कागजों का शौक अधिक किसे? सरकार या दीमक

  हिन्दुस्तान में कोरोना वैक्सीन लगाने का काम रफ्तार से चल रहा है। अलग-अलग राज्यों में रफ्तार कुछ कम या अधिक हो सकती है, लेकिन कुल मिलाकर करोड़ों लोगों को वैक्सीन लग चुकी है, और अधिक नाजुक या अधिक खतरे में जी रहे तबके इसे पहले पा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी लोग वैक्सीन का इंजेक्शन लगवाते हुए अपनी तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं, जिनमें से कुछ का मतलब प्रसार हो सकता है, लेकिन कुछ का मकसद यह भी है कि वैक्सीन को लेकर जिन लोगों के मन में दहशत है वह दूर हो, और भरोसा कायम हो। 

छत्तीसगढ़ सहित दूसरे बहुत से राज्यों के वैक्सीन लगाने  के इंतजाम देखें तो उनमें एक बुनियादी चूक दिखाई पड़ रही है। अभी भी यह काम कागजों पर किया जा रहा है, एक ही जानकारी को अलग-अलग तीन-चार टेबिलों पर बताना पड़ रहा है, वक्त भी बर्बाद हो रहा है, और लोगों के लाए हुए कागज कम से कम तीन-चार कर्मचारी छू रहे हैं जिससे सभी लोगों पर खतरा बढ़ रहा है। एक तरफ तो हिन्दुस्तान डिजिटल कामकाज का दावा कर रहा है, अधिकतर राज्यों में काफी कुछ कामों में कम्प्यूटर का इस्तेमाल बढ़ा भी है, लेकिन जनता का सरकारी कामकाज से यह वास्ता कम्प्यूटरों पर एक अलग भरोसा पैदा कर सकता था, जो कि वह नहीं कर पाया। लोगों को वैक्सीन पर भरोसा हो गया, उसे लगाने की महीन सुई पर भरोसा हो गया, लेकिन लोग यह नहीं देख पाए कि कम्प्यूटर काम को आसान कैसे करता है। बहुत ही मामूली और गली-गली में उपलब्ध कम्प्यूटरों को तार से एक-दूसरे से जोड़ देने वाली लेन प्रणाली से टीकाकरण के पूरे इंतजाम को कागजमुक्त किया जा सकता था, लेकिन ऐसा किया नहीं गया। दरअसल जब वैक्सीन पाने और लगाने को ही बहुत बड़ी उपलब्धि मान लिया गया है, तो फिर उसे कागजमुक्त बनाकर भला और कौन सी कामयाबी पाई जा सकती थी? 

लेकिन टीकाकरण जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम आम लोगों के मन में सरकार के कम्प्यूटरीकृत इंतजाम के बारे में एक भरोसा पैदा हो सकता था, खासकर टीकाकरण के शुरुआती दौर में इस उम्र के आम लोगों को टीके लग रहे हैं, उन लोगों ने कम्प्यूटरों को अधिक देखा हुआ नहीं है। सरकार डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने की बात करती है, दावा करती है, लेकिन टीका लगाने जाने वाले को कई बार अपना नाम, पता, मोबाइल नंबर बताना पड़ रहा है, हर टेबिल पर बार-बार उसी जानकारी को दर्ज किया जा रहा है, टीकाकरण की क्षमता भी बर्बाद हो रही है, और एक-एक कागज को कई लोगों के छूने से संक्रमण का एक खतरा भी बढ़ रहा है। ऐसा भी नहीं है कि राज्य सरकारों ने इंतजाम में खर्च नहीं किया है, खर्च भी किया है लेकिन चार कम्प्यूटरों को आपस में जोडक़र पूरे काम को कागजमुक्त करने की कल्पना नहीं दिखाई है। 

अब समय आ गया है कि सरकार को गैरजरूरी कागजी कार्रवाई का बोझ जनता पर से खत्म करना चाहिए। टीकाकरण से परे एक दूसरा मामला सरकारी कामकाज में गैरजरूरी कागजी कार्रवाई का है। आज लोग किसी भी सरकारी दफ्तर में मामूली सा काम लेकर जाते हैं तो उनसे ऐसे ढेर सारे कागज मांगे जाते हैं जो कि उस दफ्तर में पहले से जमा हैं। विश्वविद्यालय में नए इम्तिहान या दाखिले के लिए अर्जी लगाने पर उसी विश्वविद्यालय के पुराने नतीजों को मांगा जाता है। छोटे से छोटा सरकारी दफ्तर कागजों का अधिक से अधिक कचरा इक_ा करना चाहता है, मानो फोटोकॉपी की दुकानें उनके घरवाले चला रहे हों। दूसरी तरफ अमरीका जैसे विकसित और सभ्य सरकारों वाले देशों का यह हाल है कि वहां किसी भी सरकारी फॉर्म में मांगी जाने वाली हर जानकारी के बारे में यह तौला जाता है कि क्या उसे मांगना जरूरी है? हर सरकारी फॉर्म पर यह लिखना जरूरी होता है कि उसे भरने में करीब कितने मिनट लगेंगे? आज छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में बिजली का कोई मौजूदा ग्राहक घर पर एक एसी लगाने पर अगर खुद होकर स्वीकृत बिजली लोड को बढ़ाने की अर्जी दे, तो उससे वे सारे के सारे कागज फिर से मांगे जाते हैं जो उसने बिजली का कनेक्शन लेते हुए जमा किए थे। इससे ग्राहक के ऊपर कागजों को जुटाने का अंधाधुंध बोझ बढ़ता है, और खुद बिजली विभाग उन कागजों को दुबारा लेकर क्या कर लेगा जिनके आधार पर उसने पहला कनेक्शन दिया था? 

कागजों को लेकर सरकारी व्यवस्था का मोह हैरान करता है। जब कभी पुराने कागजों के ग_े दीमकों के खाए हुए दिखते हैं, तब यह समझ नहीं आता कि इनका अधिक बड़ा शौक दीमक को है, या सरकार को? सरकारी दफ्तरों में जाकर देखें तो ऐसे गैरजरूरी मंगाए गए लोगों के दस्तावेज धूल खाते, पानी में भीगते, दीमक का इंतजार करते फर्श से छत तक भरे रहते हैं। इसके बावजूद सरकार अपनी आदत को सुधारना नहीं चाहती। आज टीकाकरण में कागजों के गैरजरूरी बेजा इस्तेमाल को देखते हुए इस पर लिखना सूझा, तो सरकारी दफ्तरों में कागजों का आम बेजा इस्तेमाल भी सूझ गया।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 12 मार्च 2021


 

दुश्मन के लिए भी इस किस्म का हास्य-व्यंग्य वाला बर्दाश्त कैसे हो!

 खबरों की दुनिया में कभी सूखा नहीं रहता। दुनिया के किसी हिस्से में बाढ़ आई हुई रहती है, तो किसी दूसरे हिस्से में बर्फ इतनी जमती है कि बड़े-बड़े अमरीकी शहरों में पूरी कार पट जाती है। कहीं चुनाव चलते रहता है, तो कहीं जंग, कहीं हिंसा होती है, तो कहीं पर छोटी बच्चियां पढऩे के हक के लिए या पर्यावरण को बचाने के लिए बड़ी शहादत देते दिखती हैं। हिन्दुस्तान जैसा विविधताओं से भरा हुआ देश तो बारहमासी खबरदार रहता है, यानी खबरों से लबालब। ऐसे में चीन से एक बड़ी दिलचस्प खबर आई है।

चीन में बुद्ध की बहुत किस्म की प्रतिमाएं प्रचलन में हैं। इनमें से कुछ प्रतिमाओं के साथ कई किस्म के टोने-टोटके भी जुड़े रहते हैं। एक बहुत मोटे पेट वाले बड़े हॅंसते हुए बुजुर्ग की एक प्रतिमा लाफिंग बुद्धा नाम से जानी जाती है जिसके बारे में यह टोटका भी रहता है कि उसे अपने पैसों से नहीं खरीदा जाता, कोई दूसरा तोहफे में दे तो ही उस प्रतिमा को रखा जाता है। चीन के एक किस्म के वास्तुशास्त्र के मुताबिक इस प्रतिमा को किसी खास जगह या कोने पर रखकर उससे शुभ होने की उम्मीद भी की जाती है। ऐसे चीन में कल से एक नई प्रतिमा की खबर आई है जिसमें बुद्ध की मुद्रा में पिछले अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप बैठे दिख रहे हैं। वे अपने मिजाज के खिलाफ एक अभूतपूर्व शांत मुद्रा में दिख रहे हैं जो कि नामुमकिन किस्म की बात है, और उनकी ऐसी ही मुद्रा की वजह से यह प्रतिमा वहां दनादन बिक रही है। अब यह भी बुद्ध धर्म की एक उदारता है कि इस प्रतिमा को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला नहीं माना जा रहा है, और चीनी लोग ट्रंप के तमाम चीन-विरोध के बावजूद इस प्रतिमा को खरीद रहे हैं। खरीदने के पीछे लोगों का कहना है कि वे महज दिल्लगी के लिए इसे खरीद रहे हैं क्योंकि ट्रंप कभी शांत दिखता नहीं था, और इस प्रतिमा में वह शांत दिख रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि वे मजाक के तौर पर इस प्रतिमा को रखने वाले हैं ताकि यह याद पड़ता रहे कि इंसानों को कैसा नहीं बनना चाहिए। 

किसी ने ऐसी कल्पना की होती कि चीनी एक वक्त इतनी रफ्तार से ट्रंप की प्रतिमा खरीदेंगे, तो हो सकता है कि लोग उस पर हॅंसे होते। लेकिन आज तो ऐसा हो रहा है, और अमरीका का रूख चीन के लिए नए राष्ट्रपति के तहत भी कोई बहुत नर्म नहीं हुआ है। यह बात बताती है कि लोग प्रतीकों का तरह-तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं। ट्रंप जैसे बदनाम और बेइंसाफ तानाशाह किस्म के आदमी को भी शांत बनाकर हास्य के रूप में या व्यंग्य के रूप में, सबक या सावधानी के रूप में सामने रखा जा सकता है। लोग खुले मन से, अपनी नफरत को परे रखकर ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। और फिर यह भी याद रखने की जरूरत है कि यह चीन, फ्रांस की किसी पत्रिका की तरह, या योरप के दूसरे हिस्सों के मीडिया की तरह का अतिउदारवादी देश नहीं है, और वह वामपंथी विचारधारा के तहत चलने वाला, एक बहुत ही तंगदिल सरकार के तहत काम करने वाला देश है जहां पर राजनीतिक हॅंसी-मजाक की अधिक संभावना नहीं दिखती है। ऐसे देश में जब ट्रंप की प्रतिमा की शक्ल में यह नया हास्य-व्यंग्य चल रहा है, तो चीनी सरकार और चीनी जनता के इस बर्दाश्त पर गौर भी किया जाना चाहिए। साथ ही दुनिया भर में जहां-जहां धार्मिक भावनाओं के आहत होने की तोहमत लगाकर बड़े पैमाने पर हिंसा को जायज ठहराया जाता है, उन लोगों को भी यह सीखने की जरूरत है कि धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल सामाजिक हास्य-व्यंग्य के लिए भी किया जा सकता है, और किया जा रहा है। जिस चीन में मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय को अमानवीय हालात में रखकर उस नस्ल को खत्म करने की हर कोशिश हो रही है, उस चीन में यह नया सामाजिक कारोबारी-प्रयोग देखने लायक है क्योंकि चीन एक बौद्ध-बहुल देश है, और धर्म वहां योरप के कुछ देशों की तरह महत्वहीन नहीं हो गया है, वहां धर्म की अभी खासी भूमिका है। ट्रंप की इस प्रतिमा के, बुद्ध की तरह शांत बैठे हुए किरदार के सामाजिक इस्तेमाल के मायने सोचने की जरूरत है, हो सकता है दुनिया के दूसरे कट्टर और धर्मान्ध देश इससे कुछ सीख पाएं।

नेताओं की प्रतिमा की ही बात करें, तो योरप के बहुत से देशों में वहां के मौजूदा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, या चांसलर जैसे लोगों के मखौल उड़ाते हुए बड़े-बड़े बुत बनाए जाते हैं, और उन्हें झांकी की तरह सडक़ों पर निकाला जाता है। खुद अमरीका में ट्रंप के राष्ट्रपति रहते हुए ट्रंप के ऐसे गुब्बारेनुमा पुतले बनाए जाते थे जिन्हें सडक़ों से निकालते हुए लोग पीछे दौडक़र जाते थे, और उसे लात मारकर आते थे। पश्चिम की एक अलग उदार संस्कृति है जिसमें लोगों को दूसरों के अपमान करने की पूरी छूट है, और लोग उसका इस्तेमाल भी खुलकर करते हैं, और ऐसा किसी ने नहीं सुना कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के पुतले को लात मारने वाले की गाड़ी का पुलिस ने चालान भी कर दिया हो। लेकिन चीन का हाल पश्चिम से बिल्कुल अलग है, वहां पर इस किस्म की प्रतिमा एक अलग मिजाज है, और अगर लोग उसे खरीदकर इसलिए सजाने वाले हैं कि उन्हें यह याद रहे कि उन्हें कैसा नहीं बनना है, तो यह एक नियंत्रित देश की फौलादी जकड़ के बीच व्यंग्य की एक नई अभिव्यक्ति है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 11 मार्च 2021


 

...क्या सचमुच ही यह लोकतंत्र गौरवशाली है?

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी पर कल उन्हीं के राज में हमला हुआ और टूटे हुए पैर के साथ वे अस्पताल में हैं। भाजपा तो भाजपा, कांग्रेस भी इसे नौटंकी कह रही है क्योंकि इस चुनाव में भाजपा अपने आपमें एक खेमा है, और दूसरी तरफ कांग्रेस वामपंथियों के साथ मिलकर यह चुनाव लड़ रही है जिन्हें ममता बैनर्जी ने तीन दशक के राज के बाद बेदखल किया था। इसलिए इन सबका हक बनता है कि ममता बैनर्जी की अस्पताल की तस्वीरों को नौटंकी कहें। हम तब तक इस हमले की असलियत पर कुछ कहना नहीं चाहते जब तक कि ममता के विरोधी ऐसे सुबूत न रखें कि यह हमला उनका अपना करवाया हुआ था, और यह नौटंकी है। सार्वजनिक जीवन में जब तक किसी को बेईमान साबित न किया जाए, तब तक उसे ईमानदार मानने को ही हम ठीक समझते हैं। लेकिन यह हमला तो कैमरों से, अफसरों और आसपास के लोगों के बयानों से सच्चा या झूठा साबित हो जाएगा, इसके बाद से ममता बैनर्जी पर सोशल मीडिया में जिस दर्जे के हमले हो रहे हैं, वे बहुत हक्का-बक्का तो नहीं करते हैं, लेकिन यह सोचने पर मजबूर जरूर करते हैं कि जिन पार्टियों और जिन नेताओं के समर्थक और प्रशंसक ऐसे अश्लील और हिंसक पोस्ट कर रहे हैं, क्या उनके लिए उन पार्टियों के नेताओं के पास कहने को कुछ है? अभी दो दिन पहले ही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर इन तमाम नेताओं ने बड़ी-बड़ी बातें कही थीं, महिलाओं के सम्मान की बड़ी-बड़ी बात की थी, लेकिन दो दिन के भीतर एक महिला के खिलाफ, उसके चाल-चलन के खिलाफ, उसके महिला होने पर जिस तरह की अश्लील गालियां दी जा रही हैं, वे आज के इस भयानक गंदे माहौल में भी हैरान करती हैं। 

सोशल मीडिया पर ममता बैनर्जी को रंडी लिखते हुए, उनके शरीर के कुछ चुनिंदा हिस्सों का जिक्र करते हुए जिस जगह उनके नाम गालियां दी जा रही हैं, अश्लील फोटो चिपकाई जा रही है, सेक्स की कुछ हरकतें उन्हें सुझाई जा रही हैं, उसी जगह पर उसी तस्वीर के साथ जयश्रीराम की तस्वीरें भी लगी हुई हैं। सोशल मीडिया पर अभी चार दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कोलकाता की आमसभा के दिन सैकड़ों लोगों ने एक ही ट्वीट को अपने नाम से अपने पर हुए तृणमूल-गुंडों के हमले की बात कहते हुए बार-बार दुहराया था। लोग हैरान हुए थे कि ये सैकड़ों लोग सारे के सारे हावड़ा के रहने वाले, सारे के सारे अपने पिता के साथ मोदी की सभा में जा रहे थे, और सारे के सारे लोगों पर तृणमूल के गुंडों ने हमला किया था, और सारे के सारे लोगों को सिर पर तीन-चार टांके आए थे, और सारे के सारे लोगों ने बिना एक पूर्णविराम या अल्पविराम के फर्क के एक सा ट्वीट किया था। कल ममता बैनर्जी पर हुए हमले के बाद से ममता बैनर्जी के चरित्र, ममता बैनर्जी के शरीर को लेकर, उन्हें तरह-तरह वीभत्स सेक्स सुझाते हुए जो बातें सोशल मीडिया पर लिखी जा रही हैं, वे बातें इन रामभक्तों के भगवान को पता नहीं कैसे बर्दाश्त होंगी, इनके नेताओं को तो बर्दाश्त हो ही रही हैं ऐसा दिखता है।

 कई बार हमें लगता है कि सोशल मीडिया ने संगठित मीडिया में उपेक्षित लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी को एक अधिकार दिया है। संगठित मीडिया और नेताओं को भी सोशल मीडिया में लिखी बातों पर गौर करना पड़ता है। लेकिन जब हजारों लोग मानो भाड़े पर काम करते हुए किसी एक व्यक्ति के चाल-चलन पर ऐसे हमले करने को छोड़ दिए जाते हैं, तो मन में यह शक पैदा होता है कि हिन्दुस्तान जैसे बेअसर लोकतंत्र में क्या सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की यह कानूनविरोधी आजादी सचमुच ही अभिव्यक्ति की आजादी है? क्या यह सचमुच ही लोकतांत्रिक है? या यह लोगों के जीने के अधिकार के खिलाफ एक हिंसक हमला है जिस पर किसी भी लोकतांत्रिक देश को जमकर कार्रवाई करनी चाहिए थी? ममता बैनर्जी हों, या कोई अभिनेत्री हो, या नफरतजीवियों को नापसंद कोई महिला पत्रकार हो, किसी भी महिला के खिलाफ किसी एक हमलावर की दमित यौन-कुंठाएं अगर इस तरह बाहर निकलतीं तो भी समझ आता, लेकिन जब ट्रोल-आर्मी कही जाने वाली हजारों लोगों की यह फौज किसी एक के चाल-चलन, उसकी देह, सेक्स की उसकी काल्पनिक जरूरतों को लेकर उसे घेरकर पत्थर मार-मारकर मार डालने पर उतारू हो जाती है, तो यह भी सोचने की मजबूरी आ खड़ी होती है कि इस फौज के सेनापति कौन हैं, यह फौज आखिर किसके हाथ मजबूत करने के लिए तैनात की गई है? इस फौज का चाल-चलन किस धर्म और किस राष्ट्रवाद की संस्कृति के मुताबिक जायज है? जो लोग एक ही सांस में जयश्रीराम कहते हुए अगली ही सांस में औरत के कुछ अंगों और अपने कुछ अंगों का रिश्ता जोडऩे पर उतारू हो जाते हैं, वे अपने धर्म और अपनी संस्कृति का कितना सम्मान बढ़ाते हैं? और इस देश का जो कानून एक-एक ट्वीट को देशद्रोही करार देते हुए बेकसूरों को बरसों तक कैद रखने के लिए बदनाम हैं, वह कानून जब ऐसे भयानक जुर्म करने वालों को अनदेखा करके मजा पाते दिखता है, तो इस लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं पर से भरोसा उठने लगता है। हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट जो कि प्रशांत भूषण की एक ट्वीट पर हफ्तों-महीनों तक सुनवाई करके उसे अपनी अवमानना मानकर सजा सुना सकता है, उस सुप्रीम कोर्ट को इस देश की बेकसूर महिलाओं पर छोड़ दी गई ऐसी बलात्कारी-हत्यारी फौज को अनदेखा करने में मजा आता दिखता है। जब सुप्रीम कोर्ट सोशल मीडिया पर अपने बारे में कही एक-एक बात को लेकर इस हद तक संवेदनशील है, तो इस देश की महिलाओं पर हो रहे ऐसे संगठित सेक्स-हमलों पर उसे कुछ भी करना जरूरी नहीं लगता? इस सुप्रीम कोर्ट ने आज तक ऐसी एक कमेटी बनाना भी जरूरी नहीं समझा जो सेक्स की धमकियां देने वाले ऐसे सोशल मीडिया अकाऊंट्स के पीछे की ताकतों को जेल भेजने का इंतजाम कर सके। सुप्रीम कोर्ट, संसद, सरकार, चुनाव आयोग, ये तमाम संवैधानिक संस्थाएं इस लोकतंत्र के भीतर ऐसे अलोकतांत्रिक, हिंसक और अश्लील हमलों को अनदेखा करने का मजा ले रहे हैं। हो सकता है कि इन संस्थाओं में बैठे कई लोगों को ममता बैनर्जी सरीखी नापसंद महिलाओं के अंगों के साथ किस्म-किस्म के सेक्स की बातें पढऩे में मजा भी आ रहा हो। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के लिए, हिन्दू धर्म के लिए, और तथाकथित गौरवशाली भारतीय संस्कृति के ठेकेदारों के लिए यह शर्म से डूब मरने की बात है कि  आधुनिक टेक्नालॉजी का मुहैया कराया गया एक औजार इस तरह हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, और इसे रोकने में किसी की दिलचस्पी नहीं है। अगर बंगाल के इस चुनाव को ही लें, तो झूठे ट्वीट करने वाले, ममता बैनर्जी के खिलाफ सेक्स और हिंसा की सबसे गंदी बातें लिखने वाले दसियों हजार लोग अब तक गिरफ्तार हो जाने थे, दसियों हजार कम्प्यूटर और स्मार्टफोन जब्त हो जाने थे, लेकिन देश में ऐसी ताकतें हैं जो अपने को नापसंद इंसानों को जिंदा रहने का बुनियादी हक भी देना नहीं चाहतीं। क्या सचमुच ही यह लोकतंत्र गौरवशाली है? 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 10 मार्च


 

इस देश के कानून को है बस अपने हमसफर लोगों की सेहत की फिक्र...

 दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज कोलकाता से मुसाफिर विमान में दिल्ली आ रहे थे, और उन्हें मास्क ठीक से न लगाने वाले मुसाफिर दिखते ही रहे। अदालत में लौटने के बाद उन्होंने विमान कंपनियों और केंद्र सरकार को आदेश जारी किया है कि जो मुसाफिर मास्क ठीक से न लगाएं, उन्हें विमान से उतार दिया जाए, या चढऩे ही न दिया जाए। यह कार्रवाई एकदम मुनासिब है, लेकिन सवाल यह है कि गिने-चुने लोग हवाई सफर करते हैं, और 99 फीसदी से अधिक जनता ट्रेन, बस, या ऑटोरिक्शा में चलती है, और वहां तक दूसरे मुसाफिरों पर उसका कोई बस नहीं चलता। चारों तरफ भयानक दर्जे की लापरवाही दिख रही है, और जनता के हित में कोई ऐसी तरकीब निकलनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जजों को आम बसों में या ट्रेन-ऑटो में सफर करवाया जाए ताकि गरीब और आम जनता की हिफाजत के लिए भी कोई आदेश जारी हो सके। 

पता नहीं क्यों सफाई और सुरक्षा जैसी बुनियादी बातों पर भी पैसेवाले हवाई मुसाफिरों का हक माना जाता है और आम लोग मानो इसका हक ही नहीं रखते। आज भारत के बहुत से राज्यों में कोरोना पॉजिटिव बढ़ते चल रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ बड़ी-बड़ी राजनीतिक और चुनावी आमसभाएं हो रही हैं, लोगों को बसों और ट्रकों में बिना किसी सावधानी ढोया जा रहा है, भारी धक्का-मुक्की चल रही है, लेकिन मानो गरीब और आम जनता को कोरोना से कोई खतरा ही नहीं है, उसे जैसे चाहें वैसे झोंका जा सकता है। दरअसल बिना किसी दर्ज मुकदमे के खुद होकर हुक्म देने का हक महज हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को होता है जो कि हवाई सफर ही करते हैं, और सडक़ों पर भी चलते हैं तो सायरन वाली गाडिय़ों के काफिले में चलते हैं। इसलिए जिस तरह संसद और विधानसभाओं में लबालब लद गए करोड़पति जनप्रतिनिधि देश की गरीबी से अछूते हो चुके हंै, कमोबेश बड़ी अदालतों के जज भी उसी तरह आम जनता की तकलीफों से रूबरू नहीं रह गए हैं।

आज हिंदुस्तान में तमाम तबकों के बीच कोरोना से बचाव को लेकर परले दर्जे की लापरवाही चल रही है। लोग यह मान बैठे हैं कि टीका लगना शुरू होते ही मानो कोरोना चल बसा है। जबकि हकीकत यह है कि बचाव के टीकों की दोनों खुराक लग जाने के एक पखवाड़े बाद इनमें से करीब तीन चौथाई लोग कोरोना से बचाव की प्रतिरोधक क्षमता पा सकते हैं। देश की आबादी को कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पाने में एक पूरा बरस लग सकता है। जिस रफ्तार से टीका आया है उससे सौ गुना रफ्तार से लापरवाही आई है, और इसीलिए कई प्रदेशों में कोरोना के आंकड़े बढ़ते दिख रहे हैं। देश का चुनाव आयोग एक तरफ तो कड़े से कड़े नियम थोपने के लिए कुख्यात है, लेकिन कोरोना के बीच आम सभाओं को लेकर उसने अपनी आंखें बंद कर ली हैं, और यह मान लिया है कि नेताओं को सुनने पहुंचने वाले आम लोग मरने के ही लायक हैं। आम सभाओं की भीड़ देखें तो यह समझ नहीं पड़ता है कि एक-एक भाषण के बाद नेता कितने लाख लोगों को संक्रमण के खतरे में डालकर जाते हैं। अभी खासकर जिस बंगाल की बड़ी-बड़ी आमसभाओं के नजारे टीवी पर दिख रहे हैं, उन्हें देखकर किसी अदालत के जज ने, या चुनाव आयोग ने कुछ नहीं कहा है क्योंकि जज और आयोग के सदस्य कभी ऐसी भीड़ में नहीं जाते, हां वे हवाई सफर जरूर करते हैं जिसे लेकर वे बड़े फिक्रमंद हैं।

अब सवाल यह है कि गरीबों की फिक्र कौन करेंगे? देश के कानून को तो ऐसी फिक्र दिख नहीं रही है, और बड़े-बड़े जज बस अपने हमसफर संपन्न तबकों को महफूज रखना चाहते हैं ताकि अपने ऊपर कोई खतरा न आए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 9 मार्च 2021


 

बाजारू खानपान के खतरों पर न सरकार चौकन्नी, न जनता...

 देश की सबसे बड़ी पर्यावरण-संस्था सीएसई ने कल एक रिपोर्ट प्रकाशित की है कि खाने-पीने के सामानों के डिब्बे-बोतल या पैकेट पर पोषक तत्वों की जानकारी के अलावा यह भी लिखा रहना चाहिए कि उनमें कौन सी चीजें नुकसानदेह हैं। यह रिपोर्ट 4 मार्च के विश्व मोटापा दिवस के मौके पर हुए एक ग्लोबल वेबिनार में विशेषज्ञों के बीच हुई चर्चा के बाद सामने आई है। इस वेबिनार में खाने-पीने के फालतू के सामान, जंकफूड, को लेकर भारत सरकार को एक विशेषज्ञ कमेटी द्वारा सात साल पहले दिए गए सुझावों पर भी चर्चा हुई जिस पर केन्द्र सरकारें सोई हुई हैं। बाजार में खाने-पीने के सामान पेश करने वाली कंपनियां तमाम नुकसानदेह जानकारी को छुपाना चाहती हैं, और वे सरकार के नियमों को प्रभावित करने के लिए काफी कुछ खर्च करने की स्थिति में भी रहती हैं। इस ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि आईसीएमआर के 2017 के आंकड़ों के मुताबिक देश में गैरसंक्रामक रोगों से मौतें 38 फीसदी थीं जो कि बढक़र 62 फीसदी हो गई हैं। आबादी में 17 फीसदी पुरूष और 14 फीसदी महिलाएं डायबिटीज के शिकार हैं। ऐसे में अगर खाने-पीने के बाजारू सामान अपने भीतर नमक और शक्कर, घी-तेल के खतरनाक स्तर को छुपाना जारी रखेंगे, तो हिन्दुस्तान एक टाईम बम के ऊपर बैठा हुआ साबित होगा। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि करीब डेढ़ बरस पहले इसी मुद्दे पर हमने उस वक्त की सीएसई की एक दूसरी रिपोर्ट पर लिखा था। हिन्दुस्तान में पैकेटबंद मीठा-नमकीन किस्म के सामान किस कदर सेहत के खिलाफ हैं। ऐसे सामानों में शक्कर, नमक, या कुछ रसायन इतने अधिक हैं कि उनसे सेहत को नुकसान पहुंचना तय है। बाजार में अधिक चलने वाले कई ब्रांड के अधिक चलने वाले सामानों का रासायनिक विश्लेषण करके सीएसई ने एक चार्ट भी प्रकाशित किया है कि किस-किसमें कितना फीसदी नुकसानदेह सामान मिला हुआ है। 

देश में खान-पान का हाल एक बहुत फिक्र की बात है। यह बात जरूर है कि यह अमरीका जैसे देश से बहुत बेहतर है क्योंकि वहां पर लगातार जंक कहे जाने वाले बहुत ही नुकसानदेह खानपान की वजह से आबादी का एक बड़ा हिस्सा इतने भारी मोटापे का शिकार हो चुका है कि वह एक किस्म का राष्ट्रीय खतरा माना जा रहा है। भारत में भी दिल्ली जैसे उत्तर भारतीय शहर में महंगे स्कूल-कॉलेज को देखें, महंगे बाजारों में घूमते लोगों को देखें, तो अंधाधुंध मोटे लोग सबसे नुकसानदेह चीजें खाते-पीते दिखते हैं। इस नौबत को सुधारने में लोगों की दिलचस्पी धीरे-धीरे इसलिए कम हो रही है कि उनकी खर्च की ताकत में हासिल महंगे इलाज पर उन्हें बहुत भरोसा है कि आखिर में जाकर बाईपास से सब ठीक हो जाएगा, खाओ-पिओ ऐश करो। देश में ऐसी सोच महज उसी पीढ़ी का नुकसान नहीं कर रही है, बल्कि वह इस पीढ़ी के डीएनए से आगे बढऩे वाली तमाम पीढिय़ों को दिक्कत वाले जींस देकर जा रही है। इसके साथ-साथ देश की सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं पर ऐसे लोग इतना अधिक बोझ डाल रहे हैं कि कम आय वाले लोगों को ऊंचा इलाज पाने की कतार में जगह ही नहीं मिल रही है। 

हम सेहत के बचाव और चुस्त-दुरूस्त रहने के बारे में हर बरस एक-दो बार लिखते हैं कि बीमारियों से बचाव ही एकमात्र इलाज है, और कोई तरीका नहीं है कि एक बार खो चुकी सेहत को दुबारा पाया जा सके। देश के जो सबसे महंगे अस्पताल लोगों को यह भरोसा हासिल कराते हैं कि उनके पास तमाम बड़ी बीमारियों का इलाज है, उनको भी मालूम है कि इलाज की उनकी सीमा है, मेडिकल साईंस की भी एक सीमा है, और बदन को पहुंचा हुआ हर नुकसान दूर नहीं किया जा सकता। ऐसे में केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को एक तरफ तो जनता को जागरूक करना चाहिए कि वे सेहत के लिए नुकसानदेह खान-पान से कैसे बचें। दूसरी तरफ उन्हें होटलों और बाकी खानपान के धंधों पर यह नियम भी लागू करना चाहिए कि वे हर सामान छोटी प्लेट में भी उपलब्ध कराएं ताकि लोगों को मजबूरी में अधिक खाना न पड़े, या प्लेट में जूठा न छोडऩा पड़े। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक फिट-इंडिया का नारा दिया है जो कि एक अच्छी जागरूकता हो सकता है अगर इसके साथ-साथ देश भर के शहरों में सैर के लिए बाग-बगीचे, और योग-ध्यान करने की जगह, उन्हें सीखने की सहूलियत उपलब्ध कराई जा सके। ये दोनों बातें मिलीजुली हैं, एक तरफ जागरूकता बढ़ाई जाए, सेहतमंद रहने की प्राकृतिक सहूलियत मुहैया कराई जाए, और दूसरी तरफ बाजार में खाने के लिए मजबूर लोगों को कम मात्रा में भी खरीदने की सुविधा रहे। छोटी प्लेट अनिवार्य करने की बात लंबे समय से चल रही है, लेकिन इस पर अमल हो नहीं पाया है। पता नहीं राज्य सरकारें अपने अधिकारों से अपने इलाकों में ऐसा कर सकती हैं या नहीं, लेकिन अगर ऐसे अधिकार हों तो जागरूक राज्यों को ऐसा करना ही चाहिए। फिर समाज के भीतर, परिवार के भीतर लोगों को तमाम डिब्बाबंद, पैकेट वाले, और टेलीफोन से ऑर्डर करके बुलाए जाने वाले खाने का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए। सबसे सेहतमंद खाना वह होता है जो घर पर बनता है, जिसमें घी-तेल का कम इस्तेमाल होता है, जिसमें चर्बी कम होती है, और जिसमें फल-सब्जी का अधिक से अधिक उपयोग होता है। इस जगह पर इससे ज्यादा खुलासे से चर्चा नहीं हो सकती, लेकिन लोगों को अस्पतालों से अधिक भरोसा अपनी जीवनशैली पर करना चाहिए कि अस्पतालों की नौबत ही न आए। यह जानकारी कोई परमाणु-रहस्य नहीं है, और कदम-कदम पर उपलब्ध है। जरूरत महज इतनी है कि अपनी जीभ पर काबू रखकर, उसे नाराज करके, बाकी बदन पर एहसान किया जाए। 

(Daily Chhattisgarh)