भारतीय लोकतंत्र में आज के जमींदारों के लठैतों के नए गिरोह

6 अक्टूबर 2022

 

अभी अमरीका में बसे हुए एक भारतवंशी ने इस बात पर अध्ययन किया कि बॉलीवुड की फिल्मों का बायकॉट करने के जो फतवे ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर संगठित तरीके से चलाए जाते हैं, उनके पीछे क्या नीयत रहती है, और उनका क्या असर होता है। मुम्बई फिल्म उद्योग को लेकर तरह-तरह के बहिष्कार के हैशटैग ट्विटर पर चलाए जाते हैं, और अब यह आम जानकारी है कि इनके पीछे कौन सी ताकतें होती हैं। इस अध्ययन में भी यह मिला कि बायकॉट के फतवे देने वाले ऐसे लोग एक खास धार्मिक विचारधारा से जुड़े हुए हैं, और ऐसे फतवों के अलावा उनका अभियान साम्प्रदायिक नफरत भी रहता है। इससे यह भी निकलकर सामने आया कि ऐसे बहिष्कार के फतवों से सिनेमाघरों में फिल्मों पर चाहे जो असर पड़ता हो, मोटेतौर पर मुस्लिम कलाकारों के बहिष्कार के अभियान से उन्हें आगे काम मिलने में परेशानी होती है क्योंकि फिल्म निर्माता यह सोचते हैं कि इतने विवाद में क्यों पड़ा जाए। 

आज इंटरनेट पर टेक्नालॉजी की मदद से ऐसे एप्लीकेशन बनाए गए हैं जो कि एक साथ सैकड़ों ट्विटर हैंडल को चलाते हैं। बात की बात में कुछ दर्जन लोग इनकी मदद से ट्विटर पर एक अभियान शुरू कर सकते हैं, और हिन्दुस्तान जैसे कानून की मेहरबानी से जिसका विरोध करना हो उसके परिवार को हत्या और बलात्कार की धमकी भी दे सकते हैं, और उस पर कोई कार्रवाई न होने की गारंटी रहती है। देश की सबसे बड़ी अदालत के किसी जज के परिवार को इसी तरह की धमकी अगर मिली होती, तो अब तक केन्द्र सरकार से लेकर ट्विटर तक सभी कटघरे में होते, लेकिन लोकतंत्र में नौबत इतनी खराब होने के पहले भी कानून का राज कायम होने की गुंजाइश होनी चाहिए। अब जब तक देश का कानून जागता नहीं है, जब तक केन्द्र या राज्य सरकारों को सोशल मीडिया पर ऐसे जुर्म के खतरे समझ नहीं आते हैं, तब तक इन खतरों को आम जनता को ही समझना होगा। 

आज सोशल मीडिया पर हालत यह है कि किसी विचारधारा के प्रति समर्पित भक्तमंडली या भाड़े के लोग मिलकर किसी का भी जीना हराम कर सकते हैं। कानून ऐसे हमलों से किसी को नहीं बचाता, बल्कि हमलावर-मुजरिमों को ही बचाता है। नतीजा यह होता है कि जिस तरह एक वक्त गांवों में जमींदारों के लठैत रहते थे, और वे जमींदार की मर्जी से जिसे चाहे उसे कूट आते थे, आज भी हिन्दुस्तान के सोशल मीडिया में ऐसे ही लठैत रात-दिन अतिसक्रिय हैं, और इस देश के साम्प्रदायिक सद्भाव को खत्म करने में जुटे हुए हैं। आज अगर अमरीका में बैठे हुए कोई व्यक्ति हिन्दुस्तान में ऐसे अभियान के खिलाफ नीयत की शिनाख्त कर सकता है, तो यह काम भारत सरकार क्यों नहीं कर सकती? जो सरकार बात-बात में ट्विटर के साथ इस बात को लेकर भिड़ जाती है कि उसे कौन-कौन से हैंडल बंद करने हैं, वह सरकार अपना घर क्यों नहीं देखती कि उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी के तहत जो लाखों ट्विटर अकाऊंट रात-दिन नफरत फैला रहे हैं, उन पर रोक लगाए। और यह रोक लगाने के लिए ट्विटर पर उनके खाते बंद करवाना तो दूर रहा, भारत सरकार ऐसे खुले जुर्म के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई भी नहीं कर रही है। यह सिलसिला देश की हवा को और जहरीला बनाते चल रहा है, और अब लोगों को यह लगने लगा है कि साम्प्रदायिकता, हिंसा, और तरह-तरह के दूसरे जुर्म की धमकियां फैलाना अब इस लोकतंत्र में कानूनसम्मत हो चुका है। मुजरिमों का ऐसा भरोसा किसी भी लोकतंत्र को तबाह करने के लिए बहुत है। 

हमें इस बात को लेकर भी बहुत हैरानी होती है कि केन्द्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों की जो सलाहकार समितियां हैं, और जिनमें कई पार्टियों के सांसद मेंबर हैं, वहां भी ऐसे जुर्म के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पा रही है। लोकतंत्र ने जनता को जो बराबरी का हक दिया था, आज उसे कोई विचारधारा, कोई संगठन अपने लठैतों को चुनिंदा निशानों के पीछे लगाकर उनका जीना हराम कर रहे हैं, और कानून उनकी मदद के लिए मौजूद नहीं है। इस ताजा अध्ययन ने यह पाया है कि बॉलीवुड में ऐसे मुस्लिम कलाकारों को अधिक निशाना बनाया जा रहा है जिनकी शादी हिन्दुओं से हुई है, ताकि आगे जाकर उन्हें काम मिलने में दिक्कत हो। इसके पीछे उस विचारधारा का सीधा-सीधा हाथ है जो कि अपनी पार्टी से बाहर की ऐसी शादियों को लव-जेहाद कहती है, और हिंसा की हद तक धमकियां देती है। यह भारत सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह अंतरराष्ट्रीय सोशल मीडिया पर हिन्दुस्तानी नागरिकों के खिलाफ इसी जमीन से चल रहे ऐसे नफरती-हिंसक अभियान पर कार्रवाई करे। कहने के लिए तो भारत का आईटी एक्ट इतना कड़ा है कि उससे बचने की गुंजाइश नहीं रहती है, लेकिन खुले साइबर-सुबूतों के बाद भी सरकार का कार्रवाई न करना बहुत ही शर्मनाक है। यह लोकतंत्र के भीतर अपने से असहमत लोगों का जीना हराम करने का बहुत बड़ा जुर्म है, और जनता के बीच से सरकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही को लेकर सवाल उठने चाहिए। जब तक अदालतों पर कोई सीधा हमला नहीं होता है, तब तक अदालतें आज की तारीख में आम जनता के हकों को लेकर बेपरवाह दिख रही हैं, और ऐसे में जनता के बीच ही एक जागरूकता उठ खड़ी होना जरूरी है, वही एक रास्ता दिखता है। 

(Daily Chhattisgarh)

नफरत की जहरीली हवा के बीच राहुल ताजी हवा के एक झोंके की तरह...

4 अक्टूबर 2022

 

भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कर्नाटक पहुंचे राहुल गांधी की एक आमसभा चल रही थी, और बारिश होने लगी। उन्होंने बिना रूके भाषण देना जारी रखा। इसकी तस्वीर कुछ फोटोग्राफरों ने कैद कीं, और सोशल मीडिया पर वे तस्वीरें छा गईं। यह बात भी खबर में नहीं आई कि राहुल गांधी ने उस मौके पर भाषण में क्या कहा, बस बारिश की परवाह किए बिना भाषण देना लोगों को छू गया। कुछ लोगों ने यह भी याद किया कि अभी साल-दो साल के भीतर ही शरद पवार भी महाराष्ट्र में इसी तरह भीगते हुए भाषण देते दिखे थे। कुछ लोगों ने दोनों तस्वीरों को जोडक़र एक कार्टून भी बनाया। हालांकि बारिश में कुछ देर भीग जाना सरहद पर गोलियां खाने सरीखा नहीं है, इसमें कोई बहुत बड़ी बहादुरी नहीं है, लेकिन आज देश की आबादी का एक हिस्सा नफरत से इतना थका हुआ है, उसकी वजह से इतनी दहशत में है कि उसने राहुल की इस पदयात्रा को हाथोंहाथ लिया है क्योंकि यह नफरत की बात नहीं कर रही है। लोगों के लिए हिन्दुस्तान में आज यह बात कुछ अटपटी है कि कोई नेता लगातार जनता के बीच चले, रोज कई भाषण दे, फिर भी नफरत की कोई बात न करे। इसलिए राहुल एक ठंडी और ताजी हवा के झोंके की तरह हैं जो कि नफरत से झुलसे हुए देश को राहत दे रहे हैं। उनकी एक तस्वीर ने लोगों को इतना छू लिया है कि मानो लोग किसी भली चीज को छूने के लिए तरसे हुए थे। जिस तरह रेगिस्तान में ठूंठ की तरह सूखा हुआ खजूर का पेड़ भी हरियाली लगता है, उसी तरह आज हिन्दुस्तान में गैरनफरती बातें राहुल को एक नायक की तरह पेश कर रही हैं।

यह मौका राहुल की चर्चा का कम है, यह देश के हालात पर चर्चा का अधिक है। नफरत इस हद तक बढ़ाई जा रही है कि यहां सामाजिक संस्कृति पर हमला करके धार्मिक कट्टरता उसे लहूलुहान कर दे रही है। आज की ही खबर है कि मध्यप्रदेश और गुजरात में बजरंग दल सरीखे निगरानी दस्तों ने नवरात्रि के गरबा कार्यक्रमों में पहुंचे गैरहिन्दुओं को ढूंढ-ढूंढकर निकालकर पीटा, और इन दोनों प्रदेशों में कई जगहों पर इसे लेकर तनाव खड़ा हो गया है। यह बहुत नई बात भी नहीं है, और पिछले कई बरस से ऐसा ही तनाव हर नवरात्रि पर होते आया है। जो बात हमारी समझ से परे है वह यह कि अगर किसी एक धर्म के आयोजक दूसरे धर्मों के लोगों को कट्टरता से बाहर रखना चाहते हैं, उसके लिए कानून भी अपने हाथ में लेने से नहीं हिचक रहे हैं, तो फिर दूसरे धर्मों के लोगों को ऐसे आयोजनों में शामिल होकर तनाव और टकराव क्यों बढ़ाना चाहिए? अगर आयोजकों ने जगह-जगह गैरहिन्दुओं के दाखिले पर रोक के नोटिस लगा रखे हैं, तो ऐसे आयोजनों में गैरहिन्दुओं को जाना क्यों चाहिए? इन लोगों को यह बात समझनी चाहिए कि हिन्दू धर्म के जो अधिक कट्टर और अधिक हिंसक लोग हैं, वे तो अपने ही धर्म के दलितों को किसी भी सवर्ण धार्मिक कार्यक्रम में नहीं घुसने देते, गांवों में आज भी सडक़ किनारे के चाय ठेलों पर दलितों के लिए अलग कप-गिलास रहते हैं, जिन्हें इस्तेमाल के बाद धोकर रखना भी उन्हीं की जिम्मेदारी रहती है। जो समाज अपने भीतर इतना हिंसक भेदभाव करता है, उस समाज में, उसके कट्टर धार्मिक कार्यक्रमों में घुसने की कोशिश दूसरे धर्म के लोगों को क्यों करनी चाहिए? इसलिए अब जब सामाजिक संस्कृति मारी गई है, और एक हिंसक धर्मान्धता राज कर रही है, तो किसी तबके को इस टकराव को बढ़ाना नहीं चाहिए, क्योंकि हर टकराव हवा में और अधिक जहर घोलते चलेगा।

जैसे ही राहुल गांधी की भारत जोड़ो पदयात्रा की चर्चा की, तो तुरंत ही यह दिखने लगा कि इस देश को जोडऩे की जरूरत कितनी है, क्यों है, और किस तरह इस देश को टुकड़ों में तोड़ दिया गया है। आज राहुल सरीखे नेता की जरूरत इसलिए है कि देश के अलग-अलग धर्मों के, अलग-अलग जातियों के लोगों को एक साथ रखना नामुमकिन सा हो गया है क्योंकि उन्हें बहुत बड़ी योजना और साजिश के तहत एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया गया है। अब तक राहुल गांधी जितना पैदल चले हैं, उन्हें भारत के मीडिया में कोई कवरेज चाहे न मिला हो, उन्हें जनसमर्थन भरपूर मिल रहा है। कदम-कदम पर घरेलू लोग भी सामने आकर उनसे लिपट रहे हैं, उनके साथ चल रहे हैं, जबकि रोजाना लंबा सफर तय करते हुए वे धीरे नहीं चल पा रहे हैं। फिर भी लोग हैं कि अपने बच्चों के साथ आ रहे हैं, बच्चे हैं कि राहुल से लिपट रहे हैं, और उनके साथ चल रहे हैं। जो एक बहुत ही साधारण बात होनी चाहिए थी, वह बात आज अनोखी सी लग रही है, क्योंकि बाकी देश की हवा बहुत जहरीली हो चुकी है। आज देश के सुप्रीम कोर्ट को भी देखें तो उसमें अलग-अलग कई अदालतों में धार्मिक नफरत के मामले इतने अधिक दिख रहे हैं कि ऐसा लगता है कि इस देश का सबसे बड़ा काम ही आज नफरत करना हो गया है, और अदालतों का काम ऐसी नफरत से जूझना रह गया है। ऐसे माहौल में भारत जोड़ो के शब्द ही लोगों को एक किस्म से राहत दे रहे हैं कि राजनीति में रहते हुए भी कोई व्यक्ति किस तरह जोडऩे की बात कर सकते हैं।

एक बार फिर नवरात्रि के गरबा को लेकर हो रहे तनाव की बात पर लौटें तो यह समझने की जरूरत है कि कोई भी धर्म अपने आम मिजाज की तरह, और अपने बनाए जाने के मकसद के मुताबिक, अपने सबसे कट्टर लोगों के कब्जे में जाता ही है। जो सांस्कृतिक आयोजन धर्म का सामाजिक विस्तार रहते थे, वे भी अब धीरे-धीरे कट्टर बना दिए गए हैं, और ऐसे में किसी भी धर्म को दूसरे धर्म के आयोजनों में दाखिल होने के बारे में सोचना नहीं चाहिए। इसी हिन्दुस्तान में अभी एक दशक पहले तक जो सामाजिक समरसता बची हुई थी, वह इन कुछ बरसों में ही पूरी तरह खत्म हो चुकी है, और यह खात्मा एक हकीकत बन चुका है। इसलिए यहां पर अभी आदर्श की अधिक बातों की कोई गुंजाइश उन आयोजनों में नहीं है जिनके पीछे कट्टर आयोजक हैं। इसलिए न सिर्फ दूसरे धर्मों के लोगों को ऐसे आयोजनों से दूर रहना चाहिए, बल्कि इन धर्मों के समझदार और सद्भावना वाले लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या वे ऐसे कट्टर आयोजनों में शामिल होना चाहते हैं?

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 3 अक्टूबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

गांधी की एक और बार हत्या अनायास नहीं, और महज इनके हाथों भी नहीं...

3 अक्टूबर 2022

 

कोलकाता के अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर एक बड़ी सी तस्वीर छापी है जो कि एक दुर्गोत्सव की है। यह दुर्गा पूजा का ही सालाना वक्त चल रहा है, इसलिए इसमें अटपटा कुछ नहीं है सिवाय दुर्गा प्रतिमा में दुर्गा के हाथों मारे जाते महिषासुर के। महिषासुर की जगह गांधी जैसे दिखने वाले एक व्यक्ति की प्रतिमा बनाई गई है, और इसके पीछे हिन्दू महासभा का यह आयोजन है जिसमें गांधी को दानव की तरह पेश किया गया है। कहने को कल ही देश भर में गांधी जयंती मनाई गई, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित तमाम लोगों ने गांधी को याद किया। लेकिन इस देश में गोडसे के भक्त हैं कि वे कहीं गांधी की तस्वीर को गोलियां मारते हैं, तो मध्यप्रदेश से गोडसे की भक्त, भाजपा की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर गांधी को गालियां देती हैं, और गोडसे की स्तुति करती हैं। इस बीच ऐसे संगठनों के लोग भी गांधी की स्तुति करते दिखते हैं जो कि जाहिर तौर पर गांधी-हत्या के पीछे शामिल थे, लेकिन आज हिन्दुस्तान में किसी भी तरह की सामाजिक मान्यता पाने के लिए गांधी स्तुति जरूरी रहती है, इसलिए वे भी मन मारकर गांधी जयंती पर श्रद्धांजलि देते दिखते हैं। अब ममता बैनर्जी के राज पश्चिम बंगाल में दुर्गा के हाथों गांधी का एक बार फिर कत्ल करवाते हुए हिन्दू महासभा के लोगों का कलेजा ठंडा पड़ा होगा क्योंकि पौन सदी पहले वे गांधी के शरीर को ही मार पाए थे, गांधी की सोच अब भी जिंदा है।

कुछ लोग हैरान हो सकते हैं कि गांधी के इस देश में यह हत्यारी सोच किस तरह आज भी चली आ रही है। ऐसे हैरान-परेशान लोगों को यह बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जो लोग छोटे-मोटे हिंसक संगठनों की तरह हमलावर तेवरों के साथ गांधी पर आज भी गोलियां चलाते हैं, उनके संगठन उतने छोटे भी नहीं हैं जितने छोटे वे दिखते हैं। आज भी जो एक हत्यारी सोच गोडसे को स्थापित करने में लगी है, वह बढ़ते-बढ़ते गांधी स्मृति संस्थानों तक पहुंच चुकी है, और गांधी-हत्या में कटघरे तक पहुंचने वाले, और सुबूत न होने से छूटने वाले सावरकर को गांधी के समानांतर खड़ा करने की कोशिश में लगी हुई है। गांधी स्मृति संग्रहालय के ट्रस्टी केन्द्र सरकार तय करती है, और इस समिति की पत्रिका ‘अंतिम जन’ के कवर पेज पर सावरकर को लेकर भीतर सावरकर की स्तुति छपी है और उनका लिखा हुआ छपा है। इस समिति के अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद हैं, और इसका औपचारिक प्रकाशन गांधी के मुकाबले सावरकर को खड़ा करने में लगा है। इस तरह की कोशिशें सरकार के कई अलग-अलग संगठन कर रहे हैं, और इन कोशिशों की नीयत समझना मुश्किल भी नहीं है।

हिन्दू महासभा जैसे छोटे दिखने वाले संगठनों के मार्फत जिस तरह गोडसे-पूजा हो रही है वह हिन्दुस्तानी जनता के बर्दाश्त का इम्तिहान है जो कि हर बरस कई बार कई तरह से लिया जाता है। जिस तरह किसी बीमारी से बचाव का टीका उसी बीमारी के वायरस की छोटी-छोटी मात्रा देकर लगाया जाता है, उसी तरह हिन्दुस्तान में गांधी के हत्यारों का महिमामंडन धीरे-धीरे करके इस हत्यारी सोच को मान्यता दिलाई जा रही है। जब किसी झूठ को हजार बार दुहराया जाता है, तो वह काफी लोगों द्वारा सच मान लिया जाता है। सावरकर से लेकर गोडसे तक का महिमामंडन तरह-तरह से किया जा रहा है, और गांधी के साथ जुड़े हुए राष्ट्रपिता नाम के शब्द को चुनौती भी लगातार दी जा रही है। आने वाले वक्त में जल्द ही सावरकर को भारतरत्न की उपाधि भी दी जा सकती है, और गांधी से राष्ट्रपिता की उपाधि हटाने की मांग तो चल ही रही है। यह भी समझने की जरूरत है कि भाजपा से जुड़े हुए संगठनों के लोग लगातार जिस तरह यह कोशिश करते हैं, और बीच-बीच में खुद भाजपा के औपचारिक नेता जिस तरह गांधी पर हमला करते हैं, और गोडसे-सावरकर की स्तुति करते हैं, इन सबको कतरा-कतरा मनमानी मानना गलत होगा। यह सब हिन्दुत्व की उस हमलावर सोच का हिस्सा हैं जो कि गांधी को मार डालने की वकालत करती है। देश में आज कई मुद्दों पर जनता का बर्दाश्त बढ़ाया जा रहा है। मुस्लिमों और दूसरे अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक माहौल खड़ा करके बहुसंख्यक हिन्दू तबके के अधिक से अधिक लोगों के बीच ऐसे हिंसक बर्दाश्त को बढ़ाया जा रहा है। इसी तरह कहीं मांसाहार के खिलाफ, तो कहीं लोगों की गैरहिन्दू उपासना पद्धति के खिलाफ, तो कहीं उनके पहरावे के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। तमाम मुस्लिमों को आतंकी साबित करने के लिए दुनिया भर के मुस्लिम देशों की मिसालें ढूंढ-ढूंढकर लाई जा रही हंै, और उन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है। यह सिलसिला लगातार चल रहा है, और यह सिर्फ हिन्दू महासभा जैसे छोटे दिखते संगठन की अकेले की सोच हो, यह सोचना भी नासमझी होगी।

कोलकाता में दुर्गा पूजा जैसे धार्मिक, और जागरूकता से भरे हुए त्यौहार का ऐसा हिंसक, हत्यारा, और साम्प्रदायिक इस्तेमाल भी अगर इस देश के प्रधानमंत्री और बंगाल की मुख्यमंत्री को कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार नहीं कर सकता, तो फिर यही मानना होगा कि उनके मन में हिन्दू महासभा की इस प्रतिमा को लेकर कोई शिकायत ही नहीं है। एक तरफ तो बंगाल की इस बार की ही साज-सज्जा में कहीं पर किसी विदेशी कलाकार की पेंटिंग्स दिखती हैं तो कहीं ईसाईयों के सबसे बड़े तीर्थस्थान वेटिकन को दिखाते हुए दुर्गा पूजा की साज-सज्जा की गई है। बंगाल ऐसे उदार राजनीतिक विचार वाले धार्मिक समारोहों का प्रदेश है, लेकिन वहां पर हिन्दू महासभा जैसे नफरतजीवी लोगों ने गांधी की हत्या का ऐसा धार्मिक बेजा इस्तेमाल किया है। क्या इस देश में किसी हिन्दू की धार्मिक भावनाओं को इससे ठेस पहुंचती है?

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 2 अक्टूबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

खलनायक बना दिए गए गहलोत ने भला क्या अलोकतांत्रिक किया था?

  2 अक्टूबर 2022

 

सार्वजनिक जीवन में एक चूक, या एक गलत काम लोगों को आसमान से धरती पर पटक सकते हैं, नायक को खलनायक बना सकते हैं, और ऐसा ही कुछ अशोक गहलोत के साथ हुआ। राजस्थान के मुख्यमंत्री इतने ताकतवर माने जा रहे थे, उनका लंबा तजुर्बा और सोनिया परिवार के प्रति उनकी बेदाग वफादारी ने उन्हें चौथाई सदी बाद पहले गैरगांधी कांग्रेसाध्यक्ष के लायक बनाया था। सोनिया परिवार ने अपने तीन लोगों से बाहर जाकर गहलोत को पार्टी अध्यक्ष बनाना तय किया था, और उन्हें एक किस्म से इस जिम्मेदारी के लिए बाकी किसी भी कांग्रेस नेता के मुकाबले अधिक सही पाया था। इस बात की मुनादी उनकी तरफ से भी हो गई थी, लेकिन अगले ही दिन वे कांग्रेस के बहुत से लोगों के बीच नायक से खलनायक बन गए।

जो लोग कांग्रेस के घटनाक्रम बारीकी से पढ़ रहे हैं उन्हें तो कुछ बताने की जरूरत नहीं है, लेकिन बाकी लोगों के लिए यह समझ जरूरी है कि गहलोत ने पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर हामी भर दी थी, इसकी घोषणा कर दी थी, और कुछ हफ्ते बाद नतीजे घोषित होने पर वे काम भी सम्हाल चुके होते। इस बीच जाने किस हड़बड़ी के चलते दिल्ली में कांग्रेस की मौजूदा लीडरशिप ने यह महसूस किया कि गहलोत के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद उनकी जगह राजस्थान में एक नया मुख्यमंत्री लगेगा, और इसके पहले कि गहलोत अध्यक्ष चुनाव का फॉर्म भी भर पाते, दिल्ली से कांग्रेस पर्यवेक्षक जयपुर पहुंचकर विधायकों की बैठक बुलाकर अगला मुख्यमंत्री तय करने बैठे थे। लीडरशिप की इस रफ्तार ने न सिर्फ राजस्थान कांग्रेस के विधायकों  को हक्का-बक्का किया, बल्कि कांग्रेस परे के देश भर के राजनीतिक विश्लेषक भी यह सोचते रह गए कि बिजली की इस रफ्तार से नया मुख्यमंत्री तय करने की जरूरत क्या थी? राजस्थान के अधिकतर कांग्रेस विधायक गहलोत समर्थक दिख रहे हैं, और उनके बीच मुख्यमंत्री के करवाए हुए, या उनकी मौन सहमति से एक बगावत हुई, और कांग्रेस हाईकमान को उसके मौजूदा कार्यकाल के आखिरी महीने में उसकी औकात दिखा दी गई। कांग्रेस के निष्ठावान सोनिया-समर्थकों को यह शब्द कुछ अधिक कड़वा लग सकता है, लेकिन जयपुर में हुआ यही, कांग्रेस हाईकमान के भेजे हुए पर्यवेक्षक दुकान खोलकर बैठे रहे, और पार्टी विधायकों ने वहां पांव भी रखने से मना कर दिया। जब 90 फीसदी विधायक अनुशासनहीन करार दे दिए गए, तो फिर तौहीन तो हाईकमान की ही हुई क्योंकि सोनिया गांधी इनका कुछ बिगाडऩे की हालत में नहीं हैं।

अब यहां पर एक बुनियादी सवाल उठाना जरूरी है। कांग्रेस में नए अध्यक्ष चुने जाने की यह सारी मशक्कत पार्टी में एक लोकतंत्र को जिंदा दिखाने के लिए की जा रही है। और हो सकता है कि इससे पार्टी जिंदा भी हो जाए। अब सवाल यह उठता है कि एक अनमने अशोक गहलोत को अगर पार्टी अध्यक्ष बनाने के लिए इतना जरूरी समझती है कि खाली बैठे हुए दर्जनों बड़े नेताओं को छोडक़र एक मुख्यमंत्री को अध्यक्ष बनाया जा रहा है, तो गहलोत का महत्व इसी बात से साफ हो जाता है। यह महत्व उनकी काबिलीयत की वजह से भी हो सकता है, और उनके सबसे अधिक उपयुक्त होने की वजह से भी। अब अगर गहलोत को हटना ही था, तो जाहिर है कि उनकी जगह कोई और मुख्यमंत्री बनता, या गहलोत ही दोनों कुर्सियों पर काबिज रहते जैसी कि उनकी नीयत दिख रही थी, या कम से कम उनका बयान वैसा दिख रहा था। अब अगर पार्टी ने यह तय ही कर लिया था कि गहलोत के नामांकन भरने के पहले ही राजस्थान में उनका वारिस छांट लिया जाए, और इसके लिए फायर ब्रिगेड की रफ्तार से पर्यवेक्षक जयपुर पहुंच गए थे, तो फिर वहां जो हुआ, उसमें अलोकतांत्रिक क्या था? कोई भी मुख्यमंत्री किस तरह चुने जाने चाहिए? विधायकों का बहुमत जिसके साथ हो वही पार्टी विधायक दल के अध्यक्ष हो सकते हैं, और जयपुर में जाहिर तौर पर बहुमत से भी खासे अधिक लोग गहलोत के साथ दिख रहे थे। अब अगर कांग्रेस पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के लिए एक चुनाव करवाने का यह दौर अगर ढकोसला नहीं है, तो फिर ऐसा ही चुनाव राजस्थान विधायक दल के भीतर अगले मुख्यमंत्री के लिए भी होना था। और बहस के लिए कुछ देर के लिए यह भी मान लें कि विधायकों की बगावत गहलोत ने ही करवाई थी, तो भी वे विधायकों की पसंद ही साबित हो रहे थे। ऐसे में जिस लोकतांत्रिक चुनाव का दिखावा दिल्ली में हो रहा है, वैसा ही लोकतांत्रिक चुनाव जयपुर में क्या बुरा था?

लोगों की नजरों में गहलोत पल भर में खलनायक बन गए हैं क्योंकि उन्होंने कांग्रेस हाईकमान से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का इतना बड़ा तोहफा मिलने के बाद भी राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर से अपनी नीयत नहीं हटाई थी। लेकिन क्या यह देश और कांग्रेस पार्टी कांग्रेस संगठन के चुनाव देखना चाहते हैं, या कि एक मनोनयन देखना चाहते हैं? अगर गहलोत अध्यक्ष बन रहे थे, तो उसके एवज में उनसे राजस्थान सीएम की कुर्सी पर दिल्ली की मर्जी का राज्याभिषेक करवाने की उम्मीद क्यों की जा रही थी? जब पार्टी में लोकतंत्र ही लाना है, तो राजस्थान में तो खुला लोकतंत्र आ रहा था, और 90 फीसदी विधायक सचिन पायलट के खिलाफ दिख रहे थे। यह भी याद रखने की जरूरत है कि दो बरस पहले सचिन पायलट ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ जाकर, राजस्थान में अपनी ही सरकार के खिलाफ जाकर डेढ़-दो दर्जन विधायकों को लेकर सरकार गिराने की पूरी कोशिश की थी, और जब वह कोशिश नाकाम कर दी गई, तो उसके बाद क्या आज राजस्थान के कांग्रेस विधायकों का यह भी हक नहीं बनता कि वे पार्टी को तोडऩे, सरकार पलटाने की कोशिश करने वाले को मुख्यमंत्री बनाने का विरोध करते? इसमें अलोकतांत्रिक क्या था? यह तो सबसे ही लोकतांत्रिक बात थी कि विधायक दल ने उनके बीच के सबसे बड़े बागी, सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाने वाले नेता को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश को खारिज कर दिया। इसके पीछे गहलोत थे, या नहीं थे, क्या यह बात सचमुच ही मायने रखती है? पार्टी के 90 फीसदी विधायक सशरीर पायलट के खिलाफ एकजुट होकर खड़े थे, और क्या कांग्रेस हाईकमान के लिए यह एक नैतिक और जायज बात थी कि वह अपने आखिरी हफ्तों में एक ऐसे अवांछित नेता को राजस्थान पर थोप दे जिसने सरकार के खिलाफ सबसे बड़ी साजिश की थी, पार्टी को फजीहत में डाला था, और जिसके खिलाफ राजस्थान के पार्टी विधायक एकजुट हैं?

गहलोत से भला ऐसी कैसी पारिवारिक वफादारी की उम्मीद लोकतांत्रिक हो सकती है जिस परिवार के सीधे कब्जे से बाहर पार्टी को ले जाने की कवायद चल रही है? या तो सोनिया परिवार पार्टी पर काबिज रहे, या किसी दूसरे को पार्टी अध्यक्ष बनकर पार्टी को बचाने की कोशिश करने का एक मौका दे। जिसे पार्टी अध्यक्ष बनाने की नीयत चल रही है, उसी की मर्जी, उसी की राजनीति, उसी के समर्थकों और पार्टी विधायकों के बहुमत के खिलाफ जाकर राजस्थान में कांग्रेस की आज की लीडरशिप जिस तरह से सत्ता पलट करवाने की कोशिश कर रही थी, वह एक बहुत ही अलोकतांत्रिक फैसला था। जो लोग गहलोत को नाशुक्रा और सोनिया के प्रति धोखेबाज साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, वे इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि ऐसा शुक्रगुजार और वफादार होना कोई लोकतांत्रिक बात नहीं होती कि पार्टी विधायकों की मर्जी के खिलाफ गहलोत राजस्थान में पायलट को मुख्यमंत्री बनाने देते। उनकी अपनी मर्जी तो पायलट के खिलाफ रही ही होगी, विधायकों का बहुमत भी उनके साथ था।

गहलोत ने पार्टी से पुराने रिश्तों के चलते हुए, और शायद मुख्यमंत्री बने रहने के लिए सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद सार्वजनिक रूप से यह कहा कि उन्होंने सोनिया से माफी मांग ली है कि पार्टी की मर्जी का प्रस्ताव पास नहीं करवा पाए। उनकी इस माफी को कांग्रेस लीडरशिप की इज्जत बच जाने का सुबूत भी करार दिया जा रहा है। लेकिन यह पूरा सिलसिला पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है, और इस पूरे गहलोत-प्रकरण में कांग्रेस हाईकमान की बददिमागी का एक बड़ा सुबूत है जिसने मानो यह भी तय कर लिया था कि गहलोत को क्या बना दिए जाने के बाद उनसे कौन सा त्याग पा लेना पार्टी का हक है। देश के कुल दो राज्यों तक सिमट चुकी कांग्रेस पार्टी के हाईकमान को पार्टी का अस्तित्व पूरी तरह खत्म हो जाने के पहले तक और कितनी बददिमागी दिखाने की जरूरत है?

(Daily Chhattisgarh)

मौतें तो यूपी में हुईं, लेकिन बाकी देश क्या उससे बेहतर?

 2 अक्टूबर 2022

 

उत्तरप्रदेश के कानुपुर में एक मंदिर से मुंडन कराकर लौट रहे लोगों की ट्रैक्टर-ट्रॉली एक तालाब में जा गिरी, और 27 लोग मारे गए। ट्रैक्टर चला रहे आदमी के बेटे का ही मुंडन था, और तमाम लोग रिश्तेदार और करीबी लोग थे। मुंडन से लौटते हुए रास्ते में सभी ने शराब पी थी, और ड्राइवर खुद नशे में अंधाधुंध रफ्तार से ट्रैक्टर-ट्रॉली दौड़ा रहा था। अब जब हादसा हो ही गया है तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि ट्रैक्टर-ट्रॉली का इस्तेमाल सिर्फ सामान ढोने के लिए होना चाहिए, और अगर इसमें लोगों को ढोया गया तो उस पर कड़ी कार्रवाई होगी।

यह हादसा उत्तरप्रदेश में जरूर हुआ है, लेकिन देश के अधिकतर हिस्सों में ट्रैफिक नियमों का यही हाल है। ट्रैक्टर-ट्रॉली के अलावा ट्रक और दूसरे मालवाहक इंसानों को ढोकर चलते हैं। इनमें किसी तरह की कोई हिफाजत तो हो नहीं सकती है, और ऐसा भी नहीं कि ये किसी धार्मिक या पारिवारिक कार्यक्रम में आने-जाने वाले लोग ही हों, कारोबारी गाडिय़ों में मुसाफिरों को ले जाने का काम ग्रामीण भारत में जगह-जगह देखने मिलता है। और अभी जब एक बड़े कारोबारी की कार हादसे में मौत हुई, और केन्द्र सरकार ने कारों में पीछे की सीट पर बैठे हुए लोगों के लिए भी सीट बेल्ट जरूरी करने की बात कही, तो लोगों ने देश भर से गाडिय़ों की छतों पर लबालब सवार लोगों की तस्वीरें पोस्ट कीं कि ये कौन सा सीट बेल्ट लगाएंगे? इंसान की जिंदगी इस कदर सस्ती मान ली गई है कि उसे बचाने की कोई भी कोशिश न की जाए, तो भी सरकार की साख पर अब सवाल नहीं उठते। एक वक्त था जब राजनीतिक सभाओं के लिए लोगों को इसी तरह ट्रैक्टर-ट्रॉली और ट्रकों में ढोया जाता था। अब लोग खुद अपने हक की मांग करने लगे हैं, और वे बसों या दूसरी मुसाफिर गाडिय़ों के बिना किसी सभा की भीड़ बढ़ाने नहीं जाते। नतीजा यह है कि रेत-गिट्टी की तरह इंसानों को ढोना कुछ घटा है। लेकिन यह सिर्फ राजनीतिक सभाओं में घटा है, देश के शहरों में खुद सरकारी गाडिय़ां और मशीनें मजदूरोंं को ढोकर चलती हैं, बुलडोजरों पर मजदूरों को ढोया जाता है, और मौत होने पर मुख्यमंत्रियों के पास राहत देने के लिए तो अपार ताकत है ही।

अब हिन्दुस्तान में किसी भी तरह का सरकारी सुधार अदालती दखल के बिना होना मुमकिन नहीं रह गया है। और तो और हिंसक कोलाहल करते हुए जुलूस और बारात भी अदालती दखल के बिना रोकने की कल्पना सरकार नहीं करती, बल्कि अदालती हुक्म के बाद भी नहीं रोकती। ऐसे में अगर मुसाफिर ढोने वाले ऑटोरिक्शा तीन सवारियों के बजाय एक मिनी बस की तरह डेढ़-दो दर्जन सवारियां लेकर चलते हैं, तो इन्हें न रोकने के सरकारी फैसले के खिलाफ अदालत जाने के अलावा लोगों के पास और रास्ता क्या है? ऐसी गाडिय़ां सडक़ों पर अपने मुसाफिरों के अलावा भी दूसरों के लिए भी खतरनाक होती हैं, और इन पर रोक लगाने का काम जनता की भीड़ अगर करेगी, तो उस पर वही अफसर तरह-तरह के जुर्म लगा देंगे जिन पर ऐसी गाडिय़ों को रोकने की कानूनी जिम्मेदारी बनती है। लोगों के बीच यह जागरूकता आना जरूरी है कि सडक़ों पर ट्रैफिक नियम तोडऩे देना सरकार का हक नहीं है, बल्कि इन नियमों को लागू करवाना जनता का हक है।

अब ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट और देश के अलग-अलग हाईकोर्ट को अपनी वेबसाईट बनानी चाहिए, और सोशल मीडिया पेज बनाने चाहिए जहां पर लोग कानून तोड़े जाने के खिलाफ सुबूत पोस्ट कर सकें। यह बात अदालतें बरसों से मान रही हैं कि उन तक दौड़ लगा पाना आम लोगों के बस के बाहर की बात है। अब जरिया यही हो सकता है कि लोग अदालतों के सोशल मीडिया पेज पर कानून तोडऩे के वीडियो पोस्ट करें, और अदालतें अपना सोशल मीडिया-मित्र तैनात करके ऐसे मामलों पर सरकार से जवाब-तलब करे। किसी हाईकोर्ट को तो ऐसी पहल करनी पड़ेगी, और आज जब मोबाइल फोन और इंटरनेट का वक्त आ चुका है, तब जनता से यह उम्मीद करना कि वह सरकार से शिकायतों को लेकर कोई वकील तय करके अदालत तक जाए। अब लोगों को अदालत तक एक आसान और मुफ्त की पहल मुहैया कराना जरूरी है। कायदे की बात तो यह होती कि जिलों में पुलिस और प्रशासन ने ही ऐसी पहल की होती क्योंकि कानून तोड़े जाने की शिकायत तो सरकार के काम में मदद के अलावा कुछ नहीं है, लेकिन सरकारों में संगठित भ्रष्टाचार इतना अधिक है कि कानून तोडऩे वालों से माहवारी वसूलना एक बेहतर काम है, आसान काम है, बजाय कानून लागू करने के। उत्तरप्रदेश का यह ताजा हादसा ऐसे ही संगठित भ्रष्टाचार का एक सुबूत है, और यह बात पूरे देश में इसी एक प्रदेश में कोई अनोखी बात नहीं है, अधिकतर राज्यों में हाल ऐसा ही है, और जहां हादसा हो गया है वहां की बात सिर चढक़र दिख रही है। बाकी राज्यों को भी अपना-अपना घर सुधारना चाहिए, और इंसानी जिंदगियों को भ्रष्टाचार के लिए खत्म करना बंद करना चाहिए। किसी भी सरकार को कानून तोडऩे वालों को ऐसी छूट देने का कोई हक नहीं है, और अगर सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती हैं, तो फिर जनता को सोशल मीडिया पर इसके सुबूत लगातार पेश करना चाहिए, हो सकता है कि किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को इस पर कार्रवाई करना जरूरी लगे।

(Daily Chhattisgarh)

धर्म को संविधान दिखाया तो धर्मान्ध भडक़ उठे और दलित व्याख्याता बर्खास्त..

1 अक्टूबर 2022

 

उत्तरप्रदेश के वाराणसी में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के एक अतिथि व्याख्याता मिथिलेश गौतम को विश्वविद्यालय ने उनकी एक फेसबुक पोस्ट पर खड़े-खड़े बर्खास्त कर दिया है, और विश्वविद्यालय के अहाते में उनके घुसने पर रोक लगा दी है। मिथिलेश गौतम ने लिखा था- महिलाओं को नौ दिन के नवरात्र व्रत से अच्छा है कि नौ दिन भारतीय संविधान और हिन्दू कोड बिल पढ़ लें, उनका जीवन गुलामी और भय से मुक्त हो जाएगा, जय भीम।

नाम और जय भीम इन दोनों से यह जाहिर है कि मिथिलेश गौतम दलित समाज के दिखते हैं, और उन्होंने हिन्दू धर्म की मान्यताओं के मुकाबले भारतीय संविधान का गुणगान करते हुए हिन्दू महिलाओं को संविधान पढऩे की एक साधारण और पूरी तरह कानूनी सलाह दी थी। लेकिन इस सलाह पर विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. सुनीता पांडेय के दस्तखत से जारी बर्खास्तगी की चि_ी में कहा गया है कि विश्वविद्यालय के छात्रों ने 29 सितंबर को सोशल मीडिया पर डॉ. गौतम की पोस्ट के खिलाफ शिकायती पत्र दिया। डॉ. गौतम की इस हरकत से विश्वविद्यालय के छात्रों में आक्रोश फैलने, माहौल खराब होने, और इम्तिहान और दाखिला बाधित होने की वजह से राजनीति शास्त्र के अतिथि प्रवक्ता डॉ. गौतम को तुरंत ही बर्खास्त करते हुए विश्वविद्यालय परिसर में उनके आने पर रोक लगाई जाती है। 29 सितंबर को ही छात्रों ने यह शिकायत की, और उसी दिन यह बर्खास्तगी हो गई। इस रफ्तार से ही यह जाहिर है कि यह इंसाफ किस तरह का हुआ होगा। और यह बात तो समझ से परे है ही कि हिन्दू महिलाओं को भारतीय संविधान और हिन्दू कोड बिल पढऩे की सलाह देना किस तरह एक दलित का जुर्म करार दिया जा सकता है?

जो हिन्दू धर्म हिन्दुस्तान में अपनी आबादी के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बताने में लगे रहता है, वह हिन्दू धर्म जनगणना निपट जाने के बाद अपने तथाकथित लोगों के भीतर से दलितों और आदिवासियों को कुचलने और काटने में जुट जाता है। दलितों को हिन्दुओं की संख्या बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि जब भारत सरकार से कमेटी मेडिकल कॉलेज की जांच के लिए आती है तो घर बैठे रिटायर्ड चिकित्सा-प्राध्यापक को भी मेहनताने पर ला-लाकर मेडिकल कॉलेज के शिक्षकों की गिनती बढ़ाकर दिखाई जाती है ताकि मान्यता मिल जाए। उसी तरह देश में सबसे अधिक हिन्दू आबादी साबित करने के वक्त हिन्दू समाज के सबसे आक्रामक शुद्धतावादी लोगों को भी दलित और आदिवासी हिन्दू लगने लगते हैं, और जनगणना के तुरंत बाद ये अवांछित लोग उन्हें सरकारी दामाद लगने लगते हैं, और तुलसी दास के शब्दों में ताडऩ के अधिकारी लगने लगते हैं, यानी मार खाने लायक। अब एक दलित ने अगर हिन्दू धर्म के पूजा-पाठ के किसी रिवाज के मुकाबले देश के संविधान को पढऩा बेहतर बताया है, तो इसे जुर्म करार देते हुए उसकी नौकरी खत्म कर दी गई। और बात सही भी है कि किसी भी धर्म के अस्तित्व को सबसे बड़ा खतरा किसी संविधान से ही हो सकता है, और खासकर तब जब वह संविधान समाज सुधार की बात भी करता हो, और धर्म के सबसे कट्टरपंथी शुद्धतावादी ऐसे किसी संभावित सुधार के खिलाफ लगे रहते हों। अभी महात्मा गांधी के नाम पर बनाए गए इस विश्वविद्यालय ने मेहरबानी यही की है कि इस दलित के मुंह और कान में पिघला हुआ सीसा भर देने की सजा नहीं सुनाई है, महज नौकरी से निकाला है।

हिन्दुस्तान के विश्वविद्यालयों के चाल-चलन को देखें, तो हैरानी होती है कि इनका विश्व से क्या लेना-देना हो सकता है? इनका तो अपने देश से, अपने ही प्रदेश से कोई लेना-देना नहीं है, देश के संविधान से कोई लेना-देना नहीं है, संविधान की चर्चा जहां एक जुर्म है, वैसे संस्थान भला क्या खाकर विश्व की बात कर सकता है? दुनिया के महान विश्वविद्यालय खुले शास्त्रार्थ से ही पनप सकते हैं, पनपते हैं। गहरे अंधेरे कुएं, या लंबी अंधेरी सुरंग जैसे दिमाग वाले लोग विश्व शब्द इस्तेमाल करने का भी हक नहीं रखते। जिनको संकुचित धार्मिक मान्यताओं के मुकाबले एक धर्मनिरपेक्ष संविधान के प्रावधानों की चर्चा भी बर्दाश्त नहीं है, वे विश्व से कौन सा ज्ञान ले सकते हैं, और कौन सा ज्ञान विश्व को दे सकते हैं? अगर एक दलित की दी गई सलाह कट्टरपंथी, तंगदिमाग, शुद्धतावादी हिन्दू पुरूषप्रधान लोगों को इतनी खटक रही है, तो उन्हें कार्रवाई के कोड़े मारकर एक सवालिया दलित की नौकरी खाने से अधिक हौसले का कुछ करके दिखाना चाहिए। उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए कि वे अपने धर्म की मान्यताओं को बेहतर कैसे बना सकते हैं। सवाल को विश्वविद्यालय के अहाते में घुसने से रोक देना यह बताता है कि यह संस्थान विश्वविद्यालय बनने के लायक नहीं है। जहां सवालों पर रोक लगे वह जगह समझदारी की किसी भी बात के लायक नहीं है।

आज हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म या हिन्दू समाज के नाम पर एक शुद्धतावादी-कट्टरपंथी हमलावर सोच हावी है, और वह अपने आपको मानो इस विशाल समाज का सरगना मान चुकी है। इस स्वघोषित अगुवाई को आज की सत्ता से भी बेहिसाब ताकत हासिल है, और ऐसे ही हमलावर हिन्दुत्व की वजह से दलितों और आदिवासियों को इस धर्म-समाज से परे दूसरे रास्ते सूझते हैं। जो दलित अपने को एक वक्त हिन्दू मानते थे, वे बीती पौन सदी में लगातार ऐसे हिन्दुत्व को छोड़-छोडक़र दूसरे धर्मों में गए। दूसरी तरफ जिन आदिवासियों ने अपने को कभी हिन्दू नहीं माना, उन्होंने भी अपने आदिवासी-धर्म को छोडक़र अगर कोई दूसरा धर्म अपनाया है, तो उन्होंने हिन्दुत्व नहीं अपनाया। यह बात जाहिर है कि हिन्दू धर्म के भीतर वर्ण व्यवस्था के पांवों के भी नीचे की जगह पाने से बेहतर यह है कि दलित और आदिवासी ऐसे दूसरे धर्म में रहें जहां उन्हें कम से कम इंसान तो माना जाता है। महात्मा गांधी के नाम पर बनाए गए इस विश्वविद्यालय से गांधी का नाम तो पहले हटा देना चाहिए, और फिर वहां बेधडक़ दलितविरोधी काम करना चाहिए, कम से कम गांधी का नाम बदनाम न हो।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 अक्टूबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)