बच्चों के यौन शोषण में चर्च से लेकर घर तक कोई पीछे नहीं

  6 अक्टूबर 2021

  फ्रांस के कैथोलिक चर्च के पादरियों ने 1950 से लेकर अब तक इन 70 वर्षों में कम से कम सवा दो लाख नाबालिग बच्चों का का सेक्स शोषण किया। वहां पर चर्च ने इसके लिए एक जांच आयोग बनाया था जिसने ढाई साल तक जांच करने के बाद 25 सौ पेज की रिपोर्ट में इस पूरे भयानक सिलसिले का ब्यौरा दिया है। अब वहां पर सवाल यह खड़ा हो गया है कि इनमें से अधिकांश पादरी या तो मर चुके हैं, या मरने के करीब कब्र में पैर लटकाए हुए हैं, तो क्या उन्हें अदालत में खींचने से कुछ साबित हो पाएगा? लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बड़ी चीज है कि पादरियों से परे चर्च के दूसरे कर्मचारियों, चर्च के स्कूलों के शिक्षकों ने बच्चों का जो देह शोषण किया होगा, उनके बारे में एक अंदाज लगाया जा रहा है कि ऐसे बच्चों की गिनती 10 लाख से अधिक पहुंच सकती है। कहने के लिए कैथोलिक चर्च के मुखिया पोप फ्रांसिस ने जांच के नतीजों पर गहरी तकलीफ जाहिर की है और इन नतीजों को भयानक बताया है। यह सिलसिला दुनिया भर के उन तमाम चर्चों में चलते ही आया है जहां पर पादरियों को शादी से दूर रहने को कहा जाता है और चर्च ने अपनी पूरी कोशिश करके ऐसे मामलों को दबाने का काम किया है। धर्म से जुड़े हुए लोगों के हाथों बच्चों का, महिलाओं का, और आदमियों का भी शोषण, कोई नई बात नहीं है। हिंदुस्तान में भी ऐसा देखने में बहुत आता है। आसाराम जैसे लोग और उसके साथ ही उसका बेटा भी, भक्तों और अनुयायियों का सेक्स शोषण करते आए हैं, और बाबा राम रहीम नाम का एक नौटंकीबाज भी बलात्कार में जेल की सजा काट रहा है। लेकिन यह सिलसिला नया नहीं है और इसे दुनिया के ऐसे कुछ एक और मामलों से जोडक़र देखना चाहिए, जिनमें कुछ बरस पहले का हिंदुस्तान का एक केरल का मामला ऐसा था जहां कई मुस्लिम लोग ऐसे पाए गए थे जो अपने बच्चों से 4 वर्ष की उम्र तक बलात्कार करने को जायज मानते थे।

केरल में तीन चार बरस पहले  पुलिस ने लोगों के एक ऐसे समूह को पकड़ा था जो कि आपस में अपने बच्चों के अश्लील वीडियो बनाकर, उनकी नग्न तस्वीरें खींचकर शेयर करते थे, और इस समूह को चलाने वाले ने ऐसे पांच हजार लोगों को जुटा लिया था। यह सरगना मुस्लिम नौजवान इस बात की वकालत करता था कि जब तक बच्चियां चार बरस की रहें, उनसे बलात्कार करने में कोई हर्ज नहीं है क्योंकि इस उम्र की बातें उनको याद नहीं रहती। यह आदमी अपनी ही बच्चियों से बलात्कार करते उनके भी वीडियो पोस्ट करता था। केरल पुलिस ने इन पांच हजार लोगों को पकडऩे की पूरी कोशिश की है, लेकिन ये लोग मोबाइल फोन के एक ऐसे मैसेंजर, सिग्नल, का इस्तेमाल करते हुए जहां किसी को पकड़ा नहीं जा सक रहा है। इन लोगों ने अपने सरीखे हजारों लोगों के साथ ऐसे वीडियो शेयर करने का काम कर रखा था और इसमें गिरफ्तारियां हुई थीं।

बच्चों के साथ बलात्कार के मामले तो सामने आते रहते हैं, लेकिन जब उनके मां-बाप ही उनसे बलात्कार करने लगें, और उसकी फोटो या वीडियो दूसरों में बांटने लगें, तो यह एक बहुत ही गंभीर जुर्म भी है, और शायद मानसिक बीमारी भी है। भारत में अधिकतर लोगों का यह मानना रहता है कि बच्चों के साथ आसपास के लोग, परिवार के लोग ऐसा सुलूक नहीं कर सकते और महज अनजान लोग ही उनका यौन शोषण कर सकते हैं। अधिकतर परिवारों में अगर बच्चे किसी पारिवारिक सदस्य या करीबी के बारे में कोई शिकायत भी करते हैं, तो मां-बाप उन्हें डांटकर चुप कर देते हैं। ऐसे में बच्चों के पास कहीं और जाकर शिकायत करने की कोई गुंजाइश बचती नहीं है। लेकिन पूरी दुनिया की तरह भारत में भी चाईल्ड पोर्नोग्राफी का खतरा है जो कि मौजूद है, और बच्चों का यौन शोषण एक हकीकत है। दुनिया के किसी भी दूसरे गरीब देश की तरह भारत में भी गरीब बच्चे इसके शिकार अधिक होते हैं, लेकिन केरल से यह जो मामला सामने आया है, इसमें वहां तो ऐसी गरीबी भी नहीं है, वहां तो लोग पढ़े-लिखे भी हैं, और अगर ऐसे गिरोह में मुस्लिम लोग ही सरगना हैं, तो फिर उनके धर्म की रोक-टोक भी उनके गलत कामों को नहीं रोक पाई। इसलिए बच्चों का यौन शोषण संपन्नता से परे, शिक्षा से परे, धर्म से परे एक अलग किस्म का खतरा है जिससे कोई भी बच्चा सुरक्षित नहीं है।

बच्चों को ऐसे शोषण से बचाने के लिए उनको जागरूक बनाना, उनके आसपास के माहौल को तरह-तरह की निगरानी से सुरक्षित रखना, और बच्चों के मां-बाप को भी जागरूक करना एक समाधान हो सकता है। इस बारे में सरकारों को पहल करनी चाहिए, समाज को शामिल करना चाहिए, और फिर अलग-अलग किस्म के संगठन अपने-अपने सदस्यों को इस खतरे की तरफ से जागरूक करते चलें, इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। श्रीलंका या बैंकाक की तरह ही भारत में भी गोवा में पर्यटकों की बड़ी मौजूदगी के बीच बच्चों के यौन शोषण की बड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। अब एक दूसरा बड़ा पर्यटक-राज्य केरल ऐसी भयानक खबर लेकर आया है। पूरे देश को इससे चौकन्ना होने की जरूरत है, ऐसी खबरों को अनदेखा करना कोई इलाज नहीं होगा, लोगों को अपने आसपास के लोगों से इस खतरे के बारे में खुलकर बात करनी होगी, और हर किसी को अपने आसपास के बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए कोशिश करनी होगी। हर राज्य सरकार को अपने नागरिक संगठनों को साथ लेकर तुरंत ही ऐसी जागरूकता का अभियान चलाना चाहिए। दूसरी बात यह कि देश में आईटी एक्ट तो बहुत मजबूत है, लेकिन वह अदालत में किसी को सजा नहीं दिला पा रहा है। ऐसे में इंटरनेट या सोशल मीडिया पर, या कि किसी मैसेंजर सर्विस पर इस तरह के वीडियो आगे बढ़ाकर जो लोग समाज को एक खतरनाक जगह बना रहे हैं, उन्हें अपने बच्चों के बारे में भी सोचना चाहिए। कुल मिलाकर यह दुनिया एक भयानक जगह है, और लोगों को अपने बच्चों को बचाने के लिए इस पूरी दुनिया को सुरक्षित बनाना पड़ेगा, महज अपने घर को सुरक्षित रखकर, महज अपने बच्चों को सुरक्षित रखकर कुछ भी नहीं हो सकेगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 5 अक्टूबर 2021


 

कैदी को कुछ घंटे रिहाई मिली तो आजादी बहुत भारी पड़ गई

   5 अक्टूबर 2021

 बीती शाम से रात तक कुछ घंटों के लिए दुनिया का सबसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक बंद रहा, और इसी कंपनी के दो और कारोबार, व्हाट्सएप मैसेंजर और इंस्टाग्राम नाम का एक फोटो-वीडियो प्लेटफार्म भी बंद रहे। कंपनी के लोग कंप्यूटर पर कुछ फेरबदल कर रहे थे और उनकी किसी गलती से यह हुआ। कोई स्थाई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन कुछ घंटों की इस गड़बड़ी से इस कंपनी के शेयर 5 फीसदी गिर गए और इसके मालिक के अरबों रूपये डूब गए। इन सबसे परे, बचे हुए एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर लोगों ने इन घंटों में खूब लिखा, अपनी तकलीफ भी बताई, और मजा भी लिया। मैसेंजर और सोशल मीडिया के बिना कुछ घंटों जिंदगी भी किस तरह थम गई यह कल सामने आया। जबकि लोगों के पास दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी थे, और दूसरी बहुत सी मैसेंजर सर्विस भी थीं जो कि बंद नहीं हुई थीं।

अब इस छोटे से हादसे से यह समझने की जरूरत है कि लोगों की जिंदगी किस तरह इन सहूलियत ऊपर टिक गई है, उनकी मोहताज हो गई है। इनके बिना होना तो यह चाहिए था कि लोग कुछ देर अपने आसपास के दायरे में जी लेते, कुछ देर परिवार और दोस्तों का सीधा मजा ले लेते, लेकिन उनकी दिमागी बेचैनी ने उन्हें ऐसा कुछ नहीं करने दिया। लोग लगातार कभी अपने फोन को चेक करते, तो कभी इंटरनेट को, और कभी इन्हें बंद करके फिर शुरू कर देखते कि क्या उनके सिरे पर कोई गड़बड़ी है? इस बात को लेकर लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या इंटरनेट और फोन-कंप्यूटर से परे कुछ देर रह लेना उनकी अपनी सेहत, और रिश्तों के लिए ठीक नहीं है? यह भी सोचना चाहिए कि क्या एक हठयोग की तरह कुछ देर वह ऑफलाइन भी रह सकते हैं? आप बिना इंटरनेट के और टेलीफोन के रह सकते हैं? लोगों को यह बड़ा मुश्किल काम लग सकता है क्योंकि दिल और दिमाग हर कुछ मिनटों में किसी मैसेज की उम्मीद करते हैं, या किसी कॉल की, ये दोनों न आएं तो लोग खुद कोई मैसेज करने लगते हैं। लोगों के हाथ हर थोड़ी देर में अपने फोन को ढूंढने और टटोलने लगते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि सिगरेट पीने वालों के हाथ सिगरेट के पैकेट और माचिस या लाइटर को टटोलकर, अपने पास पाकर एक तसल्ली पाते हैं, और फिर चाहे उनका अगली सिगरेट का वक्त हुआ हो या ना हुआ हो, उन्हें यह भरोसा तो रहता है कि जब जरूरत रहेगी, यह पास में है। ठीक इसी तरह लोगों को इंटरनेट, फोन और कंप्यूटर, इन पर बैटरी चार्जिंग की तसल्ली इतनी ही जरूरी हो गई है जितनी कि किसी नशे या लत के सामान की रहती है।

इन सबसे परे अगर कुछ देर के लिए लोग अपने परिवार में बैठ जाएं या दोस्तों के साथ बैठ जाएं और तमाम लोग यह तय कर लें कि कोई इतनी देर न फोन देखेंगे, न कंप्यूटर देखेंगे, और शायद टीवी भी देखने से परहेज करेंगे, तो लोगों को घर के भीतर ही एक-दूसरे के बारे में कई नई बातें पता लग सकती हैं। लोग अगर फोन पर बात किए बिना सुबह शाम की सैर पर जा सकते हैं, तो उन्हें कुदरत के बारे में कई नई बातें पता लग सकती हैं, पेड़ों और पंछियों के बारे में कुछ पता लग सकता है, और जिंदगी की रोज की चीजों से परे वे कुछ नई कल्पनाएं भी कर सकते हैं। कई लोग बातचीत में आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग की बात करते हैं, यानी बंधे बंधाए ढर्रे से परे कुछ नया सोचना, कुछ नए तरह से सोचना, लीक से हटकर कुछ सोचना। लेकिन जब जिंदगी का अधिकतर जागा हुआ वक्त फोन और कंप्यूटर से ही बंधा हुआ है, इन्हीं चीजों के भीतर कैद है तो फिर आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग आ कहां से सकती है?

हमारी अधिकतर सोच उन बातों से जुड़ गई है जो बातें दूसरे लोग हमें भेजते हैं, या जो सोशल मीडिया हमें अपने पेज पर दूसरों का लिखा हुआ दिखाता है। ऐसे में अपनी मौलिक सोच के लिए वक्त और गुंजाइश यह दोनों बचते ही कहां हैं? अपनी खुद की फिक्र के लिए, अपनों की फिक्र के लिए कहां जगह निकलती है? इसलिए कल जब कुछ घंटों के लिए लोगों के हाथ से व्हाट्सएप और फेसबुक निकल गया, तो लोगों को लगा कि उनके हाथ-पैर कट गए, और अब उनका दिल-दिमाग कैसे काम करेगा? लोगों को यह याद रखना चाहिए कि जब उनके सोचने की शुरुआत दूसरों के लिखे हुए, दूसरों के पोस्ट किए हुए और दूसरों के भेजे हुए संदेशों से होती है, तो वह मौलिक कहां से हो सकती है? अब इस जगह इस मुद्दे पर और अधिक लिखकर हम एक बक्सा बनाना नहीं चाहते जिसके बाहर लोगों का सोचना मुश्किल हो, हम सिर्फ इस मुद्दे को छोडक़र बात को खत्म करना चाहते हैं ताकि लोग अपने-अपने हिसाब से इस बारे में सोचें।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 अक्टूबर 2021

 

आंदोलन कर रहे किसानों को सत्ता की गाड़ी कुचल मारे, ऐसा तो मुल्क में पहले कभी सुना नहीं था !

  4 अक्टूबर 2021

  देश में लंबे समय से चले आ रहे किसान आंदोलन में कल एक दर्दनाक मोड़ तब आया जब उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले में वहां पहुंच रहे केंद्र और राज्य के भाजपा मंत्रियों का विरोध करने के लिए इक_ा किसानों पर एक केंद्रीय मंत्री के बेटे की गाड़ी चढ़ा दी गई जिसमें 4 किसान कुचलकर मर गए। ऐसी खबर है कि इसके जवाब में कुछ किसानों ने भी हिंसा की और इस पूरे घटनाक्रम के बाद भाजपा के दो कार्यकर्ताओं और दो ड्राइवरों के भी मरने की खबर है। उत्तर प्रदेश में कुछ महीने बाद चुनाव होने जा रहा है और किसान आंदोलन तो पूरे देश में चल ही रहा है। ऐसे में उत्तर प्रदेश की कांग्रेस प्रभारी प्रियंका गांधी तुरंत लखीमपुर के लिए रवाना हुईं, जिन्हें रास्ते में ही रोककर गिरफ्तार कर लिया गया, कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के कुछ दूसरे नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लखनऊ में विमान उतारने की भी इजाजत नहीं दी गई और वह रायपुर में रवानगी का इंतजार करते रहे. भूपेश बघेल ने यह सवाल उठाया है कि क्या अब उन्हें उत्तर प्रदेश जाने के लिए कोई वीजा लेना पड़ेगा? यह बात इसलिए है कि उनके या पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी के लखनऊ पहुंचने के बाद भी उन्हें आगे बढऩे से रोका जा सकता था, लेकिन एक प्रदेश के मुख्यमंत्री को दुसरे प्रदेश की राजधानी तक पहुंचने की इजाजत भी न मिलना उन्हें एक अलोकतांत्रिक मामला लग रहा है, और जाहिर तौर पर ऐसा दिख भी रहा है। लखीमपुर जिले में जहां पर कि यह घटना हुई है वह नेपाल की सरहद पर बसा हुआ एक गांव है और वहां से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर लखनऊ तक किसी को न उतरने दिया जाए, यह बात थोड़ी अटपटी लगती है। स्थानीय शासन प्रशासन का तो यह अधिकार रहता है कि वे तनावग्रस्त से इलाके में किसी को जाने से रोकें, और वह काम इस डेढ़ सौ किलोमीटर में कहीं भी हो सकता था।

लेकिन यह मुद्दा कांग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों के उत्तर प्रदेश पहुंचने से रोके जाने का नहीं है, वह तो इस पूरी घटना का एक छोटा हिस्सा है, बड़ा हिस्सा तो यह है कि देश के कई राज्यों में चल रहे किसान आंदोलन के प्रति देशभर में अधिकांश हिस्सों में चल रही भाजपा की सरकारों का क्या रुख है। केंद्र सरकार के सामने डेरा डाले हुए किसानों को सैकड़ों दिन हो चुके हैं, लेकिन अपने किसान कानूनों को लेकर केंद्र सरकार टस से मस नहीं हो रही। दूसरी तरफ पिछले महीनों में कहीं हरियाणा के किसी मंत्री ने, तो कहीं भाजपा के किसी बड़े नेता-पदाधिकारी ने किसान आंदोलन को नक्सलियों से जुड़ा बताया, किसी ने देशद्रोहियों से जुड़ा हुआ बताया, किसी ने उसका संबंध पाकिस्तान और खालिस्तान से जोड़ा। अभी दो दिन पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने किसान आंदोलन से लाठियों से निपटने की बात लोगों से की, और कुछ वैसी ही बातें उत्तर प्रदेश में भी किसानों के बारे में केंद्र और राज्य के भाजपा-मंत्री करते आए थे। माहौल ऐसा बन गया है कि भाजपा सरकारों के मंत्री और भाजपा के बड़े पदाधिकारी किसान विरोधी दिखने लगे हैं। यह जनधारणा हर लापरवाह बयान के साथ अधिक मजबूत होते चल रही है, और रास्ता रोके आंदोलनकारियों को सत्तारूढ़ गाड़ी से कुचलकर मारने का यह देश का शायद पहला ही मौका है। पता नहीं भाजपा किस तरह देश के पूरे के पूरे किसान तबके को इस हद तक नाराज करने का एक अभियान सा चलाते दिख रही है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जब उत्तर प्रदेश जाने की इजाजत राज्य सरकार ने नहीं दी तो उन्होंने दिल्ली में पार्टी दफ्तर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा, जिनके बेटे की कार ने किसानों को कुचल कर मारा है, उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए। भूपेश ने इस बात पर भी अफसोस जाहिर किया कि इस तरह की मौतों पर प्रधानमंत्री की तरफ से कोई प्रतिक्रिया तक नहीं आई जो कि बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है. उन्होंने कहा कि यह साधारण घटना नहीं है यह हत्या का मामला है। उन्होंने कहा कि ये लोग अंग्रेजों की राह पर चलने वाले लोग हैं, ये किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि भाजपा को किसान पसंद नहीं है और भाजपा किसानों की आवाज को दबा देना चाहती है, रौंद देना चाहती है। आज प्रियंका गांधी के उत्तर प्रदेश में हिरासत में रहने के बाद भूपेश बघेल वहां जाने की कोशिश कर रहे सबसे बड़े नेता हैं, और कांग्रेस पार्टी ने उन्हें दो दिन पहले ही उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर वरिष्ठ पर्यवेक्षक नियुक्त किया है।

यह बात सच है कि उत्तर प्रदेश के कुछ महीने बाद के चुनावों को लेकर राजनीतिक दल अधिक सक्रिय हुए होंगे, लेकिन पिछले साल भर में भाजपा की केंद्र सरकार, उसकी हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकार ने किसान आंदोलन पर जो रुख दिखाया है, वह एक आम नजरिए से देखने पर किसान विरोधी दिखता है। ऐसा लगता है कि राज्यों और केंद्र के चुनाव जीतने में एक महारत हासिल कर लेने के बाद भाजपा को देश के बहुत से तबकों की परवाह नहीं रह गई है। उसे लगता है कि मोदी के नाम और चेहरे पर वह देश में कहीं भी जीत सकती है। यह सिलसिला चुनावी राजनीति के हिसाब से तो ठीक है, लेकिन हिंदुस्तान में लोकतंत्र की परंपराओं को देखें, तो बातचीत के सिलसिले को खत्म करना कोई अच्छी बात नहीं है। और संसद से लेकर सडक़ तक, मोदी सरकार और भाजपा, बातचीत के सिलसिले को गैरजरूरी साबित करते चल रही हैं। बहुमत की वजह से उनका काम चल सकता है, लेकिन यह उनका काम ही चल रहा है, देश की लोकतांत्रिक परंपराएं नहीं चल रहीं। उत्तर प्रदेश में किसानों की ये मौतें आने वाले चुनाव पर चाहे जो असर करें, हम उसके असर को चुनावों से परे भी देश के किसान आंदोलन और देश के किसान मुद्दों पर देखना चाहेंगे, क्योंकि अभी 2 अक्टूबर को ही तो लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर लोगों ने जय जवान, जय किसान की बात कही, और जिन लोगों को गांधी के मुकाबले भी शास्त्री अधिक पसंद आते हैं, उन्हें भी शास्त्री के जय किसान पसंद नहीं आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में आने वाले दिन देश के किसान आंदोलन की रफ्तार भी तय करेंगे, और इस बारे में कुछ दिन बाद फिर लिखने का मौका आएगा।

(Daily Chhattisgarh)

सबको मालूम है दोजख़ की हकीकत लेकिन..

3 अक्टूबर  2021


एप्पल कंपनी के नए मोबाइल फोन के बाजार में आने के पहले ही कंपनी की दी गई जानकारी कुछ घंटे के भीतर ही लोगों की जुबान पर आ जाती है कि अगला फोन किस साइज का आ रहा है, उसमें कौन सी खूबियां रहेंगी, और दाम कितने डॉलर रहेगा, यह हिंदुस्तान में वह कितने का पड़ेगा। शाहरुख खान का बेटा किसी नशे के मामले में पकड़ाता है तो उस बेटे के बारे में लोगों को खासी जानकारी रहती है। लेकिन हिंदुस्तान के एक सबसे बड़े अखबार का खुद का बनाया हुआ एक पॉडकास्ट सुनते हुए अभी समझ आया कि उस अखबार के बड़े-बड़े दिग्गज राजनीतिक रिपोर्टर माइक्रोफोन पर बात करते हुए भी पंजाब के सिलसिले में दलितों को अलग गिन रहे हैं, और हिंदुओं को अलग। एक दलित के मुख्यमंत्री बनने के मामले को एक हिंदू मुख्यमंत्री से अलग गिनकर चल रहे हैं। यह मामला कुछ वैसा ही है कि कश्मीर के बारे में चर्चा करते हुए लोग कश्मीर और इंडिया जैसी बात करते हैं। एक अमरीकी रेडियो स्टेशन के लिए कुछ बरस पहले मैंने देश की एक बड़ी अखबारनवीस का ऑडियो इंटरव्यू रिकॉर्ड किया था जो कि कश्मीर के मामलों की बड़ी जानकार भी थीं, और उन्होंने बातचीत में एक से अधिक बार कश्मीर और इंडिया जैसी बातें कहीं, जाहिर है कि मेरा अगला और आखरी सवाल यही था कि क्या वे कश्मीर को इंडिया से अलग मानकर चल रही हैं ? और तब जाकर उन्हें अपनी चूक समझ में आई कि वे क्या गलती कर रही थीं।

अभी जब पंजाब में मुख्यमंत्री के बदलने की बात आई और एक दलित विधायक के मुख्यमंत्री बनने की मुनादी हुई तो बहुत से खासे पढ़े लिखे लोगों को हैरानी के साथ यह चर्चा करते हुए सुना कि क्या सिखों में भी कोई जाति व्यवस्था है? लोग यही मानकर चल रहे थे कि जिस तरह गुरुद्वारे की पंगत में बिना जाति धर्म पूछे सबको एक साथ खाना खिलाया जाता है तो उससे शायद सिखों के भीतर कोई जाति व्यवस्था नहीं होगी। सच तो यह है कि भारत के किसी भी दूसरे प्रदेश के मुकाबले पंजाब में दलितों की आबादी का प्रतिशत सबसे अधिक है, वहां 32 फीसदी दलित हैं। लेकिन लोगों की याददाश्त कुछ कमजोर रहती है और मीडिया के बहुत से लोगों ने टीवी चैनलों पर यह कहा, और अखबार की खबरों में भी लिखा, कि यह पंजाब का पहला गैर-सिक्ख मुख्यमंत्री बनने जा रहा है जबकि इसके पहले पंजाब में एक से अधिक गैर-सिक्ख मुख्यमंत्री रह चुके हैं। लोगों की जानकारी असल मुद्दों को लेकर धीरे-धीरे कम इसलिए हो रही है कि फिल्म इंडस्ट्री के एक अभिनेता की खुदकुशी को राजनीतिक बनाने की कोशिशों में वे डूब जाते हैं। खेल सत्तारूढ़ ताकतें करती हैं और लोग स्टेडियम में बैठे दर्शकों की तरह मैच देखने जाते हैं, लेकिन चीयरलीडर्स की तरह नाचने लगते हैं। अफवाहों और झूठ-फरेब के इस बाजार में सच की इज्जत इतनी कम रह गई है कि लोग खबरों में सच पाने की उम्मीद करते, न कोशिश करते।

अभी एक वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहा है जिसमें किसी महानगर में कॉलेज के छात्र-छात्राओं के बीच एक कैमरा और माइक्रोफोन लिए हुए लोग उनसे हिंदुस्तान के बारे में कई किस्म के सवाल करते हैं। उन्हें हिंदुस्तान के पहले प्रधानमंत्री का नाम नहीं मालूम, पहले राष्ट्रपति का नाम नहीं मालूम, उन्हें किसी अंतरिक्ष यात्री का नाम नहीं मालूम, उन्हें छत्तीसगढ़ के भीतर झारखंड है या झारखंड के भीतर छत्तीसगढ़ है यह भी नहीं मालूम, उन्हें उत्तराखंड, हिमाचल, और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग होने की खबर नहीं है, उन्हें किसी बात की खबर नहीं है, और वे खासे फैशनेबल कपड़े पहने हुए, संपन्न परिवारों के, कॉलेज में पढ़ रहे या पढ़ चुके लोग दिख रहे हैं। जो सामान्य ज्ञान के दसियों सवालों में नाकामयाब हो कर कैमरे से ही यह सवाल करते हैं कि क्या यह उन्हें अपमानित करने के लिए यह किया जा रहा है?

हिंदुस्तान के असल मुद्दों की जानकारी में लोगों की दिलचस्पी बहुत ही कम है। सच तो यह है कि लोगों की अपने आसपास की ऐसी जानकारी में दिलचस्पी नहीं है जिससे उन्हें कोई मजा नहीं मिलता। देश के बड़े-बड़े अखबारों के छत्तीसगढ़ में रहने वाले रिपोर्टरों से कई बार यह कहा जाता है कि वे बहुत दुख-तकलीफ की या नक्सल हिंसा की खबरें बहुत अधिक ना भेजें क्योंकि उनमें किसी की अधिक दिलचस्पी नहीं है। जब मरने वाले गिनती में बहुत अधिक होते हैं, तब तो यह खबर बनती है, लेकिन छोटी-मोटी नक्सल हिंसा की खबरों में किसी अखबार की दिलचस्पी नहीं रहती, छत्तीसगढ़ के अखबारों की भी सीमित दिलचस्पी रहती है। इसके पीछे की वजह यह है कि विज्ञापन देने वाले लोग अखबार या टीवी चैनलों को दुख-दर्द, तकलीफ, और लाशों से भरा हुआ देखना नहीं चाहते। उसकी जगह एक किसी जहाज पर चल रही पार्टी में थोड़ा-बहुत नशा कर रहे लोगों के पकडाने पर शाहरुख खान के बेटे की वीडियो के साथ कई-कई घंटे उसी खबर को दिखाने में टीवी चैनलों की दिलचस्पी अधिक है, और हो सकता है कि अखबार भी वैसे ही निकलें।

फिल्मी दुनिया, सेक्स, क्राइम, और क्रिकेट से जुड़ी हुई खबरें लोगों को गुदगुदाती हैं, और उन्हें कुछ भी सोचने पर मजबूर नहीं करती। यह कुछ वैसा ही होता है कि सोफे पर बैठ कर चिप्स खाते हुए टीवी पर क्रिकेट देखना जितना आरामदेह रहता है, कसरत करना या दौडऩा, साइकिल चलाना तो उतना आरामदेह हो नहीं सकता। इसलिए लोग अपने दिमाग पर अधिक जोर डालना नहीं चाहते, अपने भीतर के सामाजिक सरोकारों को जगाने का खतरा भी उठाना नहीं चाहते। सामाजिक सरोकार अगर जाग गए तो देश-दुनिया के असल मुद्दे उनके दिल-दिमाग को परेशान करने लगेंगे। इसलिए ऐसी खबरों को ही ना पढ़ा जाए कि कितने लोग कुपोषण के शिकार हैं, कितने बच्चे पिछली शाम के खाने के बाद अगला खाना अगली दोपहर स्कूल में ही पाते हैं। ऐसी खबरों को पढऩे के बाद लोगों के अपने गले से कुछ उतरना मुश्किल होने लगेगा इसलिए लोग सामाजिक सरोकार की तमाम बातों से दूर रहते हैं।

यही वजह है कि दलितों के मुद्दों की जानकारी लोगों को कम है. कश्मीर में एक सैलानी जितनी दिलचस्पी तो है, लेकिन कश्मीर के लोगों की बाकी दिक्कतों से लोग अपने को दूर और अछूता रखते हैं. लोग उत्तर-पूर्वी राज्यों की दिक्कतों से अपने को दूर रखते हैं, और दिल्ली के बाजारों में उत्तर-पूर्व के लोगों को देखकर उन्हें चिंकी बुलाकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। लोगों को उन लोगों को देख कर भी आत्मग्लानि होती है जो कि बहुत सादगी से जीते हैं, इसलिए ममता बनर्जी की साधारण रबड़ चप्पल और उसकी साधारण साड़ी को लोग मखौल का सामान मानते हैं, और जो नेता दिन में 4 बार, 6 बार महंगे कपड़े बदलते हैं, उनकी वे इज्जत करते हैं। लोग नेताओं से यह पूछना नहीं चाहते कि उनके पास इतना पैसा कहां से आया, और लोग देश के गरीबों की तकलीफ को जानना नहीं चाहते कि बिना पैसों के या इतने कम पैसों के साथ वे जिंदगी कैसे काट सकते हैं।

लोगों का सामाजिक सरोकार से दूर रहना, लोगों की तकलीफों को अनदेखा करना, जमीन की कड़वी हकीकत को नहीं देखना, इन सबसे लोग सुखी रहते हैं, और यही वजह है ये  मुद्दे धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं फीके पड़ते जा रहे हैं। इसे एक और बात से जोडक़र देखा जा सकता है कि किस तरह हिंदुस्तान की संसद में अरबपति बढ़ते चले जा रहे हैं, और हिंदुस्तान की विधानसभाओं में भी करोड़पतियों का अनुपात लगातार बढ़ते चल रहा है। इतनी संपन्नता लोगों को विपन्नता के दर्शन ही नहीं करने देती और बहुत गरीबी से तकरीबन अनजान लोग जब संसद या विधानसभा में बैठकर चर्चा करते हैं, तो जाहिर है कि वह चर्चा गरीबों पर तो टिक नहीं सकती, वहां तक पहुंच भी नहीं सकती।

 

 

दीवारों पर लिक्खा है, 2 अक्टूबर 2021


 

कांग्रेस ने पाई नौजवान प्रतिभाएं, बिना किसी चुनौती के खतरे के

    2 अक्टूबर 2021

  वैसे तो कांग्रेस पार्टी कुछ अच्छी और कुछ बुरी बातों के लिए लगातार खबरों में बनी हुई है, और पंजाब से लेकर राजस्थान, छत्तीसगढ़ तक पार्टी के भीतर अलग-अलग किस्म के मुद्दों को लेकर बेचैनी भी बनी हुई है, लेकिन उसकी खबरें दिल्ली से बन रही हैं। राज्यों को लेकर फैसले भी क्योंकि परंपरागत रूप से इस पार्टी में, और सच तो यह है कि बाकी तमाम पार्टियों में भी, दिल्ली से होते हैं, इसलिए राज्यों की खबरें भी दिल्ली से निकल रही हैं. लेकिन कुछ दूसरी दिलचस्प बातें भी हो रही हैं। देश की नौजवान पीढ़ी में एक सबसे चर्चित नौजवान चेहरा, जेएनयू का छात्र नेता रहा हुआ कन्हैया कुमार, अपने सीपीआई से राजनीतिक संबंधों का एक लंबा दौर छोडक़र कांग्रेस में शामिल हुआ। उसी के साथ जिग्नेश मेवाणी नाम का गुजरात का एक दलित राजनीतिक कार्यकर्ता, और मौजूदा निर्दलीय विधायक भी कांग्रेस में आया। जिग्नेश मेवाणी वकील और अखबारनवीस भी रह चुका है और बाद में एक दलित कार्यकर्ता की हैसियत से निर्दलीय विधायक बना है। इन दोनों के कांग्रेस में आने की चर्चा कई दिनों से चल रही थी, और राहुल गांधी से मिलकर शायद एक से अधिक मुलाकातें करके ये कांग्रेस में आए हैं. इनके पहले गुजरात में एक और नौजवान सामाजिक कार्यकर्ता हार्दिक पटेल भी कांग्रेस में लाया गया था और उसे हैरान कर देने वाले तरीके से गुजरात प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया गया। हार्दिक ने पिछले कुछ वर्षों में गुजरात में लगातार सामाजिक और आरक्षण आंदोलनों में बड़ी अगुवाई की थी, और वहीं से हार्दिक का नाम लगातार खबरों में आया, बने रहा, और इतनी कम उम्र का कोई नौजवान इतने बड़े आंदोलन का अगुआ बने ऐसा कम ही होता है। तो हार्दिक पटेल गुजरात के पाटीदार-ओबीसी समुदाय का एक बड़ा असरदार चेहरा है और जिग्नेश मेवानी गुजरात का एक दलित चेहरा है, इन दोनों का कांग्रेस से कोई पुराना इतिहास नहीं रहा बल्कि इन दोनों का कोई चुनावी राजनीतिक इतिहास नहीं रहा है। पाटीदार आंदोलन से हार्दिक पटेल खबरों में आए क्योंकि वे अपने समाज को ओबीसी आरक्षण में शामिल करवाना चाहते थे। और गुजरात के दलितों की तकलीफ तो बहुत बुरी तरह खबरों में बनी हुई रहती ही हैं।

अब यह सिलसिला थोड़ा सा अटपटा लगता है कि कांग्रेस में एक तरफ तो अपने जमे-जमाए पुराने नेताओं से बातचीत का सिलसिला भी टूटते जा रहा है। कांग्रेस के मौजूदा तौर तरीकों से बेचैन, लेकिन कांग्रेस में ही अब तक बने हुए, करीब दो दर्जन बड़े नेताओं से ऐसा लगता है कि राहुल गांधी, या कांग्रेस हाईकमान, या सोनिया परिवार ने सीधे बातचीत बंद ही कर रखी है। और दूसरी तरफ प्रशांत किशोर नाम के एक चुनावी राजनीतिक रणनीतिकार से जिस तरह कांग्रेस सलाह-मशविरा कर रही है, उसे ऐसा लगता है कि कांग्रेस अपने भीतर की जड़ हो चुकी, फॉसिल बन चुकी, भूतपूर्व प्रतिभाओं को छोडक़र, कुछ नई नौजवान प्रतिभाओं की तरफ जा रही है। यह भी हो सकता है कि कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी को कांग्रेस में लाने के पीछे प्रशांत किशोर जैसे किसी गैरकांग्रेसी की राय रही हो। जो भी हो कांग्रेस को आज एक नए खून की जरूरत है, और बहुत बड़ी जरूरत है. जरूरत तो उसे कांग्रेस की लीडरशिप के स्तर पर भी है कि वहां पर भी कुछ नया होना चाहिए, लेकिन जब तक वह नहीं हो सकता, जब तक वह नहीं होता है, तब तक कम से कम कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी जैसे लोग पार्टी में लाए जाएं, तो इसे कारोबारी दुनिया में एक नए कामयाब स्टार्टअप को किसी पुरानी बड़ी कंपनी द्वारा अधिग्रहित कर लेने जैसा मानना चाहिए। कारोबार से भी राजनीति कुछ सीख सकती है, और उसमें यह है कि अपने पुराने लोग अगर एसेट के बजाय लायबिलिटी अधिक हो चुके हैं, तो बाहर से कम से कम कुछ नई नई प्रतिभाओं को लाकर पार्टी की एसेट बढ़ाई जाए।

यह बात हम कन्हैया कुमार के आज कांग्रेस में लाए जाने को लेकर नहीं कह रहे हैं, जिस दिन कन्हैया कुमार जेल से छूटकर जेएनयू पहुंचे थे और वहां पर करीब पौन घंटे का उनका भाषण टीवी चैनलों पर बिना किसी काट-छांट के पूरा दिखाया गया था, उस दिन से ही हम यह मानकर चल रहे हैं कि देश को ऐसे नौजवानों की जरूरत है। हमारे नियमित पाठकों ने इसी जगह पर उसी दौर में कई बरस पहले हमारा लिखा हुआ पढ़ा होगा कि देश की संसद में अगर किसी एक व्यक्ति को लाया जाना चाहिए तो वह कन्हैया कुमार है। सार्वजनिक जीवन में और चुनावी राजनीति में निजी ईमानदारी के साथ जब मजबूत विचारधारा को ओजस्वी तरीके से बोलने का हुनर किसी में होता है, तो उसका बड़ा असर भी होता है. यह बात फुटपाथ पर चूरन या तेल बेचने वाले के बोलने के हुनर से अलग रहती है। और जनसंघ के जमाने से भाजपा के इतिहास के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेई अपनी साफगोई और बोलने की अपनी खूबी के चलते हुए ही इतने लोकप्रिय रहते आए थे। इसलिए कन्हैया कुमार का कांग्रेस में आना और खासकर ऐसे वक्त आना जब उसका वर्तमान ही अंधेरे में दिख रहा है, और उसका भविष्य एक लंबी अंधेरी सुरंग के आखिर में टिमटिमाती रोशनी जैसा दिख रहा है, तब यह कांग्रेस के लिए एक हासिल है।

अब इसे एक दूसरे पहलू से भी देखने की जरूरत है। जिन चार नामों की हमने यहां चर्चा की है, हार्दिक पटेल, कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवाणी, और प्रशांत किशोर, इन सबके साथ एक बात एक सरीखी है कि ये कांग्रेस की राजनीति में अगर रहते हैं, तो भी ये राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई पकड़ नहीं रखते कि ये राहुल गांधी या प्रियंका गांधी के लिए कई बरस बाद जाकर भी किसी तरह की कोई चुनौती बन सकें। जबकि कांग्रेस पार्टी के भीतर के जिन दर्जनों नेताओं को धीरे-धीरे अलग-अलग वजहों से किनारे होना पड़ा है, उनमें से कई ऐसे हो सकते थे जिन्हें कांग्रेस की मौजूदा लीडरशिप के लिए एक किस्म की चुनौती माना जा सकता था। अभी भी यह संभावना या आशंका खत्म नहीं हुई है कि जब कभी कांग्रेस के संगठन चुनाव होंगे तो 23 बेचैन नेताओं में से कोई पार्टी अध्यक्ष का चुनाव भी लडऩे के लिए तैयार हो जाए. इसलिए राहुल गांधी या उनके परिवार ने देश के कुछ चर्चित और दमखम वाले नौजवानों को पार्टी में लाकर पार्टी को समृद्धि तो किया है, लेकिन शायद अपनी हिफाजत का भी पूरा ध्यान रखा है। राजनीति किसी किस्म के त्याग और आध्यात्म का कारोबार नहीं है और इसमें लोग अगर अपने प्रतिद्वंद्वियों को कम करते हैं, कमजोर करते हैं, तो उसमें कोई अटपटी बात नहीं है। ऐसे में कांग्रेस ने अपने बड़े कमजोर राज्यों में, गुजरात और बिहार में इन नौजवानों को पार्टी में लाकर अपनी संभावनाओं को बेहतर बनाने की कोशिश की है, जो कि एक अच्छी बात है।

हो सकता है कि कांग्रेस संगठन के पुराने जमे जमाए मठाधीशों को यह बात अच्छी न लगे, लेकिन वह अधिक काम के रह नहीं गए हैं। वे भाजपा में होते तो घोषित या अघोषित मार्गदर्शक मंडल में भेजे जा चुके रहते। लेकिन कांग्रेस की संस्कृति कुछ अलग है, और इसने अभी एक बरस पहले तक देश के सबसे बुजुर्ग कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा को राहुल और सोनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते देखा हुआ है। इसलिए बिना रिटायर किए या बिना घर भेजे भी कांग्रेस अपने पुराने बोझ को किनारे करना जानती है, और अब उसने जिन नए होनहार लोगों को पार्टी में लाने का काम किया है, वह उसके लिए एक अच्छी बात है। हम यहां पर किनारे किए गए पुराने लोगों के साथ इन नए लोगों को जोडक़र कोई नतीजा निकालना नहीं चाहते क्योंकि संगठन के भीतर की राजनीति का इतना सरलीकरण करना मुमकिन नहीं है। लेकिन देश में तेजस्वी और होनहार नौजवानों को आगे लाना किसी भी पार्टी के लिए एक अच्छी बात है और कांग्रेस ने इस हफ्ते कुछ हासिल ही किया है। हो सकता है कि इसी संदर्भ में पंजाब में भारी अलोकप्रिय हो चुके बुजुर्ग मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को किनारे करना, और एक दलित, तकरीबन नौजवान को मुख्यमंत्री बनाना भी गिना जा सकता है। देखें आगे-आगे होता है क्या।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 अक्टूबर 2021


 

बच्चे-बच्चियों का देह शोषण जशपुर से अमरीका तक कहीं कोई फर्क नहीं!

    1 अक्टूबर 2021

   उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में वहीं की एक महिला शिक्षिका ने छात्राओं के नहाते और कपड़े बदलते हुए वीडियो बना लिए और अब उन लड़कियों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है क्योंकि वे इस बात से डरी-सहमी हैं कि कहीं वह टीचर यह वीडियो और फोटो वायरल ना कर दे। पुलिस उस महिला शिक्षिका को तलाश रही है जो कि फरार हो गई है। यह मामला छत्तीसगढ़ के जशपुर में विकलांग बच्चों के एक प्रशिक्षण केंद्र और छात्रावास में अभी कुछ दिन पहले हुए बलात्कार और सामूहिक सेक्स शोषण जितना गंभीर नहीं है, लेकिन अपने आप में गंभीर तो है ही। हिंदुस्तान में एक तो लोग लड़कियों को बाहर पढऩे भेजना नहीं चाहते, ऐसे में जब किसी हॉस्टल में लड़कियों को रखकर गरीब मां-बाप उनके बेहतर भविष्य की कोशिश करते हैं, तो जशपुर के प्रशिक्षण केंद्र में वही के केयरटेकर कर्मचारियों ने बलात्कार किया, और देशभर में जगह-जगह ऐसी घटनाएं होती रहती हैं।

इस मामले से जुड़े हुए दो अलग-अलग पहलू हैं. एक तो यह कि बच्चों से जुड़ी हुई शिक्षण या प्रशिक्षण संस्थान या फिर उनके खेलकूद के संस्थान ऐसे रहते हैं जहां पर बच्चों से सेक्स की हसरत रखने वाले लोग नजर रखते हैं, और मौका मिलते ही वहां यह जुर्म करने में लग जाते हैं। फिर हिंदुस्तान में तो कानून भी लचर है और सरकारी इंतजाम उससे भी अधिक लचर है, लेकिन जिस अमेरिका में कानून मजबूत है, और सरकारी इंतजाम भी खासे मजबूत हैं, वहां भी अभी ओलंपिक में पहुंची हुई बहुत सी जिमनास्ट की शिकायतें जांच में सही पाई गईं कि उनके एक प्रशिक्षक ने अनगिनत लड़कियों का सेक्स शोषण किया। टोक्यो ओलंपिक में अमेरिकी जिमनास्ट टीम की जो सबसे होनहार खिलाड़ी थी उसने आखिरी वक्त में अपना नाम वापस ले लिया और कहा कि वह मानसिक रूप से इतनी फिट नहीं है कि वह मुकाबले में हिस्सा ले सके। बाद में यह जाहिर हुआ कि वह भी ऐसे शोषण की शिकार लड़कियों में से एक थी, और अमेरिका में ओलंपिक में पहुंचने वाली बच्चियां तक का शोषण करने वाला यह प्रशिक्षक लंबे समय तक किसी कार्रवाई से बचे रहा, शिकायतें अनसुनी होती रही, और जाने कितने दर्जन लड़कियों को इस यातना से गुजरना पड़ा जो कि जिंदगी भर उनका पीछा नहीं छोड़ेगी। हिंदुस्तान में पढ़ाई, खेलकूद, और सभी किस्म की दूसरी जगहों पर लड़कियों और महिलाओं के देह शोषण की कोशिश चलती ही रहती है, और इस देश का इंतजाम इतना घटिया है कि वह मुजरिम की शिनाख्त तो हो जाने पर भी उसे 10-20 बरस तक तो कानूनी लुकाछिपी का मौका देते रहता है। छत्तीसगढ़ में ही ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें सारे सबूतों के बावजूद 5 से 10 बरस तक ना तो पिछली रमन सरकार ने अपने अफसरों पर कार्यवाही की, और ना ही पिछले ढाई साल की भूपेश सरकार ने ऐसे मामलों को एक इंच भी आगे बढ़ाया। ऐसे में किसकी हिम्मत हो सकती है कि वे शिकायत लेकर जाएं और सारी कार्रवाई के बावजूद, सारे सबूतों के बावजूद, केवल अदालतों में वकील खड़े करते रहें, लड़ते रहें,  और कोई इंसाफ ना पाएं।

दूसरी तरफ हिंदुस्तानी समाज के बारे में भी यह सोचने की जरूरत है कि संस्थागत शोषण से परे जब परिवारों के भीतर बच्चों का देह शोषण होता है तो ऐसे अधिकतर मामलों के पीछे परिवार के लोग, रिश्तेदार, या घर में आने-जाने वाले लोग, घरेलू कामगार ही रहते हैं। लेकिन जब बच्चे शिकायत करते हैं तो आमतौर पर मां-बाप ही अपने बच्चों की शिकायतों को अनसुना कर देते हैं, उस पर भरोसा नहीं करते क्योंकि उससे परिवार या सामाजिक संबंधों का बना-बनाया ढांचा चौपट हो जाने का खतरा उन्हें अधिक गंभीर लगता है। जो अपने बच्चों की हिफाजत से अधिक महत्वपूर्ण अपने पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को मानते हैं, ऐसे मां-बाप को क्या कहा जाए। लेकिन हिंदुस्तान में बच्चों के यौन शोषण में अधिकतर मामले इसी किस्म के हैं। बच्चे और बच्चियां न तो घर-परिवार में सुरक्षित हैं, और न ही किसी संस्थान में। ऐसी ही वजह रहती हैं जिनके चलते हुए गरीब मजदूरों के परिवार अपनी बच्चियों का बाल विवाह कर देते हैं कि किसी हादसे के पहले अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली जाए, और बच्ची के हाथ पीले कर दिए जाएं। उसके बाद उसकी हिफाजत उसके ससुराल की जिम्मेदारी रहेगी। जिन गरीब घरों में मां-बाप दोनों काम करने बाहर जाते हैं, वहां पर अक्सर ही बच्ची की शादी जल्दी कर दी जाती है। यह पूरे का पूरा सिलसिला हिंदुस्तान में लड़कियों पर जुल्म का है, और क्योंकि इस देश का कानून इस कदर कमजोर है कि वह कागज पर तो अपना बाहुबल दिखाता है लेकिन जब उसके इस्तेमाल की बात आती है तो अदालतों का पूरा ढांचा आखिरी दम तक मुजरिम का साथ देता है और शिकायत करने वाले लोग वहां अपराधी की तरह देखे जाते हैं। अभी जशपुर  में जो हुआ है उसके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रदेश के बाकी सभी छात्रावासों और रिहायशी संस्थानों में बच्चे-बच्चियों की हिफाजत की जांच करने के लिए कहा है, देखते हैं कि जिलों के बड़े-बड़े अफसर कितनी गंभीरता से ऐसी जांच करते हैं। \

(Daily Chhattisgarh)