सरकारी खर्च पर धर्म को बढ़ावा लोकतंत्र-विरोधी

संपादकीय
7 अप्रैल 2016

महाराष्ट्र हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने वहां पर भाजपा-प्रशासित म्युनिसिपल द्वारा एड्स को रोकने के लिए करवाए जा रहे हनुमान-चालीसा पाठ को लेकर कड़ी फटकार लगाई है, और कहा है कि क्या भारत सिर्फ हिन्दुओं का है? धर्म को लेकर सरकार का इस्तेमाल भारत में कोई नई बात नहीं है, और नेहरू के बाद से देश की कई सरकारें, और कई प्रदेशों की सरकारें धर्म को सिर पर बिठाए चली आ रही हैं। पुराने लोगों को याद होगा कि जब पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से ब्राम्हणों के पैर धोने का काम किया तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इससे असहमति जाहिर करते हुए नाराजगी जताई थी। लेकिन इंदिरा गांधी के आने के बाद धीरेन्द्र ब्रम्हचारी से लेकर देवरहा बाबा तक, और अनगिनत मंदिर-दरगाहों तक प्रधानमंत्री और सत्ता पर बैठे बाकी लोगों का जाना-आना लगे रहा। निजी आस्था को सार्वजनिक प्रदर्शन का सामान बनाया गया, और फिर उसे सरकारी खर्च से किए जाने लगा।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम हज यात्रा के लिए केन्द्र सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी सहित किसी भी धर्म पर होने वाले सरकारी खर्च के खिलाफ लिखते आए हैं। सरकारी बंगलों पर सरकारी खर्च से रमजान के दौरान होने वाली इफ्तार दावतों के खिलाफ भी हमने लिखा है। लेकिन वोटों की राजनीति में जनता को बहलाए रखने के लिए राजनीतिक दल और नेता धर्म से बेहतर और कोई तरीका नहीं जानते, और ऐसे बहलाने के लिए सरकारी फिजूलखर्च से बेहतर भला और कौन सा तरीका हो सकता है? लोगों को याद होगा कि मध्यप्रदेश में जब उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री निवास में एक मंदिर बनवाया, बल्कि मुख्यमंत्री दफ्तर की सरकारी मेज पर किसी हिन्दू देवी-देवता की प्रतिमा भी फूलों से लदी हुई सजा दी थी। अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग धर्म के दबदबे, और उनके लोगों की बहुतायत को देखते हुए यह सिलसिला चलते रहता है। इसलिए अब जब नागपुर में एड्स की जागरूकता के लिए, या एड्स की रोकथाम के लिए जब एक विशाल सार्वजनिक कार्यक्रम में हनुमान चालीसा का पाठ करवाया जा रहा है, तो अदालत चाहे इस पर नाराजगी जाहिर करे, राजनीतिक दलों में वामपंथियों को छोड़कर भला और किसका यह नैतिक अधिकार बचा हुआ है कि वे विरोध कर सकें?
राजनीति और धर्म का घालमेल अपने आपमें जानलेवा है, और जब इसमें सरकारी खर्च की सुविधा और जुट जाती है तो फिर भला क्या बचता है। लेकिन अदालतों का सकारात्मक आलोचना का यह रूख ही देश को बचा सकता है। एक धर्म पर सरकारी खर्च की देखादेखी से फिर दूसरे धर्मों की उम्मीदें जागेंगी, और कुपोषण के शिकार इस देश में भूखे बच्चों के दूध को प्रतिमाओं पर बहाया जाएगा। सरकार को हर धर्म से दूर रहना चाहिए, बजाय इसके कि वह हर धर्म को खुश रखने को खर्च करके अपने आपको धर्मनिरपेक्ष साबित करे। सब पर खर्च करके धर्मनिरपेक्ष साबित करने के बजाय किसी भी धर्म पर कुछ भी खर्च किए बिना धर्मनिरपेक्ष साबित करना बेहतर है, और वही सही है। फिर इन दिनों तो देश में जिस तरह से सत्तारूढ़ पार्टी अपनी पसंद के धर्म को खुलकर बढ़ावा दे रही है, और उस रंग को ओढ़कर सरकारी खर्च पर आस्था का प्रदर्शन कर रही है, वह लोकतंत्र के बिल्कुल ही खिलाफ है। 

महाराष्ट्र विधानसभा में बोई नफरत के कांटे श्रीनगर एनआईटी तक

संपादकीय
6 अप्रैल 2016

जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में एनआईटी के छात्रों में तनाव फैला हुआ है। इसकी शुरुआत भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले दिनों हुए क्रिकेट मैच के दिन से शुरू हुई बताई जाती है। और अब वहां पर प्रदेश के बाहर से गए हुए और वहां पढ़ रहे छात्रों का एक जुलूस तिरंगा झंडा लेकर कॉलेज अहाते से बाहर निकल रहा था, और कश्मीर की पुलिस ने उन्हें इस तर्क के साथ रोकने की कोशिश की कि बाहर उनकी हिफाजत करना मुमकिन नहीं होगा। यह जवाबी कार्रवाई छात्र इसलिए कर रहे थे कि क्रिकेट मैच के बाद कॉलेज कैम्पस में कुछ छात्रों ने पाकिस्तान का झंडा लहराया था, और इसके जवाब में गैरकश्मीरी छात्र तिरंगे झंडे के साथ विरोध कर रहे थे। कॉलेज में कक्षाओं का बहिष्कार चल रहा है, और इम्तिहान ठप्प हो गए हैं। केन्द्र की भाजपा-अगुवाई वाली सरकार नाजुक कश्मीर में महबूबा-अगुवाई वाली सरकार में जूनियर भागीदार है, और केन्द्र-राज्य के ऐसे राजनीतिक गणित के चलते यह बात मोदी सरकार के लिए एक परेशानी की है।
कश्मीर में एनआईटी खासा पुराना कॉलेज है, और देश के बाकी एनआईटी की तरह, बाकी प्रमुख कॉलेजों की तरह यहां पर भी प्रदेश के बाहर के छात्र-छात्राओं का कोटा रहता है। इससे देश भर में राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है, क्योंकि सभी प्रदेशों और जाति-धर्मों के बच्चे साथ रहते हैं, साथ पढ़ते हैं। अब कश्मीर में दो दिन पहले ही परेशानी के बाद सरकार बनी है, और यह ताजा तनाव बढ़ गया है।
कश्मीर के लोगों के बीच पाकिस्तान के झंडे के कभी-कभी दिखने की बात नई नहीं है, और उसी एक बात को लेकर तनाव या टकराव अगर कॉलेज से शुरू हो रहा है, तो वह सड़कों के तनाव के मुकाबले कुछ अलग किस्म का है, और कुछ अधिक खतरनाक भी है। ऐसी नौबत से बचा जाना चाहिए। हम कॉलेज कैम्पस में राजनीतिक जागरूकता के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि हमने जेएनयू के मामले में छात्र-छात्राओं की राजनीतिक चेतना की तारीफ भी की है। लेकिन कश्मीर में अगर जान के खतरे की कीमत पर ऐसा टकराव होता है, तो पूरे देश में उसके बड़े बुरे नतीजे होंगे। नफरत की दुनिया देखती नहीं है, और हिंसा को बढ़ाते चलती है। कश्मीर में अगर किसी गैरकश्मीरी छात्र-छात्रा के साथ हिंसा हुई, तो देश भर में जगह-जगह कश्मीरी छात्र-छात्राओं के खिलाफ हिंसा हो सकती है, और यह नौबत बहुत खतरनाक होगी।
भारत पहले भी कई तरह के क्षेत्रीय, धार्मिक, और जातीय भेदभाव और टकराव के तनाव के बीच एक राष्ट्र बने हुए चल रहा है। कभी मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ दोनों ठाकरे हिंसक बातें करते हैं, तो कभी कर्नाटक जैसे विकसित राज्य में उत्तर-पूर्व के लोगों को मारा जाता है। देश की राजधानी दिल्ली में भी उत्तर-पूर्व के लोग आए दिन पीटे जाते हैं, और पिछले दिनों राजस्थान के एक हॉस्टल में कश्मीरी छात्रों पर जबर्दस्ती पुलिस कार्रवाई की गई थी। लेकिन कोई अगर यह सोचे कि देश भर में साम्प्रदायिकता भड़काई जाएगी, और जाति या धर्म के आधार पर, धार्मिक आस्था के आधार पर लोगों को गद्दार और देशद्रोही करार दिया जाएगा, और उसका असर छात्र-छात्राओं पर नहीं पड़ेगा, तो ऐसा मुमकिन नहीं है। हम बार-बार इस जगह पर देश के इस खतरे के खिलाफ आगाह करते रहते हैं, और जिन प्रदेशों में ऐसे साम्प्रदायिक तनाव नहीं हैं, वे प्रदेश विकास देख भी रहे हैं। भारत में अगर आर्थिक विकास की जगह आक्रामक राष्ट्रीयता और कट्टर धर्मान्धता से फली-फूली नफरत को बढ़ावा दिया जाएगा, तो उसके नुकसान मौजूदा केन्द्र सरकार के कार्यकाल के खत्म होने के बरसों बाद तक होते रहेंगे।
कश्मीर में छात्रों के झंडों और पुलिस के डंडों के टकराव को अगर एक मामूली पुलिस समस्या मानकर छोड़ दिया जाएगा, तो इससे देश का बड़ा नुकसान होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश में नफरत घटाने की कोशिश करनी चाहिए, कश्मीर में यह टकराव मोदी की पार्टी के लिए एक अधिक बड़ी समस्या है, क्योंकि देश भर में कश्मीर की पीडीपी-भाजपा सरकार को लेकर यह सवाल तो पूछा ही जा रहा था कि जिस तरह भाजपा के मंत्री-मुख्यमंत्री भारत माता की जय को लेकर देश में गद्दारी के सर्टिफिकेट बांट रहे हैं, क्या महबूबा मुफ्ती से भी भाजपा यह नारा लगवाकर उनको कोई सर्टिफिकेट देगी? हमारा यह मानना है कि राष्ट्रीयता के ये ताजा फतवे श्रीनगर की एनआईटी के ताजा तनाव के पीछे हैं, और केन्द्र और राज्य सरकार को, उनमें शामिल राजनीतिक दलों को नफरत घटाने की बात करनी चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि महाराष्ट्र की विधानसभा में नफरत बोई जाए, और उसके कांटे श्रीनगर की एनआईटी तक न पहुंचें।

राष्ट्रीय जनजाति आयोग बस्तर के बलात्कार की शिकायतें खुद सुन आया

संपादकीय
5 अप्रैल 2016

राष्ट्रीय जनजाति आयोग के अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव ने बस्तर के बीजापुर का दौरा करने के बाद, वहां महिलाओं से मुलाकात करने के बाद कहा कि जिन सात महिलाओं ने सुरक्षाबलों के जवानों द्वारा बलात्कार की शिकायत की थी, उन सभी ने यह बात दोहराई है। उन्होंने जिले की पुलिस द्वारा इस मामले की जांच का भी विरोध किया कि इससे निष्पक्ष जांच की संभावना नहीं रहती। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की टीम  बीजापुर जिले के बासागुड़ा में आदिवासी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार के मामले की जांच के लिए आई थी। आयोग के अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ने माना कि महिलाओं के साथ मारपीट और यौन उत्पीडऩ की घटना हुई है। आयोग ने घटना की जांच सीआईडी से कराने की अनुशंसा की है। साथ ही साथ इस तरह की घटना को रोकने के लिए महिला पुलिस के साथ सर्चिंग का सुझाव दिया। आयोग के अध्यक्ष ने यह भी कहा कि कानून कहता है कि यदि रेप पीडि़त कहे कि उसके साथ रेप हुआ है तो उसे मानना चाहिए।  श्री उरांव ने कहा कि सातों महिलाओं ने रेप होने की बात कही है। विधानसभा में भी यह मामला उठा था। कांग्रेस सदस्यों ने इस पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की थी। गृहमंत्री अजय चंद्राकर ने एसपी से जांच कराने का आश्वासन दिया था, जिससे सदस्य संतुष्ट नहीं हुए और सदन से वॉकआउट कर दिया।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में देश के आधा दर्जन और राज्यों की तरह दशकों से नक्सलियों की मौजूदगी है, और उनकी बंदूकों-बमों के मुकाबले पुलिस और दूसरे सुरक्षाबलों के जवान भी वहां तैनात हैं। टकराव वाले किसी भी ऐसे इलाके में जब बरसों तक गोलीबारी चलती है, तो जिंदगी और मौत के नीचे किसी भी और बात का महत्व घट जाता है। बस्तर में भी इन दोनों तरफ से मानवाधिकार की हत्या के आंकड़े इंसानी हत्या के आंकड़ों के मुकाबले सैकड़ों गुना अधिक होंगे। दिक्कत यह है कि एक तरफ जब बस्तर के बेजुबान आदिवासियों की तरफ से कुछ लोग सुरक्षाबलों की ज्यादती के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो उन्हें नक्सल समर्थक करार दे दिया जाता है। दूसरी तरफ जब लोग नक्सलियों की हिंसा के खिलाफ कोई कड़ी बात करते हैं, तो उन्हें सरकारी दलाल मान लिया जाता है। हमारे जैसे लोगों के साथ दिक्कत यह है कि हम समय-समय पर इन दोनों तोहमतों को झेलते रहते हैं।
लंबी लड़ाई वाले इलाकों में यह खतरा रहता है कि वहां के लोगों से किसी एक खेमे में शामिल होने की उम्मीद की जाती है, और वहां पर ईमानदार निष्पक्षता की गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती। लोगों को मालूम होगा कि जब किसी देश की फौज किसी दूसरे देश में जाकर कार्रवाई करती है, तो उस फौज के साथ चलने वाले मीडिया के लोग इम्बेडेड-जर्नलिस्ट कहलाते हैं, यानी साथ में जड़े हुए पत्रकार। आज बस्तर में भी पुलिस मीडिया से यही उम्मीद कर रही है कि वह एक राष्ट्रवादी ताकत की तरह पुलिस के साथ चले, साथ रहे, साथ दे। और जो लोग ऐसा नहीं करते हैं, वे बस्तर में न रहें। ऐसी नौबत का ही यह नतीजा है कि सुरक्षाबलों के लोग बलात्कार करते चलते हैं, और उनकी इन हरकतों को छुपाने-दबाने में इन सुरक्षाबलों के अफसर कुछ हद तक कामयाब हो जाते हैं। हम यहां पर बस्तर में काम कर रहे, और जोखिम के साथ जी रहे जवानों को याद दिलाना चाहेंगे कि उत्तर प्रदेश में अभी-अभी कल ही दर्जनों पुलिसवालों को एक मुठभेड़ हत्या के दशकों पुराने मामले में उम्रकैद की सजा हुई है। इसलिए वर्दीधारी लोग जुर्म करके भी हर बार बच नहीं सकते। हम बिना जांच किसी को मुजरिम नहीं ठहरा रहे, लेकिन यह जरूर याद दिला रहे हैं कि नक्सली तो अपने जुर्म के लिए किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारी होने के नाते सुरक्षाकर्मी तो अपनी खुद की हिफाजत के लिए किसी भी तरह के जुर्म से बचें। राज्य सरकार को बस्तर की पुलिस, वहां मौजूद सुरक्षाबलों की हरकतों के बारे में फिर से सोचना चाहिए, क्योंकि एक हद से अधिक बढऩे पर सरकार खुद इन बातों के लिए जिम्मेदारी मानी जाएगी, उस वक्त यह महज अनदेखी नहीं कहलाएगी।

बेकसूर देशभक्तों को गद्दार कहकर आखिर भेजेंगे कहां?

संपादकीय
4 अप्रैल 2016

दुनिया में सबसे ताकतवर मुस्लिम देश सऊदी अरब, जहां पर कि हज यात्रा करने के लिए दुनिया भर के मुस्लिम मक्का जाते हैं, वहां पहुंचे हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वहां के शासक को भारत की पहली मस्जिद की सोने से बनाई हुई नकल तोहफे में दी। यह एक बड़ी सूझ-बूझ का नमूना है कि केरल में सैकड़ों बरस पहले की इस मस्जिद के पहले ढांचे की ऐसी कॉपी बनाकर उसे सऊदी अरब को भेंट करना। लेकिन जब नरेन्द्र मोदी वहां यह धार्मिक सद्भाव दिखा रहे थे, और सऊदी अरब के साथ भारत के लिए बहुत ही महत्व के कारोबारी रिश्ते मजबूत कर रहे थे, उसी वक्त भारत में उनकी पार्टी के बड़े-बड़े नेता, और मंत्री-मुख्यमंत्री घूम-घूमकर यह भड़काऊ बात कह रहे थे कि जो लोग भारत माता की जय नहीं बोल सकते, उन्हें इस देश में रहने का कोई हक नहीं है, वे देशद्रोही हैं, और उन्हें देश छोड़कर चले जाना चाहिए। कुछ महीने पहले तक तो यह बात हमलावर हिंदुत्व के भगवाधारी बोलते थे, लेकिन कुछ हफ्ते पहले महाराष्ट्र की विधानसभा ने एक मुस्लिम विधायक इस निलंबित कर दिया कि उसने यह नारा लगाने से इंकार कर दिया था। उस वक्त भी हमने इसके खिलाफ लिखा था, लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने कल हमले को आगे बढ़ाते हुए यह सार्वजनिक बयान दिया है कि भारत माता की जय न बोलने वाले गद्दारों को देश में रहने का कोई हक नहीं है। दो दिन पहले छत्तीसगढ़ की एक बड़ी भाजपा नेता, भूतपूर्व सांसद सरोज पांडेय ने भी भारत माता की जय न बोलने वालों को देशद्रोही कहा है, और कहा है कि उनको भारत में रहने का कोई हक नहीं है। वे कानून पढ़ी हुई हैं, और उनका यह बयान भारी निराशा पैदा करने वाला है। 
अब सवाल यह उठता है कि इस देश से दसियों करोड़ लोगों को कहां भेजा जाएगा, और उन्हें दुनिया का कौन सा देश जगह देगा? जो लोग धार्मिक आधार पर ऐसा नारा लगाने से असहमत हैं, और हमारी तरह के जो लोग वैचारिक रूप से किसी नारे की बंदिश के, नारे को थोपने के खिलाफ हैं, उन करोड़ों लोगों को भाजपा के ये नेता, मंत्री और मुख्यमंत्री किस देश भेजेंगे? किसी संवैधानिक शपथ वाली कुर्सी पर न बैठे लोग तो जब ऐसे बयान देते हैं, तो वे महज जुर्म रहते हैं, लेकिन जब शपथ वाली कुर्सी पर बैठे मुख्यमंत्री इस तरह के बयान देते हैं, तो वे पद की शपथ के खिलाफ भी काम करते हैं, और हमारा मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले में ईमानदारी से विश्लेषण करेगा, तो उसका फैसला ऐसे लोगों को कुर्सी से हटाने वाला होगा। जो लोग किसी एक धर्म को लेकर ऐसी हमलावर बातें करते हैं, और बाकी तमाम धर्मों के लोगों को, अपने ही धर्म के असहमत लोगों को गद्दार कहते हैं, देशद्रोही और राष्ट्रद्रोही कहते हैं, वे संविधान के खिलाफ काम करते हैं, और उनको शपथ से जुड़ी हुई किसी कुर्सी पर रहने का हक नहीं है। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया के जिन बाकी देशों के साथ संबंध मजबूत करना चाहते हैं, कारोबार बढ़ाना चाहते हैं, उन देशों की भी अपनी धार्मिक भावनाएं हैं, और भारत में जिन बेकसूरों को, जिन देशभक्तों को दिन में दस-दस बार गद्दार कहा जा रहा है, और देश से निकालने की बात कही जा रही है, उस तनाव को भी वे तमाम देश देख रहे हैं। भारत के भीतर यह साम्प्रदायिक बखेड़ा खड़ा होने से नरेन्द्र मोदी की आर्थिक नीतियां, और उनकी आर्थिक प्राथमिकताएं भी अपनी संभावनाएं खोकर किनारे बैठ जाएंगी। आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल अगर मिट्टी के मोल न मिलता होता, तो इस देश की अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठ गया होता। लेकिन आज भी साम्प्रदायिक तनाव के चलते हुए देश में विश्वास का जो संकट खड़ा हो रहा है, वह अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित कर रहा है, और लंबे समय के लिए समाज की एकता में एक दरार खड़ी कर रहा है। इससे नरेन्द्र मोदी की बनती हुई अंतरराष्ट्रीय छवि भी तबाह हो रही है। वे अपने मुंह से ऐसी बातों को नहीं कह रहे हैं, लेकिन उनके जो लोग इन बातों को रात-दिन कह रहे हैं, उनके खिलाफ भी उनका मुंह नहीं खुल रहा है। देश के लिए यह हालत बहुत फिक्र की है, और इतिहास इसे दर्ज करते चल रहा है। 

जनता की नजरों में पुलिस की तस्वीर बदलना जरूरी

संपादकीय
3 अप्रैल 2016  

ब्रिटेन की एक खबर है कि किस तरह वहां गांव के बाहर खेल रहे बच्चों ने पहले कुछ संदिग्ध लोगों को दौड़कर खेतों में जाते देखा, और उसके बाद ऊपर आसमान में पुलिस के हेलीकॉप्टर को देखा। बच्चों को यह सूझा कि शायद पुलिस इन्हीं लोगों की तलाश कर रही है, तो दर्जन भर बच्चों ने खुली जगह पर एक तीर के निशान की शक्ल में लेटकर उसकी नोंक खेतों की तरफ बनाई और आसमान पर से पुलिस ने देखकर इस इशारे को समझ लिया, और भागते हुए मुजरिमों तक पहुंच गई। इसके कुछ हफ्ते पहले अमरीका से खबर आई थी कि वहां पुलिस कंट्रोल रूम को दो बरस की एक बच्ची की तरफ से फोन आया, और वह कुछ मदद मांग रही थी, जो कि फोन पर ठीक से समझ नहीं पड़ी। फोन नंबर का पता देखकर पुलिस की एक अफसर उस घर में पहुंची, तो दरवाजा खोलने वाले बुजुर्ग को यह पता नहीं था कि उनकी पोती (या नातिन) ने पुलिस को फोन किया है। इतने में वह बच्ची चलती वहां पहुंची और वह एक पैर में पतलून पहन चुकी थी, और दूसरा पैर पतलून में डाल नहीं पा रही थी, ऐसे में उस बच्ची को मां की दी हुई नसीहत याद थी कि किसी परेशानी में किस तरह फोन से पुलिस को कॉल करना है। इसके बाद वह महिला अफसर उस बच्ची को पतलून पहनाकर लौटी, और उसने अपना अनुभव सोशल मीडिया पर भी डाला कि किस तरह पतलून में घुस जाने के बाद उस बच्ची ने इस महिला अफसर को लिपटाकर धन्यवाद दिया।
पुलिस के संबंध अगर लोगों से अच्छे रहें, तो लोगों की मदद तो होती ही है, खुद पुलिस को अपने काम में एक ऐसी मदद मिलती है जो कि उसे अपने खुद के अमले से भी नहीं मिल पाती। अब पुलिस तो हर जगह पर तैनात हो नहीं सकती कि मुजरिम किस खेत में घुसे हैं, इस पर नजर रखी जा सके। बहुत से मामलों में पुलिस को लोगों की मदद ही काम आ सकती है। दुनिया के सभ्य और विकसित देशों में पुलिस को मददगार माना जाता है लेकिन हिन्दुस्तान में पुलिस की तस्वीर बड़ी गड़बड़ है। यहां के बच्चे बचपन से ही दो तरह की बातें सुनते हुए बड़े होते हैं, एक तो यह कि सो जा नहीं तो गब्बर सिंह आकर ले जाएगा, दूसरी बात यह कि जल्दी से दूध पी लो, नहीं तो पुलिस पकड़कर ले जाएगी। पुलिस की ऐसी तस्वीर बनाने में हिन्दुस्तानी लोग भी जिम्मेदार हैं, और खुद पुलिस भी। आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से पल भर में ऐसे वीडियो छा जाते हैं जिनमें रायपुर की सड़कों पर एक निहत्थे बेकसूर आदमी को पीटने के लिए आधा दर्जन से अधिक हेलमेट लागू करवाती पुलिस लाठियां और लात चलाने लगती है। देश भर में जगह-जगह से ऐसी तस्वीरें और ऐसे वीडियो आते ही रहते हैं जो बताते हैं कि पुलिस से बड़ा अपराधी शायद ही कोई और हो। 
भारत में पुलिस के नजरिए में फर्क लाने की जरूरत है क्योंकि पुलिस हत्यारों की तरह काम करे, फर्जी मुठभेड़-हत्या करे, बलात्कार करे, शहरी सड़कों पर लोगों को बुरी तरह से पीटे, इन सबको देख-देखकर आज शायद ही किसी की नजरों में बाकी भली पुलिस की छवि भी अच्छी बचती होगी। ब्रिटेन में जब पुलिस की लाठी की लंबाई एक-दो इंच बढ़ाने की बात हुई, तो उसका भारी विरोध हुआ, लोगों का यह कहना था कि लाठी लंबी होने से पुलिस उसे जगह-जगह ठकठकाते हुए चलेगी, और वह एक हिंसक रूख दिखेगा। हिन्दुस्तान में एक निहत्थे पर दर्जन भर पुलिस वाले इस अंदाज में लाठियां बरसाते वीडियो-कैमरे में कैद होते हैं कि उन्होंने पीट-पीटकर मारने का ठेका लिया हो। 
पुलिस का यह नजरिया, और उसकी यह तस्वीर लोगों को खाकी वर्दी से दूर रहने की सलाह देते हैं। जब तक जनता और पुलिस के बीच ऐसी हिंसा कायम रहेगी, पुलिस को जनता से मदद नहीं मिल सकेगी। यह तस्वीर बदलनी चाहिए। 

फिल्मी अंदाज के फौजी हमले बस्तर में बेकसूरों का क्या करेंगे?

संपादकीय
2 अप्रैल 2016  

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर में कल भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टरों ने राज्य पुलिस के साथ मिलकर एक फौजी अभ्यास किया कि अगर उन पर जमीनी हमला होता है, तो जरूरत पडऩे पर वे हवा से जमीन में किस तरह जवाबी गोलियां चलाएंगे। बस्तर की जमीन से दूर बसे हुए लोगों को ऐसा फौजी विकल्प बड़ा सुहाता है जिसमें बड़ी संख्या में सैनिक जाकर नक्सलियों को हर कीमत पर मारकर आ जाएं। लेकिन यह कीमत क्या है, इसका शहरियों को अंदाज नहीं है, और जंगलों में बसे आदिवासियों की जिंदगी इतनी कीमती नहीं है कि उनकी गिनती ऐसी फौजी कार्रवाई के सिलसिले में किसी कीमत की तरह गिनी जाए। नतीजा यह है कि लोग सोचते हैं कि नक्सली अगर वायुसेना के हेलीकॉप्टरों पर गोली चलाएंगे, तो जवाब में उन्हें गोली खानी पड़ेगी। 
बस्तर के नक्सली मोर्चे में बहुत से बड़े हमलों के वक्त यह बात सामने आई है कि नक्सली बड़ी संख्या में गांव के लोगों, औरत-बच्चों को सामने रखकर चलते हैं, ताकि पुलिस और सुरक्षा बल के जवान उन पर जवाबी हमला न कर सकें। ऐसी हालत में जब नक्सलियों को हेलीकॉप्टर से हवाई हमले का खतरा रहेगा तो वे बंदूकों की नोंक पर बेबस और बेकसूर आदिवासियों को साथ लेकर चलेंगे, और जहां डेरा डालेंगे, वहां भी साथ रखेंगे। इसलिए सरकारी वर्दियों को अपनी किसी भी कार्रवाई के पहले यह याद रखना चाहिए कि उससे मुजरिम नक्सलियों का चाहे जितना नुकसान हो, उससे बेकसूर आदिवासियों का कोई नुकसान तो नहीं होगा?
 अमरीकी फिल्मों में देख-देखकर लोगों को हवाई हमले बड़े असरदार लगते हैं, लेकिन शहरी लोगों को यह समझना चाहिए कि कल अगर उनकी छतों पर हवाई हमले होंगे, या उनकी सड़कों पर आसमान से गोलियां चलेंगी, तो उनकी क्या हालत रहेगी? आज बस्तर में बेकसूर आदिवासी वैसे भी पुलिस और सुरक्षा बलों के हाथों बलात्कार और हत्या झेल रहे हैं, और सरकार में बैठे हुए लोग यह मानते हैं कि अगर किसी बेकसूर, गैरनक्सली का भी फर्जी आत्मसमर्पण करवाया जा रहा है, तो उसमें आदिवासी का भला क्या नुकसान है। शहरी सोच यहां तक नहीं पहुंच पाती है कि किसी बेकसूर पर नक्सली होने की तोहमत लगाने वाले लोकतंत्र पर से उस बेकसूर आदिवासी की आस्था किस कदर खत्म होती है। जिन लोगों को यह लगता है कि गांव के गरीब आदिवासी की भी भला कोई इज्जत होती है, उनको यह मालूम रहना चाहिए कि शहरी ताकत की कुर्सियों से दूर, दूसरों का शोषण करने की क्षमता से दूर ये आदिवासी अधिक इज्जतदार हैं। लोगों को यह समझना पड़ेगा कि आदिवासी जंगल के जानवर नहीं हैं जिनको कि घेरकर लाकर थाने के किसी कटघरे में खड़ा किया जा सकता है, और फिर नक्सली घोषित करके उन्हें कुछ रकम दी जा सकती है। राजधानियों में बैठे हुए ऐसे कितने लोग हैं जिन्हें नगद रकम मिले तो वे अपने आपको नक्सली घोषित करना चाहेंगे? 
हवाई हमले की बात एक सैनिक जरूरत हो सकती है, लेकिन बेकसूर आदिवासियों के ऊपर जितना खतरा इससे होगा, उसके बारे में पहले सोचना चाहिए, उसके बाद ऐसे किसी दुस्साहस की योजना बनानी चाहिए। हम इस बात को इसलिए लिख रहे हैं कि पुलिस और वायुसेना जवाबी कार्रवाई के नाम पर ऐसा करने के लिए तैयार खड़ी हैं, और इस जवाबी कार्रवाई को झेलने का कोई काम बस्तर के गरीब आदिवासियों ने नहीं किया है। इसलिए नक्सल मोर्चे पर बेकसूरों की मौत की कीमत पर कोई भी रणनीति नहीं बनानी चाहिए। बेकसूर आदिवासी वैसे भी एक तरफ नक्सलियों के हाथों मारे जा रहे हैं, दूसरी तरफ सुरक्षा बलों के हाथों मारे जा रहे हैं, और देश पर उनका हक भ्रष्ट लोकतंत्र के हाथों मारा जा रहा है।

सरहदें और हसरतें रोक देती हैं हकीकत का मजा

संपादकीय
1 अप्रैल 2016  

कल भारत वेस्टइंडीज से एक मैच क्या हार गया, टीम का मखौल बनने लगा। सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब वे हर हाथ जो कुछ अक्षर टाईप कर सकते हैं, वे खिलाडिय़ों की निजी जिंदगी को लेकर भी तरह-तरह की गालियां और गंदी बातें लिख सकते हैं। इसके अलावा इतने तंग फासले वाले मैच में अगर जरा सी कसर रह जाए, तो खेल देखने वाले लोग इस तरह विचलित हो जाते हैं कि मानो उन्होंने उस जीत पर मोटा सट्टा लगाया हो, और भारत की हार से उनका दीवाला निकल गया हो। खेल को लेकर भावनाएं और उत्तेजना इस कदर हैं कि वेस्टइंडीज की टीम के रंग को लेकर, उनके हुलिए को लेकर, उनके गीत-संगीत और नाच को लेकर तरह-तरह की भड़ास निकाली जा रही है। देश के लोग एक असभ्य बर्ताव कर रहे हैं। 
लेकिन ऐसा बर्ताव हिन्दुस्तान का आम मिजाज है। लोगों को याद होगा कि एक किसी बड़े टूर्नामेंट को हारकर लौटे हुए धोनी के घर पर लोगों ने पथराव भी किया था और सड़कों पर कहीं तस्वीरों को जूतों से मारा था, तो कहीं पुतले जलाए थे। हिन्दुस्तानी मिजाज पुतला प्रेमी अधिक है। कभी किसी देवता के पुतले बिठाकर कई-कई दिन उसकी पूजा की जाती है, और कभी किसी राक्षस का पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। प्रतिमापूजक समाज में दिक्कत यही रहती है कि लोग जीत और हार को माला और जूते से जोड़ लेते हैं, जैसा रिजल्ट रहा, वैसा तोहफा खिलाडिय़ों के लिए तैयार रहता है। लोगों को यह सीखने की जरूरत है कि कोई खेल जीत से परे भी अच्छा रहता है, देखने लायक रहता है, और अपने देश की टीम की जीत की हसरत से परे खेल की खूबी की हकीकत का मजा लेना जो लोग नहीं जानते हैं, वे लोग खेल पर नाहक ही अपना समय बर्बाद करते हैं। 
लोगों को यह समझना चाहिए कि राष्ट्रीयता, राष्ट्रप्रेम, और अपनी टीम से मोहब्बत के साथ-साथ खूबियों से मोहब्बत करना भी आना चाहिए। न सिर्फ खेल, बल्कि संगीत, फिल्म, साहित्य, कला, या दूसरी इंसानी खूबियों के मामले में लोगों को यह देखना चाहिए कि सरहदों से परे खूबियां क्या हैं। जैसे बांग्लादेश की टीम भारत के मुकाबले एक बड़ी छोटी आबादी वाले देश की टीम है। लेकिन भारत के मुकाबले गरीब देश के थोड़े से लोगों में से ऐसी शानदार टीम निकलकर आती है जो सवा सौ करोड़ की आबादी में से निकली टीम के नाक में दम कर देती है, और आखिरी बॉल तक सांस रोककर देखना पड़ता है। अपने देश से प्रेम ऐसा हमलावर नहीं होना चाहिए कि दूसरी टीम की हार की चाह रखते हुए मैच का मजा ही न लिया जा सके।

देश के सारे चुनाव एक साथ करवाने की सोच फायदे की

संपादकीय
31 मार्च 2016  

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोच बताते हुए एक खबर आई है कि वे पैसा और समय बचाने के लिए संसद, विधानसभाओं, और म्युनिसिपल-पंचायतों के चुनाव एक साथ करवाना चाहते हैं। एक समय देश में कुछ चुनाव एक साथ होते भी थे, लेकिन राज्यों की विधानसभाओं को भंग करते-करते ये चुनाव अलग-अलग वक्त पर होने लगे, और अब कई राज्यों में तो हर एक डेढ़ बरस में कोई न कोई चुनाव होते हैं। छत्तीसगढ़ में चूंकि विधानसभा भंग होने की नौबत नहीं आई, इसलिए सन् 2000 में राज्य बनने से लेकर अभी तक चुनाव अपने समय पर हो रहे हैं, और एक-डेढ़ बरस में चुनाव निपट जाते हैं, और फिर राज्य सरकार, स्थानीय संस्थाओं को अगले तीन-चार बरस चुनावमुक्त मिलते हैं। 
प्रधानमंत्री की सोच अच्छी है, और उनके पहले भी कुछ लोग ऐसी राय दे चुके हैं, लेकिन तराजू के एक पलड़े में दो दर्जन मेंढकों को एक साथ तौलने की तरह का काम आसान नहीं होगा, और हो सकता है कि मुमकिन भी न हो। इसकी एक वजह यह है कि जब कभी लोकसभा चुनाव के साथ जोड़कर राज्य विधानसभा के चुनाव कराने की बात होगी तो कई ऐसे विधानसभाएं होंगी जिनका कार्यकाल पूरा होने के पहले ही वहां चुनाव कराने पड़ेंगे। ऐसे में वहां की सत्तारूढ़ पार्टी अपने कार्यकाल को घटाने के खिलाफ होगी। दूसरी बात यह भी है कि सांसदों और विधायकों की पेंशन भी सदन के कार्यकाल के साथ जुड़ी हुई होती है। अगर सदन पांच बरस पूरे नहीं कर पाया, तो सांसद-विधायक की पेंशन पर फर्क पड़ता है। 
लेकिन सारे राजनीतिक दलों को मिलकर इसका रास्ता निकालना चाहिए। और जिस तरह से कई राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, और कांग्रेस की सरकारें घटती जा रही हैं, कांग्रेस को इस पर शायद अधिक नुकसान न हो। लेकिन एक दूसरी बात यह है कि एक साथ चुनाव होने से पूरे देश में जिस नेता या पार्टी का माहौल रहेगा, उसकी हवा संसदीय सीट से लेकर वार्ड और पंचायत तक असर डालेगी। अब ऐसे में नरेन्द्र मोदी अकेले ऐसे नेता हैं जिनका असर देश भर में सबसे अधिक फैला हुआ, सबसे अधिक ताकत वाला दिखता है। हो सकता है कि एक साथ चुनाव की उनकी सोच के पीछे यह भी एक वजह हो, लेकिन हम एक साथ चुनाव के हिमायती इसलिए भी हैं क्योंकि इससे सरकारें जनता को लुभाने के अनावश्यक दबाव के बिना पांच बरस तक कड़े फैसले लेकर भी काम कर सकती हैं। 
राष्ट्रपति अगर ऐसे किसी मामले में दिलचस्पी लें, और पहल करें, तो शायद सभी पार्टियों को बिठाकर वे ऐसा करवा सकते हैं। राजनीतिक दल अपने नफे-नुकसान के चलते ऐसा करें इसमें शक है, लेकिन ऐसा होने पर देश का फायदा होगा, इसमें हमें कोई शक नहीं है। मोदी जैसे नेता तो आते-जाते रह सकते हैं, लेकिन देश में चुनाव व्यवस्था में अगर ऐसा बड़ा सुधार हो सकता है, तो उसकी कोशिश की जानी चाहिए।

राजस्व मंडल अध्यक्ष के फैसले साजिश और भ्रष्ट होने के मायने

संपादकीय
30 मार्च 2016  

छत्तीसगढ़ के राजस्व मंडल में मौजूदा अध्यक्ष के आने के बाद से लगातार पिछले एक अध्यक्ष के कार्यकाल के इतने फैसलों को पलटा गया है, कि उन सब पर अमल करते हुए जिला कलेक्टरों की मुश्किल खड़ी हो गई है। गरीब आदिवासियों की जमीनों को साजिश के तहत गैरआदिवासियों के हाथों बेचने में मदद करने वाले राजस्व मंडल के तत्कालीन अध्यक्ष के खिलाफ आज के मौजूदा अध्यक्ष ने साजिश जैसी कई बातें लिखी हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये बातें पहले चर्चा में नहीं थीं, पहले से यह चल रहा था, और सबको मालूम था कि राजस्व मंडल में कामकाज कैसे चल रहा था, और पूरे प्रदेश में आदिवासियों की जमीन, सरकार की खुद की जमीन, इनके खिलाफ किस तरह ये फैसले हो रहे थे। लेकिन आज पांच-छह बरस बाद जाकर अगर राज्य सरकार के इस राजस्व-न्यायालय से इसी कुर्सी के फैसलों को साजिश पाकर पलटना पड़ रहा है, और इसके खिलाफ अपील के लिए अभी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट बाकी ही हैं, तो फिर गरीबों और सरकार की जमीनों की हिफाजत कैसे हो सकेगी? 
और इस मामले को हम सिर्फ कुर्सी पर बैठे एक भ्रष्ट या एक ईमानदार के फर्क तक सीमित रखना नहीं चाहते। हमारा यह मानना है कि कलेक्टरों और कमिश्नरों के फैसलों के खिलाफ जमीनों के मामले सुनने के लिए बनाए गए राजस्व मंडल को सरकार के ढांचे में काले पानी की सजा की तरह मानना बंद किया जाना चाहिए। एक तेज और ईमानदार अफसर किस तरह से अदालती अधिकारों वाली इस कुर्सी पर बैठकर प्रदेश के हितों को, और लोगों के हितों को बचाने का काम कर सकता है, इस संभावना को देखते हुए इस कुर्सी पर लगातार बेहतर लोगों को लाने के बारे में सरकार को सोचना चाहिए। यहां पर आमतौर पर ऐसे अफसरों की तैनाती होती है जिनको सरकारी जुबान में लूपलाईन कहा जाता है, यानी नौकरशाही के हाशिए पर किसी को भेज देना। लेकिन प्रदेश की जमीनों के जितने मामले यहां से जुड़े रहते हैं, उनको देखते हुए इस कुर्सी की अहमियत समझना चाहिए। 
और जब राजस्व मंडल के वर्तमान अध्यक्ष ने करीब 50 एक सरीखे मामलों में पिछले एक अध्यक्ष के फैसलों को साजिश और गिरोह का काम कहा है, तो हमारा ख्याल है कि सरकार को खुद को भी ऐसे पिछले अध्यक्ष के खिलाफ कानूनी विकल्प तलाशने चाहिए, और अगर ऐसी कोई साजिश साबित होती है तो ऐसे अफसर को सजा दिलाने का काम करना चाहिए। यह कोई नई बात भी नहीं है, और राजस्व मंडल में बड़े पैमाने पर धांधली, और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार एक आम चर्चा रही है। लोगों का यहां तक कहना होता है कि कई अध्यक्षों के कार्यकाल में वकील ही फैसले लिखकर ले आते थे, और नगद भुगतान के साथ ऐसे फैसलों पर दस्तखत करवा लेते थे। सरकार को इस सिलसिले को तोडऩे की कोशिश करना चाहिए। लोगों की नजरों से दूर यह एक ऐसा कानूनी अधिकार प्राप्त न्यायालय है जहां पर कि हर फैसले से जमीनों का करोड़ों का नफा जुड़ा होता है, जो कि भ्रष्ट व्यवस्था के चलते आमतौर पर सरकारी जमीनों के हितों के खिलाफ जाता है। राज्य सरकार एक तरफ जब प्रशासनिक सुधार आयोग बनाकर सरकारी कामकाज में बेहतरी की कोशिश कर रही है, तो उसे प्रयोग के तौर पर राजस्व मंडल के दो अध्यक्षों के कार्यकाल का भी कानूनी विश्लेषण करना चाहिए कि एक खराब अफसर सरकार के खिलाफ, गरीबों के खिलाफ कितना नुकसान करके जा सकता है। और यह बात तो जाहिर है ही कि इस देश में अगर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का विकल्प बाकी हो, तो वहां पर संपन्न लोगों के ही जीतने की गुंजाइश अधिक बचती है। ऐसा नहीं कि हर जज भ्रष्ट है, लेकिन अदालती कामकाज इतना महंगा है कि गरीब अपनी गरीबी के चलते ही मामले हार जाते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को राजस्व मंडल को ईमानदार और काबिल अफसर देकर इस स्तर पर भ्रष्टाचार को खत्म करना जारी रखना चाहिए। 

यह हैवानियत नहीं इंसानियत ही है...


संपादकीय
29 मार्च 2016
मध्यप्रदेश के जबलपुर से एक रेलगाड़ी का एक ऐसा वीडियो आया है जिसमें डिब्बे की खिड़की से बाहर टांगकर एक बेबस नौजवान को पीटा जा रहा है। खबर है कि इसने साथ के किसी मुसाफिर की बोतल से पानी पी लिया था, और उस मुसाफिर ने अपने साथियों के साथ मिलकर इसे ऐसी सजा दी। खबर में यह भी है कि इसे 272 किमी तक ऐसे ही टांगकर रखा गया था। इस खबर को देखें तो लगता है कि अंधेरे में, या बंद कमरे में छुपकर जुर्म करने वालों से परे खुले में ऐसा भयानक अपराध करने वाले लोग बिल्कुल अलग किस्म के मुजरिम हैं। और इनकी क्या सजा हो सकती है, यह आने वाला वक्त बताएगा। 
कहीं पर दो-चार बरस के छोटे बच्चों से बलात्कार होता है, कहीं पर किसी बेबस अकेली महिला से एक दर्जन लोग बलात्कार करते हैं, और कहीं पर मानसिक रूप से विचलित किसी बच्चे या बच्ची से ज्यादती होती है। सड़कों पर देखें तो पुलिस की हिंसा बेहिसाब जारी है, और उसकी तस्वीरें अब वीडियो और टीवी की मेहरबानी से इस तरह सामने आने लगी हैं कि सरकार या अदालत को उसपर कार्रवाई करनी ही पड़ती है। ऐसी खबरों को लेकर यह चर्चा होती है कि यह अमानवीय काम हुआ है। हकीकत तो यह है कि यह सब मानवीय काम ही है। यह मानव के स्वभाव का एक हिस्सा है, और जब यह इतना हिंसक हो जाता है, इतना शर्मनाक हो जाता है कि इंसान अपने नाम के साथ उसे जुड़े देखना नहीं चाहते, तो उसे हैवानियत का काम, या अमानवीय काम बता दिया जाता है। 
जब तक इंसान यह मंजूर नहीं करेंगे कि ऐसे तमाम जुर्म, और ऐसी तमाम हिंसा उसकी ही अपनी सोच का एक हिस्सा है, तब तक उनके सुधरने का सिलसिला शुरू भी नहीं हो पाएगा। सुधार के लिए सबसे पहले जरूरत होती है खामी को परखने की, मानने की, और फिर सुधार की नीयत की। अगर कैंसर की शिनाख्त न हो, उसके इलाज की नीयत न हो, और इलाज की सहूलियत न हो, तो वह बढ़ते ही चलता है। इसलिए इंसानों को यह मानना ही पड़ेगा कि भयानक हिंसा भी उनके ही भीतर का एक हिस्सा है, और उससे उबरना उनके लिए एक चुनौती है। इसके बाद लोगों को अपने भीतर की हिंसा पर पार पाना आना चाहिए, तब कहीं जाकर नौबत सुधर पाएगी। 
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