दीवारों पर लिक्खा है, 11 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

ट्रम्प के अमरीका को देखें, तो कुछ जाना-पहचाना नहीं लगता?

11 सितंबर 2026  

 

डॉनल्ड ट्रम्प ने कल अमरीका में मध्यावधि चुनाव के पहले अपनी पार्टी के एक बड़े कार्यक्रम में यह घोषणा की है कि ये मध्यावधि चुनाव अमरीका के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण चुनाव होंगे, और इनसे देश के अगले ढाई सौ बरस का भविष्य तय होगा। वहां पर मध्यावधि चुनाव से सरकारें नहीं बदलतीं, फिर भी ट्रम्प इस चुनाव को लेकर इस अंदाज में भाषण दे रहा है कि मानो यह राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा हो। लेकिन इससे भी बड़ी दिलचस्प बात यह रही कि उसने कहा कि अगर चुनावी नतीजों में अमरीकी संसद के दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत मिलेगा, तो हर वयस्क अमरीकी नागरिक को पांच हजार डॉलर दिए जाएंगे। यह रकम कुल मिलाकर खरबों में जाने वाली है, और अमरीकी विश्लेषक दो बातों पर गौर कर रहे हैं, कि यह पैसा आएगा कहां से? और दूसरा यह कि क्या वोट पाने के लिए ऐसी कोई घोषणा कानूनी भी है? 

यह आखिरी वाली बात अमरीका और भारत के बीच एक तुलना करने पर मजबूर कर रही है। भारत में अब धीरे-धीरे करके अधिकतर पार्टियां चुनावों में महिला मतदाताओं को डायरेक्ट कैश ट्रांसफर का लालच देने लगी हैं। अलग-अलग प्रदेशों में ऐसी योजना के नाम अलग-अलग रहते हैं। लेकिन इससे भी कुछ और पहले जाएं तो तीन हफ्ते पहले ट्रम्प ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नाम लेकर भारत की चुनाव व्यवस्था और वोटर आईडी की तारीफ की थी। उन्होंने मतदाता परिचय पत्र की तरह, अमरीका के सेव अमेरिका एक्ट के तहत नागरिकता सुबूत, और फोटो परिचय पत्र पर जोर दिया था। अब दिलचस्प बात यह है कि इसी वक्त भारत में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण, एसआईआर चल रहा है। और ट्रम्प ने अभी ताजा घोषणा की है कि अमरीकी जनगणना से एच-1बी वीजा धारकों को बाहर रखा जाए, और भारतवंशी छात्र भी ऐसी अमरीकी जनगणना से बाहर रहेंगे। भारत और अमरीका दोनों जगह आबादी के अलग-अलग हिस्सों को नागरिकता से बाहर करने की ये कोशिशें हैं तो अलग-अलग पैमानों की, लेकिन ये एक राजनीतिक समानांतर काम चल रहा है कि सत्ता का नापसंद लोगों को अलग कैसे किया जाए। अमरीका में एच-1बी वीजाधारकों में सबसे अधिक भारत के लोग हैं, और वे अमरीकी जनगणना में बाहर होने जा रहे हैं। कल के दिन लोगों को हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अगर ट्रम्प के कुछ अघोषित रहस्यमय सलाहकार भारत आकर ज्ञानेश कुमार से ट्रेनिंग लेकर जा रहे हों। 

आज ही एक अखबार में यह रिपोर्ट है कि भारत के एक बंगाली परिवार को किस तरह देश से निकालकर बांग्लादेश धकेल दिया गया था, और वहां एक बरस जेल में काटकर जब यह हिन्दुस्तानी बंगाली लौटा है, तो वह यह सवाल कर रहा है कि उसका कुसूर क्या था। जिस वक्त इस भारतीय नागरिक को गर्भवती पत्नी और बाकी परिवार के साथ अवैध करार देकर जून 2025 में बांग्लादेश में धकेल दिया गया था, तो दानिश नाम के इस मुस्लिम को बांग्लादेश ने साल भर जेल में बंद रखा, बाद में जब उसका मामला हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट में गया, तो सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद अब उसे भारत वापिस लाया गया है। लोगों को याद होगा कि ट्रम्प ने भी वहां कानूनी रूप से बसे हुए लोगों को इसी अंदाज से देश के बाहर भेज दिया था, और फिर अमरीकी अदालतों ने उन्हें वापिस लाने का हुक्म दिया था। जिस तरह भारत में एक राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाकर दूसरे देश का होने का आरोप लगाकर इसे चुनावी मुद्दा बनाया गया था, ठीक उसी तरह ट्रम्प अमरीका में प्रवासियों के खिलाफ मुहिम चला रहा है, और उसका सबसे बड़ा और बुरा निशाना हिन्दुस्तानी बन रहे हैं। 

भारत में मेक इन इंडिया नाम का एक बड़ा अभियान चल रहा है, और इस देश में अधिक से अधिक चीजों को खुद बनाने की एक मुहिम चल रही है। लेकिन दूसरी तरफ चीन के साथ सरहदी मुठभेड़ के बाद चीनी सामानों के बहिष्कार का जो अभियान चला था, वह किसी किनारे नहीं पहुंच पाया। 2020 में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर चीनी हमले के बाद से चीन से भारत का आयात लगातार बढ़ते चल रहा है। 2020-21 से 2024-25 के बीच भारत से चीन को निर्यात 33 फीसदी गिर गया, और चीन से भारत में आयात 74 फीसदी बढ़ गया। व्यापार का घाटा 125 फीसदी बढ़ गया, और आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि इन पांच बरसों में भारत के चीन के साथ कारोबार में भारत की करीब 384 बिलियन डॉलर की कमी आई है। दूसरी तरफ अमरीका ट्रम्प के वर्तमान कार्यकाल में जिस तरह दुनिया भर के सामानों पर टैरिफ लगाते जा रहा है, उससे खुद अमरीका में बाहर से आने वाले सामान अंधाधुंध महंगे हो रहे हैं, और ट्रम्प का मेक अमेरिका ग्रेट अगेन नाम का राष्ट्रवादी अभियान किसी किनारे नहीं पहुंच रहा, क्योंकि दूसरे देशों से आने वाला कच्चा माल इतना महंगा हो रहा है कि अमरीका में मैन्युफैक्चरिंग बढऩे के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। 

अब जब दोनों देशों की कई तरह की स्थितियों की तुलना की जा रही है, तो भारत इस मायने में बेहतर है कि इसने अपने आपको किसी भी जंग में उलझाकर नहीं रखा है। दोनों देशों में कई बातें राजनीतिक समानता की जरूर चल रही हैं, लेकिन भारत कुछ मामलों में ट्रम्प के अमरीका के मुकाबले अधिक समझदारी से चलते दिख रहा है। अब हम तो इस चर्चा को शुरू भर कर सकते थे, लोग चाहें तो अपनी-अपनी जानकारी, और समझ के मुताबिक इस तुलना को आगे बढ़ा सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 10 सितंबर 2026





 

अपना घर छोड़ 22 सौ किमी दूर ओडिशा के जंगलों में कहां से पहुंचे ओरांग-गुटान बच्चे!

10 सितंबर 2026  

 

ओडिशा में अभी हैरान करने वाली बात। वहां बालासोर के इलाके में एक जंगल में पेड़ों पर पांच ओरांग-गुटान मिले। ये भारत के निवासी ही नहीं है, और सुमात्रा के जंगलों में पाए जाते हैं। वहां से वे ओडिशा कैसे पहुंचे, यह भी हैरानी की बात है। बंदर और चिम्पांजी जैसी एक नस्ल के ओरांग-गुटान के ये पांच बच्चे छह महीने से एक साल उम्र के हैं, इनमें भी सबसे छोटा बच्चा तो बहुत ही कम उम्र का है। ये दो हजार किलोमीटर से अधिक दूर इंडोनेशिया के सुमात्रा के टापू से पूरा समंदर पार करके ओडिशा के जंगल में कैसे आ गए, यह एक रहस्यमय पहेली है। स्थानीय सूचना बताती है कि इसी जंगल के आसपास रहस्यमय तरीके से एक काली थार गाड़ी देखी गई थी, और अब उसकी तलाश चल रही है। इनके आने की एक संभावना जिंदा वन्य जीवन तस्करी करने वाले लोग हो सकते हैं जो कि इस समंदर के रास्ते इन्हें ओडिशा लाए हों, और फिर जमीन के रास्ते भारत के किसी दूसरे हिस्से में ले जा रहे हों। भारत के अड़ोस-पड़ोस के कोई देश इतने संपन्न नहीं हैं कि जहां इस तरह के दुर्लभ जानवरों का भुगतान करने वाले लोग हों। भारत के जमीनी रास्ते से अगर कोई इन जानवरों को चीन ले जाने की बात सोचे, तो चीन का समुद्री रास्ता इंडोनेशिया, यानी सुमात्रा से करीब है, उसे इतने लंबे रास्ते की जरूरत नहीं है। लेकिन एक दूसरी खबर जो अभी-अभी आई है वह एक और चोरी की घटना बताती है। बांग्लादेश के गाजीपुर सफारी पार्क से मार्च 2025 में तीन रिंग-टेल्ड लेम्यूर चोरी हुए थे। बांग्लादेश की सीआईडी जांच के मुताबिक ये जानवर कई हाथों से गुजरने के बाद भारत लाए गए, और गुजरात के वनतारा वन्य प्राणी केन्द्र से जुड़े एक संस्थान को 48 लाख रूपए में बेचे गए। इस मामले में बांग्लादेश की अदालत में आठ आरोपियों से छह ने जुर्म मानते हुए बयान दिए हैं। बांग्लादेश की यह खबर वहां के सरकारी रिकॉर्ड में अच्छी तरह दर्ज है, और आज जब ओडिशा में इंडोनेशिया के ओरांग-गुटान इस तरह मिल रहे हैं, तो यह खबर याद पड़ती है। 

भारत से वैसे भी बहुत सारे प्राणी दुनिया के दूसरे देशों में भेजे जाते हैं, और वहां से भी दुर्लभ वन्य प्राणी भारत आते हैं। बहुत बड़े-बड़े, कई रंगों वाले तोते सरीखे काकातुआ भारत के संपन्न लोगों के घरों में दिखते हैं, वे तस्करी से ही आए हुए रहते हैं। इसी तरह कई अलग-अलग दुर्लभ नस्लों के छोटे कछुए लोग अपने घरों के मछलीघर में पालते हैं। भारत में प्रतिबंधित कुत्तों की कुछ नस्ल भी जगह-जगह लोगों पर हमला करते दिखती है, और उन्हें पालने वाले लोग बहुत संपन्न बददिमाग रहते हैं जिन्हें दूसरों की जिंदगी की कोई परवाह नहीं रहती। भारत के समुद्रतटों पर, हवाई अड्डों पर, कभी इस देश से बाहर ले जाते, तो कभी दूसरे देश से यहां लाते हुए तरह-तरह के प्राणी पकड़ाते हैं। इनके बारे में यह भी समझने की जरूरत है कि जब कानूनी रूप से इन्हें लाया, या ले जाया जाता है, उनकी तरह-तरह की चिकित्सकीय जांच होती है, जो कि भारत के लिए भी जरूरी होती है, और दूसरे देश के लिए भी। लेकिन गैरकानूनी कारोबार में ऐसी कोई जांच नहीं की जाती, और इन प्राणियों के साथ कई तरह के रोग पहली बार भारत पहुंच सकते हैं, या भारत से उन देशों में जा सकते हैं। लोगों को याद होगा कि दूसरे देश से किसी भी तरह के बीज या पौधे लाने पर भी दुनिया के अधिकांश जिम्मेदार देशों में बड़ी रोक लगी रहती है। ऐसे बीजों, या पौधों के साथ में कई तरह के नए रोग आ सकते हैं, जिसमें देश में पहले से मौजूद वनस्पतियों को खतरा हो सकता है। इसी तरह तस्करी से लाए गए जानवरों से भारत में पहले से मौजूद जानवरों को भी खतरा हो सकता है, और भारत के इंसानों को भी। 

इसके अलावा यह भी समझने की जरूरत है कि भारत में वन्य जीवन की तस्करी पर नजर रखने वाली केन्द्र सरकार की संस्था डीआरआई ने अभी कल ही पिछले दस दिनों की कार्रवाई की जानकारी जारी की है, जिसमें तेंदुए की दो खालें, 180 जिंदा इंडियन स्टार कछुए, एक दुर्लभ किस्म की एक दर्जन बड़ी छिपकलियां (टोके गेको), और पेंगोलिन के करीब 24 किलो छिलके, बाघ की आधा किलो हड्डियां जब्त की गई हैं, और करीब 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसमें ओडिशा से लेकर मेघालय और असम तक कई जगह यह कार्रवाई हुई है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही छत्तीसगढ़ के बस्तर और लगे हुए महाराष्ट्र के जंगलों में भी अवैध शिकार, और उससे हासिल जानवर की खाल जब्त हुई थीं, और इनमें तो वन विभाग के कर्मचारी भी शामिल मिले हैं। 

आज जब भारत जैसे देश में हर किस्म के जुर्म में शामिल मुजरिम बढ़ते चले जा रहे हैं, साइबर क्राइम से लेकर वाइल्ड लाईफ तस्करी तक बढ़ते चल रही है। ऐसे में इन्हें पकडऩे वाली एजेंसियों में भी जब कुछ भ्रष्ट लोग घुस जाते हैं, तो बाहर के मुजरिमों की ताकत कई गुना बढ़ जाती है। भारत कैसे चारों तरफ की सरहद से होने वाली तस्करी को रोक सकता है, यह उसके सामने एक बड़ी चुनौती है। जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार के खरीददार अच्छे दाम लेकर मौजूद रहेंगे, तब तक हिन्दुस्तान में अवैध शिकार, और तस्करी को खत्म कर पाना नामुमकिन है। आज तो हम हर दिन किसी न किसी प्रदेश में ऐसा कत्ल देखते हैं जिसमें जमीन-जायदाद की विरासत पाने के लिए आल-औलाद ही माँ-बाप को कत्ल कर देती है, ऐसे में जंगली जानवरों से भला किसको मोहब्बत हो सकती है? फिर आज तो गांव-गांव तक इंसानों, और फसलों पर जानवरों का जो खतरा मंडराता रहता है, वह भी भयानक है, उससे भी बहुत से इंसानों को एक बहाना मिलता है कि उन्हें अपने आपको बचाने के लिए जंगली जानवरों को मारना ही है, यह उनकी मजबूरी है। फिर भी आसमान से गिरे, और ओडिशा के जंगल के पेड़ों पर टंगे ओरांग-गुटान के बच्चे कई तरह के सवाल खड़े करते हैं। भारत में वन्य प्राणियों को रखने वाले निजी चिडिय़ाघरों, और दूसरे वैसे केन्द्रों को भी जांच-पड़ताल की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)   

एआई से होने वाली किफायत मौलिकता की कीमत पर है...

09 सितंबर 2026  

 

कुछ मुद्दे ऐसे रहते हैं जिस पर न लिखने का इरादा रहे, तो भी आसपास कुछ न कुछ ऐसा होता है कि लिखना पड़ जाता है। जैसे ट्रम्प, या एआई, या धर्मान्धता। आज लिखने के लिए पेरिस के एफिल टावर पर स्वामिनारायण सम्प्रदाय के संन्यासियों का खड़ा किया गया बवाल एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन इस पर बहुत से दूसरे विश्लेषकों ने लिख दिया है, बहुत से लोगों के बयान आ गए हैं, और उस पर लिखने की जरूरत कुछ कम रह गई है। लेकिन एआई पर लिखने की जरूरत खत्म हो ही नहीं रही है। हर दिन दुनिया में कहीं न कहीं से एआई को लेकर ऐसी खबरें आती हैं कि नए खतरे दिखते हैं, और नई चुनौतियां भी दिखती हैं कि एआई की वजह से लोगों का सोचना कितना कम हो रहा है, दिमाग में कल्पना करने वाला हिस्सा, मौलिक सोचने वाला हिस्सा काम कम पा रहा है, चुनौतियां बिल्कुल नहीं पा रहा है, और धीरे-धीरे लोग अपने बहुत किस्म के काम एआई को ठीक उसी अंदाज में देते चले जा रहे हैं, जिस अंदाज में कोई बड़े नेता अपने भाषण लिखने का जिम्मा भाड़े, या तनख्वाह के लेखकों को देते चले जाते हैं। असल जिंदगी में यह देखने मिलता है कि नेताओं की अपनी सोच की मौलिकता, और कल्पनाशीलता उनके लिए रखे गए भाषण-लेखकों की वजह से घटती चलती है। अब जिन्हें लीडरशिप करनी है, चाहे वह किसी सरकार की हो, संगठन की, या कि किसी कंपनी की, अगर उनका सोचना कम होते चलेगा, तो धीरे-धीरे लीडरशिप की उत्कृष्टता भी घटने लगेगी। एक दूसरा खतरा यह भी रहता है कि मदद करने वाला एआई हो, या भाषण लिखने वाले पेशेवर लेखक हों, उनकी सोच के दायरे में लीडरों की सोच कैद होने लगती है। लेकिन लोगों को इसमें कुछ अटपटा इसलिए नहीं लगता है कि जिनकी रोजी-रोटी ही भाषण लिखने से चलती है, वे शब्दों के खिलवाड़ तो लीडर से बेहतर कर ही सकते हैं, और जब लोगों की वाहवाही  पेशेवर की लिखी लफ्फाजी से हासिल होने लगती है, तो फिर लीडर को मौलिक सोच की जरूरत और भी कम लगती है। एआई के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।

यह एक ऐसा मददगार औजार साबित हो रहा है जिससे लोगों का काम हल्का होते चल रहा है, गैस के गुब्बारे जैसा। एआई ऐसी आदत बिगाडऩे वाला रहता है कि अगर हम अपने अखबार के लिए उससे इसी जगह छपने वाला संपादकीय लिखवाना चालू करें, तो वह शायद हमसे ज्यादा सधी हुई भाषा में लिख देगा। जब किसी विषय पर रिसर्च करते हुए एआई से तथ्य तलाशने को कहा जाता है, तो वह बार-बार उकसाता भी है कि अगर आप चाहें तो मैं इस पर संपादकीय लिख दूं। फिर उसे बड़ी मुश्किल से रोकना पड़ता है कि लिखने के लिए विचार हमारे पास जरूरत से अधिक हैं, सिर्फ पुराने तथ्यों को ढूंढने के लिए एआई की जरूरत है, इसलिए हमारी रोजी-रोटी पर डकैती न डालें, और सिर्फ तथ्य ढूंढकर बताएं। इससे परे बहुत से ऐसे काम एआई अपनी तरफ से नए सुझाने लगता है जो कि मानवीय सीमाओं से परे के रहते हैं। कल ही कोई एक तथ्य ढूंढते हुए एआई से लंबी बातचीत हुई, तो उसने उन आंकड़ों को पिछले सवा सौ साल के रिकॉर्ड देखकर, उनका विश्लेषण करके सामने रखने का प्रस्ताव रखा। फिर उसके साथ विचार-विमर्श करते-करते कई तरह के पैमाने तय किए गए, कुछ अपवादों पर विचार किया गया, और फिर उससे विश्लेषण करवाया गया। किसी मानवीय क्षमता में इतना विश्लेषण आता नहीं है। नतीजा यह होता है कि असाधारण और तकरीबन नामुमकिन किस्म के काम जब एआई से होने लगते हैं, तो दिमाग उसी तरफ अधिक चलने लगता है कि ऐसा असाधारण विश्लेषण करना कितना अनोखा होगा। दिमाग की मौलिक सोच कम होने लगती है, और हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद एआई के इस्तेमाल से हमारी मेहनत पर भी असर पडऩे लगा है। यह तो कुछ मौलिक काम खुद करने की आदत अभी बनी हुई है, वरना एआई ने दिमाग पर पूरी तरह चर्बी चढ़ाने का प्रस्ताव रखना जारी रखा था। 

कई बरस पहले देश के संपादकों के एक सरकारी जमावड़े में, उत्तर-पूर्व के एक राज्य में कमजोर इंटरनेट के बीच संपादकीय लिखकर भेजना बड़ी चुनौती का काम था। वहां पर कुछ कल्पनाशील संपादकों ने यह तरीका निकाला था कि इंटरनेट पर कई ऐसी वेबसाइटें थीं जो हर दिन कई विषयों पर संपादकीय टिप्पणी लिखकर डालती थीं। बहुत से संपादक अपने दफ्तरों में इन्हीं में से किसी वेबसाइट से टिप्पणी लेकर संपादकीय छापने का जिम्मा किसी को दे आए थे। मतलब यह कि आज एआई जिस तरह लोगों को अलाल बनाने पर आमादा है, उस तरह का काम तो एआई के आने के दो दशक पहले से इंटरनेट पर मौजूद सामग्री ने करना शुरू कर दिया था। नामी-गिरामी संपादकों को भी यह अपमानजनक नहीं लगता था कि उनके अखबार के संपादकीय कॉलम में इंटरनेट से उठाकर सामग्री छाप दी जाए। अब एआई ने तो यह सहूलियत दे रखी है कि एक विषय पर किसी एक एआई से एक लाख अलग-अलग लोग अपनी थोड़ी सी सोच बताकर, उसे एक रूख या रूझान सुझाकर, भाषा शैली बताकर एक लाख किस्म के संपादकीय लिखवा सकते हैं। 

हमारी बातचीत अपने खुद के पेशे तक सीमित हुई चली जा रही है, जबकि लिखना तो एआई का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा है, शायद उसकी क्षमता का सबसे आसान वाला एक-लाखवां हिस्सा। एआई का असली काम तो वैज्ञानिक, और कारोबारी विश्लेषण, और जरूरत पडऩे पर, मांगने पर निष्कर्ष सुझाने जैसा काम है। अब अगर दुनिया की कई कंपनियों में मैनेजमेंट ही लोगों पर यह बंदिश लगा रहा है कि वे अपने काम में एआई का भरपूर इस्तेमाल करें, एआई का इस्तेमाल न करने पर लोगों को नोटिस जारी हो रहे हैं, या उनकी नौकरियां ली जा रही हैं, तो फिर ऐसे में किसी भी क्षेत्र के मुखिया या लीडर अपने आपको एआई की आदत से कैसे बचा सकते हैं? एक तरफ तो उससे कई सहायकों की जरूरत खत्म हो रही है, काम जल्दी हो रहा है, पहले जो काम अकल्पनीय थे, अब कुछ पलों में हो जा रहे हैं, और फिर कंपनियां हैं कि एआई के अधिक से अधिक इस्तेमाल पर जोर दे रही हैं। तो ऐसे में किसी भी संगठन या कारोबार के नेता, या मीडिया में समाचार-विचार लिखने वाले लोग अपनी मौलिकता कब तक कायम रख सकते हैं? फिर आज आधी सदी से जो केलकुलेटर इस्तेमाल हो रहे हैं, जिनकी वजह से लोगों के दिमाग से पहाड़ा निकल ही चुका है, उसी तरह अब जिस रफ्तार से एआई का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लोगों की कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता दोनों की छुट्टी होने का खतरा आ गया है। अभी न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी ने वहां की स्कूलों में आठवीं क्लास तक के बच्चों के लिए जनरेटिव एआई औजार इस्तेमाल करने पर एक साल के लिए रोक लगा दी है। आज कंपनियां खर्च में कटौती करने के लिए जिस तरह एआई को बढ़ावा दे रही हैं, उससे उन कंपनियों में काम आसान, और सस्ता तो हो रहा है, लेकिन कल्पनाशीलता, और मौलिकता का विसर्जन भी हो रहा है। इसके खतरे दिखते-दिखते दिखेंगे।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 9 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

माफिया-धमकियों के बाद छोटे जज का हौसला, और बड़े जजों में वह गायब क्यों?

08 सितंबर 2026  

 

उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक जिला जज ने पिछले पांच महीनों में दस चर्चित मामलों में 23 मुजरिमों को फांसी की सजा सुनाई है। उनका कहना है कि ऐसे फैसलों के बाद पश्चिम यूपी के माफिया-गैंगस्टरों ने उनसे संपर्क कर यह संदेश भिजवाया है कि वे उनके पीछे पड़े, तो वे कोर्ट बदलवा देंगे, या जिले के बाहर तबादला करवा देंगे। जज रविकुमार दिवाकर ने ऐसे एक मामले में जिंदा जलाई गई एक मुस्लिम महिला के पति को फांसी सुनाते हुए अपने ऊपर उठ रहे सवालों के जवाब भी लिखे हैं। उन्होंने लिखा- मेरे माता-पिता ने भगवान के सिवाय किसी अन्य से नहीं डरने की सीख दी है। अगर जज बाहुबलियों, माफिया, या मुजरिमों के दबाव में काम करने लगें, तो जनता का अदालत पर से भरोसा कमजोर हो जाएगा। यदि मैं ऐसी ताकतों से डर जाऊंगा, तो मेरे लिए अदालत से इस्तीफा देना ही बेहतर होगा। फैसले में उन्होंने लिखा है कि उन्हें यह संदेश भिजवाया गया है कि अभी उनके पास से सिर्फ फाइलें हटवाई गई हैं, और यदि वे उनके पीछे पड़े, या टिप्पणी की, तो वे अपनी ताकत का इस्तेमाल करके उनका कोर्ट बदलवा देंगे, या जिले के बाहर ट्रांसफर करा देंगे। 

अभी कुछ ही दिन हुए हैं कि उत्तर भारत में एक सिविल जज, शबीना खान ने अपने जिले की एक चर्चित आईएएस, दुर्गा शक्ति नागपाल पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने उनकी अदालत में चल रहे एक मुकदमे को लेकर उन्हें फोन करके उन पर दबाव डाला। जज का कहना है कि नागपाल ने अपने पद का हवाला देते हुए अपनी वरिष्ठता गिनाई, और अदालत में चल रहे एक मामले की चर्चा की, हाईकोर्ट में उनकी शिकायत करने, और केस ट्रांसफर करने की बात कही, और उनके संस्कार या आचरण पर टिप्पणी की। इस पर इस महिला जज ने खुली अदालत में इसकी चर्चा करके इसे अनुचित दबाव, और डराने की कोशिश बताया, और मुकदमा दूसरी अदालत में भेजने की मांग की। जिला जज ने केस को इसके बाद दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिया। इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी नाराजगी जताई है, और इसे पहली नजर में अदालत की आजादी पर हमला करार देते हुए इसे आपराधिक अवमानना वाली पीठ के पास भेज दिया है। दिलचस्प बात यह है कि अवमानना की सुनवाई वाली अदालत के जज, जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव ने बिना कोई कारण बताए अपने को इस मामले से अलग कर लिया। अब यह किसी और अदालत में चलेगा। 

जो लोग जिला स्तर की अदालतों के कामकाज से वाकिफ रहते हैं, उन्हें इस तरह के कई अनैतिक दबावों की कहानियां याद रहती हैं। कुछ मामलों में जज भी खुद होकर कई अलग-अलग, कानून से परे की वजहों से मामलों को प्रभावित करते हैं, कई मामलों में जजों के गलत या खराब आचरण की भी चर्चा रहती है, और कई मामलों में उन पर राजनीतिक या अदालती दबाव भी आता है क्योंकि उनकी आगे की तैनाती सरकार और हाईकोर्ट दोनों पर निर्भर करती है। फिर यह भी है कि लोकतंत्र में हर तरह की बड़ी-बड़ी ताकतों से जुड़े मामले निचली अदालतों में आते-जाते रहते हैं, और वहां से किसी फैसले के बाद ही हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की बारी आती है। इसलिए छोटी अदालतों के जजों पर तरह-तरह के अनैतिक दबाव आते रहते हैं, इनमें अभी उत्तरप्रदेश का ताजा मामला सबसे ही भयानक दिख रहा है जिसमें माफिया-गैंगस्टर अपने लोगों को फांसी की सजा देने पर जज को तबादला करवा देने की धमकी दे रहे हैं। इससे न सिर्फ उनकी धमकी देने की ताकत दिखती है, बल्कि जैसा कि इस जज ने लिखा है, उनसे कुछ फाइलें या केस ले भी लिए गए, उससे ऐसा लगता है कि माफिया के हाथ ऊपर तक पहुंचे हुए हैं, या तो सरकार में ऊपर तक, या फिर न्यायिक प्रशासन में जिला जज के ऊपर कहीं तक। 

भारतीय लोकतंत्र में अब ऐसा भी नहीं रह गया है कि लोगों का भरोसा आखिर में आकर अकेली न्यायपालिका पर टिक गया है। बहुत से मामलों में देश की बड़ी-बड़ी अदालतों के फैसलों को लेकर भी जनता में बेचैनी और अविश्वास की नौबत आती है, और लोगों को लगता है कि जिनके साथ बड़ी बेइंसाफी हो रही है, बड़ा जुल्म हो रहा है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट से भी इंसाफ नहीं मिल रहा है। इसलिए लोकतंत्र में जिस तरह बाकी स्तंभों पर से लोगों का भरोसा कम हुआ है, उसी तरह अदालतों पर से भी भरोसा घटा है। बीते कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट अपने मुख्य न्यायाधीश के स्तर पर ही जिस तरह की अविश्वास की फजीहत से घिरा हुआ है, वह देखने लायक है। वह सब कुछ तो एक पूरी तरह से अवांछित जुबानी टिप्पणी की वजह से शुरू हुआ मामला है, लेकिन हमारे जैसे लोग जो बारीकी से सुप्रीम कोर्ट, और देश के हालात देखते हैं, उन्हें यह दिखता है कि देश की सबसे खतरनाक नौबतों को भी सुप्रीम कोर्ट अनदेखा कर रहा है। 

यह नौबत बहुत निराशाजनक है। हिन्दुस्तान का अदालती इतिहास लोकतांत्रिक मूल्यों पर अड़े रहने वाले बहुत से जजों से भरा हुआ है। कई जजों ने समाज या सरकार की प्रचलित सोच के खिलाफ जाकर भी फैसले दिए थे। बहुत से जज ऐसे हुए जिन्होंने खुद होकर ऐसे मामलों की सुनवाई शुरू की, जिन्हें लेकर ताकतवर तबके बहुत खफा भी हुए। लेकिन आज तो हम यह देखकर हक्का-बक्का हैं कि अभी साल-दो साल के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट ने नफरती-बयानों को लेकर हेट-स्पीच नाम से चर्चित जो आदेश दिया था, उसे देश भर में पांवोंतले कुचला जा रहा है, और सुप्रीम कोर्ट इसकी अनदेखी करने को ही सहूलियत की बात पा रहा है। अब ऐसे में किसी जिले के किसी जज को मिल रही धमकी के बाद भी अगर वह जिम्मेदारी और ईमानदारी से अपना काम करे, तो वह तारीफ की ही बात रहेगी, क्योंकि जिन सुप्रीम जजों के पास खोने को कुछ नहीं है, वे भी हौसले के काम नहीं कर पा रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 8 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)