शक्कर से भर देना चाहते हैं हिन्दुस्तानी बच्चों को!
18 अप्रैल 2024
दो अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने स्विटजरलैंड की एक कंपनी, नेस्ले, के भारत में बेचे जा रहे बच्चों के दो उत्पादों में शक्कर की मात्रा अधिक पाई है। खुद स्विटजरलैंड में इस कंपनी के सेरेलॅक और दूध पावडर बिना शक्कर के बेचे जा रहे हैं। इन दो संस्थानों ने एशिया, अफ्रीका, और लैटिन अमरीका में इस कंपनी के प्रोडक्ट बाजार से लिए और बेल्जियम की एक प्रयोगशाला में उनका परीक्षण करवाया। नेस्ले कम कमाई वाले, गरीबी वाले देशों के बच्चों में उन चीजों से मीठे के स्वाद की लत पैदा करता है। इससे मोटापे की बीमारी का खतरा रहता है। छोटे बच्चों के लिए सामानों में शक्कर नहीं रहनी चाहिए, और 2022 से संयुक्त राष्ट्र संघ की एक एजेंसी छोटे बच्चों के इस्तेमाल के सामानों में शक्कर पर प्रतिबंध की मांग कर रहा है। यह तो दो अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने यह जांच-पड़ताल की तो यह गड़बड़ी समझ आई। वरना यह कंपनी छोटे बच्चों के खाद्य पदार्थों के बाजार में खासा हिस्सा रखती है, और भारत जैसे कमजोर सरकारी इंतजाम वाले देश में देसी-विदेशी कंपनियां मनमानी करती हैं, और उन पर कोई रोक-टोक नहीं रहती।
पूरा का पूरा बाजार बच्चों के स्वाद को बिगाडऩे, उन्हें चीजों की लत लगाने का तो है ही, और बच्चों को आकर्षित करने के लिए इश्तहारों ने भी बच्चों का ऐसा इस्तेमाल किया जाता है जो कि किसी विकसित देश में नहीं किया जा सकता। कहने के लिए हिन्दुस्तान अपने आपको विकसित देश कहता है, लेकिन हकीकत यह है कि अपने नागरिकों के लिए जितने ग्राहक-हक का ख्याल उसे रखना चाहिए, उसका कोई ठिकाना ही नहीं है, बल्कि सरकार पूरी तरह से कारोबारियों के नाजायज हक की फिक्र में लगी दिखती है। भारत में उपभोक्ता सुरक्षा कानून जरूर बना हुआ है, लेकिन उस पर अमल का हाल यह है कि देसी त्यौहारों पर मिठाइयां और दूसरे सामानों के नमूने बाजार से लिए जाते हैं, और फिर उनकी प्रयोगशाला की रिपोर्ट आने पर एक-एक साल लग जाता है। नतीजा यह होता है कि बाजार में आए हुए सभी सामान जब खत्म हो जाते हैं तब उनमें से कुछ सामानों को लेकर सरकार की कार्रवाई होती है, जो कि घटिया, या मिलावटी सामान खा-पी लेने के महीनों बाद शुरू होती है।
कोई भी देश अपने आपको सिर्फ विकसित कह दे, उससे वह विकसित नहीं हो जाता। वहां पर जनता के हक का सरकार कितना ख्याल रखती है, सबसे कमजोर तबके के बुनियादी हकों की कितनी फिक्र होती है, और खासकर बच्चों के सामान, और खानपान को लेकर सरकार कितनी कड़ाई बरतती है, इससे साबित होता है कि देश कितना विकसित है। भारत में अभी पता चलता है कि पीढिय़ों से यहां इस्तेमाल हो रहे कपड़े और दीवार रंगने के रंग बच्चों के खानपान के रूई जैसे दिखने वाले, और बुड्ढी के बाल कहे जाने वाले सामानों में इस्तेमाल हो रहे हैं जिनसे कैंसर का खतरा अभी घोषित किया गया है।
देश की सबसे बड़ी पर्यावरण-संस्था सीएसई ने अपनी रिपोर्ट में बार-बार यह बताया है कि किस तरह भारतीय बाजार में खानपान के जो सामान है, उनमें नमक, शक्कर, और फैट किस तरह स्वीकृत सीमा से बहुत अधिक रहते हैं, और किस तरह बाजार के पैकेट और डिब्बाबंद सामानों के पोषण तत्वों की जानकारी देते हुए चीजों को छुपाकर लिखा जाता है, या नहीं लिखा जाता है। ऐसी बहुत सी रिपोर्ट बतलाती हैं कि खाने-पीने के सामानों पर जो चेतावनी यही कंपनियां विकसित देशों में अपने पैकेट पर लिखती हैं, उन्हें हिन्दुस्तान में नहीं लिखतीं। मतलब साफ है कि अगर सरकार किसी नियम को लागू करने में कमजोर है, या नियम बने ही नहीं हैं, तो बड़ी कंपनियां जनता की सेहत के लिए किसी भी तरह से जवाबदेह नहीं रहती, और बाजार में ग्राहक से खतरों को छुपाकर, गलत तरीके से इश्तहार करके, उन्हें सामान बेचने और खिलाने-पिलाने तक उसकी दिलचस्पी रहती है। बाजार की हालत देखें तो यह समझ पड़ता है कि खानपान का बाजार, सेहत और इलाज के बाजार को ग्राहक सप्लाई करता है। हम इस बात को सोशल मीडिया पर और इस जगह बार-बार लिखते हैं कि लोगों को बाजार के बने हुए डिब्बाबंद या पैकेटबंद प्रोसेस्ड फूड का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। लोग अपने घर आने वाले मेहमानों के लिए ऐसे सामान लाकर रख देते हैं क्योंकि इन्हें परोसना आसान रहता है, लेकिन मेहमानों के साथ-साथ घर के बच्चों की लत भी पड़ जाती है, और घर में मौजूद ऐसे पैकेट छुपाना मुमकिन नहीं हो पाता। नतीजा यह होता है कि भारत में पैसेवालों के बच्चों से परे भी, मजदूरों के बच्चों के बीच भी पैकेटबंद प्रोसेस्ड फूड का चलन बढ़ रहा है क्योंकि कामकाजी मां-बाप इन बच्चों के लिए समय पर कुछ पकाने के बजाय पास की दुकान से ऐसे एक-दो पैकेट लेकर उन्हें थमा देना अधिक सहूलियत का काम पाते हैं। नतीजा यह है कि हर आय वर्ग के लोगों में बड़ों के साथ-साथ बच्चों में भी ऐसे खानपान का चलन बहुत बढ़ चुका है।
लोगों को याद होगा कि जब अर्जुन सिंह मानव संसाधन मंत्री थे, उस वक्त उनके मंत्रालय की एक रिपोर्ट हमने इस अखबार में छापी थी कि उनकी बेटी भारत के बिस्किट निर्माताओं के संघ के साथ जाकर देश के स्कूल शिक्षा सचिव से मिली थीं, और इस बात के लिए भरपूर लॉबिंग की थी कि स्कूलों में दोपहर के भोजन की जगह बिस्किट के पैकेट दे दिए जाएं। यह तो उस वक्त सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच काम कर रहे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समय रहते दखल दिया, और दलाली के ऐसे धंधे को रोक दिया था। बाद में जाकर अर्जुन सिंह को फाइल पर यह लिखना पड़ा था कि बिस्किट निर्माताओं के साथ आकर शिक्षा सचिव से मिलने वाली महिला उनकी बेटी थीं, और मंत्रालय के अफसर उनके परिवार के किसी व्यक्ति की बात न सुनें। अब यह सोचने की बात है कि अगर देश के 12 करोड़ से अधिक बच्चे स्कूलों में दोपहर को गर्म ताजा पका हुआ खाना पाते हैं, और वे कारखानों के बिस्किट को रोज दोपहर खाने से बचे हैं, तो यह सरकारों के बचाए नहीं हुआ, उस वक्त सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं की पहल से हुआ।
भारत में जनता के अधिकारों का हाल बहुत खराब है। उपभोक्ताओं के हक के लिए काम करने वाले संगठनों को अदालतों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के महंगे वकीलों का सामना करना पड़ता है, और वे किसी मुकदमे को बड़ी मुश्किल से ही जीत पाते हैं। सरकार से लेकर अदालत तक ग्राहक के हकों की कोई जगह नहीं है। लेकिन ग्राहक की जागरूकता और नागरिक के चौकन्नेपन से ही बाजार की साजिशों का भांडाफोड़ हो सकता है, इसलिए इसकी कोशिश कभी खत्म नहीं होनी चाहिए। यह हाल सिर्फ बच्चों के खाद्य पदार्थों का नहीं है, बाजार में बड़ों के बीच लोकप्रिय किए गए कोल्ड ड्रिंक का भी यही हाल है जिनमें भारत में तो शक्कर भर दी जाती है, लेकिन दुनिया के जागरूक देशों में इसे बहुत घटाना पड़ा है।
यूपीएससी के नतीजे, और देश की सबसे बड़ी सेवाओं की दशा और दिशा भी देखें
17 अप्रैल 2024
देश में सरकारी नौकरियों के लिए होने वाले सबसे बड़े इम्तिहान यूपीएससी के नतीजे कल आए, और उनसे निकलकर, आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, आईआरएस जैसी कई नौकरियों में लोग पहुंचेंगे। इसे देश में सबसे महत्वपूर्ण इम्तिहान मानना इसलिए जायज है कि इससे चुने गए लोग हिन्दुस्तान की सरकारी नौकरियों में सबसे अधिक ताकत, जिम्मेदारी, और अधिकार की कुर्सियों पर पहुंचते हैं। ऐसा माना जाता है कि देश और प्रदेशों के नेता अपने इलाकों को जितना ढाल सकते हैं, उतने का उतना ये आला अफसर भी कर सकते हैं, या करते हैं। जहां कहीं निर्वाचित जनप्रतिनिधि कमजोर रहते हैं, या कमसमझ रहते हैं, वहां पर ये अफसर हावी भी हो जाते हैं। कायदे से तो लोकतंत्र में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को नीतियां बनाना चाहिए, और अफसरों को उन पर अमल करना चाहिए। लेकिन असल जिंदगी में देखने में यह आता है कि मंत्री बने हुए निर्वाचित जनप्रतिनिधि सरकारी कामकाज के अमल वाले कमाऊ हिस्से में जुट जाते हैं, और नीतियां बनाने के कागजी और सैद्धांतिक कामों को वे अफसरों पर छोड़ देते हैं, और इस तरह लोकतंत्र की दशा और दिशा तय करने में अफसरों का बहुत बड़ा हाथ हो जाता है। यह आदर्श स्थिति तो नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की आज की हकीकत यही है।
अब इन बड़ी नौकरियों की बात करें जहां तक पहुंचना हर आम हिन्दुस्तानी बच्चे के मन की हसरत रहती है, और वे बचपन से ही कुछ पूछने पर कलेक्टर बनने की बात कहते हैं, इन नौकरियों का हाल खासा बदहाल है, और आजादी के पहले से शुरू हुई भारत में नौकरशाही की इस व्यवस्था पर दुबारा गौर करने की जरूरत भी है। इन बड़ी नौकरियों को पाने वाले लोगों की बात करें, तो करीब आधी सदी से तो हमारा देखा हुआ है ही कि ये अपने आपमें एक कानून बन जाती हैं, और इन पर काबिज अफसर सत्तारूढ़ नेताओं के साथ मिलकर भ्रष्टाचार और लूटपाट की भागीदारी फर्म चलाने लगते हैं। लेकिन चूंकि इन अफसरों के हाथ में सरकारी फाईलें रहती हैं, रिकॉर्ड रहते हैं, और सूचना के अधिकार लागू हो जाने के बावजूद किसी के लिए सूचना जुटा पाना आसान नहीं रहता है, इसलिए इन अफसरों के भयानक बड़े पैमाने के संगठित और व्यापक भ्रष्टाचार को पकड़ पाना भी आसान नहीं रहता। राज्यों में आर्थिक अपराधों की जांच के लिए जो एजेंसी रहती है, या सरकारी भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जो एजेंसी बनती है, उसे देखें तो कुछ अपवादों को छोडक़र उसके घेरे में इन अखिल भारतीय सेवाओं के कोई भी लोग नहीं आते। इतने बड़े अफसर तभी फंसते हैं जब सत्तारूढ़ पार्टी बदलती है, या केन्द्र और राज्य में एक बड़ा टकराव होता है, जैसा कि छत्तीसगढ़ के मामले में अभी दोनों चीजें एक साथ हुई हैं, और पिछली कांग्रेस सरकार के पसंदीदा कुछ अफसरों पर इस भाजपा सरकार के तहत कुछ जुर्म दर्ज हुए हैं, लेकिन इस राज्य की मिसाल को भी देखें, तो राज्य बनने से अभी तक किसी भी अखिल भारतीय सेवा के अफसर को इस राज्य में शायद ही कोई सजा हो पाई हो। चौथाई सदी में हजार-पांच सौ अफसर आए-गए होंगे, लेकिन भ्रष्ट लोगों की बहुतायत के बावजूद एक भी व्यक्ति को सजा न मिल पाने से यह पता लगता है कि मौजूदा व्यवस्था में इन बड़े अफसरों को कोई सजा हो पाना आसान नहीं है। देश की सबसे ताकतवर और असाधारण जांच एजेंसी, ईडी, के घेरे में आए इक्का-दुक्का अफसर जेल में हैं, लेकिन अदालतों से सजा मिलने के जो आंकड़े हैं, उन्हें देखें तो इन अफसरों को कैद होने की संभावना शून्य है, और जमानत न मिलने पर जितने वक्त इन्हें जेल में रहना पड़ रहा है, बस वही एक किस्म से इनकी सजा कही जा सकती है। नौकरशाही और बाकी अफसरशाही का जो मॉडल पिछले पांच बरस में छत्तीसगढ़ में सामने आया है, और देश के दूसरे कई प्रदेशों में भी इन आला अफसरों ने अपने सत्तारूढ़ नेताओं को बचाने के लिए कानून से जिस तरह के बड़े-बड़े टकराव लिए हैं, उनसे यह साबित होता है कि ये अखिल भारतीय सेवाएं अब अपनी मौजूदा शक्ल में लोकतंत्र का भला करने लायक नहीं रह गई है। हो सकता है कि यह आज भी देश में मौजूद एक बेहतर सरकारी सेवा-व्यवस्था हो, लेकिन यह अपने आपमें इतनी खराब, भ्रष्ट, बेअसर, और जनकल्याण से कोसों दूर हो चुकी है कि इससे अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती। अब चूंकि नई कोई व्यवस्था आने तक गुलाम भारत के समय से चली आ रही यही व्यवस्था जारी रहेगी, और हर बरस इसमें सैकड़ों नए लोग बढ़ते चलेंगे, इसलिए अब यह सोचना चाहिए कि नए आने वाले लोगों की ट्रेनिंग किस तरह की जाए ताकि वे जुर्म की दुनिया बन चुकी इन नौकरियों में पहुंचकर मुजरिम न बनें, और जनकल्याण से जुड़ सकें। दिक्कत यह है कि अधिकतर प्रदेशों में सत्तारूढ़ पार्टियां और उनके नेता सरकारी खजाने को दुह लेना चाहते हैं, और इसमें उन्हें अफसरों के भी भ्रष्ट होने की जरूरत पड़ती है, और अफसर अपने आपको एयर इंडिया के पिछले प्रतीक चिन्ह, सेवा-खातिरी में मौजूद झुके हुए महाराज की तरह पेश रखते हैं। इन नौकरियों में आने वाले नए लोगों को यह भी समझना होगा कि न तो इस देश की निर्वाचित सरकारें कोई अच्छा आदर्श पेश कर पा रही है, न ही उनकी नौकरियों के उनसे पुराने अफसर कोई अच्छी चीज सिखाने की हालत में हैं। नेता और अफसर ये दोनों ही आमतौर पर जेल जाने के लायक रहते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार और जुर्म को छुपाने में पूरी ताकत लगाकर वे किसी सजा को दूर धकेलते रहते हैं।
आज जब यूपीएससी के चुने गए नौजवानों के नाम, उनकी तस्वीरें, और उनके इंटरव्यू चारों तरफ छप रहे हैं, तभी यह अप्रिय चर्चा करना भी जरूरी है ताकि इन नए लोगों को यह ध्यान रहे कि उन्हें अपने सीनियर अफसरों से यह सीखना है कि उन्हें क्या-क्या काम नहीं करने हैं, और क्या-क्या नहीं बनना है। दरअसल इन ताकतवर ओहदों के हाथ इतनी बड़ी कमाई का जरिया रहता है कि मामूली भ्रष्टाचार करके भी एक आईएएस या आईपीएस अपनी नौकरी पूरी करने के पहले सैकड़ों करोड़ रूपए कमा चुके रहते हैं। अब इतने बड़े लालच को किसी से कैसे छुड़ाया जा सकता है, इसका कोई समाधान हमारे पास नहीं है। लेकिन समाधान न हो, तो समस्या पर भी चर्चा न की जाए, ऐसा तो है नहीं, इसलिए हम इस मुद्दे को उठा रहे हैं, और इन बड़ी नौकरियों को पूरा करके जो लोग ईमानदार रहकर निकल चुके हैं, वे लोग शायद इस पर कुछ रौशनी डाल सके कि बेहतरी का रास्ता किधर से होकर निकल सकता है।
दूसरे देशों में कत्ल करवाना कितना नैतिक या अनैतिक?
16 अप्रैल 2024
पाकिस्तान की एक जेल में बंद एक भारतीय सरबजीत सिंह का जेल के भीतर 2013 में कत्ल कर दिया गया था। सरबजीत पर पाकिस्तान में भारत के लिए जासूसी करने, और बम विस्फोट करने के जुर्म थे, और वह सजा काट रहा था। वहां जिन दो कैदियों पर उसके कत्ल का आरोप था, उसमें से एक, आमिर सरफराज पर अभी पाकिस्तान में घर घुसकर गोलियां चलाई गईं। जेल में सरबजीत के कत्ल से दोनों देशों में तनातनी बढ़ी थी, और अभी जब यह ताजा हमला हुआ तो पाकिस्तान के गृहमंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस कर दावा किया कि इसमें मिले सुबूत इसके पीछे भारत का हाथ होने का इशारा करते हैं। उन्होंने कहा कि पहले भी भारत पाकिस्तान में हत्याओं के कुछ मामलों में सीधे तौर पर शामिल रहा है। इसके पहले कनाडा और अमरीका में भारत के खिलाफ गतिविधियां चलाने वाले खालिस्तानी आंदोलनकारियों पर हमलों के पीछे भारत की साजिश की बात इन दोनों ने उठाई थी, और दोनों देशों के साथ भारत के रिश्तों में कुछ कड़वाहट भी आई थी। पहली बार ऐसा लगा था कि भारत दूसरे देशों की जमीन पर भी उन लोगों पर हमले करवा सकता है जिन्हें वह भारत का दुश्मन मानता है। इस पर हमने कुछ अरसा पहले भी लिखा था, लेकिन अब भारत चुनाव के बीच है, और ऐसे में भारत के जासूस समझे जाने वाले सरबजीत के कथित हत्यारों पर जब पाकिस्तान में इस तरह का हमला हुआ है, तो इससे भारत में मौजूदा सरकार पर फिदा एक तबके को एक कामयाबी दिख सकती है।
लेकिन हम राजनीतिक और चुनावी नफे-नुकसान से परे देखें, तो भी कई बार दुनिया के अधिकतर देशों की सरकारें अपने देश के दुश्मन माने जा रहे व्यक्ति को दूसरे देश की जमीन पर भी निपटाते आए हैं। अमरीका और इजराइल सरीखे देशों पर तो यह बहुत बार लागू होता है, जहां की खुफिया एजेंसियां खुद, या भाड़े के हत्यारों से ऐसा करवाती रहती हैं, लेकिन भारत के बारे में आमतौर पर ऐसा नहीं माना जाता था। अब बदले हुए माहौल में भारत अगर दूसरे देश के नागरिकों पर, या हिन्दुस्तानी मुल्क के उन लोगों पर जो कि भारत के खिलाफ खुलकर अभियान चलाते हैं, अगर भारत सरकार हमले करवाती है, तो इसे अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नजरिए से देखा जाएगा। जिस देश की सरहद में ऐसा हमला होता है, वहां की सरकार तो जाहिर तौर पर भारत के खिलाफ रहेगी क्योंकि उसकी जमीन पर कानून तोड़ा गया है। लेकिन बहुत सी सरकारों पर इसका यह असर भी होगा कि भारत अपने दुश्मनों को छोड़ता नहीं है। बाकी देशों के बीच इसकी प्रतिक्रिया मिलीजुली रहेगी, और जो देश इस तरह की हिंसा या ऐसे जुर्म करवाते रहते हैं, उनकी नजरों में भारत उनकी कतार में शामिल हो गया एक देश गिना जाएगा।
अब सवाल यह उठता है कि इस तरह के कत्ल के पीछे क्या नैतिकता भी आड़े आ सकती है? इस बारे में यह समझना होगा कि दुनिया के अधिकतर देश दो अलग-अलग किस्म के कानूनों पर चलते हैं। कानूनों का एक सेट वे अपने देश के भीतर के लिए रखते हैं, और दूसरे देशों के लिए वे गैरकानूनी तौर-तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनकी अपनी अधिकतर आबादी को या तो कोई लेना-देना नहीं रहता है, या उन्हें कोई आपत्ति नहीं रहती है। अधिकतर लोग यह मानते हैं कि दुश्मन को निपटाते हुए किसी कानून को मानने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। चूंकि दूसरे देशों की जमीन पर भारत का कोई कानून लागू नहीं होता है, इसलिए अगर वहां पर उस देश के कानून को चकमा देकर कोई जुर्म करवाया जा सकता है, और अपने देश के दुश्मन को निपटाया जा सकता है, तो इसे लोकतंत्र की जुबान में कोई अनैतिक तो कह सकते हैं, लेकिन इसमें तब तक कुछ गैरकानूनी नहीं है जब तक कि ऐसे कत्ल वाले देश में ऐसे सुबूत न जुट जाएं जो कि कत्ल करवाने वाले देश का हाथ साबित कर सकें। इसलिए दूसरे देश में जाकर हिसाब चुकता करने के पीछे किसी देश को नैतिकता भी आड़े नहीं आती है। फिर दुनिया में जो देश सबसे अधिक लोकतांत्रिक कहे या माने जाते हैं, वैसे देश भी दुनिया भर में बम बरसाते दिखते हैं, वहां जाकर कत्ल करते हैं, सत्ता पलटते हैं, खुद राज करते हैं, और इसे कोई बुरा भी नहीं मानते। पाकिस्तान को बताए बिना अमरीका ने पाकिस्तानी जमीन पर ओसामा-बिन-लादेन के बसे होने का दावा किया, और यह दावा भी तब किया जब उसने फौजी हमला करके लादेन को मार डालने का दावा किया, और उसके बाद ही अपनी फौजी कार्रवाई के बारे में दुनिया को बताया। इस बारे में पाकिस्तान को भी उसने खबर नहीं की। इसलिए जब जिस देश की ताकत रहती है, वे दूसरे देशों में जाकर कई तरह के काम करते हैं, और लोकतंत्र के पहले की जो एक कहावत चली आ रही है, वह आज 21वीं सदी में आधुनिक और सभ्य लोकतंत्रों पर भी लागू होती है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस। इसलिए पाकिस्तान में पिछले कुछ महीनों में अगर लगातार भारत के आरोपों से घिरे हुए संदिग्ध और कथित आतंकी एक ही अंदाज में मारे गए हैं, तो पाकिस्तान के आरोपों से परे भारत की सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है, बल्कि भारत में राष्ट्रवादी आंदोलनकारी इसे देश की कामयाबी ही बता रहे हैं, और सरकार इसका कोई खंडन नहीं कर रही है। आज कल्पना करके देखें कि अगर भारत सरकार पाकिस्तान में दाऊद इब्राहिम को खत्म करवाने में कामयाब होती है, तो इसे भारत में एक बड़ी राष्ट्रीय उपलब्धि के रूप में माना जाएगा, फिर पाकिस्तान चाहे जैसी भी दखल की तोहमत लगाता रहे।
यह बात बिल्कुल साफ है कि राष्ट्रीय हितों के सामने आज कोई अंतरराष्ट्रीय हित शायद ही किसी सरकार की प्राथमिकता हों। अधिकतर सरकारें अपने घरेलू चुनावों, घरेलू अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी और महंगाई से जूझते हुए विदेशी मोर्चों पर कुछ किस्म की कामयाबी की कोशिश कर सकती हैं जिनसे देश के भीतर वाहवाही मिले। आज किसी विकसित और सभ्य लोकतंत्र में भी गिने-चुने लोग ही ऐसे होंगे जो कि अपनी सरकार के ऐसे गैरकानूनी काम का विरोध करेंगे। यह बात जाहिर है कि नैतिकता अपने देश में अपने लोगों के लिए अलग होती है, और दूसरी जमीन पर दूसरे लोगों के लिए उसका एक बड़ा हल्का संस्करण लागू किया जाता है। इसलिए भारत अपने खिलाफ काम करने वाले लोगों के साथ दुनिया के दूसरे देशों में जो सुलूक करता है, उसे कूटनीति की भाषा में कुछ और कहा जाएगा, नैतिकता की भाषा में कुछ और, और चुनावी भाषा में वह एक बिल्कुल अलग नारा रहेगा।
(Daily Chhattisgarh)
ऐतिहासिक चुनौतियों के मौकों पर किनारे खड़ा हुआ भारत कहां पहुंचेगा?
15 अप्रैल 2024
मध्य-पूर्व के देशों पर एक अलग खतरा मंडरा रहा है। ईरान और इजराइल के बीच बरसों से चली आ रही परोक्ष तनातनी अब आमने-सामने के हमलों में तब्दील हो गई है, और आस-पड़ोस के तमाम देश एक खेमेबंदी में फंसने की नौबत में खड़े हुए हैं। इजराइल पहले से फिलीस्तीनी के खिलाफ जंग छेडक़र बहुत बड़ा जनसंहार करके दुनिया की नजरों में एक युद्ध अपराधी तो बना हुआ ही था, और हालात इतने खराब हो चुके हैं कि इजराइल को दुनिया के इस हिस्से में हर किस्म की शह देने वाला अमरीका भी बेकसूर फिलीस्तीनियों की दसियों हजार की संख्या में मौतों से सहम गया है, और उसने भी इजराइल से बेकसूरों की मौत रोकने को कहा है। इस बीच मानो इजराइल पर परेशानियां कम हों, उसने सीरिया के दमिश्क में ईरानी वाणिज्य दूतावास पर मिसाइल हमला किया, और कुछ दूसरे अफसरों के साथ-साथ ईरान के एक बड़े सीनियर फौजी कमांडर की भी मौत हुई थी। जैसा कि दुनिया भर में माना जाता है, किसी भी देश में किसी दूसरे देश के कूटनीतिक ठिकाने उस दूसरे देश की जमीन ही माने जाते हैं, इसलिए ईरान में इसे अपने पर इजराइली हमला करार दिया, और उसके जवाब में कल सैकड़ों ड्रोन और मिसाइल इजराइल की तरफ रवाना किए जिन्हें इजराइल, अमरीका, और ब्रिटेन की फौजों ने तकरीबन पूरे का पूरा रास्ते में ही खत्म कर दिया। इजराइल की जमीन पर इसका बहुत मामूली सा असर हुआ, लेकिन इस टकराव को लेकर इन दोनों देशों से, और मध्य-पूर्व के इस इलाके से किसी भी तरह का वास्ता रखने वाले देशों में चौकन्नापन दिख रहा है। अमरीका ने अपने पुराने साथी और पिट्ठू इजराइल से यह साफ कर दिया है कि अगर वह ईरान पर जवाबी हमला करेगा, तो उसमें अमरीकी फौज शामिल नहीं होगी। शायद ब्रिटेन का भी यही रूख रहेगा, और ये देश इजराइल पर कोई हमला होने पर तो उसका साथ देंगे, लेकिन उससे परे ईरान पर हमले के लिए नहीं जाएंगे।
अब हम भारत जैसे देश के नजरिए से दुनिया की आज की हालत को देखते हैं, तो एक तरफ भारत का सबसे पुराना देश रूस लंबे समय से यूक्रेन पर हमला करके वहां उलझा हुआ है, और इसने नाटो देशों को भी मजबूर कर दिया है कि वे यूक्रेन का साथ देकर रूस को खोखला करने की कोशिश करें। ऐसे में भारत ने जंग से परे, रूस से लेन-देन जारी रखा है, और उसने पश्चिम के उस आर्थिक बहिष्कार को अनदेखा कर दिया है जिससे नाटो देश रूस को दीवालिया करने का सपना देख रहे थे। भारत में अमरीका और बाकी नाटो देशों के साथ अपने संबंध बिगाड़े बिना रूस के सस्ते तेल का सौदा जारी रखा है, और इस मामले में वह चीन के अलावा दुनिया में रूस का सबसे बड़ा मददगार बना हुआ है। भारत ने रूस और यूक्रेन के बीच सही और गलत की बात उठाए बिना अपने देश के आर्थिक हित देखे हैं कि उसे सस्ता तेल कहां से मिल सकता है। कुछ इसी तरह की नौबत भारत के सामने इजराइल और अमरीका को लेकर आ खड़ी हुई है कि वह इजराइल के कुल निर्यात का सबसे बड़ा आयात करने वाला देश तो है ही, ईरान के साथ भी उसके बहुत अच्छे संबंध हैं। और इस ताजा फौजी तनाव के पहले के कई महीनों से फिलीस्तीन पर जो इजराइली जंगी हमला चल रहा है, उसमें भी भारत ने अब तक अपने को अलग रखा है जो कि भारत की पुरानी परंपरागत विदेश नीति से अलग बात है। ऐसा लग रहा है कि भारत अपनी आज की विदेश नीति में अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रख रहा है, और न तो वह किसी ऐतिहासिक परंपरा को जारी रखने के तनाव में है, और न ही वह अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ बनने के उकसावों और न्यौतों पर ध्यान दे रहा है। उसने अपने आपको किसी भी द्विपक्षीय तनाव में शामिल होने से रोक रखा है, और वह बारीकी से दुनिया के रूख को देख भर रहा है। फिलीस्तीन जैसा जरूरतमंद और मुसीबतजदा देश गांधी के भारत से इससे बेहतर उम्मीद कर रहा होगा, लेकिन भारत ने किसी नैतिक दबाव में अपने वर्तमान हितों को छोडऩे से परहेज किया है। विदेश नीति के बेहतर जानकार लोग यह बता सकेंगे कि भारत का यह रूख अंतरराष्ट्रीय मामलों में उसकी वैश्विक लीडरशिप की किसी भी संभावना को बेहतर या बदतर, क्या करेगा, लेकिन आज का रूख तो दिखता यही है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों से परे के तमाम मामलात से दूर, विश्व समुदाय की किसी भी तरह की अगुवाई से दूर बैठा हुआ है। हम इस रूख के अच्छे या बुरे होने, इससे नफा या नुकसान होने पर नहीं जा रहे हैं, लेकिन फिलीस्तीन के साथ जैसा जुल्म हो रहा है उसे देखते हुए अगर हिन्दुस्तान की चुप्पी नहीं टूट रही है, तो यह विश्व इतिहास में किसी महान देश की तरह तो दर्ज नहीं होगी। नेहरू और इंदिरा को छोड़ भी दें, तो भी गांधी ने अपने पूरे जीवन फिलीस्तीनियों के हक को लेकर जितना लिखा है, वही भारत का ऐतिहासिक रूख था, लेकिन वह आज कायम नहीं रह गया है।
दुनिया में रूसी हमले से शुरू हुई रूस-यूक्रेन की जंग का बड़ा असर देखने मिल रहा है, रूस के जितने खोखले हो जाने की उम्मीद पश्चिम कर रहा था, वैसा तो कुछ भी नहीं हुआ है, बल्कि तीन दिन पहले इकॉनामिस्ट पत्रिका के एक पॉडकास्ट में बताया गया कि रूस की हालत जंग के पहले के मुकाबले बेहतर हो रही है। अमरीका सहित बाकी नाटो देशों का बहुत बड़ा पंूजीनिवेश यूक्रेन की मदद की शक्ल में इस मोर्चे पर हो चुका है, और रूस को खोखला करने का मकसद पूरा भी नहीं हुआ है। दूसरी तरफ मध्य-पूर्व में फिलीस्तीन पर इजराइली फौजी युद्ध-अपराधों से अमरीका सहित कुछ और इजराइल-समर्थक देशों की फजीहत चल ही रही थी। ऐसे में बैठे-ठाले इजराइल ने सीरिया में ईरानी वाणिज्य दूतावास पर हमला करके एक नया बवाल खड़ा कर दिया। अब मध्य-पूर्व के इस इलाके की यह दोहरी तनातनी अमरीका जैसे देश को आगे कितना उलझाएगी, यह अभी साफ नहीं है, लेकिन एक दूसरी बात बड़ी साफ है। रूस-यूक्रेन के वक्त से चीन रूस के साथ मजबूती से बना हुआ है, और अभी शायद वह ईरान के साथ खड़ा रहेगा। जंग में साथ देना एक अलग बात है, लेकिन अगर रूस, फिलीस्तीन, और ईरान, इन सारे मोर्चों पर अगर चीन एक बड़ी, और अमरीका से परे की भूमिका निभाता है, तो यह दुनिया के शक्ति संतुलन में अमरीका के लिए एक परेशानी की बात हो सकती है। यहां पर अभी हम ताइवान जैसे मुद्दे पर चीन और अमरीका के सीधे टकराव की जटिलता को और नहीं जोड़ रहे हैं, लेकिन यह बात साफ है कि इजराइल का हमलावर रूख कुल मिलाकर अमरीका के लिए एक बड़ी दिक्कत खड़ी कर रहा है। आगे ये तमाम टकराव चाहे जहां पहुंचें, भारत अगर इन पर तटस्थ और निरपेक्ष बना रहेगा, वह बीच-बचाव की किसी कोशिश में भी शामिल नहीं रहेगा, तो वह दुनिया में महत्व का एक मौका खोने का खतरा उठाएगा। देखते हैं आगे क्या होता है।
पार्टियों और सरकारों की खुली सोशल ऑडिट जरूरी
14 अप्रैल 2024
इन दिनों हिन्दुस्तान में चुनावी मौसम चल रहा है। पिछले छह महीने ऐसे ही गुजरे। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को मिनी आम चुनाव कहा जा रहा था, और अब जब आम चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है, तो 4 जून के नतीजों के बाद यह समझ पड़ेगा कि क्या इन नतीजों का पांच राज्यों के विधानसभा-नतीजों से कोई मेल बैठ रहा है। फिलहाल भाजपा और उसके सहयोगी दल, कांग्रेस और उसके सहयोगी दल, और इन दोनों गठबंधनों से बाहर की क्षेत्रीय पार्टियां, इन सबके चुनावी घोषणापत्रों का दौर चल रहा है। अलग-अलग किस्म की संभव और असंभव दिखने वाली घोषणाएं की जा रही हैं, और मीडिया भी इनके कवरेज में मगन हो गया है। आखिर पार्टियां अगले पांच बरस के लिए सत्ता में आने पर जनता को जिस किस्म के सपने दिखाती हैं, उनका समाचार-महत्व तो होता ही है।
लेकिन कुछ गैरराजनीतिक संगठनों को चुनावी घोषणापत्रों का सोशल ऑडिट करना चाहिए, और सरकारों के कार्यक्रमों का भी। छत्तीसगढ़ में भाजपा की रमन सिंह सरकार के चलते हर आदिवासी परिवार को गाय बांटने की योजना कुछ महीनों के भीतर ही हवा हो गई थी। इसी तरह खाड़ी के बजाय बाड़ी से आने वाले तेल की रतनजोत की योजना भी काफूर हो गई थी। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की पिछली सरकार में पिछले चुनावी वायदे की शराबबंदी होना तो दूर रहा, शराब का हजारों करोड़ का अवैध कारोबार जरूर हो गया। भूपेश सरकार ने नरवा-गरवा-घुरवा-बाड़ी नाम की जो अतिमहत्वाकांक्षी ग्रामीण विकास योजना बनाई थी, उसका कोई इस्तेमाल विधानसभा चुनाव में नहीं किया गया। आज देश में भाजपा घोषणापत्र जारी कर रही है, लेकिन दस बरस के मोदीराज में जो बड़े फैसले लिए गए थे, उसका कोई भी जिक्र पिछले पांच बरस में भी कभी नहीं हो रहा। नोटबंदी को देश के कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राईक कहा गया था, और आतंक पर भी। इन दोनों की सेहत पर नोटबंदी से कोई फर्क नहीं पड़ा, और सिर्फ गरीबों की मौत हुई, छोटे कारोबारी बर्बाद हुए, लोगों की महीनों की कमाई मारी गई, बैंकों पर और रिजर्व बैंक पर दसियों हजार करोड़ का बोझ पड़ा, और हासिल आया शून्य। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि कारोबारियों के पास जितने नकली नोट पड़े हुए थे, वो भी आपाधापी के उस दौर में बैंकों में खपा दिए गए, और नोटबंदी से ऐसे लोगों ने फायदा उठा लिया, और ईमानदार लोग भारी नुकसान में रहे।
चुनाव के वक्त कई किस्म के वायदे किए जाते हैं, उनमें से कुछ पूरे होते हैं, कुछ पूरे नहीं भी होते हैं। लेकिन वायदों से परे पांच बरस सरकार जितने तरह के दूसरे काम करती हैं, उनको चुनाव में क्या कहकर, क्या दिखाकर लोगों के सामने पेश किया जाता है, यह भी देखना चाहिए। चुनावी घोषणापत्र तो पार्टियों के होते हैं, लेकिन पार्टियां अपने आपको सत्ता और विपक्ष में बंटी हुई होती हैं, और सरकार को भी अपने कार्यकाल को लेकर जवाबदेह रहना चाहिए, खासकर सत्तारूढ़ पार्टी को। अगर सरकार चलाते हुए बहुत बड़े-बड़े ऐतिहासिक और नाटकीय फैसले लिए गए, लेकिन उनका नतीजा यह रहा कि उन्हें चुनाव के दौरान गिनाया भी न जा सका, तो यह बात साफ है कि उनसे कोई फायदा नहीं हुआ, बल्कि जनता को वे फैसले याद न आ जाएं, इसकी कोशिश सत्तारूढ़ पार्टी करती रहती है। इसलिए किसी पार्टी के दो घोषणापत्रों की तुलना तो ठीक है, सत्तारूढ़ पार्टी के प्रमुख कार्यक्रमों को अगर चुनावों में छोड़ दिया जा रहा है, तो उन्हें लेकर भी सवाल होने चाहिए।
भारत में जनसंगठनों की जगह एकदम खत्म हो गई है। एक-दो ही ऐसे संगठन हैं जो चुनावों के वक्त उम्मीदवारों की दौलत, पढ़ाई, और उनके जुर्म के इतिहास का विश्लेषण सामने रखते हैं। लेकिन पिछली सरकार के कार्यकाल का एक व्यापक विश्लेषण भी जनता के सामने आना चाहिए, और हिन्दुस्तान में मीडिया तो अब यह काम करता नहीं, कर सकता नहीं, इसलिए किसी जनसंगठनों को ही यह बीड़ा उठाना पड़ेगा। किसी सरकार के दस-दस, बीस-बीस हजार करोड़ के कार्यक्रमों का अगर इतना भी योगदान नहीं रहा कि मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी उन्हें जनता के सामने गिना सके, तो यह जाहिर है कि ऐसे कार्यक्रम बहुत बुरी तरह असफल हुए हो, और चाहे चुनाव आयोग की ऐसी शर्तें न रहे, तो भी जनसंगठनों को जनता के सामने सच्चाई को सही संदर्भों में रखना चाहिए, ताकि उसका फैसला एक जानकार का फैसला हो सके।
देश में आज सूचना का अधिकार कानून तो लागू है, लेकिन उसके चलते हुए भी सूचना न देने पर सरकारी विभाग आमादा रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की मेहरबानी से देश में आज पहले के मुकाबले बहुत अधिक जानकारी तक जनता की पहुंच बन गई है। हाल ही में चुुनावी बॉंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला आया है उससे भी यह बात साबित होती है कि सूचना का अधिकार कितनी अहमियत रखता है, और उसी की वजह से यह साफ हो पाया है कि किस कारोबारी ने किस तारीख पर, कौन सा नोटिस मिलने के बाद, किन पार्टियों को कितना चंदा दिया है, और किस तरह उस कारोबारी के खिलाफ जांच बंद हो गई है। पार्टियों के चुनावी घोषणापत्रों के मुकाबले उनके सत्ता के कार्यकाल की कई दूसरी बातें अधिक अहमियत रखती हैं, और पांच बरस पहले के चुनावी घोषणापत्र से इस बार तुलना करना तक तो ठीक है, लेकिन बाकी बातों का हिसाब भी सार्वजनिक रूप से होना चाहिए।