नक्सलियों का हथियार छोडऩा, सरकार की एक बड़ी कामयाबी

17 अक्टूबर 2025 

 

छत्तीसगढ़ के बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर में इस पल नक्सलियों के हथियार डालने का एक समारोह चल रहा है जिसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने दोनों उपमुख्यमंत्रियों सहित मौजूद हैं, और 210 नक्सली भी संविधान की कॉपी हाथ में लिए हुए खड़े हैं। उनके डाले गए डेढ़ सौ से अधिक हथियार भी इस मौके पर नुमाइश में हैं, और सरकार ने इसे किसी रणनीति के तहत आत्मसमर्पण कहने के बजाय इसे पुनर्वास के लिए हथियार छोडऩे की बात कही है। साथ ही बस्तर के आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों के हाथों से इन नक्सलियों का स्वागत फूल देकर करवाया गया है, जिससे यह प्रतीकात्मक माहौल बना है कि नक्सली जंगल और बंदूक छोडक़र आदिवासी समुदाय में लौट रहे हैं। आज के इन नक्सलियों में एक करोड़ के ईनाम वाला एक माओवादी रूपेश भी शामिल है। कल से अबूझमाड़ के अलग-अलग इलाकों से निकलकर ये नक्सली बसों तक पहुंच रहे थे, और वहां से जगदलपुर रवाना हो रहे थे। उनके साथ छत्तीसगढ़ के कुछ उत्साही पत्रकार भी चल रहे थे, और आज के इस हथियार डालने का कल से इंतजार चल रहा था। 

यह हथियारबंद नक्सलियों का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण है जिसे सरकार और नक्सली दोनों ही हथियार डालकर पुनर्वास की तरफ आगे बढऩा कह रहे हैं। हम अभी इस रणनीतिक शब्दावली की बारीकी और उसके पीछे की वजह पर जाना नहीं चाहते, क्योंकि यह पल लोकतंत्र की जीत का है, केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, गृहमंत्री विजय शर्मा की कामयाबी का है। यह एक बड़ी खबर इसलिए भी है कि पिछले 22 महीने में छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार आने के बाद जिस बड़े पैमाने पर मुठभेड़ों में नक्सलियों को मारा गया था, वह सिलसिला आज जारी रह सकता था क्योंकि नक्सल आंदोलन कमजोर हो गया है, और सुरक्षा बल आगे बढ़ते चले गए हैं, उन्होंने नक्सल कब्जे से कई इलाकों को छुड़ा लिया है। लेकिन लोकतंत्र में सरकार और संविधान के खिलाफ हथियारबंद आंदोलनकारियों को भी मारने के बजाय उन्हें लोकतंत्र की मूलधारा में लाना एक अधिक बड़ी कामयाबी रहती है। हम बीते दशकों में कई बार शांतिवार्ता से नक्सल हिंसा को खत्म करने की वकालत करते आए हैं, और अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने पर्दे के पीछे की बातचीत से यह माहौल बनाया कि हथियारबंद नक्सलियों ने इतनी बड़ी संख्या में हथियार छोड़े। इस कार्यक्रम में अभी सरकार की तरफ से यह भी साफ किया गया है कि पुनर्वास के लिए आए इन नक्सलियों के सामने ऐसी कोई शर्त नहीं है कि उन्हें जिला पुलिस बल में शामिल होना है। गृहमंत्री विजय शर्मा ने यह साफ किया कि जिला पुलिस बल में कुल 10 फीसदी ही पूर्व नक्सली हैं, बाकी दूसरे लोग हैं। इस पुलिस बल में शामिल होने की शर्त किसी नक्सली के सामने नहीं रखी गई है। 

छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनने के बाद से 22 महीनों में नक्सल मोर्चे पर पौने पांच सौ से अधिक नक्सली मारे गए हैं, दो हजार से अधिक ने आत्मसमर्पण किया, और करीब 19 सौ लोग नक्सल आरोपों में गिरफ्तार हुए। हमने पहले भी इसी जगह कई बार इस बात को लिखा कि इतनी बड़ी संख्या में नक्सलियों के मारे जाने पर भी गिनती की कुछ मौतों को लेकर ही यह बात उठी कि मरने वाले नक्सली न होकर आम ग्रामीण थे। जबकि इसके पहले फर्जी मुठभेड़ों की शिकायतों से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, और सुप्रीम कोर्ट में मामले खड़े ही रहते थे, न्यायिक जांच में भी करीब डेढ़ दर्जन बेकसूर लोगों को मारने की बात साबित हो चुकी थी। इस बार मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई तो जमकर की, लेकिन ऐसे आरोप नहीं लग पाए, जो कि एक बड़ी कामयाबी की बात है। अब आज जो हथियार डाले गए हैं, वे बतलाते हैं कि सरकार के किसी न किसी स्तर से नक्सल लीडरशिप, और आम नक्सलियों की बातचीत चल रही थी, और उसी के चलते हुए आज से आत्मसमर्पण नहीं कहा गया, और आदिवासी समुदाय को बीच में रखा गया कि नक्सलियों ने उनके सामने हथियार डाले, और समुदाय ने पुनर्वास के लिए उनका स्वागत किया। हमें शब्दावली की ऐसी चतुराई में कुछ भी खराब नहीं लग रहा है क्योंकि इससे जो नतीजा निकल रहा है, वह लोकतंत्र की मजबूती का है। आज ये डेढ़ सौ से अधिक बंदूकें बस्तर में कभी सुरक्षाबलों को मार रही थीं, तो कभी बेकसूर ग्रामीणों को। इन बंदूकों से परे बस्तर के नक्सल इलाकों में चारों तरफ जमीनी सुरंगें भी लगी हुई थीं, और यह माना जाना चाहिए कि इन नक्सलियों से मिली जानकारी से अबूझमाड़ के इलाके में यह खतरा कुछ कम हो सकेगा। 

दुनिया में छत्तीसगढ़ की पहचान नक्सल हिंसा से चली आ रही थी। यह एक बड़ा ऐतिहासिक मौका है कि दो दिन पहले ही महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में बस्तर इलाके में सक्रिय नक्सल पोलित ब्यूरो के एक सदस्य भूपति ने महाराष्ट्र मुख्यमंत्री के सामने समर्पण किया था, और दो दिन के भीतर ही बस्तर में हथियारों का यह बड़ा त्याग हुआ है। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक बस्तर, या बाकी देश से भी, नक्सल हिंसा खत्म करने का एक टार्गेट रखा था, रखा है। छत्तीसगढ़ इसे पूरा करने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। जिनका भी लोकतंत्र पर भरोसा है वे चाहेंगे कि नक्सली हथियार छोडक़र लोकतंत्र की मूलधारा में आएं, वे चाहें तो चुनाव लड़ें, और चाहें तो अहिंसक तरीके से समाज में कोई भी दूसरा काम करे। अमित शाह ने अभी कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ में एक अखबार से अनौपचारिक चर्चा में यह कहा था कि अगर माओवादी विचारधारा बिना हिंसा के रहती है, तो उसमें सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी क्योंकि लोकतंत्र में सभी तरह की विचारधाराओं के लिए जगह रहती है। आज जब नक्सल आंदोलन इस देश में खत्म होने की तरफ आगे बढ़ रहा है, तब अमित शाह की इस बात के महत्व को समझने की जरूरत है। दूसरी तरफ आज एक बड़ा सवाल कांग्रेस से बनता है कि पांच बरस इस राज्य में कांग्रेस की सरकार रही है, लेकिन न तो नक्सलियों का मुठभेड़ में सफाया हो सका, और न ही इस तरह से उनका आत्मसमर्पण हो सका। समाज में हिंसा कर रहे हथियारों को शांत करना निर्वाचित सरकार की जिम्मेदारी रहती है। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने दोनों मोर्चों पर यह कर दिखाया है, पहले तो उसने बड़ी संख्या में नक्सलियों को मारा, और फिर जब नक्सलियों के हाथ से मोर्चे निकलने लगे, वे कमजोर होने लगे, तो फिर वे बातचीत के लिए तैयार हुए, और अघोषित, पर्दे के पीछे की बातचीत के चलते उन्होंने अभी हथियार डाले। 

इस देश में लोकतंत्र का बहुत बड़ा खर्च नक्सल मोर्चे पर अभी भी जारी है, और इस हिंसा को खत्म करने में सफलता जिस केन्द्र सरकार या राज्य सरकार को मिले, वे तारीफ के हकदार रहेंगे। लेकिन पांच बरस छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के भूपेश बघेल से यह सवाल तो बनता है कि उनके शासन में यह क्यों नहीं हो सका, क्यों नहीं हो सकता था?

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अक्टूबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 अक्टूबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

अपने ही धर्म पर हमले का दिखावा देश से गद्दारी..

16 अक्टूबर 2025 

 

गुजरात के जूनागढ़ जिले में गिरनार पहाड़ी पर गोरखनाथ मंदिर में तोडफ़ोड़ की खबर 5 अक्टूबर को आई। मंदिर की प्रतिमा को तोडक़र पहाड़ी से फेंक दिया गया था, और भक्तजनों में भारी नाराजगी फैली थी। पुलिस की पहली खबर में अज्ञात लोगों द्वारा की गई तोडफ़ोड़ बताया गया था। अब 14 तारीख को पुलिस ने इस मामले का खुलासा किया, और बताया कि यह तोडफ़ोड़ करने वाले कोई बाहरी लोग नहीं थे, बल्कि मंदिर के ही एक कर्मचारी, और एक स्थानीय फोटोग्राफर ने यह काम किया था, दोनों गिरफ्तार हो गए हैं, और उन्हें अपना जुर्म कुबूल कर लिया है। इस भांडाफोड़ के पहले तक लोग बहुत विचलित थे कि एक हिन्दू मंदिर में ऐसी तोडफ़ोड़ की गई है, और पुलिस ने डेढ़ सौ से अधिक जगहों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग की जांच की, मंदिर के आसपास के इलाकों में धर्मशालाओं को भी जांचा, आने-जाने वाले पांच सौ भक्तों की आवाजाही परखी, और दो सौ लोगों से बयान लिए। इतनी मेहनत के बाद जो दो लोग पकड़ाए, वे 42 बरस का किशोर कुकरेजा, और 50 बरस का रमेश भट्ट, ये दो लोग थे। इनमें कुकरेजा मंदिर का ही कर्मचारी था जो कि चाहता था कि मंदिर में भीड़ बढ़े, दान अधिक आए, उसकी शोहरत अधिक हो, इसलिए उसने यह साजिश की कि मंदिर खबरों में आ जाए। उसने मंदिर आने-जाने वाले स्थानीय फोटोग्राफर रमेश भट्ट के साथ मिलकर एक रात पुजारी का कमरा बाहर से बंद किया, और प्रतिमा को तोडक़र पहाड़ से नीचे फेंक दिया। और पुलिस में रिपोर्ट लिखाई की चार अज्ञात लोगों ने मंदिर में आकर सब तोड़ दिया। 

अब देखा जाए कि मंदिर की इस तोडफ़ोड़ से अगर तनाव खड़ा हुआ रहता, तो वह कहीं तक भी जा सकता था। रिकॉर्डिंग में कोई ऐसी चीज सामने आ जाती जिससे किसी दूसरे धर्म के लोगों की उसी वक्त के आसपास मंदिर तक की आवाजाही दिखती, तो गुजरात तो वैसे भी लंबे समय से साम्प्रदायिक तनाव से गुजरा हुआ प्रदेश है। दूसरी तरफ देश में जगह-जगह, कई जगह धार्मिक तनाव खड़ा करने के लिए इस तरह की साजिश की गई है। यूपी में तो देश के सबसे प्रखर हिन्दुत्ववादी, योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं, और उनकी पुलिस के एक हिन्दू आईजी ने एक साम्प्रदायिक साजिश का भांडाफोड़ किया था। उन्होंने अपने इलाके की एक घटना बताई थी कि एक जगह गाय को काटकर फेंक दिया गया था, और उसके पास एक मुस्लिम नौजवान का आधार कार्ड पड़ा मिला था। बाद में हिन्दू एसपी, हिन्दू थानेदार, और बाकी तमाम हिन्दू पुलिस कर्मचारियों की जांच में पता लगा था कि उस इलाके के एक हिन्दू संगठन का मुखिया इस साजिश के पीछे था। उसने दो-तीन दूसरे हिन्दुओं को पैसा देकर गाय कटवाकर फिंकवा दी थी ताकि उस इलाके में साम्प्रदायिक तनाव फैले, और वहां के थानेदार का तबादला हो जाए जो कि इस हिन्दू नेता को मनमाने जुर्म नहीं करने दे रहा था। सारे सुबूतों के आधार पर, गाय काटने वाले लोगों के बयानों के आधार पर यूपी पुलिस ने इस हिन्दू नेता को गिरफ्तार किया, और इलाके में साम्प्रदायिक दंगा होने का खतरा खत्म हुआ। 

अभी कल ही मध्यप्रदेश में हाईकोर्ट ने एक ओबीसी नौजवान को ब्राम्हण नौजवान के पैर धोकर पानी पीने के लिए मजबूर करने पर एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम) के तहत भी जुर्म करने का हुक्म दिया है। देश में यह एक सबसे संगीन जुर्म है, और हाईकोर्ट ने जातीय नफरत के आधार पर ऊंची कही जाने वाली जाति की भीड़ की इस हिंसा पर इसे लगवाकर ठीक काम किया है। हमारा यह मानना है कि देश में जब किसी धर्म या जाति के लोग कोई जुर्म करके उसे साजिश के तहत किसी दूसरे धर्म या जाति के लोगों पर थोपते हैं, तो फिर उनके खिलाफ एनएसए के तहत जुर्म दर्ज होना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ऐसी हरकतें खतरा तो रहती ही हैं। जब देश में धर्म या जाति को लेकर एक सामुदायिक तनाव खड़ा किया जाए, तो वह कितना भी आगे बढ़ सकता है। भारत जैसे देश में बड़ी धार्मिक विविधता है, और सामाजिक ताना-बाना कई धर्मों के लोगों से मिलकर बना है। फिर कुछ धर्मों के लिए कुछ जानवर बहुत पवित्र हैं, और कुछ के लिए बहुत ही अपवित्र हैं। फिर यह भी है कि अधिकतर धर्मस्थल सडक़ किनारे खुले में है, जिनकी पर्याप्त हिफाजत का इंतजाम नहीं है, और कोई भी व्यक्ति आते-जाते नशे या होश में उन्हें नुकसान पहुंचाकर किसी और पर तोहमत थोप सकते हैं। इस देश में धर्म का महत्व कर्म के मुकाबले बहुत ऊपर है, और लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होने के लिए एक पैर पर खड़ी रहती है। हम अभी देश में साजिश के तहत किए गए ऐसे हमलों की लिस्ट गिनाना नहीं चाहते, लेकिन इसकी एक लंबी लिस्ट अभी चैटजीपीटी ने निकालकर दी है। लोगों को यही समझने की जरूरत है कि जो सतह पर तैरता दिखता है, वह हमेशा ही सच नहीं होता। सतह का जरा सा कुरेदा जाए, तो नीचे से आने वाला सच सतह का ठीक उल्टा भी हो सकता है। 

हमारा ख्याल है कि जाति और धर्म के आधार पर बेचैनी और हिंसा फैलाने की तमाम कोशिशों पर एनएसए जैसे गंभीर कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि इन कोशिशों से जो तनाव खड़ा हो सकता है, उसमें कई बेकसूर लोगों की जिंदगियां जा सकती हैं, समुदायों का एक-दूसरे पर भरोसा खत्म हो सकता है, और एक स्थाई नफरत फैल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने हेट-स्पीच को लेकर जो कड़े आदेश दिए हैं, वे भी ऐसे मामलों पर इसलिए लागू होते हैं कि गुमनाम, बेनाम लोगों पर ऐसी तोहमत डालकर लोग एक नफरत फैलाने का काम करते हैं, और उस पर उन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

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दीवारों पर लिक्खा है, 15 अक्टूबर 2025


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सडक़ों के खराब होने की एक नहीं, कई वजहें हैं...

15 अक्टूबर 2025 

 

महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई में सडक़ों की बदहाली को लेकर अभी बाम्बे हाईकोर्ट ने सख्त तेवर दिखाए हैं, और यह कहा है कि सडक़ों के गड्ढों की वजह से अगर किसी की मौत होती है, तो उसे सडक़ ठेकेदार और म्युनिसिपल के पैसों से मुआवजा दिया जाएगा। ऐसी मौत पर परिवार को 6 लाख रूपए मुआवजा दिया जाए, और जख्मी होने पर 50 हजार रूपए से लेकर ढाई लाख रूपए तक का। हाईकोर्ट के दों जजों की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि बिना गड्ढों वाली अच्छी हालत की सडक़ पाना नागरिकों का अधिकार है, और ऐसा मुहैया न करा पाना संविधान में दिए गए जीवन के अधिकार का उल्लंघन होगा। इस फैसले के साथ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पिछले बरसों के रूख को देखें तो यह समझ पड़ता है कि देश में जगह-जगह इसी तरह की हालत चल रही है। बहुत से राज्यों में सडक़ें नामौजूद सरीखी हैं। अब बाम्बे हाईकोर्ट का यह ताजा आदेश वैसे तो मुम्बई महानगरपालिका के इलाके को लेकर है, लेकिन इससे परे गैरशहरी इलाकों में भी सडक़ों की बहुत खराब हालत है। छत्तीसगढ़ में जगह-जगह ट्रकों और बसों के मिट्टी और दलदल के बीच से किसी तरह रेंगते हुए निकलने के वीडियो देखकर लगता है कि इन ड्राइवरों के हौसले, और ट्रकों के इंजन में ऐसी कितनी ताकत रहती है कि वे यह जगह पार कर पा रहे हैं, जो कि सडक़ है, और मौके पर नहीं है!

आज देश में केन्द्र सरकार की तरफ से बड़ी-बड़ी सडक़ परियोजनाओं का खूब प्रचार होता है, कहीं उसे कोई स्वर्णिम नाम दिया जाता है, तो कहीं भारतमाला नाम, और बहुत भारी बजट से बहुत अच्छे किस्म की ये सडक़ें महानगरों को जोडऩे वाली रहती हैं, जिनके आसपास रहने वाले लोग भी तरह-तरह के टोलटैक्स की वजह से उसके इस्तेमाल से बचते हैं। लेकिन केन्द्र की ऐसी नामी-गिरामी परियोजनाओं से परे जब बात राज्यों के भीतर की दूसरी सडक़ों की आती है, तो राष्ट्रीय राजमार्ग हो, या प्रादेशिक राजमार्ग, उनकी हालत खराब दिखती है। सिर्फ टोल सडक़ों की हालत जरा बेहतर रहती है क्योंकि निजी ठेकेदार उन्हें बनाते हैं, और बाद में 25-30 बरस तक वहां वसूली करते हैं। छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट ने केन्द्र और राज्य दोनों के अफसरों को कटघरे में खड़ा कर रखा है, क्योंकि टोल सडक़ों की हालत भी बहुत खराब है, ठेकेदार रखरखाव की शर्त को पूरा नहीं करते, और सिर्फ वसूली-उगाही करते रहते हैं। देश में कई बड़ी अदालतें ऐसी टोल वसूली के खिलाफ आदेश कर चुकी हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट भी शामिल है। 

अब टोल सडक़ों से परे राज्यों के भीतर की सडक़ों को देखें, तो अधिकतर राज्यों के पास उन्हें बेहतर तरीके से बनाने के बजट नहीं रह गए हैं। अभी बिहार चुनाव ताजा मिसाल है जहां पर ताजा चुनावी वायदों में ही राज्य का 60 फीसदी बजट चले जाने का अंदाज है। मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके साथ के भाजपा वाले गठबंधन ने जितने चुनावी वायदे किए हैं, उसे लेकर यह फिक्र जाहिर की जा रही है कि बहुत बुरी तरह कमजोर अर्थव्यवस्था किस तरह यह बोझ उठा सकेगी? इसके बाद वहां पर तनख्वाह भी बंट पाएगी या नहीं, और ऐसे में सडक़ सुधारने की फिक्र भला कौन पूरी कर पाएंगे? और बात सिर्फ बिहार की नहीं है, आगे-पीछे बहुत से राज्यों का यही हाल है। मतदाताओं तक सीधा फायदा पहुंचाने की चुनावी रणनीति अगले पांच बरस तक सरकारों के पास विकास कार्य और ढांचागत विकास के लिए बहुत कम गुंजाइश छोड़ती है। ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ पार्टियां सरकार चलाने के बजाय चुनाव लडऩे को ही पांच बरस की अपनी जिम्मेदारी मान लेती हैं, और जिस तरह दाखिला इम्तिहानों में कामयाबी को ही पढ़ाई मान लिया जाता है, स्कूल-कॉलेज के कोर्स को कोई महत्व नहीं दिया जाता है, उसी तरह वोटरों को रिझाने पर ही पूरी मेहनत लगा दी जाती है, और राज्यों का विकास थम जाता है, या बहुत धीमा हो जाता है। 

लेकिन जब बात सडक़ों की होती है, तो यह भी समझने की जरूरत है कि भारत की आज की औद्योगिक और खनिज जरूरतों के लिए बहुत बड़ी-बड़़ी मालवाहक गाडिय़ां चलती हैं, और खदानों से लेकर कारखानों या निर्माण की जगहों तक इन गाडिय़ों के आने-जाने के लिए सडक़ें इतने वजन के लायक बिल्कुल तैयार नहीं हैं। सडक़ों की क्षमता कागज पर ही कम रहती है, जमीन पर घटिया निर्माण की वजह से और भी कम रहती है। दूसरी तरफ रेत, कोयला, मुरम, लौह अयस्क जैसे खनिज लेकर जाने वाली ट्रकें बुरी तरह ओवरलोड चलती हैं, और जाहिर है कि वे सडक़ों को खत्म करते जाती हैं। ओवरलोड गाडिय़ों पर निगरानी का सरकार का ढांचा बुरी तरह भ्रष्ट रहता है, और गाडिय़ां अधिक से अधिक कमाई की नीयत से बुरी तरह ओवरलोड चलती हैं। अब ऐसी बर्बाद सडक़ों को सुधारने के लिए किसी भी तरह का कोई बजट तो हो नहीं सकता, क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में तो वे सडक़ें वहां पर चलने वाली गाडिय़ों के वजन की क्षमता की ही बनती हैं। 

देश की बड़ी अदालतें सडक़ों के कुछ पहलुओं को देख रही हैं, सुप्रीम कोर्ट चुनावी वायदों पर बड़े खर्च के जायज या नाजायज होने को लेकर एक अलग मामले की सुनवाई कर रहा है, लेकिन प्रदेशों के भीतर ओवरलोड गाडिय़ों के अघोषित मामलों की सुनवाई तो अब तक कोई अदालत कर भी नहीं रह है, और संगठित भ्रष्टाचार ऐसी ओवरलोडिंग को रूकने भी नहीं देगा। केन्द्र और राज्य को मिलकर भी यह देखना होगा कि देश का सडक़ों का ढांचा बर्बाद होने से कैसे बचाया जाए? बहुत सी सडक़ें हमेशा ही अलग-अलग वजहों से खराब होती रहेंगी, और अदालत से यह उम्मीद नाजायज होगी कि वह सरकार के इस नियमित और जरूरी कामकाज को लेकर उसके पीछे लाठी लेकर पड़ी रहे, और अपनी निगरानी में चीजों को सुधारे, सरकार को अपना काम खुद करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 14 अक्टूबर 2025


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ममताहीन सीएम के हिंसक बयानों से परे भी सोचने की कुछ जरूरत है...

 14 अक्टूबर 2025 

 

पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में अभी एक मेडिकल छात्रा के साथ कॉलेज के पास ही गैंगरेप हुआ, जिस पर बेहद दुख जाहिर करते हुए मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने इसे स्तब्ध कर देने वाला भी कहा। उन्होंने कहा कि कोई भी आरोपी बख्शा नहीं जाएगा, और कॉलेजों में सुरक्षा के लिए सरकार कड़ी हिदायत जारी करेगी। लेकिन इसके साथ-साथ ममता बैनर्जी के बयान के एक दूसरे हिस्से को लेकर भारी नाराजगी फैली है। ममता ने यह कहा था कि बलात्कार की शिकार लडक़ी रात साढ़े 12 बजे हॉस्टल-कॉलेज से बाहर कैसे आई थी, इस पर भी गौर करना चाहिए। उन्होंने कहा कि लड़कियों को देर रात बाहर नहीं निकलने देना चाहिए, खासकर सुनसान इलाकों में सतर्क रहना चाहिए, कॉलेजों को छात्राओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। इसके बाद राज्य में प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने ममता की जमकर आलोचना की, और इस गैंगरेप पीडि़त छात्रा के पिता ने ममता के बयान को गैरजिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि क्या महिलाओं को अपनी नौकरी छोडक़र घर बैठ जाना चाहिए? ऐसा लगता है कि बंगाल औरंगजेब के शासन में है। उन्होंने कहा कि वह अपनी बेटी को वापिस ओडिशा ले जाएंगे। यह छात्रा आधी रात के बाद कॉलेज कैम्पस के बाहर किसी दोस्त से मिलने, या उसके साथ निकली थी, और वहां से कुछ लोगों ने उसे पास में किसी सुनसान जगह पर ले जाकर उससे गैंगरेप किया था। 

ममता बैनर्जी का इतिहास बलात्कार के मामलों में बड़े गैरजिम्मेदार बयानों का रहा है। वे जैसे ही मुख्यमंत्री बनी थी, एक बच्ची से बलात्कार हुआ था, और उसकी रिपोर्ट होने पर ममता ने उसे अपनी सरकार को बदनाम करने की राजनीतिक साजिश कहा था, हमने इसी संपादकीय की जगह पर कई बार उस घटना का जिक्र किया है, और ममता की गैरजिम्मेदारी को याद किया है। अपने राज में होने वाले किसी भी तरह के जुर्म को लेकर ममता तुरंत ही मुजरिमों के वकील की तरह बहस करने लगती हैं, और हर बात को राजनीतिक साजिश करार देने लगती हैं, जिससे कि उनकी साख महिलाओं के खिलाफ जुर्म के मामले में पूरी तरह चौपट हो चुकी है। लोगों को याद होगा कि बंगाल में संदेश खाली नाम की जगह पर ममता की तृणमूल कांग्रेस के एक नेता, शेख शाहजहां, और उनके साथियों पर बहुत से हिन्दू महिलाओं से बलात्कार, और उनके यौन शोषण के आरोप लगे थे। इस पर पूरे देश में बंगाल सरकार और टीएमसी के खिलाफ नाराजगी फैली थी, लेकिन उन्होंने एक रैली में कहा था कि संदेश खाली में बलात्कार की कोई घटना नहीं हुई, और भाजपा माहौल खराब करने की कोशिश कर रही है। इसके बाद लोकसभा चुनाव प्रचार में ममता ने संदेश खाली को भुला देने की अपील की थी, और कहा था कि भाजपा ने महिलाओं को पैसे देकर झूठे बयान दिलवाए हैं। इसके बाद कोलकाता के आर.जी.कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक जूनियर डॉक्टर से बलात्कार और उसके कत्ल पर ममता ने कहा था कि लड़कियां रात में ड्यूटी न करें। जब कोई मुख्यमंत्री अपने प्रदेश के सबसे भयानक जुर्म पर हर बार या तो राजनीतिक साजिश की आड़ ले, या जुर्म के शिकार लोगों को ही सावधान रहने की जिम्मेदारी सिखाए, तो ऐसी मुख्यमंत्री की कोई साख नहीं रह जाती। 2011 से लेकर अब तक ममता बैनर्जी का यही ट्रैक रिकॉर्ड है, और राष्ट्रीय महिला आयोग के अलावा सुप्रीम कोर्ट की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि ममता को अपने गैरजिम्मेदार बयान और झूठे आरोपों के लिए कटघरे में खड़ा करे। 

अब जब ममता बैनर्जी के बारे में हम अपनी सोच साफ कर चुके हैं, तो बंगाल की इस ताजा घटना को लेकर कुछ सोचने की जरूरत है। सरकार और कॉलेज इन दोनों ने सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए, वह तो है ही, लेकिन क्या इस छात्रा ने अपनी हिफाजत की पर्याप्त फिक्र की थी? एमबीबीएस दूसरे साल की पढ़ाई में आधी रात के बाद कॉलेज के बाहर आने-जाने की कोई शैक्षणिक जरूरत हमें नहीं मालूम है। और अगर ऊंची क्लास में पहुंचने के बाद भी रात-बिरात छात्राओं की ड्यूटी मरीजों के लिए लगती है, तो भी वह कॉलेज-कैम्पस के भीतर-भीतर होती है। हमने योरप के ऐसे कई विश्वविद्यालय और शहर देखे हैं जहां पूरी रात सडक़ों पर छात्राओं का अकेले आना-जाना होते रहता है, लेकिन बलात्कार की कोई घटना वहां नहीं होती। समाज में लड़कियों के देर रात अकेले आने-जाने को लेकर जहां भी एक सहनशीलता है, वहां लड़कियां सुरक्षित हैं। लेकिन भारत में अधिकतर शहरों में, या यह कहना बेहतर होगा कि तकरीबन तमाम शहरों में आधी रात के काफी पहले से किसी लडक़ी का अकेले आना-जाना लोगों के लिए सनसनी की बात रहती है। लोग अपनी गाडिय़ों से उसका पीछा करने लगते हैं, उसके करीब जाने लगते हैं, और उसे ले जाने की कोशिशें करते हैं। इतनी देर रात अकेले आने-जाने वाली लडक़ी या महिला को आम लोग आसानी से हासिल हो जाने वाली, धंधे वाली लडक़ी समझ लेते हैं। जब समाज की हकीकत यह है, तो फिर आधी रात को अकेली लडक़ी के महिला अधिकारों की एक हसरत तो की जा सकती है, लेकिन हकीकत में इस हसरत के सांस लेने की गुंजाइश बड़ी कम है। भारत के सामाजिक वातावरण को समझने की जरूरत है क्योंकि यहां पर परंपरागत रूप से, ऐतिहासिक रूप से लडक़ी या महिला को उपभोग का सामान ही अधिक माना जाता है, उसके नागरिक अधिकार कहीं भी बराबर नहीं गिने जाते। 

भारतीय समाज की इस हकीकत को समझना चाहिए कि यहां कामकाज की जगह पर लड़कियों और महिलाओं का शोषण धड़ल्ले से होता है। हर कुछ हफ्तों में हमें अपने आसपास ही ऐसे मामले सुनाई पड़ते हैं कि किसी स्कूल हेडमास्टर या प्रिंसिपल ने, किसी शिक्षक ने छात्राओं से अश्लील हरकत की। मेडिकल छात्राएं तो बालिग हो चुकी रहती हैं, लेकिन उनके शोषण की कोशिश भी कुछ जगहों पर सुनाई देती है। एक भी सामाजिक दायरा हमें ऐसा याद नहीं पड़ता जिसमें लडक़ी या महिला के शोषण की घटना हमने अपने आसपास ही न सुनी हो। इसलिए आज किसी मजबूरी में भी अगर पढऩे वाली, या कामकाजी लडक़ी या महिला को देर रात बाहर निकलना होता है, तो उसे पर्याप्त हिफाजत का इंतजाम करके ही निकलना चाहिए। महिलाओं की हिफाजत इस देश में उनके प्रतिमा रहने तक ठीक है, वरना दो-चार बरस की बच्चियों से लेकर 70 बरस की बुजुर्ग महिला तक कोई भी मर्दाना हिंसा के खतरे से परे नहीं हैं। ममता की आलोचना करने के लिए जो कहना है, हम उससे कुछ अधिक ही कहते रहते हैं, लेकिन हर लडक़ी और महिला को याद रखना चाहिए कि देर रात उनके अकेले बाहर रहने पर यौन हमले का एक खतरा उन पर बने रहता है, और बेहतर हो कि वे तैयारी और इंतजाम के साथ ही बाहर निकलें। औरत और मर्द को बराबर अधिकार देने की पश्चिम के विकसित देशों की स्थिति भारत में आने में शायद एक पूरी सदी और लग जाएगी, तब भी मर्दाना हिंसा शायद ही खत्म हो सकेगी। ममता को कोसने के साथ-साथ अपनी खुद की फिक्र करने का काम भी करना चाहिए, क्योंकि मुजरिम को सजा दिलाना ही किसी भी सरकार के हाथ में रह जाता है, बलात्कार की शिकार लडक़ी जिस त्रासदी से गुजरती है, उसके जख्मों को भर पाना एक जिंदगी में तो पूरा हो नहीं पाता।

(Daily Chhattisgarh) 

चाहे जितना बड़ा गुंडा हो, असरदार तो ट्रम्प ही है...

13 अक्टूबर 2025 

 

आज 13 अक्टूबर की सुबह जब हम यह लिख रहे हैं, उसी पल इजराइल के एयरपोर्ट पर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का विमान उतरा है, और दूसरी तरफ फिलीस्तीन के हमास के कब्जे से इजराइली बंधकों का एक जत्था रिहा होकर रेडक्रॉस के मार्फत इजराइल की जमीन पर पहुंच गया है। दो बरस एक हफ्ते बाद की यह रिहाई करीब दो दर्जन जिंदा, और दो दर्जन गुजर चुके बंधकों की रिहाई वाली रहेगी, और इसके एवज में इजराइल सैकड़ों फिलीस्तनी कैदियों को रिहा करने जा रहा है जिसमें कुछ दर्जन ऐसे स्वास्थ्य कर्मचारी भी हैं जो कि इजराइली हमले में घायल हुए फिलीस्तीनियों के इलाज में लगे हुए थे। यह मौका दुनिया के इस हिस्से के लिए बड़ी अहमियत इसलिए रखता है कि पूरे मध्य-पूर्व में, खाड़ी के देशों में, अकेला इजराइल परमाणु हथियार संपन्न देश है, और मुस्लिम देशों में से कुछ के साथ उसके फौजी तनातनी के रिश्तों का बड़ा लंबा इतिहास रहा है। इजराइल और गाजा के बीच के हथियारबंद टकराव में इजराइली फौजी हमलों में अब तक 67 हजार से अधिक फिलीस्तीनी मारे गए हैं, जिनमें से अधिकतर तो निहत्थे नागरिक थे, महिला-बच्चे थे। 

दुनिया के इतिहास के इस पल को देखें, तो यह लगता है कि ट्रम्प ने जिस अंदाज में इजराइल और गाजा के हथियारबंद संगठन हमास के बीच यह समझौता कराया है, वह ट्रम्प ही करवा सकता था, और शायद इसी अंदाज में करवा सकता था। इसके पहले उसने परदे के पीछे से शायद निहत्थे फिलीस्तीनियों पर फौजी हमले बढ़ाने की छूट भी दी होगी, और माहौल में जब तनाव बहुत अधिक बढ़ गया, तब उसे सुलझाने का शायद नाटक भी किया होगा। उसने नोबल शांति पुरस्कार कमेटी की बैठक के ठीक पहले इस समझौते की घोषणा की, और यह उम्मीद भी की कि इस बरस का यह पुरस्कार उसे मिले, यह एक अलग बात है कि यह उसे न मिलकर उसकी एक कट्टर समर्थक महिला को वेनेजुएला में अपने आंदोलनों की वजह से मिला है। 

हम एक बार फिर आज के गाजा के मुद्दे पर लौटें, तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ सहित दुनिया की बहुत सी दूसरी ताकतें फिलीस्तीन को बचाने में बेअसर साबित हुईं। जिन देशों ने अभी कुछ हफ्ते पहले फिलीस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी, उनमें से भी ब्रिटेन और जर्मनी तो ऐसे थे जो कि इजराइल को हथियार बेच ही रहे थे, उन्होंने हथियार बेचना बंद नहीं किया था, इजराइल के खिलाफ कोई फैसला नहीं लिया था। ऐसे में अमरीका, जो कि पूरी तरह से इजराइल का सरपरस्त बना हुआ है, उसे एक के बाद एक अमरीकी राष्ट्रपति फिलीस्तीन पर बरसाने के लिए हथियार और बम देते आ रहे थे, उस अमरीका ने इजराइल और हमास दोनों की बांहें मरोडऩे का दिखावा करते हुए वह करवाया है, जो कि इजराइल चाहता था, और इसे एक समझौते की तरह पेश किया गया। लेकिन इससे भी हमें कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि पश्चिम के बड़े-बड़े देशों ने इस समझौते से सहमति जताई है, और मध्य-पूर्व के अधिकतर मुस्लिम देशों ने हामी भरी है। भारत जैसा दूर बैठा देश भी इस समझौते की तारीफ कर रहा है, और इसके खिलाफ कोई आवाज उठी नहीं है। मतलब यह कि बाहुबली ट्रम्प ने लोगों की बांह मरोडक़र अपनी मर्जी का यह समाधान लागू करवा दिया है। हम हर दिन फिलीस्तीन में होती दर्जनों मौतों को किसी भी तरह रोकने के हिमायती थे, और फिलहाल वहां के दसियों लाख लोगों को सांस लेने, पेट में दो कौर डालने, और शायद मरहम लगाने का एक मौका मिला है। इसके साथ-साथ ट्रम्प के प्लान में गाजा के पुनर्निर्माण की जो बात है, उस सच को अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि मजहब के गद्दार मुस्लिम देशों ने दुनिया के इस सबसे गरीब और जुल्म के शिकार, जख्मी और बेघर हो चुके देश के लिए कुछ भी नहीं किया, जबकि यह भी उन्हीं के मुस्लिम ब्रदरहुड वाला देश है। यह बताता है कि मजहब के दावे करने वाले लोग किस हद तक बेरहम और बेइंसाफ हो सकते हैं। आज यही मुस्लिम देश ट्रम्प के हाथों बांह मरोड़ी जाने पर फिलीस्तीन का साथ देने के लिए खड़े हुए हैं, लेकिन 67 हजार लोगों के मारे जाने पर इन लोगों ने कफन-दफन के मौके पर कहे जाने वाले दो शब्द भी नहीं कहे थे। 

आज की इस बात को लिखने का मकसद महज यह है कि दुनिया को आज किसी नैतिकता की बात करने का कोई हक नहीं रह गया है। गांधी, नेहरू, और अटल बिहारी के हिन्दुस्तान ने फिलीस्तीन के लिए मरहम की एक ट्यूब नहीं भेजी, किसी मुस्लिम देश ने दो मीटर का कफन भी नहीं भेजा, ऐसे में चाहे अपनी ही बढ़ाई गई मौतों को रोकने की ताकत अगर ट्रम्प ने दिखाई है, तो आज की तारीख में तो वही फिलीस्तीनियों की जान बचाने वाला नेता है। दुनिया में अब कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन कारगर नहीं रह गए हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ पूरी तरह बेअसर हो चुका है, और ट्रम्प से तो शायद राष्ट्रसंघ के मुखिया को मिलने का वक्त भी नहीं मिलता होगा। आज दुनिया का हाल जिसकी लाठी, उसकी भैंस जैसा हो गया है, और आज अगर फिलीस्तीन में मौतें थमी हैं, लोगों की तरफ आटा बढ़ रहा है, दवा बढ़ रही है, तो यह सब कुछ ट्रम्प की वजह से हो रहा है। हम फिलीस्तीन के साथ किसी लंबे-चौड़े इंसाफ की उम्मीद नहीं कर रहे हैं, लेकिन हर दिन होने वाली दर्जनों मौतों को अगर आज रोका गया है, तो आज की दुनिया में फिलीस्तीन जैसा कमजोर और गरीब देश इससे अधिक कोई इंसाफ पा नहीं सकता। यह बात ट्रम्प जैसे दुनिया के सबसे बड़े मवाली का शक्ति प्रदर्शन है, लेकिन साथ-साथ दुनिया की बाकी तमाम ताकतों को यह सोचना चाहिए कि आज धरती के इस गोले में उनकी क्या जगह और औकात रह गई है? जिन लोगों को फिलीस्तीन के भविष्य की बात सूझ रही है, और आज का यह समझौता खटक रहा है, उन्हें यह समझना चाहिए कि इसी रफ्तार से अगर हर दिन इजराइली हमले में फिलीस्तीनी मरते रहते, तो इजराइल को भला कौन रोक सकता था। इस विश्व को आज किसी भी तरह की सभ्यता का कोई दावा नहीं करना चाहिए, यह दुनिया अब पत्थर युग की तरह सबसे ताकतवर की गुलाम है, और यहां पर लोकतंत्र जैसी तमाम बातें पूरी तरह फिजूल हैं। ट्रम्प अगर कल नार्वे पर हमला करके नोबल शांति पुरस्कार के मैडल को बंदूक की नोंक पर छीनकर भी ले आएगा, तो भी किसी को कोई शिकायत नहीं करनी चाहिए, क्योंकि आज की विश्व व्यवस्था में उसी ताकत को सबने मान लिया है। फिलहाल हम चाहते हैं कि फिलीस्तीन का पेट भरे, उसके जख्मों पर मरहम लगे, और दुनिया के देशों की बांह मरोडक़र ट्रम्प गाजा का पुनर्निर्माण करवा सके।

(Daily Chhattisgarh)