विदेशी फर्जीवाड़े से डॉक्टर बने लोग कैसा इलाज करेंगे?

26 अगस्त 2026  

 

भारत के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में जिन्हें दाखिला नहीं मिलता है, और जिन्हें डॉक्टरी पढऩे की हसरत रहती है, ऐसे लोगों के लिए दूसरे देशों के मेडिकल कॉलेजों के स्वागतद्वार खुले रहते हैं। रूस, यूक्रेन, चीन, बांग्लादेश के साथ-साथ किर्गिस्तान, फिलीपींस, और उजबेकिस्तान जैसे कई देशों से एमबीबीएस की डिग्री दिलाने वाली एजेंसियां भारत में उसी तरह सक्रिय हैं, जिस तरह इन दिनों साइबर फ्रॉड करने वाली एजेंसियां कॉल सेंटर चला रही हैं। एक प्रमुख अखबार, दैनिक भास्कर की एक खोजी रिपोर्ट में आज ही यह स्टिंग ऑपरेशन छपा है कि ये एजेंसियां इन देशों में मेडिकल दाखिला करवाने के साथ-साथ कॉलेज जाने से भी छूट दिलवा रही हैं कि वे घर बैठे पढ़ाई करें, और सिर्फ इम्तिहान देने के लिए उन देशों में चले जाएं। इस सबकी लागत भारत में एमबीबीएस पढ़ाई के मुकाबले खासी कम भी है। एक तो दूसरे देशों से एमबीबीएस या उसके बराबर की डिग्री लेकर आने वाले भारतीय लोगों को भारत में एफएमजीई नाम का एक इम्तिहान पास करना पड़ता है, तभी वे यहां डॉक्टरी कर सकते हैं। साल में दो बार होने वाली इस इम्तिहान में 12 फीसदी से लेकर 25 फीसदी तक ही लोग पास हो पाते हैं, और वे ही लोग भारत में मरीज देख सकते हैं, सरकारी या निजी अस्पताल में डॉक्टर की नौकरी कर सकते हैं। बाहर से पढक़र आने वाली बहुत से लोग तीन-चार बार भी ऐसी इम्तिहान देकर खींचतानकर पास होते हैं, और हो सकता है कि इनमें भी नीट की तरह की धांधली चलती हो। 

देश भर में कई प्रदेशों में चिकित्सा शिक्षकों की इतनी कमी है कि नेशनल मेडिकल कमीशन के दौरे के समय घर बैठे हुए, रिटायर हो चुके, कभी न पढ़ाने वाले किसी भी तरह के चिकित्सक को शिक्षक बताकर मान्यता ले ली जाती है, या बढ़वा ली जाती है। इस फर्जीवाड़े से असल मेडिकल पढ़ाई का कोई लेना-देना नहीं रहता, क्योंकि जिस तरह कुछ दूसरे देशों में फर्जी हाजिरी दिलाकर छात्रों को मेडिकल पढ़ाई न करने की छूट दिलवा दी जाती है, ठीक उसी तरह भारत के बहुत से मेडिकल कॉलेजों में ऐसी फर्जी नियुक्ति दिखाकर उन्हें शिक्षक बता दिया जाता है, और यह तो जाहिर है कि वह पढ़ाई होती ही नहीं है। ऐसे में उत्तर भारत, या हिन्दी भारत के प्रदेशों में आबादी के अनुपात में मेडिकल सीटें कम होने का तर्क देकर एनएमसी दक्षिण भारत में सीटें बढ़ाने से मना कर चुका है, जहां पर कि मेडिकल सीटें बढ़ाने का ढांचा मौजूद है। यह रूख हैरान करता है कि इस देश में दुनिया के कमजोर किस्म के देशों से फर्जीवाड़े से डिग्री खरीद लेना एनएमसी को मंजूर है, लेकिन अपने ही देश के भीतर दक्षिण भारत को अधिक मेडिकल सीटें मंजूर करना उसे मंजूर नहीं है। ऐसे उग्र क्षेत्रवादी नजरिए की वजह से अभावग्रस्त उत्तर भारत का और नुकसान हो रहा है, क्योंकि अगर दक्षिण में सीटें बढ़तीं, तो उनमें से उत्तर के छात्र-छात्राओं को भी जगह मिली रहती, और हो सकता है कि उनमें से कई नौजवान डॉक्टर बनकर लौटकर अपने इलाकों में आते। अब पूरी तरह फर्जीवाड़े से विदेशी डिग्री पाना ही बहुत से बच्चों के लिए अकेला जरिया रह गया है।  राष्ट्रीय स्तर पर बने हुए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से देश के एकता के ढांचे को नुकसान होते दिख रहा है। इससे उत्तर-दक्षिण के बीच खाई भी गहरी, और चौड़ी हो रही है, और देश की चिकित्सा शिक्षा क्षमता का बेहतर इस्तेमाल नहीं हो रहा। 

अब अगर हम चिकित्सा शिक्षा से कुछ देर के लिए हटकर लोगों के इलाज पर आएं, तो उसमें भी इस रूख का नुकसान हो रहा है। दक्षिण भारत से तैयार होने वाले किसी भी इलाके के छात्र-छात्राओं का फायदा पूरे देश की स्वास्थ्य सेवाओं को किसी न किसी तरह मिल सकता था। लेकिन विदेशों में मोटा पैसा खर्च करके डॉक्टर बनकर लौटने वाले लोगों में से शायद ही कोई देश के ग्रामीण इलाकों में जाने वाले होंगे। नतीजा यह है कि सरकारी हो या निजी अस्पताल हो, भारत के अस्पताल मरीजों से उसी तरह भरे हुए दिखते हैं, जिस तरह अदालतें मुकदमों से भरी हुई रहती हैं, सडक़ें जानवरों से भरी हुई रहती हैं, और गैस एजेंसियां सिलेंडर की कतार में लगे लोगों से भरी रहती हैं। इस सिलसिले को खत्म करने के लिए उन प्रदेशों को और निजी संस्थाओं को बढ़ावा देना होगा, जो कि अच्छी या बेहतर चिकित्सा शिक्षा दे सकते हैं। सरकार एक तरफ तो अपनी हर संपत्ति का निजीकरण करती जा रही है, निजी चिकित्सा शिक्षा आज भी देश में मान्यता प्राप्त है। लेकिन ऐसे में भी सरकार के नियमों का आल-जाल अगर निजी चिकित्सा शिक्षा को आगे बढऩे से रोक रहा है, तो उसे तोडऩा जरूरी है। सरकारें हर चीज को नियंत्रित करने के मामले में इतनी बावली न रहें कि वे कंट्रोल-फ्रीक कहलाने लगें। आज देश में चिकित्सा शिक्षा पर काबू एक बहुत ही भ्रष्ट व्यवस्था है, और बीते बरसों में कितने ही लोगों को इस सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है। इससे जाहिर है कि सिर्फ नियंत्रण की नीयत से काम ईमानदार नहीं हो जाता, सरकार को इसके लिए कोई अलग तरीका निकालना पड़ेगा। दूसरी बात यह कि अलग-अलग राज्यों की क्षमता अगर नहीं है, अगर वे चिकित्सा शिक्षा, और चिकित्सा का ढांचा ही विकसित नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें बराबरी पर आने देने का मौका देने के नाम पर सक्षम राज्यों को पीछे धकेलकर रखना बहुत नाजायज बात है, और यह एक राष्ट्रीय क्षति भी है। 

देश में आज भी अधिक फीस देकर निजी कॉलेजों में डॉक्टरी पढऩा एक जायज व्यवस्था है। देश को डॉक्टरों की जरूरत है, फिर चाहे वे किसी भी कॉलेज से पढक़र निकले हों। ऐसे में सरकार तो जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज बनाने के एक सपने को पूरा करने का दिखावा करते दिखती है। इससे जमीनी हकीकत में कोई सुधार नहीं होना है। निजी मेडिकल कॉलेज आज भी मौजूद हैं, और वहां से भी डॉक्टर बनकर निकलने वाले लोग आने वाले बरसों में चिकित्सा शिक्षक, या चिकित्सा कॉलेज के अस्पताल के डॉक्टर बन सकते हैं। इसके लिए एक दूरदर्शी सोच और योजना दोनों की जरूरत है, यह शुरूआत तो केन्द्र सरकार के स्तर पर ही हो सकती है, और उस पर अमल राज्य सरकारें कर सकती हैं। फिर यह भी है कि केन्द्र से परे कई राज्य अपने स्तर पर राष्ट्रीय पैमानों से अधिक भी काम कर सकते हैं, केन्द्र को उनके काम में अड़ंगा लगाना बंद करना होगा। डॉक्टरी की पढ़ाई सिर्फ एक पढ़ाई नहीं है, बल्कि देश की जनता के इलाज के हक को पूरा करने का जरिया भी है। राज्य सरकारें छोटी-छोटी जगहों तक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खोल तो रही हैं, लेकिन हर जगह डॉक्टर नहीं मिल पा रहे हैं, इसके लिए काफी सोच-विचार किया जाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

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