यह कैसा देश है जहां सबसे रईस राष्ट्रपति सांसद नहीं खरीद...

 अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के खिलाफ संसद पर हमले के लिए लोगों को भडक़ाने और उकसाने के आरोप के साथ निचले सदन में महाभियोग प्रस्ताव खासे बहुमत से पास हो गया है। दस रिपब्लिकन सांसदों ने भी अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग के पक्ष में वोट दिया। अब संसद के उच्च सदन में अगर ट्रंप की पार्टी के 17 लोग साथ देते हैं, तो वहां से भी महाभियोग चलाने का प्रस्ताव पास हो जाएगा। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि यह कई वजहों से मुश्किल रहेगा क्योंकि वहां रिपब्लिकन पार्टी का खासा बहुमत है, और महाभियोग के लिए वहां दो तिहाई वोट लगेंगे। फिर भी ट्रंप के आलोचक उम्मीद कर रहे हैं कि 17 रिपब्लिकन आत्मा की आवाज पर वोट देंगे, और अपने कार्यकाल के आखिरी दो-चार दिनों में ट्रंप को महाभियोग का सामना करना पड़ेगा।

दरअसल अमरीकी राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग को लेकर यहां लिखने का कोई इरादा नहीं था, लेकिन वहां की इस संसदीय प्रक्रिया के एक हिस्से पर लिखना जरूरी है। ट्रंप की पार्टी के 10 सांसदों ने निचले सदन (भारत की संसद की लोकसभा की तरह) में अपनी पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ वोट दिया, और उच्च सदन (भारत की संसद की राज्यसभा की तरह) में भी कुछ रिपब्लिकन सांसदों से ऐसी उम्मीद की जा रही है, लेकिन इस पूरे सिलसिले में कहीं भी पार्टी व्हिप जैसे किसी शब्द की कोई चर्चा नहीं है। भारतीय संसद में बात-बात पर पार्टियां अपने सांसदों को व्हिप जारी करती हैं जिसके मुताबिक उन्हें न केवल सदन में मौजूद रहना होता है, बल्कि अपनी पार्टी के कहे मुताबिक वोट भी देना होता है। ऐसा न करने पर उनकी सदस्यता खत्म हो सकती है। लेकिन भारतीय संसदीय व्यवस्था के तीन गुना से अधिक पुरानी अमरीकी व्यवस्था में अब तक हिन्दुस्तानी-बंदिशों की तरह सांसदों को गुलाम नहीं बनाया गया है। अपनी पार्टी के गुलाम, पार्टी की विचारधारा ही नहीं, पार्टी के मनमाने फैसलों को समर्थन करने पर मजबूर गुलाम। इससे यह तो होता है कि सांसदों की खरीदी-बिक्री का खतरा शायद कुछ घट सकता है, लेकिन बिना ऐसे किसी कानून के अमरीकी संसद में किसी सांसद की खरीद-बिक्री की कोई चर्चा कभी सुनाई नहीं पड़ती।

संसदीय लोकतंत्र में अलग-अलग देशों के नियम-कायदों में फर्क हो सकता है, रहता ही है, लेकिन हिन्दुस्तान में दलबदल विरोधी कानून के तहत जिस तरह पार्टी व्हिप के खिलाफ जाने पर भारत में संसद और विधानसभाओं में सदस्यता जा सकती है, उससे संसद विचारों के आजाद  मंच की जगह गिरोहबंदी पर काम करने वाली एक जगह बन चुकी है। यह सिलसिला सदन में सदस्य के अपने विचारों को रखने की संभावनाओं को खत्म कर देता है, और सदस्यों के लिए महज अपनी पार्टी की सोच और फैसले से बंधे रहना एक मजबूरी हो जाती है। ऐसे में सदन को सदस्यों के निजी विचारों का जो फायदा मिलना चाहिए, वह संभावना पूरी तरह खत्म हो जाती है, और अलग-अलग सदस्यों वाला यह सदन खेमों में बंटकर ही काम करता है। एक पार्टी के लोग एक आवाज बोलते हैं, एक ही सोच और फैसला सामने रखते हैं, और इस तरह सदन निर्वाचित व्यक्तियों की पंचायत होने के बजाय उनकी पार्टियों के बीच बहस की सीमित संभावनाओं वाली जगह बनकर रह जाती है।

भारत की ऐसी तंग सीमाओं को देखते हुए अमरीका की आज की व्यवस्था पहली नजर में एक संसदीय आजादी की व्यवस्था लगती है, लेकिन भारत के संदर्भ में ऐसा सोचते ही तुरंत यह लगता है कि इस किस्म का समर्थन या विरोध खरीदना हिन्दुस्तान में कितना आसान हो जाएगा? यहां तो सांसद और विधायक, सरकार के मंत्री, चुनाव में खड़े होने जा रहे उम्मीदवार, किसी को भी खरीदा जा सकता है, कोई भी अपने आपको बेचने के लिए संसदीय-मंडी में खड़े हो सकते हैं। मजे की बात यह है कि चिल्हर दलबदल पर तो रोक लग गई है, लेकिन थोक में दलबदल एक बहुत आसान काम हो गया है। एक-तिहाई सांसद-विधायक अगर दलबदल को न जुट पाएं, तो कुछ विधायक-सांसद इस्तीफे देकर भी बाकी लोगों में से एक-तिहाई के दलबदल की संभावना पैदा करते हैं, या अपनी सरकार गिरा देते हैं। और यह देश दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के घमंड में डूबा ही रहता है।

अमरीका की लोकतांत्रिक सोच में, वहां की संसदीय व्यवस्था में दूसरी कई खामियां हो सकती हैं, होंगी, लेकिन पार्टी की नकेल से सांसदों और विधायकों को बांधकर रखने की व्यवस्था नहीं है, और उसके बाद भी सांसद-विधायक बिक नहीं रहे हैं, यह कुछ अटपटी बात जरूर है। पिछले कई दिनों से जब से अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को बहुमत नहीं मिला, और वे हारते चले गए, तो हिन्दुस्तान में तो ऐसे लतीफे खूब चले कि ट्रंप को अपने हिन्दुस्तानी दोस्तों से सांसद खरीदने की तरकीबें पूछ लेना चाहिए, लेकिन अमरीका के भीतर ऐसे लतीफे का मतलब भी शायद कोई समझ नहीं पाए होंगे।

हर लोकतंत्र में दूसरे देश के लोकतंत्र से कुछ, या कई बातें सीखने की संभावना हमेशा रहती है। अमरीकी सांसद बिना बिके हुए अपनी अंतरात्मा की आवाज पर आज वोट किस तरह दे रहे हैं, और उनकी पार्टी उन्हें कोई चेतावनी भी जारी नहीं कर रही है, और उनके बारे में ऐसी कोई अफवाह भी नहीं है कि उन्होंने अपनी आत्मा बेच दी है, इस नजारे को देखकर हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को कुछ सीखने की जरूरत है जो कि हाल के बरसों में लगातार बिकने वाले लोगों की खबरों से पटा हुआ है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 जनवरी 2021


 

क्या इंसाफ के लिए कोर्ट ऐसी कमेटी बनाता है?

किसान आंदोलन को लेकर दो दिन पहले बड़ी हमदर्दी दिखाने वाला सुप्रीम कोर्ट उस शाम से ही शक के घेरे में था, कल आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश उस शक को गहरा कर गया, और शाम होते-होते यह साफ हो गया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर एक बड़ा ही विवादास्पद आदेश दिया है। कल अदालत ने आंदोलनकारी किसानों से बात करने के लिए चार लोगों की एक कमेटी बनाई, और शाम होते-होते लोगों ने तुरंत ही इन चारों के कई बयान ढूंढकर सामने रख दिए कि किस तरह ये चारों ही सरकार समर्थक लोग हैं, उन तीनों कृषि-कानूनों का खुलकर समर्थन कर चुके लोग हैं जिन कानूनों को खारिज करने के लिए किसानों का आंदोलन चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यह खुलासा भी नहीं है कि आंदोलनकारी किसानों से बात करने के लिए बनाई गई कमेटी का नाम किसके सुझाए हुए हैं, या किस आधार पर ये नाम छांटे गए हैं। फिलहाल पहली नजर में ये नाम ऐसे लगते हैं कि आठ लोगों की कमेटी में चार नाम सरकार ने दिए हैं, और चार नाम आंदोलनकारियों की तरफ से आएंगे। दिक्कत बस छोटी सी है कि कमेटी में चार ‘सरकारी’ नामों से परे और कोई नाम नहीं आने वाले हैं। ये तीनों कृषक-कानून पिछले कुछ महीनों के ही हैं, इसलिए उन पर इस कमेटी के मेम्बरान की कही बातें पल भर में सामने आ रही हैं। इन सबने खुलकर इन कानूनों का साथ दिया हुआ है, और उनकी अपनी सोच ही उन्हें ऐसी किसी मध्यस्थ कमेटी में रहने का अपात्र साबित करती है। ऐसे नामों की कमेटी बनाकर सुप्रीम कोर्ट जजों ने अपने आपको एक अवांछित विवाद के कटघरे में खड़ा कर दिया है। ऐसी कमेटी न तो सरकारी ने मांगी थी जो कि किसानों के साथ बातचीत में लगी हुई है, न ही किसानों ने ऐसी कमेटी मांगी थी, बल्कि किसान तो ऐसी कमेटी के खिलाफ थे और उनके वकील ने साफ-साफ कहा है कि किसान इनसे बात नहीं करेंगे। 

कमेटी के एक सदस्य कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी को मोदी सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था, वे सरकार की कमेटियों में अध्यक्ष रह चुके हैं, हाल ही में उन्होंने एक लेख लिखकर विवादास्पद कृषि कानूनों का समर्थन का समर्थन किया था, और उनकी वकालत की थी। कमेटी के एक दूसरे सदस्य अनिल घनवत का एक इंटरव्यू आज ही सुबह सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने जब उन्हें कमेटी में रख ही दिया है, तो उसके बाद तो कम से कम उन्हें अपनी निजी सोच अलग रख देनी थी, लेकिन उन्होंने एक समाचार एजेंसी से कहा किसानों को ये भरोसा दिलाया जाना जरूरी है कि जो भी हो रहा है, वो उनके हित में ही हो रहा है। उन्होंने कहा कि ये आंदोलन कहीं जाकर रूकना चाहिए। इसके पहले वे कह चुके हैं कि इन कानूनों को वापिस लेने की कोई जरूरत नहीं है जिन्होंने किसानों के लिए अवसरों के द्वार खोले हैं। कमेटी के एक और सदस्य डॉ. पी.के. जोशी कह चुके हैं कि कृषि-कानूनों में कोई भी नर्मी बरतना भारतीय कृषि को वैश्विक संभावनाओं से दूर करने का काम होगा। अशोक गुलाटी बहुत लंबी-लंबी बातों में इन कानूनों की जरूरत बता चुके हैं। कमेटी के चौथे सदस्य भूपिन्दर सिंह मान ने केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर से मुलाकात करके कृषि-कानूनों का समर्थन किया था। उन्होंने द हिन्दू अखबार से बात करते हुए कहा था कृषि क्षेत्र में प्रतियोगिता के लिए सुधार जरूरी हैं लेकिन किसानों की सुरक्षा के उपाय किए जाने चाहिए, और खामियों को दुरूस्त किया जाना चाहिए। 

कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट ने उसके सामने पेश मुद्दों से परे जाकर एक ऐसे अप्रिय काम में अपने आपको उलझा लिया है कि उससे उसकी ऐसी पहल की जरूरत पर सवाल उठ रहे हैं। कृषक-कानूनों के मुद्दे पर किसानों ने सरकार के साथ बैठक के हर न्यौते पर अपने टिफिन सहित जाकर हाजिरी दी थी। सरकार के साथ बैठकों का सिलसिला खत्म नहीं हुआ था। ऐसे में उन्हीं मुद्दों पर किसानों से बात करने के लिए एक ऐसी कमेटी बनाई गई जिसके गठन के भी किसान खिलाफ थे। और फिर उसमें ऐसे नाम रख दिए गए जो कि किसानों के खिलाफ हैं। हाल के बरसों में सुप्रीम कोर्ट ने एक के बाद एक बहुत से ऐसे फैसले दिए हैं जो कि सरकार को तो जाहिर तौर पर सुहा रहे हैं, लेकिन इंसाफ की समझ रखने वाले बहुत से रिटायर्ड जज और संविधान विशेषज्ञ ऐसे फैसलों पर हक्का-बक्का हैं। जैसा कि सोशल मीडिया पर कल से बहुत से लोग लिख रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट के कल के अंतरिम आदेश से किसान आंदोलन को खत्म करने का काम होते दिख रहा है, और इससे भारत में न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर आंच आई है। कल से लेकर आज तक चारों कमेटी मेंबरों के जो बयान सामने आए हैं, वे हैरान करते हैं कि क्या मध्यस्थ ऐसे छांटे जाते हैं? 

और इस मुद्दे पर एक आखिरी बात और। अदालत ने यह भी कहा है कि इस आंदोलन में बच्चे, बुजुर्ग, और महिलाएं शामिल न हों। क्या हिन्दुस्तान की खेती में महिलाएं शामिल नहीं हैं? सुप्रीम कोर्ट की यह सोच भारी बेइंसाफी की है, और महिला विरोधी है क्योंकि यह ऐसा जाहिर करती है कि भारत में किसानी एक गैरमहिला काम है। सुप्रीम कोर्ट की दिग्गज महिला वकीलों से लेकर देश की प्रमुख महिला आंदोलनकारियों ने भी अदालत की इस बात की जमकर आलोचना और निंदा की है। कल हमने भी इस अखबार में अदालत के इस रूख पर लिखा था। लेकिन क्या आज हिन्दुस्तान की अदालतें दीवारों पर लिक्खे हुए को भी पढ़ पा रही हैं? 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 12 जनवरी 2021


 

सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या सचमुच किसानों की जीत?

 सुप्रीम कोर्ट ने अपने कल के रूख के मुताबिक आज केन्द्र सरकार के तीनों कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगा दी है। इसके अलावा अदालत ने किसानों से बात करने के लिए एक कमेटी बनाई है जो उनकी मांगों पर चर्चा करेगी। कल ही इस मुद्दे पर हमने इसी जगह काफी खुलासे से लिखा था कि जजों का जुबानी रूख किसानों के लिए हमदर्दी का था। लेकिन आज का यह अंतरिम आदेश पहली नजर में केन्द्र सरकार के लाए हुए एकतरफा कानूनों पर अमल तो रोक रहा है, किसानों से बात करने की जरूरत भी बता रहा है, लेकिन देश के लोगों के मन में शक की कमी नहीं है। बहुत से लोग यह मान रहे हैं कि इस आदेश के बाद एक किस्म से किसान आंदोलन बेमतलब का दिखने लगेगा, और इससे कुल मिलाकर सरकार की नीयत और हसरत ही पूरी होते दिख रही है।

अभी तक सुप्रीम कोर्ट के आदेश, और आदेश के पहले की जुबानी चर्चा की जो जानकारी खबरों में आई है, उनके मुताबिक आंदोलन कर रहे किसान तो ऐसी कोई कमेटी बनाने के ही खिलाफ हैं, उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट जजों से कहा कि किसान तो ऐसी किसी कमेटी में पेश भी नहीं होंगे। इस पर अदालत का यह रूख आया है कि अगर किसान समस्या का समाधान चाहते हैं, तो हम ये नहीं सुनना चाहते कि किसान कमेटी के सामने पेश नहीं होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कृषि अर्थशास्त्र और कृषि से जुड़े हुए चार लोगों की एक कमेटी बनाई है, और यह भी साफ किया है कि अदालत इस कमेटी का काम चाहती है। अदालत ने यह भी कहा है कि कृषि कानूनों पर अमल पर रोक अंतहीन नहीं रहेगी।

कल सुप्रीम कोर्ट के जजों ने जिस अँदाज में केन्द्र सरकार के वकील की जुबानी खिंचाई सरीखी की थी, अदालत का वही अंदाज नए संसद भवन सहित 20 हजार करोड़ के सेंटर विस्ता निर्माण के खिलाफ बहस के दौरान भी था। लेकिन जब फैसला आया तो केन्द्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ तमाम आपत्तियां खारिज कर दी गईं, और सरकार को निर्माण की इजाजत दे दी गई थी। अभी पिछले पखवाड़े का ही यह फैसला लोगों को भूला नहीं है, और सोशल मीडिया पर कल का अदालती रूख भारी संदेह के साथ देखा जा रहा था, और उसे सरकार की मर्जी का एक जाल माना जा रहा था। आज भी सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश लोगों के मन से शक खत्म नहीं कर पा रहा है, और कई लोगों का यह मानना है कि यह सरकार के पक्ष को मजबूत करने वाला, और किसान आंदोलन को बीच में ही बेअसर कर देने वाला आदेश है।

हम सुप्रीम कोर्ट की नीयत पर कोई शक नहीं कर रहे, और पहली नजर में उसके शब्दों को ही उसकी भावना भी मानकर चल रहे हैं। लेकिन हाल के महीनों में, बीते एक-दो बरसों में सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे फैसले ऐसे आए जो कि सरकार के रूख से सहमति रखने वाले थे, और खुद न्यायपालिका के मौजूदा और भूतपूर्व कई लोगों ने इन फैसलों को बड़ा कमजोर इंसाफ माना था। अभी भी सेंट्रल विस्ता पर सुप्रीम कोर्ट की इजाजत तीन में से एक जज की असहमति वाली है, और इस फैसले में शहरी विकास के बहुत से विशेषज्ञों को निराश भी किया है।

कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट के आज के आदेश को किसानों की जीत बता रहे हैं। दूसरी तरफ किसानों के वकील ऐसी किसी कमेटी के खिलाफ थे, और अब अदालत के कहे मुताबिक किसानों को कमेटी के सामने ही अपनी बात रखनी होगी। कुल मिलाकर जो किसान सरकार के साथ अपनी बातचीत से निराश और असंतुष्ट थे, आंदोलन जारी रखने की जिद पर अड़े हुए थे, आज उन्हें सरकार के सामने से हटाकर एक कमेटी के हवाले कर दिया गया है, और यह किसानों की अदालती हार ही हुई है। यह हाल के बरसों का सबसे मजबूत किसान आंदोलन हो गया था, और यह किसान आंदोलन होने के साथ-साथ सिक्खों के मान-सम्मान से भी जुड़ गया था। यह पूरी नौबत अदालत के आज के अंतरिम आदेश से एकदम फीकी पड़ गई है, और इसे किसी भी शक्ल में किसानों की जीत मानना कुछ मुश्किल है। लेकिन यह आदेश केन्द्र सरकार के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जिसे अब किसानों सेकिसी तरह की बात करने की जरूरत नहीं रह गई है। इसे कमेटी की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश होने, और सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक राह देखनी है क्योंकि उसके बनाए हुए कानून खारिज तो हुए नहीं है, फैसले तक महज उनके अमल पर रोक लगी है जो कि बहुत बड़ी बात नहीं है।

कल सुप्रीम कोर्ट जजों ने जुबानी बातचीत में केन्द्र सरकार के वकील के मार्फत केन्द्र सरकार की काफी खिंचाई की थी, लेकिन आज यह अंतरिम आदेश आने पर यह साफ हो रहा है कि अदालत की नीयत चाहे जो हो, किसान आंदोलन की नियति अब कमजोर हो गई है। आगे देखें क्या होता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है,11 जनवरी 2021


 

किसानों की शहादत से हिली हुई दिखी अदालत

 देश के सुप्रीम कोर्ट में जब कुछ बुनियादी बातों पर बहस चलती है, तो फिर वह सिर्फ वकीलों के बीच नहीं चलती जज भी उसमें हिस्सेदार रहते हैं। वैसे तो अदालती कार्रवाई में वकीलों का दर्जा जजों से अलग रहता है, लेकिन जज कई बार अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए वकीलों से जिरह करते हैं, और उनका नजरिया, उनका तर्क निकलवाने की कोशिश करते हैं। कई बार वे अदालती कार्रवाई के दौरान किसी औपचारिक फैसले, या आदेश के पहले भी जुबानी अपना रूख साफ करते हैं, और उनकी बातों को सुनकर दोनों पक्षों के वकील अपनी रणनीति में फेरबदल भी करते हैं। कानून की साधारण समझ रखने वाले लोगों को भी किसी अच्छे रिपोर्टर की लिखी गई अदालती कार्रवाई को पढक़र देश के संविधान, लोगों के बुनियादी हक और जिम्मेदारी, के बारे में बहुत कुछ समझने मिलता है।

आज जब सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन को लेकर दायर की गईं कई याचिकाओं को एक साथ जोडक़र सुनवाई की जा रही थी, तो अभी-अभी केन्द्र सरकार द्वारा बनाए गए किसान कानूनों को लेकर अदालत ने अपने तेवर दिखाए, और किसान आंदोलन को लेकर केन्द्र सरकार का जो रूख है उस पर तो खासी नाराजगी जाहिर की। सुप्रीम कोर्ट बेंच ने यह साफ कर दिया कि अगर सरकार खुद होकर इन कृषि-कानूनों पर रोक नहीं लगाती है, तो अदालत रोक लगा देगी। इस पर हक्का-बक्का केन्द्र सरकार के वकील ने कहा कि भारत का अदालती इतिहास रहा है कि वह कानून पर रोक नहीं लगा सकती। उन्होंने कहा कि जब तक कोई कानून विधायी क्षमता के बिना पारित न हुआ हो, या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करता हो, तब तक अदालत संसद के कानून पर रोक नहीं लगा सकती। इस पर अदालत ने साफ किया कि वह कानून पर रोक नहीं लगा रही है, लेकिन उसके अमल पर रोक लगा रही है। अब इस बारीक फर्क को लेकर देश के सबसे बड़े सरकारी वकील और जजों के बीच भी खुली बातचीत से यह खुलासा होता है कि कानून को रोकना, और उसके अमल को रोकना दो अलग-अलग बातें हैं।

लेकिन इस एक मुद्दे से परे भी अदालत ने बहुत खुलकर केन्द्र सरकार की खिंचाई की है, और इस किस्म से किसान आंदोलन के दौरान हो रही मौतों पर भारी फिक्र जाहिर की है, और यह साफ किया है कि वह ऐसी मौतों के चलते चुप नहीं रह सकती, और इन मौतों के लहू से वह चुप रहकर अपने हाथ नहीं रंग सकती। अदालत ने किसान आंदोलन के दौरान किसी हिंसा के खतरे पर भी फिक्र जाहिर की, आंदोलनरत किसानों के बीच कोरोना जैसे किसी संक्रमण के फैलने का खतरा भी अदालत ने देखा, और यह साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट को किसानों के भोजन-पानी की फिक्र है। अदालत ने सरकार से यह भी पूछा कि जिस तरह किसान खुदकुशी कर रहे हैं, क्या इस कानून को रोका नहीं जा सकता? अदालत ने कहा कि एक भी याचिका ऐसी नहीं है जिसमें कहा गया हो कि ये कानून अच्छे हैं, किसानों के भले के हैं। महीने भर से चल रही बातचीत को लेकर भी अदालत ने खफा होकर सरकार से कहा कि उसे यही समझ नहीं आ रहा है कि सरकार समाधान का हिस्सा है, समस्या का हिस्सा है? जाहिर है कि मीडिया में, और सोशल मीडिया में जिस तरह किसानों की शहादत सामने आ रही है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट अनदेखा नहीं कर पाया है।

अभी किसान आंदोलन पर, और किसान कानूनों पर अमल पर अदालत का फैसला बहुत दूर हो सकता है, और यह भी हो सकता है कि आज अदालत यह कड़ा रूख दिखाने के बाद अपने फैसले में सरकार के साथ दिखे, लेकिन आज अदालत का जो रूख है वह भी किसानों के लिए, और उनके हमदर्द हिन्दुस्तानियों के लिए राहत की बात है। अदालत के कहे हुए शब्दों से दो बातें साफ हैं, पहली बात तो यह कि संसद में बाहुबल से पास करवाए गए किसान विधेयकों को लागू करने की हड़बड़ी से सुप्रीम कोर्ट बिल्कुल भी सहमत नहीं है, और उसका कड़ा रूख दिख रहा है कि इनके अमल को रोक दिया जाए। दूसरी बात साफ दिख रही है कि इस आंदोलन में लोग जितनी तकलीफें उठा रहे हैं, जिस तरह बुजुर्ग और महिलाएं इसमें शामिल हैं, जिस तरह मौतें और खुदकुशी हो रही हैं, उनसे सुप्रीम कोर्ट हिला हुआ है। अदालत का ऐसा रूख भी इस देश के लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए मायने रखता है। ऐसा दिख रहा है कि किसानों और सरकार के बीच बेनतीजा सीधी बातचीत को देखते हुए अदालत एक कमेटी भी बना सकती है जो कि दोनों पक्षों से बात करके किसी किनारे पर पहुंच सके। कुल मिलाकर आज अदालत का रूख देश के किसानों और लोकतांत्रिक तबकों के लिए राहत का है, और पिछले कुछ समय से सुप्रीम कोर्ट को लेकर जनता में ऐसी सोच बन रही थी कि वह सरकार के साथ सहमत, या सरकार के फैसलों के प्रतिबद्ध न्यायपालिका है, यह धारणा आज के अदालती रूख से कुछ कमजोर जरूरी होगी। अदालत की जुबानी टिप्पणियों के बाद उसके आदेश, और उसके फैसले से किसानों को कितनी राहत मिलती है यह देखना अभी बाकी है, और उसमें लंबा वक्त लग सकता है। आगे-आगे देखें होता है क्या। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है,10 जनवरी 2021


 

चिकित्सा-विज्ञान तो पूरी तरह बेदिमाग है इसलिए...

आन्ध्रप्रदेश में 74 साल की एक महिला ने कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से जुड़वां बेटियों को जन्म दिया है। खुद की शादी के 57 साल हो चुके थे, लेकिन बच्चे नहीं हुए थे। अब यह महिला इन बच्चों के साथ बीबीसी की एक वीडियो रिपोर्ट में खुश दिख रही है। बच्चों के जन्म के बाद 6 महीने तक उनके साथ इस बुजुर्ग महिला को भी अस्पताल में ही रखा गया था, और अब वह खेलती-दौड़ती बेटियों संग खुश है। इस रिपोर्ट के मुताबिक इस महिला के पति को बच्चों का सुख हासिल नहीं हुआ क्योंकि वे गुजर गए। बाकी परिवार का कहना है कि विश्व रिकॉर्ड बना चुकी उनकी यह बुजुर्ग सदस्य 4-5 बरस और जी जाए, तो बच्चियों की अच्छे से परवरिश हो जाएगी। 

भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है कि वह लोगों को कोई उम्र गुजर जाने के बाद मां-बाप बनने से रोके। और चिकित्सा विज्ञान की अपनी कोई समझ नहीं है, उसके पास महज तकनीक है, और खासकर आज तो चिकित्सा-कारोबार के हाथ इतनी महंगी-महंगी तकनीकें हैं कि उसका बाजारू इस्तेमाल रोक पाना मुमकिन नहीं है। चौहत्तर बरस की जिस उम्र में यह महिला डेढ़ बरस उम्र की जुड़वां बेटियों के साथ है, वह उम्र हिन्दुस्तान की औसत उम्र से खासी अधिक हो चुकी है। और इस बात की गणितीय संभावना कम है कि वह इन बच्चियों के बालिग होने तक रह सके, और रहे भी तो उनकी देखभाल करने के लायक रह सके। जिस हिन्दुस्तान में अंग-प्रत्यारोपण को लेकर एक बहुत ही कड़ा कानून है जो कि लोगों के अंगदान करने और दूसरों के उन अंगों को पाने को बरसों लंबी जटिल प्रक्रिया बना देता है। उसी हिन्दुस्तान में संतान पाने के लिए कोई कानून नहीं है। कम से कम उम्र की कोई रोक इस पर नहीं है। संविधान में जो बुनियादी हक दिए गए हैं, उन पर चिकित्सा-विज्ञान को लेकर भी कोई रोक नहीं है जबकि संविधान के मूलभूत अधिकारों के तहत किसी को अंग देने और किसी से अंग लेने के फैसलों पर चिकित्सा-विज्ञान की जटिल औपचारिकताएं लागू की गई हैं जो कि अंग देने और पाने पर रोक तो नहीं लगाती हैं, लेकिन उन्हें बरसों की थका देने वाली जटिल प्रक्रिया जरूर बना देती हैं। 

ऐसे में आज की यह बात कुछ तो लोगों के निजी फैसले पर है कि वे 74 बरस की उम्र में मां बनना तय करते हैं। इस अकेली महिला ने ही नहीं, बल्कि बाकी परिवार ने भी इस फैसले में चाहे अनमने ढंग से, साथ तो दिया, और हसरत पूरी करने का बाकी काम चिकित्सा-विज्ञान ने कर दिया। लेकिन जिस कृत्रिम गर्भाधान तकनीक को चिकित्सा-विज्ञान ने विकसित किया है, वह चिकित्सा-विज्ञान न तो पौन सदी पर पहुंच रही इस बुजुर्ग महिला की उम्र बढ़ा सकता है, न ही उसे उम्र से जुड़ी, या दूसरी, बीमारियों से बचा सकता है। क्या ऐसे में गर्भाधान के लिए किसी उम्र की शर्त लगाना एक अधिक जिम्मेदारी की सामाजिक व्यवस्था होगी? जो बच्चे ऐसी तकनीक से, इस उम्र में, पैदा हुए हैं, उनका तो कोई बस अपने पैदा होने पर चल नहीं सकता था। वे तो अपनी मर्जी के बिना, अपने किसी फैसले के बिना ऐसे बुजुर्ग मां-बाप की संतान बनी हैं जिनकी अपनी जिंदगी का कोई ठिकाना नहीं है। एक बहुत बड़ी आशंका यह है कि ये बच्चियां बालिग होने, और उसके बाद के भी खासे बरस तक रिश्तेदारों की मोहताज रहेंगी। महज रूपए-पैसे का इंतजाम, अगर हो तो भी, काफी नहीं होता क्योंकि बिना मां-बाप के बच्चों की हालत बहुत से मामलों में बदहाल ही रहती है। 

चूंकि लोगों के निजी फैसलों पर परिवार के, या आसपास के लोगों का भी अधिक बस तो चलता नहीं है, इसलिए जब तक कोई कानून न रहे, तब तक किसी को ऐसी असाधारण बातों से रोका नहीं जा सकता। भारत में कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से दूसरी मां की कोख से बच्चों के जन्म पर एक सरोगेसी-कानून बनाकर बहुत ही कड़ी रोक लगाई गई है। यह भी सोचने की जरूरत है कि इतनी उम्र में कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से मां-बाप बनने पर क्या कोई रोक नहीं लगाई जानी चाहिए? यह बात ऐसे मां-बाप के अधिकारों की बात नहीं है, यह बात अजन्मे बच्चों के अधिकार की बात है, और चूंकि उनकी तरफ से कोई दूसरे लोग बुजुर्ग दम्पत्ति के ऐसे फैसले के खिलाफ अदालत जाने में दिलचस्पी नहीं रखते होंगे, इसलिए ऐसी नौबत की सोचकर सरकार को ही किसी रोक की बात सोचनी चाहिए कि बच्चों को दुनिया में लाकर मां-बाप जल्द चल बसें, तो उनकी जवाबदेही किसकी होगी, और सरकार को ऐसी नौबत को देखते हुए कैसी रोक लगानी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)


नगदी, या निजता, लोग भुगतान कैसे करना चाहते हैं?

 दुनिया में सबसे लोकप्रिय सोशल मीडिया फेसबुक, और सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला मैसेंजर वॉट्सऐप दोनों एक ही मालिक के हाथ हैं। अब वॉट्सऐप में अपनी सर्विस इस्तेमाल करने वाले लोगों से उनकी निजता-गोपनीयता में कई तरह की छूट मांगी है जिससे वह जानकारियों का इस्तेमाल कर सकें। जो लोग ऐसी छूट देने पर सहमति नहीं दे रहे हैं, उनके फोन पर वॉट्सऐप 8 फरवरी को बंद कर देने की जानकारी इस सर्विस की तरफ से दी गई है। 

वैसे तो हिन्दुस्तान में लोग निजता और गोपनीयता को पश्चिमी सोच मानते हैं, और किसी का कोई व्यक्तिगत जीवन भी होने की सोच भारत में नहीं है। इसलिए हिन्दुस्तान में अभी वॉट्सऐप की सहूलियत और आदत को छोडऩे का सिलसिला नहीं दिख रहा है, लेकिन एक दिलचस्प बात यह है कि सौर ऊर्जा और सोलर बैटरियों से चलने वाली कारें बनाकर दुनिया के सबसे रईस इंसान बने कारोबारी एलन मस्क ने ट्विटर पर एक दूसरी मैसेंजर सर्विस, सिग्नल, का नाम भर लिखा है, और उसे लाखों लोग देखते चल रहे हैं, आगे बढ़ाते चल रहे हैं। लोग विकसित दुनिया में वॉट्सऐप छोडऩे के पहले दूसरी सेवाओं का इस्तेमाल जोड़ते चल रहे हैं, और अभी से एक महीने बाद पता चलेगा कि दूसरी मैसेंजर सर्विसों को कितने लोगों ने इस्तेमाल करना शुरू किया है। हो सकता है कि ऐसे लोग आगे भी वॉट्सऐप को छोडऩे के बजाय उसे कुछ साधारण कामकाज के लिए बनाए रखेंगे, और सचमुच के निजी संदेशों के लिए दूसरी सर्विस इस्तेमाल करेंगे। 

इस बारे में आजकल में ही लिखे गए एक लेख में एक ताजा फिल्म का एक वाक्य लिखा गया है कि अगर आप किसी प्रोडक्ट का इस्तेमाल करने के लिए पैसे नहीं चुका रहे हैं, तो आप ही वो प्रोडक्ट हैं। 

बात सही है क्योंकि दुनिया में कुछ भी बिना प्राइज-टैग के नहीं आ सकता। सोशल मीडिया हो, या ऐसी मैसेंजर सर्विसेज हों, ये कोई समाजसेवा का काम तो है नहीं। इन्हें कारोबारियों ने शुरू किया, और मुफ्तखोरों ने इन्हें लपक लिया। नतीजा यह हुआ कि आज जब आदत डालकर और जरूरत बनाकर सोशल मीडिया और मैसेंजर लोगों की गोपनीयता खत्म कर रहे हैं, तो लोगों को यह भी लग रहा है कि इनके बिना जिंदगी कटेगी कैसे? लेकिन यह बात महज सोशल मीडिया या मैसेंजर के बारे में नहीं है, यह बात तो अखबारों पर भी लागू होती है जिन्हें लोग रद्दी के भाव पर चाहते हैं। अब अखबार उन्हें तकरीबन मुफ्त चाहिए, या लागत के दस फीसदी दाम पर चाहिए, और पाठक अखबार निकालने वाले लोगों से पूरी ईमानदारी की उम्मीद भी करते हैं। सस्ते की चाह का नतीजा यह होता है कि लोग प्रायोजित समाचार-विचार पाते हैं, उन्हीं पर भरोसा करने को मजबूर होते हैं, और फिर उनके असर में ऐसी सरकारें चुनते हैं जो कि उन प्रायोजकों की पसंद रहती हैं। मुफ्त के बारे में हिन्दुस्तान में बहुत पहले से एक बात चली आ रही है कि दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते। मुफ्त में जो मिल जाता है, उसे उसी तरह लेना पड़ता है। अब आज फेसबुक और वॉट्सऐप नाम के दान के बछिया-बछड़ा लोगों के तौलिए खींच रहे हैं, तो लोगों के पास पसंद की कोई अधिक गुंजाइश भी नहीं बची है। आज अगर अपनी गोपनीयता बनाए रखने के साथ फेसबुक और वॉट्सऐप लोगों से कुछ सौ रूपए महीने मांगने लगें, तो कितने लोग उसे देने तैयार होंगे? आज दूसरी कोई सेवाएं गोपनीयता के साथ मैसेंजर देने को खड़ी भी हों, लेकिन वे भी कोई समाजसेवी संस्थान तो है नहीं। कल जब उनका बाजार भी बढ़ जाएगा, तो वे भी यही काम करेंगी, या तो निजी जानकारियां जुटाकर उन्हें बाजार में बेचेंगी, या वे ग्राहकों से भुगतान करने को कहेंगी।
 
निजता को लेकर एक हल्का-फुल्का किस्सा दशकों से प्रचलन में है। हनीमून मनाने गया एक जोड़ा एक होटल में रूका, तो उससे कोई भुगतान नहीं लिया गया, कहा गया कि यह होटल की तरफ से गिफ्ट है। ऐसी गिफ्ट से खुश यह जोड़ा एक बरस बाद फिर वहीं जाकर रूका, तो निकलते समय उसे बिल थमा दिया गया। सदमे में आकर उसने याद दिलाया कि पिछली बार तो बिल नहीं दिया गया था, तो होटल ने उन्हें बताया कि पिछली बार उन्हें वीडियो कैमरे वाले कमरे में ठहराया गया था, और उनका वीडियो बाकी कमरों के लोग देख रहे थे। अब निजता को छोडक़र कुछ मुफ्त पाना, या निजता बनाए रखने के लिए भुगतान करना, यह लोगों को खुद तय करना है। दुनिया में मुफ्त में कुछ नहीं आता, लोगों को समझौता या भुगतान इन दो में से एक छांटना पड़ता है। उदार बाजार व्यवस्था में बस यही है कि आज एक सर्विस आपकी निजी जानकारी पर कब्जा चाहती है, तो कोई दूसरी सर्विस बिना ऐसी चाहत भी मुफ्त में हासिल है। लोग खुद तय करें कि उन्हें क्या पसंद है। 

(Daily Chhattisgarh)