यह ध्यानचंद का सम्मान हुआ है, या हथियार सरीखा इस्तेमाल?

  13 अगस्त 2021

  अभी जब देश के सबसे बड़े खेल सम्मान का नाम राजीव गांधी के नाम से हटाकर मेजर ध्यानचंद के नाम पर किया गया तो सोशल मीडिया पर मोदी के आलोचकों ने काफी कुछ लिखा। अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल खेल कांप्लेक्स में जिस स्टेडियम का नाम पटेल के नाम पर चले आ रहा था, उसे पिछले बरस नरेंद्र मोदी के नाम पर किया गया, उस समय भी यह बात जमकर उठी थी लेकिन अभी तो लोगों ने और अधिक तल्खी से याद किया और कहा कि अगर मेजर ध्यानचंद के नाम पर कुछ रखना ही था तो उस स्टेडियम का नाम मोदी ने अपने नाम पर क्यों रखवाया जहां उनकी खुद की पार्टी की सरकार है, जहां का क्रिकेट एसोसिएशन उनके अपने कब्जे में हैं, उसी स्टेडियम का नाम मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखवा दिया जाता। खैर, यह तो सरकार की अपनी मर्जी की बात होती है, लेकिन अब जब एक बार फिर ओलंपिक में भारतीय हॉकी खबरों में आई तो उस वक्त फिर मेजर ध्यानचंद का नाम चला। आधी सदी से यह मांग चली आ रही है कि मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिया जाए लेकिन इस मांग को किनारे रख दिया गया है। पिछले ही बरस की बात है, मेजर ध्यानचंद के जन्म की 115वीं सालगिरह थी और अनगिनत भूतपूर्व और मौजूदा हॉकी खिलाडिय़ों ने मिलकर यह मांग की थी कि उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न दिया जाए, लेकिन मोदी सरकार चुप रही उसने ऐसा नहीं किया। और तोहमत के लिए तो कांग्रेस है ही, कि उसने इतने समय में मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न क्यों नहीं दिया था?

अधिक पुरानी बात न करें और हाल के बरसों को देखें जब एक गैरकांग्रेसी इंद्र कुमार गुजराल साल भर के लिए प्रधानमंत्री बने थे और उन्होंने इस एक साल में बहुत से लोगों को  भारतरत्न दिया। इनमें गुलजारी लाल नंदा, अरूणा आसफ अली, एपीजे अब्दुल कलाम, एमएस सुब्बूलक्ष्मी, और चिदंबरम सुब्रमण्यम, इतने लोग थे। गुजराल के तुरंत बाद अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री बने जो पूरी तरह से भाजपा के थे, और एनडीए सरकार के मुखिया थे, उन्होंने अपने कार्यकाल में जयप्रकाश नारायण, अमर्त्य सेन, गोपीनाथ बोर्दोलोई, रवि शंकर, लता मंगेशकर, और  बिस्मिल्लाह खान को भारत रत्न से सम्मानित किया। इसके बाद एनडीए की दूसरी सरकार बनी, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और इस कार्यकाल में मदन मोहन मालवीय, अटल बिहारी वाजपेई, प्रणब मुखर्जी, भूपेन हजारिका, और नानाजी देशमुख को भारत रत्न दिया गया। मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल भी आ गया, और यह सरकार तो बड़ी रफ्तार से बड़े-बड़े फैसले लेने को जानी जाती है, लेकिन ओलंपिक के दो वक्त में भी मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की कोई चर्चा भी नहीं हुई बल्कि पिछले बरस खिलाडिय़ों की मांग पर भी सरकार का कोई रुख सामने नहीं आया। अब राजीव गांधी के नाम पर रखा गया खेल का सबसे बड़ा सम्मान उनके नाम से हटाकर मेजर ध्यानचंद के नाम पर कर दिया गया, लेकिन इसके बाद भी ऐसा नहीं हुआ कि इस मौके पर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न की घोषणा हुई हो। कुल मिलकर देखें तो राजीव गाँधी का अपमान करने में मेजर ध्यानचंद को हथियार की तरह इस्तेमाल कर लिया गया।  

हिंदुस्तान में जो नामकरण का सिलसिला अटपटा है और फिर नामों को बदलने का सिलसिला तो और भी बदमजा है। बहुत सी पार्टियों की सरकारें नाम बदलने का यह काम करती हैं और ऐसा इसलिए भी होता है कि नामकरण भी वैसी ही राजनीति दिखाते हुए किए जाते हैं, और बाद में उन्हें बदलना एक अलग किस्म की राजनीति रहती है। ऐसा भाजपा ने भी बहुत किया है, कांग्रेस ने भी बहुत किया है, इसलिए हर किसी की मिसालें बड़ी संख्या में मौजूद हैं। यह समझने की जरूरत है कि नाम रखते हुए भी सोचा जाना चाहिए और हटाते हुए भी सोचा जाना चाहिए। फिर भी हम आज यहां पर नामकरण और दोबारा नामकरण पर नहीं लिख रहे हैं, हम इस बात पर लिख रहे हैं कि राजीव गांधी का नाम हटाने की बात तो ठीक है लेकिन मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न क्यों नहीं दिया जा रहा है? यह तो मोदी सरकार के हाथ की बात थी और ओलंपिक में हॉकी के जिस खेल को मोदी ने रात-रात जागकर देखा है, टीवी के परदे के सामने खड़े रहकर देखा है, उस हॉकी के खेल के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का सम्मान अगर इस सरकार को सचमुच ही करना है, तो राजीव गांधी का नाम मिटा कर क्यों किया गया? मोदी अपने नाम के स्टेडियम के नाम को ध्यानचंद के नाम पर रखते और उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा करते? ऐसे में ही लोगों को याद पड़ता है कि अरुण जेटली के नाम पर भी दिल्ली के एक ऐतिहासिक स्टेडियम का नाम रख दिया गया। जैसा कि हमने हाल के बरसों में भारतरत्न पाने वालों के नाम गिनाए हैं कि अगर इच्छाशक्ति थी तो इंद्र कुमार गुजराल ने एक बरस के प्रधानमंत्री रहते हुए पांच भारतरत्न दे दिए, और अटल बिहारी वाजपेई ने 6 बरस प्रधानमंत्री रहते हुए पांच भारतरत्न दिए। देने के लिए तो मोदी ने भी पांच भारत रत्न अपने पिछले कार्यकाल में ही दे दिए हैं, लेकिन मेजर ध्यानचंद की बारी वहां पर नहीं आई। मेजर ध्यानचंद को मौका दिया गया तो राजीव गांधी की स्मृतियों को हटाकर उस कुर्सी को खाली करके ध्यानचंद को वहां बैठा दिया। क्या यह सचमुच यही मेजर ध्यानचंद का सम्मान हुआ है? जिस देश में सचिन तेंदुलकर जैसे कारोबारी खिलाड़ी को अभी कुछ ही बरस पहले, सबसे कम उम्र में भारत रत्न दे दिया गया, वहां पर मोदी के 6 वर्षों में भी भारतरत्न के लिए ध्यानचंद का नाम नहीं आया !

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 12 अगस्त 2021


 

गांधी से ग्रेटा थनबर्ग तक, सादगी की नसीहतों पर अमल कैसे हो?

   12 अगस्त 2021

  गांधीवादी किफायती जिंदगी को अगर देखें तो यह लगेगा कि आज की अर्थव्यवस्था की बुनियाद उससे हिल जाएगी। लोग पैदल या साइकिल से चलने लगेंगे, छोटी-छोटी आवाजाही के लिए कारों का इस्तेमाल कम हो जाएगा, सडक़ों पर गाडिय़ों की भीड़ घटेगी, और पैदल चलने वाले या साइकिल चलाने वाले लोग प्रदूषण पैदा नहीं करेंगे तो हवा साफ करने वाली मशीनों की बिक्री घट जाएगी, गाडिय़ां कम चलेंगी तो ऑटोमोबाइल की कंपनियों का भट्टा बैठ जाएगा, पेट्रोलियम कम बिकेगा, और लोग सेहतमंद भी रहेंगे। सोशल मीडिया में पैदल और पैडल के फायदे गिनाते हुए लोग यह भी गिनाते हैं कि इससे नुकसान किस-किसका होगा। सेहतमंद लोग देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करके रख देते हैं, न महँगे इलाज की जरूरत पड़ती, न बड़े अस्पतालों की, न कसरत की मशीनों की, और न उन्हें जिम जाना पड़ता। ऐसे लोग देश की अर्थव्यवस्था में कुछ भी नहीं जोड़ पाते, न किसी चीज की बर्बादी करते, ना खुद बर्बाद होते। दूसरी तरफ महज बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में चलने वाले लोग, रेस्तरां का फास्ट फूड खाने वाले लोग, कुल मिलाकर अस्पतालों को चलाते हैं, उनका खुद का आकार हर बरस बदल जाता है, तो उनकी वजह से फैशन उद्योग भी चलता है। और पैदल और पैडल में भी सबसे खतरनाक पैदल लोग रहते हैं क्योंकि वे तो साइकल तक नहीं खरीदते और साइकिल उद्योग भी नहीं चलता।

सोशल मीडिया पर हल्के फुल्के मिजाज में लिखी गई ऐसी गंभीर बातों के साथ-साथ एक दूसरी बात को भी समझने की जरूरत है। अभी दो दिन पहले ही यूरोप की सबसे चर्चित पर्यावरणवादी आंदोलनकारी किशोरी ग्रेटा थनबर्ग का एक बयान सामने आया है जिसमें उसने अंधाधुंध मार्केटिंग करने वाले फैशन उद्योग की आलोचना की है कि वह लोगों के बीच गैरजरूरी फैशन को बढ़ावा देता है। और ग्रेटा ने यह बात कहने के लिए एक फैशन मैगजीन वोग को दिए हुए एक इंटरव्यू का इस्तेमाल किया जिसमें उसने कहा कि पर्यावरण की बर्बादी के लिए और मौसम की तरह-तरह की इमरजेंसी आने के लिए फैशन उद्योग बहुत हद तक जिम्मेदार है। फैशन उद्योग हर कुछ महीनों में फैशन बदलकर लोगों को नए कपड़े और सामान खरीदने के लिए उकसाते रहता है। ग्रेट ने यह कहा कि वह कभी नए कपड़े नहीं खरीदती, अगर जरूरत भी रहती है तो पुराने कपड़ों के बाजार से इस्तेमाल होने के बाद बिकने वाले पुराने कपड़े ही खरीदती है, और जान-पहचान के करीबी लोगों से कपड़े उधार लेकर भी अपना काम चला लेती है 18 बरस की ग्रेटा थनबर्ग स्वीडन की एक किशोरी है और पर्यावरण को लेकर अपने आंदोलन की वजह से वह खबरों में भी रही। पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बावलेपन की हद तक जाकर ग्रेटा थनबर्ग पर हमला करते थे जिसका मजा लेते हुए ग्रेटा अमेरिका की पर्यावरण विरोधी नीतियों को उजागर करते रहती थी।

इन दो अलग-अलग बातों को अगर देखें तो इनका एक दूसरे से बहुत सीधा रिश्ता नहीं है, लेकिन दोनों ही बातें पर्यावरण को बचाने के लिए जरूरी हैं। एक तो यह कि लोग एक सेहतमंद जीवनशैली इस्तेमाल करें जिसमें वे पैदल और पैडल पर अधिक निर्भर करें। यह जरूरी है। इसके साथ ही यह भी समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान से हजारों मील दूर किस तरह एक संपन्न यूरोपियन देश स्वीडन में एक किशोरी उन्हीं जीवनमूल्यों को बढ़ावा दे रही है जिन्हें गांधी ने अपनी जिंदगी में इस गरीब हिंदुस्तान में बढ़ाया था. आज अगर यह सोचें कि क्या हिंदुस्तान में कोई लडक़ा या लडक़ी अपने किशोरावस्था में पर्यावरण को लेकर ऐसी जागरूकता की बात कर सकते हैं, तो गांधीवादी होने का दावा करने वाले परिवारों में भी ऐसे कोई बच्चे नहीं मिलेंगे। इसलिए गांधीवादी किफायत न सिर्फ धरती के पर्यावरण को बचाने के लिए जरूरी है, बल्कि गांधी के किस्म की आत्मनिर्भरता लोगों की सेहत के लिए भी जरूरी है। यह एक अलग बात है कि आज दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस तरह से फिजूलखर्ची पर टिक गई है, वह अर्थव्यवस्था जरूर डांवाडोल होने लगेगी।

आज हिंदुस्तान में किसी संपन्न तबके के बच्चों को तो छोड़ ही दें, औसत दर्जे की कमाई वाले परिवारों में भी बच्चे धरती को बचाने के लिए बाजार से पुराने कपड़े खरीदें या यार दोस्तों से उधार में लेकर पहन लें ऐसा किसी ने देखा-सुना भी नहीं होगा। इसलिए ग्रेटा की बातों को ग्रेट मानना भी जरूरी है और उनको गांधी के नजरिए से देखना भी जरूरी है. यह भी समझना जरूरी है कि किस तरह आज का फैशन उद्योग लोगों को गैरजरूरी खरीदारी के तरफ धकेलता है और फैशन को बार-बार बदल कर लोगों को ग्राहक बनाए रखता है, समर्पित ग्राहक।

वैसे तो देश और दुनिया में चर्चित बहुत से फिल्मी और खिलाड़ी सितारों को देखें तो उनकी एक अपील भी गैरजरूरी फैशन खपत को घटा सकती है, लेकिन घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या? यही सारे फिल्म और क्रिकेट के सितारे ऐसे हैं, जो तमाम किस्म की फैशन के इश्तहार करते हैं, उनको बढ़ावा देते हैं। अब अगर अमिताभ बच्चन ही यह कहने लगें कि वे तो पिछले 15 वर्षों से एक ही पतलून पहन रहे हैं, या उन्होंने तो पिछले 5 बरस से कोई नया सूट सिलवाया नहीं है, तो उनके खुद के पेट पर लात पड़ेगी। इसलिए जो लोग मॉडलिंग और बिक्री को बढ़ावा देने के ऐसे धंधे की कमाई पर नहीं टिके हुए हैं, उन लोगों को खुलकर सादगी, और फैशन की बात करनी चाहिए। अब कनाडा का प्रधानमंत्री अगर किसी मौके पर अपने रंग-बिरंगे मोजों के रंग, या उन पर छपी हुई डिजाइन को लेकर अपने सामाजिक सरोकार के प्रदर्शन पर वाहवाही पाता है, तो दुनिया के और भी बहुत से नेता और दूसरे चर्चित व्यक्ति फैशन की बर्बादी घटाने के लिए इस तरह के बयान दे सकते हैं। बहुत छोटी-छोटी बातों को देखें तो फेसबुक कंपनी का नौजवान मालिक मार्क जुकरबर्ग अधिकतर वक्त सलेटी रंग की मामूली टी-शर्ट और जींस में ही दिखता है। उसे किसी मौके के लिए कपड़े छंाटने में भी अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती क्योंकि उसने इन्हीं रंगों के, ऐसे ही डिजाइन के यही कपड़े 4-6 जोड़ी रखे हुए हैं। ऐसे चर्चित लोग भी अगर किफायत को लेकर कोई आंदोलन शुरू करेंगे तो उसका धरती पर बड़ा असर पड़ सकता है लेकिन सवाल यह है कि जिस फेसबुक पर रात-दिन फैशन के इश्तहार आते हैं, क्या वहां पर धंधा मार नहीं खायेगा? इसलिए बहुत से लोग जो सीधे-सीधे मॉडलिंग से जुड़े हुए नहीं है वे लोग भी इश्तहार की कमाई से तो जुड़े हुए हैं। देखें इन्हीं के बीच से कोई रास्ता ऐसा निकल सकता है क्या, जिसमें चर्चित लोग गांधी या ग्रेटर थनवर्ग की तरह किफायत और सादगी को बढ़ावा दे सकें। जिस वक्त चीन में अकाल की नौबत थी और लोगों के पास काम नहीं था, खाना नहीं था, उस वक्त वहां औरत-मर्द सभी के लिए एक ही किस्म की पतलून और वैसा ही कोट, और वह भी एक ही रंग के, लागू कर दिए गए थे ताकि लोग फैशन में बर्बाद ना हों। आज भी सरकार और समाज में जिम्मेदार लोगों को यह देखना चाहिए कि जिंदगी कैसे अधिक किफायती हो सकती है, और कैसे हम धरती पर अधिक बड़ा बोझ बनने से बचें।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 11 अगस्त 2021


 

सांवलिया सेठ मंदिर के चढ़ावे को देख मजदूर भी कुछ सीखें...

  11 अगस्त 2021

  जाने कैसे खबरों में और सोशल मीडिया में पिछले 4 दिनों से एक मंदिर की ऐसी तस्वीरें लगातार घूम रही हैं जिनमें ईश्वर के लिए आया हुआ चढ़ावा गिना जा रहा है। दर्जनों लोग बैठकर नोटों को अलग कर रहे हैं, सिक्कों को अलग कर रहे हैं, उनके बंडल बनाते जा रहे हैं। कुछ खबरें ताजा हैं, कुछ तस्वीरें और आंकड़े पिछले सालों के भी हैं। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश-राजस्थान की सरहद पर राजस्थान के हिस्से के इस मंदिर में हर महीने करोड़ों का चढ़ावा आने की खबरें पिछले वर्षों में लगातार आ रही हैं। देश का प्रमुख मीडिया, देश के प्रमुख अखबार, सभी जगहों पर आंकड़ों के साथ इस मंदिर की कमाई का जिक्र है, और उसकी तस्वीरें भी हैं। अब यह जगह कोई बहुत बड़ा तीर्थ स्थान नहीं है जहां पर तिरुपति या नाथद्वारा या स्वर्ण मंदिर या अजमेर शरीफ की तरह बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। लेकिन सांवलिया सेठ का यह मंदिर कई मायनों में बड़ा चर्चित है। और जैसा कि सांवले रंग से समझ में आ जाना चाहिए यह कृष्ण का एक मंदिर है। कृष्ण के अनगिनत रूपों में से एक रूप उनके सांवले रंग की वजह से सांवलिया सेठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। अब इस मंदिर में इतने चढ़ावे की एक वजह यह भी है यह पूरा इलाका अफीम की गैरकानूनी खेती का इलाका माना जाता है और अफीम तस्कर परंपरागत रूप से इस मंदिर के भगवान को अपना भागीदार बनाकर चलते हैं। जब कभी वे अफीम की कोई बड़ी खेप बाहर भेजते हैं, तो हिस्सा देने पहुंचते हैं और चढ़ावे में नोटों के साथ-साथ अफीम भी डाली जाती है। हर महीने अमावस्या को दान पेटी खोली जाती है तो उसमें से करोड़ों रुपए निकलते हैं जो कि जाहिर तौर पर अफीम तस्करों के दिए गए दान की वजह से इतनी बड़ी रकम बन पाते हैं। इस बात को उस इलाके के तमाम लोग अच्छी तरह जानते हैं यह बात खबरों में आती रहती है, इसलिए यह हिंदू धर्म को बदनाम करने की कोई साजिश भी नहीं है। ये खबरें बड़े धर्मालु हिंदुओं के मालिकाना हक वाले अखबारों और मीडिया में आती हैं, और अफीम को चूंकि काला सोना कहा जाता है इसलिए सांवलिया सेठ को भी काले सोने का देवता कहते हैं।

लोगों को याद होगा कि दक्षिण भारत के विख्यात तीर्थस्थान तिरुपति में भी वहां के देवता को उनके मानने वाले लोग अपने व्यापार में भागीदार मानकर चलते हैं और फिर चाहे उनका व्यापार शराब का ही क्यों ना हो, वे अपने बही-खातों में ईश्वर के नाम का हिस्सा दिखाते हुए उतनी रकम को दान में तिरुपति ट्रस्ट को हर बरस भेजते रहते हैं. उनकी आस्था उन्हें यह भरोसा दिलाती है कि ईश्वर की भागीदारी की वजह से उनका कारोबार खूब पनपेगा। और यह बात बहुत गलत भी नहीं है क्योंकि ऐसे भागीदार लोगों के धंधे में बरकत से ईश्वर का खुद का भी फायदा बढ़ता है, और यही वजह है कि व्यापारी अधिक कामयाब होते हैं, मजदूर बमुश्किल मजदूरी कमा पाते हैं, और बीच के लोग जो कि अधिक चढ़ावा नहीं दे पाते जो कि मुफ्त का लड्डू प्रसाद के रूप में पाकर ही प्रसाद पा सकते हैं, प्रसाद को खरीद नहीं सकते हैं, उनकी जिंदगी भी जस की तस चलती रहती है वह आखिर ईश्वर को किस चीज में भागीदार बना सकते हैं?

जिन लोगों ने गॉडफादर फिल्म देखी होगी या मारियो पूजा की लिखी हुई कहानी पढ़ी होगी, उन्हें पता होगा कि किस तरह दुनिया के सबसे खूंखार मुजरिम और माफिया सरगना अपने दिल की गहराइयों से ईसाई धर्मावलंबी रहते हैं, सुख-दुख के तमाम मौकों पर चर्च जाते हैं, इतवार को चर्च जाते हैं, एक-दूसरे को कत्ल की साजिश चर्च और कब्रिस्तान में करते हैं। लेकिन किसी का ईश्वर उन्हें किसी जुर्म से नहीं रोकता, किसी जुर्म की कमाई से नहीं रोकता। ईश्वर ने अगर जुर्म की कमाई से किसी को रोका होता तो भला मुंबई का एक बड़ा माफिया सरगना और एक सबसे बड़ा तस्कर मस्तान कैसे हाजी बना होता? हाजी तो लोग एक तीर्थ करने के बाद, हज करने के बाद ही बन पाते हैं, और मस्तान जब हाजी बन गया तो जाहिर है कि उसके पीछे भी ईश्वर की मर्जी रही होगी।

ईश्वर और काले कारोबार का यह पूरा सिलसिला दुनिया में कहीं भी एक-दूसरे के साथ कोई टकराव नहीं रखता। हमने दुनिया के सैकड़ों धर्मस्थानों के बारे में पढ़ा है, दर्जनों को रूबरू देखा भी है। किसी एक में भी ऐसी कोई तख्ती नहीं लगी है कि जुर्म करने वाले और पापी यहां पर ना आएं,  ईश्वर के सामने ना पड़ें, पाप की कमाई से यहां दान ना दें। सच तो यह है कि जब बड़े से बड़े चर्चित धर्मस्थान पर बड़े-बड़े चर्चित मुजरिम पहुंचते हैं, तो उनके स्वागत के लिए उस जगह के, उस धर्म के पुजारी खड़े रहते हैं। वह तमाम लोगों की भीड़ को चीरते हुए ऐसे मुजरिमों को लेकर ईश्वर तक जाते हैं और फिर जितनी देर ईश्वर और मुजरिम एक दूसरे को देखना चाहते हैं, उतनी देर ये पुजारी बाकी लोगों की भीड़ को रोककर रखते हैं। अलग-अलग धर्मों में रिवाज थोड़ा सा कम-अधिक फर्क वाला हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर बात यह है कि दुनिया का एक भी धर्म पाप की काली कमाई से कोई परहेज नहीं करता। धर्म स्थानों पर यह तो लिखा दिखता है कि यहां दलित भीतर ना आएं, महिलाएं भीतर ना आएं, गैरहिंदू भीतर ना आएं, लेकिन जिस मंदिर से यह चर्चा हमने शुरू की है, सांवलिया सेठ के उस मंदिर में भी ऐसी किसी तख्ती की चर्चा पिछले कई बरस की खबरों में हम न ढूंढ पाए कि क्या वहां पर अफीम तस्करों के लिए आने की कोई मनाही है? क्या वहां पर अफीम की कमाई दान में न देने या दान पेटी में अफीम न डालने की कोई अपील है? ऐसा कुछ भी नहीं है।

 जो धर्म अपने भीतर के इंसानों को अछूत और सछूत तो जैसे तबकों में बांटकर चलता है, उस धर्म में भी कोई भी नोट, कोई भी सिक्का, कोई भी गहने, कुछ भी अछूत नहीं हैं. और तो और अफीम की डली और अफीम की पोटली भी अछूत नहीं है। ईश्वर का यह हैरान करने वाला दरबार रहता है जहां किसी मुजरिम के लिए कोई मनाही नहीं है जहां किसी जुर्म की कमाई से कोई परहेज नहीं है। और तो और यह भी याद पड़ता है कि मदर टेरेसा ने भी अपने अनाथ आश्रम के बच्चों के लिए दुनिया के कुछ ऐसे लोगों से दान लिया था जिन्हें मुजरिम माना जाता था। अब जब ईश्वर को ही परहेज नहीं है, तो ईश्वर का नाम लेकर अनाथ बच्चों को जिंदा रखने का काम करने वाली मदर टेरेसा कैसा परहेज निभा सकती है? इसलिए जिस पैसे को प्रवचनकर्ता हाथों का मैल करार देते हैं, उस पैसे के बारे में एक भ्रष्ट नेता, अधिक बेहतर तरीके से, अधिक सच्चाई के साथ बता सकता है कि पैसा खुदा तो नहीं है, लेकिन खुदा से कम भी नहीं है। बात एकदम सही है, किसी धर्मस्थल की ऐसी हिम्मत हमने आज देखी-सुनी तो दूर, कहानी में भी नहीं पढ़ी है जहां पर यह लिखा गया हो कि इस जगह पर मुजरिमों और पापियों के आने पर रोक है, और जुर्म की काली कमाई दान में डालने पर रोक है।

ईश्वर को तस्करों से लेकर तमाम किस्म के मुजरिमों तक की भागीदारी अच्छी लगती है. अफीम के धंधे में भागीदारी से भी उसे कोई परहेज नहीं है। धर्म में जिनकी दिलचस्पी है उन्हें धर्म की बारीकियों को जानना चाहिए। अगर ईश्वर सिर्फ नेक काम करने वाले, पुण्य करने वाले लोगों का दान मंजूर करने लगेगा तो उसे दिन में दो बार अपनी प्रतिमा से निकलकर पास के गुरुद्वारे में लंगर खाने के लिए जाना पड़ेगा। ईश्वर समझदार है, व्यावहारिक है इसलिए वह किसी किस्म की कमाई को बुरा नहीं मानता और दो नंबर के धंधे में भी अगर उसे भागीदार बनाकर रखा जाता है तो वह उनको भी बरकत देता है। मनरेगा के मजदूरों को जरूर अपनी मजदूरी बढ़वाने के लिए खुद मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि उन्होंने किसी ईश्वर को अपनी मजदूरी की कमाई में भागीदार बनाया हुआ नहीं है। मजदूरों को भी अफीम तस्करों से दो नंबरियों से लेकर 10 नंबरियों तक से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है, क्योंकि वह सीख नहीं पाए हैं इसीलिए हाड़-मांस जलाते हुए रात-दिन मेहनत करते हैं, और आधा पेट खाकर सोते हैं। ईश्वर के तौर-तरीके अलग किस्म के हैं और वहां पर एक अलग ही भाषा चलती है, उस भाषा में पार्टनरशिप-डीड लिखवाना मजदूरों को आना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 10 अगस्त 2021


 

उस बन्दूकप्रेमी अमरीका से लेकर नफरतप्रेमी हिंदुस्तान तक के खतरे

 10 अगस्त 2021

  कई बरस पहले अमरीका के एक स्कूल में एक सिरफिरे समझे जा रहे नौजवान ने गोलियों से दर्जनों बच्चों को भून दिया था।  इस हत्यारे से जुड़ी हुई जो खबरें आई थीं उन पर भारत के लोगों के सोचने का भी एक पहलू है। इस अमरीकी नौजवान की मां को बंदूकों से बहुत मोहब्बत थी और वह अपने बेटों को पास की एक शूटिंग-रेंज पर ले जाया करती थी, जहां पर कि बंदूकों के शौकीन बहुत से लोग प्रैक्टिस के लिए आया करते थे। और वह बंदूकों के अपने संग्रह के बारे में भी लोगों से फख्र के साथ बात किया करती थी। दो दिन पहले जब वह अपने बेटों के हाथों मारी गई, तब उसी की बंदूक उसके खिलाफ इस्तेमाल हुई और इसके बाद वह बेटा इसी मां के स्कूल जाकर वहां छब्बीस और लोगों को मार बैठा। हर कुछ महीनों में अमरीका में ऐसी वारदात होती ही रहती हैं।

हिंदुस्तान में बड़े बुजुर्ग हमेशा से यह कहते हैं कि घर का वातावरण अच्छा रखना चाहिए। यहां की कहानियों में यह लिखा हुआ है कि किस तरह मां के पेट में रहते हुए अभिमन्यु ने चक्रव्यूह तोडऩा सीखा। इसी तरह इस देश में यह भी माना जाता है कि जब कोई महिला मां बनने वाली होती है, तो उसे अच्छा सुनना चाहिए, अच्छा देखना चाहिए। कुल मिलाकर बात यह है कि पैदा होने के पहले, या पैदा होने के बाद, लोगों को एक बेहतर माहौल की जरूरत होती है। जो लोग यह मानते हैं कि लोग पैदाइशी अच्छे या बुरे होते हैं, वे विज्ञान के कुछ आधे-अधूरे नतीजों को मान बैठते हैं, या फिर हमेशा से चली आ रही तर्कहीन कहावतों और मुहावरों को। दरअसल होता यह है कि किसी भी बच्चे की सोच बनने में उसके आसपास के माहौल का ही पूरा असर होता है। यह माहौल परिवार का भी हो सकता है, पड़ोस का भी हो सकता है, स्कूल या दोस्तों का भी हो सकता है। और आज के जमाने में इन सबसे परे, टीवी और इंटरनेट का भी हो सकता है। इसलिए जब कोई मां अपने बच्चे के सामने बंदूकों के अपने शौक को गर्व के साथ बखान करती है, और जब कोई बच्चा बचपन से ही इन बंदूकों के बीच सांस लेते बड़ा होता है, तो उसके इन बंदूकों के इस्तेमाल करने का खतरा भी बढ़ जाता है। दुनिया का इतिहास गवाह है कि बंदूकें किन्हीं मुजरिमों के मारने के, बुरे लोगों को मारने के काम नहीं आतीं, वे अधिकतर मामलों में सिर्फ बेकसूरों को मारने के काम आती हैं। कभी अपने को, कभी अपने जीवनसाथी को, और जैसा कि अमरीका के इस मामले में हुआ, अपनी मां को और उस मां की नौकरी वाले स्कूल के दर्जनों लोगों को।

इसलिए लोगों को यह सोचने और समझने की जरूरत है कि उनके, और उनके बनाए हुए माहौल का असर बच्चों पर बहुत दूर तक पड़ता है। जो मां-बाप बीड़ी-सिगरेट पीते हैं, उनके बच्चों के इस लत में पडऩे का खतरा अधिक होता है। ऐसा ही हाल बदजुबानी का है, जो लोग बातचीत में गालियां देते हैं, उनके बच्चे या उनके आसपास के बच्चे इन बातों को तेजी से सीखते हैं। जो बच्चा अपने पिता के हाथों अपनी मां से बदसलूकी देखते बड़ा होता है, वह आगे चलकर पिता से नफरत तो करता ही है, उसके खुद के हिंसक होने के खतरे बढ़ जाते हैं। हिंदुस्तान के आम परिवारों में लोग बच्चों के सामने बात करते हुए सामाजिक न्याय को भूल जाते हैं। कहीं कोई परिवार गरीबी को मूर्खता बताने लगता है, तो कहीं किसी आरक्षित तबके को सरकारी दामाद कहने लगता है। ऐसी सारी भाषा लोगों के मन में बचपन से ही बैठते चलती है और बड़े होने पर ऐसे बच्चों की सोच बदलने की गुंजाइश कम रहती है। आज इस पर लिखने का हमारा मकसद यह है कि भारत के मां-बाप इस पूरे हादसे को लेकर, और उसके पीछे इस हत्यारे नौजवान की मां की शौक और पसंद को देखते हुए, अपने खुद के बारे में सोचें-विचारें। यह देखें कि क्या उनकी कोई बात तो उनके बच्चों को गलत राह पर नहीं धकेल रही। अमरीका के इस हादसे से अगर हिंदुस्तान के मां-बाप, खुद बड़ी ठोकर खाने के पहले अपने को संभाल सकें, तो उसी में समझदारी है।

आज इस पुराने मामले पर लिखी हुई बात को दोहराने की जरूरत इसलिए पड़ रही है कि दो दिन पहले देश की राजधानी में चीख-चीख कर जो भीड़ मुसलमानों को काटने का फतवा जारी कर रही थी और इस बात को लेकर पागलपन के नारे लगा रही थी कि जब इन्हें काटा जाएगा तब वे राम-राम का नारा लगाएंगे। ऐसे लोगों को यह भी समझना चाहिए कि इस देश का नाकारा कानून और इस देश की सांप्रदायिक मुजरिमों से रियायत बरतने वाली सरकार मिलकर उन्हें सजा चाहे ना दिलवा सकें, लेकिन जब उनके परिवार के लोग, उनके आसपास के लोग सांप्रदायिक नफरत के ऐसे नारे लगाते उन्हें देखेंगे, तो वे या तो अपने परिवार के लोगों से नफरत करने लगेंगे, या इनके फतवे के झांसे में आकर खुद भी समाज के एक हिस्से से नफरत करने लगेंगे। कुल मिलाकर यह है कि उनकी जिंदगी नफरत से भरी हुई रहेगी। ये लोग मुसलमानों का कोई नुकसान नहीं कर सकेंगे, ये नुकसान सिर्फ हिंदुओं का करेंगे और अपने करीब के लोगों का सबसे अधिक नुकसान करेंगे, जिनकी जिंदगी में इंसानियत की एक जगह हो सकती थी, लेकिन उस जगह को यह नफरत से भर दे रहे हैं। इन लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि जिस तरह अमेरिका में मां-बाप की जमा की हुई बंदूकों को लेकर छोटे-छोटे बच्चे अपने स्कूल और कॉलेज में अपने बेकसूर साथियों को थोक में मार रहे हैं, उसी तरह की नफरत का शिकार हिंदुस्तान में हिंदुस्तानी नफरतजीवियों के बच्चे होने जा रहे हैं।

दीवारों पर लिक्खा है, 9 अगस्त 2021


 

मुख्य न्यायाधीश की नाक तले, सबसे भयानक सांप्रदायिक हिंसा के नारे लगाती भीड़ की अनदेखी

9 अगस्त 2021

कल दिल्ली में भाजपा के एक नेता की अगुवाई में प्रतिबंधों को तोड़ते हुए प्रदर्शन हुआ, और इस प्रदर्शन में भीड़ ने खुलकर मुस्लिमों पर हिंसा करने के नारे लगाए, और उन नारों के साथ यह नारे भी लगाए कि जब इनको मारा जाएगा तो ये राम-राम चिल्लाएंगे। अपनी हिंसक और सांप्रदायिक सोच में राम को जिस तरह से लपेटा गया है, उससे लगता है कि तुलसी की कहानी से परे अगर सचमुच ही राम कहीं होते तो अपना नाम समेटकर भी यहां से चले गए होते। जिस राम के नाम पर देश के सबसे लंबे मुकदमे के बाद एक मंदिर बन रहा है, उस राम का नाम मुंह से निकलवाने के लिए मुस्लिमों को मारने और काटने के नारे संगठित तरीके से लगवाए जा रहे हैं। और मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक छाए हुए इन वीडियो को अगर किसी ने नहीं देखा है तो दिल्ली और उत्तर प्रदेश की पुलिस ने नहीं देखा है जिनकी प्राथमिकता में ऐसी सोच पर कोई कार्यवाही करना रह नहीं गया है। मीडिया के कुछ लोगों ने इस बात को लिखा भी है कि ऐसे नारे लगाने वालों को गिनती के फतवेबाज मान लेना गलत होगा क्योंकि यह उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले हर कुछ दिनों में आगे बढ़ाए जा रहे एजेंडे का एक हिस्सा है, जिसे समझ पाना अधिक मुश्किल बात नहीं है। ऐसा लगता है कि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश चुनाव का मतदान उत्तर प्रदेश में हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं के बीच एक जनगणना की तरह होकर रह जाएगा जो कि धर्म के आधार पर की जाएगी।

जिस तरह एक पत्रकार को जंतर मंतर पर इस सांप्रदायिक भीड़ ने घेर लिया और उससे जबरिया जय श्री राम कहलवाने की कोशिश की गई, और ना कहने पर उसे वहां से निकाल दिया गया, वे तमाम वीडियो देखने के बावजूद दिल्ली की पुलिस तो मौन है ही, अपने आपको भाजपा से अलग बताने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी ऐसी नौबत के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे जबकि वह आए दिन इस बात की आड़ लेते रहते हैं कि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के मातहत काम करती है और दिल्ली का मुख्यमंत्री पुलिस को नियंत्रित नहीं करता। लेकिन दिल्ली का मुख्यमंत्री अपनी जुबान को तो नियंत्रित करता है, वह यह तो तय कर सकता है कि वह किस सांप्रदायिक हिंसा को देखते हुए अपना मुंह खोले? या फिर वह अपनी ही पार्टी के विधायकों की गुंडागर्दी को बचाने के लिए ही मुंह खुलेगा और फिर चाहे उसके राज्य के भीतर इतनी बड़ी-बड़ी सांप्रदायिक हिंसा होती चले उसका मुंह भी नहीं खुलेगा? यह हिंदुस्तान का किस किस्म का निर्वाचित मुख्यमंत्री है जिसका मुंह ही चुनिंदा मुद्दों पर खुलता है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि उसके गुरु अन्ना हजारे का मुंह चुनिंदा मुद्दों पर, चुनिंदा लोगों के खिलाफ ही खुलता था, और पिछले 6 बरस से वह कुंभकरण की तरह सोया हुआ है यह कहकर कि कांग्रेस सरकार आएगी तो उठा देना।

यह सिलसिला बहुत ही शर्मनाक है लेकिन दिक्कत यह है कि दिल्ली की पुलिस और उत्तर प्रदेश की पुलिस इन दोनों की सांप्रदायिकता में कोई फर्क रह नहीं गया है। जो वीडियो बच्चे-बच्चे के हाथ में है, वह वीडियो भी पुलिस को हासिल नहीं हो रहा है। जिस प्रदर्शन की अर्जी खारिज की जा चुकी थी उसके बावजूद वह प्रदर्शन हुआ और इतने भयानक सांप्रदायिक तरीके से हुआ लेकिन फिर भी केंद्र सरकार की इतनी एजेंसियां जो कि लोगों के मोबाइल फोन पर झांकने के लिए इजराइल से अरबों का जासूसी स्पाइवेयर खरीदती हैं, उन्हें सडक़ पर नारे लगाती भीड़ के यह वीडियो भी नहीं मिल रहे जिन्हें पाने के लिए पेगासस की जरूरत नहीं है, महज आंख और कान खोलने की जरूरत है, वे सोशल मीडिया पर चारों तरफ हैं। ऐसी अनदेखी करके केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश की पुलिस देश को किस हालत में धकेल रही है, क्या इन दो पुलिस पर राष्ट्रीय सुरक्षा अध्यादेश के तहत मुक़दमा दजऱ् नहीं होना चाहिए?

और पूरे देश में पुलिस किस तरह एक अराजक ताकत बन चुकी है इसको देखना हो तो कल देश के मुख्य न्यायाधीश का दिया हुआ यह भाषण सुनना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि देश में मानवाधिकार का सबसे बुरा हनन पुलिस हिरासत में होता है जहां ताकतवर लोगों को भी प्रताडऩा और अत्याचार झेलना पड़ता है। प्रधान न्यायाधीश एन वी रमना ने कहा कि मानवाधिकार और व्यक्ति की गरिमा को सबसे अधिक खतरा पुलिस थाने में होता है। उन्होंने पुलिस में पहुंचने के बाद लोगों के मानवाधिकार के मामले में अमीर और गरीब की ताकत के फर्क के बारे में भी काफी कुछ कहा है। उन्होंने कहा कि अगर हम कानून का राज बनाए रखना चाहते हैं तो न्याय तक पहुंच वाले, और बिना पहुंच वाले गरीब, के बीच का फर्क खत्म करना होगा।

पहुंच और बिना पहुंच वालों के बीच का यह फर्क हिंदुस्तान में आज ना सिर्फ पैसे वालों और गरीब के बीच में है, बल्कि बहुमत की आबादी और अल्पमत आबादी के बीच भी है। आज अल्पमत के लोग अगर बहुमत के खिलाफ इस तरह के नारे लगाते हुए मिलते तो अब तक उनके खिलाफ बड़ी-बड़ी एफआईआर दर्ज हो चुकी रहतीं। देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोग उनके खिलाफ टीवी की बहसों में मुंह से झाग निकालने लगते, और सडक़ों पर राजनेता देश के ऐसे गद्दार तबके को पड़ोस के देश भेज देने की बात कहने लगते। मुख्य न्यायाधीश ने जो बात गरीब और अमीर के बारे में कही है वह दरअसल पैसों की ताकत से जुड़ी हुई बात है, उसे और अधिक बारीकी से देखें तो वह सिर्फ ताकत से जुड़ी हुई बात है जो कि सिर्फ पैसों की ताकत हो, ऐसा जरूरी नहीं है। आज देश में बहुमत की ताकत और अल्पमत की ताकत का जो फर्क है उसने लोगों की जिंदगी का बुनियादी हक छीन लिया है। आज अल्पमत की भीड़ पर निशाना लगाने के लिए बहुमत की सोच वाली सरकारों की पुलिस कहीं पैलेट गन चलाने तैयार है, तो कहीं बेकसूरों को चौथाई-चौथाई सदी तक जेलों में बंद रखने को तैयार है, तो कहीं उनके खिलाफ अंतहीन झूठे मुकदमे दायर करने को तैयार है।

पता नहीं क्यों मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस तक संपन्न और विपन्न की पहुंच के फर्क को गिनाते हुए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की पहुंच के फर्क को नहीं गिनाया, जबकि कल जब वे यह भाषण दे रहे थे तकरीबन उसी समय के आसपास उन्हीं की दिल्ली में यह नारे लग रहे थे जिनमें मुस्लिमों को जब मारा जाएगा तो वे राम-राम चिल्लाएंगे के नारे वीडियो कैमरों के सामने लगाए जा रहे थे। या अलग बात है कि बिना इजाजत यह प्रदर्शन जिस भाजपा नेता के संगठन ने किया था वह इसे अपना भारत जोड़ो आंदोलन करार देता है यह किस तरह का भारत जोड़ो है?  क्या इसे उसी दिल्ली में बैठे हुए देश के मुख्य न्यायाधीश को नहीं देखना चाहिए? क्योंकि देश में लोकतंत्र की अन्य संस्थाओं का दिवाला निकल चुका है, और अब थोड़ी बहुत उम्मीद इस नए मुख्य न्यायाधीश से इसलिए है कि इनकी कोई नीयत रिटायरमेंट के बाद किसी कुर्सी को पाने की दिख नहीं रही है। उनके अब तक के फैसले एक ईमानदार अदालत का रुख दिखा रहे हैं।  मुख्य न्यायाधीश भी अगर बुलाकर यह नहीं पूछेगा कि राम का नाम लेने वालों की कमी हो गई है क्या जो कि मुस्लिमों को मार-मारकर राम का नाम लिवाया जाएगा? क्या मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी नहीं बनती कि एक मासूम नासमझ बच्चा बनी हुई दिल्ली पुलिस को बुलाकर पूछे कि उसके आंख और कान कुछ चुनिंदा मौकों पर काम करना क्यों बंद कर देते हैं? वह केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसियों को यह नहीं पूछ सकती कि ऐसे नारों के पहले और इसके बाद क्या उन्हें देश की सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं दिखता है? लोकतंत्र की बुनियादी समझ को ध्यान में रखते हुए कल की इस वारदात के बाद कोई नतीजा निकाला जाए तो उससे दिल्ली पुलिस के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज हो सकता है कि वह अपनी सरहद में इतनी बड़ी सांप्रदायिक हिंसा के फतवे हवा में गूंजने दे रही है, उसकी अनदेखी कर रही है, और पूरे देश में सांप्रदायिक हिंसा भडक़ने का खतरा खड़ा कर रही है।

(Daily Chhattisgarh)

मीडिया का कार्पोरेट कारोबार और उसके सरोकार पर चर्चा

   8 अगस्त 2021

 जिंदगी के बहुत से असल मुद्दों पर लगातार लिखने वाली एक महिला पत्रकार दोस्त ने एक वक्त लिखा था कि वह एक स्थानीय अखबार में पढ़ रही थी कि किस तरह हाथियों ने एक बस्ती में तोड़-फोड़ की। और साथ यह लिखा कि ऐसी खबरों के बाद उसे शाहरूख खान के डॉन-2 के बारे में पढऩे की क्या जरूरत है? यह बात रोज ही हमारे सामने आती है क्योंकि अखबार के कई पन्ने रोज तैयार करते हुए दिन की शुरुआत से लेकर रात काम खत्म होने तक दुविधा खत्म ही नहीं होती। अखबार पढऩे वालों की उम्मीदों के मुताबिक अखबार निकाला जाए, या उन्हें उनकी उम्मीदों के बारे में कुछ सलाह देता हुआ अखबार निकाला जाए? अखबार का मकसद कारोबार हो, या सरोकार हो? ऐसे बहुत से सवाल बहुत सी खबरों को लेकर और उन खबरों से छांटे गए किसी मुद्दे पर इस तरह का, इस जगह पर संपादकीय लिखते हुए सामने आकर खड़े हो जाते हैं। जब हम जिंदगी की तकलीफों और समाज में बेइंसाफी के बारे में लिखते हैं तो बहुत से लोगों को लगता है कि लिखने को कोई अच्छी बात बची ही नहीं है क्या? कुछ अखबारों ने अपनी यह नीति बना रखी है कि वे पहले पन्ने पर दुख-तकलीफ की कोई खबर नहीं छापते हैं, जब तक कि वह किसी बड़ी ताजा घटना की खबर न हो, और जिसे छोड़ देना लापरवाही लगे।

जो जुबान खबरों को छांटने के लिए इस्तेमाल होती है वह बहुत दिलचस्प है। हिंदुस्तान में हिंदी में अंग्रेजी के बहुत से शब्द घुल-मिल चुके हैं और ऐसा ही एक शब्द अखबारनवीसी में इस्तेमाल होता है-पब्लिक इंटरेस्ट। बारीकी से देखें तो हिंदी में इसके दो अलग-अलग मायने निकलते हैं, एक तो इसका मतलब जनहित होता है और दूसरा मतलब जनरुचि होता है। अखबार की खबरें तय करते हुए, विचारों के मुद्दे और विचारों को तय करते हुए, इन सबकी प्राथमिकताएं और इनका महत्व तय करते हुए, जब बात पब्लिक इंटरेस्ट की होती है तो कारोबारी अखबार (बिजनेस न्यूजपेपर नहीं, बिजनेस के लिए फिक्रमंद न्यूजपेपर) उसे जनरुचि मानकर एक ऐसा अखबार पाठकों के सामने रखता है जैसा कि दस-बीस बरस पहले एक तांत्रिक अंगूठी के इश्तहार में दावा किया जाता था-जो मांगोगे वही मिलेगा। और पब्लिक इंटरेस्ट का यह मतलब अखबार की रगों में दौडऩे वाले इश्तहार वाले फायदे की बात भी होती है। दूसरी तरफ जो लोग अखबार को कारोबार से कुछ अधिक, सरोकार से जुड़ा हुआ मानते हैं, वे पब्लिक इंटरेस्ट के जनहित वाले अर्थ को ढोकर चलते हैं, जो कि खासा भारी होता है और कमर भी तोड़ देता है। हम अभी बात मोटे तौर पर अखबारों की इसलिए कर रहे हैं कि देश का लंबा अनुभव इन्हीं के बारे में अधिक है और टीवी के समाचार चैनलों को आए अख़बारों के मुकाबले कम दिन हुए हैं और उनका सरोकारों से, जनहित से लेना-देना उसी वक्त जरा सी देर के लिए शुरू होता है जब कोई स्टिंग ऑपरेशन उनके हाथ ऐसा लग जाता है जो लोगों को टीवी के सामने कुछ देर बांध सके। भारत के समाचार चैनलों को हम आज के इस गंभीर विश्लेषण में जोडऩे की कोशिश करने पर भी नहीं जोड़ पाएंगे।

आज इस बात पर लिखने की कुछ जरूरत इसलिए भी लग रही है कि पाकिस्तान में एक कमजोर और खतरे में चल रहे लोकतंत्र के भीतर वहां के मीडिया को लेकर खुली बहस चलती है और लोग जिस तरह उसकी आलोचना भी करते हैं, वह बात हिंदुस्तान में शायद इसलिए कम है क्योंकि यहां मीडिया उस तरह के किसी फौजी, खुफिया, आतंकी और कट्टरपंथी हमलों का शिकार नहीं है। अधिक आजादी ने भारत के मीडिया को आत्ममंथन से परे कर दिया है और तरह-तरह के दबावों के तले पाकिस्तानी मीडिया चर्चा का सामान बनता है। अखबारों के पन्नों के लिए रोजाना धरती के अनगिनत पेड़ कटते हैं, ये पन्ने कम से कम ऐसे तो हों कि वे पेड़ों की कुर्बानी को सही ठहरा सकें! प्रेस काउंसिल के एक वक़्त के अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने अपनी कुछ बातों को लेकर मीडिया के बीच एक हलचल खड़ी की थी, और एक नाराजगी भी। लेकिन ‘उनकी’ बातों को लेकर उन्हें भला-बुरा कहने के साथ-साथ, उनके नाम को अलग करके च्उनज् बातों पर चर्चा की जरूरत क्या आज नहीं है? न सिर्फ उनकी कई बातें खरी हैं, बल्कि मीडिया में आज जो खोट है उसे लेकर आपस में ही कुछ खरी-खोटी करने की जरूरत है ताकि अगर किसी किस्म की बेहतरी मुमकिन है तो वह तो हासिल हो सके।

अखबारों के बाजारू मुकाबले के चलते कुछ ऐसी हरकतें हो रही हैं जो कि हमारी इस फिक्र को जायज और जरूरी ठहराती हैं। किसी का नाम लेकर उसे बुरा कहने या बदनाम करने का आज कोई मौका नहीं है इसलिए बिना नाम दो अलग-अलग मामलों की चर्चा यहां करना हमें माकूल लग रहा है। एक शहर में एक बड़े अखबार का स्थानीय संस्करण शुरू होने को था। वहां पहले से निकल रहे एक अखबार को यह फिक्र खड़ी हो गई थी कि नए अखबार के आने से लोग उसकी तरफ ध्यान न दें। उसने नए अखबार के पहले ही दिन, अपने अखबार में शहर की एक इतनी सनसनीखेज खबर छापी कि जिस पर पूरा देश हिल उठा। और तीन हफ्ते बीतते न बीतते देश के एक तीसरे, बड़े और जिम्मेदार अखबार ने यह रिपोर्ट छापी कि वह सनसनीखेज रिपोर्ट पूरी की पूरी झूठी थी, और सोच-समझकर उसे सच से दूर महज सनसनीखेज बनाया गया था। एक दूसरा प्रदेश और दो दूसरे अखबारों के बीच का मुकाबला। वहां भी पुराने जमे हुए अखबार ने नए अखबार के पांव न जमने देने के लिए एक इतनी बड़ी खबर छापी, जिसे पढक़र लोग हिल जाएं। एक बेटे ने अपने मां को मारकर, काटकर, पकाकर खा लिया। इससे बड़ी खबर किसी इलाके के लिए और क्या हो सकती है? और फिर वहां शायद चौथाई या आधी सदी से निकलते अखबार में अगर यह सबसे बड़ी सुर्खी हो, तो फिर लोग और क्या पढऩा चाहेंगे? कम से कम इसके मुकाबले किसी नए अखबार को तो पढऩा नहीं ही चाहेंगे। नतीजा यह हुआ कि नया अखबार बुरी तरह से पिटा हुआ सा लगने लगा। लेकिन उस प्रदेश के पाठकों की हैरानी की कोई सीमा न रही जब नए अखबार ने उस औरत को लाकर पुलिस और पाठकों के सामने पेश कर दिया जिसे कि मार, काट, पकाकर खा चुका गया बताया गया था।
 
लेकिन मीडिया के ऐसे झूठ पर बात आमतौर पर तभी होती है जब बाजार में मुकाबले के लिए किसी को किसी दूसरे अखबार को नीचा दिखाना हो। पर जहां कोई बाजारू टकराव न हों, और जहां अखबारी परंपरागत जुबान के मुताबिक, कुत्ता, कुत्ते को न काट रहा हो, वहां पर लोगों को झूठ की ऐसी साजिशों का क्या पता लगेगा? हम उसी बात पर लौटें, जिस बात से हमने आज लिखना शुरू किया था। जनहित और जनरुचि के फर्क को लेकर मीडिया पर अगर बात नहीं होगी तो यह तो वैसे भी संसद की एक बहस के मुताबिक कार्पोरेट हाऊसों का एक कारोबार बन ही चुका है। कार्पोरेट कारोबार की जुबान में सरोकार सिर्फ हाथीदांत की तरह का होता है। यहां पर चलते-चलते हम एक और अखबार और उसकी खबर का जिक्र करना चाहेंगे। टाईम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली के संस्करण में नोएडा इलाके के लिए निकलने वाले पन्नों पर एक बार एक खबर छपी थी जिसमें एक कार दुर्घटना में मारे गए एक युवक और एक युवती के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें थीं। इस पर अखबार ने अपनी कुछ जानकारियों का खंडन उसी बरस कर दिया था। लेकिन कुछ बरस बाद जाकर, शायद अदालत के बाहर समझौते के लिए, इस खबर को लेकर एक बड़ा सा माफीनामा अखबार ने एक रिपोर्ट की तरह छापा है कि उसकी खबर में कौन-कौन सी बातें झूठी थीं। एक मीडिया वेबसाईट ने हिसाब लगाया है कि करीब सवा दो सौ वर्ग सेंटीमीटर जगह में छपे इस माफीनामे का इस अखबार के विज्ञापन रेट से बिल बनता तो वह करीब आठ लाख रूपए का होता। हम अभी रूपयों पर नहीं जा रहे हैं, लेकिन हम मीडिया की गलतियों, उसके गलत कामों, और उनमें सुधार की ऐसी मिसालों को लेकर चर्चा को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

(Daily Chhattisgarh)