संसदीय रजत जयंती, और नक्सल मोर्चे पर कामयाबी

18 नवंबर 2025 

 

छत्तीसगढ़ के बस्तर में अनगिनत नक्सल हमलों के पीछे जिम्मेदार रहा एक बड़ा नक्सल नेता हिड़मा आज सुबह आंध्रप्रदेश में एक पुलिस मुठभेड़ में अपनी बीवी और कुछ दूसरे नक्सल साथियों के साथ मारा गया। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि वह दो दर्जन से अधिक हमलों के पीछे था, और आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, और तेलंगाना की सरहदों पर वह लगातार सक्रिय रहता था। आंध्र पुलिस ने इस मुठभेड़ के बाद प्रेस को बताया कि छत्तीसगढ़ पुलिस के दबाव के चलते नक्सली आंध्र में भीतर तक आए थे, और आंध्र पुलिस निगरानी रख रही थी। माड़वी हिड़मा नाम के इस नक्सल नेता पर 50 लाख रूपए का ईनाम था, वह नक्सल सेंट्रल कमेटी का शायद नौजवान सदस्य था, और इस कमेटी में बस्तर इलाके का अकेला आदिवासी भी। वह बस्तर के सुकमा में ही पैदा हुआ था, और अभी हफ्ते भर पहले ही छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री, और गृहमंत्री विजय शर्मा उसके गांव होकर आए थे, जहां उन्होंने हिड़मा की माँ और गांव के दूसरे लोगों के साथ खाना खाया था, और हिड़मा की माँ से अपील की थी कि वह अपने बेटे को पुनर्वास के लिए कहे। यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि बीते कुछ महीनों में छत्तीसगढ़ पुलिस ने बड़े-बड़े नक्सल नेताओं सहित उनके हथियारबंद साथियों के हिंसा छोडऩे को आत्मसमर्पण कहना छोड़ दिया है, और अब इसे हथियार डालना कहा जा रहा है। हाल ही में ऐसे नक्सल नेताओं ने यह भी कहा कि आदिवासी हक के लिए उनकी लड़ाई अब बिना हथियारों के चलती रहेगी। यह सरकार के हिस्से की एक समझदारी है कि भाषा की जटिलता में उलझे बिना उसने शायद नक्सल नेताओं के आत्मसम्मान के लिए आत्मसमर्पण शब्द छोड़ दिया, और हथियार डालना कहा। 

नक्सल मोर्चे से परे आज ही छत्तीसगढ़ विधानसभा का एक विशेष सत्र चल रहा है जो कि इस सदन का रजत जयंती वर्ष समारोह भी है, और विधानसभा के मौजूदा भवन को बिदाई भी है। आज के इस सत्र के बाद विधानसभा का अगला सत्र नया रायपुर के नए भवन में होगा, और 25 बरस तक संसदीय कार्य के बाद अब विधायक इस भवन का धन्यवाद करते हुए आज यहां से आखिरी बार रवाना होंगे। भारत और मध्यप्रदेश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ का मजबूत संसदीय इतिहास रहा है, और आज नक्सल मोर्चे पर सुरक्षाबलों की एक और कामयाबी के बाद इन दो बातों को जोडक़र देखने की जरूरत लग रही है। जैसा कि किसी भी देश की संसदीय व्यवस्था रहती है, वह जनता के हित के लिए काम करती है, या कम से कम उससे यह उम्मीद तो की ही जाती है। दूसरी तरफ बस्तर जैसे नक्सल इलाके में नक्सली भी अपने आपको आदिवासी जनता के हित के लिए लडऩे वाला कहते आए हैं, और उनके घोषित एजेंडा को देखें, तो उसमें कई बातें सचमुच ही आदिवासी हितों की दिखती हैं। नक्सलवाद के साथ दिक्कत यह है कि वह जनता के हक लोकतंत्र में मिलना मुमकिन नहीं मानता, और इसीलिए वह हथियारों के दम पर हक की यह लड़ाई लड़ता है। लोकतंत्र में चाहे मुद्दा कितना ही जायज क्यों न हो, उसके लिए हथियारबंद लड़ाई का हक किसी को नहीं मिलता। जिन लोगों को लगता है कि भारत की मौजूदा व्यवस्था आदिवासियों को उनका हक नहीं दे पा रही है, तो उन्हें देश के कुछ दूसरे तबकों को देखना होगा जिन्हें लगता है कि यह व्यवस्था अल्पसंख्यकों को, दलितों को, महिलाओं को, गरीबों को उनका हक नहीं दिला पा रही है। अब हक नहीं मिल रहा, इसलिए हथियार उठा लेना, यह लोकतंत्र में कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसलिए छत्तीसगढ़ की मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मौजूदा भाजपा सरकार ने जब एक तरफ नक्सलियों को खत्म करने की ऐतिहासिक कामयाबी वाली मुहिम छेड़ी, तो दूसरी तरफ उसने पुनर्वास के लिए नक्सलियों का हौसला बढ़ाया, उनसे अपील की। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी लगातार नक्सलियों से मूलधारा में लौटने की अपील की, और यह तक कहा कि अगर वे बिना हथियारों और हिंसा के अपनी विचारधारा पर कायम रहते हैं, तो उससे सरकार को कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि लोकतंत्र में हर विचारधारा के सहअस्तित्व की गुंजाइश है। इस तरह केन्द्र और राज्य के इस लचीले रूख से नक्सल मोर्चे पर वह कामयाबी मिली जो कि देश के किसी भी दूसरे राज्य में नहीं मिली थी, और छत्तीसगढ़ में तो इन दो बरसों के पहले किसी ने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। 

आज छत्तीसगढ़ की संसदीय रजत जयंती के मौके पर अगर हिड़मा और उनके साथी हथियार डालकर लोकतंत्र की मूलधारा में लौटते, और हथियारविहीन संघर्ष जारी रखते, तो बेहतर होता। लेकिन जब कोई भी विचारधारा या आंदोलन हथियारबंद होकर, लगातार हिंसा करते हुए सक्रिय रहे, तो ऐसे लोकतंत्र में सरकारों के पास उन्हें काबू में करने, या मजबूरी हो जाने पर खत्म करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। हिड़मा उन नक्सल हमलावर दलों का मुखिया रहा है जिसने दर्जनों लोगों को मारा था। सरकार के बार-बार के प्रस्ताव के बाद भी वह उन नक्सल नेताओं में था जो हथियार डालने तैयार नहीं थे। इसलिए हथियारबंद संघर्ष के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था। छत्तीसगढ़ और बस्तर के सरहदी राज्यों में नक्सली सरहद के आरपार आते-जाते रहते हैं, और केन्द्रीय सुरक्षाबलों के साथ मिलकर इन राज्यों की पुलिस कार्रवाई करती रहती है। आज सुबह आंध्र की इस कार्रवाई में इस पति-पत्नी जोड़े के अलावा भी चार और लोगों के मारे जाने की खबर है। 

छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलियों के सामने जितने बार प्रस्ताव रखे, उनके पुनर्वास की जो नीतियां बनाई, उनके हथियार सहित आने के बाद उन्हें जितने तरह के नगद फायदे दिए गए, वे हथियार छोडऩे के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन थे। अब कोई हथियारबंद आंदोलन अगर अपनी विचारधारा को लेकर लड़ते-लड़ते ही खत्म होना चाहता है, तो भारत जैसे विशाल देश और उसके प्रदेशों की सरकारों की ताकत के सामने किसी भी क्षेत्रीय सशस्त्र आंदोलन के जिंदा रहने की अधिक संभावना तो रहती नहीं है। बस्तर एक वक्त बहुत शांत इलाका था, और वहां पर सरकारी और राजनीतिक शोषण की पराकाष्ठा की वजह से नक्सलियों को पांव जमाने का मौका मिला था। अब आज नक्सलियों के पांव उखडऩे के बाद यह सरकार की जिम्मेदारी है कि बस्तर जैसे सीधे-सरल आदिवासी इलाके में सरकारी और राजनीतिक शोषण फिर काबिज न हो जाए। जिस तरह नक्सलियों से सरकार हथियार डालने की उम्मीद करती है, उसी तरह बस्तर के जंगलों में बसे हुए सीधे-सरल आदिवासी भी बिना शोषण और भ्रष्टाचार के विकास में अपनी हिस्सेदारी की उम्मीद करते हैं। रजत जयंती मना रही छत्तीसगढ़ की संसदीय व्यवस्था के कंधों पर यह जिम्मेदारी है कि वह बस्तर को शोषणमुक्त बनाए, और भ्रष्टाचारमुक्त रखे। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 18 नवंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 नवंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

सीजेआई ने सामाजिक न्याय की नब्ज पर हाथ धरा है...

17 नवंबर 2025 

 

भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर.गवई ने कल अपने इस विचार को दुहराया कि अनुसूचित जाति के आरक्षण से उस वर्ग के मलाईदार तबके को बाहर करना चाहिए। वे एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बोल रहे थे, और उन्होंने कहा कि जब रिजर्वेशन की बात आती है तो एक गरीब खेतिहर मजदूर के बच्चे का मुकाबला एक आईएएस अफसर के बच्चे से भला कैसे हो सकता है? उन्होंने कहा कि जो ओबीसी आरक्षण में लागू होता है, वही अनुसूचित जाति के आरक्षण में भी लागू होना चाहिए। उन्होंने खुद ही यह भी कहा कि जब उन्होंने इस बारे में फैसला लिखा था, तो उसकी व्यापक आलोचना हुई थी। उल्लेखनीय है कि 2024 में उन्होंने दविन्दर सिंह प्रकरण में अपनी यही सोच फैसले में लिखी थी। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बीते दशकों से लगातार यह बात लिखते आ रहे हैं कि दलित और आदिवासी दोनों ही तबकों में आरक्षण का फायदा पाने वाले लोगों पर क्रीमीलेयर की सीमा लागू करनी चाहिए ताकि एक बार इसका फायदा पाकर सामाजिक रूप से सक्षम हो चुके परिवारों को उनकी संपन्नता या परिवार के लोगों के ओहदों की ताकत से पीढ़ी-दर-पीढ़ी वह फायदा न मिलता रहे। एक बार जो परिवार आरक्षण के फायदे से ताकतवर हो जाते हैं, वे अपने ही तबके के कमजोर लोगों को कभी बराबरी तक नहीं आने दे सकते। इसलिए एक बार कमाई जा चुकी ताकत की ऐसी विरासत को जारी रखने का मतलब सामाजिक अन्याय को जारी रखना है। पहले तो दूसरे वर्गों के मुकाबले इस अन्याय को खत्म करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, अब इन तबकों के भीतर असमानता को देखते हुए क्रीमीलेयर की धारणा लागू करना बहुत जरूरी है क्योंकि उसके बिना सबसे कमजोर तबके कभी भी फायदा पाने लायक नहीं बन पाएंगे, और ताकतवर हो चुके लोग ही आरक्षण का सारा फायदा पीढ़ी-दर-पीढ़ी पाते रह जाएंगे। 

मुख्य न्यायाधीश गवई खुद दलित तबके के हैं, और उनका परिवार क्रीमीलेयर में गिनाएगा, लेकिन अपने निजी नुकसान की कीमत पर भी उन्होंने यह सोच सामने रखी है। हमारा भी तर्क यही रहते आया है कि जिस संसद या विधानसभा को आरक्षण की व्यवस्थाओं में किसी भी तरह का फेरबदल करने का अधिकार हो सकता है, उसके सारे ही सांसद और विधायक सदस्य क्रीमीलेयर के गिनाएंगे, और क्रीमीलेयर लागू करने उनके लिए ठीक वैसे ही निजी नुकसान का होगा जिस तरह सरकार के बड़े अफसरों, या अदालत के बड़े जजों के लिए होगा। हितों के ऐसे टकराव के चलते हुए दलित और आदिवासी तबकों के आरक्षण पर क्रीमीलेयर लागू नहीं हो पाई है। इसका नुकसान यह है कि इन तबकों के भीतर एक बार ताकतवर हो चुके लोग अपने बच्चों को आगे के सभी फायदों पर काबिज होने के लिए मजबूत बनाते चलते हैं, और एक काल्पनिक क्रीमीलेयर के ठीक नीचे के लोग भी उनका मुकाबला नहीं कर पाते। सामाजिक न्याय के आरक्षण के भीतर यह एक बड़ा सामाजिक अन्याय धड़ल्ले से चल रहा है। 

अब इस मुद्दे पर बात करते हुए हमारा यह साफ मानना है कि जिन एसटी-एससी परिवारों की आय 10 लाख रूपए से ऊपर है, जिनके परिवारों में कोई भी सांसद या विधायक हैं, या किसी भी सरकार संस्थान में प्रथम या द्वितीय वर्ग के अधिकारी हैं, उनके बच्चों को आरक्षण की पात्रता से बाहर करना चाहिए। इसके अलावा जिन लोगों को एक या दो पीढ़ी आरक्षण मिल चुका है, उनकी तीसरी पीढ़ी को आरक्षण के फायदे से बाहर करना चाहिए। यह बात स्कूल-कॉलेज के दाखिलों और नौकरियों पर सीधे-सीधे लागू हो सकती है, होनी चाहिए, लेकिन दूसरी तरफ इन तबकों के लिए आरक्षित चुनावी सीटों पर क्रीमीलेयर लागू करना शायद व्यवहारिक और सही नहीं होगा, इसलिए हम उस पर अभी कोई विचार नहीं रख रहे हैं। इस बात को समझना जरूरी है कि पढ़ाई और नौकरी के अवसर गिने-चुने रहते हैं, और एसटी-एससी तबकों के क्रीमीलेयर में वे सारे ही खत्म हो जाते हैं। इनको हटा देने पर भी इन तबकों के शायद 90 फीसदी लोग मुकाबलों में फिर भी बचे रहेंगे। और वे ही लोग सामाजिक अन्याय के इतिहास की रौशनी में आज आरक्षण के असली हकदार हैं। 

कल के कार्यक्रम में मुख्य न्यायाधीश गवई ने बी.आर.अंबेडकर की कही यह बात याद दिलाई कि भारत का संविधान कोई स्थिर दस्तावेज नहीं है, बल्कि उसे वक्त और जरूरत के मुताबिक बदलना और ढलना होगा, इसीलिए संविधान में संशोधन की व्यवस्था की गई है। जस्टिस गवई ने कहा कि उनके विचार से क्रीमीलेयर पर ऐसी रोक, और सिर्फ यही रोक संविधान में बताई गई समानता तक पहुंचा सकती है। उनका यह भी कहना है कि ओबीसी क्रीमीलेयर के पैमानों से परे, एसटी-एससी क्रीमीलेयर के अलग पैमाने तय हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग एसटी-एससी तबकों के आरक्षण से ताकत पा चुके हैं, उन्हें खुद ही आगे के फायदे से दूर रहना चाहिए, और जरूरतमंद लोगों के लिए रास्ता खोलना चाहिए। 2024 के दविन्दर सिंह केस में जस्टिस गवई ने बाकी लोगों से परे अपना एक अलग फैसला लिखा था जिसमें इस बात को उन्होंने साफ-साफ कहा था। उन्होंने सरकार द्वारा एसटी-एससी में भी क्रीमीलेयर की पहचान करके उसे आरक्षण के फायदों से बाहर करने की बात कही थी। इसी फैसले में बाकी जजों ने आरक्षण के भीतर कुछ जातियों के लिए आरक्षण की बात लिखी थी, लेकिन हम यहां उस चर्चा को नहीं छेड़ रहे हैं क्योंकि उससे मूल बात भटक जाएगी। 

हमें अपने अखबार में लिखी गई बातों को पांच, दस, या बीस बरस बाद किसी अदालती फैसले में पढक़र अच्छा लगता है। यह लगता है कि हमने वक्त के पहले इस बात को उठाया था। एसटी-एससी तबकों पर क्रीमीलेयर लागू करने की हमारी वकालत पर बहुत से लोगों ने बीते बरसों में हमारी आलोचना की, मानो हमने उन तबकों के लिए आरक्षण घटाने की कोई मुहिम छेड़ी है। हम तो सिर्फ इन तबकों के सबसे कमजोर लोगों तक अवसरों को जाने देने का एक रास्ता बनाना चाहते थे जो कि आज मोटी और मजबूत मलाई ने रोक रखा है। पता नहीं देश के नेताओं में इतनी राजनीतिक इच्छा शक्ति रहेगी या नहीं कि वे ऐसा साहसी फैसला ले सकें। लेकिन एसटी-एससी तबकों के आम लोगों को, या आम लोगों के हक की वकालत करने वाले लोगों को इसे मुद्दा बनाना चाहिए। देखते हैं अदालत, संसद, या विधानसभाएं, इस बारे में अपने अधिकार क्षेत्र में क्या-क्या कर सकती हैं?

(Daily Chhattisgarh) 

परमाणु हथियारों पर अकेले काबू वाला दुनिया का यह पहला फौजी

  16 नवम्बर 2025

बिहार चुनाव के, पहले सस्पेंस, और फिर जश्न में डूबे हिन्दुस्तान में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह शायद अकेले ही रहे जिन्होंने पड़ोसी पाकिस्तान में सत्ता-संतुलन में आए एक भूचाल पर फिक्र जाहिर की। बाकी लोगों को अभी तक इस बदली हुई नौबत का खतरा समझने का वक्त शायद नहीं मिला। पिछले चार दिनों में पाकिस्तान दुनिया का अकेला ऐसा परमाणु हथियार संपन्न देश बन गया है जहां पर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल पूरी तरह से फौज के मुखिया का एकाधिकार हो गया है। निर्वाचित प्रधानमंत्री, या मनोनीत राष्ट्रपति भी इस परमाणु-कमान से बाहर हो गए हैं, और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल का दर्जा प्राप्त जनरल असीम मुनीर अब इस एक मामले में राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री से भी ऊपर बिठा दिए गए हैं। इसके लिए 12 नवंबर को संसद के निचले सदन में संविधान संशोधन 234-4 वोटों से पास हुआ, और 14 नवंबर को राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने इस पर दस्तखत करके इसे कानून का दर्जा दे दिया।

फिर मानो यह काफी नहीं था, तो पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के पर कतर दिए गए, और अब वह सिर्फ सिविल और क्रिमिनल मामलों की अपील का कोर्ट रह गया है। संवैधानिक विवादों पर विचार के लिए एक नया फेडरल कांस्टीट्यूटशनल कोर्ट बना दिया गया। इससे अब मौजूदा सुप्रीम कोर्ट का खुद होकर किसी मामले की सुनवाई करना खत्म हो गया है। इसका विरोध करते हुए वहां के दो सबसे बड़े जजों ने इस्तीफे भी दे दिए हैं। 

हमने पहले ही दिन इस परमाणु खतरे की चर्चा अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर की थी, और अब जैसे-जैसे इसकी जानकारी सामने आ रही है, इसके खतरे बढ़ते हुए नजर आ रहे हैं। दुनिया में आज जिन देशों के पास परमाणु हथियार हैं, उन 9 देशों में से कहीं भी बिना निर्वाचित या लोकतांत्रिक-राजनीतिक नेता के, अकेले फौजी को परमाणु फैसले लेने का हक नहीं है। अमरीका में राष्ट्रपति को परमाणु हथियार इस्तेमाल करने का आखिरी हक है। रूस में राष्ट्रपति को मुख्य अधिकार है लेकिन रक्षामंत्री और फौजी जनरल की मंजूरी से वे यह फैसला लेते हैं। चीन में राष्ट्रपति को अधिकार है, और उनकी मंजूरी से ही सेना यह कर सकती है। भारत में प्रधानमंत्री परमाणु कमान के अध्यक्ष हैं, और कैबिनेट की कमेटी की मंजूरी जरूरी है। ब्रिटेन में प्रधानमंत्री को अधिकार है लेकिन संसद की एक किस्म की मंजूरी लगती है। फ्रांस में राष्ट्रपति को अधिकार है लेकिन वे सेना की सलाह से ऐसा कर सकते हैं। इजराइल में प्रधानमंत्री और मंत्री मिलकर यह तय करते हैं। उत्तर कोरिया में वहां के शासक किम जोंग-ऊन को नागरिक-मिलिट्री कमांडर के रूप में यह अधिकार है। पाकिस्तान में अभी जनरल मुनीर को जो अधिकार दिया गया है, उस पर कोई नागरिक-नेता निगरानी नहीं रख सकते, सवाल नहीं पूछ सकते। 

भारत पर पाकिस्तान के जितने भी हमले पिछले पौन सदी में हुए हैं, उनमें से कुछ हमले फौजी पहल पर हुए, या फौजी तानाशाह ने भी किए। दुनिया में किसी भी फौज का रूख लोकतांत्रिक नहीं रहता, क्योंकि उसकी पूरी सोच ही दुश्मन को हराने, तबाह करने, और जंग को जीतने के लिए बनाई गई रहती है। पाकिस्तान की फौज कई बार की फौजी तानाशाही का खून चखने के बाद लोकतंत्र से वैसे भी दूर हो गई है, और वहां फौजियों का राज निर्वाचित नेताओं के ऊपर रहते आया है। निर्वाचित नेताओं को कभी जेल डालना, कभी प्रधानमंत्री बनाना, कभी ओहदे से हटा देना उनका पसंदीदा शगल रहते आया है। पाकिस्तानी फौजी जनरलों का रूख देश के इस्लामिक ढांचे के मुताबिक धर्म से लदा हुआ भी रहते आया है, और धर्म लोकतंत्र में नाजुक मौकों पर कभी लोकतांत्रिक फैसला नहीं लेने देते। 

फिर पाकिस्तानी फौज के मौजूदा जनरल असीम मुनीर की ताकत को देखें, तो हाल की भारत-पाकिस्तान फौजी लड़ाई के बाद उन्हें फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई है, जो कि दुनिया में फौज की परंपराओं के खिलाफ है। फील्ड मार्शल ऐसे फौजी मुखिया को ही बनाया जाता है जिसने दो अलग-अलग मोर्चों पर देश की फौज की अगुवाई की हो। पाकिस्तान और भारत के गिने-चुने दिनों के टकराव में ऐसी कोई नौबत नहीं आई थी, न ही इस लड़ाई में पाकिस्तान की कोई जीत हुई थी कि जिसके एवज में असीम मुनीर को यह सम्मान दिया जाए। दुनिया में फौजों की सदियों पुरानी इस परंपरा को तोडक़र इस फौजी अफसर को जिंदगी भर के लिए फील्ड मार्शल का ओहदा दिया गया है। अब ऐसी अलोकतांत्रिक और बेतहाशा ताकत से लैस एक धर्मालु फौजी के हाथ भारत की ताकत के आसपास के ही परमाणु हथियार दे दिए गए हैं। दोनों देशों के पास डेढ़-डेढ़ सौ के आसपास परमाणु हथियारों का अंदाज है। 

असीम मुनीर की ताकत का अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि बददिमाग अमरीकी तानाशाह राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने कुछ महीने पहले उन्हें अमरीकी राष्ट्रपति भवन आमंत्रित करके अकेले उनके साथ खाना खाया था, और उनकी मनमानी तारीफ भी की थी। एक देश के निर्वाचित राष्ट्रपति का दूसरे देश के फौज-प्रमुख से इस तरह का मिलना, लंबी बैठक करना बड़ा ही अस्वाभाविक था, और परंपरा से परे था। आज दुनिया में ट्रम्प से अधिक बददिमाग और कोई नहीं है, और पाकिस्तान में असीम मुनीर से अधिक ताकतवर कोई नहीं है। फिर पूरी दुनिया में असीम मुनीर के अलावा कोई भी ऐसा फौजी नहीं है जो कि अपने रिवाल्वर के गोली चलाने की तरह कहीं परमाणु हमला अकेले ही कर सके। 

आज की इस बात के आखिर में अभी कुछ महीने पहले असीम मुनीर की कही हुई एक बात याद रखने की जरूरत है जिसमें उन्होंने भारत के साथ फौजी तनातनी के संदर्भ में मई के महीने में रावलपिंडी में एक फौजी परेड में पाकिस्तान के 170 से अधिक परमाणु हथियारों का जिक्र करते हुए यह कहा था- हमारी सेना और हमारे परमाणु हथियार पाकिस्तान की हिफाजत के लिए हैं। अगर कोई हमें डुबाने की कोशिश करेगा, तो पाकिस्तान अकेले नहीं डूबेगा, एक तिहाई दुनिया को साथ ले जाएगा। हमारी ताकत इतनी है कि दुश्मन सोच लें। इसके साथ-साथ असीम मुनीर ने यह भी कहा था- कश्मीर हमारा है, और हम इसे किसी भी कीमत पर लेंगे। खुद पाकिस्तान के भीतर फौज प्रमुख को परमाणु तानाशाह बना देने का विरोध विपक्ष ने किया है, यह एक अलग बात है कि उसकी कोई ताकत आज नहीं रह गई है। 

फिर भी भारत को अपनी सलामती के लिए इस ताजा खतरे पर गौर करना चाहिए।

कल के अखबार और आज के मीडिया का फर्क!

16 नवंबर 2025 

 

एक वक्त था जब आज के मीडिया के तहत सिर्फ अखबार ही आया करते थे। उन दिनों अखबारों का वजन रद्दी से तय नहीं होता था, बल्कि उसकी प्रसार संख्या से तय होता था, और उसकी साख से भी। कुछ अखबार कम छपते-बिकते थे, लेकिन उनकी बात का वजन अधिक रहता था। बाद में टीवी चैनल आए, और उनकी दर्शक संख्या गिनने के सच्चे-झूठे जैसे भी हो, कुछ पैमाने बनाए गए। इस दौर में भी यह कुछ हद तक कायम रहा कि सबसे अधिक देखे जाने वाले चैनलों की साख भी सबसे अधिक हो, यह जरूरी नहीं था। दर्शक संख्या की लिस्ट में नीचे आने वाले कुछ चैनलों का नाम भी साख की लिस्ट में ऊपर रहता था, ठीक वैसे ही जैसे कुछ अखबार बिकते-दिखते तो कम थे, लेकिन उनकी बात को अधिक गंभीरता से लिया जाता था। 

अखबार के बिकने को उसके अलग-अलग पन्नों से नहीं तौला जा सकता था। पूरे का पूरा अखबार एक ही रहता था, उसकी सामग्री किसी वेबसाईट पर भी नहीं रहती थी जिससे कि यह देखा जा सके कि उसके अलग-अलग पन्नों पर छपी सामग्री में से किसे कम देखा जा रहा है, और किसे अधिक। लेकिन टीवी के आने के साथ ही यह भी हिसाब-किताब लगने लगा कि किस चैनल के कितने बजे के कार्यक्रम में दर्शक संख्या कितनी है, और दर्शक कितनी देर वहां पर रूकते हैं। फिर धीरे-धीरे अखबारों और टीवी चैनलों की वेबसाइटें बननी लगीं, और बहुत सी समाचार वेबसाइटें खुद की भी थीं। इनमें किस लेख या समाचार, किस वीडियो या ऑडियो को कितने लोगों ने देखा, यह अलग-अलग दिखने लगा, और इसी से यह तय होने लगा कि वेबसाइट पर, या उसके पीछे के अखबार में क्या छापा जाए, और क्या नहीं। 

अब जब सोशल मीडिया पर फॉलोअर, लाईक्स, रीपोस्ट, और कमेंट जैसे कई पैमाने लोकप्रियता को तय करने लगे, तो उत्कृष्टता सौतेले बच्चे सरीखी हो गई। उसी घर में उसे ऐसे कोने पर रखा गया कि वह मेहमानों को न दिखे। आज पल-पल यह तय होता है कि किसी रिपोर्टर, स्तंभकार, या संपादक के लिखे हुए पर कितने दर्शक, श्रोता, या पाठक जुटे। यूट्यूब पर यह दिखने लगा कि किस उम्र के औरत या मर्द, देश और दुनिया के किन इलाकों से कितनी देर देख रहे हैं, उनकी उम्र क्या है, और कितने फीसदी लोग कितने सेकेंड के बाद देखना बंद कर देते हैं। 

किसी देश में लोकतांत्रिक चुनावों में चुनी गईं सरकारें जिस तरह उत्कृष्टता की कोई गारंटी नहीं होतीं, ठीक उसी तरह आज के मीडिया पर किसी सामग्री को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से उसकी उत्कृष्टता का कुछ भी लेना-देना नहीं रहता, इससे जरूर लेना-देना रहता है कि उसे कितने लोग देखने वाले हैं। अब किसी भी तरह के मीडिया संस्थान में महत्व का यही एक पैमाना रह गया है कि उसे कितने लोग देखेंगे, सुनेंगे, या पढ़ेंगे। नतीजा यह हुआ है कि आज के मीडिया में काम करने वाले लोग, चाहे वे वहां के कर्मचारी हों, या बाहर बैठे हुए लेखक हों, उनके ऊपर विश्लेषकों का लगातार यह दबाव रहता है कि उन्हें किस विषय पर लिखना है, क्या लिखना है, क्या बोलना है, और कितनी देर यह काम करना है। 

हमारा अपना तजुर्बा यह है कि हम अपने अखबार के यूट्यूब चैनल पर अगर रूस और यूक्रेन के बारे में कुछ कहते हैं, या गाजा पर इजराइली ज्यादतियों के बारे में कुछ कहते हैं, तो उसे बड़ी सीमित संख्या में लोग देखते हैं। दूसरी तरफ हम किसी बहुत ही सतही राजनीतिक विवाद के बारे में कोई गंभीर टिप्पणी करते हैं, तो उसके सतही पहलू की वजह से उसे देखने वालों की कतार लग जाती है। अब अगर हमारी अर्थव्यवस्था यूट्यूब से मिलने वाली कमाई की मोहताज रहती, तो दुनिया के जरूरी मुद्दों पर कुछ कहना बड़ा मुश्किल हो जाता, और ओछी बातों को बोलने के बाद किसी और बात पर बोलने को समय ही नहीं रहता। गनीमत यही है कि हम अभी तक इस अंधी दौड़ में शामिल हुए बिना काम कर रहे हैं। अखबार की वेबसाइट पर भी अगर हमने अलग-अलग सामग्री को देखने वाले लोगों की गिनती देखना शुरू किया होता, तो कोई गंभीर और ईमानदार बात लिखना मुश्किल हो गया रहता। 

डिजिटल टेक्नॉलॉजी और उसकी वजह से मिलने वाले दर्शक-पाठक की संख्या के आंकड़े, लोगों के किसी सामग्री पर कितनी देर रूकने का हिसाब-किताब यह सब आज जिंदा रहने की मजबूरी के लिए तो जरूरी है, लेकिन यह उत्कृष्टता की कीमत पर ही हो पाता है। एक वक्त अखबार सबसे महत्वपूर्ण जानकारी समाचार के शीर्षक में दे देता था, अब डिजिटल मीडिया में इस जानकारी को छुपाकर एक सनसनीखेज तरीके से आधी-अधूरी जानकारी देने का चलन है, जो कि कई बार सोच-समझकर झूठी, या गलतफहमी पैदा करने वाली बनाई जाती है। इस तरह का एक बड़ा फर्क कुछ तो टेक्नॉलॉजी की वजह से आया है, और कुछ कारोबारी दबाव ने उत्कृष्टता का गला घोंट दिया है। 

एक वक्त था जब कहा जाता था कि बीबीसी में अपने संवाददाताओं या दूसरे विश्लेषकों को श्रोताओं या दर्शकों की तरफ से आने वाली प्रतिक्रियाओं से अलग रखा जाता है ताकि वे प्रतिक्रियाओं से प्रभावित न हों। आज हालत यह है कि कोई भी सामग्री पोस्ट होते ही हर कुछ मिनटों में देखा जाता है कि उसे कितने लोग देख रहे हैं, कितने लागे पढ़ रहे हैं, प्रतिक्रिया कैसी आ रही है, और टिप्पणियों में क्या लिखा जा रहा है। टेक्नॉलॉजी ने टाइपिंग आसान कर दी, फोटो बेहतर कर दी, वक्त बचा दिया, लेकिन उत्कृष्टता की कुर्बानी ले ली!

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 नवंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

स्वस्थ लोगों के दिल में लगा दिए स्टेंट, कमाई के लिए गुजरात अस्पताल में...

15 नवंबर 2025 

 

गुजरात के जामनगर में दिल के ऑपरेशन के एक बड़े अस्पताल में एक डॉक्टर ने बिना जरूरत मरीजों के दिल में स्टेंट लगाकर सरकारी इलाज योजनाओं से करोड़ों रूपए का घपला कर लिया। यह जामनगर का एक बड़ा नामी-गिरामी निजी अस्पताल है, और वहां पहुंचे मरीजों का ईसीजी सामान्य होने पर भी डॉक्टर ने उन्हें डराया कि स्टेंट नहीं लगेगा, तो दिल रूक जाएगा। इसके बाद फर्जी रिपोर्ट बनाकर उनकी समस्या को अधिक दिखाया है, और स्टेंट लगाकर सरकारी योजनाओं से दो-दो लाख रूपए निकाल लिए गए। इसके लिए डॉक्टर ने मरीज भेजने वाले दूसरे छोटे डॉक्टरों को 20 फीसदी कमीशन भी दिया। सरकारी अफसरों ने अभी तीन दिन पहले छापा मारा, तो उसमें 100 से ऐसे अधिक फर्जी केस निकले, और गैरजरूरी सर्जरी का रिकॉर्ड भी निकला। डॉक्टर पाश्र्व वोरा इस अस्पताल का डायरेक्टर भी था,  और इन गैरजरूरी मामलों से अस्पताल में छह करोड़ रूपए से अधिक सरकारी योजनाओं से ऐंठ लिए। डॉ.वोरा ने वहां 8 सौ से अधिक हार्ट-ऑपरेशन भी किए, और इनमें से अधिकतर सरकारी योजनाओं से भुगतान वाले थे। इसके लिए अस्पताल गरीब परिवारों को निशाना बनाता था जिनके पास पीएमजेएवाई कार्ड हैं, और उन्हें फ्री चेकअप कैम्प के नाम पर बुलाकर फर्जी रिपोर्ट बनाई जाती थी, स्वस्थ मरीजों की धमनियों को भी 80 फीसदी ब्लाक बताया जाता था, और स्टेंट लगाकर सरकार से पैसे ले लिए जाते थे। 

लोगों को याद होगा कि कई साल पहले छत्तीसगढ़ में भी राजधानी रायपुर के कई अस्पतालों में गांव-गांव से महिला मरीजों को लाकर उनके गर्भाशय निकालने का एक संगठित जुर्म किया था। जिनके अभी और बच्चे पैदा होने थे, जिनके बदन में कोई तकलीफ नहीं थी, उनके भी गर्भाशय इसलिए निकाल दिए गए थे कि उनके इलाज के कार्ड में रकम बाकी थी। ऐसे कई अस्पतालों की मान्यता भांडाफोड़ होने के बाद खत्म की गई थी, और कई सर्जनों का लाइसेंस भी कई महीनों के लिए निलंबित किया गया था। सरकार की योजनाएं जहां रहती हैं, वहां उनमें छेद ढूंढकर, वहां से सरकारी भुगतान निकाल लेने का काम अधिकतर विभागों में किया जाता है। हमने छत्तीसगढ़ में ही बीज निगम, हार्टिकल्चर मिशन जैसे कई सरकारी दफ्तरों में परले दर्जे का संगठित अपराध देखा है। एक पार्टी की सरकार चली जाती है, दूसरी पार्टी की सरकार आ जाती है, लेकिन इन विभागों में लुटेरे सप्लायर और ठेकेदार वही के वही कायम रह जाते हैं। वे सरकारी योजनाओं में घोटालों की संभावना इतनी अच्छी तरह देख चुके रहते हैं कि नए मंत्री, और अफसर भी उन्हीं को उन्हीं के नाम से, या कुछ अलग नाम से जारी रखने को फायदे का सौदा पाते हैं। 

अभी महाराष्ट्र के नागपुर की एक खबर है कि वहां सरकारी शिक्षक भर्ती की एक योजना, शालार्थ आईडी में एक बड़ा घोटाला हुआ है, और अपात्र लोगों को फर्जी तरीके से शिक्षक नियुक्त करके उनके नाम पर करीब सौ करोड़ रूपए वेतन निकाल लिया गया है। इस मामले में कुछ गिरफ्तारियां भी हो चुकी हैं, और अब साढ़े 5 सौ शिक्षकों को गिरफ्तार करने की तैयारी चल रही है जिससे खलबली मची हुई है। सरकार की कोई भी ऐसी योजना नहीं दिखती जिसमें घोटाला न होता हो। पूरी तरह से संगठित भ्रष्टाचार, पूरी तैयारी से की गई जालसाजी के कई मामले सामने आते रहते हैं। किसानों को खेती या बागवानी के उपकरण देने के नाम पर नकली उपकरण टिका दिए जाते हैं, और अफसर पैसा खा जाते हैं। जब अफसर पैसा खाते हैं, तो जाहिर है कि पैसा नेताओं तक भी पहुंचता ही होगा। देश में शायद ही ऐसा कोई प्रदेश हो जहां पर सरकारी कामकाज में संगठित भ्रष्टाचार न होता हो। 

अब ऐसी गड़बड़ी को पकडऩे का एक रास्ता कुछ योजनाओं में एआई की मदद से निकल रहा है। एआई धान परिवहन के बिलों को देखकर यह बता सकता है कि किन नंबर की गाडिय़ों पर धान परिवहन बताया गया है, जो कि दुपहिया हैं। या सरकार ने किसी एक टैक्सी का ऐसा भुगतान किया है जिसने एक दिन में दस हजार किलोमीटर सफर कर लिया है। इंसान तो भ्रष्टाचार में शामिल रहते हैं, लेकिन जब तक एआई को ऐसे भ्रष्टाचार को जांचने में भागीदार नहीं बनाया जाएगा, तब तक एआई की पकड़ में कई और चीजें आ जाएंगी। अभी यह भी खबरें हैं कि आधार कार्ड, पैनकार्ड, मतदाता कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस जैसे बहुत से व्यक्तिगत शिनाख्त वाले दस्तावेज एक-दूसरे से जोड़े जा रहे हैं। यह भी खबर है कि जमीनों की रजिस्ट्री में आधार कार्ड अनिवार्य कर देने के बाद धोखाधड़ी कुछ कम हुई है। जब बैंक खाते, क्रेडिट और डेबिट कार्ड, यूपीआई पेमेंट के औजार सब एक-दूसरे से जोड़ दिए जाएंगे, लोगों के मोबाइल नंबर और ईमेल उससे जुड़ जाएंगे, तो कई तरह की धोखाधड़ी घटेगी। यह एक अलग बात है कि इन सबसे देश के हर नागरिक सरकार की चौबीसों घंटों की निगरानी में आ जाएंगे, और निजता खत्म ही हो जाएगी। लेकिन सरकारी योजनाओं में चल रहा भ्रष्टाचार एक-एक करके कम भी हो सकता है, अगर सरकार की सारी जानकारी के साथ एआई को जोडक़र भ्रष्टाचार पकडऩे का काम किया जाए। इसके साथ यह खतरा भी जुड़ा रहेगा कि इतनी जानकारियां अगर एक साथ रहेंगी, तो आज रात-दिन टेलीफोन पर धोखा देने वाले ठग भी उन जानकारियों का इस्तेमाल करके लोगों को अधिक हद तक धोखा दे पाएंगे। 

खैर, जो भी हो, सरकारी योजनाओं में होने वाली चोरी और धोखाधड़ी को हर कीमत पर रोकना चाहिए क्योंकि यह देश की गरीब जनता के हक का पैसा है। फिर यह डॉक्टरी जैसे महान समझे जाने वाले पेशे के लिए भी शर्मिंदगी की बात है, और डॉक्टरों के संगठनों को ऐसे मामले सामने आने पर इन डॉक्टरों और ऐसे अस्पतालों की मान्यता खत्म करने के बारे में कड़े नियम  बनाने चाहिए, और उन पर अमल करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 15 नवंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)