कुदरत को नुकसान के एवज में पड़े कोड़े
चीन की बाढ़, अमरीका का सूखा, वहीं पर तूफान, जापान में एक साथ सुनामी और बाढ़, उत्तराखंड में ताजा आपदा, इस तरह के कुदरत के कहर का सिलसिला पिछले बरसों में लगातार बढ़ते चल रहा है, और मौसम के इन तीखे तेवरों को लेकर अब एक सवाल यह उठ रहा है कि कौन से देश, कौन से प्रदेश और कौन से शहर इससे निपटने के लिए कितना खर्च करें? ऐसी नौबत साल में शायद दस-बीस दिन ही किसी इलाके को झेलनी पड़ती है। कुछ जगहों पर हमेशा से ज्वालामुखी या भूकंप के खतरे बने रहते थे, लेकिन अब नई-नई जगहों पर नई-नई कुदरती मुसीबतें सामने आ रही हैं, और इनका दर्जा भी पहले से बहुत ऊंचा हो चुका है। जो नए ढांचे खड़े हो रहे हैं, उनके लिए तो इस दर्जे की तैयारियां काफी अधिक दाम पर भी की जा रही हैं, लेकिन जहां पहले ऐसी कोई आशंका नहीं थी, वहां पर तो कोई तैयारी भी नहीं थी। इसलिए दुनिया के मौजूदा ढांचे में किस तरह कोई फेरबदल करके इन नई मुसीबतों के लिए तैयारी कर सकते हैं? पिछले कुछ सालों में ही योरप में ज्वालामुखी से निकलने वाली राख ने कुछ हफ्तों के लिए वहां जिंदगी तहस-नहस कर दी थी। योरप में ही जिस तरह से हिमयुग की वापिसी दिख रही थी उससे भी लोग हैरान थे क्योंकि दुनिया भर में तो ग्लोबल वॉर्मिंग की बातें चल रही हैं। अमरीका में लोग लू से मारे जा सकते हैं, यह पहले किसने सोचा था? दूसरी तरफ रूस की बाढ़ में डेढ़-दो सौ लोग मारे गए और ब्रिटेन बेमौसम की बरसात की मार झेलता रहा।
हिंदुस्तान की एक सबसे बड़ी पर्यावरण-जानकार सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सुनीता नारायण ने अपनी पत्रिका डाऊन टू अर्थ के संपादकीय में उन्होंने बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन में रिश्ता समझने का वक्त गिनाया था। उन्होंने लिखा था-सच बात तो यह है कि बदलाव हमारे वर्तमान और भविष्य में होंगे ही। चूंकि दुनिया ने बढ़ते तापमान का असर अभी देखना शुरू ही किया है, चरम मौसमी घटनाओं के कारण समझाने वाले पिछले कई सालों के आंकड़े अस्तित्व में ही नहीं हैं। इसलिए ज्यादा से ज्यादा यही किया जा सकता है कि एक मॉडल के आधार पर दुनिया भर में बढ़ रहे तापमान के असर की भविष्यवाणी की जाए।
हम बात वहां से कुछ अलग भी ले जाना चाहते हैं। इंसान जितने किस्म से कुदरत को कुचल रहे हैं, उसे देखते हुए यह माना जाना चाहिए कि कुदरत भी इसका हिसाब आगे-पीछे चुकता करेगी। और यह सब तो तब है जब आज धरती पर अमीरी और गरीबी के बीच का फासला एक सीमा तक ही पहुंचा है और यह आगे बढ़ते जाना तय है। जब यह फासला और अधिक भयानक हो जाएगा, तब अमीर तबके की खपत भी भयानक बढ़ जाएगी। और उससे धरती के गर्म होने, यहां पर प्रदूषण बढऩे की नौबत भी अधिक भयानक हो जाएगी। उनका एक नतीजा इस तरह के चरम मौसम की शक्ल में भी सामने आएगा। लेकिन इंसान के बनाए हुए इस खतरे से परे अगर दुनिया की इस आकाशगंगा में कुछ ऐसे फेरबदल हों जो इंसान काबू से परे हों तो क्या होगा?
आज तो यह धरती इंसानों के बिगाड़े हुए माहौल की मार को नहीं झेल पा रही है, इस पर उम्मीद से परे की कोई और मार पड़े तो क्या होगा?
हिंदुस्तान के मामले में देखें तो यह बात कई तरह के बहस के लायक लगती है कि देश के एक हिस्से में बाढ़ और दूसरी हिस्से में सूखे से निपटने के लिए नदी-जोड़ योजना का नफा क्या होगा, और नुकसान क्या होगा? यह मामला बहुत अधिक जानकार लोगों के बीच के तर्क -वितर्क का है इसलिए इस बारे में हमारी अपनी कोई विशेषज्ञ राय नहीं है। पहली नजर में यह ठीक लगता है कि पानी को सूखे इलाकों की तरफ मोड़ा जाए। लेकिन इससे इन इलाकों के पर्यावरण पर पडऩे वाले असर का ठीक-ठीक अंदाज लगाना क्या आज मुमकिन है? और यह भी कि क्या इतनी बड़ी योजना से कम कोई ऐसी योजना बन सकती है जिसका असर सीमित हो? यह कुछ उसी तरह की बात है जिस तरह कि बड़े बांधों के मुकाबले पर्यावरणवादी लोग छोटे बांधों की वकालत करते हैं। लेकिन यह जरूर है कि भारत के एक हिस्से में बाढ़ को कम करके, दूसरे हिस्से से सूखे को कम किया जा सके, और सारे सूखे हिस्से में जमीन के भीतर भी रिसकर जाने वाला पानी अधिक पहुंचे, तो उसके कई फायदे भी हो सकते हैं।
मौसम के कोड़े को आज दुनिया के बहुत से हिस्से बहुत बुरी तरह झेल रहे हैं। और अमरीका जैसा ताकतवर देश भी इस मार को हल्का करने का कोई तरीका नहीं निकाल पा रहा है। भारत को भी यह सोचना शुरू करना चाहिए कि वह कुदरत को पहुंचाए जा रहे नुकसान को कम कैसे करे। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी जरूरी बात यह भी रहेगी कि विकसित और संपन्न देशों की मतलबपरस्ती के चलते कुदरत को जो बड़ा नुकसान पहुंचाया जाता है, उसे रोकने के लिए ऐसे देशों पर दबाव कैसे बढ़ाया जाए।
कुदरत से ख्याल रखने की इतनी उम्मीदें बेबुनियाद...
उत्तराखंड और उत्तर भारत के कुछ और राज्यों में कुदरत के कहर को लेकर चल रही बहस में अधिक गंभीर लोग पर्यावरण को इंसानों द्वारा पहुंचाए गए नुकसान को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। यह नुकसान लंबे समय में पहुंचाया जाता है, और उससे बहुत लंबे समय के लिए कुदरती कहर झेलना भी पड़ता है, शायद हमेशा के लिए। लेकिन इस नजरिए को ही सब कुछ मान लेने से एक नुकसान यह होगा कि पर्यावरण को बचाने को एक पूरा इलाज मान लिया जाएगा, वह भी सही नहीं होगा।
यह भी समझने की जरूरत है कि धरती, या धरती से परे की बाकी दुनिया भी, एक चट्टान की तरह की स्थायी व्यवस्था नहीं है। धरती अपने आपमें इंसानों के आने के पहले से कई तरह के फेरबदल देखती आई है, और इस पर ज्वालामुखियों का, भूकंप का, बाढ़ का इतिहास इंसानों के और लाखों बरस पहले का रहा है। मतलब यह कि जब इंसान नहीं थे, जब उन्होंने धरती को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था, उस वक्त भी धरती में ऐसे बदलाव आते थे कि उनके आसपास अगर उस वक्त भी इंसान बसे होते, तो वे थोक में मारे गए होते। आज की एक दिक्कत यह है कि किसी इलाके की सीमाओं को समझे बिना, या उनको अनदेखा करके, उन इलाकों की सरकारें वहां की संभावनाओं के नगदीकरण में जुट जाती हैं। नतीजा यह होता है कि कुदरत की सीमाएं इतनी लांघी जाती हैं, कि उसके खतरे इंसानों पर छाने लगते हैं। हर बार ऐसा भी नहीं होता कि कुदरत कोई बदला निकालती हो। लेकिन कुदरत किसी फौलाद का ढांचा नहीं है कि हावड़ा ब्रिज की तरह उस पर सैकड़ों बरस के लिए भरोसा किया जा सके। दुनिया के किसी हिस्से में ज्वालामुखी से, कहीं पर भूकंप से, कहीं पर बाढ़ से, कहीं पर सुनामी से, कहीं पर तूफान और चक्रवात से, कहीं पर आसमानी बिजली से, और कहीं पर सूखे से, तबाही आती है, और यह तबाही रूकने लायक नहीं होती। इंसानों के पहुंचाए नुकसान से यह तबाही बढ़ती है, लेकिन धरती और दुनिया का इतिहास ऐसे नुकसान के बिना भी आने वाली कुदरती तबाही को देखते आया है। इंसानों ने तो धरती को जितना भी नुकसान पहुंचाया हो, वह तो पिछले कुछ सौ बरस की ही बात है। लेकिन धरती का इतिहास तो लाखों-करोड़ों बरस पुराना है, और जमीन के नीचे जब चट्टानें खिसकती हैं तो बड़े-बड़े इलाके तबाह हो जाते हैं। आज इसलिए कि ऐसे इलाकों में लोग बसे हुए हैं, ढांचे खड़े हुए हैं, इसलिए तबाही अधिक दिखती है।
लोग कहीं पर मंदिर-मस्जिद बनाएं, या गुरुद्वारे और चर्च, कहीं पर सैर-सपाटे की जगहें बनाएं, या पहाड़ के ऊपर और समंदर के करीब रहने की जगह, उनको धरती की सीमाओं को भी समझना होगा कि उसमें फेरबदल कभी भी आ सकता है, इंसानों के पहुंचाए जख्मों से परे भी धरती कराह सकती है, आसमान का लहू बरस सकता है। प्रकृति की इन सीमाओं के खतरों को समझे बिना अगर किसी इलाके में लाखों तीर्थयात्री या सैलानी इस तरह जाएंगे, और वहां पर मौसम की कोई मार पड़ेगी, तो उसे न तो सिर्फ मानवनिर्मित विनाश कहना ठीक होगा, और न ही ऐसी किसी जगह की सरकारों को उसके लिए जिम्मेदार ठहराना ठीक होगा। ऐसी तबाही में उनका हिस्सा इसे बढ़ाने वाला तो हो सकता है, लेकिन इसे खड़ा करने वाला नहीं हो सकता। कुदरत के कहर की मार तो इंसानों के कुकर्मो से बढ़ सकती है, लेकिन कुदरत का अपना मिजाज ऐसे फेरबदल का है जो कि धरती, समंदर, आसमान और दूसरे ग्रहों पर होते चलता है, और वह इंसान को देखकर नहीं होता। कुदरत को जो लोग मां मान लेते हैं, वे यह समझने की चूक कर बैठते हैं कि जिस तरह कोई मां अपने बच्चों का ख्याल रखती है, उसी तरह कुदरत भी इंसानों का ख्याल रखती है। कुदरत का इंसानों से ऐसा कोई रिश्ता नहीं है, और उससे ऐसी उम्मीद एक ऐसी नाउम्मीदी और सदमे की गारंटी कर देगी जैसी कि आज उत्तराखंड में लोगों को हो रही है, या जैसी कि अमरीका में पिछले बरसों में तकरीबन हर महीने-दो महीने में लोगों को किसी तूफान या बवंडर से हो रही है।
इसलिए प्राकृतिक विपदाओं को सिर्फ इंसानों की खड़ी की हुई, या बढ़ाई हुई मान लेना गलत होगा। इंसानों के किए हुए से परे भी, कुदरत ने धरती के हर हिस्से को ऐसा नहीं बनाया है कि उन जगहों पर मनचाही गिनती में लोग बसें या पहुंचें, और मनचाहे काम करें। लोगों को धरती और आसमान के, समंदर और नदियों के, खतरों को समझते हुए ही उन जगहों पर रहना या आना-जाना तय करना पड़ेगा। आज इंसानों ने अपने सुख के लिए, शौक के लिए, या रोजगार के लिए ऐसी जगहों पर ऐसे-ऐसे काम शुरू किए हैं, जो कि कभी भी खतरों से खाली नहीं रहेंगे। और इसे कुदरत की मार कहना भी इसलिए गलत होगा कि कुदरत सोच-समझकर वार या मार करने वाली ताकत नहीं है। उसमें अपने आपमें जो तब्दीलियां आती हैं उन पर उसका अपना कोई बस नहीं रहता। आज उत्तराखंड के बहुत ही कमजोर, नाजुक, और अविश्वसनीय प्राकृतिक ढांचे पर इस कदर का भरोसा कर लिया गया है, कि उसका किसी भी दिन टूट जाना हैरानी की बात नहीं होता। और वही हुआ। जिस तरह लोग आग के करीब पेट्रोल नहीं रखते, बिजली के तारों के नीचे खुद नहीं बसते, उसी तरह धरती के खतरनाक हिस्सों के खतरों को समझकर उनसे दूर रहना, दूर बसना ही बेहतर होगा। आज उत्तराखंड में अनगिनत ऐसी शहरी इमारतें बह गई हैं, या गिर गई हैं, जो कि नदी के किनारे गैरकानूनी बनी हुई थीं। ऐसी सड़कें बह गई हैं, या गिर गई हैं, जो कि पहाड़ को चीरकर बनाई गई थीं। ऐसे खतरे खुद खड़े करके इंसान अगर उनके बीच जिएंगे, वहां घूमने जाएंगे, तो वह खतरे का काम तो रहेगा ही। आज का विज्ञान, आज का सरकारी इंतजाम, ऐसे कुदरती खतरों के बाद होने वाले नुकसान को कम करने का काम ही कर सकते हैं, उसे रोक नहीं सकते।
एक वक्त था जब ऐसे तीर्थों पर जाते हुए लोग यह मानकर चलते थे कि वहां से पता नहीं लौटें, या न लौटें। साल-छह महीने न लौटने वालों के श्राद्ध भी कर दिए जाते थे। तब से अब तक वहां की धरती की हालत पहले से खराब ही हुई है, पहले से अच्छी नहीं हुई, लेकिन वहां जाने वाले लोग अब शायद लाखों गुना अधिक बढ़ गए हैं। ऐसे में एक नाजुक इलाके में इतना ही ढांचा विकसित हो सकता है, जो कि कुदरत के किसी बड़े फेरबदल के पहले तक लोगों का साथ दे दे। लोग जिसे प्रकृति की विनाशलीला या कुदरत का कहर कहते हैं, वह कुदरत का एक मामूली और नियमित-अनियमित फेरबदल अधिक है, इंसानों का खरीदा हुआ कहर कम है। इसलिए लोगों को धरती और आसमान की सीमाओं को समझकर अपनी हिफाजत खुद करनी होगी। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमरीका में ही बवंडर से आने वाली तबाही को रोकने का कोई जरिया नहीं है, तूफान से अपने लोगों को बचाने का कोई जरिया नहीं है। बचाव की सीमा है, कुदरत की सीमा है, इंसानों की हसरत असीमित है, इसलिए लोग अधिक खतरे झेल रहे हैं। यह लोगों को खुद समझना है कि वे कितने खतरे झेलकर अपने शौक, अपने सुख, या अपने आस्था को पूरा करना चाहते हैं।
घरेलू हिंसा की पराकाष्ठा के तीन अलग-अलग केस देश का हाल बता रहे हैं...
हिन्दुस्तान में आमतौर पर मुस्लिमों के बीच न तो कन्या भ्रूण हत्या का चलन सुनाई पड़ता, न ही किसी की बलि देने जैसी धर्मान्धता सुनाई पड़ती। लेकिन पिछले चार दिनों में दो ऐसी दिल दहलाने वाली खबरें सामने आई हैं जिनकी वजह से न सिर्फ मुस्लिमों में, बल्कि भारत के बहुत से दूसरे सम्प्रदायों में ऐसी निजी हिंसा के बारे में लिखने की जरूरत महसूस हो रही है। पहली खबर इतवार के दिन केरल से आई जहां पर एक गर्भवती मदरसा-शिक्षिका ने अल्लाह को खुश करने के नाम पर अपने छह बरस के बेटे का गला काटकर उसे मार डाला। इसके बाद उसने खुद पुलिस को फोन करके खबर की कि उसने अपने बेटे को अल्लाह को कुर्बान कर दिया। केरल न सिर्फ हिन्दुस्तान का सबसे पढ़ा-लिखा राज्य है, बल्कि यह सेक्स अनुपात में देश में सर्वाधिक कन्या-आबादी वाला राज्य भी है। हालांकि मां के हाथों बेटे के इस कत्ल का लडक़े-लड़कियों से कोई लेना-देना नहीं है, और यह सिर्फ धार्मिक अंधविश्वास के चलते हुई पारिवारिक हिंसा है। जब इस महिला ने बेटे को मारा, तो बगल के कमरे में उसका पति उनके दो दूसरे बच्चों के साथ सोया हुआ था। इसके दो हफ्ते पहले आन्ध्रप्रदेश से अंधविश्वास से जुड़ी पारिवारिक हिंसा की एक दूसरी खबर आई थी जिसमें दो पढ़े-लिखे मां-बाप ने अपनी दो जवान पढ़-लिख रही बेटियों को मार डाला था कि वे मरने के बाद फिर जिंदा होकर लौट आएंगी। आज की ताजा खबर हरियाणा से है जहां एक महिला अभी दो महीने बाद गिरफ्तार हुई है। यह महिला हरियाणा की सबसे घनी मुस्लिम आबादी वाले इलाके मेवात की रहने वाली है, और उसे चार बेटियां हो चुकी थीं, लेकिन बेटा नहीं हुआ था। ऐसे में उसने पारिवारिक प्रताड़ऩा झेलते हुए तनाव में चारों बेटियों की गला काटकर हत्या कर दी थी, और खुद का भी गला काटने की कोशिश की थी। अस्पताल से अब छूटने पर उसे चार बेटियों की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है।
पारिवारिक हिंसा के ये तीनों मामले अंधविश्वास और सामाजिक-पारिवारिक प्रताड़ऩा से जुड़े हुए हैं। शुरू के दो मामले अंधविश्वास में अपने ही बच्चों को मार डालने के हैं, और हरियाणा का मामला लडक़े की चाह वाले परिवार के दबाव में तनाव से की गई हत्याओं का है। इन तीन घटनाओं से दो अलग-अलग मुद्दे जुड़े हुए हैं, लेकिन ऐसी पारिवारिक हिंसा को एक साथ भी देखने की जरूरत है। धार्मिक अंधविश्वास लोगों को किस हद तक हिंसक-आत्मघाती बना देता है, उसकी कोई सीमा नहीं दिखती है। लोग अपने बच्चों को मार डालते हैं, देवी-देवता को खुश करने के लिए अपने शरीर का कोई अंग काटकर चढ़ा देते हैं, या खुदकुशी कर लेते हैं। एक तरफ तो यह दुनिया 21वीं सदी में पहुंची हुई है जब यहां के इंसान जाकर चांद को रौंद आए हैं, दूसरे ग्रहों पर जाने के रास्ते पर हैं, विज्ञान ने लोगों की बीमारियों को दूर किया है, जगह-जगह विज्ञान की पढ़ाई हो रही है, और उस बीच अंधविश्वास में ऐसी हिंसा हो रही है! एक तरफ धर्मशिक्षा देने वाले मदरसे की शिक्षिका अपने बच्चे को अल्लाह को कुर्बान कर रही है, दूसरी तरफ आन्ध्र में उच्च शिक्षित मां-बाप अपनी उच्च शिक्षा पा रही जवान बेटियों को मार डाल रहे हैं कि वे जिंदा हो जाएंगी। ऐसी नौबत में सिर्फ धर्म की शिक्षा को क्या कोसा जाए? धर्म की शिक्षा से परे उच्च शिक्षा भी लोगों के दिमाग के अंधविश्वास खत्म नहीं कर पा रही है। आज हिन्दुस्तान का सारा माहौल ही वैज्ञानिक सोच के खिलाफ हो चुका है, और इसका असर भी समाज में जगह-जगह देखने मिल रहा है।
हरियाणा पहले भी कन्या भ्रूण हत्या के लिए बदनाम राज्य रहा है, और वहां आबादी में लड़कियों का अनुपात लडक़ों के मुकाबले खासा कम रहा है। वहां पर इस मुस्लिम परिवार में चार लड़कियों के बाद मां पर बेटा पैदा करने के लिए दबाव इतना बढ़ा कि उसने चारों लड़कियों के गले काटकर खुद का भी गला काटा, लेकिन वह जख्मी होकर रह गई, और बाकी जिंदगी का पता नहीं कितना हिस्सा जेल में जाएगा। हरियाणा एक ऐसा राज्य है जहां खाप पंचायतों से लेकर मौजूदा मुख्यमंत्री तक लगातार लड़कियों के खिलाफ तरह-तरह के फतवे देते आए हैं, और राज्य की आम सामाजिक सोच लड़कियों के लिए हिकारत की है। जबकि हिन्दुस्तान में ओलंपिक से भी मैडल लेकर आने वाली लड़कियां हरियाणा की भी रही हैं।
समाज के लोगों को ऐसी घटनाओं से महज सतह पर तैरते हुए लक्षण मानना चाहिए जिनकी बीमारी सतह के नीचे है, और मरने-मारने से कम दर्जे की हिंसा सामने नहीं आ पाती है। लोगों को यह समझना चाहिए कि हिंसा की पराकाष्ठा के कुछ मामले जब सामने आते हैं, तो उससे कम दर्जे की हिंसा के हजारों मामले और रहते हैं जो कि पुलिस और अखबार तक नहीं पहुंचते, घर की चारदीवारी के भीतर जिनका दम घुटकर रह जाता है। ऐसी आत्मघाती या पारिवारिक हिंसा से उबरने के लिए लोगों के बीच एक वैज्ञानिक सोच विकसित होना जरूरी है, और समाज के भीतर लड़कियों और महिलाओं के लिए सम्मान बढऩा भी जरूरी है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में स्थित डॉ. दिनेश मिश्रा जैसे जीवट सामाजिक कार्यकर्ता लगातार अंधविश्वास के खिलाफ अपना वक्त और अपनी मेहनत लगाकर काम कर रहे हैं। अलग-अलग प्रदेशों में ऐसे और लोग भी हैं। लेकिन पुणे से लेकर बेंगलुरू तक अंधविश्वास और धर्मान्धता के खिलाफ काम करने वाले लोगों का साम्प्रदायिक कत्ल भी हो रहा है। ऐसे में अधिक संख्या में जागरूक लोगों को अधिक मेहनत करने की जरूरत है क्योंकि जब देश में कुछ ताकतें लगातार लोगों को धर्मान्ध और अंधविश्वासी बनाने के लुभावने काम में लगी हुई हैं, तब न्यायसंगत लोगों को जुटना होगा, वरना लोगों को अंधविश्वासी और धर्मान्ध बनाना तो एक अधिक आसान काम है ही।
लोकतांत्रिक आंदोलनकारियों को जो तंत्र परजीवी माने, वह कम से कम लोकतंत्र तो नहीं...
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्यसभा में देश में चल रहे आंदोलनों के संदर्भ में आंदोलनकारियों पर बड़ा हमला किया। उन्हें परजीवी भी कहा, यानी जो दूसरों पर पलते हैं, और यह भी कहा कि देश को ऐसे आंदोलनजीवी लोगों से बचाकर रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जिस तरह पहले श्रमजीवी या बुद्धिजीवी शब्द सुनाई पड़ते थे, देश में अब एक नई बिरादरी खड़ी हो गई है आंदोलनजीवियों की। किसी का भी आंदोलन चलता रहे ये जाकर उसमें पर्दे के सामने से या पर्दे के पीछे से शामिल हो जाते हैं। उन्होंने आंदोलनों को समर्थन देने वाले ऐसे लोगों की जमकर खिल्ली उड़ाते हुए मोदी ने देश को इन लोगों से सावधान रहने को कहा, देश को इनसे बचाकर रखने कहा।
पहली नजर में ऐसा लगा कि मानो भरोसेमंद मीडिया ने भी मोदी की बात को तोड़़-मरोडक़र लिखा है, और भला किस लोकतंत्र में प्रधानमंत्री आंदोलनों को लेकर इतनी ओछी बात कर सकता है। लेकिन जल्द ही यह खुलासा हो गया, और राज्यसभा का वीडियो भी चारों तरफ फैल गया कि मोदी ने सचमुच ऐसा ही कहा था। यह बात किसी भी लोकतंत्र को सदमा पहुंचाने वाली है कि वहां के आंदोलनों के संदर्भ में उस लोकतंत्र का प्रधानमंत्री ऐसी सोच रखता है। खासकर आज जब देश में कुल एक, किसान आंदोलन की चर्चा है, और इन आंदोलनकारियों को खालिस्तानी, पाकिस्तानी, चीन समर्थक, और देश का गद्दार करार देने की भरपूर कोशिश चल ही रही है। इस बीच में प्रधानमंत्री का ऐसा कहना देश के तमाम लोकतंत्रवादियों का भयानक अपमान छोड़ और कुछ नहीं है।
देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि हर कुछ हफ्तों या महीनों में किसी आंदोलन को समर्थन देते हैं, उसकी हिमायत में बयान जारी करते हैं, या उसके समर्थन में किसी प्रदर्शन में शामिल होते हैं। ऐसा इसलिए नहीं होता कि ये लोग भाड़े पर ट्वीटने वाले लोगों सरीखे भाड़े के आंदोलनजीवी हैं। ये लोग लोकतंत्र पर भरोसा रखते हैं, और हिन्दुस्तान जैसे विशाल देश में, यहां के दर्जनों प्रदेशों में, यहां के लाखों शोषणकर्ताओं के राज में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन तो चलते ही रहते हैं, और जिनका भरोसा लोकतंत्र पर है, उनका भरोसा ऐसे एक से अधिक बहुत से आंदोलनों पर हो सकता है, और रहता है। आज कोई जेएनयू के छात्रों के साथ हैं, तो हो सकता है कि यह उनका धंधा न रहते हुए भी वे शाहीन बाग के आंदोलन के साथ हो सकते हैं, वे यूपी और बिहार में बलात्कार के बाद जबरिया अंतिम संस्कार करने वाली पुलिस के खिलाफ आंदोलन के साथ भी हो सकते हैं, किसानों के आंदोलन के साथ भी हो सकते हैं, और किसी कॉमेडियन की गिरफ्तारी के खिलाफ आंदोलन के साथ भी हो सकते हैं। इसका मतलब यह कहीं भी नहीं रहता कि वे पेशेवर आंदोलनकारी हैं, या आंदोलन पर पलने वाले परजीवी धंधेबाज हैं।
लोकतंत्र में आंदोलनों और आंदोलनकारियों को इतनी हिकारत से देखना बहुत ही नाजायज बात है। अटल-अडवानी के वक्त से जनसंघ और भाजपा गौरक्षा के लिए आंदोलन करते आए हैं, या कुछ दूसरे हिन्दू संगठनों के चलाए जा रहे गौरक्षा आंदोलन का साथ देते आए हैं। जनसंघ और भाजपा कश्मीरी पंडितों के मुद्दे से लेकर कश्मीर से धारा 370 हटाने तक के मुद्दों पर आंदोलन भी करते आए हैं, और इन मुद्दों के दूसरे आंदोलनकारियों के साथ भी खड़े रहे हैं। जनसंघ के लोग आपातकाल के खिलाफ चले आंदोलन में समाजवादियों, और माक्र्सवादियों के साथ इंदिरा-विरोधी आंदोलन में शामिल रहे हैं, ये लोग कहीं हिन्दी भाषा के आंदोलन में शामिल रहे हैं, तो कहीं धर्मांतरण के बाद ऑपरेशन घरवापिसी के साथ खड़े रहे हैं। प्रधानमंत्री के बयान के जवाब में सोशल मीडिया ने उबलते हुए सैकड़ों ऐसी तस्वीरें पेश की हैं जिनमें नरेन्द्र मोदी से लेकर स्मृति ईरानी तक, और अरूण जेटली से लेकर सुषमा स्वराज तक तरह-तरह के आंदोलनों में हिस्सा लेते दिख रहे हैं। खुद मोदी धारा 370 के खिलाफ आंदोलन के मंच पर बैठे दिख रहे हैं, अटल बिहारी वाजपेयी पेट्रोल की महंगाई के खिलाफ बैलगाड़ी पर संसद जाते दिख रहे हैं, और स्मृति ईरानी तो गैस सिलेंडर की महंगाई के खिलाफ आंदोलन में सबसे आगे, लेकिन यूपीए सरकार तक, दिख रही हैं। जो पार्टी या जो नेता पूरी जिंदगी किसी न किसी लोकतांत्रिक आंदोलन से जुड़े रहे, उनका आज का मुखिया आंदोलनकारियों को अगर परजीवी कहे, तो यह उस नेता की अपनी पार्टी की विरासत का अपमान भी है।
कोई भी लोकतंत्र जब तक बेइंसाफी के खिलाफ, हक के लिए, लोकतांत्रिक मुद्दों के लिए आंदोलन नहीं देखता, तब तक वह एक मुर्दा लोकतंत्र रहता है, जिसका रहना न रहना एक बराबर होता है। आज हिन्दुस्तान के जो तथाकथित देशप्रेमी स्वीडन की एक किशोरी, ग्रेटा थनबर्ग पर उबल रहे हैं कि उसने हिन्दुस्तानी किसानों के पक्ष में ट्वीट करके हिन्दुस्तानी घरेलू मामलों में दखल दी है, उन्हें दुनिया के विकसित और सभ्य लोकतंत्रों के माहौल को भी समझना चाहिए जो कि आज भारत में नहीं रह गया है। स्वीडन की यही किशोरी ग्रेटा थनबर्ग 15 बरस की उम्र में अपने देश की संसद के बाहर पर्यावरण बचाने के मुद्दे पर धरने पर बैठी, और उसने पूरी दुनिया के लोगों का ध्यान खींचा, और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से गालियां खाईं। लेकिन उसने अपने देश में अकेले जो धरना और विरोध-प्रदर्शन शुरू किया उसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। दुनिया के देशों में जगह-जगह उसकी प्रेरणा से लोग पर्यावरण बचाने के लिए प्रदर्शन करने लगे। इस लडक़ी ने 2019 में 16 बरस की उम्र में एक समुद्री नौका से इंग्लैंड से न्यूयॉर्क तक सफर किया ताकि संयुक्त राष्ट्र पहुंचकर वह जलवायु पर खतरे के मुद्दे को उठा सके। पन्द्रह दिनों का यह सफर इसने सौर ऊर्जा से चलने वाली इस नौका से तय किया था और न्यूयॉर्क पहुंचकर उसने संयुक्त राष्ट्र के बैनरतले एक प्रेस कांफ्रेंस में दुनिया को प्रभावित किया। लोकतंत्र ऐसे ही आंदोलनों का नाम है, ये आंदोलन अपने देश की सरहद के भीतर हो सकते हैं, और अपने देश की सरहद के बाहर भी। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद के खिलाफ अपनी जिंदगी का पहला आंदोलन शुरू किया था, न तो वे वहां के नागरिक थे, और न ही वहां आंदोलन उनका हक था। आज हिन्दुस्तानी पुलिस ग्रेटा थनबर्ग को हिन्दुस्तान की दुश्मन करार देकर अपने देश के बावले लोगों को नारे लगाने का एक मौका जरूर दे रही है, लेकिन दुनिया में हिन्दुस्तान मखौल का सामान बन गया है।
देश के चुनावों में सबसे कामयाब नेता होने से भी नरेन्द्र मोदी को यह हक नहीं मिल जाता कि वे इस महान लोकतंत्र में आंदोलन नाम के लोकतांत्रिक हक को एक गाली की तरह इस्तेमाल करें। हो सकता है कि इसके बाद भी उनकी चुनावी संभावनाओं पर कोई फर्क न पड़े, या चुनावी संभावनाएं बढ़ भी जाएं, दुनिया के इतिहास में चुनावी आंकड़ों के मुकाबले लोकतांत्रिक फैसले अधिक मायने रखेंगे।
धरती बीच-बीच में लापरवाह इंसानों को हिलाकर जगाती है...
केदारनाथ में आई विनाशकारी बाढ़ की याद दिलाते हुए कल उत्तराखंड में एक बार फिर प्राकृतिक विपदा आई, लेकिन कुदरत इस बार मेहरबान रही, और शायद कुछ दर्जन मौतों पर ही बात रूक गई। फिर भी ऊपर पहाड़ पर किसी झील में बर्फ टूटी, या कुछ और हुआ जिससे कि पानी एकदम से नदी में आया, और बन रहे एक जल बिजलीघर को बहाते हुए आगे बढ़ गया। जैसा कि किसी भी बड़े हादसे में होता है, इसमें भी मरने वाले अधिकतर लोग गरीब मजदूर थे जो कि शायद इसी जल बिजलीघर की सुरंग में काम कर रहे थे, और ऊपर से बहकर आए मिट्टी के सैलाब में दर्जनों मजदूर दब गए। लाशों का मिलना और मौतों की गिनती अभी जारी है, लेकिन उनके कम-अधिक होने से बहुत फर्क नहीं पड़ता, फर्क की बात सिर्फ यह है कि कुदरत के साथ चल रहा यह खिलवाड़ इस ताजा हादसे के बाद भी लोगों की आंखें खोल सकेगा या नहीं?
उत्तराखंड में ऊपर हिमालय की जमी हुई झीलों की बर्फ धरती की बढ़ती हुई गर्मी से वैसे भी अधिक पिघल रही थी, और मौसम के बदलाव की वजह से वहां बर्फ जमना भी शायद कम हो रहा था। ऐसे में बादल फटने से, या धरती में कोई और फेरबदल होने से बर्फ का बड़ा टुकड़ा टूटकर नीचे आया और रास्ते के सब कुछ को बहाते हुए ले गया। यह तो अच्छी बात रही कि यह सुबह-सुबह हुआ, अगर यही हादसा देर रात हुआ होता, तो लोग बेखबर ही मारे जाते। लेकिन इससे सबक लेने की जरूरत यह है कि धरती के भीतर, धरती पर, या आसमान में आए किसी भयानक फेरबदल से उत्तराखंड जैसा पहाड़ी राज्य इतने बड़े खतरे में पड़ सकता है कि जिसके सामने केदारनाथ की बाढ़ की पांच हजार से अधिक मौतें भी फीकी पड़ जाएं। कुछ तो धरती की बनावट ऐसी है कि हर बात इंसान के काबू में नहीं है, और कुछ इंसान धरती को बर्बादी की तरफ धकेलने में लगे रहते हैं। इन दो बातों में से कम से कम इंसानी हरकतें तो काबू में लाई जा सकती हैं।
धरती के गर्म होने के लिए जिम्मेदार अनगिनत इंसानी हरकतों के व्यापक असर को पल भर के लिए अलग रखें, तो उत्तराखंड में इंसानों की लाई हुई तबाही को, और आगे आने वाले खतरे को देखा जा सकता है, और उसे आगे बढ़ाने से थमा भी जा सकता है। आज हिन्दुस्तान के गिने-चुने पहाड़ी राज्यों में बांध बनाकर सस्ती बिजली बनाने की कोशिशें कुछ जानकारों की नजरों में खतरे से खेलने के अलावा और कुछ नहीं है। लोग लंबे समय से उत्तराखंड जैसे राज्य में बांध में पानी अधिक इक_ा करने को धरती के लिए बड़ा खतरा मानकर चल रहे थे, और इसके खिलाफ आंदोलन भी कर रहे थे। इसी उत्तराखंड में सुंदरलाल बहुगुणा पेड़ों की कटाई का विरोध करते हुए पूरी जिंदगी चिपको आंदोलन चलाते रहे, और चाहे किसी पार्टी की सरकार रही हो, उसे कंस्ट्रक्शन के ठेकों के लिए पेड़ों को काटना सुहाता रहा। किसी भी पार्टी की सरकार का नजरिया धरती की तबाही को लेकर जरा भी अलग नहीं रहा, और उत्तराखंड ने कुछ बरस पहले केदारनाथ की बाढ़ ऐसी ही वजहों से झेली थी।
हिन्दुस्तान के ये पहाड़ी राज्य अपने स्थानीय शासन को अधिकारों के तहत पर्यटन को किसी भी सीमा तक बढ़ाने के लिए आजाद हैं, और इन राज्यों में कमाई का एक बड़ा जरिया पर्यटक हैं। लेकिन पड़ोस का हिमाचल प्रदेश अंधाधुंध बढ़ाए गए पर्यटन के बोझतले दम घुटते दिख रहा है। अब वैसा ही हाल उत्तराखंड का होने जा रहा है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि अंधाधुंध कमाई के लिए एवरेस्ट को कूड़े का ढेर बना दिया गया है। पहाड़ी रास्तों पर सडक़ें चौड़ी की जा रही हैं, उत्तराखंड को देवभूमि कहते हुए वहां अधिक से अधिक तीर्थयात्रियों का आना-जाना आसान करने के लिए ढेरों सडक़ें बनाई जा रही हैं, और उनमें से एक प्रोजेक्ट का नाम भी चारधाम महामार्ग रखा गया है। इस पहाड़ी प्रदेश में सात सौ किलोमीटर से अधिक लंबाई की यह टू-लेन नेशनल हाईवे बनाई जा रही है, और यह अंदाज लगाना अधिक मुश्किल नहीं है कि यहां आवाजाही बढऩे से वाहनों के धुएं का प्रदूषण बढ़ेगा, और उससे पर्यावरण के होने वाले नुकसान की भरपाई भी इंसानों को आगे चलकर करनी पड़ेगी। दरअसल कोई देश या प्रदेश अपनी तात्कालिक जरूरतों और संभावनाओं को देखते हुए धरती पर होने वाले दीर्घकालीन नुकसान को अनदेखा करने के आदी हो चुके हैं। उन्हें पांच साल के अपने कार्यकाल से परे की फिक्र खत्म हो गई है। केदारनाथ की बाढ़ के मुकाबले चूंकि इस बार मौतें बहुत कम हैं, इसलिए इस बार की कुदरत की चेतावनी को सरकारें तेजी से भुला देंगी। नतीजा आने वाली पीढिय़ां भुगतेंगी।
केन्द्र सरकार और उत्तराखंड सरकार पर इस बात को लेकर दबाव बनाना चाहिए कि विकास के नाम पर इस पहाड़ी राज्य, या दूसरे पहाड़ी राज्यों की कुदरती सीमाओं के साथ खिलवाड़ खत्म किया जाए। यह पूरे देश की जिम्मेदारी है कि पहाड़ी राज्यों पर कुदरती खतरा न बढ़ाने के एवज में उन राज्यों को केन्द्र से अतिरिक्त मदद दी जाए। हिन्दुस्तान में कई राज्यों को फौजी जरूरतों के मुताबिक या सरहदी रणनीति के चलते ऐसी मदद दी भी जाती रही है, और आज भी उत्तर-पूर्व जैसे राज्यों को कई तरह की रियायत मिलती है, और अनुदान मिलते हैं। भारत के पहाड़ी राज्यों को देश का फेंफड़ा बने रहने के एवज में इसकी भरपाई मिलनी चाहिए, और इसके साथ ही वहां पर धरती पर अधिक जुल्म भी खत्म होने चाहिए। अब हिन्दुस्तान की देश-प्रदेश की सरकारों में पर्यावरण के लिए आपराधिक लापरवाही दिखाई दे रही है, और ऐसे में धरती को बचाने की नसीहतों की जगह सरकारी दफ्तरों की कचरे की टोकरी के अलावा कुछ नहीं रहेगी। फिर भी लोगों को बोलने की अपनी जिम्मेदारी जारी रखनी चाहिए। ये पहाड़ी इलाके इंसानों का, आवाजाही का, बांधों का इतना बोझ ढोने के हिसाब से बने हुए नहीं हैं, और यहां की धरती अपने जंगलों के बिना हिफाजत से नहीं रह सकती। इन बातों को देखते हुए ऐसे पहाड़ी इलाकों की संभावनाओं की सीमाओं पर गौर करना जरूरी है।




