हनुमान के जलाए बिना भी आज जल रहा है श्रीलंका..

10 मई 2022


हिन्दुस्तान में इक्कीसवीं सदी में भी पौराणिक काल में जीने वाले कुछ लोगों को श्रीलंका की आज की दिक्कतों को लेकर मजा आ रहा होगा कि रावण की लंका जल रही है, लेकिन जो लोग लोकतंत्र को समझते हैं, और जो लोग रामायण काल से निकलकर इक्कीसवीं सदी में आ चुके हैं, वे जानते हैं कि पड़ोस की राजनीतिक अस्थिरता और वहां का आर्थिक संकट खुद अपने देश को नुकसान पहुंचाने के अलावा कुछ नहीं करता। इसलिए श्रीलंका की आज की तबाही का बहुत बड़ा बोझ तरह-तरह से हिन्दुस्तान पर भी पड़ेगा जो कि आज इस छोटे से टापू-देश को जिंदा रहने में मदद कर रहा है। श्रीलंका के साथ रामायण काल के संघर्ष की कहानी अलग रही, अभी तो पिछले दशकों में हिन्दुस्तान ने लगातार श्रीलंका का साथ दिया है, और जब वहां सिंहलों और तमिलों के बीच गृहयुद्ध चल रहा था तब भी हिन्दुस्तानी फौजों ने जाकर वहां की सरकार की मदद की थी, और अमन-बहाली में हाथ बंटाया था।

श्रीलंका के ताजे हालात बहुत ही फिक्र के हैं, देश के लोगों की रोजमर्रा की सबसे बुनियादी जरूरतों के सामान भी वहां नहीं हैं, सरकार के पास पैसे नहीं हैं, जहां-जहां से कर्ज मिल सकता है, सब लिया जा चुका है, और अब पड़ोस के भारत, बांग्लादेश, और चीन की मदद से श्रीलंका के लोग किसी तरह जिंदा हैं। हालात सरकार के काबू के बाहर हो चुके हैं, लोगों का भरोसा नेताओं पर से उठ गया है, कल राष्ट्रपति के भाई प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया है, और यह सत्तारूढ़ कुनबा देश की इस बदहाली के लिए अकेला जिम्मेदार करार दिया जा रहा है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, और दूसरे दो मंत्री, पूरा देश इसी कुनबे के शिकंजे में था, और इसकी मनमानी ने आज देश को डुबाकर रख दिया है। लेकिन इस राजपक्षे परिवार को कोसने के अलावा दो-तीन और बातों को भी सोचना-समझना जरूरी है जो कि श्रीलंका की आज की तबाही के पीछे जिम्मेदार रही हैं। जिस कोरोना-लॉकडाऊन ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को तबाह किया, उसने श्रीलंका से भी पर्यटन-उद्योग तकरीबन छीन ही लिया। सैलानियों से होने वाली कमाई पर देश बहुत हद तक टिके रहता था, और वह एक तो कोरोना की वजह से गायब हुई, दूसरा 2019 में ईसाई त्योहार ईस्टर के दिन श्रीलंका में चर्चों और होटल पर हुए आतंकी हमलों में ढाई सौ से अधिक लोग मारे गए थे, और पांच सौ से अधिक जख्मी हुए थे। इसने भी कोरोना के पहले ही श्रीलंका से पर्यटक छीन लिए थे। दूसरी बात यह कि श्रीलंका के सनकी प्रधानमंत्री महिन्दा राजपक्षे ने पिछले बरस अचानक यह फैसला लिया कि अब देश में कोई भी रासायनिक खाद नहीं आएगा, और सिर्फ आर्गेनिक खाद इस्तेमाल किया जाएगा। बिना किसी वैज्ञानिक और आर्थिक विश्लेषण के लिया गया यह सनकी फैसला श्रीलंका के अनाज उत्पादन की कमरतोड़ गया, और देश भर में किसानों और ग्राहकों दोनों में दहशत फैल गई, और कीमतें अंधाधुंध बढ़ गईं। अब हालत यह है कि किसानी के लिए न रासायनिक खाद है, न आर्गेनिक खाद है, और न ही ट्रैक्टर या पंप के लिए देश में डीजल रह गया है। लोगों के पास बच्चों को पिलाने के लिए दूध नहीं रह गया, अनाज नहीं रह गया, बिजली नहीं है, और हिन्दुस्तान से पहुंचने वाली मदद को देश के दूसरे हिस्सों में पहुंचाने के लिए ट्रकों के लिए डीजल भी नहीं है।

श्रीलंका में ऐसी तबाही की नौबत उस वक्त भी नहीं हुई होगी जब रामायण के कथा के मुताबिक हनुमान वहां आग लगाकर लौटे थे। आज हालत यह है कि वहीं की जनता ने प्रधानमंत्री के एक पारिवारिक घर को आग लगा दी है, भूखी जनता सडक़ों पर है, और रात भर में पांच मौतें हो चुकी हैं। कल जब सत्तारूढ़ पार्टी के एक सांसद को लोगों ने घेर लिया, तो पहले तो उसने भीड़ पर गोलियां चलाईं जिनमें एक व्यक्ति मारा गया, और फिर बुरी तरह घिर जाने के बाद उस सांसद ने अपने आपको गोली मार ली।

श्रीलंका की इस मुसीबत का कोई मुश्किल इलाज भी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जितना कर्ज श्रीलंका ले चुका है, उसके बाद उनसे कुछ और पाने की कोई उम्मीद नहीं है। भारत-बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के मदद करने की भी एक सीमा है, और वह भी अधिक दूर नहीं है। चूंकि हिन्दुस्तान का तमिलनाडु श्रीलंका के एकदम करीब है, और श्रीलंका में एक बड़ी तमिल आबादी है, और चूंकि उन तमिलों की मदद करना तमिलनाडु में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है, इसलिए वैध या अवैध तरीके से इन शरणार्थियों का तमिलनाडु आना जारी रहेगा, और यह भारत पर एक बड़ा बोझ भी रहेगा। इस नौबत में यह भी सोचने की जरूरत है कि क्या इन लोगों में से भारत में शरण मांगने वाले लोगों की कोई जगह यहां बन पाएगी क्योंकि अभी दो दिन पहले की ही खबर है कि पाकिस्तान से आए हुए सैकड़ों हिन्दुओं को भारत में नागरिकता नहीं मिल पाई, और उन्हें वापिस पाकिस्तान जाना पड़ा। ऐसे में श्रीलंका से आने वाले तमिल शरणार्थियों का भारत में क्या भविष्य होगा यह सोच पाना बड़ा मुश्किल है। यह भी है कि भारत अपनी इस ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से मुंह भी नहीं चुरा सकेगा, जैसा कि उसने म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों के बारे में किया है। श्रीलंका से आ रहे तमिल लोग भारत के तमिलनाडु के लोगों के स्वजातीय हैं, और उनको अनदेखा करना भारत के लिए मुमकिन नहीं रहेगा।

आज श्रीलंका के भयानक हालात का कोई इलाज नहीं दिख रहा, लेकिन भारत पर उसका बोझ जरूर दिख रहा है। यह ऐसा मौका है जब भारत को पड़ोसी की मदद करने के अलावा अपनी फौजी रणनीति के तहत भी श्रीलंका का साथ देना होगा, क्योंकि अगर वह साथ नहीं खड़े रहा तो श्रीलंका का चीन के और करीब चले जाना तय रहेगा, जो कि हिन्दुस्तान को आज दी जा रही मदद के मुकाबले अधिक महंगा पड़ेगा। आने वाले कई महीने श्रीलंका इस नौबत से उबरने वाला नहीं है, लेकिन उसकी मिसाल ने बाकी देशों के सनकी नेताओं के मनमाने फैसले लेने के नुकसान की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा है, और यह दुनिया के लिए एक बड़ी सबक है।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 9 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)

धर्म के नाम पर चलते शिक्षण-संस्थानों में बच्चों का यौन शोषण आम बात

9 मई 2022


उत्तरप्रदेश के मेरठ में अपना एक निजी मदरसा चलाने वाले मुफ्ती ने वहां पढऩे वाले ग्यारह बरस के एक बच्चे से 19 बार रेप किया है। ईद के दिन घर गए बच्चे ने घरवालों को यह पूरा मामला बताया और यह भी बताया कि वह दूसरे बच्चों के साथ भी ऐसी ही हरकत करता है। इसके बाद परिवार पुलिस तक पहुंचा, रिपोर्ट लिखाई, और जांच में पता लगा कि मदरसे का मुफ्ती और बच्चों के साथ भी ऐसा करते आया है। मदरसे में चौबीस बच्चे रहते हैं, और अपनी खुद की जमीन पर इस मुफ्ती ने अवैध मदरसा खोल रखा है, और बरसों से बच्चों के साथ ऐसी हरकत करते आया है। जाहिर है कि मदरसे में पढऩे आए हुए बच्चे गरीब परिवारों के होंगे, और इसीलिए वे मुफ्त में मिलने वाली पढ़ाई के लिए यहां आकर रह रहे होंगे। धर्म की ऐसी पढ़ाई कुछ मठ-मंदिरों के साथ जुड़ी संस्कृत शालाओं में भी होती है, और वहां भी गांव-गांव से गरीब परिवारों के बच्चों को लाकर रखा जाता है। ईसाई स्कूलों और हॉस्टलों में पादरियों द्वारा बच्चों से बलात्कार का सैकड़ों बरस से चले आ रहा इतिहास है, पहले तो रोमन कैथोलिक चर्च के मुख्यालय, वेटिकन के पोप ने इस जुर्म को छुपाने की बड़ी कोशिश की, लेकिन फिर जब दुनिया के कई देशों से बच्चों के यौन शोषण के मामले बड़ी संख्या में आने लगे तो चर्च को अपने लोगों के इस जुर्म को मंजूर करना पड़ा, और एक सार्वजनिक माफी भी मांगनी पड़ी। लोगों को अगर याद होगा तो अमरीका में हरे कृष्ण आंदोलन, इस्कॉन, के आश्रम-स्कूल के छात्रों के साथ दशकों तक यौन शोषण चलते रहा, और ऐसे दर्जनों बच्चों में तीन साल से अठारह साल तक के उम्र के लडक़े और लड़कियां दोनों थे। इन बच्चों के साथ आश्रम शाला में मारपीट भी की जाती थी, और उन्हें बहुत भयानक स्थितियों में रखा जाता था। यह मामला अदालत तक पहुंचने पर बहुत बड़ी रकम चुकाकर अदालत के बाहर इसका निपटारा किया गया। बच्चों के ऊपर ऐसे जुल्म पर अमरीका में एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई गई थी।

जहां कहीं धर्म से जुड़ी हुई कोई बात आती है, तो वहां लोगों का तरह-तरह से शोषण होना तय रहता है। धर्म का लबादा पहनकर आसाराम ने अपने आपको बापू कहलवाना शुरू किया, बड़े-बड़े मुख्यमंत्रियों को अपने पैरों पर बिछवाने का शौक पूरा किया, और अपने ही छात्रावास की एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार किया जो कि इतना पुख्ता मामला साबित हुआ कि आज तक आसाराम को हिन्दुस्तान की किसी अदालत से कोई राहत नहीं मिली। फिर यह भी है कि धर्म के नाम पर सिर्फ औरत-बच्चों को ही जुल्म नहीं सहने पड़ते, पंजाब-हरियाणा में बिखरे हुए राम-रहीम के भक्त मर्दों को भी ऑपरेशन से बधिया बनाया जाता था, और उसकी भयानक कहानियां जांच एजेंसियों के पास बयान की शक्ल में हैं। दरअसल धर्म लोगों को अंधविश्वासी भक्तों के समर्पित तन-मन तक ऐसी पहुंच दे देता है कि वे मनचाहे बलात्कार कर सकते हैं, लोगों को मानसिक गुलाम बनाकर रख सकते हैं।

आज जब दुनिया में यह अच्छी तरह साबित हो चुका है कि बचपन से बच्चों को धर्म की शिक्षा में डालने का मतलब उन्हें अशिक्षित बनाने से अधिक कुछ नहीं है, तो ऐसे में किसी भी धर्म का समाज जब ऐसी शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा देता है, तो वह अपनी अगली पीढ़ी को अनपढ़ और कमअक्ल, धर्मान्ध और दकियानूसी तैयार करता है। चाहे किसी भी धर्म का मामला हो, छोटे बच्चों को धर्म का चोगा पहने हुए शिक्षकों के हवाले करने का मतलब उन्हें बलात्कार के खतरे में डालना होता है। आज जो धार्मिक संगठन अपने धर्म की रक्षा के नाम पर, उसके विस्तार के लिए ऐसी धार्मिक शिक्षा शुरू करते हैं, वे सिर्फ अपने धर्म के गरीब और अनपढ़ लोगों को बेवकूफ बनाने का काम करते हैं क्योंकि ऐसे संस्थानों में पढऩे वाले बच्चे अपनी जिंदगी बर्बाद करने के अलावा और कुछ नहीं करते। धर्म का झांसा इतना तगड़ा रहता है कि गरीब मां-बाप उसमें तुरंत फंसते हैं, और यह सवाल भी उन्हें नहीं सूझता कि उनके धर्म के मठाधीश अपने बच्चों को पढऩे के लिए कहां भेजते हैं। आज अगर दुनिया के किसी भी देश में बच्चों को पढ़ाई के नाम पर सिर्फ धर्मशिक्षा देने के ऐसे सिलसिले का विरोध किया जाएगा, तो ऐसी आधुनिक और वैज्ञानिक पहल का धर्म की ओर से जमकर विरोध होगा। लेकिन अगर वैज्ञानिक सोच के मामले में पिछड़े हुए किसी धर्म के समाज को आगे बढ़ाना है, तो उसे शिक्षा के नाम पर सिर्फ धर्मशिक्षा देने से रोकना होगा। आज हिन्दुस्तान में जो बच्चे सिर्फ संस्कृत पाठशाला में पढ़ाए जा रहे हैं, मदरसे में पढ़ाए जा रहे हैं, क्या उनका कोई भविष्य है? या फिर वे धर्म के नाम पर मुफ्तखोरी करने के लिए तैयार किए जा रहे हैं जिनका रोजगार तब तक चलता रहेगा जब तक धर्म ईश्वर का झांसा देने में कामयाब रहेगा?

धर्म के नाम पर चलने वाले ऐसे संस्थान जहां भी रहेंगे, और जिनमें गरीब बच्चों को रखकर पढ़ाया जाएगा, वहां पर बच्चों के शोषण का ऐसा खतरा भी बने रहेगा। अब इस एक मदरसे में दर्जनों बच्चों से बरसों तक अगर सेक्स-शोषण चलते रहा था, तो उसका कैसा असर इन बच्चों पर पूरी जिंदगी के लिए पड़ा होगा? सरकारों और समाजों को आज के वक्त की जरूरत को समझना चाहिए और अपने बच्चों का वर्तमान और भविष्य दोनों बचाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 8 मई 2022

 

 

(Daily Chhattisgarh)

बिना ऑनर वाले समाज में लोकप्रिय ऑनर-किलिंग

8 मई 2022


हैदराबाद में अभी एक नए किस्म का लवजिहाद हुआ। लडक़ी मुस्लिम थी, और लडक़ा हिन्दू धर्म का दलित। दोनों ही गरीब भी थे, और कॉलेज पढ़ते हुए मोहब्बत हुई, और लडक़ी के भाई की मर्जी के खिलाफ जाकर इन दोनों ने शादी कर ली। हिन्दुस्तान में आमतौर पर मुस्लिम लडक़े और हिन्दू लडक़ी की शादी को हिन्दू संगठनों ने, और भाजपा ने लवजिहाद का नाम दिया है, लेकिन यहां मामला उल्टा था। शादी के कुछ दिनों के भीतर ही लडक़ी के भाई ने अपने एक रिश्तेदार के साथ मिलकर इस दलित बहनोई को खुली सडक़ पर लोगों के बीच मार डाला। बहन देखती रह गई, रोकती रह गई, लेकिन चाकू के हमले तब तक जारी रहे जब तक वह मर नहीं गया।

हिन्दू लडक़ी के मुस्लिम लडक़े से शादी करने पर उसका धर्म बदल जाने का एक मुद्दा रहता है, और कुछ मामलों में खानपान का भी मुद्दा रहता है। हिन्दू समाज का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिमों को नीची नजर से भी देखता है, इसलिए ऐसी शादी को भी सामाजिक अपमान मान लिया जाता है, और हर बरस ऐसे कई कत्ल होते हैं जिन्हें मीडिया में ऑनर-किलिंग लिखा जाता है, और जिनसे किसी का भी ऑनर जुड़ा नहीं रहता। लेकिन इस मामले में मुस्लिम और दलित परिवार के लडक़े-लड़कियों के बीच सामाजिक प्रतिष्ठा का इतना बड़ा मुद्दा शायद न रहा हो, लेकिन लडक़ी के भाई को बहन का दूसरे धर्म में शादी करना नहीं सुहाया, और उसने बहन को विधवा कर दिया, और खुद जेल चले गया।

हिन्दुस्तान में जितने किस्म की ऑनर-किलिंग देखी जाए, वे सबकी सब लड़कियों और महिलाओं को लेकर ऑनर, यानी सम्मान, की एक जनधारणा से जुड़ी रहती हैं। किसी लडक़ी या महिला से बलात्कार हो तो बलात्कारी के परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा कम हो या न हो, बलात्कार की शिकार के परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा खत्म ही मान ली जाती है। पोशाक और रहन-सहन को लेकर हजार किस्म की बंदिशें लड़कियों और महिलाओं पर ही लगाई जाती हैं, परिवार से लेकर स्कूल-कॉलेज तक उनके लिए नियम बनाए जाते हैं, और खाप पंचायतें यह तय करती हैं कि लड़कियों को मोबाइल फोन इस्तेमाल न करने दिए जाएं, उन्हें जींस न पहनने दिया जाए। हिन्दुस्तानी मर्दों के एक बड़े हिस्से ने अपने परिवार और अपनी जात-बिरादरी की लड़कियों और महिलाओं के लिए एक तालिबान जाग उठता है, और तरह-तरह की बंदिशें लगाने लगता है।

इस देश की बहुत सी जिम्मेदार और ताकतवर कुर्सियों पर बैठे हुए मंत्री, केन्द्रीय मंत्री, और मुख्यमंत्री तक महिलाओं को लेकर हिंसक और दकियानूसी बातें करते हैं, और उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक साबित करने की फूहड़ कोशिश करते हैं। इस मामले में अधिकतर राजनीतिक दलों के लोग बढ़-चढक़र मुकाबला करते हैं, और बलात्कार की शिकार लड़कियों पर लांछन लगाने में ममता बैनर्जी जैसी महिला नेता भी पीछे नहीं रहतीं जिन्होंने इस किस्म की घटिया और हिंसक बातों को अपनी आदत में शुमार कर लिया है। अकेले मनोहर लाल, या योगी आदित्यनाथ को क्यों कोसा जाए जब संघ परिवार और भाजपा के बाहर के आजम खान सरीखे तथाकथित समाजवादी नेता भी बलात्कार की शिकार बच्ची की नीयत पर शक करके उसे राजनीतिक साजिश का हिस्सा करार देते हैं, और सुप्रीम कोर्ट की लात पडऩे पर बिलबिलाते हुए मजबूरी में माफी मांगते हैं।

दो दिन पहले हैदराबाद में जिस तरह की एक मुस्लिम नौजवान ने अपने बहनोई को मारकर बहन को विधवा कर दिया है, उसकी सोच पर मुस्लिम समाज के भीतर की वह कट्टरता तो हावी रही ही होगी जो कि मुस्लिम लडक़ी को दूसरे, तीसरे, या चौथे दर्जे का इंसान करार देती है, बल्कि उसके साथ-साथ उसके दिमाग पर देश का यह माहौल भी हावी रहा होगा कि परिवार की लडक़ी अगर अपनी मर्जी से ऐसा बड़ा फैसला लेती है तो वह भी पूरे परिवार के लिए अपमानजनक है, और उसकी सजा दी जानी चाहिए।

लोगों के बीच अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की धारणा इतनी मजबूत है, अपने धर्म, अपनी जाति, अपनी संपन्नता, और ताकत का अहंकार इतना बड़ा है कि वे परिवार की लडक़ी के किसी प्रेमप्रसंग, या पसंद की शादी पर सजा देने के लिए खुद ही जुर्म करते हैं, तथाकथित ऑनर-किलिंग के मामलों में अहंकार इतना बड़ा रहता है कि वे भाड़े के हत्यारे भी नहीं ढूंढते, और अपने हाथों हिसाब चुकता करके अपनी खोई इज्जत वापिस पाने की कोशिश करते हैं। यह बात भी तय है कि सोचे-समझे ऐसे कत्ल के पहले इन लोगों को यह भी अहसास रहता होगा कि इसके बाद वे कई बरस कैद में रहेंगे, या उम्रकैद, या फांसी भी हो सकती है, लेकिन इनका अहंकार ऐसी सजा के खौफ से भी ऊपर रहता है।

ऐसे मामलों में सरकार, पुलिस, और अदालतें कर भी क्या सकते हैं? हर किसी की हिफाजत के लिए उनके साथ पुलिस तो लगाई नहीं जा सकती, और ऐसे कत्ल के बाद गिरफ्तारी और सजा दिलवाने की बात ही सरकार के काबू की बात रहती है। लेकिन जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक ऐसी हत्याएं नहीं रूक सकतीं। जब लोग जानते-समझते कत्ल करते हैं, थाने जाकर खुद अपने को पुलिस के हवाले कर देते हैं, सजा काटने को वे इज्जत वापिस पाना समझते हैं, तो फिर उन्हें रोकना मुमकिन नहीं है।

फिर इस मामले में जिस हैदराबाद शहर की बात है, वह एक विकसित और बड़ा शहर है। ऐसे में यहां पर शहरीकरण के थोड़े से असर की उम्मीद की जा सकती थी, लेकिन वह शायद इसलिए नहीं हो पाई कि बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी के चलते हुए यह शहर मुस्लिम सोच का एक कबीला भी बना हुआ है, और धर्म के सबसे कट्टर लोगों का जमावड़ा ऐसे में हो जाता है। जब किसी धर्म के लोग कबीलाई अंदाज में बड़ी संख्या में इक_ा रहते हैं, तो वह धर्म की कट्टरता को बढ़ाने का काम करता है, कट्टरता को घटाता नहीं है। किसी भी धर्म, जाति, पेशेवर-तबके की भीड़ उसके बीच के सबसे घटिया लोगों को मुखिया बनने का मौका देती हैं, और उनके असर में समाज के लोगों का रूख किसी भी बदलाव के खिलाफ बड़ा हिंसक हो जाता है।

बिना सामाजिक बदलाव के पुलिस और अदालत की कितनी भी कड़ी कार्रवाई कट्टरता को शायद ही घटा सके। शहरीकरण से जो उम्मीद है वह भी पूरी होते नहीं दिख रही, और पढ़ाई-लिखाई भी किसी को बेहतर इंसान बनाने में मदद करती हो, ऐसा कहीं साबित नहीं होता। ऐसे में हिन्दुस्तान जैसे पाखंडी देश में अलग-अलग धर्म के लोगों के बीच, अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच शादियों को बढ़ावा देने, और उनके लिए बर्दाश्त बढ़ाने की जरूरत है। तब तक ऐसी हिंसा जारी रहेगी, और जब वह मरने-मारने तक पहुंचेगी, तो ही लोगों को उसके बारे में पता चलेगा।

(Daily Chhattisgarh)

 

वकील केस लेते हुए अपनी पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता की फिक्र करें?

  8 मई 2022


कांग्रेस पार्टी के एक बड़े नेता, भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री, और देश के एक कामयाब वकील पी.चिदम्बरम अभी जब एक मामले की सुनवाई में कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचे, तो उन्हें दर्जनों वकीलों के विरोध का सामना करना पड़ा। वे जिस मामले में वहां एक कंपनी की तरफ से अदालत में खड़े हुए थे, उस कंपनी के खिलाफ बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने यह मुकदमा किया हुआ है, और यह कंपनी इस मामले में बंगाल की तृणमूल सरकार के साथ एक कारोबार में है। इस तरह चिदम्बरम न सिर्फ एक कांग्रेस नेता के दायर किए मुकदमे के खिलाफ वकील थे, बल्कि वे एक किस्म से तृणमूल कांग्रेस के साथ सौदे में शामिल कंपनी के भी वकील थे, यानी तृणमूल कांग्रेस के भी हिमायती थे।

कलकत्ता हाईकोर्ट में जिन वकीलों ने चिदम्बरम का विरोध किया उनके खिलाफ नारे लगाए, और बदसलूकी करते हुए कहा कि वे चिदम्बरम पर थूकते हैं। अगर इस विरोध-प्रदर्शन का वीडियो देखें, तो उसमें एक जगह अदालत के अहाते से निकलते हुए चिदम्बरम अचानक अपने कपड़ों को देखते हुए दिखते हैं, यानी विरोध कर रहे किसी वकील ने उन पर थूका भी होगा। यह जाहिर है कि ऐसा विरोध-प्रदर्शन करने वाले वकील कांग्रेस से जुड़े हुए होंगे, और इसीलिए उन्हें कांग्रेस का केन्द्रीय मंत्री रहा हुआ एक वकील पार्टी के नेता की पिटीशन के खिलाफ लड़ते हुए खटका होगा, और यह विरोध हुआ।

अदालतों के बारे में यह माना जाता है कि सबसे बुरे मुजरिमों को भी वकील पाने का हक रहता है। कई मामलों मेें ऐसा होता है कि किसी बहुत छोटे बच्चे से बलात्कार और उसकी हत्या करने वाले मुजरिम के लिए खड़े होने के लिए वकील नहीं मिलते क्योंकि उस शहर के तमाम वकील तय कर लेते हैं कि कोई उसका बचाव नहीं करेंगे। ऐसे में दूसरे शहर से वकील लाए जाते हैं, और ऐसे वकीलों का कोई खास विरोध स्थानीय वकील नहीं करते। लेकिन एक मामला कुछ बरस पहले जम्मू का ऐसा आया था जिसमें एक मुस्लिम खानाबदोश बच्ची के साथ एक मंदिर में पुजारी से लेकर पुलिस तक बहुत से हिन्दुओं ने बलात्कार किया था, और उसे मार डाला था। जब इस मामले की सुनवाई हुई तो इस बच्ची की तरफ से खड़ी होने वाली एक हिन्दू महिला वकील का हिन्दू समाज ने जमकर विरोध किया था, और बहुत से वकीलों ने भी उसे धमकियां दी थीं, उसके खिलाफ प्रदर्शन हुए थे, क्योंकि प्रदर्शनकारियों को यह लग रहा था कि एक मुस्लिम खानाबदोश बच्ची से रेप, और उसके कत्ल के लिए इतने हिन्दुओं को सजा क्यों होनी चाहिए। लोगों को याद होगा कि इन प्रदर्शनकारियों में भाजपा के बड़े नेता भी शामिल थे, और देश का राष्ट्रीय झंडा लेकर जुलूस निकाले गए थे, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं, और भारत माता की जय सहित कई किस्म के हिन्दू धार्मिक नारे भी लगाए गए थे।

अब अगर चिदम्बरम के मुद्दे पर लौटें, तो देश के राजनीतिक दलों में ऊंचे ओहदों पर रहने वाले और सत्तासुख भोगने वाले बहुत से ऐसे वकील रहते हैं जिनके लड़े गए मुकदमे उनकी पार्टी के लिए असुविधा का सामान बनते हैं। कई मामलों में जहां देश मेें धार्मिक और साम्प्रदायिक भावनाओं का ध्रुवीकरण चलते रहता है, उनमें कांग्रेस के कुछ बड़े नेता-वकील जब अल्पसंख्यक तबकों के वकील बनते हैं, तो भी वकालत का उनका यह फैसला उनकी पार्टी के खिलाफ प्रचार में इस्तेमाल किया जाता है, यह साबित किया जाता है कि यह पार्टी बहुसंख्यक समाज के खिलाफ है। ऐसे बहुत से मामले पिछले बरसों में सुप्रीम कोर्ट में आए हैं जिनमें कांग्रेस से जुड़े हुए वकीलों ने गैरहिन्दुओं से जुड़े हुए मामले लड़े, और उन्हें लेकर कांग्रेस को हिन्दूविरोधी साबित करने की कोशिश हुई।

लोगों को याद होगा कि इमरजेंसी के बाद जब जनता पार्टी बनी, और उसमें दूसरे कई विपक्षी दलों के साथ-साथ जनसंघ का भी विलय हुआ था। इसके बाद जनता पार्टी की सरकार बनी, और वह चल रही थी कि पार्टी के भीतर यह मुद्दा उठा कि जिन लोगों की प्रतिबद्धता या संबद्धता आरएसएस के साथ है, वे लोग जनता पार्टी छोड़ दें। ऐसे में जनसंघ के नेताओं ने यह तय किया कि आरएसएस कोई राजनीतिक संगठन नहीं है कि इसे दोहरी सदस्यता माना जाए, और ऐसी बंदिश मानने से उन्होंने इंकार कर दिया। इसके बाद ये नेता जनता पार्टी से बाहर हुए, और वह सरकार कार्यकाल के बीच ही गिर गई।

हम यहां पर किसी राजनीतिक या गैरराजनीतिक संगठन की सदस्यता, या उसके प्रति प्रतिबद्धता को लेकर दोहरी सदस्यता वाली बात तो नहीं कह रहे हैं, लेकिन इतना जरूर सोच रहे हैं कि पार्टी के बड़े नेता रहे वकीलों को क्या अपने पेशे के अदालती मामले छांटते हुए पार्टी के सार्वजनिक हित, उसकी सोच, और उसके दीर्घकालीन फायदों के बारे में भी सोचना चाहिए? कुछ लोग इसे पेशे की व्यक्तिगत आजादी मानेंगे, और इसे छीनने की बात कहने पर पार्टी को ही छोड़ देने को बेहतर कहेंगे, ठीक वैसे ही जैसे कि जनसंघ के नेताओं ने जनता पार्टी छोड़ दी थी। सैद्धांतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता का जब किसी पेशे से टकराव हो, तो लोगों को क्या तय करना चाहिए? अभी तक किसी राजनीतिक दल की ऐसी आचार संहिता सामने नहीं आई है जिसमें अपने सदस्य वकीलों के लिए ऐसी कोई सलाह लिखी गई हो, लेकिन क्या पार्टी के हित में बड़े वकील कुछ मामलों को छोड़ सकते हैं? कुछ किस्म के मामलों से परहेज कर सकते हैं? जो वकील जिंदा रहने की लड़ाई लड़ रहे हैं, वे तो किसी भी किस्म का मामला लडऩे के लिए आजाद होने चाहिए, लेकिन चिदम्बरम, कपिल सिब्बल, रविशंकर, जैसे करोड़पति वकीलों पर क्या वैचारिक प्रतिबद्धता को प्राथमिकता देने जैसी बात पार्टी लागू कर सकती है, या वे खुद इसे मान सकते हैं?

इस बारे में कोई बात सुझाना आज यहां का मकसद नहीं है, लेकिन इस चर्चा को छेडऩा मकसद जरूर है क्योंकि इससे लोगों के बीच इस बारे में बात होगी। मुम्बई की कोई एक्ट्रेस कैसे कपड़े पहन रही है, या नहीं पहन रही है, उस पर बहस के बजाय इस मुद्दे पर बहस होना बेहतर होगा। लोगों को पेशे की अपनी आजादी, और अपने संगठन के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता के बीच खींचतान होने पर क्या करना चाहिए, इस पर लोगों को सोच-विचार जरूर करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 7 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)

नक्सलियों से बातचीत की पेशकश बिना किसी शर्त के आगे बढ़ाने की जरूरत

7 मई 2022


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नक्सलियों से बातचीत की पेश की है। वे पूरे प्रदेश का दौरा कर रहे हैं, और इस दौरान उन्होंने प्रदेश की सबसे बड़ी सुरक्षा-समस्या के बारे में कहा कि भारत के संविधान को मानने और हथियार छोडऩे पर वे माओवादियों के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं। नक्सलियों ने मुख्यमंत्री की इस पेशकश पर कहा है कि वे बातचीत को तैयार हैं लेकिन बस्तर से सुरक्षा बलों को हटाया जाए, सुरक्षा बलों के शिविर हटाए जाएं, नक्सल नेताओं को जेलों से रिहा किया जाए, तभी बातचीत का माहौल बनेगा। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने इस पूरी चर्चा पर आज कहा कि नक्सलियों को अगर बात करनी है तो बिना शर्त के करें, भारतीय संविधान पर विश्वास करें। उन्होंने कहा कि बातचीत की कोई शर्त नहीं होनी चाहिए।

नक्सल मोर्चे पर हर बरस दोनों तरफ के लोग बड़ी संख्या में मारे जाते हैं, उनके अलावा बेकसूर आदिवासी भी नक्सलियों और सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाते हैं, जिनमें से एक तबका उन्हें पुलिस का मुखबिर करार देता है, और दूसरा तबका उन्हें नक्सली बताता है। ऐसे में नक्सल-समस्या, खतरे, और मुद्दे का एक शांतिपूर्ण समाधान ढूंढा जाना जरूरी है। हमारे नियमित पाठक इस बात को जानते हैं कि हम मुश्किल से मुश्किल वक्त पर भी, बड़े हमलों और बड़े हादसों के बीच भी लगातार बातचीत की वकालत करते आए हैं क्योंकि हम यह जानते हैं कि दुनिया में कहीं भी उग्रवाद और आतंकवाद का समाधान सिर्फ बंदूकों से नहीं निकलता है। हर जगह बातचीत से ही रास्ता तैयार होता है, और हिंसा खत्म होती है। उत्तरी आयरलैंड से लेकर भारत के उत्तर-पूर्व तक, और पंजाब के भयानक आतंकी दिनों तक हर कहीं रास्ता बातचीत से ही निकला है।

छत्तीसगढ़ की विधानसभा में पिछले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने यह घोषणा की थी कि वे नक्सल-समस्या को निपटाने के लिए जंगल के बीच भी आधी रात को भी बातचीत के लिए अकेले भी जाने के लिए तैयार हैं। लेकिन उनकी उस घोषणा से भी कोई बात नहीं बनी थी क्योंकि नक्सलियों का रूख बातचीत का नहीं था, तोहमतों का था, उन्होंने सरकार पर हिंसक कार्रवाई करने का आरोप लगाया और कोई बातचीत हो नहीं पाई। लोगों को याद होगा कि भाजपा सरकार के वक्त ही बस्तर इलाके के एक कलेक्टर का नक्सलियों ने अपहरण किया था, और चूंकि वह आईएएस अफसर था इसलिए उसकी रिहाई के लिए सरकार पर अधिक दबाव था। सरकार ने नक्सलियों से बात करने के लिए उनकी पसंद के कुछ मध्यस्थों को लेकर कुछ मौजूदा और रिटायर्ड अफसरों को लेकर एक कमेटी बनाई थी जिसने नक्सलियों की मांगों पर विचार किया था, जेलों में बंद बेकसूर आदिवासियों की रिहाई की थी, उनके खिलाफ मामले वापिस लिए थे, और अपने अफसर को सरकार ने छुड़ाया था। यह सिलसिला कई दिन चला था, और इस कमेटी की बैठक में शामिल अफसर उसके बाद भी राज्य सरकार को हासिल थे, नक्सलियों की पसंद के मध्यस्थ भी मौजूद थे, लेकिन सरकार इस मामले में चूक गई, और बातचीत की टेबल जो कि बन चुकी थी, उसका आगे इस्तेमाल नहीं किया गया। हमने उस वक्त भी इस अखबार में लगातार इस बात को उठाया था कि एक बार किसी तरह से भी बातचीत का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसे आगे बढ़ाना चाहिए था।

अभी सरकार और नक्सलियों के बीच जो बयान आए हैं, वे किसी बातचीत की जमीन को तैयार करने वाले नहीं हैं। बातचीत के लिए तो बिना किसी शर्त के बात होनी चाहिए, फिर चाहे दोनों पक्ष अपना-अपना काम क्यों न करते रहें। बस्तर में नक्सली अपना काम करते रहें, सुरक्षा बल अपना काम करते रहें, लेकिन उनसे परे बैठकर दोनों पक्षों के चुनिंदा लोग या उनके छांटे हुए मध्यस्थ उन मुद्दों पर बात कर सकते हैं जिससे नक्सल हिंसा खत्म हो सके। यह बातचीत किसी दुश्मन देश के साथ होने वाली बातचीत नहीं है जिसके पहले सरहद पार से होने वाले आतंकी हमलों को रोकने की मांग की जाए। हालांकि हम तो इस बात के हिमायती हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच भी तमाम किस्म के संघर्ष के चलते हुए भी बातचीत हो सकती है, और होनी चाहिए। बातचीत की टेबिल पर तो कोई हथियार लेकर आते नहीं हैं, इसलिए बातचीत नाकाम होने पर भी अधिक से अधिक कुछ लोगों के कुछ दिनों की बर्बादी होगी, उससे कोई हिंसा तो बढऩे वाली है नहीं।

किसी लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार की कामयाबी हम इसमें नहीं देखते कि वह किसी हथियारबंद मोर्चे पर कितने उग्रवादियों या आतंकवादियों को मारती है, कामयाबी तो इसमें है कि अपने देश के या किसी दूसरे देश के हथियारबंद समूहों से, दुश्मन लगती सरकारों से बातचीत से किस तरह खून-खराबा खत्म किया जा सकता है, या घटाया जा सकता है। ऐसे में किसी लोकतंत्र में हम निर्वाचित सरकार को बातचीत का माहौल बनाने के लिए अधिक जिम्मेदार मानते हैं क्योंकि हथियारबंद समूहों, नक्सलियों या किसी और में लोकतंत्र के प्रति आस्था तो है नहीं, इसलिए उनके लिए बातचीत का रास्ता इस्तेमाल करने की कोई मजबूरी भी नहीं है। सरकार को अपने सुरक्षा बलों की जिंदगी बचाने के लिए, राज्य के एक बड़े इलाके को हिंसक-संघर्ष से बचाने के लिए, बेकसूर जिंदगियों को बचाने के लिए, और विकास के लिए हथियारों के बजाय बातचीत अपनानी चाहिए। कई बार सार्वजनिक बयानों के मार्फत होने वाली बातचीत की ऐसी पेशकश कामयाब नहीं हो पाती। सरकार तो नक्सलियों के भरोसे के कुछ लोकतांत्रिक लोगों को छांटकर उनके माध्यम से बातचीत करनी चाहिए क्योंकि सरकार की कामयाबी किसी भी तरह बातचीत शुरू करने में रहेगी। जिन लोगों की बात नक्सली सुनते और मानते हैं उनको भी चाहिए कि वे अपने संपर्कों या अपने असर का इस्तेमाल करके नक्सलियों को सहमत कराएं कि उन्हें बातचीत की कोई शर्त नहीं रखनी चाहिए।

अभी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बातचीत की पेशकश की है तो इसे कुछ संभावनाओं तक पहुंचाने की कोशिश की जानी चाहिए। भूपेश बघेल के कुछ ऐसे साथी भी हैं जो कि अपनी अखबारनवीसी की जरूरत के लिए नक्सलियों के संपर्क में रहते आए हैं। उनके टेलीफोन भी पिछली रमन सरकार टैप करती थी, और बाद में एक मुख्य सचिव ने अपनी रिव्यू मीटिंग में ऐसी टैपिंग खत्म करवाई थी। इस सरकार को ऐसे संपर्कों का इस्तेमाल करना चाहिए, और नक्सलियों को बातचीत की जमीन तक लाना चाहिए। प्रदेश की दूसरी लोकतांत्रिक ताकतों और संस्थाओं को भी नक्सल-समस्या सुलझाने में राजनीति करने के बजाय इसे सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। अभी यह पूरी बात दोनों पक्षों के एक-एक बयान तक सीमित है, लेकिन इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)

 

समाचार और विचार के एकाधिकार-कारोबार पर निगरानी की जरूरत

6 मई 2022


दुनिया के एक सबसे बड़े कारोबारी एलन मस्क के ट्विटर खरीदने के बाद अब इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करने वाले लोगों और आजादी के हिमायती, लोकतंत्र की फिक्र करने वाले लोगों में यह अटकल लग रही है कि एलन मस्क की इस नई मिल्कियत का क्या रवैया रहेगा? अभी जो सौदा हुआ है और जो जल्द ही पूरा होने जा रहा है उसके मुताबिक ट्विटर अब शेयर बाजार में दर्ज एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी के बजाय एलन मस्क की एक प्रायवेट लिमिटेड कंपनी रहेगी, और उस पर अकेले उनकी मर्जी चलेगी। इस कारोबार की बहुत बारीकियों तक जाना हमारा मकसद नहीं है, लेकिन यह बात समझने की है कि ट्विटर अब तक कंपनी के हजारों-लाखों शेयर होल्डरों के प्रति जवाबदेह थी, मुनाफे के लिए भी, और अपनी नीतियों के लिए भी। लेकिन अब वह सिर्फ एक अकेले मालिक की पसंद और नापसंद पर चलेगी। हो सकता है कि इस सौदे की वजह से हर बरस कर्ज की जो किस्त चुकानी होगी, उसके चलते हुए एलन मस्क को कई तरह के समझौते भी करने पड़ें, और वे अब तक ट्विटर पर आजादी की जैसी वकालत करते आ रहे थे, उसे पूरा न भी कर पाएं। लेकिन ऐसा न होने पर भी लोगों का यह सोचना तो जारी रहेगा कि आजादी के हिमायती नए मालिक का रूख दुनिया में विचारों को प्रभावित करने वाले इस प्लेटफॉर्म को कैसी शक्ल दे सकता है? इससे दुनिया के अलग-अलग किन हिस्सों में लोकतंत्र पर क्या असर पड़ेगा?

इस बारे में जो चर्चा चारों तरफ चल रही है उनमें यह भी है कि आजादी के मायने अलग-अलग संदर्भ में अलग-अलग होते हैं, और ट्विटर पर ट्रम्प जैसी अराजकता और उस दर्जे के झूठ को भी अगर आजादी दी जाती है, तो वह दुनिया के लोकतंत्र के खिलाफ रहेगी, धरती के हितों के खिलाफ रहेगी। लेकिन अगर यह आजादी ट्विटर पर झूठ, हिंसा, और अश्लीलता पर रोक के साथ रहेगी, तो वह जनकल्याणकारी भी हो सकती है। एक बड़ा फर्क जिसका वायदा एलन मस्क ने किया है उसे ट्विटर से परे भी दूसरे संदर्भों में भी देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा है कि ट्विटर के कम्प्यूटरों का प्रोग्राम, एल्गोरिद्म, किसी ट्वीट को कम या अधिक कैसे दिखाता है, किसे दिखाता है, किससे छुपाता है किस्म की बातें वे सार्वजनिक और पारदर्शी कर देंगे। ऐसा होने पर कम्प्यूटरों के जानकार लोग यह देख-समझ पाएंगे कि अपने एल्गोरिद्म के पीछे ट्विटर की सोच क्या है, उसका तर्क क्या है, उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं। यह बात वैसे तो तमाम सोशल मीडिया पर लागू होनी चाहिए, लेकिन फेसबुक जैसे सोशल मीडिया लगातार अपने एल्गोरिद्म को छुपाते रहते हैं, और फेसबुक इस्तेमाल करने वाले लोगों की जानकारियों का बाजारू इस्तेमाल भी करते हैं, और देशों की जनता को प्रभावित करने की साजिश में शामिल भी होते हैं। इसलिए अगर एलन मस्क के मातहत ट्विटर अधिक पारदर्शी होता है, तो हो सकता है कि वह अधिक लोकतांत्रिक भी हो। बस यही देखने की बात रहेगी कि लोकतंत्र में जिस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ अनिवार्य रूप से जिम्मेदारियां भी जुड़ी रहती हैं, उन्हें ट्विटर आने वाले दिनों में किस तरह लागू करेगा।

एक दूसरी बात जो ट्विटर पर चर्चा से शुरू हो रही है लेकिन जो पूरी दुनिया में लागू होती है, वह है एक मालिक के मातहत काम करने के नफे और नुकसान। यह तो तय है कि एलन मस्क अपने फैसलों को ट्विटर पर पल भर में लागू करवा सकते हैं, लेकिन ये फैसले क्या सचमुच ही जनकल्याणकारी हो सकते हैं, या फिर वे एक कामयाब कारोबारी के एक और कारोबारी फैसले से अलग नहीं रहेंगे? व्यापार हो या सरकार हो, यह बात समझने की है कि किसी व्यक्ति की नीयत कितनी भी अच्छी क्यों न हो, अगर उसके हाथ असीमित ताकत है, तो उसके अपने खतरे रहते हैं। जिस तरह किसी लोकतंत्र में अपार ताकत रखने वाले किसी नेता के साथ होता है, वे शुरू में जनकल्याणकारी लग सकते हैं, बाद में उनके तानाशाही रूख के बावजूद वे जनकल्याणकारी-तानाशाह हो सकते हैं, और उसके बाद लोगों को यह अहसास भी नहीं होता कि जनकल्याणकारी शब्द कब धुंधला हो गया, और कब सिर्फ तानाशाह शब्द बच गया। जिन सरकारों, राजनीतिक दलों, सामाजिक संस्थाओं, में ऐसे जनकल्याणकारी लोग तानाशाही मिजाज के साथ रहते हैं, उनका कल्याण वाला हिस्सा कब तानाशाह हिस्से के सामने कुर्बान हो जाता है, यह पता भी नहीं चलता। हमने हिन्दुस्तान की राजनीति में, सरकारों, और पार्टियों में कई बार ऐसा देखा है कि घोषित रूप से जनकल्याणकारी नेता या कार्यक्रम कब आपातकाल के खलनायक संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रम में बदल जाते हैं, और फिर ये पांच सूत्र भी गायब होकर पांच खलनायकों का एक गिरोह बच जाता है।

इसलिए दुनिया को किसी एक व्यक्ति की अंधाधुंध ताकत को बहुत जनकल्याणकारी मानकर नहीं चलना चाहिए। आज शेयर होल्डरों के प्रति जवाबदेह रहने के बावजूद फेसबुक की कंपनी में उसके संस्थापक और उसे चलाने वाले मार्क जुकरबर्ग की जो मनमानी चल सकती है, या चलती है, उस ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए, और वह कब दुनिया में लोकतंत्र की जगह तानाशाही को जायज ठहराने लगेगी, इस खतरे को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। दुनिया में समाचारों और विचारों को प्रभावित करने वाली मीडिया या सोशल मीडिया कंपनियों पर किस किस्म का मालिकाना हक है, उनका कितना काबू है, इसे कभी भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। आज विकसित दुनिया की खुली बाजार व्यवस्था विचारों के कारोबार पर एकाधिकार को रोक पाने की ताकत नहीं रखती है, लेकिन समाज के लोगों को तो ऐसे खतरों से सावधान रहना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 6 मई 2022


 (Daily Chhattisgarh)