हरियाणा में बढ़ते सेक्स-जुर्म के पीछे बकवासी नेता जिम्मेदार

संपादकीय
15 मई 2017


हरियाणा में बलात्कार और सामूहिक बलात्कार, दलितों से बलात्कार, और स्कूल-कॉलेज की लड़कियों से छेडख़ानी की खबरें भयानक रफ्तार से आ रही हैं, और भाजपा सरकार के राज में वहां के हाल पिछली कांग्रेस सरकार के हाल से बहुत अधिक खराब दिख रहे हैं। वैसे तो बलात्कार और सेक्स-अपराध हर बार रोके जाने लायक जुर्म नहीं रहते हैं, क्योंकि इनके हो जाने के बाद ही आमतौर पर पुलिस तक बात पहुंचती है, लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी है कि महिलाओं पर होने वाले जुर्म और जुल्म को लेकर सरकार का जो रूख रहता है, उससे भी ऐसे जुर्म के खतरे कम या ज्यादा होना तय होता है। हरियाणा के साथ यह बुरी नौबत पहले दिन से जुड़ी हुई है जब मनोहर लाल खट्टर ने वहां का राज सम्हाला। लोगों को अच्छी तरह याद है, और गूगल पल भर में सैकड़ों नतीजे पेश कर देता है कि किस तरह चुनाव के पहले ही खट्टर ने महिलाओं के बारे में बहुत ही अश्लील, भद्दी, और हिंसक बातें कही थीं। बलात्कार को लेकर खट्टर ने कहा था कि जिन औरतों को रात में बाहर निकलने का शौक है, वे नंगी क्यों नहीं चली जातीं।
अब हरियाणा एक तो पहले से ही महिलाओं के साथ बेइंसाफी वाले प्रदेश के रूप में जाना जाता, और इसका सबसे बड़ा सुबूत वहां आबादी के अनुपात में है, पूरे देश में लड़कियों का सबसे कम अनुपात इसी एक शहर में है। दूसरी तरफ यहां की खाप पंचायतें लगातार लड़कियों और महिलाओं पर तरह-तरह की रोक लगाती आई हैं, और कांग्रेस हो या भाजपा, इनका कभी यह हौसला नहीं रहा कि वे खाप पंचायतों के खिलाफ मुंह भी खोल सकें। नतीजा यह रहा कि जब दंगल जैसी फिल्म के रास्ते हरियाणा की कुछ बहादुर लड़कियां सामने आईं, और इसके पहले उन्होंने ओलंपिक में जाकर हिन्दुस्तान का सिर ऊंचा किया, तो फिर हरियाणा में लड़कियों के हक की चर्चा की सुगबुगाहट शुरू हुई। लेकिन आज भाजपा के राज में हरियाणा का हाल यह है कि वहां स्कूल की बच्चियां स्कूल की पोशाक में अनशन पर बैठी हैं कि उन्हें आते-जाते रास्ते में छेड़ा जाता है। छेडऩे वालों का यह हौसला, और उनकी यह सोच वहां की खाप पंचायतों और वहां के मुख्यमंत्री के मर्दाना बयानों से बढ़ती हैं। दिक्कत यह है कि खट्टर के ऐसे किसी भी बयान पर उनकी पार्टी की कोई नाराजगी सामने नहीं आई, और इससे हरियाणा के लोगों को ऐसा लगा कि लड़कियां और महिलाएं दूसरे दर्जे की नागरिक हैं, और उन पर कभी भी हाथ डाला जा सकता है।
हमने उत्तरप्रदेश में समाजवादी नेता आजम खान के अश्लील बयानों को लेकर भी कहा था कि बलात्कार की शिकार लड़की के खिलाफ ऐसा बयान देने वालों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर कार्रवाई शुरू करनी चाहिए। बाद में कुछ लोगों के अदालत पहुंचने पर अदालत ने आजम खान की बांह मरोड़ी थी, और उनसे बिना शर्त माफी मंगवाई थी। हमारा यह मानना है कि पूरे देश में जहां-जहां किसी भी पार्टी के नेता, या कोई और सार्वजनिक व्यक्ति, जब कभी कोई हिंसक महिला-विरोधी बयान दें, तो उसके खिलाफ महिला आयोगों को, मानवाधिकार आयोगों को तुरंत नोटिस लेना चाहिए, और उन्हें नोटिस देना चाहिए। जब तक बकवासी नेता सजा नहीं पाएंगे, तब तक वे समाज में सेक्स-अपराधियों का हौसला बढ़ाने का काम ही करते रहेंगे। यह सिलसिला चारों तरफ की कोशिशों से रोकने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि किसी भी चुनाव के वक्त किसी भी पार्टी या नेता के ऐसे बयानों की रिकॉर्डिंग या कतरनों को लेकर जनता को जागरूक करना चाहिए कि क्या वे ऐसे लोगों को वोट देना चाहेंगे? अगर ऐसी मुहिम चलने लगी, तो नेताओं की अक्ल ठिकाने आ जाएगी। दिक्कत यह है कि राजनीतिक दलों में से अधिकतर में ऐसे नेता भरे हुए हैं, और इसलिए इस तरह के मुद्दों को कोई पार्टी उठाती नहीं है। चुनाव के वक्त मतदाता-जागरूकता के लिए गैरराजनीतिक संगठनों को अभियान चलाना चाहिए। आज भी कुछ संगठन नेताओं और पार्टियों के खर्च, उनके अपराध को लेकर रिपोर्ट जारी करते हैं। कुछ दूसरे संगठनों को यह जिम्मा लेना चाहिए कि बकवास करने वाले नेताओं की कतरनों को चुनाव के वक्त जनता के सामने रखे, और जनमत को प्रभावित करे।

तीन तलाक का विरोध तो ठीक है लेकिन...

आजकल
15 मई 2017
इन दिनों उत्तरप्रदेश में हिन्दुत्ववादी लोग मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से बचाने पर जुट गए हैं। इन्हीं कोशिशों में एक यह है कि हनुमान मंदिर में मुस्लिम महिलाएं बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ कर रही हैं कि उससे वे तीन तलाक से छुटकारा पा सकेंगी। यह बात सही है कि सीता को रावण की कैद से छुड़ाकर लाने के लिए हनुमान ने बहुत कोशिश की थी। लेकिन जहां तक तीन तलाक से महिला को बचाने की बात है, तो रामकथा के प्रसंग को याद करने की जरूरत है। जब राम ने गर्भवती सीता को घर से निकाल दिया, तो वह एक किस्म से पत्नी का त्याग कर देना ही था, और सीता अकेले ही अपने गर्भ में पल रहे लव-कुश को लिए हुए हमेशा के लिए चली गई थी।
मुझे रामकथा की बहुत अधिक जानकारी नहीं है, लेकिन गर्भवती पत्नी को हमेशा के लिए घर से निकाल देने वाले राम के भक्त हनुमान ने उस वक्त सीता को बचाने के लिए क्या कुछ किया था? उस युग में कुछ न कर पाए हनुमान से आज मुस्लिम महिलाओं को उम्मीद दिलवाई जा रही है, हे राम!
मुस्लिम महिलाओं को इंसानी हक दिलाने की जिद तो अच्छी है क्योंकि इंसानी हक तो हर किसी को मिलने ही चाहिए। लेकिन कई तरह के सवाल उठते हैं कि जिन लोगों के अपने घरों में सिरफुटव्वल चल रहा हो, वे पड़ोसी के घर की बहस में दखल देने क्यों जा रहे हैं? आज हिन्दू या जैन समाज में कन्या भ्रूण हत्या से लेकर दहेज तक की कहानियां आम हैं। हिन्दुओं के बीच अभी तक राज करने वाले हिंसक और हमलावर तबके से यह करते भी नहीं बन पाया है कि दलितों को पैरों तले कुचलने के लिए हिन्दू समाज के भीतर रखा जाए, मंदिरों में उन्हें आने दिया जाए, या कि मार-मारकर बाहर निकाला जाए, उनके पेशे को गंदा कहा जाए, उनके खानपान पर रोक लगाई जाए, उनसे गैरदलितों की शादियों को रोका जाए, और दलित महिलाओं के साथ जितना बन सके उतना बलात्कार किया जाए।
हिन्दू समाज के जो लोग आज मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से आजादी दिलाने के लिए लगे हुए हैं, उनके पास हिन्दू समाज के भीतर के इन सवालों के कोई जवाब नहीं हैं, और न ही इस इम्तिहान में बैठने में उनकी कोई दिलचस्पी है। इसलिए तीन तलाक के मुद्दे पर उनकी मुस्लिम महिला-हिमायत देखकर थोड़ी सी हैरानी भी होती है कि क्या हिन्दुओं ने अपने भीतर के सारे झगड़ों को सुलझा लिया है, और उनके पास बाकी दुनिया को सुधारने के लिए समय ही समय है?
गोमांस खाने न खाने को लेकर आज राष्ट्रीय हिंसा का एक सबसे बड़ा मुद्दा गैरहिन्दुओं पर हमले का नहीं है, यह हिन्दू समाज के एक बहुत ही छोटे हमलावर तबके का बहुसंख्यक हिन्दू आबादी पर हमला है, और खानपान की ऐतिहासिक हकीकत को नकारते हुए आज एक पाखंडी पवित्रता लादने की हिंसक जिद है। इसलिए हिन्दू समाज का जो सत्तारूढ़ तबका मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की हिंसा से आजाद करने का बीड़ा उठाए खड़ा है, वह सत्तारूढ़ तबका अपनी पवित्रतावादी पाखंडी मान्यताओं को दूसरी विचारधाराओं पर, हिन्दू समाज के दूसरे हिस्सों पर, आदिवासियों सरीखे गैरहिन्दुओं पर थोपने पर उतारू है, और उसके लिए मुस्लिम समाज की दकियानूसी मान्यताओं पर हमला अपने हमलावर मिजाज का एक विस्तार ही है, कोई मुस्लिम-कल्याण नीति नहीं है।
वैसे तो समाज सुधार के लिए जो कोई भी आगे आएं, वह एक अच्छी बात रहती है, लेकिन आज सुधार की जरूरत जिन लोगों को सबसे अधिक है, और जिनके भीतर के ताकतवर, बाहुबलि लठैत जिस तरह से कानून की बांह मरोड़ रहे हैं, और बेकसूरों को मार रहे हैं, तो सवाल यह भी उठता है कि सरकार और सत्तारूढ़ लोगों की प्राथमिकता मुस्लिम समाज की दकियानूसी मान्यताओं को खत्म करना होना चाहिए, या कि सत्तारूढ़ समाज के भीतर की ताजा खड़ी की जा रही हिंसा को खत्म करना होना चाहिए। सैद्धांतिक रूप से तो यह कहा जा सकता है कि ये दोनों बातें साथ-साथ चल सकती हैं, लेकिन हमने यह देखा है कि सत्तारूढ़ पाखंड को खत्म करना तो दूर रहा, पाखंडी मुद्दों पर सत्ता के हिंसा को ताजा खड़ा करने की अंतहीन कोशिशें चल रही हैं, और कहीं पर रोमियो का लेबल लगाकर नौजवान भाई-बहनों को पीटा जा रहा है, तो कहीं सिनेमाघर से लौटते पति-पत्नी से शादी का प्रमाणपत्र मांगा जा रहा है। कन्या भ्रूण हत्या पर बात ही नहीं हो रही है, दहेज और दहेज हत्या पर बात ही नहीं हो रही है, आबादी में हिन्दू लड़कियों का अनुपात लगातार गिरने पर बात ही नहीं हो रही है, और जिस गाय को बचाने के लिए इंसानों को मारा जा रहा है, उस गाय के लिए भी घूरे से परे किसी खाने के इंतजाम की बात नहीं हो रही है।
पाखंड से भरा हुआ ऐसा चाल-चलन लोगों की नीयत पर सवाल खड़े करता है कि आज मुस्लिम महिला के हिमायती बने हुए ये लोग अपने ही घरों में भ्रूण हत्या रोकने के लिए क्या कर रहे हैं, लड़कियों को लड़कों के बराबरी के हक दिलाने के लिए क्या कर रहे हैं, दहेज और दहेज हत्या रोकने के लिए क्या कर रहे हैं, विधवाओं की हालत सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं? ये लोग अपने समाज के भीतर अलग-अलग तबकों के खानपान, पहरावे, बोली और रिवाजों की विविधता के सम्मान के लिए क्या कर रहे हैं? ये लोग उत्तर-पूर्व और कश्मीर के लोगों की विविधता और असहमत राजनीतिक विचारधारा के साथ तालमेल बिठाने के लिए क्या कर रहे हैं?
ये वही लोग हैं जिन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मुस्लिम विरोधी नफरत सुलगाने वाले डोनाल्ड ट्रंप की जीत के लिए दिल्ली में हिन्दू-हवन किए थे और आज उस डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिमों से अधिक हिन्दुस्तानी-कामगारों के रोजगार की हत्या की है। इसलिए जब ऐसे लोग एकाएक मुस्लिम समाज की बेइंसाफी के खिलाफ खड़े होते हैं, तो उनकी लाठियों से कहीं अधिक उनकी नीयत को लेकर सवाल खड़े होते हैं। हर लाठी के पीछे दर्जनभर सवाल साफ-साफ खड़े दिखते हैं, और ऐसे में लगता है कि गब्बर सिंह ने अगर रामगढ़ की बसंतियों को आयरन की टेबलेट बांटने की समाजसेवा कर रहा है, तो पहले वह अपनी और सांभा-कालिया की बाकी हरकतों पर जवाब तो दे दे। महिलाओं को आयरन की टेबलेट की जरूरत तो रहती है, लेकिन रामगढ़ के लोगों को गब्बर की बाकी हिंसा से आजादी की जरूरत भी तो रहती है। और आज तो पूरे देश में बहुसंख्यक हिन्दू और गैरहिन्दू तबकों पर, एक अल्पसंख्यक-हिन्दू तबके की लगातार बढ़ती हिंसा की जवाबदेही कोई नहीं उठा रहा है, हर किसी के पास महज चुप्पी है।

अगर योगी के ऐसे महंगे अंदाज हैं तो बाकी से फिर क्या उम्मीद?

संपादकीय
14 मई 2017


उत्तरप्रदेश में एक योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसा लगा था कि सरकार के कामकाज में कुछ सादगी भी आ सकती है। अपने शुरुआती हफ्तों में योगी आदित्यनाथ ने कुछ ऐसे फैसले लिए भी, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फैसले के पहले ही राज्य सरकार की गाडिय़ों से लालबत्तियां हटवा दी थीं। इसके अलावा उन्होंने छुट्टियां घटा दीं, काम के घंटे तय करने को कहा, और सरकारी दफ्तरों में गंदगी के खिलाफ मुहिम छेड़ी। लेकिन दूसरी तरफ अपनी पार्टी से परे के उनके अपने निजी, और घोर साम्प्रदायिक संगठन, हिन्दूवाहिनी, द्वारा उत्तरप्रदेश में कानून हाथ में लेकर हमला करना जारी रहा, और योगी के ऐसे भाषणों का कोई मतलब नहीं रहा कि उनकी सरकार सभी धर्मों को बराबर मानकर चलेगी। उनके खुद के इस आक्रामक और हिंसक संगठन ने एक किस्म से स्थानीय स्तर पर सरकार अपने हाथ में ले ली, और अफसरों से, खासकर पुलिस से, बदसलूकी में भाजपा के नेता भी शामिल रहे, और योगी की हिन्दूवाहिनी के लोग भी।
अब एक नई खबर सामने आई कि कश्मीर के मोर्चे पर तैनात सेना के एक जवान के शहीद होने के बाद जब योगी उसके घर मिलने गए, तो एक दिन पहले से अफसरों ने इस मामूली घर में जुगाड़ लगाकर, बांस-बल्ली से टांगकर एसी लगवा दिया, और घर के भीतर सोफा और कालीन सजा दिया। अगले दिन योगी आकर गए, और आधे घंटे बाद सारा सामान हटा दिया गया और एसी भी निकाल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि अगर एक योगी के भी मुख्यमंत्री बनने पर सादगी नहीं आ सकती, तो कब आएगी? बहुत से नेता सत्ता पर आते ही ऐसा बर्ताव करने लगते हैं कि उनके पुरखे मानो बादशाह रहे हों। और यह बात सही है कि सत्ता से हटने तक ये तमाम नेता अपनी बादशाहत बनाए रखने के लिए कालेधन का अंबार जुटा लेते हैं। इस तरह सत्ता का मतलब सत्तासुख और सुखी भविष्य दोनों ही हो जाता है।
यह सिलसिला लोकतंत्र को खोखला करते चलता है, और जनता की लोकतंत्र पर आस्था को खाते चलता है। जिस देश में गरीबों को महीनों तक सरकारी योजनाओं की मजदूरी नहीं मिल पाती है, जहां पर कुछ सौ रूपए की वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए बुजुर्गों को दर्जनों मील चलकर पहुंचना पड़ता है, और खाली हाथ लौटना पड़ता है, वहां पर अगर कुछ मिनटों के लिए भी मुख्यमंत्री बिना कालीन और बिना एसी न बैठ सकें, तो यह लोकतंत्र की शिकस्त है, भाजपा की शिकस्त है, और योगी-जीवन को लेकर जितने किस्म की जनधारणाएं हैं, उनकी भी शिकस्त है। यही काम अगर उत्तरप्रदेश के दलित परिवारों में खाने या सोने वाले राहुल गांधी के लिए किया गया होता, तो नेहरू-गांधी परिवार का राजकुमार कहकर उनका मखौल हफ्तों चला होता।
हमारा ख्याल है कि पूरे देश में अदालती दखल से सरकारी फिजूलखर्ची, और ऐशोआराम को खत्म करना चाहिए। सरकार हांकने वाले लोग खुद तो ऐसा नहीं करेंगे, लेकिन हो सकता है कि अदालत में कोई ऐसे फक्कड़ जज बैठे हों जो कि किफायत के लिए हुक्म दे सकें, न सिर्फ सरकार में बैठे लोगों के लिए, बल्कि खुद अदालत में बैठे बड़े जजों के लिए भी। देश भर में जनता के पैसों पर जिस किसी को सहूलियत देने का इंतजाम रहता है, वे लोग ऐशोआराम जुटाने में जुट जाते हैं। धीरे-धीरे एक-एक करके सभी पार्टियों का जब यह हाल हो जाता है, तो फिर लोगों की शर्म भी खत्म हो जाती है। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल जैसे राज्य को एक मिसाल की तरह देखना चाहिए जहां दशकों के वामपंथी राज के बाद भी जिस तरह की सादगी और किफायत की परंपरा जारी रही, उसका एक नैतिक दबाव था कि उन्हें हराकर सत्ता में आने वाली ममता बैनर्जी के सामने भी सादगी और किफायत की एक बेबसी थी, और उन्हें अपनी सरकार को इस रास्ते पर ही चलाना पड़ा। हो सकता है कि वे खुद होकर भी ऐसा करतीं, लेकिन अगर वो ऐसा करना न भी चाहतीं, तो भी वामपंथी मिसाल के सामने जनता उनकी फिजूलखर्ची को खारिज कर देती। आज हाल यह है कि बाकी प्रदेशों में सत्ता तो सत्ता, विपक्ष में बैठे हुए लोग भी जनता के पैसों पर हर किस्म की फिजूलखर्ची जारी रखते हैं, और जनता यह देख-देखकर राजनीति के लिए ऐसी हिकारत मन में पाल लेती है कि वह लोकतंत्र से हिकारत में बदल जाती है।

उत्साही समाजसेवियों को सरकारी बढ़ावा भी मिले

संपादकीय
13 मई 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज मुख्यमंत्री ने एम्स के पास मरीजों के रिश्तेदारों के ठहरने के लिए बनाई जा रही एक धर्मशाला का भूमिपूजन किया है। इसे एक निजी ट्रस्ट बना रहा है, और यह ट्रस्ट पहले से प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल, रायपुर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के पास बरसों से यह काम कर रहा है। बहुत ही रियायती दाम पर गरीब मरीजों के साथ आए लोगों के रहने और खाने-पीने का एक बहुत अच्छा और साफ-सुथरा इंतजाम संभव हो सकता है, यह इन बरसों में देखने मिला है, और इसके साबित होने के बाद राज्य सरकार ने वहीं पर बनी एक दूसरी सरकारी धर्मशाला भी इसी ट्रस्ट को चलाने के लिए दे दी है। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि मेकाहारा के पास की यह पहली धर्मशाला भी सब्जी बेचकर कमाने वाली बिन्नी बाई नाम की एक महिला ने अपने लाखों रूपए देकर बनवाई थी, और अब यह दूसरा ट्रस्ट अपनी बनाई धर्मशाला के साथ इसे भी चला रहा है।
ऐसी कुछ मिसालें यह साबित करती हैं कि अगर समाज में उत्साही लोग रहें, और उनकी साख की विश्वसनीयता रहे, तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। इसके लिए अपने पैसे भी खर्च करने होते हैं, और दूसरे लोग भी साथ जुट जाते हैं। और यह बात कोई अकेले छत्तीसगढ़ में ही नहीं है, देश भर में जगह-जगह समाजसेवा की ऐसी मिसालें सामने आती हैं, और बहुत से लोग दूसरों को देखकर, उनसे सीखकर भी ऐसा काम करते हैं। इस बात की तारीफ में हम इसलिए लिख रहे हैं कि पूरे प्रदेश में जहां-जहां अस्पताल हैं, वहां-वहां मरीजों के साथ आकर सैकड़ों लोगों को रहना पड़ता है, और उनके लिए कोई इंतजाम नहीं हो पाता। गरीब रिश्तेदार तो अस्पताल के बरामदों में या किसी पेड़ के नीचे भी सो जाते हैं, लेकिन उनके नहाने-खाने का कोई इंतजाम नहीं रहता। उनकी इतनी क्षमता भी नहीं रहती कि वे खर्च करके यह काम कर सके। इसलिए अगर कोई ट्रस्ट ऐसा काम कर रहा है, तो उससे दूसरे शहरों के दूसरे लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए, और सरकार को भी उनका हौसला बढ़ाना चाहिए।
रायपुर में ही एक दूसरी ऐसी मिसाल एक चिकित्सा जांच केन्द्र की है जिसे एक व्यापारी परिवार ने अपने पैसों से बनवाया है, और वहां पर रोजाना सैकड़ों लोगों की रियायती जांच होती है। वैसे तो सरकार को यह सामाजिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए, लेकिन भारत में सरकारी ढांचा जितने भ्रष्टाचार और लापरवाही का शिकार रहता है, उसके चलते सरकार ऐसी इमारत चाहे बना दे, उसे सरकारी कर्मचारियों के भरोसे चलाया नहीं जा सकता। इसके लिए बहुत ही समर्पित समाजसेवी रहना जरूरी है, और जहां-जहां ऐसे लोग सामने आते हैं, सरकार को जमीन से लेकर दूसरे किस्म के अनुदान तक का इंतजाम करना चाहिए, ताकि गरीबों की सेवा हो सके, उन्हें सहूलियत मिल सके। इससे परे भी बहुत से ऐसे दायरे हैं जिनमें समाज की सबसे जरूरतमंद लोगों के लिए बाकी सक्षम समाज कुछ कर सकता है, और इसी छत्तीसगढ़ में बढ़ते कदम नाम की एक संस्था ने मृत्युकर्म से जुड़े हुए बहुत से कामों के लिए अपनी मुफ्त की सेवा देना शुरू किया, और उसे लगातार बढ़ाया है। दूसरी तरफ इसी संस्था ने रक्तदान-नेत्रदान से लेकर शरीरदान तक की प्रेरणा देने, और करवाने का रिकॉर्ड भी बनाया है। इसी तरह कुछ संस्थाएं स्कूली बच्चों की पुरानी किताबों को इकट्ठा करके उन्हें दूसरे जरूरतमंद बच्चों को देने का काम कर रही हैं। समाज और सरकार को ऐसी कोशिशों का हौसला बढ़ाना चाहिए।

ईवीएम पर आयोग की चुनौती बरसों देर से सामने आई...

संपादकीय
12 मई 2017


चुनाव आयोग ने आज राजनीतिक दलों की बैठक बुलाकर यह चुनौती दी है कि वे ईवीएम के साथ छेडख़ानी करके दिखाएं। पिछले दिनों पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में निराश और हक्का-बक्का आम आदमी पार्टी ने सबसे जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया था, और बाद में उत्तरप्रदेश चुनाव में मटियामेट हो गईं मायावती ने भी यही राग अलापा था कि उन्हें ईवीएम ने हराया है। अब उस वक्त भी हमने यह लिखा था कि जो भाजपा उत्तरप्रदेश में सपा की सरकार रहते हुए इतने बड़े पैमाने पर ईवीएम धांधली कर सकती थी, तो उसने पंजाब को अपने हाथ से क्यों जाने दिया, और गोवा-मणिपुर में कुछ सीटों से अपना बहुमत क्यों खोया? उत्तरप्रदेश में तो चुनाव करवाने वाले कर्मचारी-अधिकारी लंबे समय से सपा सरकार के तहत काम कर रहे थे, लेकिन पंजाब और गोवा में तो सरकार में भाजपा थी, और कर्मचारी उसके मातहत थे जहां ईवीएम के साथ अगर कोई छेडख़ानी हो सकती थी, तो वह भाजपा के लिए आसान थी। इसलिए ईवीएम की हैकिंग अगर तकनीकी रूप से संभव भी है, तो भी अपनी वजहों से हार को मशीन पर थोपना राजनीतिक दलों के लिए आत्मघाती था, क्योंकि इससे वे खुद ही अंधेरे में जीते हैं।
चुनाव आयोग ने आज यह काम सही किया है कि राजनीतिक दलों को ईवीएम-हैकिंग की चुनौती दी है। दुनिया में बड़ी से बड़ी कंपनियों के फोन-कम्प्यूटर हैक हो जाते हैं, और इसके लिए ये कंपनियां खुद भी हैकर्स को तनख्वाह पर रखती हैं, और बाहर के लोगों को हैकिंग करके दिखाने पर ईनाम भी देती हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी रहता है कि ऐसी कमजोरियां सामने आने पर कंपनियां अपनी मशीनों को, या कि उनके सॉफ्टवेयर को मजबूत बना पाती हैं। भारत का चुनाव आयोग दुनिया के कई देशों में चुनाव करवाने में प्रत्यक्ष या परोक्ष मदद करता है, और भारतीय चुनाव आयोग की साख बड़ी ऊंची मानी जाती है। ऐसे में अपनी मशीनों को लेकर उसके मन में यह भरोसा रहना चाहिए था कि उन्हें कोई हैक नहीं कर सकते। विपक्ष में रहने वाले दल बरसों से ईवीएम पर शक जाहिर करते आए हैं, और आज भाजपा के एक सांसद ने तो ईवीएम के खिलाफ कुछ बरस पहले एक पूरी किताब ही लिखी थी जो कि बाजार में भी है। आज भाजपा के विरोधी शक जाहिर कर रहे हैं, और ऐसे में चुनाव आयोग को बहुत पहले से यह चुनौती पार्टियों के सामने रख देनी थी। कई बार मुजरिमों से भी पुलिस को सीखने मिलता है, नकली चाबी से ताले खोलने वालों के तजुर्बे से ताला बनाने वाली कंपनियां बहुत कुछ सीख पाती हैं।
इस पूरे सिलसिले में एक ही बात हमारी समझ में नहीं आई है कि भारत जैसे आईटी-दिमागों से संपन्न इस देश में चुनाव आयोग ने पहले ही अपनी मशीनों को राजनीतिक दलों और जानकारों के सामने क्यों नहीं रख दिया था? ऐसा करके या तो आयोग की मशीनों की कमजोरी और खामी सामने आती, या फिर जनता के बीच गलतफहमी फैलाने की राजनीतिक कोशिशें थमतीं। आयोग की यह पहल बहुत देर से आई है, और देश की साखदार संस्थाओं को जनता के बीच भरोसा बनाए रखने के लिए समय रहते काम करना चाहिए। जब अपने आपको चुनाव विशेषज्ञ कहने वाले एक व्यक्ति ने ईवीएम की अविश्वसनीयता पर पूरी किताब लिख मारी थी, तभी अगर उसके दावे चुनाव आयोग झूठे साबित कर देता, तो आज वह आदमी भाजपा का सांसद नहीं बना होता। ईवीएम पर शक और तोहमत लगाकर, उस सीढ़ी पर चढ़कर एक शक्की तो संसद पहुंच गया, और चुनाव आयोग उसके बाद भी बरसों बैठे रहा। लोकतंत्र में जनधारणा का ख्याल रखना भी जरूरी रहता है, और हम उम्मीद करते हैं कि चुनाव आयोग की चुनौती से जो भी साबित हो, किसी न किसी की साख जरूर बढ़ेगी, ईवीएम और चुनाव आयोग की बढ़ेगी, या मशीनों को अविश्वसनीय बताने वाले नेताओं की बढ़ेगी। लोकतंत्र और जनता इन दोनों ही हालात में जीतेंगे।

कश्मीर के हालात खतरनाक, पर टापू जैसा जीतना असंभव

संपादकीय
11 मई 2017


कश्मीर में कल जिस तरह वहां के एक नौजवान की प्रताडऩा के बाद की लाश सामने आई है, वह दिल दहलाने वाली बात है। बाईस बरस का यह कश्मीरी फौज में भर्ती हुआ था, और पहली बार अपने गांव गया था, जहां आतंकियों ने उसका अपहरण किया, और फिर बहुत बुरी यातना के बाद उसकी लाश को फेंक दिया। पहले से तनाव में चल रहे, बहुत बुरी तरह हिंसा और अलगाव झेल रहे कश्मीर में यह मौत तनाव को किस तरफ मोड़ेगी यह तो साफ नहीं है लेकिन इसने वहां के लोगों को भी हिलाकर रख दिया है।
कश्मीर में जनता का एक हिस्सा अलगाववादियों के साथ है, और उन्हें बाकी हिन्दुस्तान के लोग चाहे राष्ट्रविरोधी कहें, वे अपनी जगह इस तर्कसंगत बात को दोहराते हैं कि जब कश्मीर का भारत में विलय हुआ था, तब यह साफ था कि वहां की जनता जनमत संग्रह करेगी और भारत या पाकिस्तान में रहने की अपनी पसंद से अपना भविष्य तय करेगी। लेकिन जनमत संग्रह के साथ कुछ और शर्तें भी जुड़ी हुई थीं, जिनमें पाक कब्जे वाले कश्मीर से फौजों का हटना भी था, और वह शर्त पूरी न होने की बात कहते हुए भारत ने जनमत संग्रह की संभावना को खारिज ही कर दिया था। नतीजा यह हुआ कि अब धीरे-धीरे भारत जनमत संग्रह का कोई भविष्य नहीं देखता और वह कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग मानते हुए ही आगे किसी बातचीत के लिए तैयार होता है, चाहे वह पाकिस्तान से हो, चाहे वह कश्मीर के अलगाववादियों से हो।
कश्मीर में लगातार फौज की मौजूदगी से हालात ऐसे बने हैं कि फौज पर तरह-तरह की हिंसा के आरोप लगते हैं, और जब वहां के स्थानीय नौजवान पुलिस और सेना पर, केन्द्रीय सुरक्षा बलों पर पथराव करते हैं, तो जवाबी पुलिस कार्रवाई की वजह से कश्मीरियों को आए जख्म हालात को और बिगाड़ते हैं। सुरक्षा बलों की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है, और अदालतों को यह समझ नहीं आ रहा है कि जब तक पथराव चलते रहेगा, तब तक कैसे सुरक्षा बलों से यह कहा जाए कि वे छर्रे वाली बंदूकें इस्तेमाल न करें। दूसरी तरफ कश्मीर के मुद्दे को, उसकी जटिलता को, समझने वाले लोगों का यह कहना है कि कश्मीर की समस्या को एक टापू की तरह नहीं सुलझाया जा सकता, और बाकी देश में जब लगातार माहौल मुस्लिमों के खिलाफ बना रहे, जब देश में जगह-जगह कश्मीरियों पर कुछ हमले भी हों, तब कश्मीरी नौजवानों की नाराजगी को खत्म कर पाना आसान नहीं है। यह एक और बात है कि बार-बार ऐसे सुबूत सामने आते हैं कि पत्थरबाजों को अलगाववादी ताकतें, या कि आतंकी ताकतें, भाड़े पर लेती हैं, और पथराव करना सैकड़ों नौजवानों का पेशा सा हो गया है, तो यह समझ पड़ता है कि कश्मीर में राजनीतिक पहल की जरूरत है, और महज बंदूकों से बात बनने वाली नहीं है। बंदूकें तो कश्मीर में आधी सदी से तैनात हैं लेकिन बात किसी किनारे पहुंच नहीं रही है।
कश्मीर में आज राज्य सरकार भाजपा के साथ गठबंधन वाली है, यह पहला मौका है जब भाजपा जम्मू-कश्मीर सरकार में सत्ता में भागीदार है, और यह भी एक अनोखा मौका है कि वह केन्द्र सरकार में भी इसी वक्त गठबंधन की मुखिया है, और सरकार पर उसका लगभग एकाधिकार है। जहां तक कश्मीर का सवाल है, तो राज्य के भीतर तो भाजपा ने दशकों से चले आ रहे अपने खुद के सभी विवादास्पद मुद्दों को ताक पर धर दिया है, और गठबंधन में छोटे भागीदार की तरह काम कर रही है। लेकिन ऐसा लगता है कि इतना काफी नहीं है, और कश्मीर के हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बाकी देश के हालात सुधारने की जरूरत है, क्योंकि आज अगर देश में यह माहौल बन रहा है कि हिन्दुओं के भीतर ही एक अल्पसंख्यक तबके के सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों के मुताबिक देश की बाकी पूरी आबादी को रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो इस तरह का साम्प्रदायिक तनाव बाकी देश के साथ-साथ कश्मीर को भी प्रभावित कर रहा है, और मोदी सरकार, भाजपा, इनकी जैसी साख की जरूरत कश्मीर में है, वैसी साख बन नहीं रही है। बाकी देश में अलग दिक्कत चल रही है, लेकिन खास कश्मीर के सिलसिले में यह कहना जरूरी है कि उसे एक टापू की तरह नहीं जीता जा सकता, बाकी देश के साथ मिलाकर ही देखना होगा।

भारत में केन्द्र और राज्य स्तर पर नई संवैधानिक जांच एजेंसी बनें

संपादकीय
10 मई 2017


अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वहां की संघीय जांच एजेंसी, एफबीआई के डायरेक्टर को बर्खास्त कर दिया है। इसे लेकर अमरीका में भारी बहस शुरू हो गई है क्योंकि इसी डायरेक्टर की निगरानी में अमरीकी चुनाव के दौरान ट्रंप के सहयोगियों और रूस की सरकार के बीच के ऐसे तालमेल की जांच चल रही है जो कि राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने वाली कही जा रही है। वहां पर यह संवैधानिक मुद्दा उठ खड़ा हुआ है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का परिवार, उनकी कंपनियां, उनके सहयोगी जिस तरह की जांच में घिरे हुए हैं, उस जांच के बीच जांच के सबसे बड़े अफसर को इस तरह से बर्खास्त करना राष्ट्रपति के अधिकारों, और राष्ट्रपति पर चल रही जांच के बीच सीधे-सीधे टकराव का मामला है। अमरीकी मीडिया कल से इस मुद्दे पर उबला हुआ है, और यह मामला अमरीकी से परे भी हितों के टकराव का ऐसा सवाल खड़ा करता है जिसे दुनिया के बाकी हिस्सों में भी सोचा-विचारा जा सकता है।
भारत में राजनीतिक ताकतों से जुड़े मामलों की जांच उन्हीं नेताओं के मातहत काम करने वाली एजेंसियां करती हैं जिनके अफसरों का भविष्य इन्हीं नेताओं के हाथ रहता है। नतीजा यह होता है कि सत्ता के काबू से परे की कोई जांच एजेंसी रहती नहीं है, और इसमें काम कर रहे लोग सीधे-सीधे सरकार के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और अपने आगे के सरकारी करियर के लिए सरकार चला रहे नेताओं का मुंह तकते हैं। ऐसे में देश में लोकपाल या लोकायुक्त जैसी संवैधानिक संस्थाओं का मुद्दा उठता है कि सरकार से परे की ऐसी जांच एजेंसियों को कमजोर बनाकर क्यों रखा जाता है। अभी कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की सारी दलीलों को खारिज करते हुए यह हुक्म दिया है कि लोकपाल के मौजूदा कानून के तहत ही तुरंत लोकपाल की नियुक्ति की जाए। मोदी सरकार के तीन बरस पूरे होने को आ रहे हैं, और अब तक लोकपाल न बनाने के लिए लोकपाल-कानून में ही फेरबदल की चर्चा जारी है। इसी देर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने अभी साफ-साफ आदेश दिया है।
केन्द्र से परे राज्यों में भी भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियां सरकार के मातहत काम करती हैं, और इसे लेकर उन पर गंभीर आरोप भी लगते हैं। हमारा ख्याल है कि राजनीतिक जीवन में पारदर्शिता और शुचिता के लिए यह जरूरी है कि जिस तरह लोकसेवा आयोग के संवैधानिक पद पर नियुक्ति के बाद लोग किसी भी तरह का सरकारी पद नहीं ले सकते, उसी तरह की एक जांच एजेंसी होनी चाहिए, जिसमें जाने के बाद लोग सरकार में न लौट सकें, न ही कोई सरकारी मनोनयन पा सकें। भारत के संघीय ढांचे में यह भी जरूरी है कि राज्यों के भीतर भी ऐसी नियुक्तियां राज्य के अफसरों से परे, देश के दूसरे हिस्सों से आए हुए जांच अफसरों में से हो, ताकि वे स्थानीय शासन के प्रभाव और दबाव से मुक्त रहें। यह बात सत्ता पर बैठे लोगों को नहीं सुहाएगी, लेकिन अगर भारत में जांच और मुकदमों को सत्ता के दबाव से परे रखना है, तो देश में एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था बनानी जरूरी है जैसी कि चुनाव आयोग, या लोकसेवा आयोग की है, जहां पर पहुंचने के बाद लोगों का सरकार से उपकार लेने-देने का सिलसिला खत्म हो जाए। फिर दूसरी बात यह कि ऐसी तमाम नियुक्तियां अपने राज्य से परे ही होनी चाहिए, और इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर अच्छे अफसरों का एक पूल बनाया जा सकता है, और राज्यों को अफसरों का बंटवारा किया जा सकता है।
आज भारत में जांच और मुकदमे पर किसी को कोई भरोसा नहीं रहता है, जो लोग सत्ता पर बैठे हैं, वे किसी भी किस्म की कार्रवाई से बहुत दूर तक बचते चलते हैं, और उनको सजा मिलने की गुंजाइश लगातार कमजोर की जाती है। भारत के संविधान विशेषज्ञों को एक ऐसी नई व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जो कि केन्द्र और राज्य सरकार के असर से परे की हो, और जिसमें देश भर के अधिकारियों और कर्मचारियों को लाकर सत्ता के भ्रष्टाचार और सत्ता के जुर्म की जांच में ईमानदारी की संभावना पैदा की जा सके। यह एक बिल्कुल नई और मौलिक सोच होगी, लेकिन यह बहुत मुश्किल बात भी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट अपना घर सुधारने की पहल करे

संपादकीय
09 मई 2017


कोलकाता हाईकोर्ट के एक दलित जज का सुप्रीम कोर्ट के साथ महीनों से चलते आ रहा टकराव आज एक अभूतपूर्व नौबत लेकर आया, और सुप्रीम कोर्ट ने इस जज को अपनी अवमानना का दोषी ठहराते हुए 6 महीने की कैद सुनाई है। हाईकोर्ट जज ने लगातार सुप्रीम कोर्ट जजों पर यह तोहमत लगाना जारी रखा था कि उनके साथ दलित होने की वजह से प्रताडऩा की जा रही है। उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधिकार क्षेत्र को लेकर एक बड़ा टकराव खड़ा किया था और घर बैठे उन्होंने अपने को अदालत मानते हुए सुप्रीम कोर्ट जजों को सजा सुना दी थी, और पुलिस को हुक्म दिया था कि इन जजों को जेल भेजा जाए।
दरअसल, भारत की न्याय व्यवस्था में यह एक बुनियादी खामी है कि सुप्रीम कोर्ट के हाथ हाईकोर्ट का प्रशासन नहीं रहता, और हाईकोर्ट के अदालती फैसलों पर तो सुप्रीम कोर्ट फैसला दे सकता है, लेकिन प्रशासनिक मामलों में उसका हाईकोर्ट पर काबू नहीं रहता। इसी तरह, खुद सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में प्रशासनिक रूप से बेकाबू सा रहता है, और सरकार के पास अदालत की मनमानी पर कार्रवाई करने के लिए कोई अधिकार नहीं रहते। किसी जज को हटाना हो तो उसके लिए संसद में बड़ी संख्या में सांसदों की तरफ से प्रस्ताव लाना पड़ता है, और उसके बाद भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह काम इतना मुश्किल रहता है कि देश के इतिहास में ऐसे गिने-चुने ही मौके आए हैं, जबकि जजों के बारे में कई बार ऐसी चर्चा आती है कि उनमें बहुत से जज भ्रष्ट रहते हैं, जिनपर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है।
संसद, सरकार, और अदालत, भारतीय लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों का  एक-दूसरे पर नियंत्रण बनाया तो गया है, लेकिन इन तीनों के बीच अदालतों का अधिकार क्षेत्र मनमानी का खतरा लिए हुए दिखता है। हमारे पास इसका कोई आसान इलाज नहीं है क्योंकि ऐसी किसी भी दिक्कत के चलते हुए हड़बड़ी में जब कोई इलाज ढूंढा जाता है तो उसका साईड रिएक्शन अधिक खतरनाक हो सकता है। लेकिन यह बात तय है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बीच एक बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था कायम करना जरूरी है क्योंकि जजों के भ्रष्ट होने पर भी उनके ऊपर कोई कार्रवाई होते हम नहीं देखते हैं। लोगों को याद होगा कि भूतपूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और उनके चर्चित वकील बेटे प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट जजों पर यह खुला आरोप लगाया था कि उनमें से आधा दर्जन से अधिक भ्रष्ट हैं, उनके ऊपर सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का मुकदमा भी शुरू किया था, लेकिन साहसी पिता-पुत्र ने कोई माफी मांगने से इंकार कर दिया था, और भ्रष्टाचार की जांच भी नहीं करवाई गई।
हमारा यह मानना है कि अदालतों को अपनी अवमानना से अधिक फिक्र इस बात की करनी चाहिए कि उन पर लगने वाले आरोपों की जांच हो रही है या नहीं। जजों के हाथ में लोगों की जिंदगी के ऐसे मायने रखने वाले पहलू रहते हैं कि उन्हें संदेह से परे जीना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को खुद ही जजों पर लगने वाले भ्रष्टाचार या दूसरे किस्म के आरोपों की जांच के लिए अदालत से बाहर की एक प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए। अदालत के भीतर कोई जांच निष्पक्ष और ईमानदार नहीं हो सकती।

केजरीवाल का राजनीतिक अंदाज आज उन पर भारी

संपादकीय
08 मई 2017


दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार से हटाए गए एक मंत्री ने अगले ही दिन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर तगड़ा हमला किया और कहा कि उसने मुख्यमंत्री को 2 करोड़ रुपये नगद वसूली करते अपनी आंखों से देखा है। इसके बाद आज इस मंत्री ने भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो जाकर केजरीवाल सरकार के भ्रष्टाचार के कुछ मामले दिए। इसे लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है कि जब महीनों पहले इस मंत्री ने अपने मुख्यमंत्री को ऐसी गैरकानूनी उगाही करते देखा तो उसी वक्त इसकी शिकायत क्यों नहीं की? और अब शिकायत की तब सूझी जब उसे बर्खाश्त कर दिया गया है। इस मौके पर सब लोग अपने-अपने हाथ धो रहे हैं, और भाजपा के विरोधियों ने यह ढूंढ कर निकाला है कि इस मंत्री,कपिल मिश्रा, की मां भाजपा की एक नेता थीं, और वे भाजपा से चुनाव लड़कर जीती भी थीं। दूसरी तरफ, केजरीवाल से अब अलग हो चुके बहुत से लोग यह याद दिला रहे हैं कि केजरीवाल की तो पूरी की पूरी राजनीति ही ऐसे आरोपों को लेकर चलती आई है और वे बिना किसी बुनियाद के लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का काम करते रहे हैं। यह बात सही भी है कि केजरीवाल का अंदाज पत्थर उछालकर भाग लेने जैसा रहा है, और वे इसी आदत के चलते अदालतों में मानहानि के मुकदमे भी झेल रहे हैं।
सार्वजनिक जीवन में आरोपों को लेकर दो बातें साफ रहनी चाहिए, पहली तो यह कि जब तक सबूत न हो तब तक सारे आरोप संदेह की तरह ही सामने रखने चाहिए, और फिर अगर किसी ने संदेह न जताकर सीधे आरोप लगाए, तो फिर उस आरोप को साबित करने की जिम्मेदारी भी उसी पर आनी चाहिए। अरूण जेटली पर लगाए गए ऐसे ही आरोपों को लेकर केजरीवाल अदालती कटघरे में है, और साबित कुछ नहीं कर पा रहे हैं। लोकतंत्र में किसी की इज्जत को उछालना एक बड़ा आसान काम होता है, लेकिन हमारा मानना है कि ऐसा करने वाले नेता, या करने वाला मीडिया कानून के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और उन्हें मुकदमे का सामना करने के लिए तैयार भी रहना चाहिए। केजरीवाल सरकार के अनगिनत मंत्री और विधायक एक-एक करके कई तरह के मामलों में फंस गए हैं, और ये मामले आर्थिक भ्रष्टाचार से परे के भी हैं। केजरीवाल की दिक्कत यह है कि उन्होंने अपने साथियों सहित राजनीति में ईमानदारी के पैमाने इतने ऊंचे कर दिए थे कि अब उनपर खरा उतर पाना उनके खुद के लिए भी मुश्किल हो रहा है।
हम किसी भी जांच को महज इसलिए टालने के खिलाफ है कि उसे लेकर सरकार पर राजनीति करने और विरोधियों को फंसाने के आरोप लग सकते हैं। ऐसे में तो देश की सारी पार्टियों, और सारे नेता मिलकर संगठित भ्रष्टाचार की गिरोहबंदी करने लगेंगे कि कोई किसी को फंसने न दे। लोकतंत्र में जो लोग ऊंची कुर्सियों पर बैठे हैं, उन्हें सबसे पहले उच्च स्तरीय जांच के लिए तैयार भी होना चाहिए। केजरीवाल की पूरी राजनीति भ्रष्टाचार के आरोपों को लगाने से शुरू हुई थी, और उस समय से उनकी कही हुई बातों को निकालकर उन्हें आज उस पर अमल करने को कहना चाहिए। 

पाकिस्तानी मरीजों को इलाज के लिए हिंदुस्तानी वीजा नहीं!

संपादकीय
07 मई 2017


पाकिस्तान ने भारत सरकार से इस बात को लेकर विरोध दर्ज कराया है कि वहां से हिन्दुस्तान आने वाले मरीजों को भारत में इलाज के लिए वीजा देना बंद कर दिया है। भारत की आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के चलते आस-पड़ोस के सभी देशों से बड़ी संख्या में मरीज आते हैं, और छत्तीसगढ़ की राजधानी में भी एक समाजसेवी अस्पताल में कई देशों के मरीजों का, बच्चों का ऑपरेशन हो रहा है। लेकिन पाकिस्तान के इस विरोध के साथ इस बात को जोड़कर देखना होगा कि सरहद पर किस तरह का तनाव चल रहा है, और इस तनाव की वजह से खेल, सिनेमा, टीवी, साहित्य समेत इलाज जैसी गैरफौजी बातों पर भी असर पड़ रहा है।
दोनों देशों में फौजी लोगों, और फौज को लेकर युद्धोन्माद से भरे हुए लोग सरहद के तनाव को बढ़ाते चलने में लगे रहते हैं। दूसरी तरफ अनगिनत लोग ऐसे हैं जिनके एक-दूसरे देश में रिश्तेदार हैं, तीर्थ हैं, और दिलचस्पी है, लेकिन इन लोगों का आना-जाना इस पर टिका रहता है कि कब दोनों देशों के बीच तनाव कितना है। पाकिस्तान में जाहिर तौर पर इलाज की वैसी सहूलियतें नहीं है जैसी कि हिन्दुस्तान में हैं, और इसीलिए वहां से लोग गंभीर बीमारियों के इलाज और ऑपरेशन के लिए भारत आते हैं। यहां पर हम भारत सरकार को यह सुझाव देना चाहेंगे कि सरहद पर चाहे कितना ही तनाव क्यों न हो, मरीजों पर किसी तरह की रोक नहीं लगानी चाहिए। जो लोग इलाज के लिए दूसरे महंगे देशों में नहीं जा पाते, वे ही लोग भारत आते हैं। और एक बड़ा देश, एक विकसित देश होने के नाते भारत की यह जिम्मेदारी है कि इस मानवीय काम में वह सरहद के किसी तनाव को आड़े न आने दे। अगर जरूरत हो तो वहां के फौजी अफसरों को, वहां के नेताओं को इलाज के लिए आने से रोक दे, लेकिन वहां के आम लोगों को तो बिल्कुल नहीं रोकना चाहिए, और वहां के बड़े लोग, खास लोग, ऐसे हैं जो कि अपनी काली या सफेद कमाई से दुनिया के महंगे देशों में भी जा सकते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का एक बहुत बुरा नुकसान दोनों देशों के सबसे गरीब लोगों को होता है जिनके मुंह का कौर छीनकर फौजों पर खर्च किया जाता है, और सरकारों के कामकाज का एक बड़ा हिस्सा इसी सरहदी तनाव पर खर्च हो जाता है। अगर ऐसा न हो तो दोनों देशों में कोई कुपोषण न रहे, कोई गरीब न रहे, और कोई बिना इलाज के न रहे। दिक्कत यह है कि सरहद के तनाव के फैसले सरहद से दूर राजधानियों में बैठकर लिए जाते हैं, और ऐसे लोगों द्वारा लिए जाते हैं जो कुपोषण या भूख को जानते भी नहीं हैं। अगर इन दोनों देशों में रिश्ते ठीक रहें, तो आपसी कारोबार भी इतना बढ़ सकता है कि किसी तीसरे मुल्क तक कमाई जाने के बजाय आपस में ही बहुत सा फायदा हो सकता है। नेता और फौजी अफसर, हथियारों के सौदागर, और उनके दलाल मीडिया के कुछ लोग, ये तमाम लोग मिलकर देशों के बीच तनाव को अपना पेशा बना लेते हैं, और इसके बीच दोनों तरफ के गरीब पिसते हैं। सरकारों से परे जनता के बीच से यह जागरूकता उठनी चाहिए कि दोनों देशों के बीच तनाव से किसी का फायदा नहीं हो रहा है, और दोनों देश दीवालिया हो रहे हैं।