होनहार का हक छीनने वाले सस्ती सजा में न छूटा करें

संपादकीय
7 जून  2016
बिहार में स्कूल के आखिरी इम्तिहान के बोर्ड की मेरिट लिस्ट में सबसे ऊपर आए हुए एक लड़के और एक लड़की के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की गई है। इन दोनों को जब मीडिया ने इंटरव्यू किया तो इन्हें अपने विषयों की जानकारी भी नहीं थी, और नाम भी नहीं मालूम थे। ऐसे में सरकार ने जांच करवाई तो पता लगा कि घपला करके इन दोनों को मेरिट में अव्वल लाया गया था। अब सरकार इनके, स्कूलों के, और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, और उनका रिजल्ट रद्द कर दिया गया है।
सवाल यह उठता है कि जो नीतीश कुमार बिहार से भ्रष्टाचार घटाने के नाम पर  सत्ता पर लौटकर आए थे, वहां पर ऐसा संगठित अपराध फिर कैसे होने लगा, जिसमें होनहार बच्चों का हक छीनकर ताकतवर मां-बाप अपने जाहिर तौर पर कमअक्ल बच्चों को मेरिट में अव्वल ला रहे हैं? देश की एक सामान्य जनधारणा को देखें तो बहुत से लोग यह मान रहे होंगे कि लालू यादव के सरकार में आ जाने के बाद अब ईमानदारी की गुंजाइश नीतीश सरकार में बचेगी भी कैसे? यह कुछ उसी तरह की बात है कि मनमोहन सिंह तो एक सज्जन प्रधानमंत्री माने जाते थे, लेकिन उनके मंत्रिमंडल में एक से बढ़कर एक मुजरिम मंत्री थे जो कि अव्वल दर्जे के संगठित भ्रष्टाचार में लगे हुए थे, और मनमौन सिंह यह सब देखते हुए चुप्पी साधे रखते थे। यूपीए-2 सरकार का कार्यकाल ऐसा था जिसमें प्रधानमंत्री को छोड़ बाकी तमाम देश को मंत्रियों के भ्रष्टाचार मालूम थे, और दिख रहे थे। ऐसी अनदेखी करने के लिए मनमोहन सिंह की जगह जेल छोड़ और कुछ नहीं हो सकती थी, लेकिन उनकी साख उनको अब तक बचा ले गई है, लेकिन आगे क्या होगा यह तो वक्त ही बताएगा।
फिलहाल हम भ्रष्टाचार के घिसे-पिटे मुद्दे पर एक बार और नहीं लिख रहे हैं, हम पढ़ाई में होने वाले घोटाले को लेकर बात करना चाहते हैं क्योंकि इसी बिहार की वे तस्वीरें दुनिया भर में कुख्यात हैं जिनमें नकल करवाने के लिए दर्जनों लोग इमारत पर बाहर से चढ़कर अपने लोगों की मदद कर रहे हैं। और अकेले बिहार की क्यों बात करें, मध्यप्रदेश में इतना बड़ा व्यापम घोटाला हुआ है जिसमें लाखों होनहार बच्चों के हक छीनकर राजनीति और पैसों की ताकत रखने वाले उन चुनिंदा सैकड़ों लोगों को मेडिकल दाखिला दिया गया जो कि आज अदालती निगरानी में चल रही जांच में फंसे हुए हैं। छत्तीसगढ़ में इतना बड़ा न सही, लेकिन छोटा-मोटा पीएमटी-पर्चा आउट होने की जांच चल ही रही है।
हमारा ख्याल है कि होनहार और मेहनतकश बच्चों का हक छीनने में जो बड़े लोग लगे रहते हैं, वैसे ताकतवर-बालिग लोगों के लिए अधिक बड़ी सजा का इंतजाम किया जाना चाहिए। ऐसा न होने पर लोकतंत्र और न्याय पर से लोगों को भरोसा उठते जा रहा है, और लोग सरकार के खिलाफ एक हिकारत और नफरत पाल चुके हैं कि कोई भी काम ईमानदारी से होता नहीं है, और ईमानदार का कोई हक रहता नहीं है। देश के लिए ऐसी नौबत बहुत ही शर्मनाक है, और भारत का अगर यही हाल रहा तो दुनिया भर में मेड-इन-इंडिया डिग्री की भी कोई इज्जत नहीं रहेगी, और ऐसी डिग्री तक पहुंचने वाले लोग भी देश के सबसे होनहार बच्चे नहीं रहेंगे।

बहुमत की असहमति रहते हुए भी अल्पमत के विचार पर विचार

6 जून 2016

स्विटरजरलैंड कल एक जनमतसंग्रह हुआ जिसमें लोगों से पूछा गया कि क्या हर नागरिक को जिंदा रहने के लिए जरूरी मदद सरकार की तरफ से की जाए ताकि वे कोई काम करना चाहें तो करें, या बिना काम किए भी रह सकें। ऐसी सोच के पीछे वे लोग थे जो यह सोचते हैं कि बहुत से लोग जिंदा रहने की मजबूरी अपनी पसंद के काम नहीं कर पाते और समाज में अपनी सबसे बड़ी खूबियों के मुताबिक योगदान नहीं कर पाते।
दुनिया के सबसे संपन्न देशों में से एक स्विटजरलैंड में योरप के बाकी कुछ देशों की तरह अब मशीनें बहुत सा काम करने लगी हैं, और लोग एक तरफ तो हफ्ते में काम के दिन घटाने में लगे हैं, और दूसरी तरफ रोजगार भी घटते चले जा रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था को देखें तो उसकी उत्पादकता में मशीनों का योगदान बढ़ते चल रहा है, और मशीनें कमा रही हैं, और इंसान खा रहे हैं, ऐसे एक दिन की तरफ विकसित और औद्योगिक दुनिया बढ़ती चल रही है।
इसलिए स्विटजरलैंड में कुछ लोगों ने यह राय सामने रखी थी कि सरकार अगर सबको बराबरी से एक न्यूनतम रिहायशी भत्ता देगी, तो लोग अपनी पसंद के काम कर सकेंगे। लेकिन स्विटजरलैंड की सरकार और वहां की सारी राजनीतिक पार्टियां इसके खिलाफ थीं, और लोगों से अपील की गई थी कि इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट डालें, नतीजा यह निकला कि यह प्रस्ताव खारिज ही हो गया। इस प्रस्ताव को कुछ लोगों ने एक कम्युनिस्ट या माक्र्सवादी सोच बताया।
यह बात सही है कि ऐसे एक न्यूनतम और बराबर गुजारा-भत्ते की सोच माक्र्सवादी लगती है ताकि समाज में हर कोई कम से कम एक न्यूनतम कमाई तो पा ही ले, और फिर जिंदा रहने के दबाव से परे जाकर अपनी मर्जी का काम कर सके। आज हम अपने आसपास देखते हैं कि बहुत से लोग सामाजिक मोर्चों पर काम करना चाहते हैं, राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा लेना चाहते हैं, पर्यावरण या पशु-पक्षियों के लिए कुछ करना चाहते हैं, कला या संगीत में जीना चाहते हैं, लेकिन जिंदा रहने की जरूरतें उन्हें काम के लिए मजबूर करती हैं, ऐसे कामों के लिए, जिनसे कि कमाई हो सके।
दुनिया के इतिहास में हिप्पियों सहित बहुत से ऐसे समुदाय रहे जिन्होंने समय-समय पर अपने कम्यून बनाए, और उनके भीतर वे बराबरी से रहे। अभी पिछले बरस ही पश्चिमी दुनिया में किसी जगह ऐसी ही एक कम्यून की तस्वीरों सहित रिपोर्ट आई थी, और उसमें शामिल होने के लिए हजारों लोग कतार में लगे हुए हैं यह बात भी उस रिपोर्ट में थी। लेकिन ऐसे कम्यून कई बार किसी एक आध्यात्मिक या किसी और तरह के गुरू के मातहत रहने और जीने वाले लोगों का एक जमावड़ा बनकर रह जाता है जहां पर उन्मुक्त सेक्स भी कभी-कभी एक जीवनशैली रहता है, और कभी-कभी ऐसे कम्यून तलवार के ढांचे को कुचलकर बनते हैं जहां पर सभी का बराबरी का हक हो, और जहां होने वाले बच्चों की सभी पर बराबर की जिम्मेदारी हो।
दिक्कत यह है कि ऐसे कम्यून के भीतर अधिकारों और जिम्मेदारियों का जो ढांचा रहता है, वह उसके देश के नियम-कायदों से मेल नहीं खाता, और किसी टकराव की हालत में ऐसे कम्यून के भीतर की व्यवस्था कानून की नजर में कोई दर्जा नहीं रहती। लोगों ने अभी चार दिन पहले ही भारत के उत्तरप्रदेश में मथुरा में एक ऐसे समुदाय से जुड़ी तबाही देखी है जो कि एक मुखिया के मातहत देश-प्रदेश के कानूनों को चुनौती देते हुए अपने आपमें एक साम्राज्य की तरह जी रहा था, और जिसने कानून पर बुरी तरह हमला भी किया।
यह कम्यून की बात स्विटजरलैंड के ताजा जनमतसंग्रह से कुछ अलग किस्म की भी है, लेकिन जब बराबरी के दर्जे की बात आती है, तो जिस तरह के कम्यून माक्र्सवादी विचारधारा को मानते हुए भी बनते और चलते हैं, वे भी बराबरी की कमाई की सोच पर टिके रहते हैं। इसलिए अगर किसी देश में संपन्नता या अतिसंपन्नता के चलते देश को ही एक ऐसा कम्यून बनाने की सोच उठी है जहां पर कि हर किसी को जिंदगी चलाने के न्यूनतम खर्चे सरकार की तरफ से दिए जाएं ताकि वे अपनी पसंद का काम कर सकें, तो यह बात भी बराबरी पर आधारित एक समुदाय की सोच है, जिसे कि स्विस नागरिकों ने सिरे से ही नकार दिया।
इस सोच का दूसरा पहलू यह है कि सरकार जनता के न्यूनतम खर्चों का बोझ उठाए। सोच का इतना हिस्सा तो भारत में जगह-जगह देखने मिलता है। केन्द्र सरकार भी गरीबों के लिए सौ किस्म की अलग-अलग रियायतें देती है, और राज्य सरकारें भी अपने खजाने से गरीबों की मदद करती हैं। इस मामले में एक तरफ तो तमिलनाडू जैसे राज्य सबसे आगे है जहां मुख्यमंत्री जयललिता हर किसी को लगभग मुफ्त रियायती खाना देती हैं, रियायती पानी, रियायती दवाएं, और मुफ्त के मंगलसूत्र जैसी कई और चीजें भी। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में करीब आधी आबादी को सरकार एक दिन की मजदूरी से भी कम पर पूरे परिवार का महीने भर का चावल देती है, मुफ्त की बिजली, मुफ्त की साइकिलें, और पढ़ाई का इंतजाम भी छत्तीसगढ़ में है, और देश के कई दूसरे राज्यों में भी।
लेकिन भारत जैसे देश में सरकारी रियायतें आमतौर पर गरीबों के जिंदा रहने के लिए मदद हैं। एक संपन्न दुनिया में लोगों को जिंदा रहने की कमाई हासिल रहने पर भी उन्हें एक बराबरी का गुजारा-भत्ता देना एक अलग सोच है कि वे अपनी मर्जी के काम कर सकें। भारत में आज ऐसी सोच के बारे में सोचना कुछ मुश्किल है क्योंकि अधिकतर लोग जिंदगी के एक संघर्ष में लगे हैं, और यहां पर मशीनों ने अभी इंसानों को राहत देना, या बेरोजगार करना उस हद तक शुरू नहीं किया है। फिर देश की संपन्नता अभी ऐसे किसी किनारे पर पहुंची भी नहीं है कि तमाम लोगों को जिंदा रहने के लिए कोई भत्ता दिया जा सके।
लेकिन स्विटजरलैंड में एक तबके की यह सोच और उस पर जनमतसंग्रह से यह तो पता लगता है कि बहुमत की असहमति रहते हुए भी अल्पमत के विचार पर विचार करना भी कितना महत्वपूर्ण माना जाता है।

जोगी के साथ छत्तीसगढ़ की राजनीति का एक रोमांचक रहस्य शुरू

संपादकीय
6 जून  2016
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में आज इतिहास की सबसे बड़ी बगावत हो रही है, जब अपने पार्टी से निष्कासित विधायक बेटे अमित जोगी के साथ जाकर भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी एक नई पार्टी बनाने के करीब हैं। कांग्रेस को वे छोड़ चुके हैं, वापिसी की संभावना या आशंका से इंकार कर चुके हैं, और ऐसा माना जा रहा है कि अब नई पार्टी महज वक्त की बात है, या हो सकता है कि अगले कुछ घंटों के भीतर जब यह अखबार छप ही रहा होगा, तब तक अजीत जोगी नई पार्टी की घोषणा कर चुके होंगे। फिलहाल आज इस बात पर ही इस वक्त लिखा जा सकता है कि जोगी के बिना कांग्रेस और कांग्रेस के बिना जोगी छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति में क्या फर्क लाएंगे?
पिछले कई बरस से लगातार यह अटकलबाजी चलती थी कि अजीत जोगी कब एक क्षेत्रीय पार्टी बनाएंगे? कांग्रेस के भीतर अजीत जोगी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनकर भी बेचैन ही थे, और वे बाकी नेताओं के साथ किसी तरह का तालमेल नहीं बिठा पाते थे। लेकिन जोगी के इतिहास पर चर्चा अधिक करेंगे तो यह पन्ना छोटा पड़ेगा, आज उनके वर्तमान और भविष्य पर ही बात सीमित रखना ठीक होगा। जोगी के बारे में आमधारणा से लेकर कांग्रेस के भीतर के आरोप और संगठन के भीतर के सुबूत तक यह बताने वाले रहे कि वे पार्टी के भीतर के अपने उम्मीदवारों को छांट-छांटकर हराने में पीछे नहीं रहे। यह कांग्रेस के लिए कोई अनोखी बात नहीं रही, क्योंकि उसके कई नेता पार्टी के भीतर ऐसा काम करते ही रहते हैं, और इसी के बीच कांग्रेस पार्टी जिंदा भी रहती है। बहुत सी जगहों पर कांग्रेस के बारे में यह कहा जाता है कि वह विरोधियों को तो हरा ले, लेकिन पहले अपने ही नेताओं की साजिशों से तो बच जाए। जोगी के कांग्रेस के बाहर जाने के साथ ही अब उन पर लगने वाली तोहमतों के दिन खत्म हो जाएंगे, और कांग्रेस जोगीमुक्त होकर बाकी नेताओं के हवाले हो जाएगी। इसके बाद प्रदेश को रमनमुक्त करने का कई पार्टियों और कई नेताओं का नारा जोगी पूरा करेंगे, या बाकी कांग्रेस पूरा करेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
फिलहाल प्रदेश इन अटकलों से गर्म है कि जोगी की पार्टी, जिसे कि लोग बन चुका मान रहे हैं, वह कितनी सीटें पाएगी, वह कांग्रेस का नुकसान अधिक करेगी, या भाजपा का, या फिर जोगी अपने प्रभाव की सीटों पर पहले की तरह जीत-हार तय करते रहेंगे? वे कुछ या अधिक सीटें पाकर कांग्रेस और भाजपा के बीच पौन फीसदी वोटों की खाई में किंगमेकर बनेंगे, या आज के अपने नारे के मुताबिक किंग बनेंगे, ये तमाम बातें अभी से लेकर विधानसभा के चुनाव तक जारी रहेंगी। जैसा कि प्रदेश कांग्रेस ने कहा है कि यह एक कांटा था जो निकल गया, तो इसके बाद कांग्रेस अब अपने बिना कांटे वाले पैर के सहारे चुनावी दौर में कितना आगे पहुंच सकती है, यह पूरी तरह कांग्रेस पर खुद पर निर्भर रहेगा। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के लोगों को इस बात का बड़ा खतरा लग रहा है कि कल तक कांग्रेस के भीतर के भीतरघात की वजह से उसे सीटों का जो फायदा होता था, वह न होने से अब क्या होगा?
अजीत जोगी और प्रदेश में बाकी कांग्रेस, किसी सहअस्तित्व के साथ जिंदा रहने के लायक नहीं रह गए थे, और यह अलगाव हो सकता है कि दोनों के लिए बेहतर साबित हो, और चुनौतीपूर्ण साबित हो। इसके साथ-साथ एक बात बड़ी साफ है कि छत्तीसगढ़ में किसी भी पार्टी का कोई नेता अगर क्षेत्रीय दल बनाने की सबसे अधिक ताकत और काबिलीयत रखता है, तो वह अजीत जोगी ही है। और क्षेत्रीय दलों की संभावनाओं को नकार देना एक राजनीतिक अदूरदर्शिता और नासमझी होगी क्योंकि कांग्रेस से अलग होकर शरद पवार एक हकीकत बने हैं, ममता बैनर्जी एक हकीकत बनी हैं, और भी कुछ ऐसी मिसालें होंगी जो कि इस सांस में हमें याद नहीं पड़ रही हैं। छत्तीसगढ़ एक छोटा राज्य है इसलिए एक तीसरी शक्ति, यहां राजनीतिक अस्थिरता का दौर भी ला सकती है, और ऐसी अस्थिरता के भूकंप खड़े करने में अजीत जोगी को महारथ हासिल है। जोगी परिवार कितनी सीटें पा सकता है, कितनी सीटों पर किसी पार्टी को जिता सकता है, और कितनी सीटों पर किस पार्टी को हरा सकता है, यह विधानसभा चुनाव के वोटों की गिनती खत्म होने तक जारी रहने वाला एक रोमांचक रहस्य रहेगा। यह राज्य बनने के बाद से सबसे दिलचस्प नौबत रहेगी, और आने वाले विधानसभा चुनावों में पूरा देश छत्तीसगढ़ को गौर से देखता रहेगा। 

बालिग और नाबालिग मुजरिम के बीच फासले का क्या हो?

संपादकीय
5 जून  2016
दिल्ली में कुछ दिन पहले लापरवाही से कार चलाते हुए एक रईस नौजवान ने एक दूसरे नौजवान को कुचलकर मार डाला था। यह लापरवाह नौजवान मौके से फरार भी हो गया था। वह बालिग होने की उम्र से चार दिन छोटा था, और उसके खिलाफ नाबालिग किशोरों पर लगने वाले कानूनों के तहत ही मुकदमा चल सकता था। लेकिन किशोर न्याय बोर्ड ने एक फैसले में कहा कि घटना के वक्त और उसके बाद इस नाबालिग आरोपी का बर्ताव बताता है कि वह अपने ऊपर लगे आरोपों से पूरी तरह वाकिफ था, दूसरों की जिंदगी के प्रति बिल्कुल गंभीर नहीं था, और हादसे के दिन भी उसने जुर्म के नतीजों को समझने की समझ थी, इसलिए उसके खिलाफ बालिग की तरह मुकदमा चलाना ठीक होगा।
यह देश में अपनी तरह का अकेला मामला है लेकिन इस बारे में पिछले कम से कम दो बरस से देश में यह बहस चल रही है कि क्या कुछ किस्म के जुर्म के लिए बालिग होने की उम्र सीमा को घटाया जाए? लोगों को याद होगा कि जब दिल्ली में देश का सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार हुआ, तो उसमें सबसे खूंखार बलात्कारी एक नाबालिग था, और वह कड़ी सजा से इसीलिए बच गया कि उसकी उम्र 18 बरस नहीं हुई थी। उस समय से इस बात को लेकर समाजशास्त्रियों, मानव शरीर के जानकार लोगों, मनोवैज्ञानिकों, और कानून के विशेषज्ञों के बीच बहस चल रही है कि किशोरावस्था के अपराधों में से किस नौबत में किसके कैसे अपराध के लिए उन्हें बालिग मान लिया जाए। और यह बहस बहुत आसान इसलिए नहीं है क्योंकि कुछ बहुत ही भयानक किस्म के अपराधों को देखकर जब ऐसी मांग उठती है, तो यह भी लगता है कि क्या समाज के व्यापक हित में ऐसी हड़बड़ी ठीक होगी?
लेकिन भारत को दुनिया के कुछ दूसरे देशों को देखना होगा जहां पर 14 बरस की उम्र से ड्राइविंग लाइसेंस दिए जाते हैं, कई जगहों पर 16 बरस की उम्र से वोट डालने की इजाजत या तो है, या उस पर विचार चल रहा है। दरअसल दुनिया में अब समझ और परिपक्वता की उम्र घटकर नीचे आ गई है। आज बच्चे जल्दी किशोर हो रहे हैं, और किशोर जल्दी बालिग समझ पा रहे हैं। इसलिए कई मामलों में उन्हें 18 बरस का इंतजार करवाना ठीक नहीं है, न ही उनके गाड़ी चलाने देने के लिए, और न ही उन्हें सजा पाने के लिए। आज भारत में दुपहिया गाड़ी चलाने के लिए भी किशोरों का 18 बरस का होना जरूरी है। लेकिन शायद ही कोई ऐसे लड़के-लड़की हों जो कि 16 बरस की उम्र के बाद दुपहिया न चलाते हों। आज स्कूल और उसके बाद की कोचिंग क्लास से लेकर खेल के मैदानों तक की भागदौड़ साइकिलों पर नहीं हो सकती, इसलिए स्कूली बच्चे भी स्कूटर-मोटरसाइकिल चलाते हैं। भारत को कम ताकतवर इंजन वाले दुपहियों के लिए 16 बरस की उम्र से ड्राइविंग लाइसेंस देने का एक सुधार करना चाहिए। इसी तरह कुछ अपराधों के लिए भी बालिग होने की सीमा को घटाकर 16 बरस करना ठीक होगा।
अभी दिल्ली का यह फैसला पता नहीं आगे की अदालत तक जाकर टिक पाएगा या नहीं, क्योंकि जिस रईस की औलाद किसी को कुचलकर, मारकर करोड़ों की गाड़ी लेकर भाग निकलती है, उस रईस के वकील बड़ी आसानी से ऐसा लागू नहीं होने देंगे। लेकिन इससे एक नई बहस जरूर छिड़ी है जो आगे तक जाएगी। जिसे मां-बाप की दी हुई महंगी और बड़ी गाड़ी चलाना आता है, वह 18 बरस से चार दिन छोटा होने की वजह से कमअक्ल या कमसमझ नहीं हो जाता। इसी तरह सेक्स-अपराध के मामले में 18 बरस से कम और 16 बरस से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए एक अलग इंतजाम रहना चाहिए लेकिन उन्हें नाबालिग की रियायत देना बिल्कुल भी ठीक नहीं होगा। 

रियायती रसोई गैस, हिन्दुस्तानी महिला की जिंदगी में क्रांति...

संपादकीय
4 जून  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बड़ी महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है जिसके तहत देश की पांच करोड़ महिलाओं को रियायती रसोई गैस कनेक्शन दिए जाएंगे। आज देश भर में 27 करोड़ गैस-ग्राहक हैं, और इनमें से एक करोड़ ने खुद होकर रसोई गैस रियायत लौटा दी है। इतने ग्राहकों के लिए आज करीब 16 हजार डीलर हैं, और अब केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने कहा है कि सरकार इस साल 10 हजार नए रसोई गैस डीलर नियुक्त करने जा रही है। इन आंकड़ों को बारीकी से देखें, तो लगता है कि देश की तस्वीर बदलने जा रही है। आजादी के बाद से अब तक जितने गैस कनेक्शन रसोई में थे, उनमें करीब 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी अगले दो बरसों में करने की तैयारी है। और ये 20 फीसदी घर-परिवार ऐसे हैं जो कि गरीब हैं, और जहां पर महिला लकड़ी या कोयले के चूल्हे पर खाना पकाते हुए छोटे से दड़बे जैसे किचन में अपनी और बच्चों की सेहत को भी खतरे में डालती थी, डालती है, और पर्यावरण में भी इसके धुएं से भारी प्रदूषण फैलता है।
हम देश में पांच करोड़ ऐसे कनेक्शनों के बाद पांच करोड़ चूल्हों से धुआं घटने की कल्पना करें, तो हम एक साफ हवा वाले देश की कल्पना भी कर सकते हैं। पूरी तरह साफ न सही, लेकिन कम जहरीली हवा। अकेले छत्तीसगढ़ में अगले दो बरस में 25 लाख ऐसे गैस कनेक्शन देने की घोषणा हुई है, और सरकार ने गैस कंपनियों को कहा है कि जहां-जहां डीलरशिप के लिए जगह न मिले, सरकारी राशन दुकानों से ही गैस कनेक्शन देना शुरू कर दिया जाए। हम इसे देश की महिला-सेहत के लिए सबसे क्रांतिकारी फैसला और कार्रवाई मानते हैं, और अगर केन्द्र और राज्य सरकारें इसे कामयाब करना तय कर लें, तो भारतीय महिला की औसत उम्र भी कुछ तो बढ़ ही जाएगी।
इस पर आज लिखने का एक मकसद तो यह है कि हमें पढऩे वाले जिन लोगों की जिंदगी में रसोई गैस पहले से है, और जिन्होंने बरसों से चूल्हे का धुआं झेला नहीं है, उन्हें भी इस अहमियत वाले फैसले का वजन समझ में आए। दूसरा मकसद यह है कि इससे जुड़े हुए छोटे-छोटे बहुत से ऐसे कारोबार शुरू हो सकते हैं जिसके लिए राज्य सरकारों को कौशल विकास योजना के तहत प्रशिक्षण देना चाहिए। इतने गैस चूल्हे बढ़ेंगे, इतने सिलेंडर बढ़ेंगे, तो इनकी मरम्मत का कुछ न कुछ काम तो बढ़ेगा। फिर जो नए लोग इन चूल्हों का इस्तेमाल करेंगे उन्हें मदद की, सुधार की जरूरत भी कुछ अधिक पड़ेगी। इसलिए राज्य सरकार को चाहिए कि हर इलाके के कुछ लोगों को गैस चूल्हा मरम्मत का काम सिखाए। यह बड़ा छोटा सा और आसान हुनर रहेगा, लेकिन इसकी जरूरत बहुत पड़ेगी।
लगे हाथों हम अपनी एक पुरानी सलाह को भी दुहराना चाहेंगे। गैस रियायत पर  नजर रखना राज्य सरकारों का जिम्मा है। हम छत्तीसगढ़ में ही यह देखते हैं कि किस तरह होटल और बाकी कारोबार, कारखाने और कारों के लिए किस तरह रियायती रसोई गैस का इस्तेमाल होता है, और सरकारी रियायत की इस चोरी को रोकने में राज्य के सरकारी अमले की अधिक दिलचस्पी नहीं रहती है, क्योंकि यह रियायत राज्य की जेब से सीधे नहीं जाती है। राज्य सरकारों को हमारी सलाह है कि रियायती रसोई गैस के बेजा इस्तेमाल के खिलाफ बनाए गए नियम-कानून का बहुत कड़ाई से इस्तेमाल करते हुए इस पर निगरानी भी रखे, और केन्द्र सरकार की रियायत बचाने में मदद करे। पांच करोड़ नए परिवारों को रियायती गैस देना सरकार पर एक बोझ भी रहेगा, और हमारा मानना है कि राज्य सरकारें अगर अपने-अपने प्रदेशों में इसकी चोरी रोक सकेंगी, तो केन्द्र सरकार के पास पांच करोड़ के बाद भी और परिवारों को यह सहूलियत देने का मौका जुट सकेगा।

मथुरा में ऐसी अराजकता चलने क्यों दी जा रही थी?

संपादकीय
3 जून  2016
उत्तरप्रदेश के मथुरा में सैकड़ों एकड़ सरकारी जमीन बरसों से कब्जा जमाए हुए अराजक लोगों के एक समुदाय को हटाने के लिए जब अदालती आदेश पर पुलिस वहां पहुंची, तो इस समुदाय ने पुलिस पर अप्रत्याशित गोलीबारी करना शुरू कर दिया, जिसमें दो पुलिस अफसर मारे गए। बाद में पुलिस ने जवाबी गोलियां चलाईं, जिसमें करीब 20 लोगों के मारे जाने की खबर है। यह समुदाय एक धार्मिक-आध्यात्मिक किस्म का समुदाय था जो कि भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ बहुत सी सिरफिरी मांगों को करते हुए अपने कब्जे की जमीन पर अपने आपको एक अलग राष्ट्र या अलग शासन जैसा समझ रहा था और कहने के लिए अपने आपको सत्याग्रही भी कहता था। खबरों में यह आया है कि अभी दो बरस पहले तक यह समुदाय उत्तरप्रदेश के एक दूसरे गुरू, जय गुरूदेव के अनुयायियों का था, जो कि अलग होकर यह नया समुदाय बना चुके थे। यह समुदाय भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चुनाव रद्द करने की मांग कर रहा था, और भारतीय नोटों की जगह आजाद हिन्द फौज की करेंसी चलाने, एक रूपए में साठ लीटर डीजल या चालीस लीटर पेट्रोल देने की मांग कर रहा था। इसके हजारों लोग लगातार सरकारी कर्मचारियों से, सरकार के दफ्तरों से टकराव ले रहे थे, और अपने आपको एक अलग कानून बता रहे थे। यह सिलसिला बरसों से चले आ रहा था।
यह हैरानी की बात है कि उत्तरप्रदेश की सरकार ऐसी अराजकता को बरसों से बर्दाश्त करते आ रही थी, और आजाद भारत विधिक वैचारिक सत्याग्रही नाम के इस संगठन की ताकत इतनी बढऩे के पहले इसे हटाने का हौसला सरकार ने नहीं जुटाया था। अपने आपको सत्याग्रही कहने वाले इस समुदाय के लोगों ने हथियार और गोला-बारूद जमा कर रखे थे, और पुलिस के पहुंचने पर उस पर हमला भी किया। खबरों में यह भी आ रहा है कि यहां हथियारों का कारखाना बना रखा था, और इसमें मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ से हथियारों का कारोबार भी चलता था।
लोकतंत्र में जब कभी सरकारें अपनी बुनियादी जिम्मेदारी से बचती हैं, तो अराजकता और जुर्म को ऐसा ही बढ़ावा मिलता है। लोगों को याद होगा कि बहुत पहले अमरीका में अपने आपको ईश्वर मानने वाला एक आदमी ऐसा ही एक बड़ा सा अहाता अपने कब्जे में करके बैठा था, और वहां पर उसे ईश्वर मानने वाले अनुयायी हजारों की संख्या में इक_ा थे। उसके इस डेरे की लंबी नाकाबंदी के बाद जब सुरक्षा बलों ने उस पर कार्रवाई की थी तो कई अफसर मारे गए थे, और इस समुदाय के लोग भी। दोनों तरफ से बड़े-बड़े हथियारों का इस्तेमाल हुआ था, और 51 दिनों तक यह कब्जा चला था। फिर अभी साल भर पहले हरियाणा में रामपाल नाम के एक गुरू ने इसी तरह से अपने आश्रम को हथियारबंद अड्डा बना लिया था और पुलिस को भारी मशक्कत के बाद उस पर कब्जा करके इस गुरू को गिरफ्तार करना पड़ा था।
आमतौर पर ऐसे सम्प्रदायों, समुदायों, और गुरूओं के प्रभाव के वोट पाने की उम्मीद में सत्तारूढ़ नेता इन पर सरकारी कार्रवाई होने नहीं देते, और विपक्ष के नेता इन गुरुओं की आपराधिक ताकत को बढ़ते देखते हुए भी अनदेखा करते चलते हैं। नतीजा यह होता है कि ऐसे गुरू अपने भक्तों से बलात्कार भी करते रहते हैं, उन्हें लूटते भी रहते हैं, उनसे हत्या और दूसरे तरह के जुर्म भी करवाते रहते हैं, और कानून के हाथ उन तक पहुंचने में बरसों की देर भी हो जाती है। आज अगर देखें कि आसाराम को लेकर गिरफ्तार लोग किस तरह के बलात्कार और कत्ल का भांडाफोड़ कर रहे हैं, तो यह समझ आएगा कि कानून से परे की ऐसी धर्मान्ध या अंधविश्वासी ताकत लोगों को अपने आपको कानून और ईश्वर मान लेने का मौका देती है। यह सिलसिला तेजी से खत्म होना चाहिए। आज अगर आसाराम बरसों से जेल में नहीं होता, तो हो सकता है कि और भी बहुत सी नाबालिग बच्चियां तबाह होते रहतीं। आज आसाराम के जेल में रहते हुए भी उसके भक्त देश भर में उसके नाम और तस्वीरों को लेकर सार्वजनिक प्रदर्शन करते ही रहते हैं। हमारा यह पक्का मानना है कि लोकतंत्र की न्याय की बुनियादी जरूरत, बुनियादी शर्त को पूरा न करने वाले लोग अपने जुर्म को ईश्वरीय या दैवीय काम भी मानते हैं। लोकतंत्र में ऐसे बाबाओं और ऐसे सम्प्रदायों के साथ कड़ाई से निपटना चाहिए, न कि इनके जुर्म की, इनके अवैध कब्जों की फेहरिस्त बहुत लंबी हो जाने के बाद। ऐसा एक सम्प्रदाय ऐसे दूसरे सम्प्रदायों को भी बढ़ावा देता है और यह सिलसिला बढऩे नहीं देना चाहिए। 

आग को हवा देने के बजाय उसे बुझाना अधिक महत्वपूर्ण

संपादकीय
2 जून  2016
दिल्ली पुलिस ने मध्यस्थता करके दिल्ली के स्थानीय लोगों और दिल्ली में बसे हुए अफ्रीकी मूल के लोगों के बीच चल रहे तनाव को खत्म करने की कोशिश की है। आमतौर पर सरकार के लिए आलोचक समझे जाने वाले अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने इस पहल और तनाव घटने की रिपोर्ट छापी है, और भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस रिपोर्ट के लिए इस अखबार को ट्विटर पर धन्यवाद दिया है।
नकारात्मक खबरें अखबार में बड़ी आसानी से सुर्खियां बन जाती हैं। हिंसा और साम्प्रदायिकता की खबरें, एक-दूसरे के खिलाफ अश्लील और असंसदीय बयान की खबरें आम बात हैं। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा घटनाओं को सनसनीखेज बनाकर अपने दर्शक या पाठक जुटाने में लगे रहता है। ऐसे में तनाव को घटाने की कोशिशें अधिक मायने रखती हैं, और ऐसी किसी भी कोशिश को प्रमुखता से दिखाने में मीडिया को एक सामाजिक जिम्मेदारी और जवाबदेही भी दिखानी चाहिए। सरकार की बहुत सी खामियां हो सकती हैं, और समाज के अलग-अलग हिंसक तबकों के बहुत से जुर्म भी हो सकते हैं, लेकिन इनकी खबरों को छापने या दिखाने के साथ-साथ यह भी याद रखना चाहिए कि इससे समाज का व्यापक नफा होगा, या व्यापक नुकसान होगा? टीकाकरण के बाद कभी किसी बच्चे की मौत हो जाती है, तो उसे एक अनुपात और जरूरत से अधिक दिखाकर मीडिया एक ऐसी दहशत पैदा कर सकता है जिससे कि बाकी लाखों बच्चे टीकाकरण से दूर रह जाएं। जो भी गलतियां होती हैं, या गलत काम होते हैं, उनसे तो बचने की जरूरत है, लेकिन सरकार और समाज को आगाह करने के साथ-साथ यह भी समझना चाहिए कि मीडिया के मार्फत अगर हिंसा या बेचैनी भड़कती हैं, तो वह बात कहां तक जा सकती है? अभी जैसे छत्तीसगढ़ में  सरकारी स्कूलों में बच्चों को पिलाए गए दूध के बाद दो बच्चों की मौत हुई है, और कुछ जगहों पर बच्चे बीमार भी पड़े हैं। इस मामले की पूरी जांच और कार्रवाई तो जरूरी है, लेकिन सरकार के जनकल्याणकारी कार्यक्रम को गलत ठहराना सही नहीं होगा। यह एक गलती है, और इसे सुधार लेना बच्चों की सेहत के लिए जरूरी और अच्छा होगा, बजाय इसके कि ऐसे कार्यक्रम को खारिज कर दिया जाए।
भारत में दुनिया के बहुत से देशों से आए हुए छात्र-छात्राओं की पढ़ाई चलती है। खुद देश के भीतर बहुत से प्रदेशों के लोग दूसरे प्रदेशों में जाकर पढ़ते हैं, या काम करते हैं। हमने पहले भी देखा है कि जब किसी क्षेत्र, धर्म, रंग, या जाति के लोगों के खिलाफ तनाव भड़कता है, तो उसकी एक प्रतिक्रिया दूसरी जगहों पर भी होती है। भारत में एक अफ्रीकी नौजवान को अगर पीट-पीटकर मार डाला गया है, तो अफ्रीकी देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानियों के साथ वहां के हिंसक लोग इसका हिसाब चुकता कर सकते हैं। इस तरह के तनाव वे ही लोग खड़े करते हैं जिनके अपने लोग दूसरे देश-प्रदेश में बसे हुए नहीं रहते। आज कश्मीर के या उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ देश के बाकी प्रदेशों में बदसलूकी हो, तो इसकी प्रतिक्रिया देश के इन सरहदी प्रांतों में जाने वाले लोगों के साथ हो सकती है।
अगर किसी तरह की हिंसा किसी उत्तेजना या गलतफहमी में हो भी गई है, तो उस पर कड़ी कानूनी कार्रवाई से तुरंत काबू पाना चाहिए, और सोशल मीडिया पर, मूलधारा के मीडिया में, ऐसे मामलों की आग को हवा नहीं देनी चाहिए। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे देश-प्रदेश में अपने चुनावी हिसाब चुकते करने के लिए इन मामलों को न बढ़ाएं। कड़ी से कड़ी कार्रवाई जरूर होनी चाहिए, लेकिन ऐसी जवाबी हिंसा न हो, हिंसा इस तरह से न बढ़े कि आंख के बदले आंख निकालने का सिलसिला पूरी दुनिया को अंधा करके छोड़ दे। 

झूठ और नफरत को आगे बढ़ाने के पहले परख लें..

संपादकीय
1 जून  2016
पिछले दो-चार दिनों से लगातार सोशल मीडिया पर मुंबई के एक गरीब क्रिकेट खिलाड़ी प्रणव धनावड़े को टीम में न लेने की खबरें बनी हुई हैं। प्रणव ने एक स्कूली मैच में एक हजार रन बनाए थे, और मुंबई की अंडर-16 क्रिकेट टीम में सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर को लिया गया है। अब इसे लेकर सचिन पर, उनके बेटे पर लगातार हमले हो रहे हैं और एकलव्य की मिसाल दी जा रही है जिसका अंगूठा कटवाकर गुरू द्रोणाचार्य ने उच्च जाति के कुछ लोगों को आगे बढऩे का मौका दिलवाया था। लोग एक-दूसरे की पोस्ट की हुई बातों को और आगे बढ़ाते जा रहे हैं, और इस बीच हकीकत को कुचलकर खत्म कर दिया जा रहा है।
ऐसे झूठ की एक मिसाल देने के लिए इस मामले पर आज हम यहां लिख रहे हैं। इस बारे में प्रणव धनावड़े ने यह कहा है कि अर्जुन तेंदुलकर को इस टीम के लिए उस वक्त चुन लिया गया था जब उसने (प्रणव ने) हजार रन वाली पारी नहीं खेली थी। दूसरी बात यह कि इस टीम में आने के लिए मुंबई की तरफ से खेलना जरूरी था, और प्रणव के पिता ने एक टीवी चैनल पर कहा है कि उनके बेटे ने उस टीम से खेला ही नहीं था कि उसका चयन हो सकता। प्रणव ने यह भी कहा है कि अर्जुन तेंदुलकर बहुत मेहनती है, और उन्होंने साथ-साथ प्रैक्टिस भी की है, लेकिन उसका चयन अपनी प्रतिभा की वजह से हुआ है, न कि पिता की वजह से।
सोशल मीडिया पर झूठ को बदनीयत के साथ सोच-समझकर शुरू करने की, और फिर उसे आगे बढ़ाने की बहुत सी मिसालें हवा में तैरती हैं, और हम लोगों को ऐसी जालसाजी, धोखाधड़ी, और साजिशों से बचाने के लिए हर कुछ महीनों में नई मिसालों के साथ यहां पर लिखते हैं। अभी एक दूसरा झूठ फैलाया जा रहा है कि एक विख्यात शरबत, रूहअफ्जा बनाने वाली कंपनी हमदर्द के बहिष्कार के लिए लगातार सोशल मीडिया पर यह झूठ फैलाया जा रहा है कि इस कंपनी की दवाओं और इसके बाकी उत्पादों का बहिष्कार इसलिए किया जाना चाहिए कि इसमें हर कर्मचारी का मुस्लिम होना जरूरी है, और इसके डीलर बनने के लिए, डिस्ट्रीब्यूटर बनने के लिए भी मुस्लिम होना जरूरी है। और लोग इस झूठ को चारों तरफ फैलाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ इस कंपनी में काम करने वाले ढेर सारे हिन्दू अफसरों ने इस झूठ के खिलाफ वीडियो बयान जारी किए हैं, और इस कंपनी की वेबसाइट को देखें तो इसके बहुत से विभागों में बहुत सी बड़ी कुर्सियों पर हिन्दू लोग काम कर रहे हैं। इन सबके नाम वेबसाइटों पर हैं, लेकिन झूठ फैलाने वाले इस बात को भी छुपा जाते हैं कि दशकों पहले राकेश नैय्यर और अब्दुल मुईद नाम के दो दोस्तों ने मिलकर हमदर्द नाम की इस कंपनी को आगे बढ़ाया था जिसे कि अब्दुलके पिता हकीम अब्दुल हमीद ने 1906 में शुरू किया था। अब एक  सदी से जिस कंपनी को हिन्दू और मुस्लिम दोनों कर्मचारियों और अधिकारियों ने मिलकर आगे बढ़ाया है, उसके आज इस तरह के साम्प्रदायिक बहिष्कार के पीछे की सोच तो जाहिर है ही, लेकिन जो लोग बिना जांचे-परखे ऐसे झूठ को आगे बढ़ाते हैं, वे लोग भी साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के बराबरी के जिम्मेदार हैं।
आज इंटरनेट की मेहरबानी से हर किसी को यह सहूलियत हासिल है कि वे झूठ पर भरोसा करने के पहले उसे परख सकते हैं, और उसे आगे बढ़ाने के बजाय उसका भांडाफोड़ कर सकते हैं। लेकिन ऐसा न करके जब किसी जाति, धर्म, या रंग, नस्ल या क्षेत्र, देश के खिलाफ नफरत फैलाई जाती है, तो उसकी हिंसक प्रतिक्रिया भी झेलनी पड़ती है। जो झूठ यहां पर किसी दूसरे देश के लोगों के खिलाफ फैलाया जाता है, उसका भुगतान उस दूसरे देश में बसे हुए हिन्दुस्तानियों को तनाव की शक्ल में, हिंसा की शक्ल में झेलना पड़ता है।
इसलिए किसी भी नकारात्मक बात को, अपमानजनक बात को आगे बढ़ाने के पहले उसे परख लेने में ही समझदारी है। ऐसा न करके उसे आगे बढ़ाने वाले लोग अपने आपको गैरजिम्मेदार या उससे भी अधिक, मुजरिम साबित करते हैं। 

स्कूलों में दूध के बाद मौतों से डरने की नहीं, जांच की जरूरत

संपादकीय
31 मई  2016
बस्तर के स्कूलों में दूध पीने के बाद दो बच्चों की मौत डराने वाली है। हम इस पर लिखते हुए यह सावधानी बरत रहे हैं कि इसे दूध पीने की वजह से हुई मौत नहीं बता रहे, क्योंकि यह बात तो सिर्फ पोस्टमार्टम या प्रयोगशाला की जांच से सामने आ सकती है। लेकिन एक अच्छा काम जो कि शुरू हुआ है, उसके खतरे सामने आ रहे हैं। और चूंकि प्रदेश में दसियों लाख बच्चे रोज दोपहर का भोजन स्कूलों में पाते हैं, इसलिए इस बारे में बहुत बड़ी सावधानी की जरूरत भी है।
लंबे समय से देश का संगठित कारोबार यह कोशिश कर रहा था कि स्कूलों का दोपहर का भोजन पकाकर न खिलाया जाए, और उसकी जगह बिस्किट खिला दिए जाएं। जब अर्जुन सिंह मानव संसाधन मंत्री थे तब उनकी बेटी ने मंत्रालय के एक बड़े अफसर से मिलकर बिस्किट निर्माता संघ की वकालत की थी, और वह बात फाईलों पर आ भी गई थी। इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक एक बड़ा अभियान चलाया था, और देश के दसियों करोड़ बच्चों को बिस्किटों से बचाया था। तब से लेकर अब तक गांव-गांव तक स्कूलों में बच्चों को गर्म खाना मिलता है, और बहुत सी जगहों पर इससे जाति व्यवस्था भी टूट रही है क्योंकि खाना पकाने वाली महिला किसी जाति की होती है, और खाने वाले बच्चे सभी जातियों के होते हैं। इसके बाद दोपहर के भोजन को लेकर एक नई बहस शुरू हो रही है जिसमें केंद्र सरकार की तरफ से राज्यों को कहा जा रहा है कि वे बच्चों की पौष्टिक जरूरतों के लिए हफ्ते में कुछ दिन उन्हें अंडा भी खिलाएं। लेकिन दूसरी तरफ कुछ शुद्धतावादी ताकतें इसके खिलाफ हैं, और मध्यप्रदेश में इसे लेकर एक राजनीतिक बहस भी चल रही है जहां भाजपा सरकार घोषित रूप से इसके खिलाफ है। छत्तीसगढ़ में अभी यह बात मुद्दा नहीं बनी है।
इस राज्य में अभी कुछ हफ्ते पहले ही स्कूली बच्चों को दूध देने के लिए राज्य के दुग्ध महासंघ के साथ शासन  ने यह कार्यक्रम शुरू किया था, और इसमें यह हादसा हो गया। यह बात सही है कि पैकेटबंद दूध में बहुत दूर के गांवों तक इतनी गर्मी में पहुंचते हुए खराब हो सकता है, लेकिन इस एक हादसे से इस योजना को खत्म नहीं करना चाहिए बल्कि इसकी जांच करके ऐसा इंतजाम करना चाहिए कि बच्चों को दूध मिल सके, और दूध खराब होने से पहले मिल सके। हमको याद है कि आज से पचास बरस पहले इस राज्य की स्कूलों में यूनिसेफ की तरफ से आए दूध पावडर को उबालकर उससे दूध बनाकर बच्चों को पिलाया जाता था, और विटामिन की गोली भी दी जाती थी। अब शासन और दुग्ध महासंघ को यह देखना है कि क्या दूर के इलाकों में दूध की जगह दूध पावडर भेजना सेहत के फायदे का होगा और अधिक व्यावहारिक भी होगा? जो भी हो एक तरीका ऐसा निकालना चाहिए कि बच्चों को अच्छे से अच्छा खाना-पीना मिल सके जिससे छत्तीसगढ़ की आने वाली पीढिय़ां कुपोषण से निकलें।

इंसान की बेइंसाफ जुबान, जानवर से इंसान तक जारी

30 मई 2016

अभी कुछ दिन पहले बिहार की एक बच्ची की तस्वीर आई जिसमें एक जेनेटिक गड़बड़ी की वजह से उसकी आंखें बाहर निकली हुई दिखती थीं। नतीजा यह था कि उसे स्कूल के दूसरे बच्चे मेढकी कहकर इस कदर चिढ़ाते थे कि उसने स्कूल जाना बंद कर दिया। अब उसकी हसरत तो है एक डॉक्टर बनकर इस बीमारी का इलाज ढूंढने की ताकि ऐसे दूसरे बच्चे तकलीफ न पाएं, दूसरे बच्चों की यातना का शिकार न हों, लेकिन जब स्कूल में ही बच्चे उसका जाना मुश्किल कर चुके हैं, तो मेडिकल कॉलेज भला पहुंचे भी तो कैसे।
लेकिन दुनिया के देशों के सभ्य होने का यह एक सबसे बड़ा पैमाना है कि वहां पर कमजोर लोगों के साथ कैसा बर्ताव होता है। रूपए-पैसे से कमजोर, रूप-रंग से कमजोर (माने जाने वाले), देह की ताकत से कमजोर, इम्तिहान में नंबरों से कमजोर, ऐसे कई किस्म के लोगों के साथ बाकी लोगों का बर्ताव बताता है कि वह समाज कितना सभ्य है। आमतौर पर किसी देश को उसके शहरी ढांचे से, उसकी अर्थव्यवस्था से, आसमान को छूती इमारतों से विकसित मान लिया जाता है, लेकिन विकास का यह एक बहुत ही सतही और कम अहमियत वाला पैमाना है। विकास का असल पैमाना है कि वहां के लोगों में अपनी जिम्मेदारी और दूसरों के हक को लेकर कितनी जागरूकता है। भारत जैसे देश में अगर देखें तो लगभग तमाम लोगों की लगभग तमाम जागरूकता दूसरों की जिम्मेदारी और अपने हक को लेकर होती है।
भारत की जुबान जो कि हजारों बरस से चली आ रही है, ऐसी गजब की बेइंसाफी से भरी हुई है कि उसके बारे में लिखते हुए हम कभी थकते नहीं हैं। यहां की आज की खड़ी बोली कही जाने वाली हिन्दी से परे भी जो लोकभाषाएं हैं, क्षेत्रीय बोलियां हैं, यहां का जो पुराना साहित्य है, लोकोक्तियां और कहावत-मुहावरे हैं, वे सबके सब कमजोर लोगों पर हमला करने वाले हैं। सबसे पहले तो देखें कि इंसानी बिरादरी अपनी आधी आबादी, औरतों को लेकर जिस जुबान का इस्तेमाल करती है, उससे वहां पर महिलाओं की बदहाली का अंदाज लगता है।
कहने के लिए तो भारत देवियों की पूजा करने वाला देश है, लेकिन यह देवियां जब तक मिट्टी या पत्थर की प्रतिमाओं में कैद रहती हैं, तभी तक उनकी पूजा होती है, और इस कैद से बाहर निकलते ही महिलाओं को मारना शुरू हो जाता है। अब महिलाओं के बारे में अपमानजनक जुबान पहले शुरू हुई, या उनका अपमान पहले शुरू हुआ यह तो पहले मुर्गी या पहले अंडे जैसी बात है। लेकिन औरत को बदचलन कहना, उसके पति खोने को उसका जुर्म मान लेना, उसे सती होने के लायक करार देना, उसे लात-घूंसों के लायक समझना जैसी बातें भारत की जुबानों में बड़ी आम हैं। हो सकता है कि एक वक्त सामाजिक बेइंसाफी को देखते हुए यह जुबान बनी हो, लेकिन आज इस बेइंसाफी के खिलाफ कानूनी इंतजाम के बावजूद यह जुबान गई नहीं है। आज भी कदम-कदम पर महिलाओं को जींस से लेकर मोबाइल फोन तक से रोका जाता है, और अंधेरे के बाद घर के बाहर निकली महिला को अनिवार्य रूप से बदचलन, और बलात्कार का न्यौता बांटते घूमने वाली मान लिया जाता है।
लेकिन लोगों की सोच में बेइंसाफी कतरे-कतरे में नहीं आती, एकमुश्त आती है, या एकमुश्त जाती है। भारत की जुबानों की ही हमको अधिक समझ है इसलिए यहीं की बात करना ठीक है। यहां हिन्दी से परे भी कई क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में कमजोर लोगों के लिए जितनी हिकारत है, उसका सदियों का इस्तेमाल लोगों को उस हिकारत को न्यायसंगत और तर्कसंगत मनवाने लगता है। अब इंसानों के लिए ही इस्तेमाल होने वाले कुछ शब्दों को देखें, तो जिसके पैरों में दिक्कत है उसे लंगड़ू कहना, जिसके हाथ कटे हैं या नहीं हैं, उसे ठुठवा कहना, जिसके कान कमजोर हैं, उसे भैरा (बहरा) कहना, जिसकी चमड़ी पर काले-सफेद दाग हैं उसे कबरा (चितकबरा)कहना, जो अधिक गोरा है उसे भुरवा कहना, जिसकी रीढ़ की हड्डी में दिक्कत है उसे कुबड़ा कहना, जिसे देखने में दिक्कत हो उसे अंधड़ा कहना, कद कम हो तो बठवा, दुबला हो तो सुकड़ू कहना भारत में आम चलन में है, और जब तक अपने खुद के घरवाले इनमें से किसी किस्म की दिक्कत न झेल रहे हों, तब तक तकरीबन तमाम लोग धड़ल्ले से इन बातों का इस्तेमाल करते हैं।
किसी के रंग को लेकर, जिस पर कि उसका कोई बस नहीं हो सकता, उसे काली-कलूटी कहना, दांत आड़े-तिरछे हों, तो उसे खेबड़ा कहना बड़ी आम बात है। और इसके साथ-साथ लोगों की आर्थिक स्थिति को देखकर उसे फटीचर कहना, दो कौड़ी का कहना, सड़कछाप कहना भी हमारी रोज की जिंदगी का हिस्सा है।
लेकिन इसके साथ-साथ जिस तरह की हिकारत हमारे मन में जानवरों को लेकर है, उसके खत्म हुए बिना इंसानों के लिए हिकारत अलग से खत्म नहीं हो सकते। हिन्दी और इससे जुड़ी हुई बोलियों में हजारों ऐसी कहावतें हैं जिनमें इंसान के सबसे वफादार जानवर-साथी, कुत्ते के लिए गालियां हैं। यहां तक कि शाकाहारी इंसान भी गाली देते हुए कुत्ते का खून पीने की बात कहते हैं, दूसरों को कुत्ते की मौत मरने की दुआ देते हैं, किसी की हरकतों को बहुत ही कुत्ती कहकर गाली देते हैं, और यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। इंसान से अधिक अहसानफरामोश कोई नस्ल नहीं है क्योंकि यह सबसे अधिक मेहनत करने वाले प्राणी को गधा या बैल कहकर गाली देती है। अब मान लो गधा इंसान का लादा बोझ लेकर भाग निकलता, और किसी ट्रक ड्राइवर की तरह बाजार में बेचकर चल निकलता तो शायद इंसान गधे को मूर्ख कहना बंद करता। लेकिन जब तक गधा इंसान को धोखा नहीं दे रहा है, वह गालियों का ही हकदार है। ऐसी नाजायज सोच वाले इंसान अपनी इस सोच के चलते ही बाकी इंसानों के लिए भी नाजायज समझ विकसित कर लेते हैं, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे आगे बढ़ाते चलते हैं।
हैरानी इस बात की है कि इंसानों या बाकी प्राणियों में भी जो वफादार हैं, और जो मेहनतकश हैं, उनको गालियों का हकदार मान लिया जाता है। इस सोच के बारे में सोचने की जरूरत है, जुबान को बेइंसाफी से परे लाने की जरूरत है, अहिंसक बनाने की जरूरत है।