अदालतों से जीवंत प्रसारण शुरू करने का वक्त आ गया

  18 जुलाई 2021

 भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमणा ने यह राय जाहिर की है कि अब न्याय व्यवस्था को  जनता के लिए रहस्यमुक्त करने का वक़्त आ गया है, उन्होंने यह बात गुजरात उच्च न्यायालय में अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग, यानी इंटरनेट पर जीवंत प्रसारण, के मौके पर कही। गुजरात ने अपने हाई कोर्ट की कार्रवाई को लाइव दिखाने का काम शुरू किया है और देश के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी इस तरफ काम कर रहा है कि कैसे कम से कम कुछ अदालतों की कार्रवाई को लाइव दिखाया जा सके। न्यायाधीश ने कहा कि आजादी की पौन सदी बाद भी न्याय व्यवस्था को लेकर जनता के मन में अभी कई तरह की गलत धारणाएं हैं, इनको दूर करने की जरूरत है। लेकिन अदालती कार्यवाही के जीवन पर प्रसारण के साथ जुड़े हुए खतरे का भी उन्होंने जिक्र किया और कहा कि इससे कभी-कभी जज को सार्वजनिक जांच का दबाव महसूस हो सकता है जिससे एक तनावपूर्ण स्थिति हो सकती है। लेकिन जज को यह याद रखना चाहिए कि भले ही इंसाफ लोकप्रिय धारणा के खिलाफ हो, उसे संविधान के प्रति प्रतिबद्धता के साथ ऐसा करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने कहां कि एक जज को लोकप्रिय राय से प्रभावित नहीं किया जा सकता।

यह बात लंबे समय से हवा में चली आ रही थी कि अदालती कार्यवाही का जीवंत प्रसारण होना चाहिए, लेकिन लोगों को यह खतरा भी लगता था कि इससे जनता में होने वाली प्रतिक्रिया का अदालती फैसले पर क्या कोई असर होगा? लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि जब संसद की कार्यवाही का जीवंत प्रसारण शुरू हुआ उस वक्त भी यह बात लगती थी कि इससे सांसदों को अपने चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं को दिखाने के लिए कई बातें कहने को सूझेगा, लेकिन अब इतने बरस बाद भी आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी सांसद के भाषण को लेकर यह तोहमत लगी हो कि वह सदन के बाहर के लोगों को सुनाने के लिए यह बात बोल रहे थे, सदन के भीतर के लोगों के लिए नहीं। इसलिए जनता की नजरों के सामने किसी बात को लाने का यह मतलब कहीं नहीं होता कि वह जनता को लुभाने की कोशिश होने लगेगी। जब लोकसभा, राज्यसभा में, और राज्यों की विधानसभाओं में कार्रवाई का जीवंत प्रसारण होने लगा है, और उन सांसदों-विधायकों की बहसों का जीवंत प्रसारण होने लगा है जिन्हें जनता के बीच वोटों के लिए दोबारा जाना भी पड़ता है, तो ऐसे लोगों के मुकाबले जजों को भला कौन सी लुभावनी बात कहने की मजबूरी रहेगी? जजों को तो किसी चुनाव से आना नहीं रहता और न ही दोबारा किसी चुनाव में जाना रहता है। वह तो जितना चाहे उतना अलोकप्रिय फैसला भी दे सकते हैं। हिंदुस्तान की राजनीति में तो होता यह है कि सरकारें बहुत किस्म के कड़वे और लोकप्रिय फैसले खुद लेने के बजाय एक ऐसी स्थिति पैदा करती हैं कि ये फैसले अदालतों से निकलकर आएं, और सरकार केवल उन पर मजबूरी में अमल करती हुई दिखें। इसलिए हमें ऐसी कोई आशंका नहीं लगती कि जनता का कोई दबाव जजों के ऊपर रहेगा। और कुछ दबाव तो वैसे आज भी है जब अदालतों से जीवंत प्रसारण नहीं है तब भी अखबारों के रास्ते या टीवी की खबरों के रास्ते, मुकदमे के चलते हुए भी अधिकतर बातें जनता के बीच में आ ही जाती हैं। यह एक अलग बात रहती है कि मीडिया अपने पूर्वाग्रह या अपनी पसंद-नापसंद या अपनी किसी साजिश के तहत, चुनिंदा बातों को अदालत की पूरी कार्रवाई की शक्ल में सामने रखता है। जब प्रसारण होने लगेगा तो दिलचस्पी रखने वाले लोग अपनी पसंद के मामले के पूरी की पूरी बहस को देख लेंगे और उसे बेहतर समझ सकेंगे। अदालत में कार्यवाही कैसे होती है, कौन से वकील क्या कह रहे हैं, कौन से जज क्या कह रहे हैं, इन बातों को लेकर अदालत के बाहर एक रहस्य बने रहता है। बहुत से मामलों में तो यह होता है कि वादी-प्रतिवादी के वकील तैयारी से नहीं जाते और अगली तारीख ले लेते हैं, अगर ऐसा भी कुछ होगा तो लोग यह देख सकेंगे कि उनके वकील अदालत के भीतर कितनी मेहनत कर रहे हैं, या मुफ्त की फीस ले रहे हैं।

इस मौके पर हम यह भी कहना चाहेंगे कि बड़ी अदालतों में जजों की नियुक्ति जब होती है, तो उसके लिए भी एक संसदीय सुनवाई होनी चाहिए। हिंदुस्तान में यह बड़ी अजीब अदालती व्यवस्था बना दी गई है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ही सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के नाम तय करके केंद्र सरकार को भेजता है और वहां से कुछेक नामों पर आपत्ति के अलावा अधिकतर नाम ज्यों के त्यों मंजूर हो जाते हैं। केंद्र सरकार के हाथ में किसी अदालत के जज को हटाने के लिए संसद में महाभियोग लाने जैसा मुश्किल काम ही अकेला रास्ता बचता है। यह व्यवस्था वैसे भी देश में लंबे समय से आलोचना झेल रही है कि अदालत को इतनी अधिक शक्तियां अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए कि वही जज नियुक्त करे और उस जज को हटाना सरकारों के लिए एक बहुत कठिन पहाड़ी चढ़ाई की तरह रहे। हम कहीं से भी यह सुझाना नहीं चाह रहे हैं कि सरकार की दखल जजों की नियुक्ति में होनी चाहिए, लेकिन हम यह जरूर चाहते हैं कि संसद की एक भूमिका इसमें होनी। जिस तरह अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के पहले संसदीय समिति उनकी लंबी सुनवाई करती है और उसका जीवंत प्रसारण भी होता है, उन्हें संभावित जजों से 100 किस्म के सवाल किए जाते हैं, जिनमें उनकी निजी जिंदगी से जुड़े सवाल भी रहते हैं, और उनकी पसंद-नापसंद, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक विचारधारा के बारे में भी सवाल किए जाते हैं। हमारा मानना है कि हिंदुस्तान में भी कॉलेजियम के तय करने के पहले या कॉलेजियम के तय करने के बाद ऐसी एक संसदीय सुनवाई होनी चाहिए और जजों को सवालों की एक अग्निपरीक्षा से गुजरना चाहिए ताकि उनके पूर्वाग्रह, उनके संबंध पहले से उजागर हो सकें, और उसके बाद यह तय हो सके कि उन्हें जज बनाना ठीक रहेगा या नहीं। फिलहाल नए मुख्य न्यायाधीश अब तक तो कुछ ना कुछ सकारात्मक और सुधारात्मक बात कर रहे हैं उनके फैसले का आदेश भी किसी सरकारी विभाग के आदेश की तरह नहीं दिख रहे हैं, इसलिए उनका यह कहना जनभावना के अनुरूप ही है कि अदालती कार्यवाही के प्रसारण को अब शुरू कर देना ताकि लोग अदालत को किसी वकील की नजरों से देखने के बजाय खुद भी देख सकें।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 जुलाई 2021


 

नफरत और तानाशाही को तो आईना हमेशा ही गद्दार लगते आया है, इसमें नया कुछ नहीं

   17 जुलाई 2021

 एक अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी के लिए फोटोग्राफर की हैसियत से काम करने वाले एक हिंदुस्तानी नौजवान दानिश सिद्दीकी की मौत दिल हिला देने वाली है। वे पिछले कुछ वर्षों से लगातार कई देशों में मुश्किल हालातों के बीच जाकर संवेदनशील फोटोग्राफी करने के लिए मशहूर हो चुके थे, और उन्होंने कई देशों में तरह तरह के संकटों की फोटोग्राफी की थी। हाल ही में उनका नाम खबरों में जमकर आया था जब उन्होंने भारत के कई श्मशान घाटों पर कदम-कदम पर जल रही चिताओं की तस्वीरें लीं, और ड्रोन कैमरे से भी तस्वीरें लेकर श्मशान का हाल लोगों के सामने रखा। जिन लोगों को ऐसे हालात में भी किसी सरकार की आलोचना करना ठीक नहीं लगता है, उन लोगों ने इस फोटोग्राफर को ही कोसा था कि यह पूरी दुनिया में हिंदुस्तान को बदनाम करने का काम कर रहा है। इसमें कोई नई बात नहीं है, मीडिया पर ऐसी तोहमतें लगती ही रहती हैं, और जिस वक्त मीडिया केवल एक आईने की तरह लोगों के सामने खड़ा हो जाता है, और उन्हें सच का चेहरा दिखाने लगता है, तो भी अपना वैसा चेहरा देखने से दहशत में आने वाले लोग उस आईने को तोडऩे के लिए पत्थर चलाते ही हैं। इसलिए दानिश सिद्दीकी को सोशल मीडिया पर गद्दार कहा गया देश को बदनाम करने वाला कहा गया और अभी जब अफगानिस्तान में अफगानी फौजी और तालिबान लड़ाकों के बीच चल रहे संघर्ष की फोटोग्राफी करते हुए उनकी मौत हुई, इस पर हिंदुस्तान में नफरतजीवियों ने भारी खुशी जाहिर की। सोशल मीडिया पर जमकर उनके खिलाफ लिखा गया और माना गया कि एक देशद्रोही को, एक गद्दार को ऐसी ही मौत मिलनी चाहिए थी। एक अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी के लिए फोटोग्राफर की हैसियत से काम करने वाले एक हिंदुस्तानी नौजवान दानिश सिद्दीकी की मौत दिल हिला देने वाली है।

जिस देश में नफरतजीवी इतने मुखर होने के साथ-साथ गिनती में अधिक भी होने लगते हैं, उस देश में लोकतंत्र गड्ढे में जाने लगता है। किसी भी लोकतंत्र में सच को जानने और मानने वाले लोग गिनती में ज्यादा रहते हुए भी मुंह कम खोलते हैं, लेकिन जो लोग सच को जानकर भी झूठ को बढ़ावा देना चाहते हैं, ऐसे नफरतजीवी लोग खूब जमकर एक हो जाते हैं, और नफरत पूरी दुनिया में फेविकोल के मजबूत जोड़ से कहीं अधिक मजबूत जोड़ की तरह काम आता है। हिंदुस्तान में आज सरकार की आलोचना को नफरत का सामना करना पड़ रहा है, नफरत का शिकार होना पड़ रहा है। लोग लोकतंत्र की इस बुनियादी बात को भूल चुके हैं कि सरकार की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने कामों के लिए और अपनी नाकामी के लिए भी लोगों की आलोचना को झेले, उससे सबक ले, और अपने आप को बेहतर बनाएं। यह सिलसिला जहां टूटता है वहां पर सरकार और अधिक नाकाम होना शुरू हो जाती है। हिंदुस्तान में कुछ महीने पहले कोरोना से होने वाली मौतों से श्मशानों पर, और कब्रिस्तान पर बढऩे वाली भीड़ की तस्वीरें देखने के लिए बड़े हौसले की जरूरत थी। लेकिन इन तस्वीरों का सामने आना भी जरूरी था। जब तक आज के हालात की हकीकत लोगों की नजरों के सामने ना आए उन्हें अपने घरों में महफूज बैठे हुए कुछ भी खराब नहीं दिखता है, खुद का पेट भरा रहे तो मुल्क में भूख भी नहीं दिखती है, खुद के घर में जनरेटर से रोशनी होती रहे, तो मोहल्ले का पावरकट भी नहीं दिखता है। इसलिए मीडिया की तो यह जिम्मेदारी ही है कि चाहे कितना ही कड़ा और कड़वा दिखे, सच को लोगों के सामने रखना है, और दानिश सिद्दीकी ने यही काम किया था।

यह काम हिंदुस्तान में पहली बार नहीं हुआ, एमपी में कांग्रेस के राज में अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे और भोपाल गैस त्रासदी हुई तो पूरे देश के, और दुनिया के फोटोग्राफर भोपाल पहुंचे, और भोपाल की ऐतिहासिक तस्वीरें दर्ज की। वह तो पूरी त्रासदी ही सरकारी लापरवाही से उपजे भोपाल गैस कांड का नतीजा थी, और उस मौके पर सरकार की आलोचना कम नहीं हुई थी, लेकिन क्योंकि उस वक्त सोशल मीडिया नहीं था और सोशल मीडिया पर पेशेवर अंदाज में पीछा करने के लिए लोग छोड़े नहीं गए थे, इसलिए किसी ने भोपाल पहुंचे फोटोग्राफरों की कोई आलोचना नहीं की थी। इसके अलावा भी बहुत से ऐसे मौके थे, 1984 का सिख विरोधी दंगा था, 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराया गया था, और 2002 के गुजरात के मुस्लिम विरोधी दंगे थे, इन सबकी तस्वीरें सामने आई थीं, लेकिन उस वक्त सोशल मीडिया नहीं था, और लोगों के पीछे अपने भाड़े के लोगों को छोडऩे की सहूलियत नहीं थी। अब एक कामयाब और समर्पित पेशेवर प्रेस फोटोग्राफर की ऐसी मौत पर भी लोग जश्न मना रहे हैं और खुशियां मना रहे हैं, और उसकी जिंदगी को कोस रहे हैं। इससे दानिश सिद्दीकी के पत्रकारिता में योगदान को कोई चोट नहीं पहुंचाई जा सकती, लेकिन लोग इस बात का सबूत सामने जरूर रख रहे हैं कि वे इंसान की शक्ल में दिख जरूर रहे हैं, उनके भीतर हैवान पूरी तरह से काबिज है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 जुलाई 2021


 

देश में कोरोना की यात्रा के साथ-साथ कांवर यात्रा की खतरनाक छूट रद्द हो

  16 जुलाई 2021

 सुप्रीम कोर्ट ने आज उत्तर प्रदेश सरकार से यह कहा है कि राज्य शासन कांवर यात्रा को इजाजत देने के अपने फैसले पर आगे नहीं बढ़ सकता और सरकार अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करके सुप्रीम कोर्ट को सोमवार तक अपना रुख बताए, वरना अदालत इस मुद्दे पर अपना फैसला देगी। कुल मिलाकर अदालत का रुख ऐसा दिख रहा है कि वह कोरोना के खतरे के बीच कांवर यात्रा जैसे एक खतरनाक धार्मिक कार्यक्रम की छूट देने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले से पूरी तरह असहमत है और राज्य सरकार को एक मौका देना चाह रही है कि वह खुद होकर अपनी इजाजत को वापस ले ले, जैसा कि पड़ोसी राज्य उत्तराखंड ने किया है, या कि जैसा आज केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना रुख बताया है कि वह कांवर यात्रा को इजाजत देने के खिलाफ है। अदालत के जजों का रुख बड़ा साफ था, उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के वकील को कहा कि वह राज्य सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार का एक और मौका दे रही है, और इसके बाद वह सीधे आदेश पारित करेगी।

हिंदुस्तान एक बड़ा अजीब सा लोकतंत्र बन गया है जहां पर एक ही पार्टी के पीएम और सीएम का रुख कांवर यात्रा को लेकर एक दूसरे के खिलाफ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार अदालत को यह कहती है कि वह कांवर यात्रा को इजाजत के खिलाफ है, और अभी कल ही प्रधानमंत्री अपने जिस मुख्य मंत्री की तारीफ करते थक नहीं रहे थे उस मुख्यमंत्री का रुख इसके ठीक उलट है। हिंदुस्तान ने तरह-तरह की धार्मिक और राजनीतिक भीड़ के चलते हुए फैले हुए कोरोना के खतरे को भुगता है, सिर्फ देखा नहीं है भुगता है। यह वही उत्तर प्रदेश है जहां पर गंगा पर तैरती हुई लाशों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था और लोगों ने ऐसा भयानक नजारा कभी देखा नहीं था, यह कुछ महीने पहले की ही बात है। अब भारत सरकार के वैज्ञानिक, सरकार के अफसर, यह बार-बार कह रहे हैं कि कोरोना की तीसरी लहर का खतरा सामने हैं और लोगों को बहुत सावधान रहना चाहिए। प्रधानमंत्री के स्तर पर अभी यह कहा गया है कि देश के पर्यटन स्थलों पर लोगों की भीड़ से खतरा बढ़ते दिख रहा है और लोग इससे बचें। लेकिन कांवर यात्रा जो कि लोगों की भीड़ के चलने, उठने-बैठने, साथ नहाने-खाने का मौका रहता है, जहां लाखों हाथ एक ही जगह पर पानी लेते हैं, या एक ही जगह पर पानी डालते हैं, वैसे धार्मिक आयोजन को उत्तर प्रदेश रोकने के खिलाफ है। जबकि भाजपा के ही राज वाले बगल के उत्तराखंड ने अपने तजुर्बे के आधार पर यह फैसला लिया है कि वहां किसी कांवर यात्रा की इजाजत नहीं दी जाएगी। दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी खबर का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कहा कि वह इससे मिलने वाली जानकारी को लेकर परेशान हैं और भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार से इस बारे में अदालत ने हलफनामा माँगा।

धर्म को लेकर राजनीति का यह पूरा सिलसिला बहुत ही भयानक है। हिंदुस्तान के लोगों को याद होगा कि पिछले बरस जब मार्च के महीने में लॉक डाउन की नौबत आई थी और देश में कोरोना आते दिख रहा था, उस वक्त दिल्ली की तबलीगी जमात में इक_ा कुछ हजार मुस्लिमों के बारे में यह माना गया था कि वहां से कोरोना फैलना शुरू हुआ और देश भर में जहां-जहां इस जमात से लोग गए, वहां-वहां कोरोना गया। लेकिन अभी कुछ महीने पहले जब उत्तराखंड के हरिद्वार में कुंभ हुआ तो लाखों लोगों को वहां जुटने की इजाजत दी गई और शाही स्नान वाले दिन तो एक दिन में दसियों लाख लोग वहां पहुंचे। अब कुछ महीने बाद यह बात सामने आ रही है कि उस दौरान उस प्रदेश में कोरोना की जितनी जांच हुई थी, वह फर्जी थी, और बिना किसी सही जांच के सर्टिफिकेट बेचे गए थे। वहां से निकलकर लोग पूरे देश में अपने अपने गांव शहर लौटे थे और यह मालूम करने का कोई जरिया नहीं है कि कुंभ की उस भीड़ की वजह से कोरोना कितना फैला। 

आज जब हिंदुस्तान में लगाने के लिए टीके नहीं हैं, और कोरोना के नए नए वेरिएंट आते जा रहे हैं जिनके बारे में कहा जा रहा है कि उन पर मौजूदा टीकों का असर पता नहीं कितना है, ऐसे में सावधानी बरतने के बजाय चुनाव के पहले के इस साल में उत्तर प्रदेश के हिंदू मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिस तरह से कांवर यात्रा की इजाजत दे चुके हैं, वह एक बहुत ही अवैज्ञानिक फैसला है, और बहुत ही कमअक़्ली का फैसला भी है। चूँकि सुप्रीम कोर्ट 2 दिन बाद सोमवार को इस मामले में आदेश देने वाला है इसलिए आज हमारा अंदाज यही है कि सोमवार को इस कांवर यात्रा पर रोक लग जाएगी, और यह भी हो सकता है कि उत्तर प्रदेश सरकार हिंदू धर्मालु लोगों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए खुद होकर अपनी दी गई इजाजत को वापस ना ले, और इसे रद्द करने की तोहमत अदालत के जजों पर जाने दे। जो भी होता है, कांवर यात्रा की इजाजत देने का योगी सरकार का फैसला बहुत ही बेदिमाग था, और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पहले भी इस बात को हम दर्ज कर देना चाहते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 जुलाई 2021


 

मुश्किल हालातों में एक मिसाल, इससे लोग और समाज भी सीखें

  15 जुलाई 2021

 आज जब देश भर में चारों तरफ से महिलाओं पर जुल्म की खबरें आती हैं, छोटी-छोटी बच्चियों से सामूहिक बलात्कार की खबरों से अखबार पटे रहते हैं, सोशल मीडिया पर अफसोस जाहिर करते हुए लोग यह नहीं समझ पाते कि यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा, तो ऐसे में महिलाओं से जुड़ी हुई कोई भी अच्छी खबर मन को बहुत खुश करती है। राजस्थान के जोधपुर में सडक़ों पर सफाई करने वाली एक म्युनिसिपल कर्मचारी आशा कंडारा ने बिल्कुल ही विपरीत परिस्थितियों में पढ़ाई की, और राजस्थान प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में शामिल होकर उसके लिए कामयाबी पाई है। यह महिला अपने दो बच्चों के साथ पिछले 8 बरस से पति से अलग रह रही है और सडक़ों पर झाड़ू लगाकर अपना घर चलाती है। आशा कंडारा को अभी 12 दिन पहले ही म्युनिसिपल में सफाई कर्मी की पक्की नौकरी मिली थी, इसके पहले वह अस्थाई सफाई कर्मचारी थी, और साथ-साथ पढ़ भी रही थी। अब म्युनिसिपल में झाड़ू लगाने की नौकरी मिलते ही, एक पखवाड़े के भीतर ही उसे राजस्थान लोक सेवा आयोग की राजस्थान प्रशासनिक परीक्षा में कामयाबी मिली है।

ऐसे मामले कलेजे को एकदम ठंडा कर देते हैं। एक तरफ तो मध्य प्रदेश जैसे राज्य में पिछले कई बरस से व्यापम घोटाले का भूत हवा में टंगा ही हुआ है और उसके आरोपी बनते बनते रह गए एक राज्यपाल गुजर भी चुके हैं, उस मामले के जाने कितने ही गवाह बेमौत मारे गए हैं, कितने ही लोग गिरफ्तार हुए हैं, और दाखिलों में बेईमानी, सरकारी नौकरी पाने में बेईमानी का सिलसिला देशभर के अधिकतर राज्यों में चलते ही रहता है। ऐसे में एक गरीब और मेहनतकश महिला ने दो बच्चों के साथ जीते हुए ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी एक परीक्षा में कामयाबी पाई है, तो इससे देश के उन तमाम लोगों को नसीहत लेनी चाहिए जो मां-बाप की छाती पर मूंग दलते रहते हैं।

इससे एक बात यह भी सूझती है कि विपरीत पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों वाली एक महिला किस तरह अपने दमखम पर एक तैयारी कर सकती है, और अपने बच्चों के साथ घर चलाते हुए भी वह एक ऐसे मुकाबले में कामयाब होकर दिखाती है जिसकी कोचिंग के लिए लोग लाखों रुपए की फीस भी देते होंगे। इससे यह भी साबित होता है कि बिना कोचिंग के भी बहुत से लोग इस तरह कामयाब हो सकते हैं, और समाज में ऐसी संभावनाओं वाले लोगों को थोड़ा सा और बढ़ावा देने के लिए सरकार और समाज दोनों को सोचना भी चाहिए। एक बात जो इससे लगी यह भी सूझती है कि एक महिला अपनी आत्मनिर्भरता की वजह से पारिवारिक परिस्थितियों से बाहर निकल कर अपने बच्चों के साथ अकेले जीने का हौसला जुटा सकती है। और इसके लिए उसके पास कोई बड़ी नौकरी भी नहीं थी वह झाड़ू लगाने का सबसे ही तिरस्कृत समझा जाने वाला काम कर रही थी, लेकिन उतनी आत्मनिर्भरता भी बच्चों के साथ जिंदगी के लिए काफी थी, और जो कमी थी वह उसका हौसला पूरा कर रहा था। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी उसने इस मुकाबले की तैयारी की और कामयाबी पाई। यह कामयाबी तैयारी करने की सहूलियत वाले लोगों के आईएएस बनने के मुकाबले भी कहीं अधिक मायने रखती है क्योंकि यह बिल्कुल ही वंचित तबके और विपरीत परिस्थिति की कामयाबी है।

आज इस मुद्दे पर लिखते हुए दरअसल सूझ रहा है कि समाज को वंचित तबके को बराबर की संभावनाएं जुटाकर देने के लिए क्या-क्या करना चाहिए। अब यह महिला तो असाधारण रूप से प्रतिभाशाली और कामयाब दोनों ही निकली, लेकिन बहुत से और युवक-युवतियां रहते हैं जो तैयारी की कमी से बराबरी तक नहीं पहुंच पाते। जिस तरह बिहार में एक आनंद कुमार आईआईटी में दाखिले के लिए गरीब बच्चों को तैयारी करवाते हैं, वैसा काम देशभर में बहुत से लोग कर सकते हैं, और हम ऐसी पहल और ऐसी कोशिशों को सिर्फ दाखिला इम्तिहानों तक सीमित रखना नहीं चाहते, बल्कि कई तरह के ऐसे हुनर सिखाने के बारे में भी हम सोच रहे हैं जिनसे लोग अपने-अपने दायरे में ही तरक्की कर सकें। आज हिंदुस्तान में करोड़ों लोग घरेलू सहायक के रूप में काम करते हैं, लेकिन उनमें से अधिकतर ऐसे रहते हैं जो कि जो कि घरेलू कामकाज में भी बहुत सी चीजें नहीं जानते। ऐसे लोगों को दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का मौका दिलवाने के बाद अगर वहां उन्हें कामयाबी नहीं मिलती है तो उनके हुनर में कुछ खूबियां जोडऩे की कोशिश करनी चाहिए ताकि वे जहां हैं, वहां बेहतर काम कर सकें और बेहतर तनख्वाह पा सके। सरकार से कुछ तबके तो बढ़ावे की उम्मीद कर सकते हैं, जैसे कि कई राज्यों में दलित और आदिवासी बच्चों के लिए दाखिला परीक्षाओं के प्रशिक्षण केंद्र चलते हैं, लेकिन तमाम गरीब और जरूरतमंद बच्चों के लिए ऐसी मदद की गुंजाइश बाकी ही है, और समाज को इस बारे में सोचना चाहिए। सरकारों को यह भी सोचना चाहिए कि सरकारी स्कूल-कॉलेज का जो ढांचा शाम और रात के घंटों में खाली रहता है, छुट्टियों के दिनों में खाली रहता है, उसका इस्तेमाल ऐसी तैयारियों के लिए करने देना चाहिए और आसपास के कुछ उत्साही लोग पढ़ाने के लिए शिक्षक भी ढूंढ सकते हैं। राजस्थान की इस एक महिला ने संभावनाओं की एक नई राह दिखाई है, समाज की यह जिम्मेदारी है कि वह इसे आगे बढ़ाएं।

(Daily Chhattisgarh)


दीवारों पर लिक्खा है, 15 जुलाई 2021


 

सवाल प्रशांत किशोर की कामयाबी का नहीं है, सवाल इस लोकतंत्र की नाकामयाबी का है

 14 जुलाई 2021

 कई राज्यों में कांग्रेस के भीतर असंतोष की खबरों से अधिक अहमियत कांग्रेस की एक दूसरी खबर को मिल रही है कि किस तरह प्रशांत किशोर ने दिल्ली में सोनिया, राहुल, और प्रियंका, तीनों से मुलाकात की है. जिन लोगों से मिलने के लिए उनकी खुद की पार्टी के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को हफ्तों और महीनों लग जाते हैं, उन लोगों से प्रशांत किशोर जैसा एक बाहरी व्यक्ति आकर एक दिन में तीनों से मुलाकात कर लेता है, तो इसका खबर बनना जायज भी है। फिर यह खबर बनना जायज इस नाते भी है कि अभी-अभी प्रशांत किशोर ने अपनी पूरी साख दांव पर लगाकर ममता बनर्जी के चुनाव अभियान की जैसी तैयारी करवाई थी, और जिस अंदाज में ममता बनर्जी ने देश के दो सबसे बड़े और सबसे ताकतवर नेताओं, नरेंद्र मोदी और अमित शाह को शिकस्त दी, उस ऐतिहासिक लड़ाई के परदे के पीछे सेनापति प्रशांत किशोर ही थे। इसलिए अब जब कांग्रेस पार्टी अगले बरस उत्तर प्रदेश में और पंजाब में होने वाले चुनावों को लेकर एक बहुत नाजुक मोड़ पर पहुंच रही है, तो प्रशांत किशोर का इन लोगों से मिलना कई हिसाब से बहुत अहमियत का है। लेकिन इसके पहले कि दिल्ली की अटकलें यह सुझाएँ कि प्रशांत किशोर कांग्रेस के रणनीतिकार बनने जा रहे हैं, यह भी याद रखने की जरूरत है कि अभी-अभी, कुछ दिन पहले ही उन्होंने मुंबई में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार से भी मुलाकात की है, और कल शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने यह सार्वजनिक बयान दिया है कि मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में शरद पवार सबसे काबिल हैं। ममता बनर्जी ने जिस अंदाज में बंगाल में मोदी और शाह को निजी शिकस्त दी है उससे कई लोगों के मन में यह बात भी उठ रही है कि क्या ममता बनर्जी मोदी के मुकाबले किसी एक मोर्चे की बड़ी नेता या सर्वमान्य नेता हो सकती हैं? इसलिए प्रशांत किशोर की कांग्रेस के राज परिवार से यह मुलाकात सिर्फ कांग्रेस के रणनीतिकार बनने की संभावनाओं से जुड़ी हों, ऐसा जरूरी भी नहीं है, यह भी हो सकता है कि वे ममता के साथ रहने के बाद, ममता से बिना किसी कटुता के, अलग हुए बिना, शरद पवार से मिलने के बाद, अब कांग्रेस से मिल रहे हैं, और क्या वे मोदी के मुकाबले किसी एक गठबंधन की संभावनाओं को टटोल रहे हैं?

यहां पर प्रशांत किशोर के बारे में थोड़ी सी बात कर लेना ठीक होगा प्रशांत किशोर संयुक्त राष्ट्र संघ में काम करके लौटे हुए एक राजनीतिक और चुनावी रणनीतिकार हैं। उन्होंने मोदी के मुख्यमंत्री के दो कार्यकाल के बाद, तीसरे कार्यकाल के लिए उन्हें जिताने के लिए काम किया था, और उसके बाद उससे भी अधिक महत्वपूर्ण काम था 2014 के आम चुनाव में मोदी को प्रधानमंत्री तक पहुंचाने की रणनीति में हिस्सेदारी का। प्रशांत किशोर चुनावी रणनीति बनाने वाले एक कामयाब व्यक्ति माने जाते हैं जिन्होंने अब तक भाजपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, द्रमुक, और तृणमूल कांग्रेस, ऐसी तमाम पार्टियों के लिए काम किया है, और यह जाहिर है कि वह अपनी किसी राजनीतिक सोच के बिना एक पेशेवर की तरह पार्टी चलाने और चुनाव जीतने के लिए सलाहकार की तरह, रणनीतिकार की तरह, काम करते हैं। आज प्रशांत किशोर पर यहां लिखने का मकसद कांग्रेस पार्टी में उनके जुडऩे या कांग्रेस की संभावनाएं बढ़ाने तक सीमित नहीं है। हम यह भी लिख कर बात खत्म करना नहीं चाहते कि प्रशांत किशोर मोदी के मुकाबले एक विपक्षी गठबंधन खड़ा करने में मददगार हो सकते हैं, हो सकता है कि वह इसमें काबिल हों, और हो सकता है कि सच ही उनका ऐसा एजेंडा हो, लेकिन हम फिर भी यह कहना चाहेंगे कि जो सक्रिय राजनीति में हिस्सेदार नहीं है, और जो थोड़े से वक्त तक नीतीश कुमार की पार्टी का सदस्य जरूर रहा हो, लेकिन जिसकी अपनी कोई राजनीतिक सोच और फिलासफी नहीं दिखती है, क्या उसके हाथों में भारतीय लोकतंत्र की इतनी सारी चुनौतियां रहना जायज है?

हमारी फिक्र भारतीय लोकतंत्र को लेकर अलग है और वही सबसे ऊपर है, न तो कांग्रेस की हमें ज्यादा फिक्र है और न ही मोदी की। ममता का चुनाव निपट गया है और यूपी का चुनाव भी किसी की तैयारी से, और किसी की बिना तैयारी के भी, निपट ही जाएगा। उत्तर प्रदेश ने जितना कट्टरपंथी और जितना सांप्रदायिक राज अभी देख लिया है, अब इसके बाद और कुछ बहुत ज्यादा देखने को बचता नहीं है। लेकिन देखने को जो बचता है वह यह है कि एक गैरराजनीतिक चुनावी रणनीतिकार अगर एक पेशेवर की तरह भारतीय लोकतंत्र को इस तरह मोड़ सकता है, इस तरह उसे किसी तरफ झुका सकता है, तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या यह लोकतंत्र सचमुच ही इतनी इज्जत का सामान रह गया है? क्या हिंदुस्तानी चुनाव और आम चुनाव क्या सचमुच ही इतने महत्वपूर्ण और जनता की सोच के इतने बड़े प्रतिनिधि रह गए हैं कि उन्हें लोकतंत्र का एक फैसला मान लिया जाए? क्या यह अपने आप में भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति की एक घोर नाकामयाबी नहीं है कि बाहर से आए हुए पेशेवर लोग इस तरह, इस हद तक भारतीय लोकतंत्र को प्रभावित कर सकते हैं, और अपनी पसंद की, अपनी छांटी हुई पार्टी को जिता सकते हैं? यह सिलसिला कुछ अजीब है लेकिन लोगों को यह सोचना है कि जिस राजनीति में  हिंदुस्तान के नेताओं ने पौन-पौन सदी गुजार दी है, लेकिन वे अपने पूरे राजनीतिक जीवन के किसी भी मोड़ पर क्या सचमुच ही इतने प्रभावशाली रहे हैं जितना कि आज एक अकेले प्रशांत किशोर को मान लिया जा रहा है? और क्या देश की जनता के लिए देश के बड़े-बड़े नेताओं के मुकाबले प्रशांत किशोर की राय इतनी अधिक मायने रखती है कि उनके सुझाए नेता को या उनकी सुझाई पार्टी को लोग सत्ता पर बिठा दें?

यहां पर बात प्रशांत किशोर की खूबी की नहीं है, यहां पर बात भारतीय लोकतंत्र की खामी की है, क्या भारतीय लोकतंत्र अपने-आप में इतना कमजोर हो गया है कि वह बाहर से आए हुए किसी व्यक्ति की आंधी के झोंके में उसकी बताई दिशा में झुक जाता है? राजनीतिक दलों को यह सोचना चाहिए कि क्या वे सत्ता की लड़ाई लड़ते हुए जनता और जमीन से इस हद तक कट गए हैं कि राजनीति से परे रहने वाला एक व्यक्ति जनता के रुख को अधिक समझ रहा है, वह जनता के दिल को जीतने की अधिकतर की पहचान रहा है? अगर किसी पेशेवर की ऐसी खूबी से भारतीय लोकतंत्र की दशा और दिशा तय हो सकती है, तो भारतीय लोकतंत्र को अपने बारे में सोचना चाहिए। किशोर सौ बरस से चली आ रही पार्टियों और तीन-तीन पीढिय़ों से काम कर रहे नेता, और तमाम धार्मिक समर्थन पाकर मजबूत बनने वाले राजनीतिक दल, क्या इन सबसे ऊपर एक अकेला कोई व्यक्ति हो सकता है? तो अगर ऐसा एक व्यक्ति इतना ताकतवर हो सकता है, तो क्या उसकी मनमानी इस देश पर कोई गलत नेता भी थोप सकती है? क्या वह इस देश पर कोई सांप्रदायिक, भ्रष्ट, तानाशाह नेता भी थोप सकता है? हमारे पास प्रशांत किशोर के खिलाफ कुछ नहीं है, और ना ही उनके खिलाफ लिखने की नीयत है, लेकिन हमारे पास भारतीय लोकतंत्र के बाकी हिस्से से सवाल जरूर है कि प्रशांत किशोर नाम की एक शख्सियत को देखकर उन्हें अपने दल को, अपने आपको, और अपने पूरे राजनीतिक जीवन को तौलना जरूर चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 जुलाई 2021