राजनीति में कटुता के चलते कहावत-मुहावरे भी मुश्किल

संपादकीय
9 फरवरी 2017


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में कल पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर एक हमला करते हुए कहा कि वे चालीस बरस तक देश के आर्थिक नीति निर्धारण के केन्द्र में रहे, और इतने बड़े-बड़े घोटाले होते गए। उन्होंने मनमोहन सिंह के बारे में कहा कि वे बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाना अच्छी तरह जानते हैं। इसे लेकर कांग्रेस ने कल संसद छोड़ दी, और आज वह इसे लेकर राज्यसभा में नारेबाजी कर रही है। कांग्रेस इसे लेकर प्रधानमंत्री से मांग कर रही है कि वे अपने शब्द वापिस लें, और माफी मांगें।
आज देश की राजनीतिक हवा में जहर देश की असल हवा से कहीं अधिक घुला हुआ है। दिल्ली या प्रदूषण के शिकार इलाहाबाद जैसे दूसरे शहरों की हवा कितनी भी जहरीली हो, संसद और विधानसभाओं में एयरकंडीशनिंग के बावजूद, राजनीतिक दलों के भाषणों और पत्रवार्ताओं में जहर कारखानों के जहर से अधिक घुला हुआ है। नतीजा यह है कि किसी का मुंह खुलता नहीं है कि उसका राजनीतिक जवाब सोचना और देना शुरू हो जाता है। तमाम राजनीतिक दल इसी काम में लगे हैं और मुद्दे की बात धरी रह जाती है। कल प्रधानमंत्री ने जो कहा वह बात एक कहावत या मुहावरे जैसी अधिक थी, और एक हकीकत भी थी। मनमोहन सिंह दस बरस प्रधानमंत्री रहे, और अपने कम से कम दूसरे कार्यकाल में तो वे लगातार भ्रष्टाचार के मूक गवाह बने रहे, और उन्होंने देश को डूब जाने दिया। किसी मंत्रिमंडल का मुखिया मीडिया में अपनी सरकार के भ्रष्टाचार की अंतहीन खबरों को देखते हुए भी अनजान और निर्लिप्त नहीं बने रह सकता। कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से अछूते रहने का हक कमल को तो मिल सकता है, किसी प्रधानमंत्री को नहीं। इसलिए मोदी की इस बात में सच्चाई तो थी कि मनमोहन सिंह अपनी इस लंबी आर्थिक भूमिका के दौरान होते भ्रष्टाचार से अनजान बने रहे। प्रधानमंत्री बनने के पहले वे वित्तमंत्री रहे, सरकार में सचिव रहे, आरबीआई के गवर्नर रहे, और अनगिनत आर्थिक नीतियों के पीछे उनका हाथ रहा। ऐसे में वे अपने दशकों के कार्यकाल के भ्रष्टाचार से अनजान बने रहने का दावा तो बिल्कुल ही नहीं कर सकते। हमने यूपीए के कार्यकाल के दौरान यह बार-बार लिखा था कि मनमोहन सिंह की जगह अदालती कटघरे से होते हुए जेल की दिखती है, यह अलग बात है कि अब तक उसकी नौबत नहीं आई है। जब कोई इंसान देश और सरकार की सेवा करने की संवैधानिक शपथ लेते हैं, तब उनकी निजी ईमानदार बने रहना कोई मायने नहीं रखता, अगर उनके मातहत एक गिरोह की तरह काम करते हैं।
देश की राजनीति में गंदी, ओछी, और भड़काऊ बातें बहुत सी हो रही हैं, कम से कम संसद की यह एक बात सदन छोडऩे जैसी नहीं थी, और कांग्रेस ने मानो एक बहाना ढूंढकर सदन छोड़ दिया। नरेन्द्र मोदी इससे बुरी बहुत सी और बातें कहते आए हैं, उन्होंने शशि थरूर के मामले में सौ करोड़ की गर्लफ्रेंड जैसी बात भी कही थी, और कई दूसरे लोगों पर ओछे हमले किए थे, लेकिन वैसी बातों का वैसा ही जवाब दूसरे लोगों ने भी उनको दे दिया था। हम ऐसी किसी भी बात को सही नहीं मानते, लेकिन मनमोहन सिंह चूंकि निजी जीवन में ईमानदार माने जाते हैं, इसलिए उनके कार्यकाल के, उनके मातहत, उनके काबू के कामकाज में हुए घोटालों को लेकर भी उनके बारे में कुछ न कहा जाए, यह फिजूल की बात है। इतिहास भी मनमोहन सिंह से हमेशा इस बात का जवाब मांगता रहेगा, भले मनमोहन सिंह अपने खुद के बारे में, अपने को रियायत देते हुए यह कहते रहें कि इतिहास उनके प्रति अधिक नर्मी बरतेगा। इस देश का कोई प्रधानमंत्री, कोई मंत्री या मुख्यमंत्री अपने मातहत होते भ्रष्टाचार का मुखिया बने रहकर किसी नर्मी की उम्मीद न करे, और जेल जाने को तैयार रहे।
आज राजनीति में कटुता इतनी बढ़ गई है कि मुद्दे की बात धरी रह जाती है, और कुछ शब्दों को लेकर लाठियां चलने लगती हैं। हमारा यह मानना है कि बात ठोस बात पर होना चाहिए, संसद का पिछला सत्र इस मुद्दे पर खत्म हो गया कि प्रधानमंत्री उसमें आ नहीं रहे हैं, आ रहे हैं तो बोल नहीं रहे हैं, और अब बोल रहे हैं तो बोलते हैं कि बोलता है।

कोल्ड स्टोरेज के बजाय गांवों में फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगें...

संपादकीय
8 फरवरी 2017


राज्य सरकार खेतों में छोटे-छोटे फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की नीति बना रही है ताकि खेतों की उपज सड़कों पर न फेंकना पड़े। छत्तीसगढ़ पिछले कई बरसों से टमाटर की ऐसी बर्बाद होती हुई फसल देख रहा है, और अब इस बरस तो कई तरह की दूसरी सब्जियां भी सड़कों पर फेंकी गई हैं। पिछले दिनों राज्य शासन ने ऐसा इरादा जाहिर किया था कि फसलों को बचाने के लिए कोल्ड स्टोरेज बनाए जाएंगे, और तब हमने यह सलाह दी थी कि महंगी बिजली पर चलने वाले कोल्ड स्टोरेज सस्ती सब्जी को रखने में बड़े महंगे पड़ेंगे, और उसके बजाय सरकार को फूड प्रोसेसिंग इकाईयां लगानी चाहिए।
उस समय हमने यह लिखा था- एक ऐसा मोड़ है कि सरकार को बाजार के साथ मिलकर यह भी सोचना चाहिए कि इसे खर्चीले कोल्ड स्टोरेज बनाने हैं, या कि फल-सब्जियों और वनोपज की प्रोसेसिंग करने वाले छोटे-बड़े कारखाने? कोल्ड स्टोरेज में किसी सामान को रखना दो हिसाब से खर्चीला होता है, एक तो किसान को तुरंत दाम नहीं मिल पाते और उसके बैंक-कर्ज का ब्याज बढ़ते रहता है, और दूसरी बात यह कि उसे कोल्ड स्टोरेज में उपज रखने का भाड़ा देते रहना पड़ता है। नतीजा यह होता है कि एक वक्त के बाद इस भाड़े को मिलाकर लागत इतनी बढ़ जाती है कि किसान कहीं के नहीं रहते। अभी पिछले हफ्ते ही उत्तरप्रदेश में कुछ जगहों से खबरें आई हैं कि किराए से थके हुए किसानों या व्यापारियों ने कोल्ड स्टोरेज से आलू निकालकर सड़कों पर फेंक दिए और उनके सडऩे से भयानक बदबू फैली और बीमारी फैलने का खतरा खड़ा हो गया है। छत्तीसगढ़ में भी हो सकता है कि सब्जी का यही हाल होने लगे, और किसान आज तो सड़कों पर सब्जी फेंक रहे हैं, या कि मुफ्त में बांट रहे हैं, कल वे कोल्ड स्टोरेज के भी कर्जदार हो जाएंगे।
हमारी सीमित समझ यह कहती है कि दूध, फल-सब्जी, या वनोपज सरीखे सामानों की प्रोसेसिंग के छोटे-बड़े कारखाने अगर राज्य में लगाए जाते हैं, तो उससे स्थानीय रोजगार तुरंत खड़े होंगे, और उपज में इतना वेल्यूएडिशन हो जाएगा कि उससे किसान को दाम ठीक मिलेंगे, और कुछ कारोबारी भी उससे कमा सकेंगे। ऐसी औद्योगिक इकाईयों में लागत भी कम आएगी, और उससे आसपास के इलाकों में फल-सब्जी उगाने का काम एक कमाऊ कारोबार भी हो सकेगा। यह बात समझ लेने की जरूरत है कि ऐसी प्रोसेसिंग इकाईयों का मतलब यह नहीं होता है कि राज्य के भीतर बड़े ब्रांड विकसित हों, और उसके बिना ये इकाईयां किसी काम की न हों। होता यह है कि ऐसी इकाईयां एक कच्चा माल तैयार करती हैं, और इसे बाहर की बड़ी कंपनियां ले जाकर ग्राहक के लायक प्रोडक्ट बनाकर बेचती हैं।
राज्य के भीतर से कोयला निकालकर अगर दूसरे राज्य में ले जाकर बिजली बनाई जाती, तो छत्तीसगढ़ को अधिक कमाई नहीं होती। इस राज्य से लौह अयस्क बाहर ले जाकर बेचा जाता है, तो उससे राज्य को बहुत कम पैसा मिलता है। लेकिन जब कारखाने यहां लग जाते हैं, तो ऐसे वेल्यूएडिशन से कमाई एकदम से बढ़ जाती है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि राज्य के भीतर अलग-अलग इलाकों की पहचान करके ऐसे केन्द्र तैयार करें जहां पर आसानी से फल-सब्जी पहुंचाए जा सकें, और वहां से कच्चा माल भी आसानी से बाहर निकल सके। हमारा ख्याल है कि ऐसी योजनाओं के लिए केन्द्र सरकार का भी भरपूर अनुदान है, और इसे बिना देर किए करना जरूरी है ताकि प्रदेश के फल-सब्जी किसान इस काम को बंद करने की न सोचने लगें। कोल्ड स्टोरेज की सोच उन उपजों के लिए ठीक हो सकती है जिनका बाजार भाव इतना अधिक रहता है कि उन्हें किराया देकर भी रखना फायदे का साबित हो। हमको यह नहीं लगता कि टमाटर-गोभी जैसी सब्जियों को कोल्ड स्टोरेज में रखना मुनासिब होगा, यह किसान को एक और कर्ज में धकेलने का काम हो सकता है, इसके बजाय सरकार को कारखाने लगाना चाहिए।
अब यह एक अच्छी बात है कि सरकार सब्जियों के लिए, या दूसरे किस्म की उपज के लिए फूड प्रोसेसिंग प्लांट को बढ़ावा देने की नीति बना रही है। छत्तीसगढ़ में वनोपज से लेकर औषधीय और सुगंध के पौधों और जड़ी-बूटियों की भरमार है, और इन सबमें वेल्यूएडिशन की संभावनाओं को तलाशकर राज्य के लोगों को बहुत आगे ले जाया जा सकता है।

भारतीय फौज भ्रष्टाचार से परे नहीं, जवाबदेह तो रहे

संपादकीय
7 फरवरी 2017


सीबीआई ने एक जांच शुरू की है कि भारतीय फौज पाकिस्तान की सरहद पर जिन जमीनों का किराया दे रही है, उनमें से कई जमीनें तो पाक अधिकृत कश्मीर की हैं। अब ऐसे में उन जमीनों का किराया देने के नाम पर पहली नजर में जो भ्रष्टाचार हो रहा है, उसकी जांच से फौज की साख पर एक आंच तो आती ही है। दूसरी तरफ, अभी दो दिन पहले एक खबर आई कि भारतीय सेना के एक ट्रिब्यूनल ने 26 बरस पुराने एक मामले में फैसला दिया, और उस वक्त के एक नौजवान अफसर को दी गई सजा को खारिज किया। उस अफसर का कहना है कि सरहद पर फौज ने बड़ी तादाद में सोना जब्त किया था, जिसे अफसरों ने दबा दिया था, और इस अफसर ने जब दबाने का विरोध किया तो इसके खिलाफ कार्रवाई की गई। अब इतने दशक बाद जाकर मिलिट्री ट्रिब्यूनल ने उस वक्त की कोर्ट मार्शल की कार्रवाई को गलत ठहराया है, और इस अफसर को राहत दी है।
जब कभी फौज की बात आती है, तो लोग यह मान लेते हैं कि उसकी किसी भी तरह की आलोचना देशद्रोह है। फौज को लोग जांच से परे रखना चाहते हैं, आलोचना से परे रखना चाहते हैं। लेकिन दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिन-जिन चीजों को जवाबदेही से परे रखा जाता है, उन सबमें खामियां पैदा होने लगती हैं। जहां रौशनी नहीं पड़ती, जहां चीजों को रहस्यमय या गोपनीय रखा जाता है, वहां गलत काम करने वालों का हौसला बढ़ता है। भारत की फौज हो या कि यहां कि पैरामिलिट्री, या किसी राज्य की पुलिस हो, वह लोकतंत्र से ऊपर नहीं हो सकती, और किसी तरह की गोपनीयता की छूट उसे रणनीति के तहत तो मिलनी चाहिए, लेकिन बाकी रोज के कामकाज में किसी ईमानदार को गोपनीयता की क्या जरूरत पड़ सकती है? फौज की खरीदी भ्रष्टाचार से भरी हुई रहती है, दूसरी तरफ फौज के भीतर से ही ऐसी शिकायतें आती हैं कि बड़े फौजी अफसरों में से कुछ ऐसे भी होते हैं जो मातहत अफसरों की पत्नियों के शोषण में लग जाते हैं। फौज के रियायती सामान बेचने में भी बड़ा भ्रष्टाचार होता है, फौज से गोलियां चोरी होकर नक्सलियों और दूसरे आतंकियों तक पहुंचती हैं, और फौज की अपनी अंतरराष्ट्रीय खरीदी कैसे भयानक भ्रष्टाचार से भरी रहती है, यह बोफोर्स से लेकर हाल के हेलिकॉप्टर खरीदी तक सामने आया ही है।
फौज के प्रति एक सम्मान एक अलग बात है, लेकिन जिसका सम्मान हो, उससे कोई जवाब न लिया जाए यह तो जरूरी नहीं है। जब गांधी की बात होती है, तो गांधी को राष्ट्रपिता मानकर देश का सबसे बड़ा सम्मान दिया गया है। लेकिन गांधी के अपने जीवन की खामियों या कमजोरियों को लेकर कौन-कौन से सवाल नहीं उठते? इतिहास में उनकी हर गलती या गलत काम को खुलासे से दर्ज किया जाता है। किसी महानता के लिए किसी गोपनीयता की जरूरत नहीं होती है। फौज में उसकी कार्रवाई की गोपनीयता तो जरूरी है, लेकिन उसकी बाकी बातों को महानता की आड़ में अनदेखा करना गलत है। कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व तक कितनी ही जगहों पर भारतीय सेना पर बलात्कार और बेकसूर की हत्या जैसी तोहमत लगती हैं, और कहीं-कहीं पर साबित भी होती हैं। फौज को ऐसी शिकायतों और उन पर मुकदमों से बचाने के लिए ऐसे इलाकों में एक अलग कानून बनाया गया है जिसे हटाने के लिए बरसों से आंदोलन चल रहा है। फौज को किसी पवित्र चीज की तरह अलग रखना ठीक नहीं है, और लोकतंत्र में हर किसी को जवाबदेह तो रहना ही चाहिए।

सरकार से लेकर निजी कारोबार तक हिन्दुस्तानियों की बेहद बदसलूकी...

आजकल
6 फरवरी 2017  
दिल्ली की खबर है कि देश के सबसे बड़े अस्पताल, एम्स, में पहुंचने वाले मरीजों और उनके साथ के लोगों की सबसे बड़ी नाराजगी की अकेली वजह वहां के कर्मचारियों का बर्ताव है। मरीजों से किए गए एक सर्वे के विश्लेषण से यह नतीजा निकला है और यह गिने-चुने मरीजों की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि करीब एक लाख लोगों की प्रतिक्रियाओं में सबसे अधिक, 33 फीसदी लोग बर्ताव को लेकर असंतुष्ट मिले हैं।
अब ये सरकारी सर्वे के, अपने अस्पताल के बारे में आंकड़े हैं, और इसलिए इसके गलत होने का आसार नहीं दिखता है। ऐसे में जब हम देश के बाकी अस्पतालों, बाकी सरकारी दफ्तरों, या कोर्ट-कचहरी को देखें, तो तकरीबन सभी जगह लोगों के साथ, ग्राहकों या मरीजों के साथ, सरकारी अमले का बर्ताव ऐसा ही दिखता है। दूसरी तरफ जो सत्तारूढ़ तबका है, या कि मीडिया और कारोबार से जुड़ा हुआ पैसे वाला तबका है, उसका हाल देखें तो सरकारी कर्मचारी ताकतवर से उलझने के बजाय उसके सामने आमतौर पर बिछ जाते हैं। बाकी जनता से उनकी उम्मीद रहती है कि वह आकर उनके सामने बिछ जाए।
अभी जिस तरह केन्द्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली ने अपने बजट के दौरान कहा कि हिन्दुस्तानियों का मिजाज टैक्स चोरी का है, तो यह बात महज टैक्स तक सीमित नहीं है, यह जिम्मेदारियों से जुड़ी हुई हर बात तक बिखरी हुई है कि हिन्दुस्तानी लोग अपनी जिम्मेदारियों से कतराते हैं, और दूसरी तरफ अधिकारों का दावा करने में वे दूसरे लोगों के मुकाबले बहुत आगे भी हैं। नतीजा यह होता है कि सरकारी सेवाओं में काम करने वाले कर्मचारियों का कामकाज इतना खराब होता है, बर्ताव इतना खराब होता है कि हिन्दुस्तान में सरकारी काम को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
किसी निजी कारोबार में किसी के बर्ताव से शिकायत हो तो लोग कहते हैं कि ऐसी बदतमीजी से बात की जा रही थी कि मानो सरकारी दफ्तर हों। जब किसी सामान की क्वालिटी बहुत ही घटिया हो तो उसके बारे में कहा जाता है कि वह सरकारी-सप्लाई के लिए है। दुकानदार खुलकर कहते हैं कि अच्छी क्वालिटी चाहिए, या गवर्नमेंट-सप्लाई के लिए। और घटिया क्वालिटी का यह पैमाना बर्ताव से लेकर माहौल तक, और गंदगी से लेकर रिश्वतखोरी तक फैल जाता है।
तकलीफ तब कुछ अधिक होती है जब हिन्दुस्तान में निजी कारोबार में भी बहुत से कर्मचारियों, और बहुत से मालिकों का भी, बर्ताव सरकारी असर से बिगडऩे लगता है, और कदम-कदम पर ऐसा लगता है कि अपने कारोबार के भले के बजाय बहुत से लोग ग्राहक से उलझने और उससे बुरा सुलूक करने में खासी मेहनत करते हैं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि भारत के छोटे कारोबार ने अभी तक बड़े संगठित कारोबार की चुनौती झेली नहीं थी, और बिना महत्वाकांक्षा वाले छोटे-छोटे कारोबारी अपने दायरे में संतुष्ट चले आ रहे थे। लेकिन अब वक्त इस रफ्तार से बदला है कि लोगों को ऑनलाईन खरीदी करते हुए किसी कारोबारी या दुकान के किसी कर्मचारी का चेहरा भी नहीं देखना है, और सौ-पचास रूपए के सामान भी लोग ऑनलाईन ऑर्डर करके बुलाने लगे हैं। भारत में जो तबका ऑनलाईन खरीदी कर सकता है, उसकी बाकी सहूलियत के अलावा और एक वजह यह है कि यह तबका बाजार की बदसलूकी से थका हुआ है, और ऑनलाईन बदतमीजी होती नहीं है।
हिन्दुस्तान में कारोबार, सरकार, और किसी भी किस्म की जनसेवा से जुड़े हुए लोग अपनी जिंदगी इन्हीं कामों में खपाते हैं। वे काम अच्छा करें, या बुरा करें, जिंदगी का एक-एक दिन तो गुजरते ही जाता है। अब दुनिया भर से लोगों की बढ़ी हुई आवाजाही के चलते हिन्दुस्तानी कामगार का वास्ता देश के भीतर भी बहुत से विदेशियों से पड़ता है, और हिन्दुस्तान के बहुत से लोग काम करने दूसरे देशों में जाते भी हैं। ऐसे में जब हिन्दुस्तानियों का बर्ताव खराब रहता है, उनकी नीयत में ईमानदारी नहीं रहती है, किसी भी सैलानी को लूट लेने की सोच रहती है, किसी भी गोरे या काले को देखकर अपनी खुद की जुबान में उसे गाली देने या उसकी खिल्ली उड़ाने को जीभ खुजाने लगती है, तो दुनिया में ऐसे हिन्दुस्तानियों के लिए संभावनाएं घट भी जाती हैं।
सरकारी संस्कृति से निकलकर आया हुआ ऐसा बर्ताव निजी कारोबार तक बिखर जाता है, और लोगों को अपनी जिम्मेदारी से दूर धकेल देता है। देश की उत्पादकता सिर्फ काम के घंटों से तय नहीं होती, घंटों के हिसाब से तो सबसे अधिक काम मजदूर करते हैं, लेकिन वह मजदूरी सबसे अधिक उत्पादक नहीं होती, न उनके खुद के लिए, और न ही देश के लिए। जब ऐसी मजदूरी में हुनर की खूबी जुड़ती है, काम की उत्कृष्टता आती है, तभी वह काम अधिक उत्पादक हो पाता है। और ऐसी उत्कृष्टता में लोगों का बर्ताव एक बड़ी बात है, जिसके बिना उनकी बाकी की मेहनत, काम के घंटे अधिक काम के नहीं बचते।
इसलिए हिन्दुस्तान में जहां एक तरफ कौशल विकास या कौशल उन्नयन, या स्किल डेवलपमेंट के नारे हवा में तैर रहे हैं, वहां पर हुनर के साथ-साथ उत्कृष्टता की बाकी खूबियों को भी जोडऩा जरूरी है, क्योंकि बेहतर हुनर से उत्पादकता एक सीमा तक बढ़ सकती है, लोगों के बर्ताव से उसमें और बढ़ोत्तरी आ सकती है।
चीन जैसे देश में जहां दुनिया भर से लोगों का आना भी बढ़ा है, और चीन से कामगारों का बाकी दुनिया में जाना भी बढ़ा है, वहां पर इस नए अंतरराष्ट्रीय अंतरसंबंध के लिए अपनी पीढ़ी को तैयार भी किया जा रहा है। चीनी लोग राह चलते खखार कर थूकने के लिए बदनाम रहते आए हैं, अब चीन के भीतर जनता को सिखाया जा रहा है कि उनके ऐसे बर्ताव से विदेशी सैलानी किस कदर नफरत करने लगते हैं, और अगर वे दूसरे देशों में जाकर ऐसा बर्ताव जारी रखेंगे तो वहां उनकी इज्जत नहीं होगी। ऐसी बातों को औपचारिक रूप से हुनर की तरह ही सिखाया जा रहा है, और इसके नतीजे भी सामने आ रहे हैं। हिन्दुस्तान में अपने लोगों के बर्ताव को लेकर कोई चर्चा भी नहीं होती, विदेशी सैलानी हिन्दुस्तानियों के थूकने और मूतने को देखकर हक्का-बक्का रह जाते हैं कि किस तरह किसी साफ-सुथरी जगह को देखते ही हिन्दुस्तानी उसे गंदा करने के लिए किस हद तक कुलबुलाने लगते हैं।
और यह बात महज कर्मचारियों, नौकरों और कामगारों पर लागू नहीं होती, बहुत से छोटे-छोटे कारोबार में जहां पर मालिक खुद गल्ले पर बैठकर दुकान पर काबू रखते हैं, वहां उनका खुद का ध्यान भी ग्राहकों पर ठीक से नहीं रहता, और उनका बर्ताव भी बहुत खराब रहता है। ग्राहक खड़े रहें और दुकानदार फोन पर गप्प मारने में लगे रहें, पास में किसी दोस्त को बिठाकर उससे गप्प मारने में लगे रहें, सिगरेट-बीड़ी पीते रहें, या बदन के किसी ऐसे हिस्से को खुजाते रहें, जिसे देखकर ही चिढ़ होने लगे, तो ऐसे कारोबार में जाने से अगली बार लोग कतराने भी लगते हैं। जब लोगों के पास एक से अधिक दुकानों की आजादी होती है, तब बर्ताव की ऐसी छोटी-बड़ी खामियां किसी दुकान से ग्राहक छीन लेती हैं, और किसी अच्छे बर्ताव वाले दुकानदार को वे ग्राहक दिलवा देती हैं।
जिन लोगों को अपने देश की संस्कृति पर बहुत फख्र है, उन लोगों को अपने लोगों के बर्ताव के बारे में भी सोचना चाहिए, इसे कोई कानून बनाकर बेहतर नहीं किया जा सकता, इसे अपनी जिम्मेदारी को समझकर ही बेहतर किया जा सकता है।

शशिकला का आना एक बुरी मिसाल

संपादकीय
6 फरवरी 2017


तमिलनाडू की राजनीति जिस अंदाज में करवट बदल रही है, और गुजर चुकीं भूतपूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के मंत्रिमंडल में लंबे समय तक काम कर चुके और बाद में उन्हीं के होशोहवास में मुख्यमंत्री बनाए गए पनीरसेल्वम को जिस तरह इस्तीफा देना पड़ा, और भ्रष्टाचार के भयानक आरोपों से अदालती कटघरे में पड़ी हुई शशिकला को अगला मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है, वह लोकतंत्र के लिए एक बड़ी त्रासदी है। और ऐसा भी नहीं कि ऐसा लोकतंत्र देश में पहली बार तमिलनाडू में ही देखने मिल रहा है, अलग-अलग कई किस्म की कुनबापरस्ती, कई किस्म के भ्रष्टाचार, और कई किस्म की बेशर्मी के साथ लोग न सिर्फ मुख्यमंत्री बनते रहे हैं, बल्कि केन्द्रीय मंत्री, और पार्टियों के पदाधिकारी भी ऐसी नौबत में बनते रहे हैं, जो कि लोकतंत्र के नाम पर एक धब्बे से कम और कुछ नहीं है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी गिनाया है कि जिस वक्त लालू यादव को भ्रष्टाचार के आरोपोंं में जेल जाना पड़ा, या हटना पड़ा, उन्होंने किस तरह अपनी एक घरेलू-महिला पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया था।
लोकतंत्र जब तक मजबूत और गौरवशाली संसदीय परंपराओं का सम्मान करते हुए न चले, उसका बेजा इस्तेमाल होने का खतरा अपार है। कदम-कदम पर इस बात का नाजायज फायदा उठाया जा सकता है कि कानून में किस-किस बात पर रोक नहीं है। जिस ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को देखकर भारत की संसदीय प्रणाली बनाई गई, वह देश तो बिना लिखित संविधान वाला, और मोटेतौर पर परंपराओं का सम्मान करते हुए चलने वाला देश है। वहां पर लोगों के इस्तीफे जरा-जरा सी बात पर हो जाते हैं। और हिन्दुस्तान में जिन लोगों के एक पैर जेल में है, वे भी प्रदेश और देश का भविष्य तय करने पर आमादा रहते हैं कि कोई कानून उन्हें नहीं रोकता है। भारत का यह हाल देखते हुए पिछले दिनों अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का यह रूख भी याद पड़ता है जब लोगों ने उनसे उनकी कंपनियों का हिसाब सार्वजनिक करने को कहा, और याद दिलाया कि किस तरह वे आधा दर्जन बार दीवालिया घोषित करके अपनी कंपनियों को टैक्स देने से बचाते आए हैं, तो उन्होंने कहा कि वे एक चतुर कारोबारी हैं, और उन्होंने कानून में मिली छूट का इस्तेमाल करके ही अपना टैक्स बचाया।
लोकतंत्र और बेशर्मी इन दो का मेल बड़ा ही घातक होता है। भारत में जगह-जगह लोकतंत्र का जैसा मखौल उड़ाया जा रहा है, उससे कहीं पर लोगों का भरोसा नक्सलियों पर बढ़ रहा है, तो कहीं पर दूसरे किस्म के अपराधियों पर जो कि हाथों-हाथ फैसला सुना सकते हैं, सजा दे सकते हैं। किसी के कुनबे में रहने वाली एक महिला जिस तरह रातों-रात आज तमिलनाडू की मुख्यमंत्री बनाई जा रही है, और उसके अरबों के भ्रष्टाचार के मामलों का कोई मतलब ही नहीं रह गया दिखता है, वह लोकतंत्र के लिए एक शर्म की बात है। लेकिन ऐसी ही शर्म की बात कई किस्म की हैं, और भारतीय लोकतंत्र ऐसे तमाम बेजा इस्तेमाल से एक बुरी तरह से खोखला हो चुका तंत्र है, जिसे चुनाव-मतदान में मिली हुई कामयाबी से अपनी इज्जत ढांकने का मौका मिलता है। चुनाव में मतदान बिना जाहिर जुर्म के हो जाए, वही लोकतंत्र नहीं होता। ऐसे जाहिर जुर्म से परे एक-एक वोट खरीदा या साम्प्रदायिकता और जाति के आधार पर डलवाया जाता है, और वह लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। ऐसे में शशिकला ने एक और बुरी नौबत खड़ी की है, और आने वाले दिन देश में इस मिसाल का और बुरा इस्तेमाल करते दिखेंगे।

भारत की डिजिटल-हड़बड़ी और सौ कदम आगे साइबर-मुजरिम..

संपादकीय
5 फरवरी 2017


देश में एक बार फिर बहुत बड़ी साइबर-ठगी पकड़ाई है, और एक मामूली से आदमी ने बताया जाता है कि लोगों से 37 सौ करोड़ रूपए ठग लिए। उसने लोगों को यह झांसा देकर कुछ-कुछ हजार रूपए जमा कराए कि उन्हें घर बैठे ऑनलाईन सोशल मीडिया पोस्ट लाईक करने के लिए पांच-पांच रूपए मिलेंगे, और लाखों लोग उसके झांसे में आ गए। अब सरकारी टीवी दूरदर्शन पर आज सुबह की चर्चा में देश के सबसे बड़े साइबर-कानून जानकार यह कहते दिखे कि अभी यह कानून बड़ा कच्चा है, और इस किस्म के जुर्म की रोकथाम के लिए, इसे पकडऩे के लिए, और इसे सजा दिलाने के लिए इस कानून में पुख्ता इंतजाम नहीं है। मतलब यह कि साइबर और डिजिटल जुर्म तो खरगोश की रफ्तार से छलांग लगाकर आगे बढ़ रहे हैं, और ऐसे जुर्म रोकने के लिए सरकारी कानून और इंतजाम कछुए की रफ्तार से चल रहे हैं। इन दोनों का मेल शायद ही कभी हो पाएगा, और इस बीच ठगी, जालसाजी, धोखाधड़ी, और बैंक खातों में सेंधमारी करके मुजरिम उन गरीबों और को लूटते चले जाएंगे जिनके हाथों से सरकार नगदी छीनकर उन्हें डिजिटल भुगतान की ओर धकेल रही है।
भारत के लिए यह एक भयानक नौबत है जिसमें आर्थिक अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, साइबर अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, बैंक खातों के घुसपैठिये दुनिया में कहीं भी बैठे हुए किसी भी जगह के खातों को लूट रहे हैं, और भारत अभी तक न तो हिफाजत के इंतजाम कर पाया है, न ही वह साइबर-कानून बना पाया है जो कि ऐसे जुर्म की सजा दिला सके। वैसे भी यह बात समझ से परे है कि जो भारत अपनी सरहद से कुछ सौ किलोमीटर दूर पाकिस्तान में बैठे हुए मुम्बई बमकांड के आरोपी दाऊद इब्राहिम तक इन दशकों में नहीं पहुंच पाया है, वह दुनिया के अदृश्य साइबर-मुजरिमों तक क्या पहुंच पाएगा। सरकार की डिजिटल-हड़बड़ी और देश की डिजिटल-सुरक्षा-तैयारी के बीच किसी तरह का तालमेल नहीं दिख रहा है। जब बहुत कम पढ़े-लिखे लोगों के हाथ फोन पर बैंक खाते थमा दिए जा रहे हैं, भुगतान की ताकत थमा दी जा रही है, तो झारखंड के एक गांव में बैठे हजारों लोग केवल पूरे देश में साइबर-ठगी के काम में लगे हुए हैं, और उसे कोई रोक नहीं पा रहे हैं।
लेकिन अभी ठगी का जो मामला सामने आया है, वह नेटवर्क मार्केटिंग जैसी बहुत पुरानी एक अंतरराष्ट्रीय धोखाधड़ी की परंपरा की ताजा मिसाल है, और अगर केन्द्र या राज्य सरकारों की कोई निगरानी मशीनरी होती, तो वह कब का इस धोखाधड़ी को पकड़ चुकी होती। दरअसल भारत में जुर्म हो जाने के बाद उसे पकडऩे और सजा दिलवाने पर ही सारी ताकत लगाई जाती है, जबकि ऐसे जुर्म से इकट्ठा मोटी रकम कई खातों से होते हुए खत्म हो चुकी रहती है, और सरकार के हाथ अधिक से अधिक यही रह जाता है कि किसी मुजरिम को सजा दिलवाई जाए, जिससे कि डूबी हुई रकम तो लोगों को वापिस मिलती नहीं। आज भारत में ऐसे आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए एक बहुत ही मजबूत साइबर-सुरक्षा ढांचे की जरूरत है, और साइबर से परे भी खुले बाजार में पूंजी निवेश, या रकम दुगुना करके देने की योजना पर नजर रखने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, ठगे हुए लोग ठगे से खड़े रह जाएंगे, और ठगों का खजाना सरकारी पहुंच से परे किसी और देश पहुंच चुका रहेगा। आज हम जगह-जगह ऐसे पूंजीनिवेशकों की भीड़ देख रहे हैं, जिन्होंने जिंदगी भर की छोटी-मोटी कमाई और बचत को दुगुना होने की उम्मीद में कहीं लगा दिया था, और ऐसी कंपनियां रातों-रात गायब हो गई हैं। सरकारों को जुर्म होने के पहले की बहुत बारीक खुफिया-निगरानी बढ़ानी होगी, उसके बिना अपराधियों के पीछे भागते रहना एक फिजूल की कोशिश ही रहेगी।

आल-औलाद श्रवण कुमार बनी रहें इसका इंतजाम करना मां-बाप का जिम्मा

संपादकीय
4 फरवरी 2017


जो घटनाएं जारी हैं, उन पर लिखना समझदारी का काम नहीं होता क्योंकि कई बार सतह पर तैरता हुआ सच गलत निकलते दिखता है, और ऐसे में उस पर लिखा हुआ भी गलत लगने लगता है। लेकिन भोपाल से अभी जो खबर आ रही है कि किस तरह छत्तीसगढ़ के रायपुर में रह चुके एक नौजवान ने भोपाल में अपनी पत्नी का कत्ल किया, और पकड़ाने पर पुलिस पूछताछ में अभी यह भी कहा है कि उसने रायपुर में अपने मां-बाप का भी कत्ल करके उन्हें दफना दिया था, और मां के नाम की जायदाद बेचकर उससे अब तक मौज की जिंदगी गुजार रहा था। हो सकता है कि यह बात सच न भी हो, लेकिन दुनिया में रोज ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जब आल-औलाद मां-बाप को बुरे हाल में रखते दिखती है, और बहुत से मामलों में उनकी जायदाद पर कब्जा करने की नीयत रहती है। दुनिया के इस हाल पर ही आज सोचने की जरूरत है।
आमतौर पर मां-बाप अपने बच्चों के लिए ही दौलत इकट्ठी करके छोड़ जाते हैं। कुछ लोग ऐसे रहते हैं जो अपनी कमाई का छोटा या बड़ा हिस्सा समाज के भले के लिए भी छोड़ जाते हैं, जैसा कि बिल गेट्स से लेकर वारेन बफे तक अमरीका में कर रहे हैं, फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग बहुत कम उम्र में ही ऐसा करना शुरू कर चुके हैं, और भारत में भी टाटा या गोदरेज जैसे उद्योगों की कमाई का एक हिस्सा समाज सेवा में जाता है। लेकिन अधिक परंपरागत सोच अपनी पाई-पाई को बच्चों के लिए छोड़ देने की है। दूसरी तरफ ऐसे मामले भी बढ़ते चल रहे हैं जिनमें बूढ़े मां-बाप बच्चों का तिरस्कार झेलते हुए अपने आखिरी बरस बड़ी तकलीफ में गुजारते हैं, और कुछ बरस पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में मां-बाप को सम्हालने की जिम्मेदारी बच्चों पर डालने का एक फैसला भी दिया था।
आज अपने बच्चों के लिए सब कुछ छोड़कर जाने की चाह और नीयत को भी काबू में करने की जरूरत इसलिए है कि एक बार सब कुछ बच्चों के हाथ आ जाए तो फिर उसके बाद वे बूढ़े मां-बाप से कैसा सुलूक करें, यह उनकी मर्जी पर रहता है। दुनिया के तमाम रिश्ते किसी न किसी स्वार्थ से जुड़े रहते हैं। मां-बाप बच्चों को जितना ख्याल रखते हैं, तो उनके अचेतन मन में यह उम्मीद तो रहती ही है कि उनके आखिरी बरसों में बच्चे भी उनका ख्याल रखेंगे। लेकिन ऐसी उम्मीद पूरी हो, इसकी जिम्मेदारी भी कुछ हद तक मां-बाप पर रहती है जिन्हें अपनी विरासत को अपनी आखिरी सांस तक अपनी जरूरत के लायक को बचाकर रखना ही चाहिए। कभी भी वसीयत ऐसी ही बनानी चाहिए कि जायदाद का आखिरी हिस्सा बच्चों को मां-बाप के गुजर जाने के बाद ही मिले, और उनकी अपनी जिंदगी में वे बच्चों के मोहताज होकर न रह जाएं। बहुत से बच्चे ऐसे रहते हैं जो कि जायदाद अपने नाम आने तक तो मां-बाप से अच्छा बर्ताव करते हैं, लेकिन उसके बाद उनका रूख बदल जाता है। ऐसी नौबत न आ पाए, आल-औलाद जिम्मेदार बनी रहे, इसकी सावधानी मां-बाप को ही बरतनी चाहिए।
और इस बात में भी कोई बुराई नहीं है कि जो लोग कमाकर इकट्ठा कर चुके हैं, उन्हें अपने बुढ़ापे के जीने और इलाज जैसे खर्चों का इंतजाम करके किसी अच्छे वृद्धाश्रम का विकल्प भी खुला रखना चाहिए, और उनके बच्चे वहां मिलने आते रहें, इसके लिए अपनी वसीयत भी उसी हिसाब से बाकी रखनी चाहिए। अपनी जिंदगी के बाद तो वे चाहें तो बच्चों को सब दे जाएं, चाहें तो उनकी सेवा करने वाले लोगों को दे जाएं, और चाहें तो समाज के लिए बिना किसी स्वार्थ छोड़ जाएं। लेकिन अगर उनकी बचत है, तो अपने बाकी जीवन तक गुजारे के लिए उसे अपने ही पास रखें, पूरा का पूरा किसी को न दें। इसके लिए बैंक भी कई तरह के रिवर्स-लोन देते हैं जिनमें लोग अपनी संपत्ति गिरवी रखकर हर महीने कुछ रकम पा सकते हैं, और उनके मरने के बाद बैंक उसे बेचकर अपना कर्ज वसूलकर बाकी रकम उनके वारिसों को दे सकती है। बुढ़ापे के लिए ऐसी सारी सावधानी और ऐसे सारे विकल्प लोगों को सोचने चाहिए। फिलहाल एक बेटे के मां-बाप को कत्ल करने के दावे से बाकी मां-बाप को दहशत में आने की जरूरत नहीं है, लेकिन आल-औलाद श्रवण कुमार की कहानी की तरह सेवा करती रहे, ऐसी वसीयत बनाने की जरूरत जरूर है।

सोशल मीडिया के खतरों से आगाह रहना और करना जरूरी

संपादकीय
3 फरवरी 2017


मध्यप्रदेश के भोपाल से एक भयानक खबर आई है कि फेसबुक पर हुई दोस्ती, लिव इन रिलेशनशिप में बदल गई, और फिर झूठी जानकारी के आधार पर शादी भी हो गई, और पति ने पत्नी को मारकर घर के भीतर ही चबूतरे जैसी समाधि बनाकर लाश को दफना दिया, उस पर सोते रहा, और उस नौजवान पत्नी के एकाउंट से सोशल मीडिया पर सबसे चैट भी करते रहा। लड़की के पिता को महीनों बाद कुछ शक हुआ, तो वे पुलिस के पास पहुंचे, और पुलिस अब लाश तक पहुंच पाई है। पिछले महीनों में छत्तीसगढ़ में भी जगह-जगह सोशल मीडिया के माध्यम से हुई मोहब्बत के बाद शादीशुदा महिलाएं अपने पति और बच्चों तक को छोड़कर पे्रमी के साथ चली गईं, और तरह-तरह के धोखे हुए।
दरअसल, इंसान की सामाजिक जिंदगी में सोशल मीडिया एक आंधी की रफ्तार से आया हुआ मामला है, और उसके साथ जीना सीखने के पहले ही लोगों ने उसका अंधाधुंध इस्तेमाल शुरू कर दिया। जिस तरह किसी छोटे बच्चे के हाथ तेज चलने वाली कार थमा दी जाए, और वह उसे चलाना शुरू कर दे, कुछ उसी तरह आज अधिकतर लोग खतरों से अंजान रहते हुए सोशल मीडिया का बड़ा इस्तेमाल कर रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि लोग जुर्म में फंसने पर, या जुर्म का शिकार होने पर तो खबरों में आ रहे हैं लेकिन जुर्म से पहले तक जब परिवार टूट रहे हैं, तनाव पैदा हो रहा है, तब तक तो वह बात खबरों में भी नहीं आती। लेकिन ऐसा मानकर चलना चाहिए कि हर जुर्म के मुकाबले सोशल मीडिया पर हजारों तनाव खड़े होते रहते हैं, और लोगों के रिश्ते खराब होते रहते हैं।
ऐसे मामले में सरकार की जिम्मेदारी तो किसी जुर्म के सामने आने पर शुरू होती है, लेकिन दूसरी तरफ परिवार और समाज की जिम्मेदारी शुरू से शुरू होती है और अपने आसपास के लोगों को सोशल मीडिया की संभावनाओं और खतरों से आगाह कराना सबकी जिम्मेदारी है। जिस तरह लोग शराब या तंबाकू के खतरों से सावधान कराते हैं, ठीक उसी तरह सोशल मीडिया के खतरों से भी सावधान कराने की जरूरत है। सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि क्या स्कूल की आखिरी की एक-दो बड़ी कक्षाओं में सोशल मीडिया को लेकर कोई पाठ स्कूली किताबों में जोडऩा चाहिए, क्योंकि इस उम्र के बच्चे अब फोन, संदेश, और सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वे भारत के बहुत ही कड़े आईटी कानून के शिकंजे से भी नावाकिफ रहते हैं, और सामाजिक खतरों से भी। इसलिए आज अपने बच्चों को मोबाइल फोन देने के पहले, कम्प्यूटर और इंटरनेट देने के पहले इसके खतरों को बताना और समझाना उसी तरह जरूरी है, जिस तरह दुपहिया देने के पहले ड्राइविंग लायसेंस और हेलमेट देना जरूरी रहता है। और बच्चों को सावधान करने के पहले यह भी जरूरी है कि बड़े खुद भी सावधान हो जाएं, क्योंकि आज इंटरनेट और फोन-कम्प्यूटर पर कुछ भी निजी नहीं रह जाता है, और बहुत कुछ कानून के हिसाब से जुर्म के दायरे में आता है। 

ट्रंप के फैसले, और उनके खिलाफ खड़ी वहां की कौम

संपादकीय
2 फरवरी 2017


अमरीका में डोनल्ड ट्रंप के काम सम्हालने के बाद उनकी घोर नस्लवादी, साम्प्रदायिक, आप्रवासी और गरीब विरोधी नीतियों के चलते उनका देश भर में जबर्दस्त विरोध हो रहा है। वहां के संघीय ढांचे में राज्यों और शहरों को कई किस्म के अधिकार मिले हुए हैं, और कुछ राज्यों और शहरों ने ट्रंप के शरणार्थी-विरोधी फैसलों को मानने से इंकार कर दिया है। उनके फैसलों को अदालतों में चुनौती भी दी जा रही है, और अमरीकी सरकार की वकील ने जब अदालत में उनके फैसलों की वकालत करने से मना कर दिया, तो जाहिर तौर पर उसे इस ओहदे से हटा दिया गया। ट्रंप सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को यह भी कहा है कि अगर वे ट्रंप की नीतियों से सहमत नहीं हैं, तो वे नौकरी छोड़कर जा सकते हैं। अमरीका में एक अभूतपूर्व जागरूकता का सैलाब दिख रहा है कि मुस्लिमों पर ट्रंप के हमले का विरोध करने के लिए सभी धर्मों के लोग, सभी नस्लों के लोग खुलकर साथ आए हैं, सड़कों पर हैं, और ट्रंप को अमरीकी उदारता भी याद दिला रहे हैं, और संविधान के प्रावधान भी।
अमरीका में जागरूकता का यह दौर, और लोगों का अपने निजी हितों से परे भी सार्वजनिक जीवन मूल्यों के लिए इस तरह लडऩा एक देखने लायक बात है। हिन्दुस्तान में जहां सरकार से असहमति होने पर लोग अपने-अपने तबके के लिए लड़ते दिखते हैं, और धर्म या जाति ही उन्हें जोड़कर एक करती है, वहां अमरीका में इतने बड़े पैमाने पर लोगों का दूसरों के लिए लडऩा इंसानियत के लिए बड़ी उम्मीद बंधाता है। अमरीका की एक दूसरी बात जो देखने लायक है, वह है ट्रंप की नीतियों से असहमत वहां की सबसे बड़ी-बड़ी कंपनियों के मुखियाओं का खुलकर विरोध में सामने आना। भारत में न तो केन्द्र सरकार, और न ही किसी राज्य सरकार के खिलाफ बोलने का हौसला किसी उद्योगपति या कारोबारी में हो सकता है, या होता है। ऐसे में अमरीका में यह हौसला दिखना यह भी साबित करता है कि वहां कारोबार किस तरह भारत के मुकाबले बहुत अधिक हद तक सरकारी काबू से परे रहते हैं। तीसरी बात जो सोचने की है, वह है अमरीकी मीडिया के तकरीबन तमाम लोगों का ट्रंप के लिए बड़ा ही आलोचक होना। ट्रंप ने मीडिया के साथ एकदम से सींग भिड़ाए हैं, और मीडिया के साथ बदसलूकी के नए रिकॉर्ड कायम किए हैं। ऐसे में वहां का मीडिया ट्रंप के खिलाफ जितना खुलकर लिख रहा है और बोल रहा है, वह भी अमरीका में मीडिया की आजादी का एक अलग सुबूत दिखता है।
ट्रंप अमरीकी राष्ट्रपति भवन में कुछ उसी किस्म के दिख और लग रहे हैं जिस तरह की कांच और चीनी मिट्टी के सामानों की किसी दुकान में फंस गया बिफरा हुआ सांड दिख सकता है। ट्रंप उसी अंदाज में चारों तरफ तबाही कर रहे हैं, दूसरी देशों को कोस रहे हैं, खुद अमरीका के भीतर मनमाने फैसले ले रहे हैं, अपनी सरकार के भीतर भी मानो उनका कोई सलाहकार न हो, और वे अकेले ही ऐसे फैसले ले रहे हैं जिनका अमरीका को नुकसान उनका कार्यकाल खत्म होने के बरसों बाद तक जारी रहेगा। ऐसा लगता है कि ट्रंप न सिर्फ बददिमागी और घमंड से भरे हुए हैं, बल्कि वे बेवकूफी से भी भरे हुए हैं, और अमरीका की तमाम अच्छी परंपराओं को कुचलने की हड़बड़ी में भी हैं। किसी बुरे नेता के लिए ऐसा होना दुनिया के लिए एक बेहतर बात होती है कि उसका घड़ा तेजी से भरना शुरू हो गया है। लेकिन दुनिया में दूसरी जगहों पर जहां पर बुरे नेता इतने बददिमाग, और इतने बेवकूफ नहीं हैं, वे अपने-अपने देश के लिए धीमी रफ्तार से बुरे फैसले लेते हुए देर तक कुर्सी पर काबिज भी रह सकते हैं। फिलहाल डोनल्ड ट्रंप अमरीका को दुनिया का सबसे बड़ा निशाना बनाने का काम भी कर रहे हैं, और अपने देश का इतना बड़ा नुकसान भी कर रहे हैं जो कि आने वाले कई राष्ट्रपति भी सुधार नहीं पाएंगे।
भारत के समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। भारत में तो कौमें पांच बरस के कई कार्यकाल इंतजार कर लेती हैं, लेकिन अमरीकी कौम देखने लायक है जो कि देश को तोड़ रहे निर्वाचित मुखिया के खिलाफ इस तरह मजबूती के साथ सड़कों पर है, और एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा भिड़ाकर खड़ी है।

बजट आ तो गया, पर बेअसर सा लगता है...

संपादकीय
1 फरवरी 2017


मोदी सरकार का बजट नोटबंदी की छाया में दबा रहा। फिर भी अब नोटबंदी तो हकीकत हो ही चुकी है, वह कितनी कड़वी रही, कितनी नुकसानदेह रही, कितने फायदे की रही, यह आने वाले बरस बताएंगे, ऐसा खुद सरकार ने कहा है। लेकिन कुछ बातें जो पूरा बजट पढ़े बिना पहली नजर में भली लगती हैं, वह चर्चा के लायक हैं। यह उम्मीद भी की जा रही थी कि नोटबंदी से मिले जख्मों पर सरकार कुछ मरहम रख सकती है, इसे लेकर जो चर्चाएं थीं, उनमें से कुछ तो पूरी नहीं हो पाईं, और कुछ बातें हुई हैं।
वित्तमंत्री अरूण जेटली के पेश किए हुए 2017 के बजट में ग्रामीण मजदूरी की यूपीए सरकार की सबसे बड़ी योजना, मनरेगा, पर 48 हजार करोड़ रूपए रखे गए हैं, जो कि आज तक की अधिकतम रकम है। पिछले साल इस मद में कुल 37 हजार करोड़ रूपए रखे गए थे। इसके साथ-साथ ग्रामीणों के लिए खेतिहर कर्ज से लेकर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अगले दो बरस में एक करोड़ घर बनाने का इरादा भी गरीबों को फायदा पहुंचाएगा, और यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने में मदद भी करेगा। सरकार ने इसके साथ-साथ इंकम टैक्स देने वाले नौकरीपेशा तबके को भी सबसे कम टैक्स-सीमा में छूट दी गई है, इससे बहुत बड़ी संख्या में लोगों को छोटी ही सही, राहत मिलेगी। लेकिन हर बजट ऐसे थोड़े-बहुत फेरबदल लेकर आता ही है, और हम इसका बहुत अधिक मतलब निकालना नहीं चाहते।
आज के इस बजट और कल आए आर्थिक सर्वेक्षण से देश की जनता को यह उम्मीद थी कि नोटबंदी का तर्क स्थापित किया जाएगा, और उससे तात्कालिक और दीर्घकालीन फायदे गिनाए जाएंगे, लेकिन यह साबित हुआ है कि सरकार के पास ऐसे किसी फायदे का कोई अंदाज नहीं है, बल्कि नोटबंदी की वजह से सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीडीपी) गिरने का अंदाज सरकार को सामने रखना पड़ा है। इसके साथ-साथ नोटबंदी के पीछे जो तर्क है, उसे भी देखने की जरूरत है कि देश की अर्थव्यवस्था से कालाधन खत्म होना, या कि देश के बाहर गया हुआ कालाधन वापिस लाना, उसका कोई रास्ता न आर्थिक सर्वेक्षण में दिखता, और न ही बजट में दिखता। दरअसल उसका कोई रास्ता सरकार के पास है भी नहीं, बल्कि सरकार ने अपने टैक्स विभागों को कालाधन निकालने के लिए जिस तरह से कारोबार की दुनिया के पीछे लगाया है, उससे मंदी में फंसे हुए कारोबार की तकलीफें और बढ़ गई हैं। जो लोग यह नाटकीय उम्मीद कर रहे थे कि सरकार शायद आयकर खत्म करने जैसा कोई काम करे, जैसी कि सलाह सरकार को नोटबंदी सुझाने वाले जनसंगठन से लेकर सरकार के अपने सांसद सुब्रमण्यम स्वामी तक दे रहे थे, उस तरह का कोई क्रांतिकारी फैसला  इस बजट में सामने नहीं आया। यह एक अलग बात है कि हम आयकर खत्म करने जैसे किसी फैसले की न तो वकालत कर रहे हैं, और न ही ऐसे किसी फैसले के नफे-नुकसान का हमें पूरा अंदाज है। लेकिन नोटबंदी जैसे नाटकीय कदम के बाद उसका एक तर्कसंगत अंत इस बजट में दिखाई नहीं पड़ता, और यह सरकार की एक बड़ी नाकामयाबी दिखती है।
मोदी सरकार आज दुनिया में कच्चे तेल के सस्ते होने का बड़ा फायदा उठा रही है, और देश की अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा फायदा इसी बात से हुआ है कि ताजा भारतीय इतिहास की सबसे सस्ती खरीदी हो रही है, और जनता पर सबसे अधिक टैक्स लगाकर पेट्रोल-डीजल दिया जा रहा है। इस फासले से सरकार के पास बहुत बड़ी रकम इकट्ठा हो रही है, और सरकार को अर्थव्यवस्था चलाने में इससे मदद मिल रही है। सरकार का यह भी कहना है कि नोटबंदी की वजह से उसका रिकॉर्ड टैक्स-कलेक्शन हुआ है, और बैंकों के पास इतनी रकम आ गई है कि हर तरह के कर्ज आसानी से मिलेंगे। ऐसी नौबत में इस बजट से परे भी वित्त मंत्री को यह ध्यान रखना पड़ेगा कि बैंक ऐसे कारोबार के लिए कर्ज देकर अपने आपको न डुबाएं जिनसे अब तक का तजुर्बा बहुत खराब रहा है। खरबपतियों से कर्ज नहीं लौटता, और बहुत छोटे-छोटे लोगों की कर्ज की अदायगी बहुत अच्छी है। अभी इस बजट के असर का हमको पूरा अंदाज नहीं है, और आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था के जानकार इस बारे में अधिक तर्क सामने रख सकेंगे। आज तो इस बजट का असर इतना ही दिखेगा कि यह आया या नहीं आया, यह भी अधिकतर लोगों को समझ नहीं आएगा। इस हिसाब से यह बजट एक बेअसर बजट दिखता है, और हो सकता है कि आज देश की अर्थव्यवस्था किसी अधिक दुस्साहस के लायक बची नहीं है।