सोनिया-राहुल पर कोर्ट केस पर संसद में हंगामा क्यों ?

संपादकीय
9 दिसंबर 2015

कांग्रेस पार्टी के अखबार नेशनल हेराल्ड की प्रकाशक कंपनी के शेयरों को एक नई कंपनी बनाकर उसमें डालने के मामले में भाजपा के नेता सुब्रमण्यम स्वामी सोनिया-राहुल सहित कांग्रेस पार्टी के खिलाफ अदालत गए हुए हैं, और यह पहला मौका है जब सोनिया गांधी किसी अदालती कटघरे में खड़ी होने जा रही हैं। हालांकि यह मामला कंपनी कानूनों के तहत एक जटिल मामला है, और इसके गुण-दोष पर हम कुछ कहना नहीं चाहते, लेकिन इस अदालती मामले को लेकर कांग्रेस पार्टी ने संसद के भीतर जिस तरह का बर्ताव किया है, वह भारी गैरजिम्मेदारी का है। अगर देश में सांसदों के खिलाफ चल रहे तमाम अदालती मामलों को लेकर संसद के भीतर ऐसा हंगामा होने लगे, तो साल में 365 दिन और चौबीसों घंटे चलने वाली संसद में भी समय का टोटा पड़ेगा। ऐसा करके कांग्रेस ने पता नहीं अपनी घबराहट उजागर की है, या खीझ जताई है, उसकी चाहे जो भी नीयत हो, यह काम उसके खिलाफ जा रहा है। 
सार्वजनिक जीवन में लोगों को दो तरह की अदालतों का सामना करना पड़ता है। जनता की अदालत का, और कानून की अदालत का। जहां तक ईश्वर की अदालत का सवाल है, तो उसके बारे में आस्थावान लोग बता सकते हैं कि मरने के बाद लोगों को वहां खड़ा होना पड़ता है या नहीं, और वहां पर कोई हिसाब-किताब होता है नहीं। लेकिन जब जमीन पर कानून की अदालत कोई कार्रवाई कर रही है, तो उसके खिलाफ संसद के भीतर हंगामा खड़ा करके कांग्रेस पार्टी इस अदालत की तौहीन भी कर रही है, और संसद का वक्त भी बर्बाद कर रही है। कल के दिन संसद में कही बातों को लेकर लोग उसके खिलाफ अदालत जाने लगें, या अदालत में कही बातों को लेकर चुनावी सभाओं में जाने लगें, तो लोकतंत्र का मटियामेट ही हो जाएगा। यह मामला चूंकि कांग्रेस पार्टी के सर्वोच्च स्तर से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसके नेताओं को अपने बर्ताव को काबू में भी रखना था, और कानून की लड़ाई कानूनी औजारों से लडऩी थी। 
आज कांग्रेस ने यह मामला दायर करने वाले भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी को भाजपा का वरिष्ठ नेता करार देते हुए इस अदालती मामले को भाजपा का राजनीतिक बदनीयत का अभियान करार दिया है। पल भर के लिए यह मान भी लिया जाए कि सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा की सहमति या अनुमति से यह मुकदमा चला रहे हैं, तो भी बात तो मुकदमे के गुण-दोष पर होनी चाहिए, न कि उसके पीछे की नीयत पर। और अब जब अदालत में इसकी सुनवाई तय हो चुकी है, तब अदालत के बाहर जुबानी जमा-खर्च से यही जाहिर होता है कि कांग्रेस कानूनी रूप से कहीं कमजोर है। ऐसा है या नहीं, यह तो अदालत और वकील जानें, लेकिन ऐसी आक्रामक कार्रवाई संसद के भीतर और मीडिया के बयानों में कांग्रेस का सम्मान नहीं बढ़ा रही। 
देश में अधिकतर पार्टियों के बहुत से नेताओं को बहुत सी अदालतों में जाना पड़ता है, और कांग्रेस पार्टी का यह रूख लोगों के गले नहीं उतरेगा कि उसके नेताओं के खिलाफ कोई व्यक्ति निजी हैसियत से भी मुकदमा न करें। सुब्रमण्यम स्वामी एक बहुत ही बड़बोले और लड़ाकू नेता हैं। वे लंबे समय से जयललिता, सोनिया, राहुल, इंदिरा, राजीव जैसे कई पसंदीदा निशानों पर हमले करते आए हैं। वे भाजपा में भी हमेशा नहीं रहे, पार्टी के भीतर आते-जाते रहे हैं। इसलिए उनके इस मुकदमे को भाजपा का मुकदमा समझना भाजपा के साथ ज्यादती होगी। दूसरी बात यह कि अगर मोदी सरकार का कोई विभाग या उसकी कोई जांच एजेंसी इस मामले में अलग से कार्रवाई करती, तो भी उसे हम खारिज करने के बजाय कांग्रेस और सोनिया परिवार से उसका जवाब देने की उम्मीद करते। सार्वजनिक जीवन में हर नेता को बहुत से मामलों में जवाब देने पड़ते हैं, और उनको सही जगह पर ही जवाब देना चाहिए। संसद, अदालत, मीडिया, और चुनावी सभा, ऐसे बहुत से अलग-अलग मंच लोकतंत्र में रहते हैं, और लोगों को एक जगह की बहस को दूसरी जगह नहीं ले जाना चाहिए, खासकर जब तक वे सही जगह पर पूरा जवाब न दे दें। नेशनल हेराल्ड के मामले में अदालत में कार्रवाई अभी शुरू ही हुई है, और कांग्रेस को इतनी जल्दी हड़बड़ाकर ऐसा जाहिर नहीं करना चाहिए कि उसके नेता या तो अदालतों से ऊपर हैं, या वे अदालतों में जाना नहीं चाहते हैं। सोनिया गांधी आमतौर पर विनम्रता की बात करती हैं, लेकिन कल की उनकी प्रतिक्रिया एक आक्रामक जवाबी हमला थी कि वे इंदिरा गांधी की बहू हैं, और किसी से डरती नहीं हैं। वे इंदिरा की बहू हैं, यह एक निर्विवाद तथ्य है, और जिसने कुछ गलत न किया हो, उसे अदालत से डरने की जरूरत नहीं है, यह भी एक निर्विवाद तथ्य है। इसलिए ऐसी पैनी राजनीतिक बात कहने का कोई मौका एक अदालती कार्रवाई के सिलसिले में नहीं था, और वे ऐसा कहने से बच भी सकती थीं। फिलहाल कांग्रेस को इस मामले में संसद और सड़क का वक्त बर्बाद नहीं करना चाहिए, और अदालत में उसके सामने सारे विकल्प खुले हुए हैं। 

भारत-पाक में बातचीत हर हाल में जारी रहे...

संपादकीय
8 दिसंबर 2015

भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आज पाकिस्तान रवाना हो रही हैं, और दोनों देशों के बीच सरहद पर चलते तनाव, आतंकी हरकतों की तोहमतों के बीच होने जा रही इस बातचीत को लेकर भारत में विपक्षी पार्टियां सरकार पर चढ़ बैठी हैं। उनका आरोप है कि मोदी सरकार ने जिस नौबत को लेकर पाकिस्तान के साथ बातचीत बंद की थी, सरहद पर हमलों और आतंकी हरकतों की उन नौबतों में ऐसा क्या फर्क हो गया है कि अब बातचीत फिर शुरू हो रही है। भारत के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने इस बात पर भी सरकार पर हमला किया है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने एक तीसरे देश में पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से क्यों बात की? भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से यह भी कहा जा रहा है कि पिछले दिनों पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से एक सम्मेलन में मुलाकात के दौरान उनकी क्या बात हुई, यह संसद को बताया जाए। 
दरअसल देश के भीतर सरकार और विपक्षी दलों के बीच जो खींचतान चलती है, उसके तहत अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी एक ऐसा तनाव खड़ा किया जाता है जिससे कि देश के भीतर जनता को यह लगे कि विपक्ष चौकन्ना है, सरकार कुछ गलत कर रही है, कुछ छुपा रही है, और देश की जनता को कुछ अधिक जानने का हक है। यह बात नई नहीं है, जिस समय यूपीए की सरकार थी, और एनडीए विपक्ष में था तब भी सरकार के लिए ऐसी परेशानी खड़ी की जाती थी। लोगों को याद होगा कि नवाज शरीफ के एक निजी तीर्थयात्रा पर अजमेर आने पर नरेन्द्र मोदी ने महीनों तक आमसभाओं में यह हमला किया था कि सरहद पर जो पाकिस्तान हिन्दुस्तानी सैनिकों के सिर काट रहा है, उस पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को भारत की सरकार बिरयानी खिला रही है। कमोबेश वैसे ही तेवर दिखाने का हक आज कांग्रेस को है, लेकिन ये दोनों ही नौबतें देश के हित के खिलाफ है, और अड़ोस-पड़ोस में बसी हुई दो परमाणु ताकतों के खिलाफ भी है। 
घरेलू राजनीति के स्तर को कुछ उठने की जरूरत है। भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहें, इसमें दोनों देशों की राजधानियों में बसे ताकतवर लोगों का कुछ नहीं जाता, लेकिन फौजी खर्च में दोनों देशों के गरीब लोग भूखे मर रहे हैं, दोनों देशों में करोड़ों बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, पढ़ाई और इलाज का खर्च नहीं जुट पा रहा है, और फौजों पर अंधाधुंध खर्च हो रहा है। इसलिए हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि चाहे आतंकी हमले होते हों, चाहे सरहद पर फौजी टकराव चल रहा हो, देशों के बीच बातचीत से ये नुकसान और बढ़ नहीं सकते, घट जरूर सकते हैं, हमारा मानना है कि बातचीत हर हाल में जारी रहनी चाहिए, संगीत के कार्यक्रम, फिल्में, टीवी चैनल, क्रिकेट-हॉकी, साहित्य समारोह हर हाल में चलने चाहिए। भारत और पाकिस्तान के बीच कारोबार से भी इन दोनों देशों का भला है, और वह भी जारी रहनी चाहिए। यह बात समझने की जरूरत है कि इन तमाम रिश्तों से आतंकी और फौजी टकराहट भी घट सकती है, लेकिन जब हर किस्म के रिश्तों को तोड़ दिया जाएगा, तो फिर दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए महज आतंकी और फौजी ही बच जाएंगे। जंग के नारे सुहाने बहुत लगते हैं, लेकिन हर जंग में आम लोग मरते हैं, और खास लोग मानो शतरंज की बिसात के पीछे बैठे हुए प्यादों को आगे बढ़ाते रहते हैं। 
आज जब भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी वजह से बातचीत का सिलसिला शुरू हो रहा है, तो भारत के विपक्षी दलों को दो बरस पहले तक की विपक्षी पार्टी भाजपा के रूख की नकल करने के बजाय यह याद रखना चाहिए कि कांग्रेस के जवाहर लाल नेहरू ने धोखा खाते हुए भी पड़ोसी देशों से बातचीत जारी रखी थी, और खुद होकर किसी जंग की शुरुआत नहीं की थी। कांग्रेस को घरेलू राजनीति के चलते एक ओछापन नहीं दिखाना चाहिए, और इस बातचीत की गाड़ी के पहियों में डंडा नहीं अड़ाना चाहिए। इन दोनों देशों के तमाम लोगों को बातचीत की हिमायत करते हुए इस बारे में बोलना चाहिए और सरकारों का हौसला बढ़ाना चाहिए। सरकार पर काबिज पार्टियों से लोगों की असहमति हो सकती है, लेकिन यह याद रखना चाहिए दो देशों के बीच बातचीत राजनीतिक दल नहीं करते, सरकारों पर ही यह जिम्मेदारी रहती है, और उन्हीं का यह हक रहता है। इसलिए आज मोदी सरकार और शरीफ सरकार के बीच बातचीत को तमाम अमन-पसंद लोगों को बढ़ावा देना चाहिए। बल्कि हम तो इस बात के भी हिमायती रहेंगे कि दोनों देशों के विपक्षी दल भी आपस में बैठकर बातचीत करें, और एक व्यापक सहमति बनाकर अपनी-अपनी सरकारों के सामने एक एजेंडा रखें, जिससे कि उनकी सरकारों पर एक जनदबाव पड़ सके। 

चेन्नई से उपजे कई सवालों पर देश को आत्ममंथन की जरूरत

7 दिसंबर 2015
संपादकीय
तमिलनाडु की बाढ़ के पीछे की वजहों को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं वे बताती हैं कि नेताओं-अफसरों, और बिल्डरों ने मिलकर पिछले दशकों में राजधानी चेन्नई की जो तबाही की है, उसी का नतीजा रहा कि कुदरत की मार से शहर पर जख्म इतने अधिक आए। अदालती आदेशों के बावजूद सरकार और स्थानीय शासन ने चेन्नई शहर को बचाने की कोई कोशिश नहीं की, तालाब घटते चले गए, नाले-नालियां पटते चले गए, झील के किनारे बड़े-बड़े अवैध निर्माण हो गए, आबादी बढ़ती चली गई, और पानी की निकासी के रास्ते घटते चले गए। नतीजा यह हुआ कि तेज बारिश हुई तो देश के इस महानगर में सड़कों पर मोटरबोट चलाकर लोगों की जिंदगियां बचानी पड़ीं। 
अब जब मौतें हो रही हैं और लोग डूबे हुए हैं, तो देश के प्रधानमंत्री वहां जाकर सिवाय कुछ हजार करोड़ की मदद देने के और क्या कर सकते हैं? और वही हुआ, केंद्र सरकार ने चार हजार करोड़ रुपये तमिलनाडु को दिए, जिसका अधिकतर हिस्सा इस शहर के लिए अम्मा ब्रांड की राहत सामग्री में खर्च होगा। अब सवाल यह है कि देश के संघीय ढांचे के भीतर जब राज्य सरकार बेलगाम होकर, अपनी मनमर्जी से नियम-कानून के खिलाफ काम करेगी, और किसी आपदा के आने पर केंद्र सरकार से बड़ी-बड़ी उम्मीदें रखेगी, तो इस सिलसिले को कैसे थामा जाएगा? जब कोई राज्य हजारों करोड़ के स्मारक बनाए, और भूकंप या बाढ़ आने पर हजारों करोड़ की राहत की उम्मीद केंद्र से करे, तो ऐसे में वे राज्य बेवकूफ साबित होंगे जो कि अपने साधनों से मनमानी स्मारक नहीं बनवाते हैं। यह बात ठीक है कि भारतीय लोकतंत्र के संघीय ढांचे में राज्यों के अधिकार अधिक होने चाहिए, लेकिन क्या राज्यों की गलत कामों की मनमर्जी भी असीमित होनी चाहिए? क्या शहरी विकास और पर्यावरण के नियम तोड़कर धरती को बर्बाद करने की आजादी भी राज्यों को होनी चाहिए? क्या उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में, जहां पर कि आज लोग घास-पत्तों की रोटी बनाकर खा रहे हैं, और कुपोषण के शिकार हैं, वहां पर हजारों करोड़ के स्मारक बनने चाहिए? राज्य के समाजवादी मालिक मुलायम सिंह यादव का सौ करोड़ का जन्मदिन मनाया जाना चाहिए? आखिर राज्य की कैसी मनमानी पर केंद्र सरकार को रोक लगाने का हक होना चाहिए?
केंद्र सरकार का पैसा आसमान से आया हुआ नहीं है। इसी देश में राज्यों से पैसा केंद्र में आता है, और जरूरत के मुताबिक राज्यों को वापिस जाता है। यह एक मिलाजुला खजाना है, और राज्य अपने पैसे को मनमानी से बर्बाद करें, और फिर मानवीय जरूरत दिखाते हुए केंद्र से उम्मीद करें, तो यह संघीय ढांचे की भावना और उसकी सीमाओं के खिलाफ है। राज्य सरकारों को अपने साधनों से तो सब कुछ करने की छूट है, लेकिन राज्यों को केंद्र सरकार की मदद के पहले राज्यों की अपनी मुसीबत से उबरने की तैयारियों को भी देखने का प्रावधान भारतीय लोकतंत्र में होना चाहिए। यह सिलसिला जब लंबा चलता है, तो केंद्र सरकार या उसके मुखिया की हैसियत से प्रधानमंत्री अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं, या राजनीतिक मजबूरियों के मुताबिक अलग-अलग राज्यों को मनमर्जी से मदद वैसे ही देते हैं जैसे कि राजशाही के दिनों में राजा गले से निकालकर मोतियों की माला दे देते थे। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और केंद्र सरकार को राज्यों पर एक पर्यावरण जुर्माना लगाने का अधिकार भी होना चाहिए, क्योंकि एक राज्य का बर्बाद किया हुआ पर्यावरण उसकी सीमाओं से बाहर भी दूसरे लोगों को भी बर्बाद करता है। चेन्नई से उपजी मुसीबत और फिक्र को लेकर देश के बाकी हिस्सों को भी अपनी गलतियों पर आत्ममंथन करना चाहिए। 

रोजगार का बुरा बाजार बेहतर और काबिल बनने की बड़ी जरूरत

6 दिसंबर 2015
संपादकीय

देश की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक, टाटा स्टील, ने ब्रिटेन में अपने एक कारखाने में सात सौ से अधिक लोगों को निकालने की तैयारी कर ली है। इसी तरह दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियां बुरी तरह से छंटनी करने जा रही हैं, और बड़े-बड़े ब्रांड इस बात के लिए आए दिन खबरों में हैं। ये खबरें भी तब बनती हैं जब सैकड़ों या हजारों लोगों को एक साथ हटाया जाता है, जब थोड़े-थोड़े लोग हटते चलते हैं, या जब रिटायर होने वाले लोगों की जगह किसी और को नियुक्त नहीं किया जाता, तो कोई खबर भी नहीं बनती। कुल मिलाकर हम यह कहना चाहते हैं कि दुनिया के कामगारों और बेरोजगारों, सभी को यह समझ लेना चाहिए कि कामकाज का बाजार अब आसान नहीं रह गया है। इसकी कई वजहें हैं, और अब वे दिन लद गए, जब झंडे-डंडे लेकर मजदूर संगठन छंटनी को रोक लेते थे। आज दुनिया के अधिकतर देश ऐसी किसी छंटनी के खिलाफ नहीं हैं, जिनको रोकने से कारखाने ही बंद हो जाएं। भारत में भी दशकों तक वामपंथी सरकार के तहत चलने वाले कारखानों के बारे में जनधारणा यह है कि यूनियनबाजी के चलते यूनियनें तो बच गईं, लेकिन न कारखाने बचे, न नौकरियां बचीं।  खैर, हम अभी यूनियन और कारखाने के विवाद में जाना नहीं चाहते, क्योंकि इन दोनों के रिश्ते किसी भी देश के कानून में चाहे जैसे हों, हमारी आज की यहां की चर्चा का मकसद बेरोजगारों और कामगारों से उनके हुनर और उनकी काबिलीयत पर बात करना है।
दुनिया में रोजगार का कारोबार अभी तक तो कम्प्यूटरों का हमला झेल रहा था, अब वह रोबो के निशाने पर भी है। कारखानों में कब अधिकतर कामगारों की जगह मशीनी रोबो काम करने लगेंगे, यह अंदाज लगाना भी अब अधिक मुश्किल नहीं है। बिना किसी यूनियनबाजी के रोबो लगातार बिना रूके, बिना गलतियों के, बिना बोनस और बढ़ोतरी की मांग के काम करते रहेंगे, और कई किस्म के कारखानों में ये मालिक की भारी बचत भी करेंगे। दूसरी तरफ घर तक सामान पहुंचाने वाली बहुत सी कंपनियां द्रोन का इस्तेमाल करके डिलीवरी करना शुरू कर चुकी हैं, और आज दुपहियों पर जो लोग दौड़-दौड़कर सामान पहुंचाते हैं, उनके रोजगार विकसित देशों के महंगे बाजार में घटना शुरू हो जाएंगे।
ऐसी मिसालें अनगिनत हैं, लेकिन किसी भी कारोबार में आखिरी तक वे कामगार बचे रहेंगे जिनका काम सबसे अच्छा होगा। कोई भी कारोबार या कारखाना जब लोगों को निकालना शुरू करते हैं, तो सबसे कमजोर, या सबसे निकम्मे, सबसे गैरजरूरी को सबसे पहले निकालते हैं। आज दुनिया के बाजार में खर्च को घटाने का जो गलाकाट मुकाबला चल रहा है, उसमें किसी भी मालिक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे सामान में, तनख्वाह में, या किसी भी और खर्च में बर्बादी जारी रखें। नतीजा यह है कि लोग सबसे पहला काम गैरजरूरी लोगों से छुटकारा पाने का कर रहे हैं। कम्प्यूटरों से लेकर संचार तकनीक तक, और देश-दुनिया के आधुनिक ढांचे तक, बड़ी मशीनों से लेकर बड़ी गाडिय़ों तक, हर किस्म की चीजों से अब यह मैनेजमेंट के लिए आसान हो गया है कि कम लोगों के सहारे अधिक काम कर लिया जाए। इसलिए आज लोगों को यह ख्याल रखना चाहिए कि अगर वे अपने-आपको बेहतर नहीं बनाएंगे, अगर मेहनत और ईमानदारी से काम नहीं करेंगे, तो वे खुली सड़क पर खड़े रह जाएंगे। और छंटनी झेल रहे कारोबार किसी जरूरत से अगर नए लोगों को नौकरी पर रखते भी हैं, तो वे रोजगार के बाजार से सबसे अच्छे लोगों को छांटने की आजादी भी रखते हैं। आने वाले दिन लोगों के लिए और अधिक मुकाबले के रहेंगे, और इसके लिए जो लोग तैयार नहीं रहेंगे, वे बेरोजगार रहेंगे इसकी गारंटी है।

गैरजरूरी भड़काने और उकसाने के खतरे

5 दिसम्बर
संपादकीय

अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए पिछले कुछ हफ्तों में लगातार बयान सामने आ रहे हैं, और आरएसएस सहित बहुत से हिन्दू संगठनों के बयान ऐसे हैं, जिनका कोई नया मतलब नहीं निकलता, सिवाय इसके कि अदालती फैसला आने के बाद मंदिर बनेगा, या मंदिर बनना ही चाहिए, या मंदिर बनाकर रहेंगे, या सर्वसम्मति से मंदिर बनना चाहिए। कुल मिलाकर बात वहीं की वहीं है, और एक मुद्दे को महज कुरेदा जा रहा है, यह साबित करने के लिए कि राम मंदिर का मुद्दा अभी मुद्दा ही है, उसकी समाधि नहीं बनाई गई है। जितनी बातें अशोक सिंघल के गुजरने के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों ने कही है, उनमें न कुछ नया है, और न ही कुछ ठोस है। ये बयान महज अखबारी सुर्खियों के मार्फत इतिहास में यह दर्ज कराने के लिए दिए गए हैं कि किन-किन लोगों ने मंदिर का मुद्दा छोड़ नहीं दिया है। 
अब सवाल यह है कि यह देश और कितने तरह के उकसावे और भड़कावे धर्म के नाम पर बर्दाश्त करे? मंदिर के नाम पर, मस्जिद के नाम पर, हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर, आबादी के नाम पर, धर्मांतरण के नाम पर, आदिवासियों को वनवासी बुलाने की जिद्द के नाम पर, मंदिरों में, दरगाहों पर महिलाओं के दाखिले के नाम पर, दलितों के मंदिर-प्रवेश-रोक के नाम पर, कौन-कौन से गैरजरूरी मुद्दों के उठाकर देश के आगे बढऩे को पटरी से उतारा जा सकता है, इस पर बहुत से लोग और संगठन उतारू हैं। इसलिए उतारू हैं कि उनका खुद का अस्तित्व ऐसे ही मुद्दों को छेडऩे पर कायम रह सकता है। अगर ये मुद्दे बने न रहें, तो किसी को यह याद भी नहीं होगा कि ऐसे बड़बोले नेता, और उनके संगठन जिंदा भी हैं। और एक दूसरी आशंका यह भी है कि अगर ये लोग ऐसी भड़काऊ बातें नहीं करेंगे, तो धर्मांध और कट्टर लोगों से इनको चंदा मिलना भी बंद हो जाएगा। 
और यह बात महज हिंदुस्तान में नहीं है, दुनिया में जगह-जगह नफरतजीवी लोग ऐसा ही भड़काऊ काम करके चंदा पाते हैं, और भड़काऊ काम करके अपने-आपको जिंदा रखते हैं। आज अगर एक धर्म के दंगाजीवी लोग घर बैठ जाएं, तो दूसरे धर्म के हिंसक हमलावरों की दूकान ही बंद हो जाए। मंदिर बनाने को लेकर बिना किसी मतलब और महत्व वाले कुछ बयान आए, तो उसके खिलाफ बयान देते हुए कुछ ऐसे नाम खबरों में आए जो कि शायद बरसों से ताक पर बैठे हुए थे। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा की बातों को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसी भी भारतीय की बातों के मुकाबले अधिक ध्यान से सुनते हैं। ओबामा ने अमरीका में मुस्लिमों के खिलाफ कही जा रही आक्रामक और हिंसक बातों पर फिक्र जाहिर की है। हमें उम्मीद है कि ओबामा मोदी से फोन पर होने वाली गप-शप के दौरान अपनी इस सोच को भी बांटेंगे कि किसी एक धर्म के खिलाफ अगर देश में हिंसक बातें होती हैं, तो वे देश के हित के खिलाफ जाती हैं, और उनकी प्रतिक्रिया भी होती है। और मोदी जिस अमरीका की तरफ बार-बार देखते हैं, और अपने दोस्त बराक से फोन पर बातें करते रहते हैं, उन नरेन्द्र मोदी को भी चाहिए कि वे ओबामा से पूछें और समझें कि हिंसक बातों के खिलाफ उन्होंने ऐसी फिक्र क्यों जाहिर की है?
हमारा यह मानना है कि जिस देश को आगे बढऩा है, उसे भड़कावे और उकसावे वाली तमाम बातों से अपने को बचाना होगा, क्योंकि इंसानी मिजाज ऐसा है कि एक भड़कावे के खिलाफ दूसरा भड़कावा भड़कने को तैयार बैठे रहता है, बल्कि एक पैर पर खड़े रहता है। मोदी को यह समझना चाहिए कि भारत में आज अहिष्णुता के खतरे जो लोग गिना रहे हैं, वे लोग बदनीयत नहीं हैं, बल्कि वे देश के लिए फिक्रमंद हैं।

डिजिटल छेडख़ानी शोभा नहीं देती भारत सरकार को

संपादकीय
4 दिसंबर 2015
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेन्नई-बाढ़ के हवाई सर्वे की तस्वीर को लेकर भारत सरकार का प्रचार विभाग आलोचना के घेरे में है। हेलीकॉप्टर में बैठे मोदी के साथ की खिड़की की जगह पर डूबे हुए शहर की एक तस्वीर जोड़ दी गई, और उसे इंटरनेट पर जारी कर दिया गया। वैसे तो मीडिया में ऐसी जोड़-तोड़ आए दिन होती है, और मोदी की तस्वीर में यह सरकारी फेरबदल उसी जगह की तस्वीर जोड़कर किया गया था, जिसके साथ आसानी से यह लिखा जा सकता था कि दो तस्वीरें जोड़ी गई हैं। इससे कोई विवाद खड़ा नहीं होता। लेकिन रात-दिन प्रचार की पल-पल की हड़बड़ी ऐसी गलतियां करवा देती हैं। और फिर आज की डिजिटल टेक्नालॉजी में यह काम इतना आसान हो गया है कि फोटो एडिटिंग के एक सबसे लोकप्रिय सॉफ्टवेयर, फोटोशॉप, को अब एक ब्रांड की बजाय एक विशेषण की तरह इस्तेमाल किया जाता है। 
आज ही एक दूसरी खबर यह है कि इंटरनेट पर कुछ दूसरी समाचार वेबसाइटों पर एक विवादास्पद खबर के साथ की तस्वीर किसी एक पत्रकार के फेसबुक अकाउंट से लेकर लगाई गई है, और इस महिला पत्रकार को वहां से अपनी खबर हटवाने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ी। यह एक अलग बात है कि भारत में मौजूदा आईटी कानून बहुत ही कड़क है, और किसी के खिलाफ कुछ झूठा छप जाए, उसके मुकाबले डिजिटल तकनीक पर कुछ झूठा पोस्ट हो जाए, तो कई गुना कड़ी सजा की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन लोग अभी भी ऐसे डिजिटल-खतरों को समझ नहीं रहे हैं। हम इसी जगह पर हर कुछ महीनों में इस बारे में लिखते हैं, और ऐसी छेड़छाड़ से परे भी लोगों को इस बात के लिए आगाह करते हैं कि वे बिना जांचे-परखे दूसरे लोगों की जालसाजी को आगे बढ़ाने में मददगार न हों। 
दरअसल मोदी इस देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने डिजिटल तकनीक और संचार माध्यमों का भरपूर इस्तेमाल किया है। उनके साथ-साथ उनके समर्थक, उनके प्रशंसक, और हो सकता है कि उनके कुछ विरोधी भी, लगातार डिजिटल-धोखाधड़ी करते हुए पूरी दुनिया की जगह-जगह की कामयाबी की तस्वीरों को मोदी के गुजरात, या मोदी के कार्यकाल के साथ जोड़कर रात-दिन फैला रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता कि मोदी-भक्तों का कोई न कोई झूठ उजागर न हो रहा हो।  इससे उन अनजाने भक्तों का तो कोई नुकसान नहीं होता, क्योंकि वे बेचेहरा और बेनाम हैं, लेकिन इससे मोदी का, या वैसे किसी भी दूसरे नेता का बड़ा नुकसान होता है। और जब सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री की हैसियत से, या निजी हैसियत से नरेन्द्र मोदी ऐसे लोगों को ट्विटर पर फॉलो भी करते हैं, तो फिर वे उनकी हरकतों से अनजान रहने का फायदा भी नहीं पा सकते। दूसरे लोगों के गलत कामों से बदनामी पाने से बचने के लिए न सिर्फ प्रधानमंत्री को, बल्कि सार्वजनिक जीवन के और लोगों को भी मेहनत करनी पड़ेगी। सोशल मीडिया महज वाहवाही दिलाए, और बदनामी का खतरा बिल्कुल न दिलाए, ऐसा नहीं हो सकता। 
लेकिन आज की बात हमने जिस मुद्दे से शुरू की है, वह और गंभीर है। जब अनजान लोग डिजिटल-छेड़छाड़ या जालसाजी की तस्वीरें पोस्ट करें, तो वह तो कम खतरनाक मामला है। जब भारत सरकार में बैठे लोग ही ऐसा करने लगें, तो वह अधिक फिक्र की बात है। हम उम्मीद करते हैं कि सूचना प्रसारण मंत्रालय इस चूक को पहली और आखिरी चूक साबित करने की गारंटी करेगा। 

साइकिल की सोच अच्छी पर तैयारी की जरूरत

3 दिसंबर 2015
संपादकीय
रायपुर नगर निगम के महापौर प्रमोद दुबे ने आज से एक नया साइकिल अभियान शुरू किया है कि महीने में एक दिन लोग साइकिल चलाएं। इसके लिए जैसा कि समारोह होता है, हो गया, और अगले महीने कुछ लोगों को शायद यह बात याद रहे, और अधिकतर लोग शायद इसे भूल जाएं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि साइकिल का थोड़ा-बहुत इस्तेमाल जिंदगी के लिए कितना फायदेमंद है। गरीब तो मजबूरी में साइकिल चलाते हैं, क्योंकि उससे अधिक कुछ खरीद और चला पाना उनके बस के बाहर होता है। और संपन्न तबका या तो घर पर कसरत की साइकिल चला लेता है, या फिर महंगी साइकिल लेकर सड़क पर भी शौक से चला लेता है। लेकिन जो सबसे बड़ा मध्यमवर्गीय तबका है, उसमें साइकिल का चलन बहुत कम है। साइकिल को बढ़ावा देने की सोच अच्छी है, लेकिन उसके साथ की दिक्कतों, और उसके खतरों को समझना पड़ेगा। 
आज जितनी लापरवाही से लोग गाडिय़ां चलाते हैं, उस पर राजधानी की पुलिस का भी कोई काबू जब नहीं है, तब यह उम्मीद करना खतरनाक होगा कि लोग साइकिल चलाएंगे, और तेज रफ्तार गाडिय़ां आकर उनके लिए खतरा खड़ा नहीं करेंगी। ऐसी नौबत में लोग अगर पर्यावरण की सोचकर, या अपनी सेहत की सोचकर महीने में एक दिन या हफ्ते में कुछ घंटे साइकिल की सोचें भी, तो भी सड़कें और ट्रैफिक उसके लायक नहीं है। दुनिया के सबसे विकसित शहरों में से एक लंदन में वहां के मेयर ने साइकिलों का ऐसा विशाल ढांचा तैयार किया कि लोग हर महीने एक छोटा सा भाड़ा देकर कहीं से भी साइकिल उठा सकते हैं, और कहीं पर भी छोड़ सकते हैं। लेकिन उसके लिए वहां की सड़कों के किनारे एक साइकिल ट्रैक अलग से रहता है, और यही वजह है कि योरप में लोग खूब साइकिलें चलाते हैं। वहां के सैलानी एक देश से दूसरे देश जाते हुए भी ट्रेन में अपनी साइकिलें ले जाते हैं, और दूसरे देश पहुंचते ही उन पर घूमना शुरू कर देते हैं। अमरीका के भी बहुत से शहरों में सिटी बसों में साइकिलों के लिए अलग से जगह रहती है, और लोग उन पर साइकिल रखकर ले जाते हैं। 
हमने पहले भी एक सुझाव दिया था कि राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को हर तरह की साइकिलों पर से हर तरह का टैक्स हटा देना चाहिए। उससे गरीब को एक राहत मिलेगी, और जो लोग महंगी साइकिलें खरीदते हैं, हो सकता है वे अपनी महंगी गाडिय़ों को कुछ देर राहत दें, और उससे सड़कों पर भीड़ और प्रदूषण घटेंगे। दूसरा इंतजाम राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं को करना पड़ेगा कि सार्वजनिक जगहों पर साइकिलों को बांधकर ताला लगाने के लिए लोहे के पुराने परंपरागत ढांचे बनाकर रखे जाएं, ताकि लोग साइकिल रखने का हौसला कर सकें। इसके बिना लोग साइकिल लेकर निकल भी जाएं, तो उसके चोरी हो जाने का खतरा बने रहेगा। आज सार्वजनिक जगहों पर साइकिल रखने का इंतजाम सबसे ही कमजोर रखा जाता है क्योंकि कोई ताकतवर लोग तो साइकिल पर आते नहीं हैं। जिस तरह शहर में अलग-अलग खेलों के मैदान या स्टेडियम हैं, उसी तरह एक साइकिल ट्रैक बनाना चाहिए जिस पर खिलाड़ी और आम लोग साइकिल चलाने का अपना शौक पूरा कर सकें, और उससे धीरे-धीरे सड़कों पर भी साइकिल की उनकी आदत बने।
हम इसे एक अच्छी शुरुआत मानते हैं, और लोगों को इससे जुडऩा चाहिए। साथ ही यह बात अकेले रायपुर शहर तक सीमित रहने से नहीं बनेगी, इसमें राज्य सरकार को बाकी प्रदेश के लिए भी बुनियादी सहूलियतें जुटानी चाहिए। और सबसे पहले शुरुआत तो सरकार साइकिल टैक्स खत्म करके कर ही सकती है। 

चेन्नई या मुंबई की बाढ़ से तबाही, सीखने की जरूरत

संपादकीय
2 दिसंबर 2015

तमिलनाडू से राजधानी चेन्नई के बारिश और बाढ़ में बुरी तरह डूब जाने की खबरें आ रही हैं, और अभी वहां अगले दो-तीन दिन बारिश और जारी रहने की चेतावनी भी मौसम विभाग ने दी है। पिछले कई दिनों से तमिलनाडू में बारिश और बाढ़ से बड़ी संख्या में लोग मारे गए, और चेन्नई शहर खासकर बुरी तरह प्रभावित हुआ। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले मुंबई शहर इसी तरह डूबा था, और इमारतों के तलघर तो पूरी तरह डूब ही गए थे, ग्राउंड फ्लोर पर भी कई फीट पानी भर गया था, आज चेन्नई का हाल उससे भी बुरा दिख रहा है। अब यहां पर दो-चार बातों को मिलाकर सोचने की जरूरत है, और इन महानगरों से परे भी बाकी देश में भी इस बारे में सोचना चाहिए। 
जहां-जहां शहरीकरण हो रहा है, वहां-वहां पानी को सोखने लायक खुली जमीन तेजी से खत्म हो रही है, और कांक्रीट के ढांचे बारिश के पानी को सिर्फ इक_ा कर पाते हैं, निकाल नहीं पाते। फिर जैसा कि मुंबई के मामले में सामने आया था, वहां पर सारी भूमिगत नालियां प्लास्टिक के कचरे से पूरी तरह बंद थीं, और पानी के निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था। देश भर में जगह-जगह शहरीकरण से जो कचरा इक_ा हो रहा है, उसकी रफ्तार बढ़ती चल रही है, दूसरी तरफ पानी के निकलने के जो पुराने नाले-नालियां हैं, वे कचरे से बंद होते चल रहे हैं। शहरीकरण में जो नए इलाके विकसित हो रहे हैं, ताकतवर और संपन्न तबका वहीं बस रहा है, और वहां पर तो पानी आने-जाने के रास्ते ठीक है, लेकिन पुराने इलाके हर शहरों में डूब रहे हैं, बारिश के पानी भी डूब रहे हैं, और ताजा कचरे में भी डूब रहे हैं। 
अब यहां पर यह भी सोचने की जरूरत है कि लोग कितना कचरा इक_ा करते हैं, उसे कैसे फेंकते हैं, और उसके निपटारे का स्थानीय म्युनिसिपल के पास क्या तरीका है? यहां पर तस्वीर बड़ी निराशाजनक है, क्योंकि बढ़ती आबादी, बढ़ती संपन्नता, और बढ़ते कचरे की रफ्तार से निपटारे की पुरानी रफ्तार का कोई मेल नहीं बैठता। दूसरी बात यह कि मौसम अब अधिक दगाबाज हो गया है। बारिश के ही नहीं, गर्मी और सर्दी के मौसम भी अपनी तेज मार के नए रिकॉर्ड कायम कर रहे हैं। मौसम का जो सर्वाधिक रिकॉर्ड रहते आया था, वह अब बदल भी रहा है, और अब जरा सी देर में बहुत तेज बारिश होकर किसी भी शहर को डुबा देती है। इस मौसम में कोई बदलाव लाना पूरी दुनिया के सामूहिक सहयोग से हो सकता है, लेकिन वह किसी शहर के बस की बात नहीं है। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि शहरीकरण की योजनाएं मौसम की अभूतपूर्व बुरी मार का अंदाज लगाकर ही बनाई जाएं, न कि पुराने रिकॉर्ड देखकर। मौसम ने इंसानों से कोई रिश्वत नहीं खाई हुई है कि वह उस पर हमेशा मेहरबान रहे, और खासकर जब इंसान कुदरत पर कूद-कूदकर लात मारते हों, तो कुदरत की क्या बेबसी है कि वह इंसान पर मेहरबान रहे? 
शहरीकरण की तेज रफ्तार और उसका विकराल आकार स्थानीय म्युनिसिपल की सोच और उसकी कूबत दोनों से परे की बात हो चुके हैं। अब शहरी कचरे के तेज रफ्तार निपटारे के साथ-साथ, शहरों से पानी की तेज रफ्तार निकासी का इंतजाम जब तक नहीं किया जाएगा, देश के शहर कभी भी डूब जाएंगे, और अगली बारिश आने तक भी लोगों के निजी नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी। मुंबई या चेन्नई में जिन लोगों के घर कई-कई फीट पानी में डूबे हुए हैं, उनके सामानों का जो नुकसान सूखने तक हो चुका रहेगा, उससे लोग उबर नहीं पाएंगे। देश की सरकार, राज्यों की सरकारें, और शहरों की म्युनिसिपालिटी टुकड़े-टुकड़े में सोच रही हैं, और टुकड़े-टुकड़े में योजनाएं बना रही हैं। कुदरत की मार से निपटने के लिए इस तरह के काम से काम नहीं चलेगा। लोगों को यह भी याद रखना पड़ेगा कि अब महज हर बरस की बाढ़ वाले इलाकों में ही बाढ़ नहीं आती, अब तो नए-नए किसी भी इलाके में कितनी भी बाढ़ आ जाती है, और हर किसी को ऐसी नौबत के लिए तैयार रहना पड़ेगा, और इसकी बुनियादी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर है।

झूठ को फैलाना भी आसान और झूठ को परख लेना भी

संपादकीय
1 दिसंबर 2015

लोकसभा में कल वामपंथी सांसद मोहम्मद सलीम ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर कहा था कि 8 सौ बरस बाद भारत को एक हिन्दू राजा मिला है। राजनाथ सिंह ने इसे अपने संसदीय जीवन का सबसे तकलीफदेह दिन बतलाया, और कहा कि अगर उन्होंने ऐसा बयान दिया होता, तो वे एक पल भी भारत के गृहमंत्री रहने के लायक नहीं रहते। दरअसल मोहम्मद सलीम ने आउटलुक पत्रिका के ताजा अंक में छपी एक रिपोर्ट में राजनाथ सिंह के नाम से लिखे गए इस बयान को देखकर संसद में मुद्दा उठाया था, और यह बयान दरअसल विश्व हिन्दू परिषद के गुजर चुके अध्यक्ष अशोक सिंघल ने दिया था, राजनाथ सिंह ने नहीं। पत्रिका ने इस बात के लिए गृहमंत्री से माफी मांगी है, लेकिन वामपंथी सांसद ने इस पर माफी मांगने से इंकार कर दिया है, उनका कहना है कि उनकी बात सदन की कार्रवाई में शामिल ही नहीं की गई थी, इसलिए उनके लिए माफी मांगना जरूरी नहीं है। 
वैसे तो पत्रिका के माफीनामे के बाद यह बात आई-गई हो जाती है, लेकिन हम इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि आज लोगों के नाम से सौ तरह की बातें प्रचार पाती हैं, जिनमें से कुछ बातें उनकी कही हुई होती हैं, और कई बातें उनकी कही हुई नहीं होतीं। आज के डिजिटल युग में यह आसान है कि किसी भी बात के सच या झूठ होने के लिए इंटरनेट पर उसे तलाश लिया जाए, और अधिकतर बातों की परख भी हो जाती है, लेकिन संसद में किसी मुद्दे को उठाने के पहले लोगों को इतनी मामूली छानबीन इसलिए कर लेनी चाहिए कि झूठ होने पर न सिर्फ किसी और की साख चौपट होती है, बल्कि अपनी खुद की साख भी खराब होती है। और संसद का महंगा वक्त भी जाया होता है। यह एक अलग बात है कि जब राजनाथ सिंह के समविचारक अशोक सिंघल ने ऐसी बात कही थी, तो राजनाथ सिंह ने शायद उसका कोई विरोध भी नहीं किया था, लेकिन उतने भर से उनकी न कही बात उनके नाम से जोडऩा पूरी तरह नाजायज है। 
आज लोग धड़ल्ले से झूठी तस्वीरें, झूठी जानकारी, झूठे बयान गढ़कर, डिजाइन करके, इंटरनेट और फोन पर चारों तरफ फैलाने में लगे रहते हैं। लोगों को कोई भी जानकारी आगे बढ़ाने के पहले उसकी सच्चाई को खुद भी परख लेना चाहिए, क्योंकि झूठ जब पकड़ाता है, तो उसे फैलाने वाले तमाम लोगों की साख भी चौपट होती है। यह बात हम संसद से परे भी इसी जगह कई बार लिख चुके हैं कि टेक्नालॉजी जितनी सहज और आसान हो गई है, बातों को फैलाना जितना सरल हो गया है, उनको परखने की जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी हो गई है। आज जो लोग किसी विचारधारा के बड़े समर्थक हैं, या बड़े विरोधी हैं, वे सच और झूठ की परवाह किए बिना अपनी पसंद की जानकारी को फैलाते चलते हैं। इन लोगों को यह भी समझना चाहिए कि झूठ के सहारे कोई लंबी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती, और जब कतरा-कतरा झूठ भी पकड़ में आ जाता है, तो उससे अच्छे-भले मुद्दे भी चौपट हो जाते हैं। बहुत पहले कुछ महान लोगों ने यह बात कही थी कि मकसद ही नहीं, राह भी सही होनी चाहिए। इस बात को आज के सोशल मीडिया के जमाने में खास याद रखने की जरूरत है कि जो लोग किसी मकसद से झूठ पोस्ट करते हैं, वे सबसे पहले तो अपने मकसद को ही हरा देते हैं। जिस किसी मकसद के साथ झूठे लोग जुड़ जाते हैं, लापरवाह जुड़ जाते हैं, उस मकसद को विरोधियों या दुश्मनों की जरूरत ही नहीं रहती, ऐसे झूठे साथी ही काफी रहते हैं। 
आज इंटरनेट पर मामूली तलाश से ही किसी बात की सच्चाई की परख हो सकती है। लोगों को, खासकर जिम्मेदार लोगों को ऐसी जिम्मेदार सोच को बढ़ावा देना चाहिए, और अपने इर्द-गिर्द के लोगों को यह समझाना भी चाहिए कि वे किस लापरवाही से किस झूठ को फैला रहे हैं, और एक दिन ऐसा भी हो सकता है कि वे खुद, उनका परिवार ऐसे किसी झूठे प्रचार का शिकार हो जाएं। 

मंदिर से लेकर दरगाह तक दुत्कारी जा रही हैं महिलाएं

संपादकीय
30 नवंबर 2015

अभी दक्षिण भारत का एक मंदिर खबरों में बना ही हुआ था कि वहां पर महिलाओं को माहवारी के दौरान घुसने से किस तरह रोका जा रहा है, कि इसी दौरान कल महाराष्ट्र के एक प्रमुख मंदिर शनि शिंगणापुर की खबर आई कि वहां परंपरा के खिलाफ जाकर एक महिला ने शनि प्रतिमा पर तेल चढ़ा दिया, और वहां से निकल गई। इसके बाद मंदिर के सेवादारों को निलंबित कर दिया गया है, और मूर्ति के शुद्धिकरण में भक्तजन और पुजारी जुट गए हैं। यह बात सिर्फ इन्हीं गिने-चुने मंदिरों की नहीं है, देश में जगह-जगह कई मंदिरों में ऐसा हाल है, और नए बने हुए ताजा मंदिरों में स्वामिनारायण सम्प्रदाय के मंदिर या आश्रम का हाल है जहां स्वामी के सामने महिलाओं को जाने की इजाजत भी नहीं है, और उन्हें इस तरह दूर रखा जाता है कि वहां के स्वामी की नजर भी महिलाओं पर न पड़े। लेकिन यह मामला सिर्फ हिन्दू धर्मस्थलों का हो ऐसा भी नहीं है। अभी मुंबई हाईकोर्ट में यह केस चल ही रहा है कि वहां की प्रमुख और एक विख्यात हाजी अली दरगाह पर महिलाओं को जाने नहीं मिलता। दरगाह ट्रस्ट ने हाईकोर्ट में यह तर्क दिया है कि इस्लाम में महिलाओं का कब्र के करीब जाना गुनाह माना गया है, और उन्हें दूर से ही कब्र देखने की इजाजत है। 
हम हिन्दू या मुस्लिम धर्म की बात किए बिना मोटे तौर पर धर्मों के नजरिए की बात करते हैं जो कि महिलाओं को, नीची करार दी गई जातियों, गरीबों, या कमजोर लोगों के खिलाफ रहता है। धर्म ताकतवर को सलाम करता है, और कमजोरों को दुत्कारता है। धर्म को इसी हिसाब से, और इसीलिए ही बनाया गया था, और वह आज हजारों बरस बाद भी इस मकसद को एक वफादार औजार या हथियार की तरह पूरा कर रहा है। लेकिन दिक्कत यह है कि हिन्दू समाज में जिन दलितों को दुत्कारा जाता है, जिनके मंदिर घुसने पर उन्हें मार दिया जाता है, जिन्हें गैरदलित-ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोग छूते भी नहीं हैं, उन्हीं के हिन्दू धर्म में शामिल बने रहने के लिए बहुत से दलित मरे पड़े रहते हैं। होना तो यह चाहिए कि दलित ऐसे धर्म का धिक्कार करें, जो कि उनको लात मारता है। लेकिन सैकड़ों पीढिय़ों से धर्म की जो दहशत चली आ रही है, उससे न दलित आजाद हो पाते, न ही महिलाएं आजाद हो पातीं। हिन्दू धर्म में तो अधिकांश धार्मिक कर्मकांड का बोझ महिलाओं पर ही रहता है, और बहुत से त्यौहारों पर वे कई गुना अधिक काम करती हैं, और पति के लिए भूखे रहकर उपवास भी करती हैं। हिन्दू धर्म का कोई रीति-रिवाज यह समानता नहीं बताता कि कभी आदमी भी अपनी औरत के लिए उपवास करे।
आज समाज में उन तमाम तबकों में एक जागरूकता की जरूरत है जो कि धर्म के मारे हुए जख्मी हैं। मुस्लिम समाज में धर्म का नाम लेकर महिलाओं के साथ जो गैरबराबरी होती है, उससे भी मुस्लिम महिलाओं को बाहर निकलने की जरूरत है। इस देश में सुप्रीम कोर्ट ने एक समय शाहबानो को उसका हक दिलाने का फैसला दिया था, और राजीव गांधी की ताकतवर सरकार ने अपने संसदीय बाहुबल का बेजा इस्तेमाल करके कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। आज एक बार फिर अदालत से लेकर मुस्लिम समाज तक यह चर्चा उठ रही है कि मुस्लिम आदमी को एक से अधिक शादी की छूट, और अपनी बीवी को तीन शब्दों के तलाक से छोड़ देने की छूट का क्या किया जाए? अभी देश की कुछ अदालतों ने ये सवाल उठाए हैं कि केन्द्र सरकार को इस बारे में इसलिए सोचना चाहिए कि मुस्लिम महिला भी इस देश की नागरिक है और उसके बुनियादी अधिकारों को मुस्लिम विवाह कानून कुचलता है। 
भारत में आज माहौल गर्म है। ऐसे में हर तबके के भीतर के लोगों को ही अपने सामाजिक सुधार के लिए आगे आना पड़ेगा, और आवाज उठानी पड़ेगी। आज समाज के किसी दूसरे तबके के लोग अगर समाज सुधार सिखाना चाहेंगे, तो उसका भारी विरोध होने लगेगा, और विपरीत प्रतिक्रिया होगी। राजा राममोहन राय ही सतीप्रथा के खिलाफ सामाजिक आंदोलन चला पाए थे, कोई मुस्लिम वह काम नहीं कर सकता था। इसी तरह मुस्लिम समाज में जो सुधार जरूरी हैं, जो लोकतांत्रिक बराबरी जरूरी है, उसके लिए मुस्लिमों के बीच से ही आवाज उठनी जरूरी है। मंदिर हो या दरगाह, वहां पर बराबरी के लिए बात होनी चाहिए, और जो धर्म के ठेकेदार हैं, उनको भी बदलते हुए वक्त की हवा देखकर एक उदारता सीखनी चाहिए। हमारा तो यह मानना है कि महिलाएं हों या दलित, जिसको भी दुत्कारा जाता है, उनको धर्म से परे देखना और सोचना चाहिए, जब धर्म अपनी आबादी खोने लगेंगे, तो ही अपने आपको सुधारेंगे।