धर्म के नाम पर जारी हिंसा लोकतंत्र में समाधान के रास्ते

संपादकीय
7 जुलाई  2016
आज जब पूरी मुस्लिम दुनिया, और दुनिया भर के मुस्लिम ईद की नमाज पढ़ रहे थे, सालाना खुशियां मना रहे थे, तब बांग्लादेश में एक बार फिर मजहब के नाम पर दहशत फैलाने वाले लोगों ने धमाका किया, और लाखों की भीड़ के बीच मौतें तो कम हुईं लेकिन यह बात जाहिर हुई कि आतंकियों की नजरों में उस धर्म के किसी त्यौहार का भी कोई मतलब नहीं है, जिस धर्म का नाम लेकर वे हिंसा कर रहे हैं, और लहू बिखेर रहे हैं। दूसरी तरफ भारत में मुस्लिम समाज के एक प्रवचनकर्ता जाकिर नाईक की बातों को भड़काऊ और हिंसक मानते हुए उनके खिलाफ प्रतिबंध की मांग की जा रही है, और ईद के इस मौके पर मुंबई में उन पर कार्रवाई के बैनर भी देखने मिले। दो दिन पहले ही यह रिपोर्ट आई थी कि मुस्लिमों के इस पवित्र महीने रमजान में दुनिया में जगह-जगह इस्लाम के नाम पर कितनी हिंसा हुई, और कितने लोग मारे गए। दूसरी एक रिपोर्ट पिछले साल-दो साल से हर कुछ हफ्तों में आती ही है कि किस तरह खाड़ी के देशों में इस्लामी आतंकी अपने कब्जे में रखी गई, गुलाम बनाई गईं लड़कियों की नीलामी इंटरनेट और वॉट्सऐप पर करते हैं। ये तस्वीरें भी सामने आईं कि इस्लामिक स्टेट के आतंकी किस तरह एक कमरे में बैठे हुए ठहाके लगा रहे हैं, और उन्हीं के पीछे उनके साथी किस तरह लड़कियों से बलात्कार कर रहे हैं।
दुनिया में धर्म के नाम पर हिंसा और आतंक का लंबा इतिहास है। भारत के बगल के म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यकों ने जिस अंदाज में वहां के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को मारना जारी रखा है, उसे खत्म करवाने में वहां की नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त सत्तारूढ़ आंग-सान-सू-की की भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखती है। लेकिन धर्म का हिंसा से लेना-देना नया नहीं है। हिटलर के इतिहास को खोलकर देखें तो दिखता है कि किस तरह चर्च की मदद से हिटलर सत्ता में आ पाया था। और दूसरी तरफ वेटिकन का इतिहास देखें तो यह बात अच्छी तरह दर्ज है कि किस तरह पोप ने अपने पादरी-साथियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण के मामलों को दबाने का काम किया, और ऐसे धार्मिक चोगों को जेल जाने से बचाकर रखा। भारत में कई धर्मों में तरह-तरह की हिंसा दिखाई पड़ती है, और हिन्दुओं में भी सतीप्रथा से लेकर कन्या भ्रूण हत्या, और देवदासी प्रथा जैसी कई तरह की हिंसा रही है, और अभी तो मोदी सरकार की जांच एजेंसी ही अदालत में ले जाकर एक हिन्दू संगठन के खिलाफ सुबूत पेश कर रही है कि किस तरह उसने एक न्यायप्रिय व्यक्ति नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या की थी, और आतंक की और घटनाओं की साजिश रची थी।
दरअसल धर्म की सोच को जब तक लोकतंत्र और न्याय की आधुनिक सोच के साथ नहीं ढाला जाएगा, तब तक धर्म का आतंक और हिंसा से रिश्ता टूट नहीं पाएगा। भारत में बहुत से मामलों में यह साम्प्रदायिक या कट्टर जिद सामने आती है कि धार्मिक मान्यता या आस्था, या धार्मिक रीति-रिवाज कानून से ऊपर हैं, संविधान से ऊपर हैं। और जब सरकारें ऐसी सोच को बढ़ावा देती हैं, तो फिर भावनाओं को भड़काकर अपनी ठेकेदारी चलाने वाले लोग इसे हिंसा तक ले ही जाते हैं, और फिर एक धर्म के भीतर चल रहे भड़कावे के जवाब में दूसरे धर्म के लोगों के बीच भी जवाबी भड़काना शुरू हो जाता है, आगे बढऩे लगता है। भारत जैसे लोकतंत्र में इस बात की बड़ी साफ जरूरत है कि तमाम किस्म की आस्थाओं को कानून के तहत ही रखा जाए, न कि छांट-छांटकर, समय और माहौल देखकर उन्हें कानून से ऊपर साबित करने की कोशिश की जाए। आज बहुत से मामलों में ऐसा दिखता है कि केन्द्र या राज्य सरकारें, राजनीतिक दल और बाकी संगठन धार्मिक भावनाओं को कानून से ऊपर बिठाने कीक कोशिश करते हैं, और देश की अदालतों को ऐसी कोशिशों के खिलाफ फैसले देने पड़ते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और देश के लोगों के बीच एक वैज्ञानिक और न्यायप्रिय, लोकतांत्रिक और तर्कसंगत सोच विकसित होने देनी चाहिए, वरना यह देश कई सदी पीछे पहुंच जाएगा।

अब स्मृति शेष

संपादकीय
6 जुलाई  2016
केंद्र सरकार में कल हुए फेरबदल को लेकर इसी जगह हमने मंत्रियों के चेहरों और विभागों में फेरबदल को बेहतर कामकाज के लिए एक जरूरी रास्ता कहा था। कल शाम होते-होते यह खबर आ गई कि स्मृति ईरानी अब देश की शिक्षा (मानव संसाधन) मंत्री के बजाय, कपड़ा मंत्री रहेंगी। इस घोषणा के कई घंटे पहले हमने जो लिखा था, वह ऐसे ही फेरबदल को लेकर था कि जो लोग अपने काम को ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, या तो उन्हें हटाकर दूसरों को मंत्रालय दिए जाएं, या फिर उनके विभाग बदलकर उन्हें कोई दूसरा काम दिया जाए। देश की शिक्षा में जितनी तबाही स्मृति ईरानी के इन दो बरसों में हुई, उसकी अगले ढाई-तीन बरस में प्रकाश जावड़ेकर कितनी भरपाई कर पाएंगे, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन मोदी सरकार की पहली लिस्ट में जो सबसे विनाशकारी पसंद थी, वह अब देश के सामाजिक तानेबाने को छिन्न-भिन्न करने के बजाय कपड़ों के तानेबानों में उलझी रहेगी, यह देश की आने वाली पीढिय़ों के लिए बड़ी राहत की बात है।
इससे कुछ कम राहत की बात यह है कि विदेश मंत्रालय में अब तक राज्य मंत्री चले आ रहे भूतपूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह के अलावा एम.जे. अकबर भी विदेश राज्य मंत्री रहेंगे। अकबर पहले लंबे समय तक अखबारनवीस रहे, फिर वे कांगे्रस पार्टी में जाकर पार्टी प्रवक्ता भी रहे, और चुनाव भी लड़ा। फिर उन्होंने अपने उगले हुए लाखों शब्दों को निगलते हुए अब मोदी का साथ चुना, और कल मंत्री बने। अखबारनवीसों की जिस नस्ल को जनरल वी.के. सिंह वेश्याओं के बराबर गिनते हुए प्रेस्टीट्यूट कहते हैं, उसी नस्ल में कोई चौथाई सदी काम करने वाला अब उन्हीं की बराबरी में आकर बैठा है, और ऐसा समझ पड़ता है कि विदेश मंत्रालय में इस बड़बोली तोप के मुकाबले एक सूखी हुई कलम को अधिक महत्व मिलेगा। वी.के. सिंह ने बेमौके के अपने बेतुके बयानों को लेकर जो रिकॉर्ड कायम किया था, वह बेमिसाल है, और विदेश मंत्रालय जैसे नाजुक काम में उन्होंने फौजी बूटों से काम लिया, और खासी तबाही की। लेकिन इस फेरबदल में जो एक-दो उम्मीदें की जा रही थीं, उनका न होना भी एक किस्म का संदेश है। मोदी मंत्रिमंडल के जो लोग घोर साम्प्रदायिक और हिंसक बयानों के लिए जाने जाते हैं, उनकी बिदाई की अटकलें चल रही थीं, उनमें से एक राम शंकर कठेरिया का हटना जरूर हुआ है, लेकिन उनके कुछ और तेजाबी भाई-बहन मंत्रिमंडल में बने हुए हैं।
जैसा कि हमने कल भी लिखा था, किसी भी पार्टी की सरकार में लोगों का फेरबदल कम से कम एक बार जरूर होना चाहिए, और ऐसा होने पर अगले चुनाव की टिकटों की लिस्ट में बदलने वाले चेहरों की गिनती कम हो सकती है। खराब काम करने वाले, बदनामी वाले, भ्रष्टाचार और विवाद में फंसे हुए लोग अगर पूरे पांच बरस जारी रहते हैं, तो हो सकता है कि वे तो अपनी भारी-भरकम कमाई की वजह से अगला चुनाव जीत भी जाएं, लेकिन वे बाकी तमाम सीटों पर थोड़ा-थोड़ा नुकसान करके पार्टी की संभावना को तबाह कर सकते हैं, करते हैं। मोदी सरकार में अब कोई बड़ा फेरबदल बाकी नहीं है। लेकिन देश के राज्यों में न सिर्फ भाजपा की सरकारों को, बल्कि सभी पार्टियों और गठबंधन की सरकारों को एक मध्यावधि-फेरबदल करना ही चाहिए, ऐसा करने पर मंत्रियों, विधायकों से लेकर सरकार और जनता का भी भला होगा। बिना फेरबदल पांच बरस बहुत लंबा वक्त होता है, और कोई यह कल्पना भी कर सकता है कि पांच बरस शिक्षा मंत्री रहते हुए स्मृति ईरानी देश का क्या हाल करके गई होतीं?

फेरबदल और नए खून से सरकार को फायदा तय...

संपादकीय
5 जुलाई  2016
केंद्र की एनडीए सरकार के मंत्रियों में आज बड़ा फेरबदल हुआ है, और अभी तक उन्नीस नए मंत्रियों की शपथ हो चुकी है, पांच राज्य मंत्रियों के इस्तीफे हो चुके हैं, और हो सकता है कि अगले कुछ घंटों में कई मंत्रियों के विभाग बदल जाएं। दो ही दिन पहले मध्यप्रदेश में भी ऐसा ही कुछ हुआ है, और यह मानकर चलना चाहिए कि यह सरकार के भीतर अपने कार्यकाल की मध्यावधि में लिए गए फैसले हैं, जो कि एक असरदार बात हो सकती है। हम महज फेरबदल के लिए किसी फेरबदल की बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन जब किसी पार्टी या गठबंधन में बहुत से लोग मौका पाने से बचे हुए हों, उस वक्त मौजूदा लोगों को मूल्यांकन के बिना जारी रखना शायद सबसे अच्छा फैसला न होता हो।
ऐसा कभी भी नहीं हो सकता कि किसी सरकार में काम करने वाले सारे के सारे मंत्री अच्छा काम करने वाले हों, और उस पार्टी या गठबंधन में मंत्री बनने से रह गए बाकी लोगों में मंत्रियों से बेहतर कोई हो ही नहीं। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य को अगर हम देखें, तो दर्जन भर मंत्रियों की सीमा ऐसी है कि जिसमें क्षेत्र, जाति, गुट, और वरिष्ठता को देखते हुए फेरबदल की अधिक गुंजाइश शायद न निकलती हो, लेकिन फिर भी अगर सत्तारूढ़ संगठन और मुख्यमंत्री सरकार के कार्यकाल के बीच अगर ऐसा फेरबदल कर सकें, तो फेरबदल के पहले, और फेरबदल के बाद भी मंत्री अपना कामकाज बेहतर रखने की कोशिश करेंगे, और सार्वजनिक छवि का ख्याल भी रखेंगे। यह जरूरत सिर्फ छत्तीसगढ़ की नहीं है, किसी भी राज्य की है, और केंद्र सरकार की भी है। पूरे पांच बरस बिना फेरबदल चलने के नुकसान भी होते हैं, और ऐसी यथास्थिति मंत्रियों को लापरवाह भी बना देती है। इसलिए लोगों में फेरबदल, विभागों में फेरबदल, अधिकारियों में फेरबदल, काम की जगहों में फेरबदल एक निरंतर सिलसिला रहना चाहिए, ताकि लोग अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन करके दिखा सकें।
अब केंद्र की मोदी सरकार और छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे राज्यों की भाजपा की प्रदेश सरकारों का अगले चुनाव के हिसाब से कामकाज शुरू हो चुका है। पिछले चुनावों में यह देखने में आया है कि बैठे हुए सांसदों और विधायकों में से जहां-जहां अगले चुनाव में चेहरों को बदला गया है, वहां-वहां जीत का अनुपात बढ़ गया है। इससे भी लोगों को यह नसीहत लेनी चाहिए कि फेरबदल से आने वाला ताजा खून कामकाज को बेहतर बनाता है। छत्तीसगढ़ समेत बहुत से प्रदेशों में चुनावी रिकॉर्ड बताते हैं कि कई मंत्री अपनी तमाम ताकत के बावजूद चुनाव में निपट भी सकते हैं। ऐसी नौबत भी किसी पार्टी को न देखनी पड़े, इसके लिए भी सत्ता से जुड़ी कुर्सियों पर पांच साल के पट्टों के बजाय एक मध्यावधि-मूल्यांकन आधारित फेरबदल अधिक काम का हो सकता है। 

निजी जिंदगी में झांकते सरकार और कारोबार

संपादकीय
4 जुलाई  2016
ब्रिटेन में अभी सरकार और बाजार मिलकर एक नया प्रयोग शुरू कर रहे हैं जिसमें शहरों के बाजारों से निकलने वाले लोगों के मोबाइल फोन को वाईफाई के स्कैनर से दर्ज किया जाएगा, और उससे यह विश्लेषण किया जाएगा कि कौन से ग्राहक किस वक्त, किस दुकान के सामने से गुजर रहे हैं। जीवन की निजता के हिमायती लोग इस बात को निजी जिंदगी में दखल भी मान रहे हैं, और उनका यह भी मानना है कि ऐसे इकट्ठा की गई जानकारी का कई तरह से बेजा इस्तेमाल हो सकता है। लोग वैसे भी सड़कों पर लगे हुए सीसी टीवी कैमरों, कारों की नंबर प्लेट का रिकॉर्ड रखने वाले स्कैनरों को, पार्किंग मीटरों को निजी जीवन में दखल मान ही रहे हैं, और उसके खिलाफ दुनिया के विकसित देशों में एक आवाज उठ रही है।
हॉलीवुड में कुछ ऐसी फिल्में बन चुकी हैं जिनमें यह दिखाया गया है कि सरकार और कारोबार मिलकर कानूनी और गैरकानूनी तरीके से किस तरह उपग्रह और संचार प्रणाली का इस्तेमाल करके किसी भी व्यक्ति का कहीं भी छुपना नामुमकिन कर सकते हैं। लोगों को याद होगा कि अमरीका कई बरस तलाश करने के बाद भी ओसामा-बिन-लादेन तक नहीं पहुंच पाया था क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि लादेन कोई फोन या कम्प्यूटर इस्तेमाल नहीं करता था। अगर वह फोन पर रहता तो शायद बरसों पहले मारा गया होता। लेकिन टेक्नालॉजी के इस्तेमाल को लेकर लोगों के दिमाग में यह बात अब तक बैठ नहीं रही है कि मासूम लगते इस्तेमाल को गिनाते हुए जो निजी जानकारी जुटाई जाती है, उसे मुजरिम और बाजार दोनों अपने लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। आज जब भारत जैसे बड़े देश में सरकारी वेबसाइटों पर आए दिनों चीन में बैठे हैकर घुसपैठ करते रहते हैं, जब दुनिया के बड़े-बड़े बैंकों में कम्प्यूटरों के रास्ते घुसकर अरबों-खरबों की लूट हो जाती है, तब भारत के आधार कार्ड जैसे साधारण दस्तावेज पर दर्ज निजी जानकारी कई तरह से लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
अभी दो दिन पहले रायपुर म्युनिसिपल में यह घोषणा की कि हर घर के बाहर एक बायोमेट्रिक नेमप्लेट लगाई जाएगी जिस पर परिवार के लोगों के बारे में जानकारी दर्ज होगी, और म्युनिसिपल के कोई भी कर्मचारी एक मामूली कम्प्यूटर एप्लीकेशन से उस जानकारी को पढ़ सकेंगे। अगर यह बात सही है, तो यह मुजरिमों के लिए बहुत मजे की बात हो सकती है। वे किसी घर के बाहर जाकर ऐसे एप्लीकेशन से यह जान सकते हैं कि घर में किस-किस उम्र के कितने लोग रहते हैं, और फिर उस हिसाब से जुर्म की साजिश तैयार कर सकते हैं। आज भी इंटरनेट पर सरकार की तरफ से हर वाहन की जानकारी मौजूद है, और किसी गाड़ी के नंबर को डालकर न सिर्फ उसके मालिक का नाम-पता पाया जा सकता है, बल्कि यह भी पता लग जाता है कि उस पर किस कंपनी का कर्ज है। अब इस जानकारी को लेकर कोई अगर उस कंपनी के कम्प्यूटरों में घुसपैठ कर ले, तो कर्जदार के खाते की और तमाम जानकारियां मिल सकती हैं। यह सब काम घरों में बैठे हुए छोटे-छोटे बच्चे भी कर रहे हैं, और हैकिंग को लेकर किताबें भी लिख रहे हैं।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को अनिवार्य करने के खिलाफ एक जनहित याचिका पर सुनवाई अभी जारी रखी है, और यह बात तय है कि सरकार के रिकॉर्ड में आने वाली बहुत सी बातों की हिफाजत आसान बात नहीं होगी, और निजी जानकारियों को पाकर लोग कई तरह से उसका नाजायज इस्तेमाल करेंगे। आज हर हफ्ते ऐसी खबरें आती हैं कि देश में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली रेलवे की रिजर्वेशन वेबसाइट को तोडऩे के लिए बाजार में कुछ सौ रूपए में ही तरह-तरह के कम्प्यूटर एप्लीकेशन मिल जाते हैं, और रिजर्वेशन-एजेंट आम मुसाफिरों को पीछे छोड़कर ऑनलाईन अपना काम पहले कर लेते हैं, और जायज मुसाफिरों के लिए सीट नहीं बचती। इसलिए सरकार को अपनी जुटाई गई जानकारी को सम्हालकर रखने की अपनी क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आंकना चाहिए, क्योंकि आज जो सुरक्षित दिख रही है, कल वहां तक पहुंचने का तोड़ निकल आएगा, तो ऐसी जानकारी देने वाले लोग उसके शिकार होंगे। सरकार और कारोबार इन दोनों की नीयत लोगों की निजी जिंदगी में ताक-झांक की रहती है और यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

ऐसे हिंदुस्तान का तो ऊपरवाला ही मालिक

संपादकीय
3 जुलाई  2016
पंजाब के एक आम आदमी पार्टी विधायक के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया है कि उसने किसी को एक करोड़ रुपए में एक धार्मिक ग्रंथ जलाने का ठेका दिया था। अकाली दल की सरकार की पुलिस ने जुर्म दर्ज कर लिया है और ऐसी आशंका है कि जल्द ही इस विधायक की गिरफ्तारी हो सकती है। जहां तक हमारी आम समझ साथ देती है, तो हमें यह बात गले नहीं उतरती कि ऐसा काम करने के लिए कोई विधायक इतनी बढ़ी रकम का ठेका देगा। और यह आशंका अधिक लगती है कि पंजाब में सामने खड़े चुनावों को देखते हुए कोई साजिश ऐसी शिकायत के पीछे हो।
हिन्दुस्तान की हालत देखें तो लगता है कि यह देश बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के कवर्धा में एक शिवलिंग तोड़़ दिया गया और भारी तनाव खड़ा हो गया। बड़े-बड़े अफसरों को जाकर वहां डेरा डालना पड़ा और हालात मरने-मारने के हो चुके थे। यह तो कवर्धा की जिला पुलिस ने तेजी से काम करके एक हिंदू नौजवान पुजारी को गिरफ्तार किया जिसने कि कोई सिद्धि प्राप्त करने के लिए शिवलिंग को तोड़ा था। अब सवाल यह है कि इस पूरे देश में हर एक-आधी मील पर कोई न कोई धर्मस्थल है जो कि बिना किसी हिफाजत के है। ऐसे में किसी भी जगह किसी जानवर को मारकर फेंकना साम्प्रदायिक दंगा भड़काने के लिए काफी है। अलग-अलग धर्म अलग-अलग जानवरों को लेकर भारी संवेदनशील हैं, और अलग-अलग धर्मों के गं्रथ भी ऐसे हैं कि उनके कुछ पन्नों को सड़क पर फेंककर या आग लगाकर दंगा फैलाया जा सकता है। इनमें से कोई भी बात हिफाजत में नहीं आ सकती। धार्मिक किताबें बाजार में हैं, लावारिस जानवर सड़कों पर हैं, और धर्मस्थल खुले हुए हैं। ये तीन चीजें मिलकर देश के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन सकती हैं, और शरारत या साजिश करने वाले लोग, या कोई सिरफिरे या विक्षिप्त लोग अनजाने में भी ऐसी हरकत कर सकते हैं जिससे कि दंगा हो जाए।
भारत को धर्मांधता से, कट्टरता और अंधविश्वास से उबरना होगा। लेकिन हालत यह है कि नेहरू के वक्त से लेकर आज तक लगातार देश में अंधविश्वास बढ़ा है, और नेताओं ने, पार्टियों ने थोक में धर्मांधता भी बढ़ाई है। नेहरू ने हिंदुस्तानियों में जो वैज्ञानिक सोच विकसित करने की कोशिश की थी, उसे उनकी बेटी भी आगे नहीं बढ़ा पाई। और जब इंदिरा गांधी ने जाकर मचान पर टंगे हुए देवरहा बाबा के पांव तले अपना सिर रखा था, तब यह जाहिर हो गया था कि नेहरू का युग इस देश में खत्म हो गया। और आज तो हाल यह है कि बड़े-बड़े नेता और बड़ी-बड़ी पार्टियां लगातार लोगों के बीच कट्टरता को बढ़ाते हुए दिखती हैं। यह देश धर्म में डूबा हुआ देश है, और 21वीं सदी में पहुंचने से इनकार कर रहा है। इसके लोगों को लगातार कट्टरता में भिगाकर रखा जा रहा है, और ये लोग पेट्रोल में भीगे हुए खतरनाक लोगों की तरह हैं, और ये बारूद के ढेर पर बैठे हुए हैं। ऐसे देश का, आस्थावान लोगों की जुबान में, ऊपरवाला ही मालिक है।

ढाका पर आतंकी हमले के खतरे मुंबई हमले से कम नहीं

संपादकीय
2 जुलाई  2016

पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की राजधानी ढाका में कल आईसिस के आतंकियों ने मुंबई हमले की तर्ज पर हमला कर दिया और लोगों को बंधक बनाया। वहीं कल ही फिर एक हिंदू पुजारी की हत्या कर दी गई। ये कोई पहला मामला नहीं है जब गैर-मुस्लिम की हत्या हुई हो। बीते महीने ही एक पुजारी की हत्या तब कर दी गई जब वह मंदिर जा रहे थे। बांग्लादेश में पिछले कुछ वक्त से धर्मनिरपेक्ष या उदारवादी ब्लॉगरों की भी हत्याएं हो रही हैं और वहां के धार्मिक अल्पसंख्यकों की भी।  एक बौद्ध मठ में सत्तर बरस के एक बौद्ध भिक्षु की गला काटकर हत्या कर दी गई थी।  इन हमलों की जिम्मेदारी आईसिस ने ली है, हालांकि बांग्लादेश सरकार ऐसे किसी संगठन की देश में मौजूदगी से साफ इंकार करती रही है।
आज खाड़ी के और अफ्रीका के कुछ देशों में इस्लाम के नाम पर बड़े पैमाने पर हिंसा की प्रतिक्रिया योरप और अमरीका जैसे देशों में मुस्लिम आबादी और मुस्लिम शरणार्थियों के प्रति नफरत की शक्ल में सामने आ रही है। योरप के शांत देशों में भी नवनाजीवादी नस्लभेदी सड़कों पर हैं और फिर हिटलर के नामलेवा खबरों में हैं। इस तरह इस्लामी आतंकवाद ऐसे हिंसाग्रस्त देशों में तो मुस्लिमों को ही मार रहा है, वह बाकी देशों में भी मुस्लिमों को शक से लाद रहा है। साम्प्रदायिक ताकतें ऐसा ही  ध्रुवीकरण चाहती भी हैं, लेकिन सभ्य और समझदार लोकतंत्र वाले देश अपनी पूरी ताकत से ऐसी नौबत से जूझ रहे हैं और इसीलिए लंदन में एक मुस्लिम मेयर चुना जा रहा है, तमाम साम्प्रदायिक प्रोपेगंडा के बावजूद।
भारत में जो लोग मुस्लिमों के खिलाफ नफरत को हवा देते हैं, वे न देखे हुए लोग हैं। वे यह समझ नहीं सकते कि इसकी कैसी प्रतिक्रिया मुस्लिम या इस्लामी देशों में काम करने वाले हिंदुस्तानियों को झेलनी पड़ती है। खुद हिंदुस्तान के भीतर धर्मों के बीच का तनाव, क्षेत्रीयता के बीच का तनाव लोगों का बड़ा नुकसान करता है। कई बार उत्तर-पूर्वी राज्यों में हिंदीभाषी लोगों को चुन-चुनकर थोक में मारा जाता है। कभी यह बाकी हिंदुस्तान में उत्तर-पूर्वी लोगों के साथ हिंसा के जवाब में होता है, तो कभी उत्तर-पूर्व की हिंसा के जवाब में बाकी हिंदुस्तान में हिंसा होती है।
आमतौर पर ऐसी हिंसा वे लोग करते हैं, जो अपने इलाकों में हिफाजत से जीते रहते हैं। जिनके घरों के लोग दूसरे देश-प्रदेश में दूसरी जाति, धर्म, रंग के लोगों के साथ जी रहे हैं, वे अपने इलाकों में भी हिंसा से बचते हैं, दूर रहते हैं। नेहरू के वक्त से राष्ट्रीय स्तर के सार्वजनिक-उद्योगों और राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों ने देश को एकजुट रखने का बहुत बड़ा काम किया था। बांग्लादेश-पाकिस्तान, या म्यांमार जिस तरीके से अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के शिकार हैं, उसका नुकसान दूर तक और देर तक होगा। भारत के सबसे बड़े बौद्ध धर्म स्थल बोधगया में कुछ बरस पहले आतंकी धमाके हुए तो उन्हें म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड में मुस्लिमों द्वारा बौद्ध लोगों की हत्याओं का जवाब बताया गया और कई मुस्लिम गिरफ्तार भी हुए। श्रीलंका ने तो यह शक भी जाहिर किया था कि इसके पीछे श्रीलंकाई तमिलों का आतंकी संगठन लिट्टे भी हो सकता है जिसे कि श्रीलंका में बौद्ध-बहुल सरकार के हाथों हिंसा झेलनी पड़ती है।
सभी लोगों को हिंसा से बचना चाहिए क्योंकि हिंसा जमीन के भीतर के पानी सरीखी होती है, जो बहकर कितने दूर तक जाता है या ऊपर से पता नहीं चलता। भारत की सीमाओं से सटे एक इस्लामिक पड़ोसी मुल्क में इस तरह की घटनाएं भारत के लिए गंभीर खतरा हैं।

हमर छत्तीसगढ़, एक अनोखा अभियान, अनोखी संभावना भी

संपादकीय
1 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ सरकार आज से अगले करीब दो बरस के लिए एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू कर रही है। हमर छत्तीसगढ़ नाम के इस कार्यक्रम में राज्य के 11 हजार से अधिक गांवों से हर पंच-सरपंच को राजधानी रायपुर लाकर, मेहमान की तरह ठहराकर उन्हें राज्य स्तर की, राजधानी-स्थित कामयाबी के संस्थानों को दिखाया जाएगा। नया रायपुर, एयरपोर्ट, विधानसभा, साईंस सिटी जैसी जगहों को देखने के साथ-साथ ये जनप्रतिनिधि एक साथ पौधे भी लगाकर जाएंगे। एक भावनात्मक जुड़ाव के लिए इन सभी को अपने गांवों से मिट्टी-पानी, और पौधा लेकर आने को कहा गया है, ताकि राजधानी गांव-गांव से जुड़ सके। यह अपनी तरह का एक बड़ा अनोखा प्रयोग है, और शायद यह लोकतांत्रिक दुनिया में सबसे अधिक लोगों के साथ चलने वाला सबसे लंबा कार्यक्रम भी रहेगा। दो बरस में डेढ़-दो लाख लोगों का इस तरह आकर राजधानी देखकर लौटना, शायद ही दुनिया में कहीं और हुआ हो।
छत्तीसगढ़ के दूर-दूर बसे हुए आदिवासी इलाकों के बहुत से लोगों ने अभी तक रेलगाडिय़ां नहीं देखी हैं, और राजधानी देखने वाले लोग भी सीमित संख्या में ही होंगे। विधानसभा को भीतर से देखना शायद राजधानी के एक फीसदी लोगों को भी नसीब नहीं हुआ होगा, और 5डी डोम में एक नई तकनीक की फिल्म देखना भी राजधानी के एक फीसदी लोगों को भी कभी नहीं मिला होगा। इस तरह ये लोग बहुत सा नया अनुभव लेकर लौटेंगे, और चूंकि ये अलग-अलग राजनीतिक दलों के, या बिना किसी पार्टी वाले पंच-सरपंच हैं, इसलिए वे अपने-अपने इलाकों में सैकड़ों या हजारों लोगों के प्रतिनिधि भी रहेंगे। लोकतंत्र में किसी जनकल्याणकारी सरकार की यह जिम्मेदारी भी रहती है कि वह जनता के भीतर भरोसा कायम करे और उसे बढ़ाए, लोकतंत्र के फायदे दिखाए, और समझाए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह बात इसलिए भी जरूरी है कि राज्य के एक बड़े हिस्से में नक्सल हिंसा छाई हुई है और वहां के लोगों को लोकतंत्र से न तो पूरी हिफाजत मिल पाती है, और न ही सरकार से अपने पूरे हक मिल पाते हैं। इसकी वजह से एक ऐसा खतरा भी खड़े रहता है कि इन इलाकों की जनता का लोकतंत्र पर से भरोसा कुछ उठने लगे, और उनमें से कुछ लोग नक्सलियों को लोकतंत्र का एक विकल्प चाहे बेबसी में ही मानने लगें।
इसलिए राज्य स्तर की उपलब्धियों से गांव-गांव की जनता का वास्ता अगर इस तरह से पड़ता है, तो यह राज्य के खर्चे पर गांव-गांव के जनप्रतिनिधियों के भीतर एक नया आत्मविश्वास और एक नया आत्मगौरव भी भर सकता है। यह एक अलग बात है कि ऐसा असर उसी हालत में कायम रह सकेगा जब इसी राजधानी से नियंत्रित होने वाले जिले और नीचे के स्तर के प्रशासन में भी जनप्रतिनिधियों के लिए वह सम्मान बना रहे, जिस सम्मान के साथ इनको गांव-गांव से लाकर राज्य की सरकार का मंत्रालय दिखाया जा रहा है। ऐसे प्रवास और ऐसे अनुभव से एक बात यह भी हो सकती है कि ये जनप्रतिनिधि लौटकर राज्य की योजनाओं के बारे में मिली हुई जानकारी का इस्तेमाल अपने गांवों और अपने इलाकों की जरूरतों के लिए, संभावनाओं के लिए कर सकें। इसलिए अच्छे-खासे खर्च से चलने वाले इस दो बरस के हमर छत्तीसगढ़ कार्यक्रम का नफा महज आंकड़ों में नापना मुमकिन नहीं है, और इसके लंबे समय तक मिलने वाले फायदों की कल्पना की जा सकती है।
राज्य सरकार को इस अभियान के साथ-साथ सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों को भी संवेदनशील बनाना चाहिए। इतने लोगों के आने से सरकार को बहुत तरह की जानकारियों से रूबरू होने का मौका मिलेगा, लेकिन इसके बिना भी यह बात जगजाहिर है कि सरकारी अमले का बर्ताव आम जनता के साथ बहुत अच्छा नहीं रहता है, और जनप्रतिनिधि भी उनसे बहुत अलग नहीं हैं। इसलिए सरकार को ये दो बरस अपने तौर-तरीकों को बेहतर बनाने के लिए भी मिल रहे हैं, और डेढ़-दो लाख पंच-सरपंच यहां आने पर उनसे सरकार के बारे में उनका तजुर्बा भी पूछा जाना चाहिए, और आगे की संभावनाओं को लेकर उनकी कल्पनाएं भी पूछनी चाहिए। वे छोटे-छोटे गांवों या छोटे-छोटे इलाकों के जनप्रतिनिधि जरूर हैं, लेकिन उनकी समझ और सोच बड़े शहरों के लोगों की सोच-समझ से आगे की, और बड़ी हो सकती है। सरकार को इस मौके का फायदा उठाकर ऐसे सभी मेहमान ग्रामीणों से बातचीत का कोई ढांचा तैयार करना चाहिए, और उनसे मिली बातों का विश्लेषण करना चाहिए।

फोन से शादी, वहां समारोह के साथ हुई, यहां बिना जश्न

संपादकीय
30 जून  2016
अमरीका से एक बड़ी बढिय़ा खबर आई है कि एक आदमी ने अपने स्मार्टफोन से समारोहपूर्वक औपचारिक शादी कर ली। उसने शादी के कपड़े पहने, समारोह हुआ, और चर्च में पादरी ने रस्में पूरी कीं। पादरी ने इस आदमी से शादी की रस्म के तहत पूछा कि एरोन क्या तुम इस स्मार्टफोन को कानूनी तरीके से पत्नी मानते हो और क्या तुम उसे प्यार करने, उसका सम्मान करने, उसे आराम से रखने के साथ उसके प्रति निष्ठावान रहोगे? उसने कहा, हां, मैं ऐसा करूंगा। इस पर इस दूल्हे के बारे में कहा गया कि कलाकार और निर्देशक चेर्वेनाक ने अपने स्मार्टफोन से प्रतीकात्मक ढंग से शादी का भाव प्रदर्शित कर समाज को एक संदेश दिया है कि लोग अपने फोन से इतना अधिक जुड़े हुए हैं कि वे हमेशा उसके साथ रहते हैं और यह शादी जैसा लगता है।
यह अमरीका की बात नहीं है, भारत और चीन जैसे देशों में भी लोग अपने फोन से इस तरह जुड़े रहते हैं कि मानो वह जन्म से उनके बदन का कोई हिस्सा ही हो। अगर सैर-सपाटे के लिए कहीं जाने पर भी फोन काम न करे, उस पर घंटी न बजे, उस पर संदेश न आए-जाएं, तो लोग डिप्रेशन में आ जाते हैं। उनकी काम करने की क्षमता घट जाती है, उनकी बेचैनी बढ़ जाती है, और उनका बर्ताव अस्वाभाविक हो जाता है। पिछली चौथाई सदी में दुनिया ने मोबाइल फोन का इंसानी-मानसिकता पर जो असर देखा है, वैसा किसी और टेक्नालॉजी का पिछली दस सदियों में भी नहीं हुआ होगा। और अब फोन जैसे-जैसे अधिक स्मार्ट होते जा रहे हैं, अधिक बड़े या अधिक तेज होते जा रहे हैं, वे इंसानों की और अधिक गुलाम बनाते चल रहे हैं। बेडिय़ां और हथकडिय़ां बढ़ती जा रही हैं, और चारों तरफ जंगले भी खड़े होते जा रहे हैं।
आज हालत यह है कि हिन्दुस्तान में भी यह लतीफा चलता है कि अगर घर में सारे लोगों को एक जगह इक_ा करना हो तो घर का वाईफाई बंद कर दिया जाए, सारे लोग अपने फोन या लैपटॉप लिए हुए एक जगह आ जाएंगे। फोन में बिना वाईफाई भी सहूलियत है, इसलिए सफर और सैर के दौरान भी परिवार के लोग एक साथ मजा लेने के बजाय अपने-अपने फोन पर जुटे रहते हैं, और कुछ लोगों का यह मानना है कि अगर फोन बंद हो जाएं, तो शायद घर के लोगों को भी अब यह समझ नहीं पड़ेगा कि एक-दूसरे से क्या बातें करें, क्योंकि बातचीत कम होती गई है, और परिवार के लोग भी आपस में एक-दूसरे को फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर पसंद और नापसंद करने लगे हैं, देखने लगे हैं।
कई बरस पहले से जापान के बारे में यह बात आती थी कि लोग टेक्नालॉजी के ऐसे गुलाम हो गए हैं, और टेक्नालॉजी पर ऐसे टिक भी गए हैं कि उन्हें दूसरे इंसानों की जरूरत अब नहीं पड़ती, और वहां विवाह नाम की संस्था दम तोड़ती जा रही है, और लोग घरों से निकले बिना महीनों तक ऑनलाईन जिंदगी जीते रहते हैं, मशीनी चिडिय़ा पाल लेते हैं, मशीनी कुत्ता पाल लेते हैं, और उनके लिए समाज की शक्ल में सिर्फ सोशल मीडिया पर उनके दोस्त बच जाते हैं, जिनमें से अधिकतर से वे कभी मिले भी नहीं रहते।
अभी अमरीका में जिस नौजवान ने अपनी फोन से ऐसी शादी की है, उसने दुनिया भर के फोन-गुलामों के खतरों की तरफ ध्यान खींचा है कि किस तरह लोग अपनी असल जिंदगी से कटकर अपने उपकरणों से ही शादी के बंधन में बंध बैठे हैं। लोग पहले कहते थे कि फलां लड़का या लड़की, आदमी या औरत, अपनी नौकरी से शादी कर बैठे हैं, और उससे परे उनकी जिंदगी बहुत कम रह गई है। अब तो नौकरी भी सौतिया डाह से दम तोड़ सकती है, क्योंकि लोग आमतौर पर अपने फोन से शादी कर बैठे हैं। अमरीका में इसका खुला समारोह हुआ है, लेकिन भारत जैसे बहुत से देशों में लोग बिना समारोह भी ऐसी जिंदगी में दाखिल हो चुके हैं। आज हाल यह है कि बहुत से लोग बीवी के बिना तो जीने तैयार हो जाएंगे, फोन के बिना वे नहीं जी सकते।
समाजविज्ञान और इंसानी-मानसिकता के विशेषज्ञों को लोगों की इस बदली हुई सोच पर सोचने का मौका भी नहीं मिल रहा है, क्योंकि किसी तरह की रिसर्च में वक्त लगता है, और तब तक इंसान इस कुएं में और गहरे कैदी हो चुके रहते हैं। लेकिन आज इस मुद्दे पर यहां लिखने का मकसद यह है कि फोन के नए मॉडल तो हर कुछ महीने में मिलते रहेंगे, परिवार के लोग एक बार छूट गए, तो फिर जुड़ नहीं पाएंगे। इसलिए लोगों को टेक्नॉलॉजी से परे, फोन जैसे उपकरणों से परे, अपनी असल जिंदगी के इंसानी-दायरे के बारे में भी सोचना चाहिए। 

बारिश में डूबने से पहले

संपादकीय
29 जून  2016
बारिश होते ही जगह-जगह से पानी भरने की खबरें आने लगी हैं, और यह तब है जब मानसून पूरी तरह प्रदेश में सक्रिय नहीं हुआ है। राजधानी रायपुर समेत अन्य नगरों में कमोबेश यही हाल हर साल देखने-सुनने को मिलता रहा है। शहरों में पानी भरने की न तो एक वजह है, और न ही उसका कोई आसान रास्ता है।  इस मुद्दे पर थोड़ी सी ठोस बात अगर करें, तो एक तो शहरीकरण से खड़ी हुई कुदरती दिक्कतें, और फिर शहरी जीवनशैली से खड़ी हुई दिक्कतें, ये दोनों मिलकर नीम पर चढ़े हुए करेले की तरह नौबत ला रही हैं।  भारत के अधिकतर शहरों में बिना योजना के इमारतें और आबादी बढ़ती चली गई हैं, और इनके बोझ को ढोने की क्षमता विकसित नहीं हुई है।
जहां-जहां शहरीकरण हो रहा है, वहां-वहां पानी को सोखने लायक खुली जमीन तेजी से खत्म हो रही है, और कांक्रीट के ढांचे बारिश के पानी को सिर्फ इक_ा कर पाते हैं, निकाल नहीं पाते। फिर जैसा कि मुंबई के मामले में सामने आया था, वहां पर सारी भूमिगत नालियां प्लास्टिक के कचरे से पूरी तरह बंद थीं, और पानी के निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था। देश भर में जगह-जगह शहरीकरण से जो कचरा इक_ा हो रहा है, उसकी रफ्तार बढ़ती चल रही है, दूसरी तरफ पानी के निकलने के जो पुराने नाले-नालियां हैं, वे कचरे से बंद होते चल रहे हैं। शहरीकरण में जो नए इलाके विकसित हो रहे हैं, ताकतवर और संपन्न तबका वहीं बस रहा है, और वहां पर तो पानी आने-जाने के रास्ते ठीक है, लेकिन पुराने इलाके हर शहरों में डूब रहे हैं, बारिश के पानी भी डूब रहे हैं, और ताजा कचरे में भी डूब रहे हैं।
अब यहां पर यह भी सोचने की जरूरत है कि लोग कितना कचरा इक_ा करते हैं, उसे कैसे फेंकते हैं, और उसके निपटारे का स्थानीय म्युनिसिपल के पास क्या तरीका है? यहां पर तस्वीर बड़ी निराशाजनक है, क्योंकि बढ़ती आबादी, बढ़ती संपन्नता, और बढ़ते कचरे की रफ्तार से निपटारे की पुरानी रफ्तार का कोई मेल नहीं बैठता। दूसरी बात यह कि मौसम अब अधिक दगाबाज हो गया है। बारिश के ही नहीं, गर्मी और सर्दी के मौसम भी अपनी तेज मार के नए रिकॉर्ड कायम कर रहे हैं। मौसम का जो सर्वाधिक रिकॉर्ड रहते आया था, वह अब बदल भी रहा है, और अब जरा सी देर में बहुत तेज बारिश होकर किसी भी शहर को डुबा देती है। इस मौसम में कोई बदलाव लाना पूरी दुनिया के सामूहिक सहयोग से हो सकता है, लेकिन वह किसी शहर के बस की बात नहीं है। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि शहरीकरण की योजनाएं मौसम की अभूतपूर्व बुरी मार का अंदाज लगाकर ही बनाई जाएं, न कि पुराने रिकॉर्ड देखकर। मौसम ने इंसानों से कोई रिश्वत नहीं खाई हुई है कि वह उस पर हमेशा मेहरबान रहे, और खासकर जब इंसान कुदरत पर कूद-कूदकर लात मारते हों, तो कुदरत की क्या बेबसी है कि वह इंसान पर मेहरबान रहे?
शहरीकरण की तेज रफ्तार और उसका विकराल आकार स्थानीय म्युनिसिपल की सोच और उसकी कूबत दोनों से परे की बात हो चुके हैं। अब शहरी कचरे के तेज रफ्तार निपटारे के साथ-साथ, शहरों से पानी की तेज रफ्तार निकासी का इंतजाम जब तक नहीं किया जाएगा, देश के शहर कभी भी डूब जाएंगे, और अगली बारिश आने तक भी लोगों के निजी नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी। देश की सरकार, राज्यों की सरकारें, और शहरों की म्युनिसिपालिटी टुकड़े-टुकड़े में सोच रही हैं, और टुकड़े-टुकड़े में योजनाएं बना रही हैं। कुदरत की मार से निपटने के लिए इस तरह के काम से काम नहीं चलेगा। लोगों को यह भी याद रखना पड़ेगा कि अब महज हर बरस की बाढ़ वाले इलाकों में ही बाढ़ नहीं आती, अब तो नए-नए किसी भी इलाके में कितनी भी बाढ़ आ जाती है, और हर किसी को ऐसी नौबत के लिए तैयार रहना पड़ेगा, और इसकी बुनियादी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर है।

शब्दों के बीच का अनबोला, अनकहा, और अनपूछा...

संपादकीय
28 जून  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल एक अंगे्रजी समाचार चैनल टाईम्स नाऊ के मुखिया अर्नब गोस्वामी को एक इंटरव्यू दिया, तो उसमें उन्होंने जितनी बातें कहीं, उन पर तो कल रात से ही चर्चा शुरू हो गई, लेकिन दो और बातों पर जमकर चर्चा चल रही है कि कल कही बातों के पहले इतने वक्त से मोदी बहुत से जलते-सुलगते मुद्दों पर क्यों नहीं बोल रहे थे, और चुप क्यों थे? और दूसरी चर्चा यह शुरू हुई कि इंटरव्यू ले रहे बड़बोले और हमलावर तेवर वाले अर्नब गोस्वामी ने बहुत से सहज सूझते सवाल क्यों नहीं किए? कुछ बड़े अखबारनवीसों ने ऐसे संभावित सवालों की पूरी लिस्ट लिख डाली है जो कि कोई मामूली समझ वाला पत्रकार भी पूछ लेता, और जो कि इस नामी-गिरामी आत्ममुग्ध टीवी पत्रकार ने नहीं पूछे।
जो सवाल इस इंटरव्यू के खत्म होने के बाद उठ रहे हैं, वे उठना जायज हैं क्योंकि जब इतने बड़े ओहदे पर बैठा हुआ कोई नेता दर्जनों मुद्दों पर बोलता है, तो देश और दुनिया सुनते हैं। फिर जब कोई आमतौर पर हमलावर रहने वाला और आत्मप्रशंसक पत्रकार इस मुनादी के साथ इंटरव्यू शुरू करता है कि यह भारतीय प्रधानमंत्री मोदी का किसी भी भारतीय चैनल को दिया हुआ पहला इंटरव्यू है, तो फिर लोगों की उम्मीदें इस महत्व के मुताबिक जागती हैं, और देखने-सुनने वाले लोग यह भांप लेते हैं कि कौन-कौन से बहुत ही स्वाभाविक रूप से उठने वाले सवाल नहीं पूछे गए।
दरअसल सवाल हों, या कि जवाब, इंटरव्यू हो, या कि कोई भाषण, चौकन्नी दुनिया में ये सब दर्ज होते जाता है कि बोलने की किस-किस मौके पर चुप रहा गया, और किस-किस मौके पर चुप रहकर दूसरे को बोलने का मौका देने के बजाय, खुद इंटरव्यू लेने वाला बोलते रह गया। अर्नब गोस्वामी इस बात के लिए भारी बदनाम हैं कि वे अपने कार्यक्रम में आमंत्रित लोगों को कुछ भी नहीं बोलने देते, और पूरे वक्त खुद ही बोलते चलते हैं। उनके इस मिजाज को लेकर अनगिनत लतीफे चलते हैं, और लोग लगातार उनके खिलाफ टीवी पर भी बोलते हैं। लेकिन जैसा कि किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में होता है, बदनाम होने से नाम तो होता ही है, ऐसा ही टीवी के लोगों को लेकर विवाद छिडऩे से भी होता है। अब मोदी का यह इंटरव्यू अगर ऐसे विवाद के बिना रहता, तो वह कल शाम ही आया-गया हो जाता। यह विवाद छिडऩे से ही अब वह कई दिनों तक खबरों में बने रहेगा। नेताओं या दूसरे महत्वपूर्ण लोगों की तो यह जिम्मेदारी नहीं होती कि वे खुद अपने लिए असुविधा की बातें करें, लेकिन उनसे इंटरव्यू लेने वालों की यह जिम्मेदारी जरूर होती है कि वे असुविधा की बातों से परहेज न करें, और उन लोगों को सस्ते में न छोड़ें जिनको बहुत से मुद्दों पर अपनी बात बोलने का मौका दिया जा रहा है। शब्दों के बीच का अनबोला, अनकहा, और अनपूछा भी बड़ी बारीकी से दर्ज होता है, और मीडिया के लोगों को यह याद रखना चाहिए।