कोई जूलियस सीजर और रामकथा की किताबें भेजे देश के इन बड़े जजों को

27 अगस्त 2026  

 

सुप्रीम कोर्ट के एक जज, जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के काम के तरीकों पर पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए हैं, और ऐसे मामले गिनाए हैं जिनमें बड़े-बड़े नफे-नुकसान वाले केस दूसरे जजों से जस्टिस शर्मा ने खुद अपनी बेंच पर ले लिए, और फिर ताकतवर लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए अदालत का बेजा इस्तेमाल किया। जस्टिस मेहता ने इस महीने 2, 10, और 17 तारीख को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को ये पत्र लिखे हैं, जिनमें बहुत सारे मुद्दे गिनाए गए हैं। बड़े-बड़े जमीन-जायदाद के ऐसे केस के नाम दिए गए हैं जो कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश ने अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करते हुए अपनी अदालत में बुला लिए। अभी कुछ दिन पहले ही एक और हाईकोर्ट, पंजाब एवं हरियाणा, के बारे में इसी तरह की खबर आई थी कि वहां भी कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने दूसरे जजों की बेंच से राजनीतिक प्रभाव वाले चुनिंदा मामलों को अपनी कोर्ट में बुला लिया, और फिर ऐसे फैसले दिए जिससे पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार पर बहुत बड़ा बोझ पड़ा, और वह बोझ कोई भी सरकार उठा नहीं सकती। एक के बाद एक, दो ऐसे जजों की खबरें इस हाईकोर्ट से ऐसी आई थीं जिन्हें लगातार ऐसे विवादास्पद मामलों से जोडक़र देखा जा रहा था। 

अभी दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज, जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला खबरों में बना ही हुआ है, जिनके बंगले से बोरियां भर-भरकर अधजले नोट बरामद हुए थे। वहां आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों, और पुलिसकर्मियों को ये बोरियां मिलीं, इनके वीडियो भी सामने आए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की एक जांच कमेटी बनाई, जिसमें यह पाया कि बंगले के स्टोर रूम में सचमुच में बड़ी मात्रा में नोट रखे हुए थे। कमेटी ने यह भी पाया कि आग बुझने और दमकलकर्मियों के जाने के बाद सुबह-सुबह वहां से जली हुई नगदी हटाई गई। इस कमेटी की रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई, और आगे की संवैधानिक कार्रवाई करने की सिफारिश की गई। इस मामले से कई और किस्म के संदेह भी जुड़े हुए थे, लेकिन कोई सुबूत न रहने से यह स्थापित नहीं हो सका कि यह पैसा किसने, किसको, किस वजह से दिया था, यह किस भुगतान का था। फिर भी किसी हाईकोर्ट जज का इतनी बड़ी नगदी से सीधा रिश्ता शायद पहली बार ही सामने आया। 

इस सिलसिले में थोड़ी सी हैरानी इस बात को लेकर हो रही है, कि पिछले कुछ हफ्तों से सुप्रीम कोर्ट का ही एक जज मुख्य न्यायाधीश को ऐसे गंभीर आरोपों वाली चिट्ठी लिख रहा है, और अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में राजस्थान हाईकोर्ट का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अनियमित तरीके से काम करते हुए, पक्षपात और भाई-भतीजावाद दिखाते हुए काम कर रहा है, और इस पर सुप्रीम कोर्ट कुछ करते भी नहीं दिख रहा है। किसी भी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश किसी मामले के लिए बेंच तय कर सकते हैं, और बेंच का फैसला ही कई मामलों में केस का फैसला भी मान लिया जाता है। खासकर जब कीमती जमीन-जायदाद से जुड़े हुए, आर्थिक नफा-नुकसान के मामलों की बेंच बदली जाती है, तो लोगों का शक जायज ही रहता है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने यह कहा है कि उन्होंने जस्टिस शर्मा से स्पष्टीकरण मांगा है। भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट का ही एक जज किसी राज्य के हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ बार-बार लिखित शिकायत कर रहा है, और उस पर देश का मुख्य न्यायाधीश कई हफ्ते बाद भी स्पष्टीकरण का ही इंतजार कर रहा है! ऐसे में लोगों को कुछ और जजों के विवाद भी याद पड़ते हैं कि किस तरह उनके बीते बरसों में उन पर जमीन-जायदाद की खरीद-बिक्री में आर्थिक अनियमितता के आरोप लगे थे। 

किसी भी लोकतंत्र या दूसरी शासन व्यवस्था में एक लाईन अक्सर कही जाती है कि सीजर की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। अब इसका संदर्भ यह है कि ईसा के 62 बरस पहले रोमन शासक जूलियस सीजर की पत्नी घर पर एक धार्मिक समारोह करवा रही थी, जो कि केवल महिलाओं के लिए था। वहां पर एक नौजवान महिला बनकर भीतर घुस गया, और माना गया कि वह शासक की पत्नी से मिलने पहुंचा था। इसे लेकर पूरे रोम में बड़ा राजनीतिक, और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया। सीजर को यह विश्वास नहीं था कि उसकी पत्नी ने कोई अपराध किया है, उसने अदालत में भी यही बात कही, लेकिन फिर भी उन्होंने पत्नी को तलाक दे दिया। जब उनसे पूछा गया कि वे बीवी को बेकसूर मानते थे, तो फिर तलाक क्यों दिया, तो उन्होंने कहा कि राजा की पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह संदेह की छाया भी अपने पर पडऩे दे। वहीं से यह लाईन निकली कि राजा की पत्नी को संदेह से भी ऊपर रहना चाहिए। इसे सार्वजनिक जीवन में ईमानदार रहने से ऊपर बढक़र ईमानदार दिखने की भी सोच के रूप में दुनिया भर में माना गया। फिर भारत, और दुनिया भर की अदालतों में भी इससे मिलती-जुलती एक सोच आगे बढ़ी कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, होते हुए भी साफ-साफ दिखना चाहिए। 

भारतीय संस्कृति में इसकी एक बड़ी मिसाल रामकथा में आती है जहां अयोध्या के एक निवासी की एक बात को सुनकर वनवास से लौटे राम अपनी पत्नी सीता को घर से निकाल देते हैं। उनका पैमाना भी यही रहता है कि राजा की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। यह फैसला भयानक रूप से गलत था, लेकिन ऐसे ही कड़वे फैसलों की वजह से राम, मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाए थे। ऐसे भारत में सबसे बड़ी अदालतों के जजों को न सिर्फ ईमानदार रहना चाहिए, बल्कि साथ-साथ ईमानदार दिखना भी चाहिए, और संदेह से ऊपर तो रहना ही चाहिए। जहां किसी जज से यह उम्मीद की जाती है कि वे किसी पक्षकार, या किसी वकील, या केस के इतिहास से अपना दूर का रिश्ता रहने पर भी उसे सुनने से इंकार कर दे, वहां पर इतने आरोपों के साथ कोई जज अगर अनियमित तरीके से काम कर रहे हैं, तो न्यायपालिका पर किसका भरोसा रह जाएगा? ऐसा भी नहीं कि आज हर किसी का न्यायपालिका पर बहुत बड़ा भरोसा है। देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का जितना पतन हुआ है, उसकी वजह से नौजवान पीढ़ी, और बच्चों तक में देश की व्यवस्था को लेकर बेचैनी और संदेह दोनों भरे हुए हैं। किसी जज को खुद भी ऐसी शर्मनाक नौबत से बचना चाहिए, और जब सुप्रीम कोर्ट के एक जज यह लिखकर दे रहे हैं कि राजस्थान हाईकोर्ट के कुछ जजों ने उनसे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ऐसी शिकायतें की हैं, तो बिना देर किए संदेह के घेरे वाले जज को अपने आपको ऐसे पसंदीदा मामलों की सुनवाई से तो अलग कर ही लेना चाहिए। भारत की न्यायपालिका में यह तो जरूरी रहता भी नहीं है कि किसी मामले की सुनवाई कोई एक खास जज करे। ऐसे जज को खुद होकर अपने को आर्थिक वजन वाले मामलों से तो अलग कर ही लेना चाहिए। हमने जिन दो पुरानी कहानियों का जिक्र ऊपर किया है, उन दोनों की किताबें जस्टिस शर्मा को उपहार में भेजनी चाहिए, क्योंकि ऐसा लगता है कि उन्होंने ये दोनों कहानियां पढ़ी नहीं हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

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