संसद में जरूरत से अधिक बाहुबल से लोकतंत्र को खतरे
25 मई 2022
हिन्दुस्तान में कभी देश की सरकार तो कभी
किसी प्रदेश की सरकार को लेकर राजनीतिक स्थिरता पर बातचीत होती है। पश्चिम
बंगाल में हिन्दुस्तान की सबसे लंबी वाममोर्चा सरकार तीन दशक से अधिक तक
लगातार चली थी। अभी हाल तक छत्तीसगढ़ में बीजेपी की डॉ. रमन सिंह सरकार
पन्द्रह बरस चली थी, और कुछ दूसरे राज्यों में किसी एक पार्टी या एक
मुख्यमंत्री की सरकार इससे भी अधिक समय तक चली हैं। सरकार की लंबाई एक बात
होती है, और सरकार का संसदीय बाहुबल एक दूसरी बात होती है। इस देश में कुछ
पार्टियों का संसदीय बाहुबल देश या प्रदेश की सरकारों को चलाने के लिए
जरूरत से खासा अधिक था, और वैसे में संसदीय कामकाज पर इस अतिरिक्त बाहुबल
का कैसा असर पड़ता है, यह सोचने की बात है।
जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की सहानुभूति लहर के चलते उन्हें कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा संसदीय बाहुबल मिला था। वह सरकार विशुद्ध कांग्रेस की सरकार थी, किसी साथी दल की कोई जरूरत नहीं थी, और उसी का नतीजा था कि शाहबानो पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए राजीव सरकार ने एक संविधान संशोधन किया था जो कि मुस्लिम कट्टरपंथी मर्दों को तो खुश करने वाला था, लेकिन जिसने मुस्लिम महिला के हक पर लात मारी थी। उस वक्त तो फिर भी संसद में इस मुद्दे पर खासी बहस हो गई थी, और अलग-अलग पार्टियों और विचारधाराओं को बोलने का मौका मिला था। लेकिन अभी की मोदी सरकार में जब तीन कृषि कानून बनाए गए, तो उन पर कोई सार्थक चर्चा नहीं होने दी गई, और एनडीए सरकार के भीतर भी भाजपा ने महज अपने ही बाहुबल से इन विधेयकों को कानून बनवा दिया, और इस मुद्दे पर गठबंधन छोडऩे वाले अपने एक सबसे पुराने साथी, अकाली दल के अलग होने से भी भाजपा की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि गठबंधन सरकार के भीतर भी भाजपा अकेली ही सरकार बनाने की गिनती रखती थी।
समय-समय पर देश की संसद ने, और कभी-कभी राज्यों की विधानसभाओं ने भी ऐसे मौके दर्ज किए हैं जब व्यापक जनहित और महत्व वाले विधेयकों को बिना जरूरी चर्चा के बाहुबल के ध्वनिमत से पारित करा दिया गया। लोकतंत्र में संसद को बनाया इसलिए गया है कि वहां पर सरकार से सवाल पूछे जा सकें, देश-प्रदेश के हालात पर जानकारी मांगी जा सके, सरकार को जहां अपने बजट को सामने रखकर लोगों को सरकारी खर्च की योजना बताई जा सके, और कमाई के तरीके गिनाए जा सकें। इसके अलावा जब कभी कोई नए विधेयक आते हैं, संविधान संशोधन की जरूरत रहती है, तो अलग-अलग प्रदेशों, अलग-अलग पृष्ठभूमि, अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा से आए हुए सांसदों की बात को सुना और समझा जा सके, तब उसके बाद कोई नया कानून बनाया जाए, या पुराने को बदला जाए। देश भर से आए हुए सैकड़ों सांसदों की राय सुनना संसदीय लोकतंत्र की एक बुनियाद है, और इस बुनियाद के बिना जब कोई इमारत खड़ी की जाती है, तो एक आंदोलन की आंधी से वह उसी तरह गिर सकती है जिस तरह कृषि कानून औंधे मुंह गिरे।
संसदीय
बाहुबल की अधिकता का एक बड़ा खतरा यह रहता है कि सत्तारूढ़ पार्टी किसी
संसदीय फैसले के लिए किसी भी असहमति को सुनने को मजबूर नहीं रहती, उसे किसी
को सहमत कराने की जरूरत नहीं रहती, और वह संसद के भीतर ठीक उसी तरह कोई
कानून बना या बिगाड़ सकती है जिस तरह वह अपनी पार्टी की बैठक के भीतर कोई
मनमाना फैसला ले सकती है। यह सिलसिला बहुत तानाशाह और खतरनाक तो है ही,
इससे संसदीय व्यवस्था का एक सीधा-सीधा नुकसान भी होता है। जिन लोगों ने
राजनीति और सामाजिक जीवन में दशकों गुजार दिए हैं, ऐसे लोगों से संसद भरी
रहती है। ये लोग हर दिन सैकड़ों लोगों से मिलते हैं, और अलग-अलग मुद्दों पर
जनता की राय से वाकिफ रहते हैं। वैसे तो भारत के मौजूदा संसदीय कानून के
मुताबिक सभी सांसद या विधायक अपनी पार्टी के फैसलों से बंधे रहते हैं, और
उन्हें किसी भी मुद्दे पर अपनी पार्टी के हुक्म के मुताबिक ही वोट डालना
होता है, वरना उनकी सदस्यता खतरे में रहती है। लेकिन ऐसी सीमाओं के भीतर भी
सांसदों की निजी सोच, उनके निजी तजुर्बे बहस में सामने आते हैं, और एक-एक
सांसद बीस-तीस लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और उनके मार्फत उनके
इलाकों के लोगों की सोच संसद के रिकॉर्ड में आने की एक संभावना तो रहती ही
है।
सदन में पार्टी व्हिप से बंधे सांसदों का एक नुकसान देश के संसदीय
लोकतंत्र को यह होता है कि वे पार्टी की घोषित सोच से परे शायद ही कुछ बोल
पाते हैं। ऐसे में देश की जनता के बीच से चुनाव की अग्निपरीक्षा से होते
हुए जो सांसद संसद में पहुंचते हैं, वे अपनी मौलिक बातें वहां बहुत कम कर
पाते हैं। उन्हें पार्टी की तरफ से पहले से बता दिया जाता है कि किस मुद्दे
पर क्या कहना है। इस तरह देश के सबसे चुनिंदा दिल-दिमागों का मौलिक योगदान
संसद और लोकतंत्र को बहुत कम मिल पाता है। पार्टी अनुशासन के नाम पर
भारतीय संसदीय व्यवस्था में सांसदों को इस तरह बांध दिया जाता है कि
लोकतंत्र में विचारों की जो विविधता होनी चाहिए, वह महज पार्टियों की
विविधता तक सीमित रह जाती है। एक तो निजी सोच का खुलकर सामने आना बहुत कम
रह गया है, और फिर पार्टियों के बीच किसी मुद्दे पर बहस भी गैरजरूरी मान ली
गई है क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी बिना बहस भी किसी विधेयक को पास कराने का
बाहुबल रखती है।
भारत के ताजा इतिहास के जानकार लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या अपने भीतर जरूरत से अधिक कड़े अनुशासन वाली पार्टी संसदीय विचार-विमर्श में कम योगदान देने वाली पार्टी भी हो जाती है? दूसरी बात यह कि क्या किसी पार्टी या गठबंधन की जरूरत से अधिक मजबूती पूरी संसद में ही किसी विचार-विमर्श को हाशिए पर धकेल देती है? और चूंकि हिन्दुस्तान ऐसे एक से अधिक दौर देख चुका है जहां सांसदों या पार्टियों की बातों को अनसुना करना किसी दिक्कत की बात नहीं रह गई है, इसलिए ऐसे तरीकों के बारे में सोचना चाहिए कि सांसदों की निजी सोच को देश की बहस की मेज पर किस तरह लाया जा सकता है? पार्टियां इस बात को शायद ही पसंद करें, क्योंकि वे सदन के भीतर अपने सदस्यों को निर्वाचित जनप्रतिनिधि की तरह देखना नहीं चाहतीं, बल्कि पार्टी के एक अनुशासित सिपाही की तरह देखना चाहती हैं। इस तरह जनता के प्रति सांसद की जवाबदेही खत्म हो जाती है, और वह पार्टी के प्रति सौ फीसदी अनुशासन की नौबत बन जाती है। ऐसे में क्या संसद के बाहर एक समानांतर बहस के बारे में सोचा जा सकता है? या फिर पार्टियों का अनुशासन ऐसी भी किसी बात को होने नहीं देगा? लोकतंत्र के भीतर हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर सोच की विविधता वाली बहस का जो महत्व होना चाहिए, वह किसी गठबंधन की सरकार में विपक्ष के वोटों की जरूरत के बीच तो कायम रह सकता है, लेकिन अंधाधुंध गैरजरूरी बाहुबल रहने पर उसकी संभावना शून्य हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र इसका क्या रास्ता निकाल सकता है?
बवंडर में फंसी दुनिया के बीच इतिहास में पहुंचकर गौरव में जीते हिन्दुस्तानी!
24 मई 2022
पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था एक बवंडर में
फंसी हुई दिख रही है। जाहिर तौर पर रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद दोनों के
बीच छिड़ी जंग एक बड़ी वजह है क्योंकि ये दोनों ही देश गेहूं, खाने के
तेल, मक्का, रासायनिक खाद के अलावा भी बहुत सी चीजों के बड़े निर्यातक देश
थे, और आज यूक्रेन के बंदरगाहों पर अनाज फंसा हुआ है, गोदाम भरे हुए हैं,
लेकिन जंग के चलते जहाजों की आवाजाही बंद है। एक अंदाज यह है कि यूक्रेन से
चालीस करोड़ लोगों को अनाज पहुंचता था, जो कि अब बंद है, और यह जंग कब तक
चलेगी इसका कोई ठिकाना भी नहीं है। दुनिया की अर्थव्यवस्था के बवंडर में
फंसने की एक-दो और वजहें भी हैं। कोरोना की महामारी, और उससे जुड़े लॉकडाउन
के चलते दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था चौपट हुई है, और
श्रीलंका-पाकिस्तान सहित सत्तर ऐसे देश हैं जो अपनी किस्त चुकाने की हालत
में नहीं हैं। इसके ऊपर यह मुसीबत भी आ खड़ी हुई है कि चीन ने कोरोना को
लेकर जितने कड़े लॉकडाउन की नीति अपनाई है, उसका सबसे बड़ा कारोबारी शहर,
शंघाई हफ्तों से पूरे लॉकडाउन में चल रहा है, और चीन से कारोबारी संबंधों
वाले देशों पर भी बुरा असर पड़ा है क्योंकि वहां से कच्चा माल और पुर्जे
निकलना बुरी तरह प्रभावित हुआ है, और जाने कब तक यह जारी रहेगा। एक
अर्थशास्त्री के मुताबिक ऐसी ही बाकी सारी मुसीबतों के बीच में
क्रिप्टोकरेंसी का बाजार भी चौपट हो गया है, और उसमें भी बहुत से कारोबारी
डूब सकते हैं। ऐसे में हिन्दुस्तान पूरी दुनिया में बढ़ती हुई महंगाई के
साथ-साथ उसकी मार खा रहा है, और लोगों के लिए रोज की जिंदगी जीना भी
मुश्किल हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़े एक अलग बात रहते हैं
क्योंकि वे अम्बानी-अडानी और बेरोजगारों की कमाई को मिलाकर उसका एक औसत पेश
करते हैं, और इन आंकड़ों में हिन्दुस्तान अभी बहुत बुरी हालत में नहीं दिख
रहा है, कम से कम दुनिया के और देशों के मुकाबले वह ठीक-ठाक हालत में दिख
रहा है।
लेकिन इस तस्वीर को समझते हुए यह भी देखने की जरूरत है कि दुनिया के बहुत से देश कुपोषण और भुखमरी के इस बुरी तरह शिकार हैं, कि वे उसी से नहीं उबर पा रहे हैं, इसलिए वैसे देशों के साथ हिन्दुस्तान की तुलना जायज नहीं होगी, जो कि अपने आपको विकासशील देशों से ऊपर मानता है। दूसरी तरफ दुनिया के बहुत से विकसित और संपन्न देशों की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि वहां के सबसे गरीब लोग भी हिन्दुस्तान के गरीब लोगों के मुकाबले बिल्कुल ही अलग दर्जे के हैं, और वहां सबसे गरीब और बेरोजगार भी ऐसी दिक्कतें नहीं झेलते हैं जैसी कि हिन्दुस्तान में ऐसे तबकों के लोग झेलते हैं। इसलिए अर्थव्यवस्थाओं और देशों की तुलना आसान नहीं है, और पिछले दो-तीन बरस में उनमें क्या तुलनात्मक फर्क पड़ा है, उसे भी महज आंकड़ों से समझ पाना मुश्किल है। हिन्दुस्तानी गरीब इतने गरीब हैं कि उनकी कमाई में पचीस फीसदी की गिरावट उनका एक वक्त का खाना छीन सकती है। आज हिन्दुस्तान में विदेशी मुद्रा के भंडार में रिकॉर्ड गिरावट आई है, और रूपये की डॉलर के मुकाबले कीमत इतिहास में सबसे कम हो गई है। इन दो बातों से आयात और निर्यात दोनों पर फर्क पड़ रहा है, और यह फर्क नीचे गरीब तक और अधिक पड़ रहा है, अमीरों की रोटी पर तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ा है।
लेकिन पूरी दुनिया में चल रहे ऐसे बवंडर के बीच हिन्दुस्तान अपने कुछ ऐसे मुद्दों को लेकर अपने आपमें मस्त है कि जिसे देखकर हैरानी और दहशत दोनों ही होते हैं। जिस देश के पास बिना सरकारी रियायती अनाज के दो वक्त पेट भरने का तरीका नहीं है, उस देश को सरकारी गेहूं-चावल से बांधकर रखा गया है, और उसे सौ-दो सौ बरस पहले ले जाकर बिठा दिया गया है। जिस तरह कम्प्यूटरों के ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर को पहले की किसी तारीख पर भी सेट किया जा सकता है, ताकि उसके बाद के जो फेरबदल नापसंद हैं, उनसे पीछा छूट जाए, कुछ वैसा ही आज हिन्दुस्तान में हो रहा है। सरकारी मुफ्त अनाज नहीं मिलेगा तो कल का खाना कहां से बनेगा, जहां पर ऐसा अनिश्चित भविष्य हो, वहां एक काल्पनिक भूतकाल को प्रमाणिक मानकर बहुसंख्यक आबादी को विज्ञान कथाओं की तरह टाईम-ट्रैवल करवाया जा रहा है। हिन्दुस्तान के इतिहास में एक ऐसा दौर बताया जाता है जब यहां के राजा रास-रंग में डूबे हुए थे, महलों को बनाने और नर्तकियों को नचवाने के शगल से उन्हें फुर्सत नहीं थी, और वैसे में ही विदेशी हमलावर आकर यहां काबिज हो गए थे। हिन्दुस्तान में आज राजकाज इतिहास के चुनिंदा और पसंदीदा गड़े मुर्दों को उखाडक़र एक ऐसे इतिहास को फैलाने के शगल में डूबा हुआ है जिससे न भविष्य का कोई लेना-देना है, न वर्तमान का। एक वक्त कार्ल माक्र्स ने लिखा था कि धर्म अफीम की तरह इस्तेमाल की जाती है, उनकी विचारधारा वाली पार्टियां चाहे आज चुनाव हार रही हों, उनकी यह बात सही साबित हो रही है। जिस तरह किसी बहुत जख्मी या किसी बड़ी बीमारी की तकलीफ से गुजरते हुए इंसान को दर्द भुलाने के लिए नशे के इंजेक्शन लगाए जाते हैं, उसी तरह आज हिन्दुस्तान में लोगों को उनकी मौजूदा तकलीफें भुलाने के लिए, कल की अनिश्चितता का आभास न होने देने के लिए, और आने वाले परसों की प्राथमिकता की तरफ से बेफिक्र रखने के लिए इस अफीम का इस्तेमाल किया जा रहा है। हिन्दुस्तानी बहुसंख्यक आम लोगों को इस अफीम के चलते, इस अफीम से बने हुए एक काल्पनिक इतिहास के चलते तमाम दुख-दर्द से मुक्ति मिल गई है। इस मायने में हिन्दुस्तान दुनिया के बाकी तकलीफजदा देशों से बिल्कुल ही अलग है, क्योंकि धर्म का ऐसा इस्तेमाल तो धर्म आधारित राज वाले हिन्दू या मुस्लिम, या ईसाई देशों में भी नहीं हो रहा है। इतिहास के आटे से बनी रोटी, सदियों पहले ऊगी सब्जी के साथ परोसकर लोगों को तृप्त कर दिया जा रहा है, और बहुसंख्यक जनता का धर्मान्ध हिस्सा डकार भी ले रहा है। ऐसा लगता है कि हकीकत के कुपोषण के शिकार हो जाने तक इस तबके की यह खुशफहमी जारी रहेगी कि वह खा-खाकर अघा रहा है, और उसे अपचन भी हो रहा है, और सोशल मीडिया के मुताबिक उसके लिए हाजमोला लेना प्रतिबंधित भी है क्योंकि उसमें हज भी है, और मौला भी है।
हिन्दुस्तान में एक ऐसे जानवर की बात बहुत से मुस्लिम इलाकों में कही जाती है जो कि कब्र तक सुरंग बनाकर दफनाई हुई लाशों को खाकर अपना काम चलाता है, उसे कबरबिज्जू कहा जाता है। दफनाए हुए इतिहास को खाकर जिंदा रहने वाले जानवरों को पता नहीं कौन सा बिज्जू कहा जाएगा।
नीचे का यह पहला पैरा, और उसके आगे की बात
23 मई 2022
देश में यह बहस चल रही है कि किस तरह
बहुसंख्यक आबादी के मुकाबले अल्पसंख्यक आबादी बढ़ते चल रही है, और कितने
दशक में वह आज की बहुसंख्यक आबादी को पार कर जाएगी। इसे देश के भीतर आज के
अल्पसंख्यकों में अधिक प्रजनन दर से भी जोडक़र देखा जा रहा है, और देश की
सरहद के पार से आकर वैध या अवैध रूप से बसने वाले लोगों की वजह से बढ़ती
हुई आबादी भी माना जा रहा है। इन दोनों ही मिलीजुली वजहों से ऐसा अंदाज
लगाया जा रहा है कि आज की बहुसंख्यक आबादी 2045 तक बहुसंख्यक नहीं रह
जाएगी, वह आधे से कम रह जाएगी, वह सबसे बड़ा तबका तो रहेगी, लेकिन बाकी
तमाम तबके मिलकर उससे अधिक आबादी के हो जाएंगे। आबादी की शक्ल बदलने के इस
अंदाज को एक राजनीतिक साजिश भी करार दिया जा रहा है, और यह व्याख्या फैलाई
जा रही है कि वोटों को पाने के लिए कुछ राजनीतिक ताकतें, पार्टियां
सोच-समझकर एक साजिश की तरह यह काम कर रही हैं, और आज के अल्पसंख्यक
समुदायों को बढ़ावा दे रही हैं, और वैसे ही समुदायों के लोगों को अवैध रूप
से या वैध रूप से देश में घुसा भी रही हैं।
जिन लोगों को यह लग रहा होगा कि आज हम भारत की यह चर्चा क्यों कर रहे हैं, उन्हें यह जानकर हैरानी होगी कि यह हिन्दुस्तान नहीं, अमरीका के बारे में है। वहां पर श्वेत नस्लवादी समूहों के बीच, उनके द्वारा चारों तरफ यह व्याख्या बरसों से फैलाई जा रही है कि वहां के गोरे अमरीकियों के मुकाबले काले और दूसरे अश्वेत तबके बढ़ते जा रहे हैं, और वे आने वाले दशकों में गोरे अमरीकियों को बहुसंख्यक नहीं रहने देंगे। इस प्रोपेगंडा को इतने हिंसक तरीके से फैलाया जा रहा है कि अभी एक अठारह बरस के गोरे नौजवान ने इसी सिद्धांत को मानते हुए, इसी पर लिखी गई अपनी डायरी और अपने बयान को ऑनलाईन पोस्ट करते हुए, बंदूक और कैमरे से लैस होकर, ऑनलाईन लाईव प्रसारण करते हुए दस काले लोगों को मार डाला। अमरीका में इस सोच को रिप्लेसमेंट थ्योरी कहा जाता है, और यह गोरे नस्लवादी लोगों के लिए उनके सबसे बड़े धार्मिक ग्रंथ की तरह है। डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी इसी थ्योरी को बढ़ावा देते हुए गोरे अमरीकियों को एक करने में लगी रहती है, और इसी वजह से गोरे नस्लवादी हिंसक समूहों के बीच रिपब्लिकन पार्टी पसंदीदा तो है ही, इसके अधिक नस्लवादी नेता, डोनल्ड ट्रंप ऐसे हिंसक समूहों के आदर्श नायक भी रहे हैं। यहां यह समझने की जरूरत है कि हिंसक गोरे नस्लवादियों का यह विरोध एक समय काले लोगों के खिलाफ शुरू हुआ था, फिर वह सभी किस्म के गैरगोरों को निशाने पर लेकर चलते रहा, और अब तो उसने अमरीका में बसे हुए यहूदियों को बहुत बड़ा खतरा माना है, और वह उनके भी खिलाफ हिंसक तेवरों के साथ सोशल मीडिया, और सडक़ों पर बराबरी से लगा हुआ है।
अब एक गोरे नस्लवादी जवान ने हर अमरीकी को आसानी से हासिल भारी खतरनाक ऑटोमेटिक हथियार की सहूलियत का इस्तेमाल करके छांट-छांटकर एक काले इलाके में डेढ़ दर्जन लोगों को गोलियां मारी, और उसमें से दस लोग मारे गए, उस खतरे को हिन्दुस्तान जैसी जगह पर भी समझने की जरूरत है जहां पर हथियार इतनी आसानी से हासिल नहीं है। लेकिन लोगों को यहां पर हिंसक सोच को रखने और उससे गौरवान्वित हुए घूमने की आजादी हासिल है। लोगों को याद रखना चाहिए कि आजाद हिन्दुस्तान के पहले आतंकी नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या की, तो उसे कई लोगों का साथ और सहयोग हासिल था। उसने भी एक साम्प्रदायिक नफरत की सोच लिए हुए इस देश के सबसे महान इंसान को मारा था। उस वक्त अमरीका में ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी लिखी भी नहीं गई थी, लेकिन वह नस्लवादी नफरत और हिंसा की शक्ल में जर्मनी के हिटलर से हासिल थी, और हिन्दुस्तान के भीतर भी उस सोच की एक मौलिक जगह थी। आज यह समझने की जरूरत है कि अमरीका में अठारह बरस का एक नौजवान दुनिया के सबसे अधिक मौकों वाले देश में नफरत के चलते जिस किस्म का हत्यारा बनने में गौरव हासिल कर रहा है, उस किस्म का हत्यारा बनने का गौरव हिन्दुस्तान में भी जगह-जगह देखने मिल रहा है। लोगों को याद होगा कि राजस्थान में एक मुस्लिम को जिंदा जलाकर मारने वाले ने उसका वीडियो बनाकर खुद ही फैलाया था, उसमें और इस अमरीकी नौजवान में फर्क सिर्फ ऑटोमेटिक रायफल की उपलब्धता का था। अभी दो दिन पहले मध्यप्रदेश में जिस तरह एक भाजपा नेता ने मुस्लिम होने के शक में एक मानसिक विचलित बुजुर्ग जैन को पीट-पीटकर मार डाला, उसकी सोच में अगर अमरीकी हथियार को जोड़ दिया जाए, तो वह भी धर्म के आधार पर दर्जन भर लोगों को मार डालने की मानसिकता तो रखता था।
हम हिन्दुस्तान के सिलसिले में इस बात को इसलिए उठा रहे हैं कि आज देश के करोड़ों नौजवानों को नस्लवादी नफरत से लैस किया जा रहा है। ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी उन्हें पढ़ाई जा रही है, बचपन से ही चुनिंदा स्कूलों में यह बात उनके दिमाग में भरी जा रही है, सोशल मीडिया पर भाड़े के लोगों से या समर्पित लोगों से इस थ्योरी का कीर्तन करवाया जा रहा है, और ढोल-मंजीरे पर झूमते हुए सिर इस थ्योरी से ब्रेनवॉश हुए चल रहे हैं। जिस तरह गोमांस के शक में मुस्लिमों, दलितों, और आदिवासियों को मारा जा रहा है, वह इसी थ्योरी का नतीजा है। अब यह समझने की जरूरत है कि जिन बड़े-बड़े नेताओं ने देश के करोड़ों अनपढ़ या शिक्षित, बेरोजगार या छोटी-मोटी नौकरी करने वाले नौजवानों को इस नस्लवादी हिंसा में झोंक दिया है, उनकी अपनी औलादें दुनिया की सबसे बड़ी या महंगी यूनिवर्सिटी से महंगी तालीम पाकर आती हैं, और हिन्दुस्तान या कहीं और करोड़ों कमाती हैं। झंडे-डंडे और त्रिशूल लेकर सडक़ों पर झोंकने के लिए इन नेताओं की औलादें मौजूद नहीं हैं क्योंकि वे उनके प्रति जिम्मेदार अपने मां-बाप की मेहनत से ऊंची पढ़ाई करके जिंदगी में ऊपर पहुंचने में लग गई हैं। दूसरी तरफ हिन्दुस्तानी ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी पढ़-पढक़र सडक़ों पर नफरत का सैलाब फैलाने वाले लोग अमरीका के बफेलो में अभी दस काले लोगों को मारने वाले गोरे नौजवान की तरह ढलने के लिए तैयार हो रहे हैं।
हिन्दुस्तान में आज ऐसी हिंसक सोच, और शायद उसकी प्रतिक्रिया में पैदा होने वाली दूसरे तबकों की ऐसी ही हिंसक सोच को महज लाइसेंसी हथियार ही तो हासिल नहीं हैं, बाकी तो भीड़त्या करने के लिए उनके पास लाठियां ही काफी हैं, और काफी लाठियां हर जगह मौजूद हैं। यह बात समझने की जरूरत है कि इस देश के भीतर और इस देश के बाहर कई किस्म के आतंकी संगठन काम कर रहे हैं, और ऐसे संगठन अमरीका की बंदूकों के मुकाबले अधिक बड़ा खून-खराबा करने के विस्फोटक हथियार लोगों को मुहैया करा सकते हैं, और पूरे देश में आबादी के बीच अगर मरने और मारने का ऐसा मुकाबला चल निकलेगा, धर्म के आधार पर हिंसा का सैलाब धमाकों का साथ पाने लगेगा, तो क्या होगा? आज जिन लोगों को अपने मजबूत मकानों में अपने को महफूज महसूसने की खुशफहमी है, वह खुशफहमी किसी एक धमाके से खत्म हो सकती है। हम अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे अनगिनत देशों में धर्मान्धता के चलते जैसे आत्मघाती विस्फोट देखते हैं जिनमें एक-एक में सौ-पचास लोग मारे जाते हैं, क्या हम इस देश को उस तरफ बढ़ाना चाहते हैं? इस लिखे हुए को कोई धमकी या चेतावनी मानना एक नासमझी होगी क्योंकि हम एक खतरे के अंदेशे के प्रति लोगों को सजग करना अपनी जिम्मेदारी समझ रहे हैं। हिन्दुस्तान में यह नस्लवादी हिंसक धर्मान्धता का सिलसिला खत्म होना चाहिए, वरना यहां के कुछ नौजवान अमरीका के बफैलो के नौजवान से प्रेरणा पा सकते हैं, कुछ लोग अफगानिस्तान-पाकिस्तान के आत्मघाती दस्तों से प्रेरणा पा सकते हैं, और उस दिन देश में किसी तबके के कोई लोग सुरक्षित नहीं रह जाएंगे।
धर्मनिरपेक्ष दिखने का मतलब साम्प्रदायिकता बढ़ाना तो नहीं
उत्तरप्रदेश की एक मस्जिद को लेकर यह ऐतिहासिक विवाद चल रहा है कि क्या
एक मंदिर को तोडक़र इसे बनाया गया है? देश की कई अदालतें इस सवाल के अलग-अलग
पहलुओं से जूझ रही हैं, और देश के कुछ अलग-अलग कानून एक-दूसरे के सामने
खड़े किए जा रहे हैं कि किस कानून के मुताबिक क्या होना चाहिए। हिन्दू और
मुस्लिम दो तबके अदालत में एक-दूसरे के सामने खड़े हैं, और अदालत का
सिलसिला कुछ पहलुओं पर शक से घिरा हुआ है, और इसी के चलते अदालत को अपनी
मातहत अदालत का तैनात किया गया एक जांच कमिश्नर हटाना भी पड़ा है। लेकिन यह
एक जटिल मामला है जिस पर यहां लिखने के बजाय किसी लेख में उसके साथ अधिक
इंसाफ हो सकता है। यहां आज इस कानूनी विवाद पर लोगों की लिखी जा रही बातों
पर लिखने की नीयत है।
जब मस्जिद में जांच के दौरान अदालत से तैनात एक हिन्दू जांच कमिश्नर वकील ने अदालत को रिपोर्ट देने के बजाय यह सार्वजनिक बवाल खड़ा करना शुरू किया कि मस्जिद में पानी की एक टंकी में शिवलिंग मिला है, तो इस पर देश भर से लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखना शुरू किया। टीवी समाचार चैनलों को रोजी-रोटी मिली, और वे भी स्टूडियो में एक-दूसरे से पहले साम्प्रदायिक दंगा करवाने के गलाकाट मुकाबले में उतर पड़े। सोशल मीडिया पर लिखने वालों में दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के एक प्रोफेसर रतनलाल भी थे, जिनके खिलाफ हिन्दू धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की पुलिस रिपोर्ट की गई, जुर्म दर्ज हुआ, और आनन-फानन उनकी गिरफ्तारी भी हो गई। खबरों से पता लगा कि रतनलाल एक दलित हैं, और उनकी पोस्ट पर विवाद होने के बाद उन्होंने जोर देकर यह कहा कि उन्होंने बहुत जिम्मेदारी के साथ लिखा था।
जैसा कि जाहिर है शिवलिंग से हिन्दू धर्मालुओं की भावनाएं जुड़ी हुई हैं, और शिवलिंग एक प्रतीक के रूप में किसी दूसरे धर्म की भावनाओं को चोट पहुंचाने का काम भी नहीं करता। इसलिए मस्जिद में मिला हुआ पत्थर शिवलिंग है या नहीं, यह अदालत के तय करने की बात है, उस पत्थर को शिवलिंग कहकर किसी दूसरे धर्म पर चोट पहुंचाने का काम नहीं हो रहा था। किसी जगह पर किसी एक धर्म के दावे का झगड़ा था, जो कि अभी निचली अदालत में है, और 25-50 बरस बाद वह हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत से तय हो सकता है, लेकिन तब तक उस पत्थर को लेकर कोई झगड़ा नहीं था। वह पत्थर भी किसी का नुकसान नहीं कर रहा था। वह सैकड़ों बरस से उसी जगह पर पानी में डूबे हुए था, वहां से नमाज पढऩे के पहले लोग हाथ और चेहरा धोने को पानी लेते थे, और अगर बहस के लिए यह मान लें कि वह शिवलिंग ही है, तो भी सैकड़ों बरस के लाखों नमाजियों के हाथ लगते हुए भी उस शिवलिंग को कोई दिक्कत नहीं थी।
ऐसे में सोशल मीडिया पर प्रोफेसर रतनलाल के अलावा भी हजारों लोगों ने साम्प्रदायिकता का विरोध करने के लिए शिवलिंग का विरोध करना शुरू कर दिया, या अधिक बेहतर यह कहना होगा कि उन्होंने उस पत्थर के शिवलिंग न होने के दावे करने शुरू कर दिए, और ऐसा करते हुए लोग तरह-तरह से शिवलिंग के अपमान पर चले गए। यह अपमान उस पत्थर को शिवलिंग मानकर उसकी उत्तेजना फैलाने की साजिश का होता, तो भी ठीक होता। इस मामले में पहली नजर में दिखता है कि अदालत के तैनात जिस जांच कमिश्नर को रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को ही देनी थी, उसने एक घोर हिन्दुत्ववादी की तरह हमलावर अंदाज में एक पत्थर के शिवलिंग होने का दावा करते हुए मीडिया में बयानबाजी शुरू कर दी, और उसके तौर-तरीकों से, और उसके दावों से बिना सुबूत सहमत होते हुए निचली अदालत ने मुस्लिमों के नमाज पढऩे के पहले वुजू करने, हाथ धोने की उस जगह को सील कर दिया। अब यह मौका एक छोटी अदालत के जज, और अदालत के जांच-कमिश्नर वकील को लेकर कुछ लिखने का था, और लोगों ने शिवलिंग का मखौल उड़ाना शुरू कर दिया। अभी तो यह तय भी नहीं हुआ था कि वहां मिला वह पत्थर सचमुच ही शिवलिंग है, लेकिन एक धार्मिक प्रतीक शिवलिंग को लेकर इतनी ओछी और अश्लील बातें लिखी जाने लगीं, कि मानो शिवलिंग खुद ही त्रिशूल लेकर हिंसा कर रहा हो।
यह मौका अदालत के जांच कमिश्नर और जज के पक्षपात या पूर्वाग्रह, उनके न्यायविरोधी रवैये को साबित करने का था, हिन्दुस्तानी मीडिया ने जिस तरह एक हिन्दुत्ववादी वकील के उछाले हुए शिवलिंग शब्द को लपककर पूरे देश में साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता फैलाना शुरू किया, मीडिया के उस रूख के बारे में लोगों को बात करनी थी, लेकिन यह पूरी बहस इस बात पर आकर सिमट गई कि कुछ कथित धर्मनिरपेक्ष लोग किस तरह शिवलिंग का मजाक उड़ा रहे हैं, हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचा रहे हैं।
मेरी तरह के परले दर्जे के नास्तिक, और धर्मनिरपेक्ष को भी धार्मिक प्रतीक का गंदी जुबान और गंदी मिसाल के साथ मखौल उड़ाना न सिर्फ नाजायज लगा बल्कि यह देश में साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ मजबूत करना भी लगा। जिस वक्त देश की बहस को असल मुद्दों से भटकाकर भावनाओं में उलझाने की राष्ट्रीय स्तर की साजिशें लगातार चल रही हैं, उसी वक्त अगर देश के असली या कथित धर्मनिरपेक्ष लोग भी अनर्गल, अवांछित, और नाजायज बकवास करके देश की बहस को गैरमुद्दों में उलझाने का काम करेंगे, तो यह धर्मनिरपेक्षता नहीं है, यह साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ में उसी तरह खेलना है, जिस तरह देश के कई टीवी स्टूडियो खेल रहे हैं। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अगर पूरी तरह से नाजायज बातों को जायज ठहराने की कोशिश होगी, तो उससे अभिव्यक्ति की जरूरी और जायज स्वतंत्रता की शिकस्त होगी। जब यह देश अपने आजाद इतिहास के सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहा है, जब उसके सामने असली और गंभीर चुनौतियां जानलेवा दर्जे की हो चुकी हैं, तो यह वक्त अपनी गैरजिम्मेदार और फूहड़ बातों से दुश्मन के हाथ मजबूत करने का नहीं है। जिन लोगों को यह लगता है कि वे शिवलिंग का मखौल उड़ाकर मुसलमानों के हाथ मजबूत कर सकते हैं, उनसे अधिक गैरजिम्मेदार आज कोई नहीं होंगे क्योंकि इससे हिन्दू लोगों में से सबसे अधिक हिंसक और साम्प्रदायिक लोगों के हाथ मजबूत होने के अलावा और कुछ नहीं हो रहा। जो लोग हिन्दुस्तान में सभी धर्मों को बराबरी दिलाना चाहते हैं, कुचले जा रहे धर्म को बचाना चाहते हैं, उनमें से कुछ लोग अगर धर्मान्ध-साम्प्रदायिक लोगों के हाथ अपने बयानों के हथियार थमा रहे हैं, तो यह धर्मनिरपेक्षता का काम नहीं है, यह साम्प्रदायिकता का काम है।
किसी व्यक्ति के धर्म, उसकी जाति, उसके वर्ग की वजह से उसकी सार्वजनिक बातों को रियायत नहीं दी जा सकती, खासकर ऐसे व्यक्ति को जिनकी पढ़ाई-लिखाई और समझदारी में कोई कमी नहीं है। ऐसे लोग अगर किसी एक गंभीर और व्यापक सोच के चलते हुए भी किसी धर्म के प्रतीक का मखौल उड़ाना जायज समझते हैं, तो वे लोग हिन्दुस्तान में आज असल मुद्दों पर बहस को बंद करवाने का काम कर रहे हैं, और ऐसे नुकसानदेह लोगों को बढ़ावा देकर देश में साम्प्रदायिक ताकतों को और मजबूत नहीं करना चाहिए।
लोकतांत्रिक लगता औजार, तानाशाही का बना हथियार
21 मई 2022
सोशल मीडिया कुछ ईश्वर की तरह हो गया दिखता
है, जिसके बारे में कहा जाता है कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी
तिन तैसी। खुद हमें कई बार सोशल मीडिया एक सबसे बड़ा लोकतांत्रिक औजार लगता
है, लेकिन अधिक दिन नहीं गुजरते कि यह साबित होने लगता है कि यह आज का
सबसे बड़ा पूंजीवादी और तानाशाह हथियार है। जब अलग-अलग लोगों को बिना खर्च
किए हुए सोशल मीडिया पर अपनी बात कहने का मौका मिलता है, तो यह एक
अभूतपूर्व लोकतांत्रिक ताकत लगती है। लेकिन जब हवा के इन झोंकों को एक ताकत
और योजना के साथ एक ऐसी तरफ मोड़ दिया जाता है कि लोकतंत्र को पीछे छोडक़र
तरह-तरह के बाहुबल दुनिया का जनमत अपने हिसाब से हांकने लगें, तब इस
लोकतांत्रिक दिखते औजार का खतरा समझ आता है। आज जब दुनिया में रूस और
यूक्रेन को लेकर जनमत बनने की बात आती है, या दूसरे एक अलग मोर्चे पर
फिलीस्तीनियों पर इजराइली जुल्म जारी हैं, और इस पर अमरीकी जुबानी जमाखर्च
दिख रहा है, तो ऐसे में जनमत को प्रभावित करने वाले औजारों की
लोकतांत्रिकता के बारे में सोचने की जरूरत लगती है। फिर बाहर ही क्यों
देखें, हिन्दुस्तान के भीतर हिन्दू-मुस्लिम से लेकर पप्पू और फेंकू नाम के
खेमों में बंटे हुए लोगों के बीच सोशल मीडिया पर जिस तरह की जंग छिड़ी है,
क्या वह सचमुच ही एक लोकतांत्रिक औजार को लेकर जनमत बनाने की कोशिश है, या
कि इस औजार को लूटकर उसे हथियार बनाकर एक संगठित गिरोह की तरह किया जा रहा
हमला है? इस हथियार के साथ एक दूसरी दिक्कत यह है कि हमलावर जब चाहे अपनी
फौज को और इस हथियार को लोकतांत्रिक औजार बता सकते हैं, और ऐसे औजार से
मानवीय मूल्यों का सामूहिक मानव संहार भी कर सकते हैं। दिखने में जो सडक़
किनारे प्याऊ के पानी की गिलास है, वह एक साजिश के तहत नफरत के जहर का
सैलाब फैलाने के काम में लाई जा रही है, और सोशल मीडिया नाम का यह प्याऊ
जनसेवा की वाहवाही भी पा रहा है।
इसने लोकतंत्रों में एक इतनी भयानक नौबत ला दी है जितनी भयानक नौबत अमरीका में सबसे विनाशकारी बवंडरों से आते दिखती है, जिससे शहर के शहर उजड़ जाते हैं। लोकतंत्र और सभी किस्म के बेहतर मूल्यों और सिद्धांतों को खत्म करने के लिए सोशल मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बनकर सामने आ गया है, और ट्विटर पर जब चाहे तब नफरतजीवी लोग अपनी मर्जी के एजेंडा को ट्रेंड करवा सकते हैं, यानी उस एक पल उनके पसंदीदा शब्दों के साथ नफरत की सुनामी बाकी तमाम मुद्दों के पैर उखाड़ सकती है, उन्हें बहाकर किनारे कर सकती है। दिखने में जो लोकतांत्रिक दिखता है उस पर पूंजीवादी, तानाशाह, और नफरतजीवी ताकतों ने इतने संगठित तरीके से कब्जा कर लिया है और उसके बेजा इस्तेमाल की तकनीक विकसित कर ली है कि अहिंसा की बातें हाशिए पर ही बनी रहती हैं, वे कभी ट्रेंड नहीं हो पातीं।
कहने के लिए यह एक लोकतांत्रिक आजादी है जो कि हर किस्म के लोगों को मिली हुई है, और नफरत के विरोधी भी चाहें तो अपने पसंदीदा मुद्दों को ट्रेंड करवा सकते हैं। लेकिन सच तो यह है कि अमन-चैन की बातों को आगे बढ़ाने के लिए साथ देने वाले आएंगे कहां से? हिन्दुस्तान में हम देखते हैं कि साम्प्रदायिक सद्भाव और मोहब्बत की बातें करने वाले लोगों पर नफरतजीवियों का झुंड इस तरह टूट पड़ता है कि जैसे जंगल में कोई अकेला कमजोर प्राणी मांसाहारियों से घिर गया हो। और यह हमलावर झुंड जब अपने धर्म से अधिक, दूसरों से नफरत से भरा हुआ रहता है, तो उसके नाखून और दांत अधिक तेज रहते हैं, उसके पंजों की ताकत अधिक रहती है, और जब ऐसे झुंड को एक संगठित समर्थन भी हासिल रहता है, सत्ता से लेकर न्याय प्रक्रिया तक उसे हिफाजत हासिल रहती है, तो फिर उसके हमले बुलडोजर पर सवार रहते हैं, और वह इतिहास के भी नीचे पुरातत्व तक को खोद डालने पर आमादा रहता है।
अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव से लेकर हिन्दुस्तान के राजनीतिक और साम्प्रदायिक एजेंडा को तय करने में सोशल मीडिया जिस भयानक तरीके से एक हथियार की तरह कुछ लोगों को हासिल है, उससे लगता है कि मार्क जुकरबर्ग से लेकर ट्विटर के पंछी तक ने अपने आपको सुपारी लेकर भाड़े के हत्यारे की तरह काम करने के लिए पेश किया हुआ है। चूंकि हिन्दुस्तान में इन चीजों को लेकर कुछ तो लोगों की समझ कम है, और कुछ आज की सत्ता को इनसे सहूलियत हासिल है, इसलिए यहां इनके खतरों पर अधिक चर्चा नहीं हो रही है। दूसरी तरफ अमरीका और पश्चिम के कई देशों में सोशल मीडिया की बेकाबू दिखती, लेकिन पूरी तरह से काबू में काम करती विनाशकारी ताकत पर संसदों में सवाल किए जा रहे हैं। हिन्दुस्तान आज अपने इतिहास की सबसे अधिक हिंसक धमकियां सोशल मीडिया पर ही देख रहा है, लेकिन इस देश का बहुत कड़ा बनाया गया सूचना तकनीक कानून भी सोशल मीडिया पर चुन-चुनकर लोगों का शिकार कर रहा है, और हिंसक खूनी जत्थों को अनदेखा भी कर रहा है।
लोकतंत्र में चुनाव प्रचार के लिए या बाकी वक्त भी जनमत को प्रभावित करने के लिए जो परंपरागत तरीके चले आ रहे थे, वे एकाएक पेनिसिलीन की तरह बेअसर हो गए दिखते हैं। अब लोगों को भडक़ाने के लिए जिस तरह सोशल मीडिया की ताकत का इस्तेमाल हो रहा है, वह लोकतंत्र के नाम पर बाहुबल और नफरत की एक नई इबारत लिख रहा है। और आज जब हिन्दुस्तान जैसे देश में लोगों की निजी और सामूहिक जनचेतना का अधिकतर हिस्सा मिट्टी में मिल चुका है, तब संगठित हिंसा को सोशल मीडिया की लहरों पर सवार करके उसे आसमान तक पहुंचाना आसान हो गया है। लोकतंत्र के लिए यह बहुत फिक्र की बात है कि करीब एक सदी में इस देश में जो लोकतांत्रिक चेतना विकसित हुई थी, वह पिछले एक दशक की सोशल मीडिया की सुनामी में पूरी तरह शिकस्त पा चुकी है। यह सोच कुछ लोगों के लिए थोड़ी सी जटिल लग सकती है, लेकिन इस पर सोचा जाना जरूरी है।
इस मुल्क में लोकतंत्र सबसे नाकामयाब है अदालती मामलों में..
20 मई 2022
देश की दो बड़ी-बड़ी पार्टियों में
बड़े-बड़े ओहदों पर रह चुके, संसद सदस्य रहे हुए, कामयाब क्रिकेटर और
कॉमेडियन नवजोत सिंह सिद्धू ने सुप्रीम कोर्ट से कल मिली एक साल की कैद बा
मुशक्कत पर सरेंडर करने के लिए कुछ हफ्तों का समय मांगा है। सिद्धू के वकील
अभिषेक मनु सिंघवी ने उनकी सेहत का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से यह
रियायत मांगी है। सिद्धू को यह सजा 34 बरस पुराने एक मामले में हुई थी
जिनमें उन्होंने पार्किंग के झगड़े में एक बुजुर्ग की पिटाई की थी जिसके
बाद उसकी मौत हो गई थी। कई अदालतों से सजा पाते और छूटते सिद्धू आखिर में
सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, और वहां भी एक बार बरी हो जाने के बाद जब मृतक के
परिवार ने दुबारा पिटीशन लगाई, तो इस ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक
साल की कैद सुनाई है। कानून के जानकारों का कहना है कि अभी भी इस मामले में
सिद्धू की तरफ से कोई और पिटीशन लगाने की थोड़ी सी संभावना बाकी है, और
अगर ऐसी कोई याचिका अदालत में मंजूर होती है तो यह मामला आगे और कई बरस तक
टल सकता है, और सिद्धू कई पार्टियों में आ-जा सकते हैं, हिन्दुस्तानी संसद
में चाहे न पहुंच पाएं, वे टीवी पर पहुंचकर ठोको ताली कह सकते हैं।
दूसरी तरफ कल की ही एक और खबर है जिसमें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 9 बरस से जेल में बंद तीन ऐसे गरीब आदिवासी विचाराधीन कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया है जो गरीबी की वजह से अपनी जमानत नहीं करा पा रहे, और 9 साल से मुकदमा झेलते हुए जेलों में बंद हैं। ये बहुत गरीब हैं, परिवार से संपर्क नहीं है, और जमानत की रकम जमा कराने वाले कोई नहीं हैं, इसलिए 2016 में अदालत से मिली सशर्त जमानत की शर्त पूरी करने की हालत में नहीं हैं, और अब हाईकोर्ट ने इन तीनों को व्यक्तिगत बॉंड पर रिहा करने का आदेश दिया है। बहुत कम ही ऐसे जुर्म रहते हैं जिनकी सजा 9 बरस से अधिक की कैद रहती हो, इसलिए इन गरीब आदिवासियों पर चाहे जिस जुर्म का मुकदमा चल रहा हो, शायद सजा मिलने पर जो कैद हो, उससे अधिक कैद वे गुजार चुके होंगे।
हिन्दुस्तान की जेलों में ऐसे बेबस गरीब बड़ी संख्या में बंद हैं जो मुकदमे झेल रहे हैं लेकिन उनकी जमानत नहीं हो पा रही है। और जो ताकतवर लोग सुबूतों को बर्बाद कर सकते हैं, गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं, उनके लिए लाखों रूपए फीस लेने वाले अरबपति वकील खड़े होते हैं, बड़ी-बड़ी अदालतों के बड़े-बड़े जज आधी रात को भी अपने बंगले में उनके केस सुनते हैं, और उन्हें तुरंत ही जमानत या अग्रिम जमानत मिल जाती है। एक ही किस्म के जुर्म के आरोपों पर अलग-अलग ताकत के लोगों के बीच कानून का फायदा पाने, उससे रियायत पाने में जितना बड़ा फर्क हिन्दुस्तान में दिखता है वह किसी भी लोकतंत्र के लिए बहुत शर्मनाक नौबत है। कोई विकसित लोकतंत्र ऐसा नहीं हो सकता जिसमें कमजोर की पूरी जिंदगी मुकदमे का सामना करते निकल जाए, बिना जमानत जेल में निकल जाए, और ताकतवर और पैसे वाले मुजरिम सजा पाने के बाद भी कानून से लुका-छिपी खेलते रहें। देश की एक बड़ी कंपनी, जो कि देश भर में मुकदमे झेल रही है, उसके चार बड़े डायरेक्टरों को अभी छत्तीसगढ़ पुलिस गिरफ्तार करके लाई, और जेल पहुंचते ही कुछ घंटों के भीतर वे चारों एक साथ अस्पताल पहुंच गए। जेल की जगह अस्पताल में रहने में बहुत सी सहूलियत रहती है, और हर ताकतवर या पैसे वाले कैदी बिजली की रफ्तार से यह सहूलियत पा जाते हैं।
हिन्दुस्तान में आर्थिक असमानता सिर चढक़र बोलती है। लेकिन पढ़ाई, इलाज, नौकरी, या चुनावी जीत की संभावनाओं से भी अधिक बढक़र यह असमानता अदालतों में दिखती है जहां गरीब से जेल में भी अमीर कैदियों की खातिरदारी करवाने के लिए बंधुआ मजदूरों सरीखा काम लिया जाता है। उसे आराम के लिए अस्पताल नसीब होना तो दूर रहा, जरूरी इलाज भी नसीब नहीं होता, उसके मामले की पेशी पर उसे अदालत ले जाने के लिए पुलिस नहीं मिलती, अदालत पहुंचकर भी उसका मामला आगे नहीं खिसकता, क्योंकि गरीब विचाराधीन कैदी भारतीय लोकतंत्र के हाथ गरम करने की ताकत नहीं रखते। हमारा ऐसा मानना है कि भारतीय लोकतंत्र में अगर लोगों की आस्था न्यायपालिका पर से खत्म करवानी है, तो उन्हें किसी मुकदमे में उलझाकर अदालती चक्कर लगवाए जाएं, वहां पर इंसाफ के नाम पर बेइंसाफी दिखाई जाए, वहां पैसों की ताकत का नंगा नाच उसे देखने मिले, और मुकदमा खत्म होने के पहले लोकतंत्र में उसकी आस्था खत्म हो जाए।
अमरीका जैसे देश में काले लोगों पर चल रहे मुकदमों में उनका कानूनी साथ देने के लिए सामाजिक संगठन बने हुए हैं जो कि उनके हक के लिए लड़ते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में जहां पर आमतौर पर दलित, आदिवासी, और मुस्लिम मुकदमों के सबसे अधिक शिकार हैं, वहां पर इन तबकों के हक के लिए लडऩे वाले कोई संगठन सुनाई नहीं पड़ते। सामाजिक बराबरी तो तभी आ सकती है जब लोगों को उन पर लगाए गए आरोपों से निपटने के लिए बराबरी का मौका मिले। भारतीय न्याय व्यवस्था में तो ऐसी किसी बराबरी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस देश में और इसके तमाम प्रदेशों में हर बड़े राजनीतिक दल से जुड़े हुए बहुत से वकील हैं, लेकिन किसी पार्टी ने भी अब तक गरीबों की कानूनी मदद के लिए कोई कार्यक्रम नहीं बनाया है, किसी सत्तारूढ़ पार्टी ने भी नहीं, और न ही किसी विपक्षी पार्टी ने। आमतौर पर किसी भी पार्टी के बड़े नेता के फंसने पर उसे बचाने के लिए अरबपति वकीलों की फौज खड़ी हो जाती है, लेकिन कोई पार्टी अपने प्रभाव के इलाके में सबसे गरीब लोगों की कानूनी मदद की कोई कोशिश नहीं करती।
भारत में आज जाहिर तौर पर कमजोर तबकों, दलित, आदिवासी, मुस्लिम, और महिलाओं की कानूनी हिफाजत के लिए ऐसे मजबूत संगठन बनने और सामने आने चाहिए जो कि उन्हें बराबर का कानूनी हक दिलाने के लिए लड़ाई लड़ें। अमरीका जैसे देश से इस बात की मिसाल ली जा सकती है, और इस देश के जागरूक लोगों में से कुछ का सामने आना जरूरी है, उसके बिना किसी तरह का इंसाफ कमजोर लोगों को नहीं मिल सकेगा, और ताकतवर लोग अदालत से सजा मिलने के बाद भी ताली ठोंकते हॅंसते रहेंगे।


