिकार नहीं दिए जाने चाहिए जो कि उस समाज के भीतर की महिलाओं को इंसान भी मानने के खिलाफ हों, जाहिर तौर पर गैरबराबरी और बेइंसाफी के हों। भारत में जिस-जिस धर्म में महिलाओं के हक के खिलाफ जो भी कानून हैं, उन सबको खत्म किया जाना चाहिए। यह एक अच्छी बात है कि एक मुस्लिम महिला का यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है, और जजों को भी यह समझना चाहिए कि मुस्लिमों के बीच सदियों से प्रचलित, और पिछले कुछ दशकों से कानून बनकर लागू बातों को लोकतंत्र की रौशनी में देखने-परखने का समय आ चुका है, और अब किसी समाज के भीतर महिलाओं को दूसरे दर्जे की नागरिक, या गुलाम बनाकर रखना देश के लोकतंत्र के खिलाफ कहलाएगा। अदालत को दकियानूसी कानूनों को जारी रखने के बजाय 21वीं सदी को भी देखना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

...भीड़त्या के डेढ़ दर्जन आरोपियों से केस वापिस! सुप्रीम कोर्ट जाग रहा है?

20 नवंबर 2025 

 

उत्तरप्रदेश में 2015 में एक मुस्लिम अखलाक के गांव में यह अफवाह फैली कि उसने अपने घर में गोमांस रखा है। इस बात की घोषणा गांव के मंदिर से लाउडस्पीकर पर हुई, और बात की बात में एक बड़ी भीड़ जुट गई, और अखलाक को उसके घर से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला गया। उसे बचाते हुए उसके बेटे को भी गंभीर चोटें आईं। 2015 में ही पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट फाइल की जिसमें 15 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था, और इनमें एक नाबालिग लडक़ा भी था, और एक स्थानीय भाजपा नेता का बेटा भी। 2017 में योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने, और उसके बाद 2021 से अखलाक-मॉबलिंचिंग मामले की सुनवाई शुरू हुई। देश में अपने किस्म की यह पहली भीड़त्या थी जिसे खबरों में मॉबलिंचिंग कहा गया था। अब उत्तरप्रदेश सरकार ने अदालत में अर्जी दाखिल की है कि वह सारे ही अभियुक्तों के खिलाफ हत्या के आरोप सहित तमाम आरोप वापिस लेना चाहती है। 

क्या लोकतंत्र में इससे भयानक और कुछ हो सकता है कि एक मांसाहारी परिवार के व्यक्ति को उसके घर पर रखे गए मांस के गौमांस होने का आरोप लगाकर घर से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला जाए? क्या देश में प्रशासन और पुलिस नहीं रह गए हैं कि जगह-जगह ऐसी गौ-गुंडई की जाए? कहीं राजस्थान में, कहीं हरियाणा में, अक्सर ही उत्तरप्रदेश में, और अब छत्तीसगढ़ में भी गौहत्या या गौमांस, या गौ-कारोबार, गौ-परिवहन का आरोप लगाकर किसी को भी पीट-पीटकर मार डाला जाता है। छत्तीसगढ़ में पिछले साल राजधानी रायपुर की सरहद पर एक पुल के ऊपर पशु व्यापारियों को पीट-पीटकर मार डाला गया, और फिर उन्हें पुल से कूदकर जान देना बता दिया गया। अपने आपको गौरक्षक कहने वाले लोगों ने 50-60 किलोमीटर तक पशु व्यापारियों की गाड़ी का पीछा किया, उस पर हमला करके उसे रोका, और उसमें कोई गाय नहीं थी, लेकिन तीन मुस्लिम पशु व्यापारी मार डाले गए। ये तीनों अपनी गाड़ी में भैंस ले जा रहे थे। उनमें से एक ने अपने परिवार को फोन लगाया था, और परिवार 47 मिनट तक इन लोगों के मार खाने की चीखें सुनते रहा। लेकिन जैसा कि अभी यूपी सरकार कर रही है, उस वक्त छत्तीसगढ़ की पुलिस ने इस घटना में किसी मारपीट का जिक्र नहीं किया, और यह दिखाया कि ये पशु व्यापारी पुल से नीचे कूदे, और पत्थरों पर गिरकर मर गए। जिन लोगों ने पीछा किया, हमला किया, उन पर हत्या का जुर्म भी दर्ज नहीं किया गया। 

आज अखलाक को दिल्ली से 50 किलोमीटर के भीतर ही गादरी नाम के गांव में दफन हुए 10 बरस गुजर चुके हैं, और अब हत्या के सारे ही आरोपियों के खिलाफ सरकार मामला वापिस लेने की अर्जी लगा चुकी है। खबर बताती है कि इसमें राज्यपाल की अनुमति भी साथ में लगाई गई है। गौतम बुद्ध नगर जिले की अदालत में लगी इस अर्जी को लेकर बुद्ध क्या सोच रहे होंगे, इसका अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है। अब तक तो पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियां, सरकारी या दूसरे वकील, और न्याय प्रक्रिया में शामिल दूसरे लोग धर्म के नाम पर रियायत करते हुए सुने जाते थे। लेकिन अब तो संविधान की शपथ लेकर काम करने वाली एक सरकार ने एक औपचारिक अर्जी ऐसी लगाई है, जो कि बुरी तरह हक्का-बक्का करती है। 

लोगों को याद होगा कि गुजरात में दो-तीन बरस पहले 2002 के दंगों के दौरान एक गर्भवती मुस्लिम महिला से बलात्कार करने वाले, और उसके छोटे से बच्चे को मार डालने वाले 11 लोगों को राज्य और केन्द्र सरकार ने अच्छे चाल-चलन की फाइल बनाकर समय से पहले जेल से रिहा कर दिया था। जेल के बाहर इन्हें माला पहनाकर, मिठाइयां खिलाकर इनका सार्वजनिक अभिनंदन किया गया था। जब इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई, तो अदालत ने इन सारे लोगों को दुबारा जेल भेजा। हमारा ख्याल है कि यूपी की जिला अदालत में यूपी सरकार की लगाई हुई अर्जी का सुप्रीम कोर्ट को खुद ही संज्ञान लेना चाहिए, और इस सरकारी अर्जी को खारिज करते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा करना चाहिए, और उससे पूछना चाहिए कि संविधान की शपथ का क्या हुआ? देश में आज जगह-जगह अल्पसंख्यकों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, और ऐसे में अल्पसंख्यकों की खुली भीड़त्या करने वाले लोगों को अगर इसी तरह माफी मिलती रही, तो वे क्या-क्या नहीं करेंगे, और देश में बाकी जगहों पर गाय के नाम पर इंसानों को काटने की घटनाएं कहां-कहां पर नहीं होंगी? 

गुजरात दंगों के इस सबसे चर्चित बिल्किस बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी 11 मुजरिमों को रिहाई रद्द करके दो हफ्ते में जेल भेजा था, और इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- आपने कानून का कत्ल कर दिया है, यह रियायती-रिहाई नहीं, दगाबाजी है, और आपने जुर्म और मुजरिम दोनों को बचाने की कोशिश की। जजों ने कहा ये मिठाई क्या 15 अगस्त की बांट रहे थे? इन बलात्कारियों और हत्यारों को हीरो बना दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि गुजरात सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बाम्बे हाईकोर्ट के फैसले को पलटने की हिमाकत की, गुजरात सरकार के पास ऐसी रियायत देने का हक ही नहीं था, फिर भी 11 मुजरिमों को छोड़ दिया! जजों ने कहा कि गैंगरेप और सामूहिक हत्या के इन मुजरिमों को इस तरह रिहा करना जनचेतना की हत्या है। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने कहा- बिल्किस बानो के साथ दो बार अन्याय हुआ, पहले 2002 में, दूसरी बार 2022 में जब इन्हें (हत्यारे-बलात्कारियों को) छोड़ा गया।

बिल्किस बानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात (और केन्द्र सरकार भी) को जैसी फटकार लगाई थी, लताड़ लगाई थी, वैसी ही अभी यूपी की योगी सरकार को लगाने की जरूरत है। देखते हैं सुप्रीम कोर्ट अभी जाग रहा है, या... 

(Daily Chhattisgarh)  

अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम और स्थानीय बच्चों के खेलकूद के बीच कोई रिश्ता नहीं...

19 नवंबर 2025 

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य सरकार ने एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम बनाया था जिसकी निर्माण लागत ही सौ करोड़ रूपए तक पहुंच गई थी, और जमीन के दाम जोड़ें, तो शायद हजार-दो हजार करोड़ का स्टेडियम था। अब सफेद हाथी खाने में तो काले हाथी जितना ही खाता है, लेकिन उसे नहलाने में साबुन अलग से लगता है, जो कि खासा महंगा रहता है। यह स्टेडियम भी भूले-भटके यहां होने वाले किसी क्रिकेट मुकाबले की शकल कभी देख पाता था, और इसके अलावा तो इतने बड़े ढांचे का और तो इस्तेमाल था नहीं। अब सरकार ने पांच साल के लिए यह स्टेडियम छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन को दिया है, जिससे सालाना कुछ रकम भी मिलेगी, रखरखाव भी होगा, और हो सकता है कि मैच कुछ अधिक हो जाएं, या कुछ रकम भी सरकार को मिल जाए। हम अभी सरकार के इस फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे, लेकिन इससे जुड़े हुए एक मुद्दे पर बात करना जरूरी है।

प्रदेश में दसियों हजार स्कूल-कॉलेज के खेल मैदान हैं, कुछ छोटे हैं, कुछ बड़े हैं, लेकिन खेल गतिविधियां ठप्प सरीखी रहती हैं। चूंकि सरकार चाहती है इसलिए खेल मुकाबले तो हो जाती है, स्कूलों से लेकर दूसरी टीमें बन जाती हैं, प्रतियोगिताएं हो जाती हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में राज्य के खिलाड़ी राज्य के भीतर ही रह जाते हैं, और गिने-चुने खिलाड़ी ही राष्ट्रीय स्तर पर किसी किनारे पहुंच पाते हैं। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की एक फिजियोथैरेपिस्ट युवती छत्तीसगढ़ की है, और टीम विश्वकप जीतकर लौटी, तो यह प्रदेश इस फिजियोथैरेपिस्ट का सम्मान-अभिनंदन करने का मौका पा सका, पूरा प्रदेश इसी बात को लेकर गौरवान्वित रहा। कहने के लिए प्रदेश में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के अलावा, अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम भी है, लेकिन इनका प्रदेश के खिलाडिय़ों से कुछ लेना-देना नहीं है। नेता-अफसर-ठेकेदार बड़े-बड़े निर्माण से खुश रहते हैं, और बड़े-बड़े स्टेडियम बनने से तो सरदार खुश हुआ किस्म के फिल्मी डायलॉग भी याद आते हैं। लेकिन प्रदेश के खिलाड़ी इन स्टेडियमों में खेलने लायक बन सकें, वह बात किनारे धरी हुई है। स्कूल और गांव के स्तर के खिलाडिय़ों को आगे बढ़ाने, उन्हें मैदान मुहैया कराने, खेल के सामान और खेल शिक्षक-प्रशिक्षक देने का काम स्टेडियम बनाने जितना आकर्षक नहीं रहता, इसलिए सरकार में किसी की दिलचस्पी ऐसे बिखरे हुए काम में नहीं रहती, जहां स्कूल की स्पोटर््स किट खरीदी से छोटे-छोटे से कमीशन ही मिलें। फिर स्कूलों में खेल के अभ्यास से तो किसी को कुछ नहीं मिलना है, सिर्फ बच्चों को खेलने का मौका मिलेगा, आगे बढऩे का मौका मिलेगा। इसलिए प्रदेश भर में स्कूल-कॉलेज के, और बाकी सार्वजनिक खेल मैदानों पर गैरखेल काम ही चलते रहते हैं। सरकार, राजनीति, बाजार, धर्म, और आध्यात्म, इन सब के तम्बू लगने और उखडऩे के बीच एक-दो दिन खेल मैदानों पर बच्चे पहुंच पाते हैं, तो हाथ-हाथ भर गहरे गड्ढे पड़े रहते हैं, कोई मैदान खेल के लायक नहीं बचते। 

इस प्रदेश में हर खेल के लिए कोई न कोई खेल संघ है। हरेक पर कोई न कोई बड़ा नेता, बड़ा अफसर, या बहुत बड़ा कारोबारी काबिज है। सत्ता बदलने के साथ-साथ कुछ खेल संघों के मुखिया के नाम बदल जाते हैं, लेकिन वे रहते नेता-अफसर, और कारोबारी ही हैं। खेल मैदानों की बात कुछ अरसा पहले छत्तीसगढ़ बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्षा ने भी उठाई थी। लेकिन प्रदेश के एक भी खेल संघ ने यह बात नहीं उठाई कि खेल मैदानों पर दूसरे काम नहीं होने चाहिए, उन्हें सिर्फ बच्चों और खिलाडिय़ों के खेलने के लिए रखना चाहिए, ताकि वे स्टेडियम में पहुंचने लायक टीम के लायक भी बन सकें, और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ साबित कर सकें। खेल संघ सत्ता से इतने जुड़े रहते हैं, सत्ता का हिस्सा रहते हैं कि वे सरकारी या राजनीतिक हितों से परे कुछ सोच भी नहीं पाते। खेल आयोजनों और खेल संघों के मंच देखें, तो उन पर सत्ता, सत्तारूढ़ पार्टी, और प्रदेश का खेल माफिया हावी रहता है, जिनका खेलों से कुछ लेना-देना नहीं रहता, लेकिन वे इन संघों के नाम पर एक सामाजिक प्रतिष्ठा, और एक ताकत पाते रहते हैं। तमाम खेल एक तरफ तो खेल मैदानों को लेकर सरकारी लापरवाही और उदासीनता के शिकार हैं, और दूसरी तरफ वे खेल संघों के शिकार हैं। आज जितने खिलाड़ी थोड़े-बहुत भी आगे बढ़ पाते हैं, वे खेल संघों की वजह से नहीं, खेल संघों के बावजूद आगे बढ़ जाते हैं। 

किसी भी किस्म की सत्ता के बड़े लोगों को छोटे मैदानों की कोई बात नहीं सुहाती, उन्हें बड़े स्टेडियम, अंतरराष्ट्रीय मैच, बड़े सितारे, मुफ्त की बिजली, हजारों करोड़ के स्टेडियम कुछ लाख रूपए में पा लेने की हसरत उनकी रहती है। लेकिन क्या यह प्रदेश बाहर से आए हुए खिलाडिय़ों का नजारा देखने के लिए ही बना है, या फिर यहां के बच्चों के खिलाड़ी बनने के लिए भी गांव-गांव तक सरकार की जो संपत्ति बिखरी हुई है, जो सार्वजनिक खेल मैदान हैं, क्या उनके लिए भी सरकार कोई नीति बनाएगी, क्या खेल संघ यह भी देखेंगे कि उनके खेलों के लिए मैदान हैं या नहीं, वे कितने काम के हैं, और बच्चों को उन खेलों की सुविधा हासिल है, या उनके खेल संघों की राजनीति ही उन खेलों को हासिल है? यह बात हँसी की लगती है कि सरकार अपनी खुद की स्कूलों के मैदानों को न बचाए, उन पर अवैध निर्माण खुद करती रहे, और दूसरी तरफ महंगी टिकट देकर जाने वाले अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम  पर हजारों करोड़ की जमीन लगाए, सैकड़ों करोड़ का निर्माण करे, और लाखों रूपए महीने का रखरखाव करे। 

भारत को चीन जैसे देश से सीखना चाहिए कि छोटे-छोटे से बच्चों की प्रतिभा को पहचान कर किस तरह उन्हें चार-छह बरस की उम्र से ही प्रशिक्षण दिया जाता है, और किशोरावस्था में पहुंचने तक तो उनमें से चुनिंदा बच्चे ओलंपिक से गोल्ड मैडल लेकर भी आने लगते हैं। इधर हिन्दुस्तान मैदान और स्टेडियम के बाजारू और कारोबारी इस्तेमाल में डूबा हुआ है, और सत्ता पर काबिज लोग खेल संघों पर काबिज होकर उन खेलों का गला घोंट रहे हैं। ऐसे देश-प्रदेश में बच्चों और बड़ों सबका खेल भविष्य यही है कि सैकड़ों-हजारों रूपए की टिकटें खरीदकर नुमाइशी मैच देखें, और अपनी खुद की उपलब्धि के हसीन सपने देखना छोड़ दें, क्योंकि उनको पूरा करने की फिक्र किसी को नहीं है।

(Daily Chhattisgarh)