केजरीवाल ऐसी जुबानी-गंदगी फैलाकर लंबा नहीं चल सकते

संपादकीय
8 सितंबर 2016
दिल्ली और पंजाब में लगातार महिलाओं के आरोप झेलते हुए, कहीं वीडियो तो कहीं ऑडियो रिकॉर्डिंग से बदनामी पाते हुए आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल आज जब पंजाब चुनाव प्रचार पर गए, तो जाते हुए दिल्ली स्टेशन पर ही उन्हें महिलाओं का विरोध झेलना पड़ा, और पंजाब पहुंचने पर भी स्टेशन पर वे पुलिस के घेरे में ही स्टेशन से बाहर निकल पाए। और जैसी कि उम्मीद थी, आम आदमी पार्टी की तरफ से यह कहा गया कि नरेन्द्र मोदी ने यह विरोध करवाया है। दूसरी तरफ गुजरात में लंबा पटेल आंदोलन चलाने वाले हार्दिक पटेल के भाई का एक स्टिंग ऑपरेशन अभी सामने आया जिसमें वे एक व्यापारी से रूपए ले रहे हैं, तो हार्दिक ने कहा कि इस वीडियो को नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के इशारे पर फैलाया जा रहा है।
केजरीवाल काफी अरसे से इस बात के लिए बदनाम हैं कि वे अपने खिलाफ होने वाली हर बात को लेकर मोदी पर हमला करते हैं, उन पर तोहमत लगाते हैं। हो सकता है कि केजरीवाल के खिलाफ हर साजिश के पीछे मोदी हों, क्योंकि राजनीति में कानून तोड़े बिना जितने तरह की साजिशें हो सकती हैं, वे सब तो मान्यता प्राप्त हो ही चुकी हैं, कभी कोई पार्टी स्टिंग ऑपरेशन करती है, तो कभी कोई दूसरी पार्टी। अब सवाल यह है कि केजरीवाल के मंत्री अगर किसी महिला के ऐसे आरोपों के घेरे में हैं कि राशन कार्ड बनवाने के लिए उस मंत्री ने महिला का देह शोषण किया, और खुद ही उसकी खुफिया-रिकॉर्डिंग भी कर ली, तो इसमें मोदी और अमित शाह क्या करें, या राहुल गांधी क्या करें? राजनीतिक विरोध अपनी जगह ठीक है, और राजनीतिक साजिशें भी चलती ही रहती हैं, लेकिन अगर केजरीवाल का कोई मंत्री विदेशी महिलाओं को पीटता है, कोई अपनी बीवी को पीटता है, कोई किसी और तरह का जुर्म करता है, तो क्या इसे आम आदमी पार्टी के विरोधी बंदूक की नोंक पर करवाते हैं? अभी दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश में भाजपा से जुड़े हुए एक ऐसे नेता को सेक्स-रैकेट में गिरफ्तार किया गया है जो कि मोदी-सेना नाम का एक संगठन चलाता था, और जिसकी मोदी और बाकी मंत्रियों, भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरों से उसका फेसबुक पेज पटा हुआ है। तो अब भाजपा की सरकार में भाजपा से जुड़े इस सेक्स-कारोबारी की गिरफ्तारी किसकी साजिश कही जाए? अभी-अभी गुजरात की खबर आई है कि वहां पर भाजपा सरकार के मातहत काम करने वाली सीआईडी ने अदालत में अपनी जांच-रिपोर्ट में कहा है कि वहां ऊना में दलितों पर गोमांस का आरोप लगाकर उनकी जो पिटाई की गई थी, उसमें पुलिस ने अपराध किया था, और कई पुलिसवालों को गिरफ्तार करके सीआईडी ने अदालत में पेश भी कर दिया है। अब सवाल यह उठता है कि मोदी और अमित शाह के राज में वहीं की सीआईडी, वहीं की पुलिस को, गौरक्षकों की हिंसा और उनके जुर्म में भागीदार मानते हुए गिरफ्तार करके अदालत में पेश कर रही है, तो इसे किसके इशारे पर किया हुआ काम माना जाए? अभी महाराष्ट्र खबरों में बना हुआ है जहां पर एक धर्मनिरपेक्ष और कट्टरता विरोधी सामाजिक मुखिया की हत्या में सनातन हिन्दू संगठन के लोगों को गिरफ्तार किया गया है, और अदालत में उनका जुर्म साबित किया जा रहा है। यह पूरा काम भी वहां पर भाजपा की सरकार के रहते हुए हुआ है।
केजरीवाल भारतीय राजनीति में गैरजिम्मेदारी से बयानबाजी, अतिबड़बोलेपन, और सनसनीखेज आरोपों का एक अभूतपूर्व सिलसिला चला रहे हैं। धीरे-धीरे जनता उनकी ऐसी जुबानी-गैरजिम्मेदारी से थकती जाएगी, और उनसे भी यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि उनके ऐसे आरोपों के पीछे उनकी प्रधानमंत्री बनने की हसरत है, या कि मोदी को बदनाम करने की? हो सकता है कि उनकी ये दोनों हसरतें साथ-साथ चलती हों, लेकिन मीडिया चाहे कितनी ही गैरजिम्मेदारी से ऐसे आरोप दिखाता रहे, देश की जनता ऐसी गंदगी पर बहुत समय तक भरोसा नहीं करती, चाहे उसे किसी पार्टी के, कोई भी नेता फैलाएं। हमारा ख्याल है कि मीडिया को गैरजिम्मेदारी से गंदगी फैलाने के बजाय, ऐसे लोगों से जिम्मेदारी के सवाल करने चाहिए, और इसके बिना अधिकतर पार्टियां महज सनसनीखेज गंदगी बढ़ाते चल रही है।

कश्मीर पर बातचीत सबसे, और बिना शर्त की जाए...

संपादकीय
7 सितंबर 2016
कश्मीर में सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल से वहां के अलगाववादी नेताओं ने मुलाकात नहीं की, और इसके साथ ही भारत सरकार, कश्मीर सरकार, और कश्मीर के इन अलगाववादियों के बीच मतभेद की एक खाई सामने आई है, और इसके चलते कोई कारगर बातचीत होते नहीं दिख रही है। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपनी चुनी हुई शब्दावली में यह बात बार-बार दुहराई कि कश्मीर में अमन-चैन चाहने वाले लोगों से ही बात होगी, और जब यह प्रतिनिधि मंडल कश्मीर गया, उस वक्त भी सीपीएम ने इसमें शामिल होने के साथ-साथ यह खुली मांग की थी कि इसे बिना किसी शर्त के कश्मीर विवाद के सभी संबंधित पहलुओं से बात करनी चाहिए। लेकिन कश्मीर के अलगाववादियों से बात करने का उनका कोई इरादा नहीं था। दूसरी तरफ अलगाववादियों ने यह साफ कर दिया था कि कश्मीर को विवादित इलाका माने बिना वे किसी बात को किसी काम का नहीं समझते। और भारत सरकार, राजनाथ सिंह, मोदी, बार-बार यह कह चुके हैं कि पूरा कश्मीर भारत का निर्विवाद हिस्सा है, और उस पर कोई बात नहीं हो सकती। वामपंथी सोच यह है कि बातचीत बिना शर्त होनी चाहिए, और हर किसी से होनी चाहिए।
दरअसल दुनिया में हथियारबंद लड़ाई, या राजनीतिक मतभेद को लेकर जब कभी सरकार और बागियों या अलगाववादियों के बीच बातचीत होती है, तो जो बुनियादी मतभेद बातचीत में आड़े आते हैं, उनमें यही दो-तीन बातें खास रहती हैं। एक तो यह कि बातचीत कुछ शर्तों के साथ हो, या बिना शर्तों के। दूसरी बात यह रहती है कि हथियारबंद आंदोलन में लोग पहले हथियार छोड़ें, और उसके बाद फिर बातचीत शुरू हो। हमें जितना याद पड़ रहा है भारत में ऐसे कई मौके आए जब हथियारबंद आतंक भी चलते रहा, और उस बीच भी सरकार ने लोगों से बात की। ऐसा उत्तर-पूर्व से लेकर पंजाब तक कई जगहों पर हुआ, और जब कोई लोकतांत्रिक समाधान ढूंढना होता है, तो जिस पक्ष का लोकतंत्र पर भरोसा अधिक है, उसी पर जिम्मेदारी भी अधिक आती है। हथियारबंद बागी, आतंकी, या नक्सलियों से लोग तो अपनी मांगों पर अड़े रह सकते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में ही हमने कुछ बरस पहले यह देखा है कि एक कलेक्टर को अगुवा करके नक्सलियों ने सरकार को बातचीत की टेबिल पर आने के लिए मजबूर किया था, और मोटे तौर पर बिना किसी सरकारी शर्त के, और महज नक्सल-शर्तों के साथ वह बातचीत हुई थी, और उसके तहत तय की गई कई बातों पर अमल भी हुआ था।
 इसलिए लोकतांत्रिक सरकार चलाने वाले लोगों को शर्तों को लेकर अडऩा नहीं चाहिए। जो बागी हैं, आतंकी हैं, जो अलग देश या प्रदेश चाहते हैं, जिनका लोकतंत्र को खत्म करने का खुला एजेंडा है, उनसे तो लोकतांत्रिक-समझदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन केन्द्र सरकार को कश्मीर के मामले में बिना किसी हिचक के हर किसी से बात करनी चाहिए, जो कि इस देश के नागरिक हैं। बहुत से मामलों में तो दुनिया के दो देश भी किसी विवाद पर एक-दूसरे से बात करते ही हैं। कश्मीर के मामले में भी भारत और पाकिस्तान की सरकारें एक-दूसरे से बहुत बातें कर चुकी हैं, और फिलहाल सरहद पर एक अस्थायी इंतजाम करके दोनों देश इस मुद्दे को टालते आ रहे हैं, क्योंकि इसी एक मुद्दे को लेकर बखेड़ा इतना है कि दोनों देशों के बाकी मामलात धरे रह जाते हैं। हमारा तो यह मानना है कि भारत और पाकिस्तान को कश्मीर सहित तमाम मुद्दों पर बात करना चाहिए। यह बहुत ताजा इतिहास है कि किस तरह बांग्लादेश के साथ भारत की बातचीत से दोनों देशों के बीच कुछ गांवों और जमीन की अदला-बदली भी हो गई, और उन जगहों के नागरिक दूसरे देश के नागरिक हो गए। योरप का इतिहास और वर्तमान इस बात का गवाह है कि किस तरह देशों के बीच की सरहदों को मानो पेंसिल की लकीर की तरह मिटा दिया गया, और तकरीबन पूरा योरप बिना भीतरी सरहदों का एक इलाका हो गया है।
भारत सरकार को या भारत के राज्यों को किसी भी बागी या आतंकी संगठन से बात करते हुए किसी तरह की शर्त नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि उनके खिलाफ पुलिस या फौजी कार्रवाई करने का विकल्प तो सरकारों के पास हमेशा रहता ही है। न तो सरकार अपने इस हक को छोड़े, और न ही दूसरे पक्ष से उनकी किसी जिद को छोडऩे की शर्त रखे। ऐसी उदारता अगर कश्मीर में दिखाई जाएगी, तो ही कश्मीर का कोई हल निकल सकेगा। वरना फौज और पुलिस के बल पर किसी इलाके को देश में जोड़े रखना न सिर्फ खर्चीला है, बल्कि ऐसा करते हुए बहुत सी अलोकतांत्रिक कार्रवाई भी करनी पड़ती है, जिसका नुकसान इतिहास में दर्ज होते चल रहा है। और किसी इलाके को लोकतंत्र की मूलधारा से बहुत समय तक कटे रहने देना भी देश के व्यापक लोकतांत्रिक हित में नहीं है। ऐसे में उस इलाके के लोगों को लोकतंत्र, और उसमें अपनी भूमिका, दोनों ही गैरजरूरी लगने लगते हैं।

क्षमायाचना की जरूरत तो धर्म से परे राजनीति और सरकारों के लिए भी जरूरी

संपादकीय
6 सितंबर 2016
जैन समाज के लोग आज एक सालाना रिवाज के मुताबिक उन सभी लोगों से क्षमायाचना कर रहे हैं जिनसे उनका कोई वास्ता पड़ा हो, और शायद उनसे कोई तकलीफ पहुंची हो। हर बरस ऐसे संदेश भेजे जाते हैं, और कुछ विज्ञापन छपते हैं, कुछ लोग फोन भी करते हैं। क्या ऐसी क्षमायाचना का कोई महत्व होता है? या फिर लोग एक सालाना रिवाज की तरह इसे करते हैं और भूल जाते हैं?
दरअसल बहुत से धर्मों में क्षमायाचना या प्रायश्चित का प्रावधान रहता है, और ईसाई चर्चों में तो कन्फेशन रूम रहते हैं जहां एक तरफ लोग अपने पाप मंजूर करने के लिए बैठते हैं, और दूसरी तरफ बैठे हुए पादरी को अपने गलत कामों का ब्यौरा देते हैं। इसमें पादरी पापी को देख नहीं पाते, और इस प्रायश्चित के बाद माना जाता है कि लोग पापमुक्त हो जाते हैं। अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग तरह से प्रायश्चित का इंतजाम किया गया है, और हिंदू धर्म में किसी बिल्ली के मर जाने पर सोने की बिल्ली बनाकर चढ़ाने का रिवाज भी सुनने में आता है, फिर इसे माना जाता है, या नहीं, यह तो पता नहीं।
लेकिन इस मुद्दे पर लिखने का आज हमारा दूसरा मकसद है। धर्म से परे भी दुनिया की सरकारें, और राजनीतिक दल, धर्म और जाति के संगठन, और बड़े-बड़े लोग अपनी ऐतिहासिक गलतियों के लिए देश या दुनिया से, किसी समाज या कुछ लोगों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हैं, और वह इतिहास में दर्ज भी हो जाती है। जर्मनी के हिटलर ने बाकी दुनिया के साथ जो किया था, और जिस तरह दसियों लाख यहूदियों को मारा था, उसके लिए जर्मन लोग बहुत माफी मांग चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने वहां के आदिवासियों को संसद के भीतर आमंत्रित करके सदन के बीच खड़े होकर उनसे माफी मांगी क्योंकि कोई एक सदी पहले ऑस्ट्रेलिया के गोरे शासकों ने वहां के मूल निवासी आदिवासियों के बच्चों को उनसे छीन लिया था, और उन्हें शहरी, संपन्न, शिक्षित, ईसाई घरों और संस्थाओं में रखकर बड़ा किया था, और यह माना था कि वे अशिक्षित-गरीब, जंगल के रहने वाले लोगों के बच्चों पर एक एहसान कर रहे हैं। बाद में जब दुनिया संवेदनशील हुई, तो यह माना गया कि यह मूल निवासियों के बच्चों की पूरी पीढिय़ों की चोरी थी, और ऐसी चोरी की पीढ़ी के लिए गोरों ने अपने-आपको चोर मानते हुए देश की संसद में मूल निवासियों से माफी मांगी। यह घटना इसलिए भी अधिक सोचने लायक है कि आज भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से हिंदू संगठन आदिवासी बच्चों को निकालकर ला रहे हैं, और उन्हें हिंदू बनाने के लिए देश के अलग-अलग प्रदेशों में उन्हें रख रहे हैं, और ऐसे बच्चे अपने मां-बाप, परिवार, संस्कृति, समाज, रीति-रिवाज, बोली और कला, इन सबसे कट जा रहे हैं, और सवर्ण, शहरी, हिंदूवादी लोग अपनी ऐसी पहल को उन बच्चों पर एहसान भी मान रहे हैं। हो सकता है कि सौ-पचास बरस बाद इस देश में संवेदनशीलता आए, और आदिवासी हकों का सम्मान करते हुए इस देश की संसद भी आदिवासियों के सामने हाथ जोड़कर खड़ी होगी और माफी मांगेगी। लेकिन फिलहाल सवर्ण हिंदू यह एहसान करते हुए अपने-आप पर गौरव भी कर रहे हैं, और अपनी यह नासमझी भी बता रहे हैं कि आदिवासियों को समझदार बनने के लिए उनकी जमीन से उखाडऩा जरूरी नहीं है, वे अपनी जमीन पर रहते हुए भी, किताबें पढ़े बिना भी ऐसी शहरी-हिंदूवादी लोगों से अधिक समझदार हैं।
लेकिन दुनिया के बाकी इतिहास को देखें, और भारत में पिछले कुछ दशकों की बहस को देखें, तो यह सोचने की जरूरत है कि कौन से नेता और कौन सी पार्टियां, कौन से धर्म और कौन से संगठन किस-किस ऐतिहासिक अपराध या पाप के लिए माफी मांगने के लिए एकदम फिट केस हैं? गांधी के कत्ल को लेकर बहस चल रही है, उसके लिए कौन माफी मांगेंगे? 1984 के सिख विरोधी दंगों में कांगे्रस के नेताओं के खुले भड़कावे के बाद विशाल वृक्ष गिरने से हिलती हुई धरती पर हजारों सिखों का कत्ल हुआ, उसके लिए कौन लोग माफी मांगेंगे? लेकिन इसके पहले जिस तरह स्वर्ण मंदिर को आतंकियों का ठिकाना बन जाने दिया गया, और पंजाब में गैर सिखों को छांट-छांटकर मारा गया, और सिख पार्टियां, सिख संगठन चुप रहे, उसके लिए कौन माफी मांगेंगे? अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई, और उसकी प्रतिक्रिया में सैकड़ों लोग मारे गए, उसके लिए कौन माफी मांगेंगे? गोधरा में और गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा में सैकड़ों या हजारों लोग मारे गए, उसके लिए कौन माफी मांगेंगे? कश्मीर से जिस तरह हिंदू पंडितों को हत्या और बलात्कार की धमकी देकर बेदखल किया गया, और उसमें जिस तरह से वहां के मुस्लिम बिरादरी और मस्जिदें इस्तेमाल हुईं, उसके लिए कौन माफी मांगेंगे?
इसलिए जब हम धार्मिक प्रथा के तहत ऐसी माफी सुनते हैं तो लगता है कि धर्म से परे भी राजनीति और समाज को, संगठनों और नेताओं को सालाना माफी मांगनी चाहिए, और अपने कुकर्मों की फेहरिस्त भी जारी करनी चाहिए कि इन बातों के लिए वे माफी चाहते हैं। अब ऐसा कलेजा कितने लोगों का होगा, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। लेकिन अगर ऐसा होगा, तो हो सकता है कि एक दिन बस्तर के आदिवासियों से भी खादी और खाकी मिलकर सामूहिक क्षमायाचना करें।

हुनर और उसके ग्राहक को मिलाने में सरकारी भूमिका

संपादकीय
5 सितंबर 2016
हिन्दुस्तान और बाकी दुनिया में टेक्नालॉजी के करवट लेने से बहुत से लोगों की नौकरी एकाएक खत्म होती है। एक वक्त था जब एक-एक निगेटिव से एक-एक प्रिंट एक बार में  बनते थे, आज न निगेटिव रह गए, और न ही प्रिंट करने के लिए उतने लोगों की जरूरत पड़ती। यही हाल बहुत से कारोबारों का हो गया है और ऐसा लगता है कि मशीनें रफ्तार से लोगों को बेरोजगार करने लगेंगी। लेकिन दूसरी तरफ हम हिन्दुस्तान जैसे देश को देखें तो यहां आज भी बहुत से ऐसे कामकाज हैं जिनके लिए हुनरमंद कारीगर आसानी से मिलते नहीं हैं, और दूसरी तरफ ऐसे कारीगरों को काम भी आसानी से नहीं मिलते। पिछले दिनों भारत सरकार ने ऐसी कुछ वेबसाइटें बनाई है जिनमें कारीगर और उनकी सेवाओं के ग्राहक एक-दूसरे को आसानी से पा सकें। कुछ शहरों में ऐसी एजेंसियां भी हैं जो कि कुछ तरह की मरम्मत, रख-रखाव, या नए काम के लिए कारीगर जुटाकर देती हैं। इसमें लोगों के काम होते हैं, एक एजेंसी को बीच का काम मिल जाता है, और हुनरमंद कारीगर घर बैठे या फोन पर काम पा जाते हैं।
आज अगर भारत के किसी देश-प्रदेश को तरक्की करनी है, तो उसे अपने मानव संसाधन का बेहतर इस्तेमाल करना पड़ेगा। लोग घर बैठे रहें, और कारीगर तलाशते रहें, दूसरी तरफ कारीगर मजदूरों के बाजार में खड़े रहकर काम तलाशे, तो इसमें देश का बड़ा नुकसान है। हर प्रदेश को यह चाहिए कि वह कम दाम वाली ऐसी सेवाओं के लिए जरूरत के मुताबिक कारीगर भी तैयार करे, और उनसे ग्राहकों के मिलने को मुमकिन और आसान भी बनाए। आज इंटरनेट, मोबाइल एप्लीकेशन, और फोन के चलते यह काम आसान भी हो गया है। टेक्नालॉजी एक तरफ काम कम कर रही है, तो दूसरी तरह वह काम बढ़ा भी सकती है। जब इस देश मेें एटीएम शुरू हुए थे, तो लोगों को लगता था कि एक-एक मशीन बैंक के एक-एक कैशियर की नौकरी खा जाएगी। कुछ नौकरियां कम भी हुई हैं तो बहुत सी नौकरियों की संभावना बढ़ती भी जा रही हैं, हर एटीएम की चौकीदारी के लिए एक-दो गार्ड रखे जाने लगे, और कम पढ़े-लिखे लोगों के रोजगार का यह एक नया मौका निकला। आज शहरों में दुपहियों पर खाने-पीने के सामान पहुंचाने वाले लोग लगातार दौड़-भाग करते दिखते हैं और अब तो दवा घर पहुंचाने की सर्विस भी शुरू हो गई है, किराना घर पहुंचाया जाने लगा है, और छोटे-छोटे दूसरे सामानों की बिक्री भी घर पहुंचकर होने लगी है। तो टेक्नालॉजी जहां नौकरियां घटा रही है, वहीं बढ़ा भी रही है।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को चाहिए कि स्किल डेवलपमेंट को कागजों तक न रखकर उसे तेजी से हकीकत में बदले, और हर कुछ महीनों में यह अंदाज लगाए कि किस तरह के हुनर की जरूरत बढ़ती जा रही है, और उसके मुताबिक लोगों का प्रशिक्षण होना चाहिए। सरकार को यह भी चाहिए कि वह एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार करे जिससे कि कारीगरों को बाजार में न खड़ा होना पड़े, उनकी तलाश आसान रहे, और उन्हें फोन पर बुलाया जा सके। आज मोबाइल फोन की टेक्नालॉजी ने बहुत से काम आसान कर दिए हैं। इन दिनों बड़े शहरों में जो मोबाइल-टैक्सियां चलती हैं, उनके मोबाइल-एप्लीकेशन पर जाते ही यह दिखने लगता है कि सबसे करीब की टैक्सी कितने मिनट में पहुंच सकती है, और उसे बुलाने पर उस करीब के टैक्सी वाले को भी बहुत कम समय में ही तुरंत सवारी मिल जाती है। आज सरकार में बैठे लोगों को तकनीक की कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करना चाहिए, और अपने प्रदेश के लोगों को इंटरनेट-फोन से जोड़कर उनका कारोबार भी बढ़ाना चाहिए, और ग्राहकों की जरूरत के मुताबिक हुनर की तैयारी भी करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ खनिजों पर आधारित कमाई पर टिका राज्य है, और इसकी अर्थव्यवस्था में सर्विस सेक्टर का योगदान न के बराबर है। इसी क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं भी रहती हैं, और यह राज्य इसमें अभी बहुत कुछ कर सकता है।

मदर टेरेसा तो चमत्कार के पहले से भारत की एक सबसे बड़ी संत बन चुकी थीं

संपादकीय
4 सितंबर 2016
अभी कुछ देर में रोमन कैथोलिक चर्च के साम्राज्य, पोप के मुख्यालय वैटिकन में मदर टेरेसा को संत की उपाधि दी जाएगी। हिंदुस्तान के सबसे गौरवशाली इंसानों में से एक, मदर टेरेसा ने पूर्वी योरप के अपने जन्म के देश से यहां आकर जिस तरह सबसे गरीब, बदहाल-फटेहाल बंगाल में भूख से मरते लोगों, बीमार लोगों और बेसहारा बच्चों की सेवा करने में अपनी जिंदगी लगाई, उसे लेकर आलोचना करने वाले भी हमेशा ही मौजूद रहे, लेकिन वे किसी भी दूसरे हिंदुस्तानी के मुकाबले अपने किस्म से सेवा करने में सबसे आगे ही रहीं। इसलिए आज जब उन्हें संत घोषित किया जा रहा है, तब संत की पदवी या उपाधि पर भरोसा करने वाले लोगों का खुश होना जायज है। बाकी लोग तो मदर टेरेसा को भारतरत्न मिलने के पहले से भी उन्हें धरती पर ईश्वर का एक रूप मानकर खुश रहते ही थे। लेकिन उनके आलोचक हमेशा यह मानते रहे कि वे लोगों को दुखी और गरीब बनाए रखने में लगी रहती थीं, और अपने कामों के लिए वे दुनिया के कुख्यात या बदनाम लोगों से भी दान लेने में परहेज नहीं करती थीं। फिर ईसाई विरोधी एक छोटा तबका ऐसा भी है जो मदर टेरेसा के सारे काम को लोगों के ईसाईकरण के आरोप के साथ ही देखता था, हालांकि ऐसे तबके के पास भारत के बहुसंख्यक हिंदू समाज में ऐसी सेवा करने वाले कोई हिंदूवादी विकल्प कभी नहीं रहे भी या बाबा आमटे की तरह रहे भी, तो वे हिंदूवादियों में कभी नहीं रहे। मदर टेरेसा की एक-दो और बातों के लिए उनकी आलोचना दुनिया भर के उदारवादी लोग करते रहे। वे गर्भपात और गर्भनिरोधकों के खिलाफ रहीं। लोगों का यह मानना है कि गर्भनिरोधकों के बिना दुनिया में गरीब आबादी बढ़कर एक बदहाली में जीने को मजबूर रहती है, और ऐसी आबादी के बीच जीते हुए भी मदर टेरेसा इस बात के महत्व को नकारती रहीं।
लेकिन आज उनके संत बनने के मौके पर उनके ईसाई धर्म की इस प्रथा को समझना भी जरूरी है कि जब तक किसी के करिश्मे स्थापित नहीं होते हैं, जब तक किसी के किए हुए चमत्कारों को वैटिकन अपनी छानबीन और जांच के बाद सही नहीं पाता है, तब तक उन्हें संत नहीं बनाया जाता। लेकिन हिंदुस्तान में मदर टेरेसा का किया हुआ काम जमीनी काम की एक हकीकत रहा, किसी तरह का कोई चमत्कार उसके लिए उन्हें नहीं लगा। सबसे गरीब और सबसे बेहाल लोगों की जितनी मदद उनकी संस्था ने देश भर में की है, और यह जाहिर है कि इनमें से अधिकतर जरूरतमंद देश के दूसरी धर्मों में भी पैदा हुए होंगे, और उन धर्मों ने अपने इन जरूरतमंदों को फुटपाथ या नाली-गटर में मरने के लिए फेंक दिया था। ऐसे अवांछित बच्चों को उठा-उठाकर मदर टेरेसा और उनके साथ की दूसरी नन्स ने जिंदगी दी, तो इसमें कोई करिश्मा नहीं था, महज सेवा और समर्पण से यह काम हुआ। दूसरी तरफ संत की उपाधि देने के पहले वैटिकन ने खूब लंबी-चौड़ी तलाश करके दो ऐसे मरीज ढूंढ निकाले जिनका यह दावा है, या जिनका यह मानना है कि वे मदर टेरेसा के चमत्कार से ठीक हुए, और इसके आधार पर मदर टेरेसा को संत बनाया जा रहा है। हमारी सोच वैटिकन की सोच से बिल्कुल अलग है, और हमारी नजर में, हमारी जुबान में हम जिसे संत मानते हैं, उनके साथ किसी तरह का चमत्कार जुड़ा होना कहीं जरूरी नहीं होता है। इस देश में गांधी को भी साबरमति का संत माना गया, और गांधी के साथ कोई चमत्कार भी जुड़ा हुआ नहीं था। लेकिन ईसाई धर्म-संगठन की अपनी मान्यताएं हैं, और धर्म का कारोबार तो चमत्कारों के बिना चल नहीं सकता। लेकिन हिंदुस्तान और बाकी दुनिया की नजर में मदर टेरेसा की महानता किसी चमत्कार की मोहताज नहीं रही, और यह देश वैटिकन के इस संतई-सर्टिफिकेट के बिना भी उनको भारतरत्न मान चुका था, और उनकी सेवा देखकर देश के तकरीबन सारे लोगों के बदन में सिहरन सी दौड़ जाती थी। अपने जन्म के देश को छोड़कर वे जिस तरह इस गरीब देश में आकर यहां के सबसे गरीब, और सबसे ही जरूरतमंद लोगों के बीच पूरी जिंदगी काम करती रहीं, उससे वे भारत की एक सबसे बड़ी संत पहले ही बन चुकी हैं, आज शायद वैटिकन उनका सम्मान करके खुद सम्मान पाने का काम ही कर रहा है।

अंबानी अफसोस जाहिर करे और मोदी इससे अपने को अलग करें

संपादकीय
3 सितंबर 2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बड़ी सी तस्वीर के साथ रिलायंस के मालिक मुकेश अंबानी ने अपनी नई टेलीफोन-इंटरनेट सेवा के जो इश्तहार छपवाए, उनसे ऐसा लगा कि वे प्रधानमंत्री से मुफ्त की मॉडलिंग करवा रहे हैं। लेकिन मानो यह काफी नहीं था, तो फिर रिलायंस जियो का जो टीवी इश्तहार आया, उसमें तो प्रधानमंत्री के लालकिले के भाषण सहित उनकी बहुत सी तस्वीरें, वीडियो क्लिप दिखाई गईं, और ऐसा लगने लगा कि यह कंपनी देश की सरकार ही है। इसलिए इसके तुरंत बाद जब विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री की जमकर आलोचना की, तो वह स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही थी। कांग्रेस ने तो निजी कंपनी के विज्ञापन में प्रधानमंत्री के ऐसे इस्तेमाल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
भारतीय लोकतंत्र में ही नहीं, अमरीकी लोकतंत्र में भी नेताओं और कारोबारियों के रिश्ते जगजाहिर हैं। नरेन्द्र मोदी के पहले भी, और केन्द्र सरकार से परे राज्यों में भी नेताओं के करीबी कारोबारी रहते हैं, और उनके साथ खास रियायतों वाले रिश्ते भी रहते हैं। आखिर चुनावों के वक्त लंबा-चौड़ा कालाधन कारोबार की दुनिया से ही नेताओं को मिलता है, इसलिए आदर्श की खोखली बातों को हकीकत पर लादने का कोई फायदा तो है नहीं। ऐसे में यह समझने की जरूरत है कि राजनीति और कारोबार के बीच के संबंधों में क्या कोई सीमा रेखा हो सकती है? लोगों को याद होगा कि आज के राष्ट्रपति और कांग्रेस पार्टी के एक सबसे लंबे वक्त के सबसे ताकतवर मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी की खूबी यही मानी जाती थी कि वे देश के बड़े उद्योगपतियों से पार्टी के लिए मनचाहा चंदा जुटा सकते थे। और आज जिन मुकेश अंबानी की कंपनी के इश्तहारों को लेकर यह बात हो रही है, उस अंबानी का पेट्रोल पंप कर्मचारी से देश के सबसे बड़े कारोबारी तक का पूरा सफर कांग्रेस के राज में ही हुआ था। उस वक्त से यह चर्चा भी रहती थी कि देश की बहुत सी आयात-निर्यात नीतियां, और बहुत सी टैक्स नीतियां धीरूभाई अंबानी के कहे मुताबिक, उनके फायदे के लिए बनती थीं, और उनकी बुलंदी के पीछे कारोबार का योगदान कम था, सरकारी नीतियों का योगदान अधिक था। लोगों को यह भी याद होगा कि अटल सरकार के दौरान जब धीरूभाई अंबानी पर डाक टिकट जारी हुई, तो मंच पर उस वक्त के संचार मंत्री प्रमोद महाजन ने उस टिकट के पोस्टर को थामने के बजाय उसे उठाकर अपने सिर के ऊपर चढ़ाकर तस्वीरें खिंचवाईं थीं। इसलिए मोदी का कुछ कारोबारियों से घरोबा भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि एक राजनीतिक दल, और उसके पदाधिकारियों का किसी से घरोबा, और एक प्रधानमंत्री के ओहदे का किसी से घरोबा, क्या दो अलग-अलग बातें रहनी चाहिए, या फिर इन दोनों में दिखावे के लिए भी किसी फर्क की जरूरत नहीं है? हमारा यह मानना है कि राजनीति और कालेधन के सारे संबंध देखते हुए भी सार्वजनिक जीवन में दिखावे की नैतिकता को अगर कुचलना जरूरी न हो, तो उसे ढो लेना चाहिए। किसी कारोबारी पर मेहरबानी और रियायत के सौ तरीके होते हैं, उनमें से ऐसे सार्वजनिक प्रदर्शन का तरीका अच्छा नहीं माना जा सकता। और ऐसा मानने का हमारे पास कोई कारण नहीं है कि अंबानी ने मोदी की सहमति या अनुमति के बिना उनके नाम, उनके वीडियो, और उनकी तस्वीरें का ऐसा कारोबारी और बाजारू इस्तेमाल किया होगा। किसी टेक्नालॉजी को बढ़ावा देना एक अलग बात है, लेकिन किसी ब्रांड को आगे बढ़ाना सरकारी या संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों का काम नहीं होना चाहिए। जो कुछ गलतियां टाली जा सकने लायक होती हैं, यह उनमें से एक थी, और हमारा ऐसा मानना है कि इससे न सिर्फ नरेन्द्र मोदी का नुकसान हुआ है, बल्कि अंबानी का भी नुकसान हुआ है जो कि अपने प्रोडक्ट की खूबियों को बिना प्रधानमंत्री का चेहरा लगाए भी बेच सकते थे, और बाजार की दुनिया में ऐसे चेहरे से ग्राहकों का भरोसा नहीं जीता जा सकता, विवाद की खबरों में जरूर आया जा सकता है, और इस मामले में यही हुआ है। ऐसी नौबत में बेहतर यही है कि अंबानी खुद अपने इन विज्ञापनों को हटाए, इनके लिए अफसोस जाहिर करे, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने आपको सार्वजनिक बयान देकर इनसे अलग भी करें। यह उनकी निजी पसंद का मामला नहीं है, यह प्रधानमंत्री पद की सार्वजनिक गरिमा का मामला भी है।

फोन-इंटरनेट ग्राहकों की जिंदगी में एक बड़ा फर्क

संपादकीय
2 सितंबर 2016
भारत के टेलीफोन-इंटरनेट उद्योग में बड़े अम्बानी ने कल जो धमाका किया है, वह देश भर के कोने-कोने में पूरी-पूरी रात लोगों की गैरजरूरी बातचीत की शक्ल में आगे जिंदगी भर गूंज सकता है। दरअसल दुनिया में खुले कारोबार में ऐसा ही होता कि कोई कारोबारी धंधे के सारे तौर-तरीके एक पल में बदल सकते हैं, और लोगों की जिंदगी भी। कल तक लोग फोन पर बात करते हुए यह सोचते थे कि महीने का बिल कितना आएगा, आज मुकेश अम्बानी की कंपनी ने इस कारोबार में टेलीफोन पर बातचीत को मुफ्त कर दिया है, बस इंटरनेट से डाटा इस्तेमाल करने का एक पैकेज लेना होगा। इससे हिन्दुस्तानी मोबाइल-ग्राहकों या इंटरनेट-ग्राहकों के खर्च पर जो फर्क पडऩा है, वह तो आने वाले दिनों में सामने आएगा, लेकिन अगर रिलायंस के इस दावे की तरह बातचीत सस्ती हो जाती है, तो सामाजिक अंतरसंबंधों में भी एक बड़ा फर्क आएगा। अभी तो महज प्रेमी-प्रेमिका या मां-बेटी के बीच ऐसी लंबी बातचीत होती हैं, लेकिन बातचीत पूरी तरह से मुफ्त हो जाने से लोग क्या करेंगे यह अंदाज लगाना मुश्किल है।
दरअसल टेक्नालॉजी ने दुनिया के समाज पर जितने किस्म के फर्क डाले हैं, उतने तरह के फर्क समाज अपने नियम-कायदों से भी नहीं डाल पाता। लोगों का मिजाज टेक्नालॉजी और उसके कारोबार से तय होता है, और हाल के दस-बीस बरसों को देखें तो लोगों के सामाजिक संबंध, दोस्तों का दायरा, यह सब कुछ इस बात पर आ टिका है कि लोगों की फोनबुक मेंं किनके नाम हैं, किनके नहीं, किनको एसएमएस किया जा सकता था, वहां से बात अब इस पर आ टिकी है कि किसको वॉट्सऐप किया जा सकता है, और किसको नहीं। कौन लोग फेसबुक पर दोस्त हैं, और कौन नहीं, इस पर भी लोगों के दोस्तों का दायरा तय होने लगा है। कुछ-कुछ ऐसा हो गया है कि जो लोग आपके वॉट्सऐप की लिस्ट में नहीं हैं, वे मानो आपकी असल जिंदगी में भी अब आपके दोस्त नहीं रह गए हैं, और ऐसी लिस्ट में जो लोग हैं, उनके साथ बातचीत, हंसी-मजाक, इन सबका बढ़ते चलना देखने लायक है।
अब इससे परे जिस दूसरी बात को बड़े अम्बानी की कंपनी भुना रही है, वह है लोगों की जिंदगी के शौक से लेकर, कारोबार तक, और पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक इंटरनेट की जरूरत। मुकेश अम्बानी ने यह एक नया फार्मूला निकाला है कि लोग डाटा के लिए भुगतान करें, और बातचीत मुफ्त में करें। बाजार में कभी-कभी पहले भी ऐसा हुआ है कि टायर खरीदो, और उसके साथ पेजर मुफ्त। अखबार खरीदो और उसके साथ हीरों का हार या कुर्सी मुफ्त। लोगों को यह समझ नहीं पड़ता था कि पांच सौ रूपए सालाना खर्च करके एक पत्रिका खरीदने पर पन्द्रह सौ रूपए का बैग कैसे मुफ्त मिल सकता है। लेकिन अब मुकेश अम्बानी बाजार में चिटफंड कंपनी की तरह धोखा देकर भाग जाने वाले कारोबारी नहीं हैं, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि उनकी यह नई तरकीब शायद लंबी जिंदगी जिए, और कारोबार के तौर-तरीकों को बदल ही दे। इंटरनेट की जरूरत, और इंटरनेट का शौक, ये इतनी रफ्तार से हिन्दुस्तानी लोगों पर भी हावी होते चल रहे हैं कि अम्बानी को इसमें एक टकसाल दिख रही है।
इंटरनेट के साथ एक यह बात तो है ही कि उसने सूचना पाने के संपन्न तबके के एकाधिकार को तोड़कर इसे एक लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में दुनिया के सामने रखा है। अब भारत में संचार कंपनियां अगर इस नई कारोबारी चुनौती को देखते हुए अगर रेट गिराती हैं, अपनी सेवाओं को सुधारती हैं, तो देश के लोगों का फायदा हो सकता है। फिलहाल हम न तो रिलायंस कंपनी के प्रचार के लिए यह लिख रहे हैं, और न ही भारत के फोन-इंटरनेट ग्राहकों की जिंदगी में आने वाले एक बड़े फर्क को अनदेखा करना चाहते हैं, इसलिए इस पर लिखना तो है ही। लेकिन यह सिलसिला बाजार और ग्राहक को कहां तक पहुंचाता है, लोगों की जिंदगी में इससे क्या फर्क पड़ता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

सेक्स-वीडियो के हीरो पर पहला पत्थर वे चलाएं...

संपादकीय
1 सितंबर 2016
दिल्ली में कल आम आदमी पार्टी की सरकार के एक मंत्री को उनकी कुछ निजी सेक्स-वीडियो, और तस्वीरें सामने आने पर सरकार से बर्खास्त कर दिया गया, और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बड़ी शर्मिंदगी के साथ कहा है कि किसी के चेहरे पर यह लिखा नहीं होता कि वह गलत है। उनकी पार्टी ने कहा कि यह सीडी मिलते ही आधे घंटे के भीतर इस मंत्री को हटा दिया गया। दूसरी तरफ इस मंत्री ने अपने बचाव में कहा है कि वह दलित समुदाय का है, इसलिए उसके खिलाफ ऐसी साजिश की गई है।
अभी तक जो वीडियो-रिकॉर्डिंग और तस्वीरें खबरों में देखने मिली हैं, उनसे यह तो नहीं लग रहा है कि इस मंत्री ने अपने पद का बेजा इस्तेमाल करते हुए महिलाओं का शोषण किया है। अगर वैसा होता है, या किसी भी महिला की तरफ से यह शिकायत आती है कि इस मंत्री ने उस पर दबाव डालकर ऐसा किया, तो उसके लिए देश के कानून में अलग से कड़ी कैद का इंतजाम भी है। लेकिन दूसरी तरफ जैसा कि कुछ समाचार चैनलों का यह विश्लेषण है कि इस मंत्री ने खुद ही अपनी ऐसी रिकॉर्डिंग की, तस्वीरें खींचीं, तो यह एक अलग मामला बनता है। लोग अपने निजी जीवन की सेक्स की रिकॉर्डिंग कर सकते हैं, उसमें कोई जुर्म नहीं है, जुर्म वहां शुरू होता है जहां पर वह रिकॉर्डिंग करने वाले ही उसका किसी तरह का इस्तेमाल करते हैं, उसे बेचते या बांटते हैं, या शायद उसे दूसरों को भेजने पर भी रोक है। यह बात तो जांच के बाद सामने आएगी, लेकिन फिलहाल यह मामला इसलिए भी अधिक गंभीर लगता है कि केजरीवाल राजनीति में एक अलग तरह की ईमानदारी और पारदर्शिता का नारा लगाते हुए सत्ता तक पहुंचे हैं, और वे देश में महज अपने आपको, महज अपनी पार्टी को ईमानदार मानते हैं, इसलिए उन पर, उनके लोगों पर ईमानदारी और नैतिकता सभी तरह के पैमाने कुछ अधिक कड़ाई से लागू भी होते हैं। और फिर जो मंत्री इस सेक्स रिकॉर्डिंग में पकड़ाया है, वह दिल्ली सरकार का महिला एवं बाल विकास मंत्री भी था, और उससे महिलाओं के प्रति एक संवेदनशील और सम्मान के नजरिए की उम्मीद भी की जाती थी। उसने खुद ही सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि उसके मन में महिलाओं के प्रति इतना सम्मान है कि वह रोज सुबह अपनी पत्नी के पैर छूकर ही घर से निकलता है। अब ऐसे में अगर पत्नी से परे की कुछ या कई महिलाओं के साथ उसकी ऐसी अंतरंग तस्वीरें सामने आती हैं, तो जाहिर है कि उसकी निजी जिंदगी एकदम सही तो नहीं है।
और फिर जो लोग सार्वजनिक जीवन में हैं, उनसे जनता थोड़े से अमानवीय आदर्श की उम्मीद भी करती है। यह एक अलग बात है कि देश की शायद ही ऐसी कोई पार्टी हो जिसके नेताओं के बीच सेक्स को लेकर हंगामे न हुए हों। मध्यप्रदेश में ही एक मंत्री नौकर पर बलात्कार में जेल रहकर जमानत पर है, कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी ने आंध्र के राजभवन में रहते हुए कई तरह की वीडियो-उत्तेजना दुनिया को उपलब्ध कराई, और अगर हमारी याद सही है तो कांग्रेस के प्रवक्ता रहे अभिषेक मनु सिंघवी की एक सेक्स-वीडियो में वे शायद एक महिला वकील को जज बनाने जैसी बात कहते हुए भी दर्ज हो चुके हैं, और उन्हें पार्टी का यह ओहदा छोडऩा भी पड़ा था। ऐसी बहुत सी मिसालें हैं, और इसलिए हैं कि राजनीति में जो लोग हैं वे भी इंसान हैं, और इंसान के लिए यह एक आम बात है। लेकिन जनता अपने नेता से आम इंसान के लिए रियायती आम पैमानों से ऊपर एक खास आदर्श की उम्मीद करती है, और जुर्म न रहने पर भी एक बेहतर सामाजिक-नैतिक आचरण उनसे चाहती है।
लोगों को याद होगा कि सेक्स-वीडियो और ऐसी तस्वीरों का बेजा इस्तेमाल नया नहीं है, और इमरजेंसी के बाद बाबू जगजीवन राम को धमकाने के लिए उनके बेटे सुरेश राम की महिला मित्र के साथ की नग्न तस्वीरों को भरकर मेनका गांधी ने अपनी पत्रिका, सूर्या, का एक पूरा अंक ही निकाला था। अब वह तो कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति का नतीजा था, एक साजिश थी, और वही मेनका आज अपने बेटे सहित भाजपा के भीतर बड़े ऊंचे दर्जे का मुआवजी-सत्ता सुख भोग रही हैं। इसलिए सार्वजनिक जीवन में निजी सेक्स कुछ वैसा ही है कि जो पकड़ा गया वह चोर, बाकी साहूकार। इसलिए ऐसा भांडाफोड़ होने पर मंत्री के पद से हटा देना तो ठीक है, लेकिन इस मंत्री पर बाहर के, दूसरी पार्टियों के उन्हीं नेताओं को पहला पत्थर चलाना चाहिए जिनकी अपनी पार्टी के नेताओं के चाल-चलन बड़े आदर्श के हैं। हमें लगता है कि ऐसा करने पर यह मंत्री बिना एक खरोंच भी पाए चुपचाप घर पहुंच जाएगा। फिलहाल एक दलित नेता को ऐसी घटिया बात नहीं करना चाहिए कि चूंकि वह दलित है, इसलिए उसके खिलाफ ऐसी साजिश की गई है।

दुनिया एक डिजिटल खतरे के ढेर पर बैठी हुई है पर...

संपादकीय
31 अगस्त  2016
दुनिया में आज मोबाइल फोन पर संदेश, तस्वीरें, और वीडियो-संगीत भेजने के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली एक सर्विस, वॉट्सऐप का मालिकाना हक दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया सर्विस फेसबुक के पास आने के बाद अब एक के फोन नंबर दूसरी सर्विस को भी चले जा रहे हैं, और ऐसे मेल से इन सोशल-मीडिया कारोबारियों के पास अपने ग्राहकों का डाटा-बेस एकदम से दुगुना हो जाएगा। इससे लोगों की निजी जिंदगी किस तरह फोन और फेसबुक पर मिलकर एक हो जाएगी यह  अंदाज लगा पाना अभी संभव नहीं है, लेकिन लोग सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर फिक्र कर रहे हैं, और यह सुझा रहे हैं कि अपनी फोनबुक को फेसबुक के साथ शेयर करने से कैसे बचा जा सकता है।
लेकिन हकीकत यह है कि रोजमर्रा की जिंदगी में शायद ही कोई ऐसे इंटरनेट-उपभोक्ता रहते हैं जो कि फोन और इंटरनेट पर इस्तेमाल होने वाले किसी एप्लीकेशन, या किसी सोशल मीडिया की लिखी गई नियम और शर्तों को पढ़ते हों, और उसके बाद उससे सहमति जाहिर करते हों। नतीजा यह होता है कि बाजारू और कारोबारी सभी तरह के इंटरनेट-सेवा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, और संदेश वाली सेवाएं, ये अपने ग्राहकों या सदस्यों की निजी जानकारी के इस्तेमाल का हक हासिल कर लेती हैं, और उससे फिलहाल तो अपना विज्ञापनों का कारोबार बढ़ाने की बात करती हैं, लेकिन आज ही वह दूसरी किन बातों के लिए इन बातों का इस्तेमाल करती होंगी, यह अंदाज लगाना नामुमकिन है। कुल मिलाकर यह है कि जिन लोगों को अपनी निजी जिंदगी की गोपनीयता बनाए रखने में उन्हें ओसामा-बिन-लादेन की तरह फोन और इंटरनेट से दूर ही रहना होगा, तभी उनके बदन पर तौलिया बने रह सकता है। आज जो लोग सोशल मीडिया पर पहुंचते हैं, वे कानूनी कारोबारियों, और गैरकानूनी हैकरों, सभी के हाथों अपनी गोपनीयता खो बैठते हैं।
सोशल मीडिया ने आज निजी जिंदगी को जिस तरह से नाजुक बना दिया है, और उसकी जानकारी को खतरनाक बना दिया है, उसके बाद अब दुनिया में सरकारों की खुफिया जासूसी एजेंसियों का काम खासा घट गया है। कई बरस से चलते-चलते एक लतीफा अब पिट गया है कि अमरीकी सरकार ने सीआईए का बजट एक चौथाई कर दिया है, कि अब फेसबुक के बाद जासूसी का काम तो घर बैठे हो सकता है, उस पर दुनिया भर में इतना खर्च क्यों मंजूर किया जाए। और लोग न केवल अपने सामाजिक संबंधों के लिए, बल्कि अपने कारोबार के लिए भी इंटरनेट पर पूरी तरह टिक चुके हैं, और उनकी आम या खास हर तरह की जानकारी आज इंटरनेट पर है। इससे दुनिया का कारोबार और निजी जिंदगी दोनों ही इतने नाजुक हो गए हैं कि अगला कोई विश्व युद्ध ऐसा भी हो सकता है कि जिन इंटरनेट खातों पर कोई एक खास शब्द दर्ज हो, उन सारे खातों की सारी जानकारी को एक साथ मिटा दिया जा सके। मिसाल के तौर पर अगर कोई चाहे तो किसी धर्म की कुछ बहुत ही सामान्य बातों वाले ई-मेल खाते, वैसे सोशल मीडिया खाते, इनको एक साथ मिटा दिया जाए। ऐसे में एक खास धर्म के, एक खास देश के, एक खास रंग या जाति के, एक खास राजनीतिक विचारधारा के, एक खास आय वर्ग के लोगों को उनकी पूरी डिजिटल जिंदगी से अलग किया जा सकता है, और वे एकदम से डिजिटल-दीवालिया हो जाएंगे, न उनका इतिहास बचेगा, न उनका वर्तमान बचेगा, और भविष्य बनाने में शायद पूरी जिंदगी लग जाएगी। हमारी यह भविष्य की एक आशंका है कि अगले युद्ध हथियारों से नहीं लड़े जाएंगे, और किसी देश का डिजिटल-ढांचा खत्म करके उस देश को पल भर में लकवे का शिकार बना दिया जाएगा, ताकि वहां की जिंदगी थम जाए, खत्म हो जाए, और अराजकता से वहां दंगे होने लगें।
आज दुनिया को यह सोचने की जरूरत है कि किस तरह ऐसे डिजिटल-खतरे से बचने की तैयारी की जा सकती है, क्योंकि अब धीरे-धीरे किसी भी देश की सार्वजनिक सेवाओं, और रोज की जरूरतों का इतना कम्प्यूटरीकरण हो चुका है कि एक भी साइबर-अटैक देश की धड़कन को रोक सकता है। ऐसी कल्पना पर हॉलीवुड में फिल्में तो बहुत सी बनी हैं, लेकिन सरकार और समाज ऐसी नौबत से निपटने के लिए शायद कुछ कर नहीं पा रहे हैं।

सरकार में फाइलों से परे के जुबानी आदेश-निर्देश भी रिकॉर्ड करना ठीक होगा?

संपादकीय
30 अगस्त  2016
मनमोहन सिंह सरकार में कोयला-सचिव रहे एच.सी. गुप्ता ने आज  सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई में कहा कि उन्होंने तमाम बातें उस समय कोयला मंत्रालय देख रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने रख दी थीं। इससे ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह कटघरे के और करीब पहुंच गए हैं, और आगे जाने उन पर इतनी जिम्मेदारी तय होगी। लोगों को याद होगा कि अभी इसी पखवाड़े इस रिटायर्ड आईएएस अधिकारी ने अदालत में रोते हुए यह कहा था कि वे अब आगे इस मुकदमे में अपना कोई पक्ष रखना नहीं चाहते, और न ही जमानत जारी रखना चाहते हैं, उन्हें जेल भेज दिया जाए। उनका कहना था कि उनके पास अब वकीलों पर और खर्च करने के लिए ताकत बची नहीं है, और जिसने जमानत ली है उसे अपनी गारंटी वापिस चाहिए इसलिए उन्हें जेल भेज दिया जाए। अदालत ने उन्हें मुफ्त में सरकारी वकील देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन देश के एक सबसे बड़े मंत्रालय के सचिव रह चुके, और देश की सबसे ताकतवर आईएएस सेवा से रिटायर हुए इस व्यक्ति की इस बेबसी पर लोग हक्का-बक्का रह गए।
जब कोई कटघरे में है, तो उसकी ईमानदारी और बेईमानी पर अधिक चर्चा ठीक नहीं है, लेकिन इस अफसर के बारे में आमतौर पर सरकारी महकमों में जनधारणा ठीक रहती थी, और उन्हें ईमानदार माना जाता था। दूसरी तरफ मनमोहन सिंह को भी लोग निजी ईमानदार मानते थे, और लोगों को यह भरोसा शायद न हो कि मनमोहन सिंह ने रिश्वत ली हो। लेकिन जब कोई जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाली कुर्सियों पर बैठते हैं, तो निजी ईमानदारी की बात किसी काम की नहीं रहती। हर किसी को निजी ईमानदार रहना चाहिए, और इसमें तारीफ की कोई बात नहीं हो सकती। दूसरी तरफ सरकारी, संवैधानिक या सार्वजनिक पदों पर बैठे हुए लोगों पर यह अनिवार्य जिम्मेदारी आती है कि वे अपने मातहत लोगों के कामों पर भी नजर रखें, और गड़बड़ी सामने आने पर तो उस पर कार्रवाई उनकी कानूनी जिम्मेदारी भी रहती है। मनमोहन सिंह के बारे में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि कोई मुखिया अपने-आपको तब ईमानदार होने का तमगा नहीं दे सकता, जब उसके मातहत खुलेआम जुर्म कर रहे हों, और वह सबको दिख भी रहे हों। मनमोहन सिंह की ऐसी कोई निजी ईमानदारी अगर रही भी होगी, तो भी उन्होंने संविधान की शपथ लेकर जो कुर्सी संभाली थी, उस शपथ के साथ और उस कुर्सी के साथ तो उन्होंने अनदेखी की बहुत बड़ी बेईमानी की भी थी।
अब जब उनके मंत्रालय-सचिव रहे अफसर यह कह रहे हैं कि उन्होंने सब कुछ मनमोहन सिंह को बता दिया था, तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या सरकारी फाइलों से परे की लोगों की सरकारी बातचीत को भी दर्ज किया जाना चाहिए? मंत्री और अफसर के बीच, अफसर और मातहत के बीच बहुत सारी बातें जुबानी होती हैं, और क्या अगर ऐसी बातचीत को कोई एक या दोनों पक्ष अपने फोन पर ही रिकॉर्ड करके रखने लगे, फोन पर होती बातचीत को रिकॉर्ड करने लगे, तो क्या वह सरकारी सेवा नियमों के खिलाफ होगा? या फिर उससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ेगी? और कोई हैरानी नहीं है कि आज सूचना के अधिकार और अदालती-सक्रियता के इस दौर में सरकार में काम करने वाले लोगों में से कुछ लोग यह तय कर लें कि फाइलों से परे भी वे जुबानी निर्देश और आदेश को भी रिकॉर्ड करके रखेंगे।