निचली अदालतों के जज सुप्रीम कोर्ट के फैसले पढऩे की जहमत उठाएं...

09 अगस्त 2026

भारत की छोटी से छोटी अदालत के जज या मजिस्ट्रेट से यह उम्मीद की जाती है कि वे न केवल संविधान की मूल भावना को समझें, बल्कि कानून की प्रक्रिया को भी जानें, और जरूरत पडऩे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों, और उनमें स्थापित मान्यताओं को भी समझें। खासकर उस वक्त जब छोटी अदालतें बड़े संवैधानिक मुद्दों का जिक्र अपने फैसलों में करने लगें। संवैधानिक मुद्दों का जिक्र बिना संवैधानिक शब्दों और भावनाओं की समझ के करना जायज नहीं हो सकता। इसी तरह अदालत चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हों, अगर उसके छुए गए मुद्दों और पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट पहले अपने फैसलों से कानून की सोच स्थापित कर चुका है, तो निचली अदालतों के आदेश या फैसले कम से कम उसके खिलाफ तो नहीं होने चाहिए। फिर भी लोकतंत्र में हमें लगता है कि अदालत की व्यवस्था और प्रक्रिया के भीतर भी अगर कोई मजिस्ट्रेट या जज अपने से बड़ी अदालत से असहमति दिखाना चाहते हैं, तो उसे उन्हें असहमति के रूप में दर्ज करने का एक लोकतांत्रित अधिकार तो शायद हो सकता है, लेकिन उनके आदेश और फैसले अपने से ऊंची अदालत के अपने पर भी लागू फैसलों के खिलाफ नहीं जा सकते। 

अभी मुम्बई में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें पुलिस ने प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंसेज (टिस) के दो छात्रों की अग्रिम जमानत याचिका मुम्बई के एक सत्र न्यायालय ने खारिज कर दी। मुम्बई पुलिस ने टिस परिसर में एक कार्यक्रम के दौरान उमर खालिद और शरजील इमाम नाम के चर्चित और बरसों से बिना सुनवाई जेल में बंद आंदोलनकारियों की रिहाई के लिए नारे लगाए। इन्हें अग्रिम जमानत देने से मना करते हुए एडीजे वी.बी.बोहरा ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों में खालिद और इमाम को जमानत देने से इंकार कर दिया था, इसलिए उनकी रिहाई के लिए नारे लगाना गलत था, और छात्रों से देश के कानून का सम्मान करने की उम्मीद की जाती है। पुलिस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि टिस में दस-बारह छात्रों ने मोमबत्तियां जलाकर मानवाधिकार कार्यकर्ता स्व.जी.एन.साईबाबा की कविताएं पढ़ीं, और उमर खालिद, शरजील इमाम की रिहाई के नारे लगाकर साईबाबा को श्रद्धांजलि दी। 

अदालत ने अपने आदेश में यह जिक्र किया है कि साईबाबा को अदालत ने आतंकी मामले में बरी कर दिया था, इसलिए सिर्फ उन्हें श्रद्धांजलि देने को अवैध नहीं माना जाता। लेकिन जिन दो लोगों को अग्रिम जमानत से मना किया गया है, उनके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर कुछ माओवादियों की प्रकाशित पुस्तकों को डाउनलोड करना मिला है। और कुछ जानकारी उपकरण से हटा दी गई थी। जज ने कहा कि यह आपराधिक अपराध नहीं है, लेकिन यह उनके आचरण पर संदेह पैदा करता है, और कथित अपराध में उनके शामिल होने का संकेत देता है। जज ने लिखा कि किताब डाउनलोड करने और नारे लगाने के पीछे उनके इरादे का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है। एक दूसरी अर्जी पर जज ने कहा कि उसके मोबाइल फोन में मिली वॉट्सऐप चैट से भी पता लगता है कि उन्होंने विभिन्न स्थानों पर भाग लिया था। इसके अलावा उनके द्वारा कुछ जानकारी हटा दी गई थी। जज ने खुद ही कहा कि माओवादी संगठन की पुस्तकों को सिर्फ डाउनलोड करना अपराध नहीं है, लेकिन उनके इरादे और उनके संबंधों का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है। 

एक सत्र अदालत का यह फैसला बहुत बुरी तरह हैरान और निराश करता है। किसी विचाराधीन कैदी की रिहाई के लिए नारे लगाना लोकतंत्र में कब से अपराध होने लगा? अगर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत नहीं दी है, तो सुप्रीम कोर्ट से असहमत होना कोई जुर्म तो नहीं है! हम तो अपने अखबार में यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर कई बार अदालतों से असहमत होते हैं, लोकतंत्र में संसद या अदालत से सहमत होने की कोई बंदिश भी नहीं है। हम तो ट्रम्प जैसे लुच्चों के मामलों में भारत सरकार के रूख से भी असहमत रहते हैं, लेकिन वह भी कोई जुर्म नहीं है, लोकतंत्र ऐसी ही विविधता का नाम है। ऐसे में सेशन कोर्ट के इस आदेश से कई संवैधानिक खतरे खड़े होते हैं, और हमारा ख्याल है कि मुम्बई हाईकोर्ट में जाने पर जमानत न देने का यह फैसला खड़ा नहीं हो पाएगा। 

सुप्रीम कोर्ट पहले कई मामलों में यह कह चुका है कि जब तक अदालत दोष सिद्ध न कर दे, हर व्यक्ति निर्दोष माने जाएंगे। ऐसे में जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की रिहाई की मांग करना किसी मुजरिम को रिहा करने की मांग नहीं है। और हमारा तो तर्क यह है कि किसी मुजरिम को भी रिहा करने की मांग जुर्म इसलिए नहीं है कि देश में सबसे चर्चित बलात्कारियों की रिहाई की मांग रात-दिन सार्वजनिक रूप से नामी-गिरामी लोग करते ही रहते हैं। पुलिस ने ऐसी मांग करने वाले किसी व्यक्ति को सजायाफ्ता की रिहाई की मांग के जुर्म में तो नहीं पकड़ा है। इंदिरा की हत्या के बाद दो लोगों ने खालिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए थे, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सिर्फ नारे लगाए गए, जिनसे कि कोई हिंसा नहीं हुई, जिनसे कोई भीड़ नहीं भडक़ी, जिनसे कोई सार्वजनिक अशांति नहीं हुई, तो वह जुर्म नहीं है। ऐसे में उमर और शरजील की रिहाई का नारा कैसे जुर्म हो गया? 

इस जज ने हैरान करने की हद तक तर्कहीन बात कही है। वे खुद जिक्र करते हैं कि नक्सल साहित्य डाउनलोड करना जुर्म नहीं है, लेकिन इसके पीछे के इरादे को लेकर पूछताछ करने के लिए पुलिस हिरासत जरूरी है। जब कोई काम जुर्म नहीं है, तो उसके पीछे के इरादे की पूछताछ का हक पुलिस को कैसे मिल सकता है? और कोई जज कैसे पुलिस के ऐसे किसी कथित अधिकार को लोगों की आजादी के अधिकार के ऊपर मान सकता है? यह एक मुद्दा ही हाईकोर्ट में इस आदेश को खारिज करवाने के लायक है। 

सेशन कोर्ट ने हैरान करने की हद तक दो बातें लिखी हैं। एक तो यह कि इन छात्रों से गिरफ्तार उपकरणों में कुछ डिलीट किया गया है। हर कोई अपने कम्प्यूटर या मोबाइल फोन पर बहुत सी चीजें डाउनलोड करते हैं, बहुत सी चीजें डिलीट करते हैं। यह स्वाभाविक काम कैसे किसी जुर्म का शक करने का आधार हो सकता है? दूसरी बात यह कि किसी प्रतिबंधित संगठन की विचारधारा की किताब डाउनलोड करना कोई जुर्म नहीं है, यह बात सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सारे मामलों में साफ की हुई है। इसके बावजूद यह सेशन कोर्ट उसे मुद्दा बना रहा है, और उसे संदेह का एक आधार बता रहा है। ऐसे में तो सुप्रीम कोर्ट और संसद की लाइब्रेरी में भी ऐसा साहित्य हो सकता है, तो क्या वहां के रजिस्ट्रार या महासचिव से भी उनके इरादे पर पूछताछ की जाए? दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में प्रतिबंधित संगठनों के साहित्य को पढऩे पर कोई रोक नहीं रहती है, तानाशाही जरूर किताबों से डरती है। लेकिन इस अदालत ने एक बात और भयानक लिखी है जिसमें उसने कहा है कि ये छात्र की वॉट्सऐप चैट से यह पता लगता है कि उसने कई इलाकों में फील्डवर्क किया है। अदालत का यह जिक्र हैरान करता है क्योंकि देश के एक विख्यात समाजशास्त्रीय अध्ययन केन्द्र के छात्र अगर फील्डवर्क नहीं करेंगे, तो उनकी पढ़ाई कैसे पूरी होगी? शिक्षा के बुनियादी तत्वों को जुर्म से जोड़ देने का यह अदालती निष्कर्ष बहुत ही भयानक है।

मुम्बई के एक सेशन कोर्ट का यह आदेश हैरान करता है कि अगर विश्वविद्यालयों के मासूम छात्र-छात्राओं को भी अपने अहिंसक, लोकतांत्रिक, और पूरी तरह से गैरअराजक विचारों की भी छूट नहीं है, तो फिर देश को एक विचारहीन लोकतंत्र काफी होगा! आज जब इन तमाम मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट के अनगिनत फैसले न सिर्फ अदालतों की लाइब्रेरियों में किताबों की शक्ल में मौजूद हैं, बल्कि इनसे जुड़ी हुई खबरें रात-दिन इसके हिस्सों को बताती हैं। किसी छोटी अदालत के जज को भी अगर बड़े संवैधानिक मुद्दों को छूना है, तो उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे भारतीय न्याय प्रक्रिया में उनसे जुड़ी हुए सर्वोच्च फैसलों को तो कम से कम समझ लें। इस आदेश को तो आगे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की आँच से गुजरना होगा, लेकिन क्या आगे खड़ी उस संभावना को देखकर संतुष्ट रहा जा सकता है, जब निचली अदालत इस हद तक अलोकतांत्रिक रूख वाली हो? देश की न्याय व्यवस्था में यह काफी नहीं है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक फैसले के पलटने की संभावना बाकी है। बहुत से ऐसे लोग होंगे जिनके बस में ऊंची अदालतों तक जाने की ताकत नहीं होगी, वक्त नहीं होगा, और ऐसा करते हुए जिनकी पढ़ाई-लिखाई, या जेलों में बंद उमर और शरजील की तरह जवानी के कई बरस खराब हो सकते हैं। भारतीय न्याय व्यवस्था आदर्श होने से कोसों दूर है, यहां अभी-अभी उम्रकैद की सजा काट रहे किसी को 22 बरस बाद, तो किसी को 33 बरस बाद बेकसूर बरी किया गया है। छात्रों को फर्जी मामलों में, सत्ता से असहमत विचारधारा के आधार पर पुलिस और अदालती प्रक्रिया के माध्यम से प्रताडि़त करना पूरी तरह नाजायज और अलोकतांत्रिक है। किसी के साथ एफआईआर, जांच, मुकदमे, और निचली अदालत में लगातार बेइंसाफी के बाद उसे भरोसा दिलाना कि उनके लिए अभी तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के रास्ते खुले हैं, एक बहुत ही फर्जी किस्म का तथाकथित लोकतांत्रिक भरोसा है। 

आज पूरे देश में छात्रों की पीढ़ी से सरकारें जिस तरह हिली हुई हैं, बड़े-बड़े संगठन अपनी रणनीति दुबारा तय कर रहे हैं, वह सब देखते हुए सरकारों को फर्जी केस बनाना बंद करना चाहिए। कॉकरोच नाम का एक शब्द जिस तरह एक विस्फोट के साथ एक फुटपाथी-क्रांति में बदल गया, उससे भी सरकारों को समझ लेना चाहिए कि फर्जी केस फजीहत भी बन सकते हैं, सरकारों की खुद की फजीहत। फिलहाल तो हमें इंतजार रहेगा कि बाम्बे हाईकोर्ट सेशन कोर्ट के इस आदेश के उन पहलुओं पर क्या कहता है, जिन्हें हम आज अलोकतांत्रिक लिख रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)  

कुछ और दीक्षांत समारोहों के बहिष्कार के बाद समझ आएगा चीफ जस्टिस को भी

09 अगस्त 2026  

 

देश की एक प्रतिष्ठित लॉ यूनिवर्सिटी, हैदराबाद स्थित नालसार से ग्रेजुएट होकर निकल रहे छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को आमंत्रित करने का विरोध किया है। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखकर भेजा है कि मुख्य अतिथि बदला जाए। इन स्नातक छात्र-छात्राओं के समर्थन में विश्वविद्यालय के जूनियर भी आ गए हैं, और अब तक 380 के दस्तखत विरोध की चिट्ठी पर हो गए हैं। नालसार में देश के मुख्य न्यायाधीश को ही दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाने की परंपरा रही है, लेकिन छात्र-छात्राओं के विरोध को देखते हुए कार्यक्रम की तारीख तय नहीं की जा सक रही है। इनका कहना है कि हाल ही में दिल्ली में हुए नीट-प्रदर्शन के जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान सूर्यकांत की कही कुछ बातें उन्हें मंजूर नहीं है। जब छात्रों की ओर से एक वकील ने मुख्य न्यायाधीश से कहा था कि उनके पास पुलिस ज्यादती के वीडियो हैं, जिन्हें वे दिखा सकते हैं, तो सीजेआई का कहना था कि इन वीडियो में उनकी दिलचस्पी नहीं है, और न ही उनके पास इन्हें देखने का समय है, हमारा वक्त बर्बाद मत कीजिए। छात्रों का मानना है कि ये टिप्पणियां संवैधानिक मूल्यों और मानवाधिकार के खिलाफ हैं, इसलिए वे अपनी डिग्री ऐसे व्यक्ति से लेना नहीं चाहते। यह विरोध कानूनी शिक्षा, और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। उनका कहना है कि प्रदर्शनकारी नागरिकों पर पुलिस की कथित बर्बरता को इस तरह अनदेखा करना उन संवैधानिक मूल्यों, और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है, जो उन्हें नालसार में पढ़ाए गए हैं। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने भी मुख्य न्यायाधीश के इस रूख के खिलाफ लिखा था कि जस्टिस सूर्यकांत मई के महीने में नौजवानों के संदर्भ में कॉकरोच कहकर पहले से घिरे हुए थे, और अब कॉकरोच-आंदोलन पर पुलिस ज्यादती की बात सुनने, देखने का भी समय उनके पास नहीं था। हमने एक पखवाड़े पहले अदालती बेरूखी की खबरों पर लिखा था कि अपने ही पहले के शब्दों से उपजे हुए इस आंदोलन का जिक्र उनकी अदालत में होने पर उन्होंने एक बार फिर संवेदनाशून्य शब्दों का इस्तेमाल किया है। हमने लिखा था कि देश में कॉकरोच को मारने वाली फैक्ट्रियों का कुल उत्पादन मिलाकर भी कॉकरोचों की इस नई पीढ़ी को नहीं मार पाएगा। और ऐसे कारखाने चाहे किसी लोकतांत्रिक संस्था, या स्तंभ की शक्ल में ही क्यों न हों, उनके हमलों से भी ये कॉकरोच अपनी लोकतांत्रिक प्रतिरोधक क्षमता से बच जाएंगे। अपनी एयरकंडीशंड मीनारों में बैठे हुए लोग अपनी फिक्र करें। 

अपनी कही हुई गैरजरूरी, और नाजायज बातों के नुकसान से भी अछूते रहने वाले लोग जब अपना तैश जारी रखते हैं, तो ऐसा ही होता है। अभी इसी हफ्ते की बात है जब मुम्बई में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंसेज (टिस) का दीक्षांत समारोह तय वक्त के 48 घंटे पहले स्थगित करना पड़ा क्योंकि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत इसमें मुख्य अतिथि बनकर आने वाले थे, और दीक्षांत समारोह में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन की आशंकाओं से संस्थान ने कार्यक्रम टाल दिया। यह अपने आपमें देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ एक दुर्लभ घटना थी, लेकिन दुनिया के अलग-अलग देशों में कई सत्तारूढ़ नेताओं का विरोध करते हुए दीक्षांत समारोह के मंच पर ही छात्र-छात्राओं का बयान देना, फिलीस्तीन जैसे झंडे लहराना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जाता है। 

हिन्दुस्तान में हाल के बरसों में एक हास्यास्पद बयानबाजी सत्ता के लोगों की तरफ से होती रही है कि छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए। जब वोट डालने की उम्र 18 बरस है, पंचायत से लेकर संसद तक के चुनाव में हर बालिग का वोट है, तो उन्हें राजनीति से दूर रहने की सलाह देना अपनी चमड़ी बचाने जैसा है। जब जिसे यह लगता है कि छात्र उनके खिलाफ हो सकते हैं, उन्हें छात्रों को राजनीति से दूर रखना आत्मसुरक्षा का एक तरीका लगता है। लेकिन अब कुछ दशकों के बाद जाकर तिलचट्टों की शक्ल में नौजवान पीढ़ी ने आंदोलन का अपना हक, और आंदोलन की अपनी जिम्मेदारी जिस तरह से उठाई है, उससे देश की तस्वीर एकदम ही बदल गई है। मानो सोती हुई बाकी नौजवान पीढ़ी को किसी ने झकझोर दिया हो कि उन्हें भी जागते रहना होगा। गनीमत यह है कि छात्रों के इस बार के विरोध-प्रदर्शन के पीछे किसी राजनीतिक दल का न साथ है, न हाथ है। छात्रों ने अपनी ताकत, और अपने दलविहीन होने की जरूरत, इन दोनों को खूब पहचाना है, और आंदोलन की शुरूआत इसी तरह हुई है। यह एक अलग बात है कि कुछ वामपंथी छात्र संगठनों के छात्रों ने अपनी संस्कृति, और अपने मिजाज के मुताबिक आंदोलन का साथ दिया है, गैरराजनीतिक आधार पर राहुल गांधी ने इन वामपंथी छात्र नेताओं के साथ खड़़े रहकर कंधे से कंधा टकराया है, और अपनी मौजूदगी को पीछे रखकर इन बच्चों को आगे बढ़ाया है। कुछ ऐसा ही अब जंतर-मंतर से निकलकर कहीं झारखंड में सामने आ रहा है, तो कहीं मुम्बई के टिस में। अब उन लोगों की बोलती बंद हो गई है जो कल तक छात्रों को राजनीति से दूर रहने की नसीहत देते थे, या देश में किसी भी तरह के आंदोलन को अराजकता मानते थे। अब तो मुम्बई के एक स्टेडियम में जाकर जिस तरह आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने छात्र-पीढ़ी से बात की है, जिस तरह उनकी वकालत की है, उनकी आलोचना को खारिज किया है, उससे खुद भाजपा के बड़बोले नेता हक्का-बक्का हैं। मोहन भागवत जिस पीढ़ी और जिन आंदोलनकारियों को अपने लिए देश में सबसे भरोसेमंद करार दे रहे हैं, जिन्हें देशप्रेमी करार दे रहे हैं, उन्हें अब कंगना रनौत क्या खाकर गटर कहेंगी, ऐसा कोई खाद्य पदार्थ हमें समझ नहीं पड़ रहा है। 

हमने आज की यह बात शुरू की थी सीजेआई के अभूतपूर्व, असाधारण, ऐतिहासिक विरोध से, उस विरोध से देश में यथास्थिति कायम रखने वाले तबके चौंके हुए हैं, और सहमे हुए हैं। छात्र पीढ़ी को अपनी ताकत, अपने हक, और अपनी जिम्मेदारियों का अहसास होना अगर शुरू हुआ है, तो यह लोकतंत्र के लिए जिंदादिली का एक सुबूत है। दूसरी तरफ बुजुर्ग सत्ता-पीढ़ी को अगर यह समझ आ रहा है कि यह पीढ़ी धार्मिक झंडों-डंडों, और पुलिस की लाठी-गोली के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता से लैस है, तो अब इन प्रचलित हथियारों को छोडक़र बातचीत के औजारों का इस्तेमाल शुरू हो गया है। लोकतंत्र में भी आसमान पर पहुंची बददिमागी की अक्ल ठिकाने लगाने में तिलचट्टों और छात्रों की सुगबुगाहट सबको दिख रही है। चीफ जस्टिस को अगर नहीं दिख रही है, तो कुछ और दीक्षांत समारोहों के बहिष्कार के बाद दिखने लगेगी।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 9 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

महुआ मोइत्रा को अंडों के बीच भेजने का अदालती फैसला क्या जायज है?

08 अगस्त 2026  

 

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा के एक मामले में कल सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी तल्ख बातें कहीं। महुआ मोइत्रा की एक फेसबुक पोस्ट को लेकर पश्चिम बंगाल में उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ है। इसमें उन्हें पुलिस के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने को कहा गया था। इसके खिलाफ वे कलकत्ता हाईकोर्ट गई थीं, वे चाहती थीं कि उनसे पूछताछ ऑनलाइन कर ली जाए, वहां उन्हें राहत नहीं मिली। अब वे सुप्रीम कोर्ट आई थीं, तो वहां महुआ मोइत्रा की वकील ने कहा कि उन्हें अपनी हिफाजत का खतरा है, पहले भी उन पर अंडे फेंके जा चुके हैं, इसलिए दोबारा ऐसी घटना हो सकती है। इसलिए शारीरिक रूप से थाने जाने के बजाय उन्हें ऑनलाइन मौजूद रहने की इजाजत दी जाए। 

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने इस पर कुछ मौखिक टिप्पणियां कीं, जो कि आज चारों तरफ खबरों में आई हैं, और हम उन पर इसलिए लिख रहे हैं कि वे कुछ हक्का-बक्का करती हैं। जजों ने कहा- आप संसद सदस्य हैं, राजनीति में आई हैं, फिर अंडों से क्यों डरती हैं? हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने तो सीने पर गोलियां खाई थीं। जजों ने यह भी कहा कि इस तरह की अर्जियां तो इस अदालत के सामने आनी ही नहीं चाहिए। जबकि हाईकोर्ट ने महुआ मोइत्रा की व्यक्तिगत हाजिरी से छूट की अर्जी खारिज करते हुए भी यह आदेश दिया था कि जब वे जांच अधिकारी के सामने पेश हों, तो पुलिस यह सुनिश्चित करे कि उन पर अंडे न फेंके जाएं। हाईकोर्ट ने इस बात को रिकॉर्ड में लिया था कि पहले उनकी विरोधी भीड़ ने उन पर अंडे फेंके थे, लेकिन इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जजों का यह कहना कि वे राजनीति में हैं, अंडों से क्यों डरती हैं, बड़ी ही अटपटी और अवांछित बात है। 

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि वहां जज जुबानी बहुत सारी बातें कहते हैं, जो कि फैसले या आदेश में लिखित रूप से नहीं रहती, और उन्हें आमतौर पर चुनौती नहीं दी जा सकती। लेकिन मीडिया में ऐसी तीखी और तल्ख बातों से खबरें तुरंत बनती हैं, और यह एक किस्म से कानूनी सुनवाई के भीतर एक जुबानी सुनवाई और चलने लगती है जो कि आखिर में जाकर फैसले में शायद नहीं भी आती। एक तरफ तो अदालतें मीडिया ट्रायल के खिलाफ कुछ कहती हैं, कभी-कभी अपनी ही कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल के खिलाफ आदेश देती हैं, और अक्सर ही बड़ी अदालतों के जज जुबानी टिप्पणियों से एक जनधारणा बनाने लगते हैं, बना देते हैं, या किसी की साख को खराब करते हैं। आज एक लोकतंत्र में किसी जनप्रतिनिधि को अगर लोगों का विरोध झेलना भी पड़ता है, तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि लोगों को अंडे झेलने के लिए भी तैयार रहना चाहिए? अंडों से कोई बड़ी चोट चाहे न लगे, लेकिन उसकी चिपचिपाहट जब किसी के कपड़ों और बदन पर लग जाए, तो क्या वैसी हालत में लोग सफर कर सकते हैं, काम कर सकते हैं, पुलिस दफ्तर में लंबी गवाही दे सकते हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट के जज उन पर फेंके गए अंडों को झेलने के बाद अदालत में बैठकर दिन भर काम कर सकते हैं? जजों का यह कहना बहुत ही नाजायज है कि राजनीति में हैं तो अंडों से क्या डरना? 

कोई राजनीति में रहे, न्यायपालिका में रहे, या मामूली सरकारी नौकरी में रहे, हर किसी को गरिमा के साथ अपना काम करने का बुनियादी हक है। हमने बंगाल में अभी हाल ही में देखा है कि एक दूसरे सांसद, ममता बैनर्जी के भतीजे, अभिषेक बैनर्जी को किस तरह चारों तरफ से घेरकर अंडों से हमला किया गया, उनसे धक्का-मुक्की की गई, और उन्हें बचाने के लिए उन्हें हेलमेट लगाकर वहां से निकाला गया। राजनीति या सार्वजनिक जीवन में होने का मतलब अगर इस तरह की हिंसा, और ऐसे अपमान को झेलना है, तो यह लोकतंत्र नहीं है। कोई आंदोलनकारी तो ऐसा कर सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ी अदालत के जज अगर इसकी तुलना स्वतंत्रता सेनानियों के छाती पर गोली झेलने से करे, तो यह बहुत ही खराब मिसाल है, नाजायज है, बेइंसाफ बात है। अदालत को एक महिला जनप्रतिनिधि के साथ उसकी सामान्य गरिमा के प्रति हमदर्दी रखनी चाहिए थी। भारतीय समाज में महिलाओं को वैसे भी अक्सर अपमान के लायक मान लिया जाता है। ऐसे में अगर बंगाल की सार्वजनिक जगहों पर आम हो चला ऐसा अपमान अगर अदालत लोकतंत्र मान रही है, तो क्या अदालत खुद भी जनता की ऐसी लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया झेलने के लिए तैयार रहेगी? 

जिस मामले में जजों ऐसा अपमान करने वाली जनता को झिड़क़ना था, पुलिस को हिफाजत देने के लिए कहना था, और महुआ मोइत्रा को ऑनलाइन जुडऩे की छूट देनी थी, उसमें जजों ने बड़ा नकारात्मक रूख दिखाया है। आज तो सुप्रीम कोर्ट भी अपनी बहुत सारी सुनवाई ऑनलाइन करने लगा है, जिसमें एक साथ कई वकील बोलते हैं। ऐसे में पूछताछ करने वाले एक पुलिस अफसर को एक पढ़ी-लिखी महिला सांसद से ऑनलाइन पूछताछ करने में क्या दिक्कत हो सकती है? इस पर पहले कलकत्ता हाईकोर्ट, और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट का रूख हैरान करता है। यह उस भीड़ को खुश करने वाला रूख तो है, जो आज बंगाल में बदली हुई सत्ता की वजह से, सत्ता से हटी हुई पार्टी के लोगों का तरह-तरह से अपमान कर रही है। सार्वजनिक जगहों पर, और एयरपोर्ट तक पर, विमान के भीतर भी महुआ मोइत्रा जैसे सांसदों को या दूसरे निर्वाचित लोगों को तरह-तरह से अपमान झेलना पड़ रहा है। यह सिलसिला देश के सामने बहुत से टीवी चैनलों के रास्ते, बहुत से वीडियो और खबरों के रास्ते सामने आ चुका है, और महुआ मोइत्रा की तरफ से भी ऐसी घटनाओं का जिक्र दोनों ही बड़ी अदालतों में किया गया था। 

अंडों के वार, चिपचिपाहट की बौछार से बचने के लिए अगर एक महिला सांसद ऑनलाइन पूछताछ का अनुरोध कर रही है, तो उसे स्वतंत्रता सेनानियों की तरह छाती पर गोलियां झेलने के लिए तैयार रहने को कहा जा रहा है। जजों की यह सोच बड़ी अदालत के बड़े अदालती अहंकार को बताती है कि वे किसी आदेश या फैसले के पहले किसी भी तरह की बातें कह सकते हैं। यह लोकतंत्र नहीं है, अदालत का यह रूख और बर्ताव भी लोकतंत्र नहीं हैं। आज जब पूरी की पूरी दुनिया अधिक से अधिक काम को ऑनलाइन करने की तरफ बढ़ रही है, खुद जज कभी अपने घरों से ऑनलाइन सुनवाई करते हैं, तो कभी वकील घरों से ही वीडियो-कैमरों पर ऑनलाइन जिरह करते हैं, लगातार यह बात भी चल रही है कि जेलों से अदालतों को वीडियो लिंक से जोड़ा जाए, तो ऐसे में व्यक्तिगत मौजूदगी की पुलिस की जिद पुलिस का एक राजनीतिक रूख है, और एक महिला को इसकी छूट न देना हमें तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का अहंकारी रूख लगता है। जब अदालतें सार्वजनिक भीड़ के बीच होने वाली भीड़त्या को रोकने के लिए भी कुछ नहीं कर पातीं, तो उन्हें किसी निर्वाचित महिला सांसद को आक्रामक और विरोधी भीड़ के बीच जाने के लिए आजादी की लड़ाई की मिसाल की चुनौती देने का क्या हक है? अदालतें संविधान के बड़े ढांचे के भीतर मनचाहे आदेश और फैसले दे सकती हैं, लेकिन यह सिलसिला लोकतंत्र के न्यायिक इतिहास में अच्छी तरह दर्ज भी होते चलता है। जजों को यह सोचना चाहिए कि उनके ऊपर अगर कभी अंडे फेंके जाएं, तो क्या उससे लिथड़े हुए वे दिन भर अदालती काम कर सकेंगे?

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 8 अगस्त 2026



 

एक दिन नहीं गुजरता कि एआई का कोई नया खतरा सामने न आता हो!

07 अगस्त 2026  

 

अमरीका से आई हुई एक खबर पिछले साल-दो साल से चल रही, और हाल के महीनों में अधिक गहरा गई एक फिक्र को बढ़ाती है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के क्षेत्र में जिन कंपनियों की सबसे अधिक चर्चा होती है, उनमें से ओपनएआई, और एंथ्रॉपिक के कुछ अधिक विकसित एआई एजेंटों ने ऐसा बर्ताव किया जिसकी उन्हें इजाजत नहीं थी। एआई सेफ्टी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन एजेंटों ने फर्जी पहचान बनाने की कोशिश की, बिना इजाजत दूसरी सुरक्षा प्रणालियों में घुसपैठ की कोशिश की, कुछ मामलों में बदनीयत से कम्प्यूटर कोड लिखने की कोशिश की, और सुरक्षा नियमों को चकमा देकर अपना इरादा पूरा करने की कोशिश भी की। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य के एआई एजेंट कितने जोखिम पैदा कर सकते हैं, और उन्हें किस तरह काबू किया जाना चाहिए, इस पर विचार होना चाहिए। इन दोनों कंपनियों ने इस रिपोर्ट पर कहा है कि वे अपने सुरक्षा इंतजाम और मजबूत करेंगी। इस ताजा खबर से अब पिछले दो-तीन बरस में एआई से जुड़ी हुई कई चिंताजनक घटनाएं याद आती हैं। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी खबर और है, जो इससे बिल्कुल भी जुड़ी हुई नहीं है, लेकिन हम उसे जोडक़र देखना चाहते हैं। अमरीका के ही स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एआई की मदद से पहली बार ऐसे वायरस डिजाइन किए हैं जो प्राकृतिक नहीं है। वैज्ञानिकों का मकसद बदन में दवा प्रतिरोधी वैक्टीरिया को मारना है, लेकिन सवाल यह है कि एआई के इस्तेमाल से अगर विज्ञान ऐसे वायरस बना चुका है, तो आगे यह क्षमता कई और किस्म के खतरे खड़े कर सकती है।

 

एआई को लेकर दुनिया के बहुत से एआई विशेषज्ञ समय-समय पर फिक्र जाहिर करते रहते हैं, और उनमें से हजारों ऐसे हैं जिन्होंने अपीलों पर दस्तखत भी किए हैं कि एआई का अंधाधुंध और बेकाबू विकास स्थगित किया जाए, क्योंकि इसे दुबारा काबू में करने की ताकत आज इंसानों में नहीं हैं। एआई विकसित करने में जो बड़े-बड़े कम्प्यूटर वैज्ञानिक लगे हुए हैं, उनमें से भी कुछ इस काम से अलग हो गए हैं, कुछ ने ऐसी कंपनियां छोड़ दी हैं, और कुछ कारोबारी भी एआई के असीमित विकास के खिलाफ हो गए हैं। लोगों का यह मानना है कि बेकाबू एआई पूरे मानव जाति के लिए, धरती के लिए बहुत बड़ा खतरा हो सकता है। दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी एलन मस्क ने एक वक्त एआई कंपनी में खासा पूंजीनिवेश किया था, लेकिन अब इसके खिलाफ दस्तखत करने वाले हजार वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों, और कारोबारियों में मस्क भी शामिल हैं। एआई के एक सबसे बड़े वैज्ञानिक जेफ्री हिंटन गूगल छोडक़र बाहर आ गए, और उन्होंने कहा कि उन्हें डर है कि एआई भविष्य में इंसानी काबू से बाहर जा सकता है। उन्होंने कहा कि इससे जुड़े खतरों को जलवायु परिवर्तन, या परमाणु हथियारों जितनी गंभीरता से लेना चाहिए। एक दूसरे वैज्ञानिक-विशेषज्ञ का कहना है कि सबसे बड़ा खतरा एआई का स्वायत्त एजेंट बन जाना है, यानी वह खुद योजना बनाए, साधन जुटाए, इंटरनेट का इस्तेमाल करे, और दूसरे एआई को निर्देश दे। इन खतरों को अगर हम जमीनी हकीकत की शक्ल में समझना चाहें, तो भारत जैसा आज दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल लोकतंत्र सबसे अधिक खतरा पा सकता है। यहां करोड़ों लोग वॉट्सऐप इस्तेमाल करते हैं, करोड़ों लोग इंस्टाग्राम, करोड़ों लोग यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं, सौ करोड़ लोग आधार कार्ड इस्तेमाल करते हैं, तकरीबन पूरी आबादी बैंक खातों से जुड़ी हुई है। अगर एआई इन सब पर कोई साइबर हमला करेगा, तो उससे पूरा देश ठप्प हो सकता है, और अगर इतना ताकतवर बेकाबू एआई बन जाएगा, तो कोई एक देश, कोई सुरक्षा कंपनी उसे रोक भी नहीं पाएगी।

 

आज एक सवाल यह है कि अब तक इंसान मशीनों पर काबू रखते थे, उनसे काम करवाते थे। अब पहली बार ऐसी मशीनें बन रही हैं जो अपनी मर्जी से भी काम करते दिख रही हैं, और उनके लिए बनाए गए नियमों के जाल के छेदों में से वे निकलकर मनमानी भी कर रही हैं। एआई एजेंटों की पूरी रिसर्च, और उनका विकास, जिस तरह हर पल आगे बढ़ रहे हैं, उससे कब वे सुरक्षा दीवार को छलांग लगाकर पार कर लेंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं है। अब यह सोचें कि किसी प्रयोगशाला में एआई ऐसे वायरस बिना वैज्ञानिकों की मदद के बना डाले, जो कि प्राकृतिक ही नहीं है, और एआई औजार को हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाले कुछ लोग अगर उस वायरस को फैलाने की साजिश कर लें, तो उसका क्या इलाज होगा? क्या एआई ऐसे वायरस नहीं बना लेगा जिनसे मौजूदा विज्ञान जूझ ही नहीं सकेगा?

 

यह पूरी नौबत बहुत भयानक है। अब यह बात स्थापित हो चुकी है कि एआई झूठ बोल सकता है, वह उसके लिए तय किए गए नियमों को किनारे धकेलकर मनमानी जगह घुसपैठ कर सकता है, अब वह वायरस जैसी जैविक संरचनाएं भी डिजाइन कर सकता है, और इंसानों ने अब तक उसके लिए पर्याप्त नियम और नियंत्रण नहीं बनाए हैं। जिन लोगों को अब तक एआई सिर्फ एक कम्प्यूटर-समस्या लगता है, उन्हें यह समझना चाहिए कि कोरोना जैसा कोई वायरस अगर एआई से बनाकर अगर कोई देश, गिरोह, या समूह दुनिया के किसी इलाके, किसी तबके में फैलाने का काम करेगा, तो कैसी नौबत आएगी? इसके अलावा झूठी जानकारी फैलाना, कम्प्यूटर आधारित हर किस्म की व्यवस्था को चौपट कर देना, यह सब एआई के बाएं हाथ का खेल आज भी है, और विज्ञान और कारोबार मिलकर इसके दाएं हाथ को और अधिक ताकतवर बनाने में लगे हुए हैं।

 

भारत जैसे देश के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि यह न तो एआई विकसित करने वाले देशों में हैं, न ही एआई से हिफाजत विकसित करने वाला देश है। लेकिन यह पूरी तरह डिजिटल तकनीक पर आधारित प्रणालियों वाला देश जरूर है, और इसके पास उन सबका कम्प्यूटरों से परे का कोई विकल्प भी नहीं है। इसलिए खतरे के मुहाने पर बैठे हुए दूसरे दर्जनों देशों की तरह, या कि अधिक सही यह कहना होगा कि किसी भी और देश की तरह भारत को भी चौकन्ना रहना होगा, और हर देश में एक ऐसी टास्क फोर्स बननी चाहिए जो कि एआई के खतरों तक अपना काम सीमित रखे। ऐसी तैयारी बिना हम एक बहुत नाजुक भविष्य के साथ जी रहे हैं।    

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 7 अगस्त 2026



 

आरोपियों को खुद सजा देना पुलिस के अधिकार से परे है

06 अगस्त 2026  

 

दो दिन पहले एक अदालत ने भाजपा के एक बहुत ताकतवर सांसद, और भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष रह चुके बृजभूषण शरण सिंह को पहलवान खिलाड़ी लड़कियों के यौन शोषण के मामले में बरी कर दिया। बीते कुछ बरस रिपोर्ट लिखवाने के लिए इन लड़कियों को दिल्ली की सार्वजनिक जगहों पर आंदोलन करना पड़ा था, और कई तरह की अप्रिय घटनाओं के बाद जाकर सुप्रीम कोर्ट की दखल से रिपोर्ट दर्ज हुई थी। अब इस मामले में इस नेता की रिहाई के बाद शिकायतकर्ता लड़कियों ने कहा है कि वे ऊपरी अदालत में जा रही हैं। मामले के जानकार बहुत से लोगों का कहना है कि इतने ताकतवर व्यक्ति के खिलाफ भारत की अदालत में कुछ साबित कर पाना आसान नहीं रहता है। इस मामले में भी कोई एक गवाह लडक़ी अपने बयान से पलट गई थी। फिलहाल इस फैसले पर कुछ न कहते हुए हम मुम्बई हाईकोर्ट चलते हैं जहां उसकी गोवा बेंच ने कई बरस पहले के एक बड़े चर्चित मामले में निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है, और अपनी मातहत कर्मचारी के यौन उत्पीडऩ में तहलका नाम की एक चर्चित पत्रिका के संपादक तरूण तेजपाल को गुनहगार करार दिया है। हाईकोर्ट ने माना है कि 2013 के इस मामले में 2021 में गोवा सत्र न्यायालय का फैसला सही नहीं था। 2013 के बाद से ही तरूण तेजपाल की बड़ी चर्चित पत्रकारिता खत्म हो गई थी, क्योंकि उस घटना के प्रचार के बाद पत्रकारिता में उनकी कोई जगह नहीं रह गई थी। पांच बरस पहले वे इस आरोप से निचली अदालत में बरी हो गए थे, लेकिन अब फिर अभी से पौन घंटे बाद उनकी सजा की अवधि की घोषणा होगी। 

ये दोनों लोग बहुत चर्चित थे, और इनके चेहरे सब लोग जानते थे। लेकिन छोटे-बड़े हर किस्म के जुर्म में गिरफ्तार होने वाले बहुत सारे आम लोग ऐसे रहते हैं जिनके चेहरे लोग पहले से नहीं जानते। ऐसे लोग पुलिस के प्रेसनोट में, या उसकी वेबसाइट पर, उसके सोशल मीडिया पेज पर दिखाए जाते हैं। कई मामलों में जब जनता का आक्रोश अधिक रहता है, तब ऐसे आरोपियों के जुलूस भी निकाले जाते हैं। अभी किसी हिन्दी प्रदेश का एक वीडियो सामने आया था जिसमें जनभावनाओं को शांत करने के लिए दो आरोपियों के हाथों पर झूठा प्लास्टर लगाया गया था, पट्टियां बांधी गई थीं, वे लंगड़ाते हुए चल रहे थे। लेकिन शहर से गुजरा हुआ यह जुलूस जब अदालत पहुंचा तो एक कोने में खड़े होकर वे प्लास्टर और पट्टियां सब उतारकर फेंक रहे थे, और बिना लंगड़ाए चल रहे थे। जनधारणा को शांत करने के लिए यह नाटक पुलिस ने किया था। इसी तरह देश में मुठभेड़ों के लिए बदनाम कुछेक सरकारें ऐसी हैं जो आरोपियों के पैरों में गोली मारती हैं, और फिर वे लंगड़ाते हुए वीडियो पर दिखाए जाते हैं। 

अभी कुछ अरसा पहले गुजरात हाईकोर्ट ने एक फैसला दिया कि पुलिस द्वारा आरोपियों की तस्वीरें, वीडियो, और पहचान सार्वजनिक करना गलत है। हाईकोर्ट का कहना था कि सिर्फ आरोपी होने से कोई व्यक्ति अपराधी नहीं हो जाते। उनकी पहचान उजागर करना, या उनके फोटो-वीडियो जारी करना उनकी निजता के खिलाफ है, और गरिमा से जीने के उनके नागरिक अधिकार के खिलाफ है। अदालत का कहना है कि पुलिस काम जांच करके अदालत के सामने सुबूत रखना है, न कि मीडिया ट्रायल करवाना। पहले भी कुछ मौकों पर ऐसे मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे थे, और वहां यह कहा गया था कि गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, असम, और छत्तीसगढ़ पुलिस के सोशल मीडिया अकाउंट पर हथकड़ी लगाए गए, रस्सी से बांधे हुए, घुटनों के बल बैठे हुए, या सार्वजनिक परेड करवाए जाते आरोपियों के फोटो और वीडियो डाले जा रहे हैं। गुजरात हाईकोर्ट ने माना कि बाद में अगर कोई निर्दोष साबित हो जाए, तो क्या उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा पुलिस लौटा सकेगी? अदालत ने साफ किया कि पुलिस सजा देने वाली संस्था नहीं है। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कहा गया कि देश भर के लिए पुलिस के लिए दिशा-निर्देश दिए जाएं, तो अदालत ने कोई अंतिम व्यापक कानून नहीं बनाया, उसने कहा कि पीयूसीएल वाले मामले में पुलिस की प्रेस ब्रीफिंग गाईडलाईन बनाने का आदेश दिया जा चुका है, और सोशल मीडिया को भी उसी में शामिल किया जा सकता है। 

यह भी याद रखने की जरूरत है कि बीते दशकों में एक से अधिक मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ राय रखी है कि गिरफ्तार व्यक्ति भी मौलिक अधिकार रखते हैं, और पुलिस उनकी गरिमा खत्म नहीं कर सकती। एक मामले में अदालत ने यह लिखा था कि गिरफ्तारी अपने आपमें सजा नहीं बनाई जा सकती। एक तीसरे मामले में यह राज्य की जिम्मेदारी बताई गई थी कि आरोपी की गरिमा और मानवीय अधिकारों का सम्मान किया जाएगा। इससे परे भारतीय आपराधिक कानून का मूल सिद्धांत है, जब तक अदालत दोष सिद्ध न करे, व्यक्ति निर्दोष माने जाएंगे। अब सवाल यह उठता है कि आज देश में कई मामलों में 20-25 बरस बाद भी लोग बाइज्जत बरी हो रहे हैं। इस बीच में किसी निचली अदालत ने उन्हें सजा सुनाई थी, या उन्हें बेकसूर करार दिया था, और उस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया, और लोग रिहा किए गए। आज ही के अखबार में ओडिशा के एक व्यक्ति की खबर है, जिसे 22 साल जेल में काटने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया है। इस फैसले के खिलाफ अपील करने में यह गरीब जब लेट हो गया, तो हाईकोर्ट ने देरी माफ नहीं की थी, और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी भी जाहिर की है। एक दूसरे मामले में एनआईए कोर्ट ने 78 बरस के एक व्यक्ति को राजद्रोह के आरोप से मुक्त किया है, जिस पर यह मामला 33 बरस से चल रहा था। अब ऐसे बहुत सारे मामले हैं, और भारत की न्याय व्यवस्था में पहली निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले आने तक कुछ दशक लग जाना एक मामूली बात है। 

अब भारत में 50 फीसदी से अधिक मामलों में लोगों को सजा नहीं होती, और वे छूट जाते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक हत्या के मामलों में 35-40 फीसदी को ही सजा हो पाती है, बलात्कार में 25-30 फीसदी को, और यूएपीए जैसे कड़े कानून में 2 से 6 फीसदी तक लोगों को ही सजा होती है। यह सब कुछ निचली अदालतों के आंकड़े ही है, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाते हुए सजा के मामले घटते ही हैं। ऐसे में पहली गिरफ्तारी के तुरंत बाद लोगों को मुजरिम की तरह पेश करना, उन आरोपियों के बुनियादी अधिकारों के एकदम खिलाफ जाने वाली बात है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज नहीं किया है, बल्कि इसे पीयूसीएल की पुलिस ब्रीफिंग मार्गदर्शिका बनाने के केस के साथ जोड़ दिया है। जब तक ऐसी कोई मार्गदर्शिका नहीं आती है, तब तक भी राज्यों की पुलिस को चाहिए कि वे गरिमा के साथ जीवन के भारतीय संविधान के बुनियादी अधिकार का खुद होकर सम्मान करे, और आरोपियों को लोगों के सामने पेश करना बंद करे। सुप्रीम कोर्ट ने अगर अभी कोई सीधा आदेश नहीं दिया है, तो इस याचिका को खारिज भी नहीं किया है। राज्यों को चाहिए कि वे संविधान के बुनियादी तत्वों को समझें, और उसके मुताबिक काम करें। 

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 6 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)