किडनी बेच नया फोन न जुटाएं, अपने फोन से तसल्ली जुटाएं...

   17 सितम्बर 2021

  दुनिया की एक सबसे बड़ी कंप्यूटर और मोबाइल फोन कंपनी, एप्पल ने 2 दिन पहले बाजार में अपने फोन के कुछ नए मॉडल उतारे तो सोशल मीडिया पर फिर यह मजाक चल गया कि शरीर का कौन सा अंग बेचने पर इसका कौन सा मॉडल लिया जा सकता है। जो संपन्न पश्चिमी देश हैं वहां पर फोन की महंगी कीमत के बावजूद लोग कुछ बरस पहले तक तो एप्पल स्टोर के बाहर फुटपाथ पर दो-दो दिन लाइन में सोए रहते थे, अब पता नहीं वहां क्या हालत है। लेकिन दुनिया में और भी कुछ सामान हैं जो इसी किस्म के महंगे हैं, कुछ दूसरी कंपनियों के कुछ फोन भी करीब-करीब ऐसे ही दाम के हैं, और इसलिए यह मजाक उनके साथ भी बनाया जा सकता है, लेकिन ऐसे लतीफे बनते एप्पल के ही हैं।

यह सोचने की जरूरत है कि क्या सचमुच ही रोजाना इस्तेमाल की टेक्नोलॉजी पर इतना खर्च करने की जरूरत है? लेकिन यह कोई नई बात तो है नहीं, एक वक्त जब टीवी आया तो उस वक्त भी बड़ी स्क्रीन के दाम ऐसे ही अंधाधुंध अधिक थे, टीवी पर फिल्म देखने के लिए जो वीसीपी या वीसीआर आते थे, उनके भी दाम ऐसे ही थे। हर टेक्नोलॉजी शुरू में बहुत महंगी रहती है बाद में धीरे-धीरे सस्ती होती जाती है। और अब तो घर-दफ्तर में टीवी पर फिल्म देखने के लिए किसी मशीन को चलाने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। इसी तरह जिनको यह लगता है कि मोबाइल फोन बहुत महंगे होते जा रहे हैं उन्हें यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि मोबाइल फोन की खूबियां इतनी बढ़ाई जा रही हैं कि वे अधिक महंगे हो रहे हैं। हर किसी को इतने महंगे मोबाइल फोन की जरूरत नहीं है, और बाजार में लोगों के काम चलाने लायक मोबाइल 10-12 हजार में भी आराम से मिल जाते हैं। अधिक खर्च वही लोग करते हैं जिन्हें शान-शौकत की आदत है और जो केसर खरीदते हुए भी सबसे महंगी वाली केसर खरीदते हैं, बादाम लेते हुए भी सबसे महंगा बादाम और कुर्ते के लिए सिल्क का कपड़ा लेते हुए सबसे महंगा सिल्क। इसलिए आज बाजार में जो सबसे महंगे सामान आ रहे हैं उन्हें लोगों की जरूरत मानना गलत होगा, और जिन लोगों को अपनी जरूरत के काम के लिए मोबाइल या कंप्यूटर चाहिए, उन्हें तो यह भी देखना चाहिए कि कुछ बरस पहले के दाम पर भी आज उससे बहुत अधिक खूबियों वाले फोन और कंप्यूटर आने लगे हैं।

दरअसल बाजार में सबसे महंगा सामान लेने के शौकीन लोगों को बिना जरूरत ऊंची तकनीक वाले सामान लेने की आदत रहती है। जिन्हें कभी कोई वीडियो एडिटिंग नहीं करनी है वे भी फोन ऐसा चाहते हैं कि उसका प्रोसेसर और उसका रैम सबसे ऊंचा हो। अधिकतर लोगों को यह समझना चाहिए कि उनके पास के मौजूदा फोन या कंप्यूटर पूरी तरह खराब ना हो जाने तक उन्हें नए उपकरणों की जरूरत नहीं रहती है। इसलिए अपने पास के फोन का नया मॉडल आते ही उस पर जाने की कोशिश एक निहायत फिजूल की बात रहती है, और बहुत महंगा शौक भी। जिनको लगता है कि एक किडनी बेचकर भी आईफोन खरीदना चाहिए, उन लोगों को किडनी संभालकर रखनी चाहिए और बाजार के सस्ते फोन से काम चलाना चाहिए, जिससे तकरीबन तमाम काम निपट सकते हैं। बस समाज में उठते-बैठते लोगों को दिखाने के लिए चकाचौंध वाला महंगा ब्रांड उनके पास नहीं रहेगा लेकिन ऐसा ब्रांड दिखाकर किसी को खुश करना जरूरत नहीं रहती है, यह महज घमंड रहता है। इसलिए लोगों को अपनी जरूरत के मुताबिक ही खर्च करना चाहिए क्योंकि एक बार जिस तरह के सामान का इस्तेमाल शुरू किया जाए, बाद में फिर उससे नीचे का सामान लेना जंचता नहीं है। बच्चों को भी उतने ही महंगे सामान दिलवाने चाहिए जिनके खराब होने पर उतने ही महंगे सामान दोबारा दिलाए जा सकें।


 दरअसल खुशी सामान बदलने से नहीं आती है, खुशी आती है अपने पास के सामान से संतुष्ट रहने पर। जब तक जरूरत ना हो तब तक और अधिक महंगे, और नए, और बड़े, सामानों पर जाकर और अधिक खूबी पाने के फेर में खुशी खत्म होती है, और जो हासिल है उससे अगर काम चल रहा है, उससे अधिक की जरूरत नहीं है, तो हसरतों को काबू में रखना ठीक है क्योंकि ना तो बाजार में उपकरणों के आने पर काबू रखा जा सकता, और ना ही खूबियां बढ़ते चले जाने को रोका जा सकता है। लोगों को याद रखना चाहिए कि हिंदुस्तान की कुछ सबसे बड़ी कंप्यूटर सॉफ्टवेयर कंपनियों को बनाने वाले और उनके आज के मालिक, अज़ीम प्रेमजी, नारायण मूर्ति, अरबपति-खरबपति होने के बाद भी प्लेन में इकोनॉमी क्लास में सफर करते हैं। वे अगर चाहें तो वह अपनी कंपनी के लिए प्लेन खरीदकर उसका इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन वे आम मुसाफिर विमान में भी महंगी टिकट नहीं खरीदते, साधारण टिकट खरीदते हैं। इसके बाद ये कारोबारी अपनी दौलत से हजारों करोड़ रुपये समाजसेवा पर खर्च करते हैं। ऐसे ही बहुत से ऐसे लोग हैं, दुनिया का एक सबसे बड़ा फुटबॉल खिलाड़ी, सादिओ माने ऐसा है जो अपने घिसे-पिटे पुराने मोबाइल फोन का इस्तेमाल करता है, उसके हाथ में एक पुराना फोन दिखा जिसकी स्क्रीन भी क्रैक हो चुकी थी। वह अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज सेवा पर खर्च करता है। वह अपने फोन को बदलने पर भी जरा सा खर्च करना नहीं चाहता क्योंकि उतने पैसों से किसी और एक की मदद हो सकती है। फुटबॉल से ही उसकी सालाना फीस 75 करोड़ रुपये से अधिक है।

इसलिए लोगों को अपने बच्चों के सामने भी ऐसी मिसाल पेश करने की जरूरत है कि जरूरत जितने ही सामान लिए जाएं, और जरूरत पूरी न होने पर ही उन्हें बदलकर दूसरा सामान लिया जाए। जो अतिसंपन्न लोग हैं उनको छोडक़र बाकी सब लोगों की जिंदगी की प्राथमिकताएं महंगे सामान बदल देते हैं, और सामानों को, ब्रांड को, नए मॉडल को जरूरत से अधिक महत्व देने के बजाय जिंदगी की दूसरी बातों को महत्व देना सीखना चाहिए, जो कि न पैसे से मिल सकती हैं, और न ही पैसे न रहने पर वे कहीं चली जाती हैं। जिंदगी की बुनियादी सोच ऐसी रहनी चाहिए कि जो बाजार में रोज आने वाले नए सामानों से अधिक खूबी रखने वाली हो।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 सितम्बर 2021


 

असहमति वाली विचारधारा की जगह तो ठीक है, लेकिन वह है कैसी यह भी देखना

  16 सितम्बर 2021

   वामपंथी राज वाले केरल के कन्नूर विश्वविद्यालय में अभी एक नया बवाल चल रहा है कि वहां पर एमए, शासन एवं राजनीति, के पाठ्यक्रम में हिंदुत्व के बड़े-बड़े नामों की लिखी हुई किताबों को शामिल किया गया है। विनायक दामोदर सावरकर, एमएस गोलवलकर, और दीनदयाल उपाध्याय की किताबों को कोर्स में शामिल करने पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग उबल पड़े हैं, और उन्होंने इसे शिक्षा के भगवाकरण का एक काम बताया है। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय के कुलपति का यह कहना है कि पोस्ट ग्रेजुएट छात्र-छात्राओं को सभी विचारधाराओं को पढऩे की जरूरत है ताकि वे बाकी विचारधाराओं के साथ तुलना करके एक आलोचनात्मक विश्लेषण कर सकें। कुलपति का कहना है कि पोस्ट ग्रेजुएट नौजवान छोटे बच्चे नहीं होते हैं कि वे किसी के लिखे हुए को पढक़र उससे सीधे प्रभावित हो जाएं बल्कि अलग-अलग विचारधाराओं को पढऩे के बाद विश्लेषण की उनकी क्षमता बढ़ती है। कन्नूर विश्वविद्यालय के कुलपति ने देश के दूसरे प्रमुख विश्वविद्यालयों का नाम भी गिनाये हैं जहां पर सावरकर और गोलवलकर का लिखा हुआ पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।


दूसरी तरफ केरल के उच्च शिक्षा मंत्री ने पाठ्यक्रम में इस जोड़-घटाने को अति संवेदनशील मामला बतलाया है और कहा है कि विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सांप्रदायिक सोच को जोडऩा एक खतरनाक काम है, अगर जरूरत रही तो पाठ्यक्रम से इन चीजों को हटाया जाएगा। इस मुद्दे को लेकर केरल, और केरल के बाहर के भी अलग-अलग तबकों का अलग-अलग कहना है। एक दिलचस्प फेसबुक पोस्ट कांग्रेस के सांसद और कांग्रेस के भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री रहे हुए शशि थरूर की है। थरूर एक सुपरिचित लेखक भी हैं और वे केरल से निर्वाचित लोकसभा सदस्य भी हैं। उन्होंने लिखा है कि कुछ दोस्तों ने शैक्षणिक आजादी की हिमायत करते हुए मेरे कथन को खारिज किया है, मेरा यह मानना है कि हमें हर नजरिए को पढऩे की जरूरत रहती है, उस नजरिए को भी जिससे कि हम असहमत रहते हैं। अगर हम सावरकर और गोलवलकर को नहीं पढ़ेंगे तो किस आधार पर उनकी सोच का विरोध करेंगे? उन्होंने कहा कि कन्नूर विश्वविद्यालय तो गांधी और टैगोर को भी पढ़ाता है। थरूर का कहना है कि किसी समाज में दलगत राजनीति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बौद्धिक आजादी रहती है। उन्होंने लिखा कि यह सोचना बेवकूफी की बात होगी कि किसी की विचारधारा से अपरिचित रहने से उस विचारधारा को परास्त करने में मदद मिलेगी। उन्होंने लिखा-मैंने अपनी किताबों में सावरकर, गोलवलकर को काफी खुलासे से लिखा है, और उनका विरोध किया है।


हिंदुस्तान में उच्च शिक्षा ही नहीं प्राथमिक और बाकी स्कूल शिक्षा भी राजनीतिक और धार्मिक सोच से समय-समय पर प्रभावित होती रही हैं। जैसी राज्य सरकार रहती है वैसी सोच में किताबें ढल जाती हैं. पाठ्यक्रम को तय करने में किसी तरह की कोई आजादी नहीं रहती, न ही स्कूलों को, न विश्वविद्यालयों को। आज हरियाणा और गुजरात जैसे राज्यों में स्कूलों में कई किस्म की सांप्रदायिक बातें पढ़ाई जा रही हैं, जिन्हें लेकर लोगों की बड़ी आपत्ति है, लेकिन क्योंकि सरकार चलाने वाली पार्टी की सोच वैसी है, इसलिए वहां पर अब किताबें उस सोच को पढ़ा रही हैं। इस विवाद को हम कुछ दूर से बैठकर देख रहे हैं, अभी हमने कन्नूर विश्वविद्यालय के पूरे पाठ्यक्रम को नहीं देखा है कि वहां पर इनकी किताबें इनकी विचारधारा को बताने की हैं, या उस विचारधारा का प्रोपेगेंडा है? फिर भी है कि यही पैमाना गांधी या दूसरे धर्मनिरपेक्ष सोच रखने वाले लोगों पर भी लागू होगा कि उनकी किताबें या उनके लिखे हुए का कौन सा हिस्सा पढ़ाया जा रहा है? क्या वह हिस्सा उनकी विचारधारा से परिचय कराने वाला है, या इस परिचय से कहीं आगे बढक़र, कहीं अलग जाकर उनकी विचारधारा का प्रचार करने वाला है? यह बहुत नाजुक पक्की बात है, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण बात भी है। केरल के इस विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम तय करने वाली कमेटी ने क्या सोचकर इन चीजों को पाठ्यक्रम में जोड़ा है, यह तो उसकी बैठकों की कार्रवाई में अगर दर्ज हुआ होगा तो उससे समझा जा सकता है, लेकिन हम इस बात को इतना आसान भी नहीं मान रहे हैं जितना इसे शशि थरूर कह रहे हैं। पहली बात तो यह है कि कौन सी विचारधारा कितनी महत्वपूर्ण है इसका मूल्यांकन करना भी पाठ्यक्रम कमेटी का काम होना चाहिए। अब अगर विचारधारा के नाम पर आसाराम या राम रहीम की विचारधारा को भी पढ़ाया जाए और कहा जाए कि जिसे खारिज करना है उसकी विचारधारा को पढऩा जरूरी है तो फिर अलग-अलग किस्मों से कई लोगों की विचारधाराओं को पढ़ाना चाहिए, जिसमें नक्सलियों की विचारधारा भी हो सकती है, जिसमें दूसरे किस्म के कई और अपराधियों की विचारधारा भी हो सकती है, हिटलर की विचारधारा भी हो सकती है, और फूलन देवी की विचारधारा भी हो सकती है। किस विचारधारा का कौन सा हिस्सा किस अनुपात में पढ़ाया जाए, उसे किस संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में पढ़ाया जाए, उसके साथ किस हिसाब से एक तुलनात्मक विश्लेषण किया जाए, यह एक बहुत जटिल और नाजुक मामला है।


दूसरी बात यह कि पोस्ट ग्रेजुएट  छात्र-छात्राओं को बहुत अधिक परिपच् को मान लेना भी ज्यादती होगी। इस देश में नौजवान पीढ़ी की परिपच्ता ऐसी बहुत अधिक दिख नहीं रही है। अगर नौजवान वोटर जो पहली बार या दूसरी बार वोट डाल रहे हैं, वे अगर इतने ही परिपच् रहते, इतने ही जिम्मेदार रहते, उनकी राजनीतिक समझ इतनी मजबूत हो चुकी रहती, तो देश-प्रदेश में कई जगह कई किस्म के लोग, और कई किस्म की पार्टियां भला कैसे जीत जाते?  इसलिए पाठ्यक्रम को तय करने वाले लोगों की अपनी सोच और विश्वविद्यालय को चलाने वाली विद्या परिषद और कार्यपरिषद जैसे फोरम को भी अपनी सोच का इस्तेमाल करना चाहिए, और अभिव्यक्ति की, विचारों की सारी स्वतंत्रता के साथ-साथ एक बड़ी बात यह भी है कि नौजवानों के दिल-दिमाग में भारतीय संविधान के मूल तत्व, भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी बातों को बैठाना जरूरी है, जो कि किसी भी दलगत राजनीति से परे की निर्विवाद बातें हैं। अगर देश की कोई सोच है इन बातों को कमजोर करने वाली है, इनके खिलाफ लोगों को सांप्रदायिक बनाती हैं, धर्मांध बनाती हैं, कट्टर बनाती हैं, वैज्ञानिकता से दूर ले जाती हैं, तो उन बातों का एक ऐसा विश्लेषण ही कोर्स में शामिल करना चाहिए जिससे उन बातों को महिमामंडित ना किया जाए, बल्कि उनकी उनका आलोचनात्मक विश्लेषण किया जाए। इस देश में कुछ किस्म की सोच ने लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है और लोकतंत्र के साथ-साथ इस देश में लोकतंत्र के आने के पहले से जो धार्मिक सहिष्णुता चली आ रही थी, उसे भी हिलाकर रख दिया है। इसलिए वैचारिक उदारता के नाम पर, विचारधारा की विविधता के नाम पर, छात्र-छात्राओं के सामने एक जिम्मेदार विश्लेषण पेश होना चाहिए और किसी भी तरह से विध्वंसक विचारधारा को बढ़ावा देना इस देश के लिए ठीक नहीं होगा। वैसे भी यह देश सामाजिक समरसता की तबाही की कगार पर पहुंचा हुआ है,  इसे और धक्का देने की गुंजाइश नहीं है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 सितम्बर 2021


 

फसलों पर अनुदान से खत्म नहीं हो जाती दिक्कतें, बल्कि शुरू होती हैं, देखें एक नजर

 15 सितम्बर 2021

  संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसियों ने अभी दुनिया में खेती पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट इस मायने में दिलचस्प है कि इसका अंदाज कहता है कि 80 फीसदी से ज्यादा सरकारी अनुदान या तो फसल की कीमतों को प्रभावित करते हैं, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं, या दुनिया में किसानों के बीच गैर बराबरी को बढ़ाते हैं। यह अंदाज कम खतरनाक नहीं है क्योंकि वैसे भी दुनिया के गैर किसान लोगों के बीच में, टैक्स देने वाले संपन्न लोगों के बीच में, खेती पर दी जाने वाली सब्सिडी को लेकर हमेशा से एक नाराजगी चली आती है कि इस सब्सिडी की वजह से किसान मेहनत करने के बजाए बैठे हुए सरकारी मदद पा जाते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट की एक बात यह भी है कि यह सब्सिडी को बंद करने के लिए नहीं कह रही है, यह रिपोर्ट कह रही है कि सब्सिडी किन लोगों को किस तरह से दी जा रही है, इसे सरकारों को दोबारा तय करना चाहिए।

आज मोटे तौर पर दुनिया में जगह-जगह किसानों को उनकी उपज अधिक दाम पर खरीदकर सरकारें सब्सिडी देती हैं या उन्हें खाद रियायती दर पर देती हैं, या उन्हें खेती के लिए कर्ज बाजार के भाव से कम ब्याज पर देती है. कई जगहों पर जिनमें हिंदुस्तान के छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी शामिल हैं वहां किसानों के खेती के कर्ज माफ कर दिए गए हैं, यह भी अलग-अलग राज्यों में कुछ जगहों पर कुछ मौकों पर हुआ है, और जाहिर है कि यह पूरा का पूरा खर्च सरकार के उसी खजाने से होता है जिससे विकास के दूसरे काम होते हैं, जिससे समाज के दूसरे तबकों को किसी तरह की सब्सिडी दी जाती है. तो यह पैसा कहीं अलग से नहीं आता है, किसान को किसी भी तरह से मिलने वाली सब्सिडी या कर्जमाफी सरकार की एक ही जेब से निकलती है, जिस जेब से दूसरे विकास काम होते हैं। तो यह बात ठीक है कि सरकारों को इस बारे में सोचना चाहिए कि उस सब्सिडी की वजह से समाज में कोई गैरबराबरी तो नहीं बढ़ रही है, एक दूसरी बात यह कि उस से पर्यावरण को कोई नुकसान तो नहीं पहुंच रहा है।

अब हम बातचीत की शुरुआत छत्तीसगढ़ में धान की खेती पर राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी से करते हैं क्योंकि इस राज्य में धान की कीमत पूरे देश में सबसे अधिक दी जा रही है। जाहिर है कि इससे धान उगाने वाला यह इलाका और अधिक धान उगाने की तरफ बढ़ता है, और सरकार की और अधिक रकम इस अनुदान पर खर्च होती है। अब इस सब्सिडी को सरकार अलग-अलग न्याय योजना, या किसी और नाम से लोगों तक देती है, और मौजूदा कांग्रेस सरकार ने अपने घोषणापत्र में कर्ज माफी की बात कही थी और सरकार बनने के बाद पहले ही दिन कर्ज माफी का यह फैसला लिया था और कुछ दिनों में ही बैंकों तक किसानों के कर्ज का पैसा पहुंच गया था जिसके लिए राज्य सरकार ने हजारों करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। ऐसी बात नहीं है कि छत्तीसगढ़ में पहले से इस बात पर चर्चा न हुई हो कि इस अनुदान की वजह से, अधिक दाम पर धान की खरीदी की वजह से, धान की वह फसल अधिक से अधिक उगाई जा रही है जो अधिक से अधिक पानी भी मांगती है। जबसे यह राज्य बना तबसे एक दूसरा मुद्दा जो चर्चा में था वह था फसल चक्र परिवर्तन का। इसमें यह कोशिश हो रही थी कि धान के बजाय कुछ दूसरी फसलों को कैसे लिया जा सकता है जिससे किसान को उसकी बुनियादी लागत तो थोड़ी सी अधिक लगेगी, मेहनत थोड़ी अधिक करनी पड़ेगी, कुछ नए बीज और नई तकनीक का इस्तेमाल करना पड़ेगा, लेकिन उसे फसल का धान के मुकाबले अधिक दाम मिलेगा। परंपरागत धान की फसल के साथ जुड़ी हुई किसान की सहूलियत ने उसे किसी दूसरी फसल की तरफ मुडक़र देखने नहीं दिया। और नमूने के तौर पर किसी एक जिले में किसी एक दूसरी फसल की बात को अगर छोड़ दें, तो मोटे तौर पर प्रदेश के तकरीबन तमाम किसान धान पर ही आश्रित हो गए हैं, और उसकी सरकारी खरीद के ही मोहताज हैं। अब इसका पर्यावरण पर असर यह पड़ रहा है कि खूब पानी लग रहा है और जो विविधता होनी चाहिए वह फसलों से खत्म होती चली गई है। फिर छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों के लिए 5 हॉर्स पॉवर तक के पंप के लिए मुफ्त बिजली देना तय किया था, जो कि जारी है, और ऐसे पंप तमाम भूजल खींचकर खेतों में डाल देते हैं, और छत्तीसगढ़ में जमीन के नीचे पानी का स्तर हर बरस गिरते चले जा रहा है। पूरी दुनिया में अब किसी भी नई फसल को लेकर पहली चर्चा यह होती है कि उसमें पानी कितना लगेगा। तो धान उगाने वाले इलाके हमेशा अधिक पानी की खपत करते हैं, और धान का अंधाधुंध रकबा बढ़ते चले जाना पर्यावरण पर एक दबाव भी डालता है। लेकिन यह हमने केवल छत्तीसगढ़ की, हमारे सामने की खड़ी हुई बातों का जिक्र किया है, अलग-अलग राज्यों में ऐसे अलग-अलग बहुत से मामले हैं जिन पर स्थानीय स्तर पर भी विचार होना चाहिए और राष्ट्रीय स्तर पर भी, जिस पर कोई नीति या कार्यक्रम बनना चाहिए।

लगे हाथों हम यहां पर एक दूसरी योजना की बात करना चाहते हैं जो भारत सरकार ने अभी-अभी घोषित की है। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने भारत में पाम ऑयल की खेती बढ़ाने के लिए एक बहुत बड़ी योजना की घोषणा की है जिसके तहत उत्तर-पूर्व के राज्यों और अंडमान जैसे राज्य में दूसरी खेती की बजाए, दूसरे पेड़ों के जंगल के बजाय, पाम ऑयल के बीज वाले पेड़ लगाने के लिए बहुत बड़ा अनुदान देना तय किया है, जिसके तहत शुरू के कुछ सालों में किसानों की आर्थिक मदद भी की जाएगी, जब तक उसकी फसल ना आने लगे, और किसानों को उसके लिए एक न्यूनतम समर्थन मूल्य देना भी तय किया गया है ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव होने से भारत के जो किसान पाम ऑयल की खेती करेंगे वह एकदम से नुकसान में ना चले जाएं। इसके कई मायने हैं, एक तो यह यह सब्सिडी क्या भारत में तेल के दूसरे बीज उगाने वाले परंपरागत किसानों को भी हासिल है, या एक विदेशी फसल को हिंदुस्तान में बढ़ावा देने की सरकार की इस योजना के लिए केवल पाम ऑयल के पेड़ लगाने वाले लोगों को ही इसका फायदा मिलेगा? एक दूसरा मामला यह है कि परंपरागत दूसरे तेल बीज की फसल के लिए चल रहे उद्योगों का क्या हाल होगा? ऐसे बहुत से मुद्दे हैं लेकिन इसके साथ-साथ एक मुद्दा यह भी जुड़ा हुआ है कि भारी सरकारी अनुदान के साथ शुरू होने वाली इस फसल में बहुत सारा पानी भी लगेगा जो कि पर्यावरण को प्रभावित करेगा, और एक बड़ी बात यह है कि बड़े पैमाने पर पाम ऑयल के पौधे लगाए जाने पर जैव विविधता खत्म होगी जिससे जंगलों और खेतों दोनों का एक बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है। पेड़ों के साथ-साथ बहुत से पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों की जिंदगी भी जुड़ी रहती है, वह किस तरह से नुकसान झेलेगी इसका भी कोई अंदाजा नहीं है। लेकिन यह बात सबको समझ आ रही है कि सरकार की यह अतिमहत्वाकांक्षी योजना पर्यावरण के लिए, अर्थव्यवस्था के लिए, कई किस्म की दिक्कतें खड़ी कर सकती है, और किसी एक खास फसल के लिए केंद्र सरकार की इतनी बड़ी अनुदान योजना क्या देश की बाकी मौजूदा फसलों के साथ एक संतुलन नहीं बिगाड़ेगी? ऐसे कई सवाल हैं।

हम विचारों के इस कॉलम में आज उन पर बहुत विस्तार से टिप्पणी नहीं कर सकते क्योंकि वह तकनीकी जानकारी के साथ और उनके विश्लेषण के साथ लिखे जाने वाले लंबे लेख के लायक मुद्दे हैं। लेकिन हम छत्तीसगढ़ में धान की जरूरत से अधिक फसल से लेकर उत्तर पूर्व में दूसरी फसलों और दूसरे पेड़ों के जंगलों की जगह लगाए जाने वाले पाम ऑयल के पेड़ों तक बहुत से मुद्दों के बारे में चर्चा करना चाहते हैं कि सरकारी अनुदान पर आधारित खेती के साथ पर्यावरण के जो मुद्दे जुड़े हुए हैं उन पर जरूर ध्यान देना चाहिए, जैव विविधता से जुड़े हुए जो मुद्दे हैं उनके बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि सरकारी अनुदान लोगों को उसका फायदा लेने उसका फायदा पाने की हकदार फसलों की तरफ बढ़ाता है और उस पर फिर सरकार का भी काबू नहीं रह जाता। सरकारें क्योंकि निर्वाचित रहती हैं इसलिए वे अनुदान को चुनावी फायदे से जोडक़र भी चलती हैं, इसलिए एक बार जब ऐसे अनुदान शुरू हो जाते हैं तो उनका खत्म होना मुश्किल या नामुमकिन हो जाता है। हम किसी भी अनुदान को बंद करने की सिफारिश नहीं कर रहे हैं लेकिन किसी भी अनुदान को शुरू करने के पहले केंद्र या राज्य सरकार को उस अनुदान के शुरू होने के बाद होने वाले पर्यावरण के फेरबदल के बारे में अध्ययन करने के लिए हम जरूर कह रहे हैं। यह जनता का पैसा है इसे जिन लोगों को मदद के लिए देना जरूरी लग रहा है उन्हें देना सरकार का हक है, लेकिन यह धरती का नुकसान करने की कीमत पर नहीं होना चाहिए। पर्यावरण का जो नुकसान सरकारों की नीतियां करती हैं उनमें धरती, पेड़, पानी, जंगल, जानवर, इनकी कोई आवाज इसलिए नहीं सुनी जाती कि इनके हाथ में कोई वोट नहीं होता है। लेकिन आने वाली पीढिय़ों को बहुत बुरी तरह नफा या नुकसान पहुंचाने वाली आज की चुनावी नीतियों के बारे में सरकारों को गंभीरता से सोचना चाहिए। सरकारें शायद कोई कड़वे फैसले ले नहीं सकतीं और लुभावने फैसले लेने के लिए बेताब रहती हैं, इसलिए पर्यावरण के जानकार लोगों को, समाज के जागरूक लोगों को, इन मुद्दों को लगातार उठाना चाहिए और लोगों के सामने रखना चाहिए कि चुनावी घोषणा पत्र के लोकप्रिय मुद्दे या कि लाल किले से की गई घोषणाएं इन 5 वर्षों के बाद अगले सौ-पचास बरस तक इस धरती के पर्यावरण को कैसे प्रभावित करेंगी।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 सितम्बर 2021


 

दिवस पर हिंदी पर कर लें कुछ चर्चा?

    14 सितम्बर 2021

   आज के दिन हिंदी दिवस मनाया जाता है। लोग इस भाषा के बारे में कई तरह की बातें लिखते हैं और सालाना श्रद्धांजलि के अंदाज में इस भाषा के महत्व को याद किया जाता है। ऐसे मौकों पर बहुत से लोग भावुक होने लगते हैं और राष्ट्रभाषा की उपेक्षा गिनाते हुए वे हिंदी सेवा की जरूरत पर बोलने और लिखने लगते हैं। हिंदी सेवा, हिंदी सेवक जैसे शब्द पूरे वक्त कहीं न कहीं हवा में तैरते रहते हैं। बहुत से लोग इसी नाम से बनाए गए संगठनों की कुर्सियों पर काबिज रहते हैं, कुछ लोग इसे एक पूर्णकालिक पेशे की तरह भी बना लेते हैं और वे हिंदी सेवक का दर्जा पाकर एक किस्म की शहादत की कोशिश में लग जाते हैं। यह माहौल कुछ उसी तरह का लगता है जैसे घूरों पर पलती गायों के देश में लोग पूर्णकालिक गौसेवक हो जाते हैं। गाय को सिर्फ पॉलिथीन वाला घूरा नसीब होता है और गौसेवक गाय के हिस्से की रोटी खाने लगते हैं।

हिंदी भाषा की सेवा बड़ा मजेदार शब्द है। हिंदी को कम पढऩे वाले कोई विदेशी अगर सुनेंगे तो वे हिंदी को मां समझेंगे और उन्हें लगेगा कि ऐसे सेवक मां के पैर दबाने में लगे रहते हैं। हम अपनी साधारण समझ से जब यह सोचते हैं कि इस बड़े देश में सबसे बड़ा हिस्सा जब हिंदी बोलने वालों का है, तो फिर हिंदी इस्तेमाल करने वालों का बुरा हाल क्यों है? कुछ लोग इस बात को मुगल राज तक ले जाएंगे जब भारत में उर्दू का प्रचलन शुरू हुआ और सरकारी कामकाज उसमें होने लगा। फिर अगर देखें तो ईस्ट इंडिया कंपनी आई और देश का सरकारी काम, अदालती काम उर्दू के साथ-साथ अंग्रेजी में भी होने लगा। फिर जब भारत के आजाद होने का वक्त आया, देश के संविधान को बनाने की बात आई, तो दुनिया के बहुत से संविधानों की मिसालें अंग्रेजी में थीं, और भारत का उस वक्त का सत्ता का तबका अंग्रेजी जानने-समझने वाला था, तो कानून अंग्रेजी में बना। सरकार का कामकाज भी आजादी के बाद अंग्रेजी में शुरू हुआ, इसलिए देश के बीच के एक बड़े हिस्से को छोडक़र बाकी राज्यों में हिंदी बोलचाल की भाषा भी नहीं थी, बोली भी नहीं थी।

भारत के नक्शे को अगर देखें तो दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान इतने राज्य ही अपने थोड़े या अधिक हिस्से में हिंदी बोलने वाले थे, बाकी के तमाम राज्य हिंदी से परे की दूसरी जुबानों वाले थे। और जिन राज्यों को यहां हम गिना रहे हैं, इनके भीतर भी क्षेत्रीय बोलियां बहुत ताकतवर थीं, जैसे छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी, और दो-तीन और बोलियां, ऐसा हाल हिंदी भाषी इन प्रदेशों का भी था। जैसे भोजपुरी में, राजस्थानी में, हरियाणवी और गढ़वाली में कितने ही किस्म की फिल्में बनती हैं, संगीत रिकॉर्ड होता है, साहित्य लिखा जाता है, लोकगीत चले आ रहे हैं। इनकी लिपि देवनागरी होने से इनको हिंदी भाषी मान लिया गया और वह गिनती हकीकत से थोड़ी दूर रही।

लेकिन यह भी बहुत बड़ा मुद्दा नहीं था, और हिंदी से सत्ताहीन तबके, कमजोर तबके, उद्योग-बाजार और आयात-निर्यात से परे के तबके, तकनीकी शिक्षा और उच्च शिक्षा से परे के तबके अपना काम चलाते रहे और कमजोर बने भी रहे। चूंकि कामयाबी का एक रिश्ता अंग्रेजी से एक सदी से अधिक से बना हुआ था, इसलिए वह चलते रहा, और देश के बाहर हिंदुस्तान का अधिकतर लेना-देना अंग्रेजी भाषी देशों से था इसलिए भी वह चलते रहा। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते-समझते थे, और जिनके लिए हिंदी में ऊंची पढ़ाई करना मुश्किल था, बाहरी दुनिया से संपर्क मुश्किल था, कम्प्यूटर से लेकर टेक्नोलॉजी तक का काम मुश्किल था, वे पीछे रहते चले गए। और जिस तरह पीछे रह गई एक पीढ़ी की अगली पीढ़ी के पीछे रहने का खतरा अधिक रहता है, उसी तरह का हाल हिंदी बोलने वालों का हुआ। दूसरी तरफ हिंदी को एक भावनात्मक मुद्दा मानने वाले लोग उसकी सेवा के नाम पर अंग्रेजी के विरोध को आक्रामक तरीके से बढ़ाते रहे, और हिंदी इलाकों में एक के बाद दूसरी पीढ़ी अंग्रेजी की जानकारी के बिना, अंग्रेजी में काम करने वाले राज्यों के लोगों से पीछे रहती चली गईं।

भाषा को लेकर आज इस जगह इस चर्चा में अपने विचार लिखने के लिए हमारे पास दो छोटी-छोटी बातें हैं। एक तो यह कि हिंदुस्तान में जो लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हैं उनको यह भी समझना होगा कि जिस शुद्ध हिंदी को वे राष्ट्रभाषा करार देना चाहते हैं, वह हिंदी यहां की राष्ट्रभाषा नहीं रही, नहीं है, और नहीं रहेगी। मुगलों की उर्दू और अंग्रेजों की अंग्रेजी आने के पहले भी हिंदुस्तान के आज के कुछ हद तक के हिंदी भाषी राज्यों में स्थानीय और क्षेत्रीय बोलियों की इतनी जबर्दस्त पकड़ थी, और आज भी है कि आज की खड़ी बोली जैसी हिंदी, शुद्ध कही जाने वाली हिंदी, मोटे तौर पर बहुत सीमित थी। जिस तरह हिंदी को अलग, और हिंदुस्तानी को अलग मान लिया जाता है, उससे हिंदी का बहुत बड़ा नुकसान हुआ। आज की हिंदी के साथ उर्दू, अंग्रेजी, और हिंदुस्तान की दर्जनों दूसरी भाषाओं और बोलियों ने मिलकर जो हिंदुस्तानी जुबान बनाई है, उसमें से फेंटकर सिर्फ खालिस हिंदी को जब अलग कर लिया जाता है, और उसे एक सेवा की तरह की भावना से जोड़ दिया जाता है तो वह बाकी हिंदुस्तानियों के काम की नहीं रह जाती। जिस तरह किसी मिली-जुली हिंदू-मुस्लिम समाधि या दरगाह पर जब इनमें से किसी एक ही धर्म के रीति-रिवाज, उसी धर्म के रंगों को लेकर हावी हो जाते हैं, तो दूसरे धर्म वहां से हटना बेहतर समझते हैं। इसी तरह का हाल हिंदी का हुआ, और हिंदी इलाकों को यह ठीक से पढऩे-समझने भी नहीं मिला कि गैरहिंदी राज्यों में, खासकर दक्षिण के राज्यों में हिंदी किस हद तक बेकाम की जुबान है। उसका न कोई अस्तित्व है, न उसकी वहां कोई जरूरत है। वहां हिंदी जानने, समझने और बोलने वाले लोग ऐसे कामगार हैं जिनका कि भारत के हिंदी भाषी राज्यों से कामकाज का वास्ता पड़ता है। इससे परे वे अपनी क्षेत्रीय भाषा में खुश हैं और आगे बढऩे की संभावनाएं देने वाली अंगे्रजी जुबान के साथ खुश हैं।

हिंदुस्तानी से अपने-आपको अलग करने के फेर में शुद्धतावादी हिंदी ने अपने दायरे को बहुत सीमित कर लिया। वरना एक वक्त था जब प्रेमचंद जैसे लेखक उर्दू को भी समझते थे, उर्दू में भी लिखते थे, और जब वे हिंदी लिखते थे, तो वह गरिष्ठतावादी, शुद्धतावादी हिंदी से परे की हिंदुस्तानी जुबान होती थी, यही वजह है कि वह आसानी से लोगों के समझ आती थी, और आज पौन सदी बाद भी वह आज के बहुत से हिंदी लेखन के मुकाबले समझने में अधिक आसान है। हिंदी की सेवा या शुद्धता के नाम पर जो लोग लगे रहते हैं, उन्हीं से इस भाषा की संभावनाओं को नुकसान हुआ। किसी भाषा का असरदार होना, उसकी संवाद-क्षमता का अधिक होना जरूरी होता है, न कि उसका शुद्ध होना। हिंदी को जब लगातार शुद्ध बनाए रखने की ऐसी कोशिशें हुईं कि वह अधिक से अधिक लोगों की समझ से परे होती चली गई, तो वह अपना असर और खोती चली गई, क्योंकि वह कम लोगों के इस्तेमाल की रह गई। हिंदी के साथ एक दिक्कत और यह हो गई है कि अंग्रेजी से नापसंदगी के चलते हिंदी के जो लोग अंग्रेजी से परहेज करने लगे, उनका ज्ञान-संसार भी सीमित रहने लगा, और ज्ञान के विकल्प की तरह उन्होंने भावनाओं और विशेषणों का इस्तेमाल अधिक किया।

भाषा इस्तेमाल के लिए होती है, उसका मकसद किसी से अपने पैर दबवाना नहीं है, उसका मकसद किसी एक की बात को दूसरे तक पहुंचाना है। भाषा एक औजार की तरह है जो अगर अच्छी तरह अपना काम करे, हुनरमंद कारीगर के काम में उससे मदद मिले, तो ही उस औजार की इज्जत है। जिस घन से अच्छा वार हो सके, वह लोहे का भी अच्छा। और जिसके वार से चोट न पहुंचे, वह सोने का घन भी किसी काम का नहीं। इसलिए भाषा को बांहें फैलाकर दूसरी भाषाओं और बोलियों से मिलकर चलना चाहिए, उन्हें गले मिलाकर चलना चाहिए। भाषा से बिल्कुल परे की एक मिसाल हम यहां देना चाहेंगे जो कि हमें अपने किस्म की बेमिसाल बात लगती है। सिखों के सबसे महान ग्रंथ गुरूग्रंथ साहिब को देखें तो गुरूनानक देव ने उस वक्त के मुस्लिम, हिंदू, दलित, सभी तबकों के संतों की बातों को सिखों के इस ग्रंथ में उनके नाम सहित जोड़ा। गुरूनानक चाहते तो उन्हें सिर्फ अपनी बातों से ही यह ग्रंथ पूरा कर देने से कौन रोक सकता था? दुनिया के अधिकांश धार्मिक गं्रथ सिर्फ अपनी ही बातों के होते हैं। लेकिन धर्मों की ऐसी दुनिया में जब गुरूनानक देव ने बेझिझक दूसरे धर्मों को इतना महत्व दिया, तो उनकी उस दरियादिली से भी यह ग्रंथ इतना महत्वपूर्ण बन पाया। इसी तरह का हाल जुबान के मामले में अंग्रेजी का रहा, जिसने दुनिया की दर्जन भाषाओं से सैकड़ों शब्दों को हर बरस अपने में शामिल करने का सिलसिला चला रखा है और अंग्रेजी के शब्दकोषों में ऐसी लिस्ट हर साल जुड़ती भी है।

विचार के इस कॉलम में इस बड़े मुद्दे पर पूरा लिखना मुमकिन नहीं है इसलिए हम आधी-अधूरी बात को ही यहां छोड़ रहे हैं, यहां उठाए गए कुछ पहलुओं पर कुछ सोच-विचार की उम्मीद के साथ। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 सितम्बर 2021


 

एक बेलगाम शासन-प्रमुख से किस तरह श्रीलंका आर्थिक इमरजेंसी में !

   13 सितम्बर 2021

 भारत के ठीक पड़ोस का एक देश श्रीलंका इन दिनों आर्थिक इमरजेंसी से गुजर रहा है। देश की हालत यह हो गई है कि लोग दाने-दाने को मोहताज हो रहे हैं, दुकानों में सामान खाली हो चुका है, लोग खाली झोले लिए हुए दुकानों के सामने लंबी कतारों में हैं, सामानों के दाम आसमान पर पहुंच रहे हैं. जो सामान आयात किया जाता है उसके कारोबारी भी बुरी दिक्कतें झेल रहे हैं क्योंकि श्रीलंका के रुपए का दाम डॉलर के मुकाबले 200 तक पहुंच गया है, और सरकार ने चीजों के आयात या विदेशी मुद्रा के इस्तेमाल पर कई तरह की बहुत ही कड़ी रोक लगा दी है। देश में हालत कितनी खराब है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां की फौज के एक मेजर जनरल को खाने-पीने के सामानों के इंतजाम में लगाया गया है कि वह व्यापारियों की जमाखोरी पर नजर रखे जहां नियमों के खिलाफ सामान इक_े किए गए हैं उन्हें जप्त करे, और सरकारी ढांचे के तहत उन्हें उचित दामों पर ग्राहकों को बेचने का इंतजाम करें। श्रीलंका की सेना अब इस काम को देख रही है। लेकिन यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि श्रीलंका की इस नौबत के लिए कौन सी बातें जिम्मेदार हैं?

इस सिलसिले की शुरुआत कुछ जानकार लोगों के मुताबिक अप्रैल के महीने से होती है जब वहां के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने यह फैसला लिया कि पूरे देश में रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद किया जा रहा है। क्योंकि रासायनिक खाद पूरे का पूरा आयात होता था, इसलिए यह सरकार के हाथ में था कि खाद का आयात, और इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया जाए और देश को पूरी तरह जैविक खाद की तरफ ले जाया जाए। खबरें बताती हैं कि राष्ट्रपति राजपक्षे ने संयुक्त राष्ट्र में भाषण देते हुए अपने इस फैसले को ऐतिहासिक फैसला बताया था और दुनिया के भविष्य को बदलने वाला भी। राजपक्षे ने दुनिया के दूसरे देशों को भी यह नसीहत दी थी कि वे भी पूरी तरह रासायनिक खाद को बंद करके पूरी तरह जैविक खाद की तरफ जाएं। अब दिक्कत ये हुई है कि श्रीलंका की खेती जिसमें कई किस्म की फसल देशों से निर्यात होती थी, उनमें चाय पत्ती की फसल इस बार आधी ही रह जाने की आशंका चाय उगाने वाले संगठनों को है. कुछ ऐसा ही किसान संगठनों का मानना है कि देश में चावल की उपज इस साल आधी रह जाएगी। राष्ट्रपति के इस अतिमहत्वाकांक्षी या उन्मादी किस्म के फैसले का नतीजा यह निकला है कि देश में जैविक खाद का उत्पादन तो रातों-रात नहीं बढ़ पाया, लेकिन रासायनिक खाद आना बंद हो गया। श्रीलंका के बाहर के भी बहुत से कृषि वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस किस्म का फैसला एक रसायन-विरोधी सोच या पसंद को बताने वाला तो हो सकता है, लेकिन इसका व्यावहारिकता से कोई लेना-देना नहीं है। वैज्ञानिक मानते, और जानते हैं कि दुनिया के किसी देश ने इस तरह रातों-रात रासायनिक खाद को छोडऩे में कामयाबी नहीं पाई, और न ही कोई देश पूरी तरह से जैविक खाद पर जा पाया है। यूरोप के जो सबसे संपन्न देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था सबसे मजबूत है, वे देश भी पूरी तरह जैविक खाद पर नहीं जा पाए हैं।

दुनिया के वैज्ञानिक और अर्थशास्त्रियों का यह अंदाज है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति का यह सनकी, मनमाना, और बिना किसी वैज्ञानिक आधार के लिया गया यह फैसला देश को तबाह करने जा रहा है, क्योंकि इसके पीछे न किसानी की समझ है, न अर्थशास्त्र की समझ है। यह केवल एक ऐसे शासक के तानाशाह दिमाग से निकला हुआ फैसला है, जो यह सोचता है कि वह कुछ भी कर सकता है। क्योंकि श्रीलंका की सरकार पूरी तरह से राजपक्षे कुनबे तले दबी हुई है, इसलिए कुनबे से भरा हुआ मंत्रिमंडल राष्ट्रपति के साथ है, और कोई वहां पर विरोध कर नहीं पा रहा है। राजपक्षे के छोटे भाई महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री हैं, तीन और मंत्री घर के हैं. कहने के लिए तो देश में आज सिर्फ आर्थिक आपातकाल लगाया गया है लेकिन वहां के कानून के जानकार लोगों का कहना है कि यह पूरी तरह से पूरा-आपातकाल ही है, और इसमें नागरिकों पर वे सारे प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जो इसके पहले के आपातकाल में लगाए गए हैं। इसका मतलब यह है कि लोग वहां सरकार की किसी बात का विरोध नहीं कर पाएंगे, सरकार उन्हें बिना लंबी सुनवाई जेलों में बंद रख सकेगी, और देश की फसल गिरने की जो खतरनाक नौबत वहां आई हुई है, उसे छुपाए रखने के लिए, दबाए रखने के लिए मीडिया और आम लोगों को कुचला भी जा सकता है। श्रीलंका जो कि अभी कुछ अरसा पहले तक इस इलाके की एक अच्छी अर्थव्यवस्था माना जाता था, उसने अपने शासन प्रमुख के इस एक मनमाने फैसले के चलते दम तोड़ दिया है, और लोगों को खाने-पीने तक के सामान नसीब नहीं हो रहे हैं। यह किसी भी देश के लिए एक भयानक नौबत है कि वहां की सेना राशन का इंतजाम देख रही है।

जब कोई देश इस किस्म की भयानक हालत का शिकार रहता है, तो वह अंतरराष्ट्रीय शिकारियों के लिए एक शिकार भी बन जाता है। भारत के बहुत से लोग पिछले वर्षों की श्रीलंका की चीन नीति देखते हुए कुछ परेशान भी चल रहे थे कि श्रीलंका धीरे-धीरे चीन पर अधिक से अधिक निर्भर होते चल रहा है। अब आज हालत यह है कि श्रीलंका के इस आर्थिक आपातकाल के पहले के एक साल में चीन ने उसे बहुत बड़ा कर्ज दिया हुआ है। श्रीलंका की कोरोना की पहली लहर से जूझने की कई जगहों पर तारीफ हो रही है और इसके साथ ही यह याद रखना जरूरी है कि श्रीलंका को चीन से कोरोना की वैक्सीन मिली, भारत से नहीं मिली। श्रीलंका को चीन से कर्ज मिला, भारत से नहीं मिला। भारत के पिछले कर्ज की वापिसी के लिए श्रीलंका ने कुछ और समय मांगा है, उस पर भी भारत ने अब तक कोई फैसला नहीं लिया है। इसलिए आज चीन आज श्रीलंका के आड़े वक्त पर उसके साथ में खड़ा हुआ देश है, और भारत को यह सोचना चाहिए कि एक तरफ पाकिस्तान, कुछ दूरी पर अफगानिस्तान, और इधर श्रीलंका, क्या यह सब मिलकर भारत की एक चीनी घेराबंदी नहीं बन रहे हैं?  दूसरी तरफ आज श्रीलंका जैसी मुसीबत से गुजर रहा है और उसे मदद की जितनी जरूरत है, उसमें हिंदुस्तान को अपनी विदेश नीति के तहत श्रीलंका के किस हद तक काम आना है, इसे तय किया जाना चाहिए। अगर सरकार यह तय करती है कि उसे कुछ भी नहीं करना है, तो यह एक फैसले के तहत होना चाहिए, न की कोई फैसला न लेने से ऐसी नौबत आनी चाहिए।

श्रीलंका दुनिया के तमाम देशों के लिए मनमाने आत्मघाती तानाशाह फैसले का शिकार एक देश बनकर बुरी हालत में सामने खड़ा है, देखें आगे से कौन-कौन से देश और कौन-कौन से शासन प्रमुख क्या-क्या सबक लेते हैं। श्रीलंका की नौबत से दुनिया के दूसरे देशों को चाहे जो सबक लेना हो वे लेते रहें, और शायद यह सबक सबको लेना चाहिए कि कोई शासन प्रमुख अपने बेबुनियाद और मनमाने फैसलों से देश को किस तरह गड्ढे में डाल सकते हैं, और किस तरह लोकतांत्रिक देशों को ऐसे फैसलों, और ऐसे शासकों से बचना चाहिए। श्रीलंका की भुखमरी की नौबत की तरफ जाने के खतरे को देखते हुए भारत सहित दूसरे देशों को मनमाने सरकारी फैसलों के बारे में दोबारा सोचना चाहिए। यह सोचना चाहिए कि वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों के हिस्से का काम मामूली पढ़े-लिखे नेताओं को नहीं करना चाहिए।

(Dail y Chhattisgarh)