जिन्हें बांग्लादेश मिसाल के तौर पर बुरा लगता है...
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अभी एक अनुमान बताया है कि जिस रफ्तार से बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी बढ़ रही है, और भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी की जो बदहाली चल रही है, जल्द ही बांग्लादेश भारत से बेहतर अर्थव्यवस्था बन सकता है, इस एक पैमाने पर वह आगे निकल सकता है। इस बात को लेकर कई अर्थशास्त्री सहमत हैं कि 1971 में पैदा हुए बांग्लादेश ने भारी दिक्कतें, फौजी हुकूमत, राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक कट्टरता, और प्राकृतिक विपदाओं को झेलते हुए भी धीमी लेकिन निरंतर गति से जैसी तरक्की की है, वह अहमियत रखती है, और बांग्लादेश दुनिया के कारोबारियों में एक भरोसेमंद जगह बन चुका है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के पिछले छह बरसों को लेकर राहुल गांधी ने आईएमएफ के ताजा अनुमान का हवाला देते हुए लिखा है कि भाजपा सरकार के पिछले छह बरस के नफरत भरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे ठोस उपलब्धि यही रही है कि बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोडऩे वाला है।
किसी तर्क के रूप में कोई मिसाल देना खतरनाक होता है क्योंकि लोग तुरंत ही इस पर उतर आते हैं कि भारत और बांग्लादेश में कौन-कौन से फर्क हैं जिनकी वजह से यह मिसाल ही नाजायज है। किसी तर्क को पटरी से उतारना हो तो ही कोई मिसाल देनी चाहिए। लेकिन अब एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने अगर एक पैमाने पर भारत, बांग्लादेश, और नेपाल सबके आंकड़े दिए हैं तो लोग तुलना कैसे न करें? मिसाल कैसे न दें? हिन्दुस्तान में आज वह पीढ़ी अभी रिटायर हो रही है जिसने अपने कॉलेज के दिनों में बांग्लादेश से आए हुए शरणार्थियों के गुजारे के लिए इंदिरा सरकार द्वारा लागू किए गए शरणार्थी टैक्स का पैसा हर सिनेमा टिकट पर दिया था। बांग्लादेश 1947 के पहले तक अविभाजित भारत का ही एक हिस्सा था, जो विभाजन में पहले पाकिस्तान में जाकर पूर्वी पाकिस्तान बना, और फिर इंदिरा गांधी के हौसले से उस हिस्से को पाकिस्तान से तोडक़र बांग्लादेश बनाया गया। अब भारत के ही बनाए हुए ऐसे बांग्लादेश में महज इंसानों की मेहनत से अगर अर्थव्यवस्था इस तरह बेहतर होती चली जा रही है तो फिर तुलना के लिए इस पड़ोसी से बेहतर और कौन सा देश हो सकता है? फिर बांग्लादेश ने यह मिसाल भी सामने रखी है कि अपनी महिलाओं को हुनर सिखाकर, कामकाज में लगाकर किस तरह पूरी दुनिया के बड़े-बड़े फैशन ब्रांड के कपड़े बांग्लादेश में सिले जा सकते हैं। अपनी मानव शक्ति का ऐसा इस्तेमाल करके इस देश ने अगर एक मिसाल सामने रखी है, तो हिन्दुस्तान में झंडा-डंडा थमाकर फर्जी मुद्दों पर झोंक दी गई कई पीढिय़ों के बारे में सोचना चाहिए कि उनसे देश की एकता के टुकड़े-टुकड़े होने के अलावा और क्या हासिल हो रहा है?
बात राहुल गांधी ने कही है, या कि एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संगठन से आई है, या कि पड़ोस के एक ऐसे गरीब और छोटे देश की है जिसके साथ ‘गर्व से कहो हम भारतीय’ लोग अपनी तुलना नहीं चाहते हैं। इसलिए आज यह हिन्दुस्तान कश्मीर से 370 के खात्मे, राम मंदिर बनने, बाबरी मस्जिद केस में सबके रिहा हो जाने की खुशी में ऐसा डूबा है कि पड़ोस का गरीब मेहनत करते-करते कब उससे आगे निकल गया, यह उसे न पता लगा, और न ही वह इस हकीकत को देखना ही चाहता है। दरअसल किसी भी देश-प्रदेश की सरकार के लिए आर्थिक आंकड़े सबसे बड़ी चुनौती होते हैं, और सबसे बड़ी कसौटी भी होते हैं। ये आंकड़े अगर ईमानदारी से जुटाए जाते हैं, तो ये धोखा देने के काम नहीं आते, और सवाल बनकर मुंह चिढ़ाते हैं। ऐसे में आज भारत में किसी भी किस्म के आर्थिक सर्वे, आर्थिक विश्लेषण, और उनसे जुड़े सवालों से मुंह चुराया जा रहा है। असली आंकड़े झंडों-डंडों से नहीं डरते, उन्हें भीड़ पीट-पीटकर मार भी नहीं सकती, वे न थाली-ताली से खुश होते हैं, और न ही दीयों की लौ से डरकर भागते हैं। अगर कोई चीज सबसे स्थाई होती है, तो वह असल और सच्चे आंकड़े होते हैं। ऐसे में बांग्लादेश की कामयाबी को चुनौती की तरह लेने के बजाय, उससे सबक लेने के बजाय, अपनी नाकामयाबी की लकीर छोटी करने के बजाय बांग्लादेश को एक मिसाल के रूप में भी खारिज कर देना अधिक आसान समझा जा रहा है। हकीकत से इस हद तक मुंह चुराकर दुनिया में कोई भी तरक्की नहीं कर सकते। आज बांग्लादेश में एक-एक महिला लाखों की सिलाई मशीनों पर दुनिया के महंगे ब्रांड के कपड़े सिलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक साख बना रही है, और हिन्दुस्तान ऐसी संभावनाओं को अनदेखा करते हुए अपने लोगों को नारों और कीर्तन में झोंक रहा है। यह सिलसिला अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों में जारी नहीं रह सकता, क्योंकि उनके पास इस देश में दबाए गए, छुपाए गए आंकड़ों से परे भी जानकारियां हैं।
हिन्दुस्तान आज जिस आर्थिक बदहाली से गुजर रहा है, उससे उबरने का रास्ता मुंह छिपाने से होकर नहीं गुजरता। उससे उबरना तभी हो सकता है जब हकीकत का सामना किया जाए, समस्या को माना जाए, और उन बातों के बारे में भी सोचा जाए जो तरक्की के रास्तों पर रोड़ा हैं। एक देश जो अपने नामौजूद इतिहास के झूठे गौरव के नशे में मदमस्त रखा जा रहा है, वैसे देश का पिछडऩा तय है। और लोग हैं कि भूखे पेट उन्हें ऐसे झूठे गौरव का नशा और अधिक चढ़ रहा है।
यह तो अच्छा हुआ कि इस बार सुप्रीम कोर्ट ने अर्नब को सीधे राहत न दी
मुम्बई में टीवी चैनलों द्वारा अपना टीआरपी (दर्शक संख्या) बढ़ाने को लेकर जो फर्जीवाड़ा किया गया है उस पर जुर्म दर्ज करके मुम्बई पुलिस कार्रवाई कर रही है, और दो छोटे चैनलों के लोगों को गिरफ्तार किया गया है, और देश के सबसे विवादास्पद और चर्चित समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी के लोगों को नोटिस देकर बुलाया गया है। पुलिस का दावा है कि रिपब्लिक टीवी ने लोगों को पैसे देकर अपना चैनल देखने का काम दिया, और यह काम उन घरों में दिया गया जहां पर दर्शकों की संख्या दर्ज करने के लिए अलग से बॉक्स लगे रहते हैं। कुल मिलाकर यह मामला अपनी दर्शक संख्या अधिक दिखाने के लिए की गई बेईमानी का है। जब इस जांच के खिलाफ रिपब्लिक टीवी सुप्रीम कोर्ट गया तो वहां अदालत ने उसकी याचिका सुनने से इंकार किया, और कहा कि किसी भी आम व्यक्ति की तरह इस चैनल को भी पहले हाईकोर्ट जाना चाहिए। अदालत ने पूछा कि पहले हाईकोर्ट क्यों नहीं गए? हाईकोर्ट के विचार किए बिना सीधे सुप्रीम कोर्ट अगर सुनवाई करेगा तो लोगों में यह संदेश जाएगा कि हमें (सुप्रीम कोर्ट) उच्च न्यायालयों पर विश्वास नहीं है।
लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले रिपब्लिक टीवी के मुखिया अर्नब गोस्वामी का एक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, तो अदालत ने जिस रफ्तार से अर्नब के केस की सुनवाई की थी, और उन्हें राहत दी थी, उसे लेकर देश भर में लोगों के बीच कई सवाल उठे थे कि लॉकडाऊन में घर लौटते मजदूरों के मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास समय नहीं है, पूरे कश्मीर में इंटरनेट बंद रहने के मामले की सुनवाई के लिए समय नहीं है, एक अकेले अर्नब गोस्वामी के लिए समय है?
हम कानूनी बारीकियों में गए बिना सिर्फ इतना कहना चाहते हैं कि लोकतंत्र में न्यायपालिका को न सिर्फ ईमानदार और निष्पक्ष रहना चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए। जब व्यापक जनहित के मुद्दे जिनसे करोड़ों लोग प्रभावित होते हैं, वे धरे रह जाते हैं, और मशहूर या रईस लोग सुप्रीम कोर्ट में आनन-फानन में सुनवाई का मौका पा लेते हैं, जज ऐसे लोगों के मामले रात-बिरात घर में भी सुन लेते हैं, तो फिर लोगों की आस्था अदालतों से हिलना स्वाभाविक है। वैसे भी हिन्दुस्तान में न्याय की पूरी प्रक्रिया ताकतवर तबके, संपन्न तबके, और मुजरिमों के पक्ष में इतनी अधिक झुकी हुई दिखती है कि लोगों का भरोसा अदालती इंसाफ से घटते चले गया है। यह सिलसिला अगर थमा नहीं, तो न्यायपालिका पर रहा-सहा भरोसा भी खत्म हो जाएगा।
भारत में किसी जुर्म या बेइंसाफी के खिलाफ इंसाफ पाने की कोशिश थाने के स्तर से ही कुचल दी जाती है जैसा कि अभी हाथरस में बलात्कार की शिकार दलित लडक़ी के साथ हुआ, या यूपी के भाजपा विधायक सेंगर पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली लडक़ी और उसके परिवार के साथ हुआ। यह छोटा सिलसिला नहीं रहता, यह बरसों तक शिकायतकर्ता को कुचलने का सिलसिला रहता है, और आसाराम से लेकर सेंगर तक के मामलों में हमने अनगिनत कत्ल होते देखे हैं जिन्हें हादसा बनाकर पेश किया जाता है। लोकतंत्र में जब सरकारें जुल्म करने वालों के साथ रहती हैं, तो अदालत के सामने जो तस्वीर पेश की जाती है, वह कोई जुर्म साबित करने के लिए काफी नहीं होती। अभी-अभी सीबीआई कोर्ट में बाबरी मस्जिद को गिराने को लेकर जिस तरह कोई जुर्म साबित नहीं हो पाया उसे लोगों ने न्याय की भ्रूणहत्या कहा है। अदालत वहीं से अपना काम शुरू कर सकती है जहां पर पुलिस या दूसरी जांच एजेंसी ने मामले को लाकर खड़ा किया है। अब जिस देश में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कराने गई लडक़ी के साथ थाना ही बलात्कार करने में जुट जाता है जहां पुलिस खुद ही मुठभेड़-हत्याओं की मुजरिम रहती है वहां पर अदालत में भला कौन जुर्म साबित करने वाले रहते हैं? ऐसे में बेकसूरों पर जुर्म साबित न हो जाए, लाश को ही कातिल करार देकर फांसी पर न टांग दिया जाए वही काफी माना जाना चाहिए।
देश की निचली अदालतों में भयानक भ्रष्टाचार सुनाई पड़ता है। देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट के जजों में से बहुतों को भ्रष्ट कहते-कहते प्रशांत भूषण जैसे दिग्गज वकील की जिंदगी ही निकली जा रही है। और अब तो हाल के बरसों में जिस तरह रिटायर होने के बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज सत्ता की मेहरबानी से पुनर्वास पा रहे हैं, उसके बाद लोगों का भरोसा अदालतों पर और घटा है। आज इस बारे में लिखने की जरूरत इसलिए है कि अर्नब गोस्वामी के केस में यह तो अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें याद दिलाया कि उन्हें आम लोगों की तरह पहले हाईकोर्ट जाना चाहिए। अगर आज अदालत ऐसा नहीं करती, और अर्नब गोस्वामी के कुछ महीने पहले के केस की तरह उन्हें सीधे राहत देती, तो लोगों के बीच अदालत पर भरोसा और टूटता। आज देश की इस सबसे बड़ी अदालत को यह देखना चाहिए कि व्यापक जनहित के मामले प्राथमिकता के आधार पर कैसे लिए जाएं, और निजी हित या कारोबारी हित के मामलों को न्याय की प्रक्रिया का नक्शा दिया जाए कि उन्हें किस रास्ते से चलकर जरूरत और नौबत आने पर सुप्रीम कोर्ट तक आना चाहिए। आज देश में कमजोर और ताकतवर के बीच इंसाफ पाने के हक में एक साफ फर्क दिखाई पड़ता है। यह फर्क लोकतंत्र के खात्मे का संकेत है, और सुबूत भी है। देश की न्याय व्यवस्था के काम और उसके तौर-तरीकों पर खुली बहस होनी चाहिए। जिस तरह हाल के महीनों में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आपको छुईमुई के पौधे की तरह अवमानना का हकदार माना है, और उस पर अदालत का खासा समय खर्च किया है, उतने समय में तो यह अदालत कश्मीर के लोगों के बुनियादी हक भी सुन सकती थी, और मजदूर-कानूनों की बांह मरोडऩे के खिलाफ तर्क भी सुन सकती थी। लोकतंत्र में व्यापक जनहित प्राथमिकता होना चाहिए, और यह बात हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत के जजों को ध्यान से समझनी चाहिए।
महाराष्ट्र-राज्यपाल ने याद दिलाया कि देश में राजभवन जरूरी नहीं..
महाराष्ट्र में शराब खुली है और मंदिर बंद। इस बात को लेकर वहां के राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को एक चिट्ठी लिखी, और उसने बाकी बातों के अलावा यह ताना भी दिया कि क्या उद्धव ठाकरे अब ‘सेक्युलर’ (धर्मनिरपेक्ष) हो गए हैं? इसके लिखित जवाब में उद्धव ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को याद दिलाया है कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद की जो शपथ ली थी उसमें धर्मनिरपेक्षता की शपथ शामिल थी। राज्यपाल की चिट्ठी को लेकर महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ गठबंधन के सबसे वरिष्ठ नेता शरद पवार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक विरोध-पत्र लिखकर भेजा है जिसमें उन्होंने राज्यपाल की भाषा पर कड़ी आपत्ति की है।
राज्यपाल का लिखा हुआ हक्का-बक्का कर देता है कि क्या इस देश में अब किसी की धर्मनिरपेक्षता उसे ताने कसने का सामान बना दी जा रही है! और यह बात महाराष्ट्र के सबसे आलीशान बंगले में समंदर किनारे रहने वाला वह राज्यपाल कर रहा है जो कि प्रदेश का संविधान प्रमुख भी है। अगर संविधान से इतना ही परहेज है, तो राज्यपाल को यह महल छोडक़र चले जाना चाहिए और खुलकर संविधान का विरोध करना चाहिए, धर्मनिरपेक्षता का विरोध करना चाहिए।
मंदिर न खोलने को लेकर राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी थी कि क्या आपने हिन्दुत्व छोड़ दिया है, और धर्मनिरपेक्ष हो गए हैं? एक राज्यपाल की तरफ से एक मुख्यमंत्री को लिखी हुई हमारी ताजा याद में यह सबसे ही घटिया और असंवैधानिक बात है। लेकिन राज्यपालों द्वारा घटिया बात अब अधिक आम होती चल रही हैं। उत्तर-पूर्व में तैनात एक राज्यपाल तथागत राय ने ट्विटर पर लगातार ओछी राजनीति की बात करने के लिए एकदम कुख्यात ही हो गए थे। आज भी एक भूतपूर्व राज्यपाल की हैसियत से उनका ट्विटर अकाऊंट उन्हें कट्टर दक्षिणपंथी हिन्दू बताता है जो कि उनका खुद का लिखा हुआ बखान है।
महाराष्ट्र राज्यपाल की चिट्ठी पर उद्धव ठाकरे ने बढिय़ा जवाब लिखकर भेजा है कि उनके हिन्दुत्व को राज्यपाल के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। यह बात कोई दबी-छुपी नहीं है कि महाराष्ट्र के राज्यपाल के जिस विचारधारा से आए हैं और जिस विचारधारा की वजह से आए हैं, उस विचारधारा में सेक्युलर शब्द को एक गंदा शब्द माना जाता है। लेकिन भारत के संविधान की जो रीढ़ की हड्डी है, वह इसी शब्द से बनी हुई है, और इस शब्द से जिन्हें नफरत हो उन्हें खुलकर संविधान को खारिज करना चाहिए, सेक्युलर शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करने से काम नहीं चलेगा।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में राज्यपाल की जुबान की शिकायत की है, और कहा है कि उस तरह की भाषा को देखकर वे हैरान हैं। यह पत्र किसी राजनीतिक पार्टी के नेता का पत्र लग रहा है, न कि किसी राज्यपाल का।
शिवसेना ने राज्यपाल के चिट्ठी के जवाब में एक जुबानी बयान में उन्हें यह ठीक याद दिलाया है कि मंदिरों की कोई तुलना शराबखानों के साथ नहीं की जा सकती। महाराष्ट्र में कोरोना का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। शिवसेना के इस जवाब से परे भी हकीकत यही है कि शराबखानों में तो शराबियों को काबू करने के लिए बाहुबली कर्मचारी रखे जाते हैं, लेकिन धर्मस्थलों पर आमतौर पर बेकाबू और अराजक रहने वाले भक्तों को कौन काबू करेंगे? हिन्दुस्तान का इतिहास उठाकर देखें तो धर्म, धार्मिक स्थल, और धर्मालु लोग किसी भीड़ की शक्ल में आते ही अराजक हो जाते हैं, वे हथियार निकाल लेते हैं, वे हिंसा पर उतारू रहते हैं, और वे अपने धर्म को संविधान से ऊपर करार देते हैं। अभी-अभी बाबरी मस्जिद गिराने पर जो फैसला आया है, उसने बड़ी मासूमियत से तमाम लोगों को बरी तो कर दिया, लेकिन 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद गिराने का लाईव टेलीकास्ट जिन लोगों ने देखा था, उन्होंने तो यह देखा ही है कि नेताओं के उकसावे पर, कई दिनों से उनके बयानों पर यह भीड़ 6 दिसंबर को किस तरह अराजक और हिंसक थी, और उसने मस्जिद गिराकर ही दम लिया था। धर्म का मिजाज ही लोकतंत्र के खिलाफ होता है, संविधान के खिलाफ होता है, और हिंसक होता है। महाराष्ट्र में धर्मस्थलों को एक बार खोलकर क्या कोई उन पर नियम लागू कर सकेंगे? वहां लगने वाली भीड़ पर काबू किया जा सकेगा?
और घोर हिन्दुत्व का झंडा लेकर राजभवन में बैठे इस राज्यपाल को कम से कम यह तो समझना चाहिए कि मंदिरों को न खोलकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे या उनकी सरकार एक किस्म से हिन्दुओं पर ही एक अहसान कर रहे हैं क्योंकि मंदिर खुलने से कोरोनाग्रस्त होने का सबसे बड़ा खतरा अकेले हिन्दू समाज पर ही रहता। इस खतरे को अनदेखा करके मंदिरों को खोलने के लिए राजभवन से इस किस्म की फिकरेबाजी करना पूरी तरह शर्मनाक बात है। यह सरकार के काम में एक ओछी दखल भी है, और ऐसी हरकत लंबे समय से चली आ रही एक सोच को फिर जिंदा करती है कि क्या हिन्दुस्तानी संघीय व्यवस्था में राजभवन की सचमुच कोई जरूरत रह गई है? एक वक्त तो अंग्रेज सरकार के एजेंट की तरह राज्यों पर काबू रखने के लिए लोग तैनात किए जाते थे, लेकिन आज महज शपथ दिलाने, और निर्वाचित सरकार को परेशान करने के लिए यह वृद्धावस्था पुनर्वास खत्म करना चाहिए। हम इस घटना की वजह से नहीं, बल्कि लंबे अरसे से यह बात लिखते चले आ रहे हैं कि राजभवनों का कोई संवैधानिक औचित्य नहीं रह गया है, और राज्यपाल केन्द्र सरकार के इशारे पर निर्वाचित सरकार को इसी तरह परेशान करने वाले एजेंट बनकर रह गए हैं। ऐसी गुजर चुकी संघीय जरूरत को अब विसर्जित कर देना चाहिए। राज्यपाल एक अवांछित बोझ बनकर राज्य पर रहते हैं, और निर्वाचित सरकार की फजीहत करने के लिए केन्द्र से इशारे का इंतजार करते हैं। हिन्दुस्तान के ताजा इतिहास में राजभवन उतनी ही भ्रष्ट जगह बन गई है जितनी भ्रष्ट कोई भी दूसरी सरकारी संस्था रहती है। बहुत से राजभवन दलालों और सप्लायरों का अड्डा बन जाते हैं, और राज्यपालों के परिवार दलाली का धंधा करते हैं। मध्यप्रदेश में अभी कुछ समय पहले तक राज्यपाल रहे रामनरेश यादव व्यापम घोटाले में फंसे हुए थे, और गुजर जाने की वजह से कटघरे से बच गए। बिहार में कांग्रेस के बूटा सिंह ऐसे राज्यपाल रहे कि जिनके बेटे वहां से दलाली का धंधा चलाते थे।
अलग-अलग कई किस्म की वजहें हैं जिनकी वजह से राजभवन संस्था को खत्म कर देना चाहिए। इसकी कोई उपयोगिता नहीं रह गई है, इसकी कोई संवैधानिक जरूरत नहीं रह गई है। जहां तक सरकार को शपथ दिलाने की बात है तो खुद राज्यपाल को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शपथ दिलाते हैं, और ऐसी कोई वजह नहीं है कि वे मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल को शपथ न दिला सकें।
महीने भर की बच्ची लिए हुए सरकारी काम काबिले तारीफ?
कल से समाचार-मीडिया और सोशल मीडिया दोनों ही यूपी की एक नौजवान आईएएस अफसर सौम्या पांडेय की खबरों से भरे हुए हैं जिनमें वे अपनी एक महीने की बेटी को गोद में लिए हुए एसडीएम का काम कर रही हैं। वे दिल्ली के करीब गाजियाबाद में एसडीएम है, और बच्ची के जन्म के पहले तक वे लगातार काम करती रहीं, और अब प्रसूति के 22 दिन बाद ही काम पर लौट गई।
सोशल मीडिया पर खासे सोचने-समझने वाले लोग भी इस अधिकारी की तारीफ करते थक नहीं रहे हैं। लोगों को याद होगा कि पश्चिम के कुछ देशों में संसद में वहां की महिला सदस्य अपने दूध पीते बच्चों को साथ लेकर आती रहीं, और सदन की कार्रवाई के बीच उन्होंने बच्चों के दूध पीने के हक को जाहिर भी किया। एक महिला सांसद तो संसद में अपना बयान देते जब खड़ी थी, तब भी वह बच्चे को दूध पिला रही थी। वह बात अपने बच्चे को साथ रखने की भी थी, और सार्वजनिक जगह पर उसे दूध पिलाकर उसके हक को स्थापित करने की भी थी क्योंकि बहुत सी जगहों पर ऐसा दकियानूसी रिवाज बना दिया गया है कि महिलाएं सार्वजनिक जगहों पर अपने बच्चों को दूध न पिलाएं।
ये दोनों दो बिल्कुल अलग-अलग किस्म के मामले हैं, और भारत की जिस समर्पित महिला अफसर को अभी तारीफ मिल रही है, उस बारे में हम लिखना चाहते हैं, और सवाल उठाना चाहते हैं कि क्या एक महीने की बच्ची का सुरक्षित सेहत का हक सरकारी काम के प्रति समर्पण के मुकाबले कम मायने रखता है? आज जब हिन्दुस्तान में सरकारों में बैठे हुए लोग हरामखोरी के लिए जाने जाते हैं, तब कुछ गिने-चुने अफसर अगर ऐसे समर्पण से काम कर रहे हैं, तो इस एक पहलू से वे बहुत मायने रखते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब एक छोटी सी जिंदगी इससे जुड़ी हुई है, तो फिर उसे साथ रखकर इस तरह से सरकारी फाइलों को निपटाना क्या उस बच्ची के बुनियादी हकों पर ज्यादती नहीं है? और क्या मां-बाप को भी ऐसा हक दिया जा सकता है कि वे अपने बच्चों को ऐसे खतरे में डालें? यह बात कोरोना जैसी महामारी आने के पहले की होती, तो भी बात समझ आती। लेकिन अभी तो कल ही बीबीसी की एक रिपोर्ट आई है कि किस तरह मोबाइल फोन पर और नोटों पर कोरोना वायरस 28 दिनों तक जिंदा रह सकते हैं। अब जब वे नोटों पर जिंदा रह सकते हैं, तो सरकारी कामकाज की फाइलों पर भी जिंदा रह सकते हैं, उतना अधिक न सही कुछ कम जिंदा रह सकते हैं। ऐसे में महीने भर की बच्ची को खतरे में डालकर काम करने वाली, काम के प्रति समर्पित मां की वाहवाही करते हुए इस खतरे को अनदेखा नहीं करना चाहिए।
हिन्दुस्तान से न्यूजीलैंड जाकर वहां बसे हुए और काम करने वाले कुछ मां-बाप इसलिए वापिस हिन्दुस्तान भेज दिए गए थे कि उन्होंने पैदा होने वाले बच्चे के बाद अगले कई महीनों तक मां-बाप के काम करने के सीमित घंटों के कानून को तोड़ा था, और अधिक काम किया था। लोगों को याद होगा कि अभी जब सुषमा स्वराज विदेश मंत्री थीं, तब योरप के किसी एक देश में सरकार ही लापरवाह मां-बाप से उनके बच्चे को लेकर चली गई थी, और अपनी हिफाजत में रखा था। सभ्य लोकतंत्रों की खूबी यही है कि वहां उनके अधिकारों की सबसे अधिक हिफाजत होती है जो अपने हक के लिए खुद नहीं लड़ सकते। चाहे वे बच्चे हों, कुदरत हो, पशु-पक्षी हों, या बेघर इंसान हों।
हिन्दुस्तान के कानून में अभी हाल ही के बरसों में फेरबदल करके महिला को मिलने वाले प्रसूति-अवकाश को बढ़ाया गया है, और छह महीने का किया गया है। तीन महीने का तो शायद पहले से चले आ रहा था, उसे और बढ़ाया गया। इसके पीछे वैज्ञानिक और मानवीय दोनों किस्म की जरूरतें हैं, जिनका ख्याल रखते हुए यह अवकाश लंबा किया गया है। अभी जिस महिला अधिकारी की तारीफ छप रही है, उस पर भी ऐसी जरूरत लागू होती है, और उससे अधिक उसकी महीने भर की बच्ची पर। हमारा ख्याल है कि अतिउत्साही मां-बाप को ऐसा करने से रोकने के लिए भी सरकार को एक कानून बनाना चाहिए कि महिला के लिए कम से कम तीन महीने छुट्टी पर रहकर अपने नवजात शिशु की देखभाल की बंदिश रहेगी। कई देशों में ऐसा है, और शायद ही कोई सभ्य और विकसित देश ऐसा होगा जो कि महीने भर के भीतर बच्ची को ली हुई महिला को ऐसी महामारी के बीच फाइलों का सरकारी काम करने की छूट देता हो।
कामकाजी महिलाओं पर पुरूषों के मुकाबले बेहतर काम करने का एक मानसिक दबाव हमेशा बने रहता है। पुरूषवादी और पुरूष प्रधान समाज अक्सर यह मानकर चलता है कि अरे ये तो महिला है, ये कहां से इतना काम करेगी। और ऐसे में महिलाओं के सामने यह चुनौती रहती है कि वे पुरूषों से कम साबित न हों। ऐसी भी बहुत सी स्थितियां देखने में आती हैं जब महिला अधिकारी जरूरत से अधिक कड़ाई बरतती हैं, जरूरत से अधिक मेहनत करती हैं, और पुरूषवादी कसौटी पर अपने को अधिक खरा साबित करने में जुटी रहती हैं। इनमें से किसी बात से हमें कोई आपत्ति नहीं है, आज का यह लिखना सिर्फ इसलिए है कि इस कहानी में एक छोटी सी बच्ची की जिंदगी भी जुड़ी हुई है जो अपनी बेहतरी की बात खुद नहीं कर सकती।





