दलित छात्रों को सेप्टिक टैंक की सफाई की सजा, घटना नहीं राष्ट्रीय सोच है

 19 दिसंबर 2023  

  

कर्नाटक के एक सरकारी हॉस्टल-स्कूल में दलित बच्चों को सजा देने के लिए प्रिंसिपल ने उनसे पखाने के सेप्टिक टैंक की सफाई करवाई। स्कूली बच्चे जब सेप्टिक टैंक के भीतर उतरकर उसकी सफाई कर रहे थे, तो उस वक्त के कुछ फोटो और वीडियो चारों तरफ फैले। सोशल मीडिया पर इनके आने के बाद सरकार की नींद खुली, और प्रिंसिपल और उसके मातहत कुछ शिक्षक-कर्मचारी निलंबित किए गए, और सरकार की तरफ से पुलिस में इसके खिलाफ एसटी-एससी कानून के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई गई। कोलार जिले के मोरारजी देसाई आश्रम-स्कूल के इस मामले में हिन्दुस्तान में दलितों के खिलाफ भेदभाव, छुआछूत, और हिंसा को एक बार फिर बुरी तरह उजागर कर दिया है। भारत में सफाई कर्मचारी हर बरस सेप्टिक टैंक और गटर साफ करते हुए मारे जाते हैं, और पिछले पांच बरस में सवा तीन सौ से अधिक ऐसी मौतें हो चुकी हैं। जो लोग आरक्षण के खिलाफ हिंसक बातें करते हैं, कभी उनके मुंह से यह सुनाई नहीं पड़ता कि सफाई कर्मचारियों में भी गैरदलितों के लिए आरक्षण होना चाहिए। सच तो यह है कि शहरी संपन्न तबका पूरी तरह से इस भरोसे पर गंदगी करते चलता है कि सफाई करने को दलित तबका अनंतकाल तक मौजूद रहेगा। अब दलितों के बारे में गैरदलितों की यह सोच हिंसक होकर इस हद तक पहुंच गई कि एक सरकारी स्कूल-हॉस्टल के प्रिंसिपल ने दलित बच्चों को सेप्टिक टैंक की सफाई की सजा दी, जबकि ऐसी सफाई में मौतों की खबरें आती रहती हैं। 

हम किसी एक प्रदेश की एक स्कूल के प्रिंसिपल और शिक्षकों पर ही आज की इस पूरी बात को खत्म करना नहीं चाहते क्योंकि देश के कई प्रदेशों में इस तरह की हिंसा होती रहती है। आज कर्नाटक में जिस कांग्रेस पार्टी की सरकार है, उसी पार्टी की सरकार राजस्थान में थी, जब आजादी की 75वीं सालगिरह देश भर में मनाई जा रही थी, और एक शिक्षक ने एक दलित छात्र को पीट-पीटकर इसलिए मार डाला था कि उसने सवर्ण जाति के लिए अलग से रखी गई मटकी का पानी पी लिया था। शिक्षक ने उसे गालियां बकते हुए इतना पीटा था कि भीतरी चोटों से वह मर गया। तमिलनाडु में जहां पर कि दलित-हिमायती डीएमके सरकार है, वहां पर अभी सितंबर के महीने में ही एक दलित स्कूली बच्चे को तीन गैरदलित छात्रों ने इतना मारा कि वह टूटे हाथ-पैर सहित अस्पताल में पड़ा है, और उसकी बहन भी द हिन्दू अखबार में छपी इस तस्वीर में टूटे हाथ सहित अस्पताल के कमरे में एक कुर्सी पर दिख रही है। इस अखबार की खबर कहती है कि तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों में बहुत से छात्र-छात्राएं अपनी कलाई पर जाति सूचक धागे बांधते हैं। एक दलित-हिमायती शासन वाले राज्य में जाति सूचक ऐसे संगठनों की भरमार है जो कि अपने सवर्ण होने के अहंकार में डूबे रहते हैं। आजादी की सालगिरह वाले अगस्त महीने में ही तमिलनाडु में दलितों पर ऐसे तीन हमले हुए हैं। भाजपा के योगीराज वाले यूपी के अमेठी जिले में दस-दस बरस के दलित स्कूली बच्चों को दोपहर के भोजन की कतार में अलग खड़े रखने के लिए स्कूल प्रिंसिपल ने ही उन पर हिंसा की थी। यह एक सरकारी स्कूल का मामला था, और गैरदलित प्रिंसिपल दलित बच्चों को लगातार पीटती रहती है। यूपी में ही सितंबर 2022 में एक दलित बच्चे की हिज्जे की एक गलती पर एक टीचर ने उसे इतना पीटा था कि यह बच्चा इन चोटों से अस्पताल में मर गया। 

ऐसी घटनाओं को इंटरनेट पर बड़ी आसानी से एक पल में ढूंढा जा सकता है, और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के इस अमृतकाल में देश में आज दलितों की जो हालत है उसे देखने के लिए मोबाइल-इंटरनेट वाले लोगों को ऐसी खबरों को पल भर में ढूंढ भी लेना चाहिए, और कुछ मिनट देश की इस हकीकत को जानने में लगाना भी चाहिए क्योंकि गैरदलितों के बीच इन मुद्दों की ऐसी कोई समझ नहीं है, न उनके कोई सरोकार हैं। संविधान में दलितों को जो आरक्षण मिला है, उससे परे उन्हें कानून से भी पूरी हिफाजत नहीं मिल पाती, क्योंकि उसे लागू करने वाले अफसर, जुर्म पर सजा देने वाली अदालतें, इन सबके भीतर एक बहुत गहरा दलित-विरोधी पूर्वाग्रह भरा हुआ है। दलित-आदिवासी आरक्षण को लेकर देश के अनारक्षित तबकों में अब तक सरकारी दामाद कहने का चलन रहा है। और तो और वे ओबीसी लोग भी इसी जुबान का इस्तेमाल करते थे, जो कि कुछ अरसे से ओबीसी आरक्षण पा रहे हैं, और आज जाति जनगणना के बाद संसद और विधानसभाओं में भी राजनीतिक आरक्षण पाने का भरोसा रख रहे हैं। 

हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने अभी दो-चार दिन पहले ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों में आरक्षण लागू करने की वकालत की है, और ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि आरक्षित तबके के लोगों को, खासकर दलित-आदिवासियों को नालायक मानने की एक सवर्ण सोच खत्म हो। देश के संविधान निर्माताओं में एक दलित, डॉ.भीमराव अंबेडकर का नाम सबसे ऊपर है, जो कि दलित समाज के थे, लेकिन आज 140 करोड़ आबादी के इस शहर में सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि उसकी 32 कुर्सियों में से कुछ कुर्सियों पर आरक्षण के लायक भी दलित नहीं मिल पाएंगे। हमारा ख्याल है कि कर्नाटक के स्कूल में प्रिंसिपल ने दलित बच्चों को जो यह सजा दी है, वह ऐसे ही सवर्ण अहंकार से उपजी हुई सजा है। जब तक देश की बड़ी अदालतों में यह आरक्षण लागू नहीं होगा, तब तक स्कूली प्रिंसिपलों और टीचरों से दलितों के सम्मान की उम्मीद करना फिजूल बात होगी।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 दिसंबर 2023


 

करोड़ों प्राणियों में कमीनगी पर इंसानों का एकाधिकार..

 18 दिसंबर 2023  

  

बॉम्बे हाईकोर्ट में अभी एक केस सामने आया जिसमें एक आदमी ने शादी के कुछ साल बाद तक लडक़ा न हुआ, तो दूसरी शादी कर ली। दूसरी बीवी से बेटा हो गया। साथ रह रही पहली बीवी को भी बेटा हो गया। इसके बाद उस आदमी ने पहली बीवी के कहने पर दूसरी को घर से निकाल दिया, जो कि उसके बेटे की मां भी थी। अब मामला गुजारा-भत्ता के लिए हाईकोर्ट तक पहुंचा तो वहां अदालत ने इस आदमी को जमकर फटकार लगाई, और कहा कि पहली शादी के बरकरार रहते हुए उसने पहले तो दूसरी शादी की, और अब वह दूसरी पत्नी को अलग करके उसके गुजारे की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। यह मामला 1989 में हुई दूसरी शादी का है, और 2012 में दूसरी पत्नी को गुजारे के लिए अदालत जाने की जरूरत पड़ी। 2015 में निचली अदालत के हुक्म पर भी अब पति ने दूसरी पत्नी को मासिक भत्ता देना बंद कर दिया है, अब हाईकोर्ट ने इस पति को फटकार लगाई है, और महिला को छूट दी है कि वह भत्ता बढ़ाने की मांग कर सकती है।

इंसान बात-बात पर अपने भीतर की हिंसा, दगाबाजी, बेईमानी को लेकर जानवरों की मिसालें देते हैं। कहीं भेड़ की खाल ओढक़र धोखा देने वाले भेडिय़े की बात कहते हैं, कहीं आस्तीन में सांप की मिसाल, कहीं मूर्खता के लिए गधे की कहानियां, तो कहीं बहादुरी की मिसाल के लिए शेर की कहावतें, यह अंतहीन है। इनमें से कोई भी जानवर इंसानों जैसे घटिया नहीं होते। वे अपनी नस्ल के प्राकृतिक मिजाज के मुताबिक रहते हैं, अगर वहां एक से अधिक साथियों से देहसंबंध स्वाभाविक है, तो उसे निभाते हैं, और पेंगुइन जैसे कुछ प्राणी एक साथी के साथ भी जीने वाले कहे जाते हैं। हम किसी पेंगुइन को कोई चरित्र प्रमाणपत्र नहीं दे रहे, लेकिन कई और भी ऐसे पशु-पक्षी हैं जिन्हें एक ही जोड़ीदार के लिए जाना जाता है। सैंडहिल क्रेन नामक पंछी, दरियाई घोड़े, सलेटी-भेडिय़े, बार्न-उल्लू, बाल्ड-ईगल, गिबन जाति के बंदर, काले गिद्ध, हंस ऐसे ही कुछ और प्राणी हैं जिन्हें आमतौर पर अपने एक साथी के लिए वफादार माना जाता है। अब जानवरों को गाली बकने वाली इंसानी नस्ल को देखें तो उनमें वफादार-मर्द की धारणा भूतों और चुड़ैलों जितनी ही हकीकत होती है। लेकिन जब गाली देना हो तो पशु-पक्षियों की मिसाल आसान रहती है क्योंकि वे मानहानि का मुकदमा दायर नहीं कर सकते। 

बॉम्बे हाईकोर्ट के इस ताजा मामले को देखें तो समझ पड़ता है कि इंसानों में कमीनगी धरती पर किसी भी दूसरे प्राणी के मुकाबले हजारों गुना अधिक रहती है, और हो सकता है कि इंसानों से परे किसी भी प्राणी में कमीनगी रहती भी न हो। लोगों को याद रखना चाहिए कि दूसरों को लूट लेने की कीमत पर भी अपने परिवार के लिए दौलत जुटा लेने जैसा घटिया काम दुनिया के करोड़ों किस्म के प्राणियों में से सिर्फ इंसान का एकाधिकार है। कहने के लिए इंसानी समाज के जो रीति-रिवाज प्रचलित हैं, उनके खिलाफ जाकर अपने ही बच्चों से बलात्कार करना सिर्फ इंसान ही कर सकते हैं। बाकी पशु-पक्षी तो उनके समाज में प्रचलित काम ही करते हैं। अब सिर्फ इंसानों की बात पर लौटें, तो आए दिन ऐसी खबरें आती हैं कि किसी बालिग ने शादी का वायदा करके किसी नाबालिग से देहसंबंध बनाए, और फिर धोखा दे दिया। शिकायतकर्ता के नाबालिग होने पर कार्रवाई के लिए देश में कड़ा कानून है, लेकिन दोनों लोगों के बालिग होने पर शादी के वायदे को लेकर अगर बाद में धोखे की कोई शिकायत खड़ी होती है, तो अब देश की अदालतें ऐसी शिकायतों पर सजा सुनाने से मना कर रही हैं। अदालतों ने भी यह ठीक ही अहसास किया है कि बालिग लोगों के बीच शादी के वायदे को पूरा न करना, या न कर पाना किसी किस्म का जुर्म मानना गलत है। जब शादीशुदा जोड़ों के बीच भी निभना मुश्किल हो जाता है, और तलाक हो जाते हैं, तो फिर प्रेमसंबंधों में जी भर जाने, या कोई शिकायत हो जाने की गुंजाइश तो हमेशा ही रहती है। पुरूष साथी पर तोहमत मढऩे के बजाय लडक़ी या महिला के लिए बेहतर यही होता है कि किसी रिश्ते में पडऩे के पहले इस बात को समझ ले कि हर वायदे कभी पूरे नहीं होते, और ऐसा सिर्फ मर्द की तरफ से औरत के साथ हो, ऐसा भी नहीं है, कई मामलों में कोई लडक़ी या महिला भी शादी का वायदा पूरा नहीं कर पातीं, और ऐसे में क्या उन पर यह तोहमत लगाई जाए कि उन्होंने धोखा दिया है? 

पुलिस और अदालत तक पहुंचने वाले बहुत से मामलों को देखें तो यह समझ पड़ता है कि लोग अपनी सामान्य समझबूझ, और बहुत मामूली तर्कशक्ति, बहुत सीमित तजुर्बे को भी अनदेखा करते हुए खतरनाक रिश्तों में पड़ते हैं। ऐसे अनगिनत मामले सामने आते हैं जिनमें दूसरी बीवी यह कहती है कि उसे पहली बीवी से तलाक का वायदा किया गया था। अगर ऐसी नौबत है तो शादीशुदा से रिश्ता बनाने के पहले उसके तलाक का इंतजार भी कर लेना चाहिए। लेकिन लोग पहले ऐसे उलझे हुए रिश्तों में पड़ते हैं, और फिर उनमें धोखा होने की बात कहते हुए झींकते हैं। यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि इंसान जानवरों जितने ईमानदार नहीं होते, और वे कई किस्म से बेवफा हो सकते हैं, उनसे बहुत ऊंचे दर्जे की वफा की उम्मीद जीते जी जन्नत के नजारे सरीखी होगी। इसलिए हर किसी को चाहिए कि सामाजिक और कानूनी रूप से पुख्ता रिश्तों में ही पड़ें। अगर लोगों को सिर्फ प्रेम और देहसंबंधों में पडऩा, तो उनके बीच में दोनों के बालिग होने पर किसी तरह का कानून शामिल नहीं होता। यहां तक तो सब ठीक है, लेकिन जहां शादी की बात आती है, वहां पर पहली या दूसरी पत्नी, परिवार के दूसरे कानूनी वारिसान जैसे बहुत से उलझाने वाले पहलू जुड़ जाते हैं। इसलिए दस-दस, बीस-बीस बरस बाद जाकर अदालत से मिले मामूली से इंसाफ पर भरोसा करके लोगों को अधिक रिश्ते नहीं बनाने चाहिए। अब यह कल्पना करें कि दस बरस की अदालती लड़ाई के बाद, और यह लड़ाई शुरू होने के पहले की बीस बरस की तकलीफदेह शादीशुदा जिंदगी के बाद अगर ढाई हजार रूपए महीने का कोई गुजारा-भत्ता मिलना है, तो उससे एक महिला और उसके बेटे का क्या काम चल सकता है? इसलिए अपनी समझ और दुनिया के तजुर्बे को कानूनी संभावना से ऊपर मानना चाहिए। कानून को एक आखिरी विकल्प की तरह रखना चाहिए क्योंकि वह अधिकतर मामलों में ऐसे सुबूतों पर काम करता है जिन्हें जुटाना किसी मामूली के बस का काम नहीं रहता है। इंसानी समाज पशु-पक्षियों के समाज सरीखे ईमानदार नहीं हैं, इसलिए यहां पर लोगों को दूसरों की कही बातों, और उनके दिखाए गए सपनों पर लापरवाही से जरूरत से ज्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए। 

(Daily chhattisgarh)

मोदी के एक आव्हान पर हर प्रदेश में बच सकती है हजारों करोड़ फिजूलखर्ची

 17 दिसंबर 2023  

  

तीन राज्यों में भाजपा की सरकार बनने का सिलसिला चल रहा है, और इन हिन्दीभाषी राज्यों से परे, तेलंगाना और मिजोरम भी इसी दौर से गुजर रहे हैं। पांचों राज्यों में नए मुख्यमंत्री हैं, जो कि पहली बार यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। तीन बड़े और हिन्दीभाषी राज्यों में देश के एक ही नेता, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पार्टी के, और उनकी पसंद के नेता सरकार और विधानसभा के ओहदे संभालने वाले हैं। मोदी हिन्दुस्तान के एक ऐसे अनोखे नेता हैं जिनकी पूरी पार्टी उनके काबू में है, और जनता का एक पर्याप्त बड़ा हिस्सा उनके हर फैसले पर ताली बजाने को तैयार खड़े ही रहता है। जब वे अपने एक फैसले से देश के करोड़ों लोगों के हाथों में झाड़ू थमवा सकते हैं, तो फिर अपनी पार्टी की राज्य सरकारों के लिए तो उनकी मर्जी ही हुक्म सरीखी होगी। ऐसे में कुछ महीनों बाद के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले अगर वे हिन्दी पट्टी कहे जाने वाले इलाके के इन तीन राज्यों में अगर सरकारों को जनता के करीब ला सकते हैं, उन्हें जनसरोकारों से जोड़ सकते हैं, तो इससे नए मुख्यमंत्रियों की एक सादगी और किफायत की बुनियाद भी बन सकती है, इन राज्यों का भला भी हो सकता है, और लोकसभा चुनाव में इसका फायदा मोदी और उनकी पार्टी को तो होगा ही होगा। 

यह कोई रहस्य की बात नहीं है कि सरकारों में बैठे मंत्री और अफसर अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते हुए बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों को बंगलों पर तैनात करवाते हैं, जो कि जनता की जेब पर ही बोझ रहता है, और इसके साथ-साथ ऐसे कर्मचारियों को मजबूरी की नौकरी या रोजी के लिए मानवीय गरिमा के खिलाफ काम करने पड़ते हैं। एक-एक बड़े अफसर के बंगले पर दर्जन भर या दर्जनों कर्मचारियों की तैनाती रहती है, और वे घोषित रूप से तो कहीं और ड्यूटी पर रहते हैं, लेकिन अघोषित रूप से वे बंगला ड्यूटी करते हैं। कुत्तों को घुमाने से लेकर बच्चों का पखाना साफ करने तक, कपड़े धोने, और प्रेस करने तक, खाना पकाने और सब्जियां उगाने तक सैकड़ों किस्म के काम सरकारी कर्मचारियों से करवाए जाते हैं, जो कि पूरी तरह से गैरकानूनी इंतजाम है, और बहुत से बड़े अफसर तो खुद जितनी तनख्वाह पाते हैं, उससे अधिक कुल तनख्वाह के कर्मचारियों का बेजा इस्तेमाल करते हैं। 

हमारा ख्याल है कि प्रधानमंत्री या उनकी पार्टी अपने नए मुख्यमंत्रियों को सादगी और किफायत की नसीहत देकर सरकारी फिजूलखर्ची घटाने की बात करेंगे, तो यह देश के सामने एक मिसाल हो सकती है, और एक-एक राज्य में दसियों हजार ऐसे कर्मचारियों को इंसान की तरह जीना नसीब हो सकता है। आज सरकार में ऊपर से नीचे तक तमाम लोग इस पूरी तरह गैरकानूनी इस्तेमाल के लिए इस हद तक संगठित रहते हैं कि छोटे कर्मचारियों की जुबान ही सिली रहती है, और वे नौकरी खोने के डर से, या रोजी खत्म हो जाने के खतरे से कुछ कह नहीं पाते। हमारा ख्याल है कि सरकारी कर्मचारियों के ऐसे अघोषित इस्तेमाल के खिलाफ एक कड़ा कानून बनाना चाहिए, और इस पर सजा का इंतजाम करना चाहिए। इस देश में संस्कृति यह हो गई है कि जब तक अदालती डंडे का डर न हो, किसी को किसी कानून की परवाह नहीं रह गई है। 

देश में गरीबी इतनी है कि केन्द्र और राज्य सरकारों को तरह-तरह की अनाज-योजनाएं चलानी पड़ रही हैं, स्कूली बच्चों को दोपहर का भोजन देने से ही वे कुपोषण से बच पा रहे हैं, देश के दसियों करोड़ लोग आज भी बेघर हैं, और दसियों करोड़ लोग न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर काम करने को मजबूर हैं। ऐसे देश में सरकारी ओहदों पर बैठे हुए लोग न सिर्फ भ्रष्टाचार में डूबे रहते हैं, बल्कि सरकारी ढांचे का बेजा निजी इस्तेमाल करने को वे अपना जायज हक मान बैठे हैं। हमारा ख्याल है कि जब भाजपा आज देश में सबसे अधिक संख्या में राज्यों पर काबिज है, और ये तीन प्रमुख राज्य अभी सरकार बनाने के दौर से गुजर रहे हैं, तो यह पार्टी अपने नरेन्द्र मोदी सरीखे मजबूत नेता की अगुवाई में एक सुधार शुरू करने के लिए सबसे अधिक काबिल संगठन है। भाजपा के भीतर पार्टी की राष्ट्रीय लीडरशिप की हालत कांग्रेस सरीखी बर्बाद नहीं है कि जिसे सुनने से पार्टी के मुख्यमंत्री ही मना कर दें। इसलिए भी हम आज यह सुझाने की हालत में हैं कि प्रधानमंत्री अगर भाजपा मुख्यमंत्रियों को किफायत और सादगी की नसीहत दें, और मंत्रियों-अफसरों के निजी इस्तेमाल में सरकारी अमले को झोंकने के खिलाफ कड़ाई से कहें, तो हर राज्य में हजारों करोड़ रूपए सालाना की बचत हो सकती है। और किसी को भी नौकरी या रोजगार से निकाले बिना उनका बेहतर इस्तेमाल सार्वजनिक जरूरत की जगहों पर किया जा सकता है। 

और यह बात प्रधानमंत्री तक न पहुंचे, तो हर राज्य के मुख्यमंत्री अपने स्तर पर भी ऐसा कर सकते हैं, और इससे अफसरी बददिमागी भी जमीन पर आएगी। आज जिन लोगों को यह लगता है कि उनके बिना सरकार नहीं चल सकती, उन्हें भी यह अहसास कराना जरूरी है कि स्थाई रूप से नियम-कानून तोड़ते हुए वे सरकारी अमले को घर पर नहीं जोत सकते। कल ही हमने अपने यूट्यूब चैनल पर छत्तीसगढ़ की राजधानी, नया रायपुर में मंत्री-मुख्यमंत्री और अफसरों के लिए बने बड़े-बड़े बंगलों की बात की थी कि अब उनके रखरखाव के लिए साधन और सुविधाओं का कई गुना अधिक बेजा इस्तेमाल शुरू हो जाएगा। प्रधानमंत्री को पूरे देश में सरकारी अमले की सादगी को भी लागू करना चाहिए, यह एक अलग बात है कि नया रायपुर में सरकारी बंगलों की यह योजना उन्हीं की पार्टी की रमन सिंह सरकार ने मंजूर की थी, उसका टेंडर किया था, और कांग्रेस सरकार ने पांच बरस ईंट-गारा ढोकर ये बंगले पूरे किए, और अब भाजपा के मंत्री-मुख्यमंत्री उसमें रहने जा रहे हैं। हमने उस वक्त भी इतनी बड़ी फिजूलखर्ची के खिलाफ लिखा था, लेकिन सत्ता को फिजूलखर्ची सुहाती है, और किफायत की हमारी सलाह कूड़े के ढेर में गई थी, और अब यह प्रदेश हाथी सरीखे विशाल रखरखाव का खर्च बाकी जिंदगी उठाता रहेगा। चाहे पीएम, चाहे सीएम जिस स्तर पर भी हो, जनता की जेब काटना बंद होना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 दिसंबर 2023


 

ब्रिटेन का रवांडा-प्लान और भारत के सीखने का सामान

 16 दिसंबर 2023  

  

भारत की संसदीय प्रणाली ब्रिटेन के मॉडल पर ढली हुई है, इसलिए भारतीय संसद या यहां की विधानसभाओं के जानकार लोगों को यह बात चौंका सकती है कि अभी ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण एक बिल संसद में पेश किया, तो उन्हीं की पार्टी के 29 सांसद गैरहाजिर थे। ऐसा नहीं कि वे इस बिल के खिलाफ थे, लेकिन वे कानून बनने जा रहे इस बिल के प्रावधानों को और कड़ा बनाना चाहते थे, और इसलिए उन्होंने वोट नहीं दिया। फिर भी वहां संसद के निचले सदन ने इसे बहुमत से पास कर दिया। रवांडा बिल नाम का यह विधेयक ब्रिटेन में दूसरे देशों से पहुंचने वाले लोगों को रोकने के लिए बनाया गया है क्योंकि देश अब शरणार्थियों और घुसपैठियों से थक गया सा लगता है। वहां के कुछ आंकड़े देखें, तो ब्रिटिश सरकार ने हर बरस एक लाख प्रवासियों को बसाने का वायदा किया था, लेकिन 2022 में ऐसे लोगों की संख्या 7 लाख 45 हजार पहुंच गई थी। ऐसे में ब्रिटेन ने एक अफ्रीकी देश रवांडा के साथ मिलकर यह योजना बनाई है कि ब्रिटेन रवांडा में ऐसे गैरकानूनी पहुंचने वालों को बसाएगा, और उसका खर्च खुद उठाएगा। अब इस योजना को लेकर खुद ब्रिटेन के भीतर कुछ लोग सरकार की इस सोच के खिलाफ हैं, वे इसको अमानवीय मानते हैं, और इसे ब्रिटेन का अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से मुंह चुराना कहते हैं। दूसरी तरफ सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी इस पर प्रधानमंत्री के पेश किए गए रवांडा प्लान के मुकाबले अधिक कड़ा कानून चाहती है क्योंकि अवैध घुसपैठियों, और इजाजत पाकर आए शरणार्थियों से ब्रिटिश खजाने की कमर टूट रही है। 

लोगों के याद होगा कि 2016 में जब ब्रिटेन में यूरोपियन यूनियन को छोडऩे के मुद्दे पर ब्रेक्जिट नाम का जनमतसंग्रह हुआ था, तब लोगों ने जिन वजहों से इस ऐतिहासिक गठबंधन को छोडऩा चाहा था, उसमें बाहर से आने वाले लोगों का मुद्दा एक सबसे बड़ा था। तब से लेकर अब तक ब्रिटेन में सरकार के सामने यह एक दुविधा बनी रही कि यूनियन छोड़ देने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए ब्रिटेन की जवाबदेही खत्म नहीं हुई थी, और खुद उसके लोग देश के भीतर भी गरीब और हिंसा झेल रहे देशों से आ रहे मजबूर लोगों को रवांडा में शरणार्थी या राहत शिविरों जैसे इंतजाम में बसाने के खिलाफ हैं। ब्रिटेन में यह नया कानून लागू हो जाने के बाद भी इस पर चर्चा खत्म नहीं होगी, और खुद सत्तारूढ़ पार्टी अपने प्रधानमंत्री की इस पहल से संतुष्ट नहीं हैं, और इसमें और कड़ाई चाहती है।

हम दो पहलुओं से इस मुद्दे को हमारे पाठकों के बीच चर्चा के लायक पाते हैं, एक तो यह कि किसी देश की शरणार्थी नीति कैसी होनी चाहिए, क्योंकि खुद भारत म्यांमार और बांग्लादेश से कानूनी और गैरकानूनी तरीकों से आने वाले लोगों को लेकर एक चुनौती से गुजरता है, यह देश में आज बसे हुए लोगों की नागरिकता को पीढिय़ों पहले से साबित करने के कानून की बहस में भी उलझा हुआ है। दूसरी बात यह कि किसी संसदीय व्यवस्था में सत्तारूढ़ या कोई दूसरी पार्टी किस तरह अपने सदस्यों की असहमति को बर्दाश्त कर सकती है। हिन्दुस्तान में तो हम बात-बात में संसद या विधानसभाओं में पार्टियों के व्हिप देखते हैं जिनके मुताबिक अगर सदस्य सदन में मौजूद नहीं रहे, और उन्होंने पार्टी के फैसले के मुताबिक वोट नहीं दिया, तो उनकी सदस्यता खत्म हो सकती है। ऐसे में दूसरे कुछ अधिक विकसित लोकतंत्रों में यह देखना दिलचस्प रहता है कि आंतरिक असहमति से पार्टियां किस तरह जूझती हैं। हिन्दुस्तान की संसदीय व्यवस्था में यह कल्पना से परे है कि किसी पार्टी के इतने सदस्य अपनी ही सरकार से असहमत होकर किसी विधेयक पर मतदान के दौरान गैरहाजिर हों। कुछ लोगों को यह बात अटपटी लग सकती है कि हम ऐसी असहमति की वकालत कर रहे हैं जो कि भारत जैसे माहौल में किसी मुद्दे पर दाम पाकर भी खड़ी हो सकती है। आज भारत में संसदीय व्यवस्था की जो साख है, उसमें ऐसा भी हो सकता है कि किसी कारोबारी घराने के हाथों बिककर सांसद या विधायक किसी फैसले को प्रभावित करें। दूसरी तरफ पार्टियों को भी यह बात सहूलियत की लगती है कि सदन में मौजूदगी और पार्टी के फैसले के मुताबिक वोट देने का एक कानून रहे, ताकि जिस किस्म का भी सौदा-समझौता करना हो, उसे पार्टी खुद करे, और सांसदों को अलग-अलग अपनी ‘आत्मा’ बेचने की छूट न रहे। हम असहमति की गुंजाइश को खत्म करने को अलोकतांत्रिक भी पाते हैं कि वोटरों के फैसले से चुनकर आए सांसद या विधायक उनकी या अपनी पसंद से वोट नहीं डाल सकते, बल्कि अपनी पार्टी की गिरोहबंदी का एक पुर्जा बनकर रह जाते हैं। इससे किसी पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक विचार-विमर्श की संभावना भी खत्म हो जाती है। इसलिए लोकतंत्र में दलबदल कानून के रास्ते, व्हिप (कोड़ा) चलाकर अपने सांसदों को जानवरों की तरह एक रास्ते पर, एक दिशा में हांकने का इंतजाम पूरी तरह लोकतांत्रिक नहीं लगता है। 

फिर दूसरी तरफ ब्रिटेन, और योरप के दूसरे देशों की तरह इस मुद्दे पर सोचने की जरूरत भी है कि पड़ोस के देशों से, या दूर-दराज के देशों से भी आने वाले लोगों को अपनी जमीन पर किस तरह बर्दाश्त किया जा सकता है। अफ्रीका से लेकर सीरिया और इराक तक, पाकिस्तान और दूसरे कई देशों से आने वाले शरणार्थियों तक के लिए योरप-अमरीका जैसे विकसित इलाकों की नीति कैसी रहती है, उसे भी भारत जैसे देशों को देखना चाहिए, क्योंकि यहां पर पड़ोस के म्यांमार जैसे हिंसाग्रस्त देश से बहुत ही मजबूर शरणार्थी पहुंचते हैं, और उन्हें उनके धर्म के आधार पर रोक देने की एक मजबूत सरकारी सोच भारत में बनी हुई है। लोकतंत्र तंगदिली का नाम नहीं रहता है, और यह एक आक्रामक राष्ट्रवाद का शिकार होकर भी नहीं चल सकता है। लोकतंत्र अपने देश की सरहदों के पार भी लोकतांत्रिक बने रहने का नाम है, और सरहद पार के लोगों के लिए भी एक लोकतांत्रिक रूख बने रहना जरूरी रहता है। हम ब्रिटेन के इस ताजा मामले को लेकर भारत के बारे में इन दोनों ही पहलुओं से सोचते हैं कि अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों के प्रति भारत का रूख क्या रहना चाहिए, और भारत के भीतर संसदीय लोकतंत्र में पार्टी के भीतर की असहमति का क्या महत्व हो सकता है। दुनिया के लोकतंत्र एक-दूसरे से हमेशा ही कुछ न कुछ सीखते रहते हैं, और हो सकता है कि ब्रिटेन के इस रवांडा-प्लान और उस पर सत्तारूढ़ पार्टी के दर्जनों सदस्यों की संसदीय असहमति से भारत में भी सोच-विचार का सामान जुटे। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 दिसंबर 2023


 

सहूलियत से भुला दिए गए मणिपुर का सरहदी महत्व..

 15 दिसंबर 2023  

  

देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के चलते हिन्दीभाषी इलाकों से मणिपुर की खबरें गायब ही हो गई थीं। और बात महज हिन्दी इलाकों की नहीं है, उत्तर-पूर्व के बाहर भारत के बहुत कम हिस्से की कोई बड़ी दिलचस्पी उत्तर-पूर्वी राज्यों में रहती है, और ये इलाका देश की खबरों की मूलधारा से तब तक कटा सा रहता है जब तक वहां से किसी बड़ी हिंसा की बड़ी खबर नहीं आ जाती। पिछले कई महीनों से मणिपुर धीरे-धीरे खबरों में किनारे होते चले गया, और अब एक बार फिर वहां की एक खबर सामने आई है कि कई महीने पहले जातीय हिंसा में मारे गए 64 लोगों के शव उनके परिवारों को दिए जा रहे हैं, और आज उनके अंतिम संस्कार के लिए मणिपुर के अलग-अलग इलाकों में सुरक्षाबलों ने छूट दी है, और संघर्ष कर रहे समुदायों ने भी कुछ घंटे की शांति का आव्हान किया है। सुप्रीम कोर्ट की बनाई भूतपूर्व हाईकोर्ट जजों की एक कमेटी की रिपोर्ट के बाद अदालत के आदेश पर महीनों से मुर्दाघरों में रखे गए वे शव अब परिवारों को दिए जा रहे हैं, जिनमें 60 ईसाई-आदिवासी कुकी समुदाय के हैं, और 4 मणिपुर के शहरी और गैरआदिवासी, हिन्दू मैतेई समुदाय के हैं। 

मई के महीने से मणिपुर में शुरू हुई हिंसा का अभी भी कोई अंत नहीं हुआ है, और जिन दो समुदायों के बीच टकराव चल रहा है, वे अलग-अलग इलाकों में सीमित हो गए हैं, और मणिपुर के भीतर जातीय आधार पर एक भौगोलिक विभाजन हो गया है जो कि सुरक्षाबलों की असाधारण बड़ी मौजूदगी की वजह से किसी तरह टकराव को टालते हुए जारी है। लेकिन यह यथास्थिति शांति से कोसों दूर है, और महज बंदूकें हंै जो कि बड़ी संख्या में तैनात हैं, और मणिपुर के दो समुदायों को एक-दूसरे को मारने से रोक रही हैं। जिन लोगों को मणिपुर के इस तनाव के ताजा इतिहास की याद न हो, उन्हें यह बताना ठीक होगा कि इस छोटे से राज्य की 40 लाख से कम आबादी में आधी आबादी नगा-कुकी आदिवासी समुदाय की है जो कि ईसाई हैं, और जिन्हें आदिवासी-आरक्षण मिला हुआ है। ये लोग राजधानी इम्फाल के शहरी इलाके से परे के पहाड़ी इलाकों पर अधिक बसे हैं। दूसरी तरफ इम्फाल के घाटी जैसे इलाके में मैतेई समुदाय बसा है जिसके अधिकतर लोग हिन्दू हैं, और इस समाज के कुछ लोगों ने मणिपुर हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई थी जिसमें उन्हें भी आदिवासी-आरक्षण में शामिल करने की मांग की गई थी। इस पर मई के पहले हफ्ते में हाईकोर्ट का एक फैसला आया जिसमें राज्य सरकार से कहा गया था कि वह मैतेई समुदाय को आरक्षण देने की सिफारिश केन्द्र सरकार से करे। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस आदेश को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर माना, लेकिन तब तक हिंसा के कुछ महीने गुजर चुके थे, और पौने दो सौ लाशें गिर चुकी थीं। केन्द्र सरकार की कोशिशें भी देर से शुरू हुईं, और वे मणिपुर का कोई समाधान नहीं निकाल पाईं क्योंकि राज्य के भाजपाई मुख्यमंत्री बीरेन सिंह वहां की आधी आबादी का भरोसा खो बैठे हैं, और अड़ोस-पड़ोस के दूसरे राज्यों में भी मणिपुर के आदिवासियों के खिलाफ हुई सरकारी और मैतेई हिंसा को लेकर बड़ी नाराजगी है। इस सिलसिले में यह याद दिलाना बेहतर होगा कि अभी पांच राज्यों में मणिपुर के पड़ोस के मिजोरम में भी चुनाव हुआ है, और वहां आदिवासियों के बीच जिस तरह की नाराजगी है उसे देखते हुए एनडीए में भागीदार मिजोरम की सत्तारूढ़ पार्टी के मुख्यमंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ एक मंच पर आने से भी इंकार कर दिया था कि मिजो आदिवासी मतदाता उससे नाराज होंगे। 

खैर, मिजोरम का चुनाव तो निपट गया, लेकिन मणिपुर में ऐसी गहरी दरार पड़ी है कि पहाडिय़ों के बीच घाटी की तलहटी की तरह बसा हुआ राजधानी इम्फाल शहर मैतेई समुदाय का एक ऐसा इलाका बन गया है जहां पर राज्य की सरकार, विधानसभा, हाईकोर्ट सब कुछ है, लेकिन वहां पर प्रदेश की आधी नगा-कुकी आदिवासी आबादी पहुंच भी नहीं सकती। केन्द्र सरकार के सुरक्षाबलों की बहुत बड़ी मौजूदगी से हिंसा स्थगित चल रही है, वह किसी भी तरह से खत्म नहीं हुई है, उसे बस बंदूकों की नोंक पर रोककर रखा गया है, लेकिन ऐसी जिंदगी में मणिपुर के लोगों का वक्त थम गया है। दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरों के इलाकों में आ-जा नहीं सकते, और तो और, आदिवासी इलाकों के अस्पतालों से मैतेई डॉक्टरों को भी छोडक़र जाना पड़ गया है, दोनों तरफ के अफसर-कर्मचारी एक-दूसरे के इलाकों में काम नहीं कर सकते, दस हजार से अधिक स्कूली बच्चे मां-बाप के साथ सैकड़ों राहत शिविरों में बंटे हुए हैं, और वहां उनकी कोई पढ़ाई भी नहीं हो रही है। मणिपुर की जिंदगी के बाकी तमाम पहलू भी इन दो तबकों के बीच बंटे हुए, थमे हुए हैं, और एक प्रदेश के भीतर नौबत दो दुश्मन देशों की तरह की हो गई है। आठ महीने से अधिक का वक्त गुजर चुका है, और मणिपुर के इस आंतरिक टकराव का कोई राजनीतिक समाधान आसपास भी नहीं दिख रहा है। दिक्कत यह भी है कि मणिपुर की एक बड़ी लंबी सरहद पड़ोसी देश म्यांमार के साथ लगी हुई है जो कि चार सौ किलोमीटर लंबी है। म्यांमार चीन के प्रभाव वाली एक ऐसी फौजी तानाशाही बना हुआ है जो कि नशे की तस्करी के बड़े धंधे में शामिल है। इसलिए वहां से मणिपुर में बड़े पैमाने पर हथियार, हथियारबंद म्यांमारी लोग, और नशे की कमाई आने की खबरें भी बनी रहती हैं। एक फौजी-रणनीतिक महत्व के इस सरहदी प्रदेश में इतनी लंबी अशांति और हिंसा के अपने खतरे हैं, और भारत के साथ फौजी मुकाबले वाले चीन का इस नौबत से फायदा उठाना बड़ा स्वाभाविक लगता है। 

देश के सरहदी राज्यों को भुला देना एक आम और आसान बात दिखती है। और ऐसा सिर्फ देश की राजनीति में नहीं हो रहा है, प्रदेशों में भी जो हिस्से राजधानियों से सबसे दूर रहते हैं, वहां तक पहुंचते हुए शासन-प्रशासन बेअसर होने लगते हैं। ठीक उसी तरह की नौबत उत्तर-पूर्व के राज्यों को लेकर भारत सरकार की रहती है। कई बार तो ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार इन इलाकों को यह सोचकर भुला देती है। यहां की समस्याएं अपने आप सुलझ जाएंगी। जो भी हो, मणिपुर आज देश की बाकी बड़ी आबादी को सीधा खतरा न दिख रहा हो, यहां के लोगों के बुनियादी हक आज निलंबित हैं, और यह सिलसिला जल्द से जल्द खत्म होना चाहिए। जिस प्रदेश में वहां के सबसे बड़े हिस्से के विधायक भी राजधानी, और विधानसभा न पहुंच सकें, उसे उस राज्य के रहमोकरम पर छोड़ देना समझदारी नहीं है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 दिसंबर 2023


 

संसद के भीतर-बाहर हमला नहीं, प्रदर्शन के ऐसे खतरे, और सबक

  14 दिसंबर 2023  

  

हिन्दुस्तान की संसद पर आतंकी हमले की 22वीं सालगिरह पर लोकसभा के भीतर और संसद परिसर में एक अहिंसक हमला हुआ। इसमें सिर्फ नारों और रंगीन गैस का इस्तेमाल करते हुए कुछ लोकतांत्रिक मांगें की गईं। वैसे तो संसद पर हमले की सालगिरह का यह दिन थोड़ी सी अधिक सावधानी का रहना चाहिए था, लेकिन गैरहथियारबंद और कुछ लोकतांत्रिक किस्म के इस ‘हमले’ से बचाव और रोकथाम करना कुछ मुश्किल भी रहा होगा क्योंकि इसमें मैटल डिटेक्टर वगैरह काम नहीं आए होंगे। अब यह जरूर है कि ऐसे असाधारण विरोध-प्रदर्शन को लेकर संसद की सुरक्षा पर कई सवाल खड़े होंगे, और देश में यह भी एक फिक्र की बात हो सकती है कि महज सोशल मीडिया पर एक-दूसरे से जुड़े हुए आधा दर्जन लोग किस तरह ऐसी कार्रवाई कर सकते हैं। यह भी है कि अगर एक-दूसरे से सिर्फ सोशल मीडिया पर जुड़े हुए लोग ऐसा कर सकते हैं, तो फिर उनके हथियारबंद होने पर ऐसा कोई भी खतरा और कितना बड़ा हो सकता था। ऐसी बहुत सी बातें हैं, जिन पर सोच-विचार होना चाहिए। यह जरूर है कि संसद के भीतर सदन में बैठे सांसदों के लिए खतरनाक साबित हो सकने वाले ऐसे प्रदर्शन में जिन मुद्दों को उठाया गया है, उन पर इस मौके पर चर्चा नहीं होगी, और महज प्रदर्शन के तौर-तरीके एक आतंकी हमला करार दे दिए जाएंगे। अभी तक की जानकारी के मुताबिक गिरफ्तार पांच लोगों के साथ-साथ दो और लोगों की तलाश चल रही है, और खबर है कि इन पर यूएपीए जैसा कड़ा कानून लगाया गया है। एक राहत की बात यह है कि इसमें गिरफ्तार तमाम लोग कश्मीर, पंजाब, या उत्तर-पूर्व जैसे राज्यों के नहीं हैं, वे न मुस्लिम हैं, न सिक्ख हैं, इसलिए उन पर पाकिस्तानी या खालिस्तानी साजिश की तोहमत नहीं लग सकती। सारे के सारे नाम हिन्दू नाम हैं, और चाहे कितने ही हिन्दू पाकिस्तान के लिए जासूसी करते पकड़ाए न जा चुके हों, आज अगर संसद में इस प्रदर्शन के पीछे गैरहिन्दू होते, तो देश एक अलग किस्म से जलता-सुलगता रहता। प्रदर्शनकारियों ने कहा है कि वे किसानों के आंदोलन, मणिपुर संकट, और बेरोजगारी की वजह से नाराज थे, इसलिए उन्होंने ऐसा किया है। 

हम अभी इस चर्चा में संसद की हिफाजत की लापरवाही पर अधिक जोर डालना नहीं चाहते क्योंकि हमारा मानना है कि यह कोई हथियारबंद हमला नहीं था, यह एक विरोध-प्रदर्शन था, और इससे संसद के हिफाजत के इंतजाम को बेहतर करने का एक मौका भी मिला है। कल अगर रंगीन गैस के बजाय जहरीली गैस का कोई स्प्रे लिए हुए प्रदर्शनकारी आत्मघाती जत्थे की शक्ल में सदन के बीच इतना स्पे्र करते रहते, तो दर्जनों सांसद मारे जा सकते थे। इसलिए इस प्रदर्शन को एक बड़े हमले से बचाव का मौका मानकर चलना बेहतर होगा। अभी संसद और सरकार को यह नसीहत देने का मौका नहीं है कि इन प्रदर्शनकारियों के उठाए मुद्दों पर भी चर्चा की जरूरत है क्योंकि ये मुद्दे तो पहले से संसद के भीतर और बाहर लगातार चर्चा का सामान है, फिर चाहे संसद और सरकार से इन पर देश को कुछ हासिल न हो रहा हो। संसद अभी तक खत्म नहीं हुई है, और संसद के बाहर उठाए मुद्दे भी थोड़ी बहुत जगह तो पा ही लेते हैं, ऐसे में अंग्रेजी की पार्लियामेंट में भगत सिंह की तरह हथगोला फेंकने की जरूरत अभी नहीं थी, और कल का यह प्रदर्शन एक हिंसक और खतरनाक प्रदर्शन ही कहलाएगा, और सरकार और अदालतें इसे आतंकी कार्रवाई मान लेंगी, तो भी उसमें कुछ अटपटा नहीं होगा। लोकतंत्र में प्रदर्शन का यह तरीका मंजूर नहीं किया जा सकता। 

अब देश की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह सोचने का एक मुद्दा है कि अलग-अलग शहरों में बसे लोग सोशल मीडिया पर आपस में जुडक़र इस तरह दिल्ली में एकजुट होते हैं, और इस तरह संसद के भीतर और बाहर देश का ध्यान खींचते हैं। ऐसे में किसी बड़े आतंकी संगठन की जरूरत भी नहीं रह जाती, और अगर वैचारिक आधार पर देश की असल दिक्कतों पर कुछ नौजवान कई बरस जेल में काटने का खतरा उठाकर भी ऐसा प्रदर्शन करते हैं, तो फिर कुछ हिंसक किस्म के नौजवानों को इसी अंदाज में और अधिक हिंसा करने के लिए भी तैयार किया जा सकता है। फिर यह भी जरूरी नहीं है कि ऐसा कोई हमला संसद जैसी महफूज समझी जा रही जगह के भीतर ही हो, यह भी हो सकता है कि देश में कहीं भी भीड़भरी जगह पर ऐसा महज रंगीन-गैस हमला किया जाए, और बिना किसी जानलेवा खतरे के भी महज भगदड़ में सैकड़ों लोग मारे जाएं। ऐसे में अगर किसी की नीयत देश में अधिक बदअमनी फैलाने की होगी, तो इसमें हमलावर को भीड़ से अलग धर्म का बताकर साम्प्रदायिक हिंसा भी फैलाई जा सकती है। कल संसद तो किसी जान-माल के नुकसान से बच गई है, लेकिन देश को एक नई किस्म के खतरे का पता चल गया है, जो कि अधिक फायदे की बात लगती है। न सिर्फ संसद, विधानसभाओं, और अदालतों को ऐसी नौबत से बचाना चाहिए, बल्कि दूसरे किस्म की गैसों के असली आतंकी हमलों की शिनाख्त और उनसे बचाव के रास्ते भी तलाश लेने चाहिए। 

संसद खबरों में अधिक महत्वपूर्ण है, लेकिन मजदूरों के बाजार या गरीबों के किसी स्कूल में बच्चों की जिंदगी भी उतना ही मायने रखती है। इसलिए देश को पहली बात तो यह कि हमलों से बचाव की तरकीबें सीखनी चाहिए, और साथ-साथ देश में सामाजिक अमन-चैन, इंसाफ, और लोकतंत्र को कायम रखने की कोशिश भी करनी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)