चुनाव प्रभावित करने की सुपारी लेने वाले इजराइली कारोबार लोकतंत्र पर खतरा
20 फरवरी, 2023
दुनिया के कई सबसे प्रतिष्ठित अखबारों के रिपोर्टरों ने मिलकर अभी एक सबसे बड़ी सनसनीखेज रिपोर्ट पेश की है जिसमें एक इजराइली कारोबारी को दुनिया के दर्जनों देशों ने चुनाव प्रभावित करने का ठेका लेते पाया गया है। रहस्य के पर्दों में रहने वाला यह इजराइली आखिरकार जाकर शातिर रिपोर्टरों के स्टिंग ऑपरेशन में फंसा, और वह कम्प्यूटर स्क्रीन पर इन रिपोर्टरों को यह बताते हुए कैद हुआ कि वे किस तरह लोगों के ईमेल खातों में घुसपैठ करते हैं, और सोशल मीडिया अकाऊंट्स को प्रभावित करके चुनाव के वक्त माहौल बदलने का काम करते हैं। बरसों से इस इजराइली चुनावी-सुपारी लेने वाले कारोबारी के बारे में चर्चा होती थी, लेकिन वह कभी सामने नहीं आया था, कभी फंसा नहीं था, लेकिन अब वह उजागर हो गया है, और उसने जिन दर्जनों देशों के नाम गिनाए हैं कि उसने वहां के चुनावों को प्रभावित किया है, उनमें भारत का नाम भी है। और उसका यह दावा भी है कि जिन अब तक 31 देशों में उन्होंने चुनाव प्रभावित किए हैं, उनमें से 26 देशों में नतीजे उनके मनमाफिक आए हैं। उन्होंने राजनीतिक दलों, सरकारों, और कारोबारियों से ठेके लेकर जनमत प्रभावित करने के ऐसे बड़े-बड़े साइबर-अभियान चलाए थे।
इस एजेंसी का भांडाफोड़ करने के लिए पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन, आईसीजे (इंटरनेशनल कन्सोर्र्टिएम ऑफ इंवेस्टीगेटिव जर्नलिस्ट्स, की जिस टीम में काम किया उसमें 30 से ज्यादा मीडिया संस्थानों के पत्रकार जुड़े हुए थे। इन पत्रकारों ने संभावित ग्राहक बनकर इस इजराइली कारोबारी से संपर्क किया था, और नए ग्राहक फंसते देख इस इजराइली ने बारीकी से यह बताया कि वे किस तरह किसी के भी ईमेल अकाऊंट को हैक कर सकते हैं, सोशल मीडिया पर कम्प्यूटर एप्लीकेशनों की मदद से चलाए जाने वाले अनगिनत अकाऊंट से वे किसी पार्टी या उम्मीदवार के पक्ष में या उसके खिलाफ माहौल खड़ा कर सकते हैं। यह इजराइली कारोबारी वहां का रिटायर्ड फौजी या खुफिया अफसर रहा हुआ है, और वह बिना किसी पहचान के, अपना नाम और चेहरा छुपाए हुए इसी तरह के खुफिया अभियान चलाने का कारोबार करता है। लोगों को याद होगा कि दो बरस पहले जब इजराइली फौजी घुसपैठिया सॉफ्टवेयर पेगासस का भांडा फूटा था, तो वह भी पत्रकारों की इसी किस्म की एक टोली की बनाई हुई रिपोर्ट थी, और उसमें इजराइली कंपनी का यह दावा था कि वह सिर्फ सरकारों को ही यह स्पाइवेयर बेचती है। इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी दावा था कि भारत में उसका इस्तेमाल हुआ है। फिर भारत के सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला पहुंचने पर अदालत के सामने भारत सरकार ने साफ-साफ यह कहा था कि वह ऐसा कोई हलफनामा नहीं देगी कि उसने पेगासस खरीदा या उसका इस्तेमाल किया है या नहीं। अभी तक सुप्रीम कोर्ट में इसकी जांच चल ही रही है, कि यह दूसरा इजराइली कारोबार सामने आया है जो लोगों के ईमेल अकाऊंट में घुसपैठ तो करता ही है, वह साथ-साथ जनधारणा बनाने, और जनमत को मोडऩे का ठेका भी लेता है ताकि चुनावों को प्रभावित किया जा सके।
पिछले कई बरस से भारत में भी यह फिक्र चल रही है कि सोशल मीडिया पर तमाम वक्त कुछ ताकतें एक खास किस्म के एजेंडा को बढ़ाने का काम कर रही हैं। लेकिन इसके कोई सुबूत सामने नहीं आए थे। यह पहला ऐसा सुबूत दिख रहा है जिसमें यह इजराइली कंपनी साइबर-जुर्म करके चुनावों को प्रभावित करने का ठेका ले रही है, और उसके ग्राहकों की लिस्ट में हिन्दुस्तानी चुनाव की कोई एक ताकत भी है। यह जांच किसी किनारे तक पहुंचे या न पहुंचे, लोगों को इस खतरे को समझने की जरूरत है कि जिस सोशल मीडिया को दुनिया एक बहुत बड़ा लोकतांत्रिक औजार मानकर चलती है, वह लोकतंत्र के खिलाफ एक उतने ही बड़े भाड़े के हथियार की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर यह रिपोर्ट सही है, और इजराइली घुसपैठिया कंपनी इजराइल की बहुत सी दूसरी बदनाम निगरानी-कंपनियों की तरह काम करती है, तो हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र के लिए यह एक बहुत बड़ा खतरा है। हिन्दुस्तान के लिए खतरे को इस हिसाब से समझना चाहिए कि आज इजराइल के पूरे निर्यात का आधा हिस्सा अकेला हिन्दुस्तान खरीदता है। इसके अलावा भारत की आज की सरकार अपनी विदेश नीति में इजराइल के साथ खड़ी हुई है, और फिलीस्तीनियों को भारत का ऐतिहासिक और परंपरागत समर्थन अब तक खत्म हो गया दिखता है। ऐसे में भारत की कुछ ताकतें अगर एक ग्राहक की शक्ल में ऐसे इजराइली कारोबारी को ठेका देती हैं, तो यह बात इजराइल की सरकार और वहां के सारे कारोबार को भी माकूल बैठेगी क्योंकि वह कारोबार को जारी रखने वाली बात होगी। इसलिए भारत में इस पर अधिक बारीकी और चौकन्नेपन से गौर किया जाना चाहिए कि इस देश के किस चुनाव में किस पार्टी या संगठन, सरकार या नेता ने इन्हें जनमत प्रभावित करने की सुपारी दी थी।
सोशल मीडिया अच्छा हो या बुरा, वह अब एक अपरिहार्य ताकत बन चुका है, और किसी भी चुनाव में इसकी ताकत को अनदेखा करना ठीक नहीं होगा। फिर फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म दुनिया के कई देशों में तरह-तरह की जांच और संसदीय सुनवाई का सामना कर रहे हैं कि वह किस तरह अपने इस्तेमाल करने वाले लोगों की सोच को प्रभावित करने का काम करते आया है। फेसबुक और ट्विटर जैसे अमरीकी कारोबार को अमरीका में ही संसदीय जांच का सामना करना पड़ रहा है कि वे राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने, या पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के उकसावे पर हिंसा को बढ़ाने का काम करते रहे हैं। ऐसे माहौल में हिन्दुस्तान जैसे देश को यह समझना चाहिए कि अब यहां ईवीएम से चुनावी धोखाधड़ी के आरोपों से चिपके रहने से कुछ साबित नहीं होगा। अब सोशल मीडिया के खतरों को समझना होगा, और अनगिनत इजराइली कंपनियों की बदनीयत पर भी नजर रखनी होगी कि वे लोकतंत्रों को किस तरह अपना वफादार ग्राहक बनाने में लगी रहती हैं।
मिसाल तो मलबेतले से भी निकलती है, और समंदर के सीने पर से भी
19 फरवरी, 2023
भूकम्प से बर्बाद तुर्की से अभी दो-तीन दिन
पहले खबर आई थी कि वहां गिरी हुई इमारत के मलबे तले दस दिनों से दबी हुई एक
लडक़ी को इतना वक्त सर्द मौसम में गुजार लेने के बाद अभी बचाया जा सका है।
दसवें दिन भी दो महिलाओं और दो बच्चों को मलबे से जिंदा निकाला गया था। इसे
करिश्मा ही माना जा रहा था, और यह एक विश्व रिकॉर्ड बन गया था कि अभी तीन
दिन और गुजरने के बाद तीन लोगों को मलबे के नीचे से और बचा लिया गया है,
यानी पिछला रिकॉर्ड तीन दिन भी नहीं टिक पाया। ये लोग भूख-प्यास के बावजूद
बिना किसी मदद के, बिना गर्म कपड़ों के जिंदा थे। तुर्की और सीरिया के इस
भूकम्प में 46 हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। इसे सदी का इस इलाके का
सबसे जानलेवा भूकम्प माना जा रहा है, और लोगों के इस तरह बचने को आस्तिक
लोग ऊपरवाले की मेहरबानी मान रहे हैं, और नास्तिक लोग इसे इंसान के जिंदा
रहने के जज्बे की एक बड़ी मिसाल।
जो भी हो, तुर्की और सीरिया के इस हाल को देखकर बाकी दुनिया को हौसले की एक बड़ी नसीहत लेने की जरूरत है। दुनिया का हर हिस्सा इतनी बड़ी मुसीबत से नहीं घिरता है। खासकर सीरिया तो बरसों से गृहयुद्ध से घिरा हुआ है, विदेशी हमलों का शिकार है, और कल ही इजराइल ने वहां एक मिसाइल हमला किया जिसमें 15 मौतों की खबर है। इतने किस्म की कुदरती और इंसानी मार कुछ देशों पर पड़ी हुई है, लेकिन वहां लोगों का हौसला है जो कि दस-दस मंजिली इमारतों के दस-बीस फीट ऊंचे रह गए मलबे के नीचे भी जिंदा है। और यह हौसला देखकर उन लोगों को बहुत कुछ सीखना चाहिए जो कि अपनी जिंदगी की अनिश्चितता से, उसकी नाकामयाबी से, उसकी तकलीफों से निराश होकर जिंदगी छोडऩे की सोचते हैं। ऐसा आए दिन हो रहा है, अभी दो दिन पहले ही ये आंकड़े सामने आए कि हिन्दुस्तान में पिछले दो-तीन बरसों में कितने लाख मजदूरों ने खुदकुशी की, कितनी लाख महिलाओं ने जान दे दी, और ऐसे ही कुछ और तबकों के भी आंकड़े सामने आए हैं। कई लोग इसे कोरोना और लॉकडाउन के दौर में सरकार की नाकामी का नतीजा मान रहे हैं, कुछ लोग इसकी जड़ें नोटबंदी और जीएसटी की दिक्कतों से बर्बाद हुए कारोबार में देख रहे हैं, जो भी हो, आम हिन्दुस्तानी की हालत आज किसी इमारत के मलबे में दबे हुए इंसान से बेहतर तो है ही। दुनिया की मिसालों से सरकारों को भी सबक लेना चाहिए, और लोगों को भी। किसी भी मिसाल से इन दोनों के लिए अलग-अलग नसीहतों का मौका रहता है, और सरकारों के लिए भी हम लिखते ही रहते हैं कि देश में धर्मान्धता और कट्टरता को बढ़ाने का नतीजा क्या होता है, इसे समझने के लिए अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे नाकामयाब लोकतंत्रों की तरफ देखना चाहिए, और अब तक वैसी नौबत में न पहुंचे हुए देशों को वैसी धर्मान्धता, और कट्टरता से बचना चाहिए। लेकिन सरकारों से परे इंसानों के सीखने की बातें भी तमाम नौबतों में रहती हैं। लोगों को बुरे से बुरे वक्त में भी किसी अच्छे की न तो उम्मीद छोडऩी चाहिए, और न ही उसकी कोशिश बंद करनी चाहिए।
जिंदगी की छोटी-छोटी मिसाल भी बड़े-बड़े हौसले दे जाती है। फिलीस्तीन में इजराइली हमले का शिकार एक ऐसा फोटोग्राफर है जिसका बदन बस कमर के ऊपर बचा है, नीचे कुछ भी नहीं है। और वह न सिर्फ जिंदा है, बल्कि पहियों की कुर्सी पर चलते हुए वह फोटोग्राफी का अपना काम भी करता है, और फिलीस्तीन की आजादी की लड़ाई भी लड़ता है। ऐसे और भी लोग हैं जो बिना हाथ-पैर के पैदा हुए हैं, और जो आज दूसरे लोगों को प्रेरणा देने के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रमों में मंच पर व्याख्यान देते हैं। एक वक्त कुछ लोग इस बात पर बहस कर रहे थे कि वे तो अंग्रेजी जानते नहीं हैं, और दुनिया घूमने कैसे जा सकते हैं, तो एक समझदार ने उन्हें याद दिलाया कि जो लोग मूक-बधिर होते हैं, न सुन सकते न बोल सकते, क्या वे कहीं जाते ही नहीं हैं? और यह बात भी कई बरस पहले की थी, अब तो आम मोबाइल फोन पर लोग दुनिया की किसी भी देश की जुबान में अनुवाद कर सकते हैं, किसी भी भाषा में पूछे गए सवाल का अपनी भाषा में जवाब देकर उसे मोबाइल फोन की स्क्रीन पर किसी तीसरी या चौथी भाषा में भी दिखा सकते हैं। जरूरत हौसले की थी, और टेक्नालॉजी ने तो वक्त के साथ सारी दिक्कतें दूर कर ही दीं। लेकिन टेक्नालॉजी हौसला नहीं दिला सकती, वह खुद का ही लगता है। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले जब अमरीका के न्यूयॉर्क में मौसम के बदलाव के खतरों पर एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम हो रहा था, तो स्वीडन की एक किशोरी, ग्रेटा थनबर्ग, लोगों का ध्यान खींचने के लिए एक बोट पर सवार होकर 35 सौ मील का समुद्री सफर तय करके न्यूयॉर्क पहुंची थी, और तब से लेकर अब तक वह मौसम के बदलाव के मोर्चे पर दुनिया की सबसे लड़ाकू नौजवान सामाजिक कार्यकर्ता बनी हुई है। इस लडक़ी ने अपने मां-बाप से लेकर अपने स्कूल तक, और अपने देश की संसद तक को अपने आंदोलन से मजबूर किया कि वे जीवनशैली में बदलाव लाएं ताकि पर्यावरण बच सके। उसने शुरूआत घर से की, फिर अपना शहर, फिर अपना देश, और फिर समंदर चीरते हुए वह ब्रिटेन से अमरीका पहुंची थी। हिन्दुस्तान में इस टीनएज के तकरीबन तमाम बच्चे पर्यावरण के बजाय अपने मोबाइल फोन के अगले मॉडल में मगन दिखते हैं, और पर्यावरण को बचाना उन्हें सफाई कर्मचारियों और रद्दी बीनने वालों का जिम्मा लगता है। इसलिए न सिर्फ हौसले की, बल्कि जागरूकता की नसीहत लेना भी मुमकिन है, कोई दस मंजिला इमारत के मलबेतले बिना खाए-पिए सर्द मौसम में जिंदा रहने का हौसला दिखा रहे हैं, तो कोई अपने खेलने-खाने के दिनों में दुनिया को बचाने, गैरजिम्मेदार और लापरवाह अमरीकी राष्ट्रपति को आईना दिखाने के लिए समंदर चीरने का हौसला दिखाते हैं, और इन सबसे बाकी दुनिया के सीखने का बहुत कुछ रहता है। ऐसी हर मिसाल पर लोगों को अपने आसपास के लोगों से भी चर्चा करनी चाहिए, और चाहे इनसे कितनी ही शर्मिंदगी क्यों न खड़ी होती हो, लोगों को अपने बच्चों से भी इन मिसालों की चर्चा करनी चाहिए। हो सकता है कि वे फोन पर ऑर्डर किए हुए पीत्जा का इंतजार करते हुए वीडियो गेम खेल रहे हों, लेकिन उन्हें असल जिंदगी की ऐसी करिश्माई लगती घटनाएं जरूर बतानी चाहिए, हो सकता है कि किसी एक बात से उन्हें अपनी बाकी जिंदगी के लिए एक बेहतर रास्ता सूझे।
स्कूली चिकन लेग पीस पर, अपने बच्चों के हक की लड़ाई
19 फरवरी 2023
बंगाल की एक खबर है कि वहां के माल्दा जिले
में एक स्कूल के बच्चों के मां-बाप का यह कहना था कि स्कूल में दोपहर के
भोजन में जब चिकन परोसा जाता है, तो वहां के शिक्षक उसके सभी अच्छे हिस्सों
को (जिन्हें शायद लेग पीस कहते हैं) अपने लिए रख लेते हैं, और मुर्गे के
बदन के बाकी कम जायकेदार माने जाने वाले हिस्सों को बच्चों के खाने में
डालते हैं। मां-बाप का यह भी कहना था कि जिस दिन स्कूल में चिकन पकता है,
उस दिन शिक्षक पिकनिक के मूड में होते हैं, और वे बेहतर क्वालिटी का चावल
लाकर अपने लिए उसे अलग पकाते हैं। इस बात की शिकायत लेकर मां-बाप स्कूल
पहुंचे, और वहां शिक्षकों के साथ उनकी कहासुनी हो गई। बात बढऩे पर आधा
दर्जन शिक्षकों को पालकों ने एक कमरे में बंद कर दिया, और चार घंटे बंद
रखा, बाद में पुलिस ने आकर इन शिक्षकों को छुड़वाया।
अब बंगाल राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक, बहुत मुखर, और आक्रामक-सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति वाला प्रदेश है। यहां पर छोटी बातें भी बड़ा मुद्दा बन जाती हैं। एक वक्त की बात है कि कोलकाता में ट्राम की टिकट एक या दो पैसे बढ़ा दी गई थी, तो वहां राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सडक़ों पर गाडिय़ों में आग लगा दी थी। जागरूकता का हाल यह है कि इस राजधानी में फुटपाथों पर किताबों की दुकानें शायद हिन्दुस्तान में किसी भी दूसरे शहर के मुकाबले अधिक हैं। लोग दीवारों पर नारे लिखते हुए, समर्थन या विरोध के कार्टून बनाते हुए मानो खूबसूरत कलाकृतियां ही बना देते हैं। इसलिए अगर वहां के स्कूली बच्चों के मां-बाप ऐसे भेदभाव के खिलाफ ऐसा आक्रामक विरोध करते हैं, तो भी हैरानी की बात नहीं है, और अगर राजनीतिक असहमति की वजह से गांव के लोगों ने शिक्षकों के खिलाफ गुटबाजी करके ऐसा किया होगा, तो भी हैरानी नहीं होगी। पहले वामपंथी पार्टियों के राज में उनके कार्यकर्ता प्रदेश में ऐसे किसी भी मुद्दे को लेकर राज करते थे, और अब ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सत्ता के बाहुबल का उसी तरह इस्तेमाल करती है। कुल मिलाकर बंगाल की राजनीतिक संस्कृति एक मुखर प्रतिक्रिया की है, और यह ताजा मामला उसी की एक मिसाल है।
लेकिन इस बात से मेरे अपने बचपन की कुछ यादें ताजा हो गई हैं। मैं छत्तीसगढ़ के उस वक्त के एक जिला मुख्यालय वाले शहर के म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ता था। यह बात आधी सदी के और पहले की है। उन दिनों यूनीसेफ या विश्व स्वास्थ्य संगठन किसी के बैनरतले हिन्दुस्तानी गरीब बच्चों को कुपोषण से बाहर लाने के लिए विदेशी दूध पाउडर आता था, और विटामिन, कैल्शियम, या किसी और किस्म की गोलियां भी आती थीं। हर शनिवार स्कूल की छुट्टी जल्दी होती थी, और आखिरी घंटे में सबकी नजरें मैदान के उस कोने पर लगी रहती थीं जहां एक भट्टी पर बड़े से गंज में दूध पाउडर को खौलाकर दूध बनाया जाता था, और उसके बाद हम सब छात्र एक-एक गिलास लेकर कतार में लग जाते थे, और सबको आधा-पौन गिलास दूध मिलता था, और एक-एक गोली मिलती थी। इस खुराक की साख इतनी थी, और इससे इतने करिश्मे की उम्मीद रहती थी कि दवा खाने और दूध पीने के तुरंत बाद तमाम बच्चे किसी बॉडीबिल्डिंग मुकाबले की तरह अपने हाथों को मोडक़र देखने लगते थे कि मांसपेशियां (मसल्स) बन गई हैं या नहीं?
उस वक्त वही एक किस्म का हफ्तावार मिड डे मील था, और आज सोचते हुए याद पड़ता है कि सभी जातियों के बच्चे थे, सभी धर्मों के भी थे, लेकिन दूध बनाने और देने वाले चपरासी या चौकीदार की जात या धरम की कोई चर्चा भी नहीं थी। यह 60 के दशक की बात थी, लेकिन स्कूल के शिक्षकों में ब्राम्हणों का बहुमत था, लेकिन किसी को भी उस दूध को पीने से इंकार नहीं रहता था। शायद जाति और धरम की समझ आने के पहले ही बच्चों को उससे उबर जाने की पहली नसीहत वहीं मिली होगी। बाद में जब देश में सरकारी स्कूलों में मिड डे मील कार्यक्रम शुरू किया गया, तो उसके पीछे की एक सोच यह भी थी कि स्कूलों में एक साथ खाते-पीते बच्चों के बीच से जाति की दीवारें टूटेंगीं, और मोटेतौर पर वैसा हुआ भी, कई जगहों पर जाति व्यवस्था ने अपने खूनी पंजे दिखाए, लेकिन कहीं सरकारों की सख्ती से, तो कहीं अदालती दखल से, कुल मिलाकर सरकारी स्कूलों के गरीब बच्चों के बीच एक साथ खाना तकरीबन सभी जगह होने लगा। कुपोषण से मुक्ति के अलावा यह एक बड़ा फायदा हुआ, लेकिन यह बात तो आज के मुद्दे से परे की है, और कुछ लंबी खिंच गई।
मुद्दे की बात यह है कि उस वक्त हमारी म्युनिसिपल स्कूल के शिक्षक दूध वाले ऐसे दिन कागजों में बांधकर दूध पाउडर के एक-दो किलो के पैकेट साइकिल के पीछे फंसाकर ही घर जाते थे। यह सिलसिला बहुत लंबा नहीं चला, लेकिन जब तक चला, तब तक अधिकतर, या सभी शिक्षकों के लिए यह आम बात थी कि दूध पीना भी था, और बांधकर घर भी ले जाना था। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जो कि उस समय मध्यप्रदेश का हिस्सा था, वहां जनता के बीच जागरूकता न तब थी, न आज है। जब अविभाजित मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कैबिनेट में सैकड़ों लोगों को सीधे सरकारी नौकरी दे दी, तो केरल से आए हुए एक आईएएस अफसर ने हैरानी जाहिर की थी, और व्यक्तिगत बातचीत में मुझसे कहा था कि यह आपके प्रदेश मेें ही हो सकता है, हमारे केरल में सरकार मुकाबले से परे किसी एक को भी नौकरी देने की हिम्मत नहीं कर सकती, क्योंकि लोग उसके खिलाफ अदालत चले जाएंगे, और सरकार कटघरे में होगी।
जनता की जागरूकता के बिना न उसके बच्चों को कोई हक मिल सकते, न उसे खुद कोई हक मिल सकता, और उन्हें कोई भविष्य तो मिल ही नहीं सकता। इस राज्य में पिछली सरकारों के वक्त से ही स्कूल शिक्षा विभाग एक सबसे भ्रष्ट विभाग बना हुआ है। यहां किताबें सप्लाई करने से लेकर फर्नीचर की खरीदी तक में खुला भ्रष्टाचार हावी रहा है, और हर सरकारी स्कूल में एक-दो कमरे टूटे हुए फर्नीचर से भरे हुए रहते हैं। लेकिन राज्य बनने के बाद के इन 22 बरसों में भी कहीं मां-बाप ने जाकर स्कूल की बदइंतजामी के खिलाफ आवाज उठाई हो, ऐसा सुनाई नहीं पड़ा। किसी-किसी स्कूल में जब शिक्षक दारू पिए हुए फर्श पर पड़े रहते हैं, या किसी महिला के साथ स्कूल की इमारत में बंद कमरे में रंगे हाथों पकड़ाते हैं, तो जरूर कुछ गांव वाले इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं। लेकिन बाकी बदइंतजामी, बाकी भ्रष्टाचार से लोग अछूते रहते हैं, बेअसर रहते हैं।
कुछ लोगों को लग सकता है कि बंगाल की तरह की हमलावर जागरूकता अच्छी नहीं है, और वह हिंसक होने लगती है, लेकिन हिंसा से नीचे दर्जे की, अमन-पसंद जागरूकता भी तो हिन्दीभाषी प्रदेशों में देखने नहीं मिलती। मां-बाप यह आवाज भी नहीं उठाते कि उनके बच्चों की स्कूल में शिक्षक कितने दिन आते हैं, कितने दिन नहीं आते, और शिक्षकों की कितनी कुर्सियां खाली पड़ी हुई हैं। मां-बाप चबूतरों पर बैठे हुए खाली वक्त गुजार लेते हैं, लेकिन बच्चों की स्कूल की तरफ झांकना जरूरी नहीं समझते, और गैरजिम्मेदार मां-बाप तो अब और बेफिक्र हो गए हैं कि बच्चों को एक वक्त का खाना स्कूल से मिल जाता है, अब वह अच्छा रहता है या नहीं, उनके हक के लायक रहता है या नहीं, इसकी फिक्र अपने आपको सबले बढिय़ा मानने वाले छत्तिसगढिय़ा में नहीं दिखती है।
बंगाल का यह ताजा मामला सच्चा है यह मानकर हम उसे एक मुद्दा मान रहे हैं कि चिकन का अच्छा हिस्सा उनके बच्चों को न मिलने पर वे स्कूल पहुंचकर शिक्षकों को बंधक बना लेते हैं। स्कूलों की कई बुनियादी दिक्कतों को लेकर, खामियों और मक्कारियों को लेकर हिन्दीभाषी इलाकों में लोगों में जागरूकता पता नहीं कभी आएगी भी या नहीं। लोगों को याद रखना चाहिए कि राजनीतिक जागरूकता वाला जिम्मेदार प्रदेश केरल अपने बच्चों को सबसे अच्छी शिक्षा देता है, सबसे अच्छा इलाज देता है, और जिंदगी में कामयाब होने के लायक सबसे अच्छी संभावनाएं भी अपने बच्चों को केरल ही देता है। अगली पीढ़ी को सिर्फ निजी विरासत, और अपना डीएनए नहीं दिया जाता, अपनी जागरूकता से अगली पीढ़ी को एक बेहतर भविष्य भी दिया जा सकता है।
भूकम्प से मलबा बने सीरिया और भूखे-बिलखते पाकिस्तान से सबक लेने की जरूरत...
18 फरवरी, 2023
भयानक भूकम्प से अभी हाल में गुजरे सीरिया
में इमारतों का मलबा भी नहीं उठ पाया है, नीचे लाशें बिना कफन दफन हैं
जिनकी गिनती भी नहीं हुई है, और शिनाख्त भी नहीं हुई है, और ऐसे सीरिया में
आईएसआईएस नाम के इस्लामी आतंकी संगठन ने एक हमला किया है जिसमें 53 लोगों
की मौत हो गई है। अगर किसी को उसके धर्म ने कुछ भला सिखाया होता तो वे लोग
आज भूकम्प से तबाह लोगों की मदद में लगे रहते, अभी इसी भूकम्प में पड़ोस के
टर्की में मलबे के नीचे से दस दिन बाद एक लडक़ी जिंदा निकली है, उससे सबक
लेकर सीरिया में भी लोगों को जिंदा निकालने की कोशिश करते, लेकिन उन्हें
अभी धर्म के आधार पर आतंकी हमले सूझ रहे हैं। और यह हमला कोई अनोखा नहीं
है, अभी हफ्ते भर के भीतर ही ऐसे ही एक दूसरे हमले में इसी आतंकी संगठन ने
16 लोगों को मार डाला था, और दर्जनों का अपहरण कर लिया था। एक दूसरी खबर
पाकिस्तान की है जहां प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अभी ट्वीट किया है कि
पाकिस्तान न सिर्फ आतंक को उखाड़ फेंकेगा बल्कि आतंकियों को कानून के कटघरे
तक लाकर मौत की सजा दिलवाएगा। उन्होंने लिखा है कि पिछले दो दशक में इस
देश ने अपना लहू बहाकर भी आतंक से मुकाबला किया है, और उसने इस दुष्टता को
हमेशा के लिए खत्म करने की कसम खाई है। पाक प्रधानमंत्री वहां की कारोबारी
राजधानी करांची के पुलिस मुख्यालय पर कल हुए आतंकी हमले के संदर्भ में बोल
रहे थे जिसमें चार लोग मारे गए थे, और 14 जख्मी हुए थे। पाकिस्तान के आतंकी
संगठन तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है।
जिस सीरिया से हमने आज बात शुरू की है वह सीरिया बरसों से गृहयुद्ध से गुजर रहा है, वहां के कई इलाके सरकारविरोधी विद्रोहियों के कब्जे में है। और वह इलाका भूकम्प में सबसे अधिक तबाह हुआ है। वहां तक अंतरराष्ट्रीय राहत पहुंचने में भी बहुत मुश्किल आई है। और वहां से यह मांग भी उठ रही है कि पड़ोसी टर्की से इस इलाके में राहत आने के लिए और रास्ते खोले जाएं, और सीरिया की सरकार भी इन इलाकों तक आवाजाही खोले। जब देश बरसों से चले आ रहे गृहयुद्ध, और फौजी हवाई हमलों का शिकार रहा है, और आज वहां दसियों हजार लोगों की भूकम्प से मौत का अंदेशा है, तब भी धार्मिक आतंकियों को जानलेवा हमलों के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा है। ऐसा भी नहीं कि धर्म से जुडऩे का मतलब नेक कामों से रिश्ता खत्म हो जाना ही होता है। दुनिया के बहुत से देशों में सिक्ख संगठन राहत पहुंचाने में सबसे आगे रहते हैं, और वे मुसीबत के वक्त अपने गुरुद्वारों को भी दूसरे धर्म के लोगों की प्रार्थना के लिए खोल देते हैं। एक वक्त ऐसा भी था जब सिक्ख धर्म की सत्ता को अपने कब्जे में किए हुए भिंडरावाले ने पंजाब में छांट-छांटकर गैरसिक्खों को अपने आतंकी हत्यारों से निशाना बनवाया था, लेकिन सिक्ख उससे उबर गए हैं, और वे आज दुनिया में राहत पहुंचाने में सबसे आगे शामिल रहते हैं। दूसरी तरफ आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन इस्लाम के नाम पर गृहयुद्ध और भूकम्प से मलबा हुए देश में आतंकी हमले किए जा रहे हैं।
सीरिया, और कुछ ही दूरी पर बसे हुए एक दूसरे मुस्लिम देश पाकिस्तान, इन दोनों में मजहबी आतंकियों को देखें, तो ये अपने-अपने देश की सरकारों के काबू से बाहर हैं, और धर्म के नाम पर ये अपने ही धर्म के लोगों को मार रहे हैं। अभी 20 दिन पहले पाकिस्तान के पेशावर में पुलिस के इलाके की एक मस्जिद में आतंकी आत्मघाती हमला किया गया था जिसमें हमलावर ने पुलिसवर्दी के भीतर विस्फोटकों से लैस होकर नमाज के दौरान धमाका किया, और करीब पांच दर्जन लोग मारे गए थे, और डेढ़ सौ से अधिक जख्मी हुए थे। आज पाकिस्तान में लोगों के खाने को आटा नहीं है, गाडिय़ां चलाने को पेट्रोल नहीं है, बिजली बंद है, और पिछले बरस की बाढ़ से देश की करोड़ों की आबादी अब तक उबर नहीं पाई है, लेकिन धार्मिक आतंकियों को कत्ले-आम सुहा रहा है। मतलब यह कि जिंदगी को बचाने के काम में धर्म की दिलचस्पी बड़ी सीमित रहती है, लेकिन थोक में कत्ल करने में धर्म दौड़ में सबसे आगे रहता है। हकीकत तो यह है कि पिछली सदियों में थोक में हुए अधिकतर कत्ल धर्म के नाम पर, धर्म की वजह से, धर्म के झंडे-डंडे के साथ ही हुए हैं।
दम तोड़ते देशों में मजहबी दहशतगर्दी के कत्ले-आम से बाकी दुनिया के लिए भी कुछ सबक है। एक वक्त जो देश अच्छे-भले चल रहे थे, वहां पर धार्मिक आतंकी संगठन इसलिए पनप और हावी हो पाए कि वहां लोगों के बीच धार्मिक कट्टरता पहले तो धार्मिक रीति-रिवाजों तक थी, बाद में वह कट्टरता में बदली, और फिर उसके बाद उसे हिंसा में तब्दील होने में अधिक वक्त नहीं लगा। दुनिया के जो देश आज वैज्ञानिक सोच खोकर धर्मान्धता के शिकार हो रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान और सीरिया जैसे दुनिया के बहुत से देशों का इतिहास देखना चाहिए कि एक वक्त वहां धर्म तो था, लेकिन धार्मिक-आतंकी नहीं थे। धर्म का मिजाज उसे कट्टरता की तरफ ले जाता है, यह कट्टरता उसे हिंसा की तरफ ले जाती है, और यह हिंसा उसे आतंकी बनाकर कामयाब होती है। इसलिए जिन देशों को, जिन लोगों को आज अपना धर्म सुहा रहा है, और जिन्हें अपने धर्म की कट्टरता पर भी उसे तालिबानी बुलाने पर बड़ी आपत्ति होती है, उन्हें यह समझना चाहिए कि यह पहाड़ से लुढक़ती हुई चट्टान सरीखी नौबत है जिसकी रफ्तार बढ़ती चलती है, और जो आखिर में जाकर जानलेवा ही साबित होती है। धर्म को जब भी नफरत से जोड़ा जाता है, किसी दूसरे धर्म के खिलाफ उसे खड़ा किया जाता है, देशों के कानून और संविधान के मुकाबले धर्म को अधिक ऊंचा दर्जा दिया जाता है, तो वहां पर अपने-अपने धर्मों के तालिबान बनाने का रास्ता खोल दिया जाता है, यह मंजिल पाने में वक्त कम या अधिक लग सकता है। समझदार देशों के लिए यह भी समझने की बात है कि जो देश मजहबी आतंक के शिकार हैं, उन देशों की तमाम संभावनाएं इन आतंकियों से जूझने में खत्म हो जाती हैं, उनकी अंतरराष्ट्रीय साख खत्म हो जाती है, उनकी आने वाली कई पीढिय़ां अपनी संभावनाओं को छू नहीं पातीं। इसलिए धर्म नाम के इस खूंखार जानवर को इंसानी लहू चटा-चटाकर इतना इंसानखोर नहीं बना देना चाहिए कि वह स्वर्ग नाम की पाखंडी धारणा को पाने के फेर में अपने ही देश, अपने ही धर्म, अपने ही लोगों को थोक में मारने में लग जाए। धर्म और धार्मिक आतंक के बीच नंगी आंखों से दिखने वाली कोई सीमारेखा नहीं होती है, इनके बीच सलेटी रंग का एक समंदर होता है, जिसमें मामला कहां तक पहुंचा है यह पता नहीं लगता। धर्म की कातिल ताकत को समझने की जरूरत है, और सीरिया से लेकर पाकिस्तान तक, अफगानिस्तान से लेकर कई अफ्रीकी देशों तक लोग धर्म के झंडे लेकर इस ताकत को साबित कर रहे हैं, एक-एक हमले में दर्जनों और सैकड़ों लोगों को मार-मारकर।
स्मार्ट सिटी, किस कीमत पर और कितनी बर्बादी से?
17 फरवरी, 2023
नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन शुरू किया था जिसके तहत सौ शहरों को छांटकर उन्हें शहरी सुविधाओं के मामले में बेहतर बनाने का बीड़ा उठाया गया था। अगले महीने मार्च 2023 में इनमें से 22 शहर स्मार्ट होने जा रहे बताए गए हैं, और दावा किया गया है कि इससे वहां के लोगों की जिंदगी बेहतर होगी, और वे एक साफ-सुथरे माहौल में रह सकेंगे। इन शहरों में भोपाल, इंदौर, आगरा, वाराणसी, भुवनेश्वर, चेन्नई, कोयम्बटूर, इरोड़, रांची, सालेम, सूरत, उदयपुर, विशाखापत्तनम, अहमदाबाद, काकीनाड़ा, पुणे, वेल्लूर, पिम्परी-चिंचवाड़ा, मदुरै, अमरावती, तिरुचिरापल्ली, और तंजौर के नाम हैं। अब तक इन शहरों में एक लाख करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं, और तकरीबन उतने ही और शुरू किए गए हैं। इसमें आधी रकम केन्द्र सरकार देता है, और आधी रकम राज्य सरकार या स्थानीय म्युनिसिपल की लगती है।
जब यह योजना शुरु हुई थी तब भी हमने इसके खिलाफ लिखा था कि यह निर्वाचित म्युनिसिपलों के अधिकारों में दखल है, और स्मार्ट सिटी का काम करने वाली एक अलग बनाई गई कंपनी उन शहरों के म्युनिसिपलों के प्रति जवाबदेह नहीं रहती हैं जो कि एक असंवैधानिक नौबत है। भारत में केन्द्र, राज्य, और स्थानीय संस्थाओं से परे कुछ नहीं हो सकता, लेकिन स्मार्ट सिटी की पूरी धारणा ही केन्द्र सरकार की सोच पर शहरों को ढालने के लिए राज्यों पर थोपी गई थी, और ‘स्मार्ट’ बनने की हड़बड़ी में राज्य इस बात की अनदेखी कर गए थे कि केन्द्र की सोच पर राज्यों को बराबरी से खर्च करना पड़ रहा है, और उनकी अपनी कल्पनाशीलता की कोई जगह इसमें नहीं है। इसके अलोकतांत्रिक मिजाज को भी अनदेखा किया गया था, और अभी छत्तीसगढ़ के हाईकोर्ट में इसके खिलाफ एक पिटीशन पर सुनवाई हो ही रही है। हम ‘स्मार्ट’ बनने जा रहे ऐसे शहरों का हाल देखें तो इनमें से मध्यप्रदेश का इंदौर बार-बार देश का सबसे साफ शहर घोषित हो रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि मध्यप्रदेश की कारोबारी राजधानी होने की वजह से इंदौर म्युनिसिपल की कमाई अंधाधुंध है, और उतना खर्च करके कोई भी शहर साफ रखा जा सकता है। देश के किसी भी शहर में अगर म्युनिसिपल या वार्ड मेम्बर यह तय कर लें कि उन्हें चारों तरफ से रकम जुटाकर शहर को साफ रखना है, तो शहर की संपन्नता में यह मुमकिन तो है, लेकिन सफाई के ऐसे टापू बाकी प्रदेश के हक को छीनते हैं, और एक स्थानीय वाद को बढ़ावा देते हैं। भारत में ही दक्षिण भारत के कुछ शहरों ने सफाई की योजना इस तरह बनाई है कि उन पर धेला भी खर्च नहीं किया जा रहा है, और कचरे से कमाई की जा रही है। ऐसे में सैकड़ों करोड़ सालाना खर्च करके किसी टैक्स देने वाले शहर को साफ रखना कोई बड़ी चुनौती नहीं है। होना तो यह चाहिए कि कचरे को छांटना और सफाई रखना स्थानीय जनता के मिजाज में लाया जाना चाहिए ताकि उस पर टैक्स का पैसा खर्च न हो। शहरों पर अनुपातहीन खर्च करके उन्हें ‘स्मार्ट’ बनाने की सोच असंतुलित विकास है, और जब निर्वाचित संस्था के काबू से परे ऐसा काम होता है, तो वह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक भी रहता है।
जिस तरह राज्यों में डीएमएफ के नाम पर जो जिला खनिज निधि अंधाधुंध बर्बाद करने के लिए कलेक्टरों के हाथ रहती है, उसी तरह ‘स्मार्ट’ सिटी के नाम पर ऐसा अंधाधुंध खर्च म्युनिसिपल कमिश्नरों के हाथ आ जाता है। और उसकी बर्बादी की मिसाल डीएमएफ से कम नहीं है। यह राज्य के नेताओं और अफसरों की मनमर्जी से होने वाली बर्बादी का जश्न रहता है। हमने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अभी-अभी देखा कि ऐतिहासिक सरकारी खेल मैदान को काटकर किस तरह खाने-पीने का एक बहुत महंगा बाजार स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत बनाया जा रहा है, और फिर मानो उसे आबाद करने के लिए आसपास कई किलोमीटर तक सडक़ किनारे के गरीब ठेलेवालों को हटा दिया गया है कि अगर वे भी खानपान बेचते रहेंगे, तो स्मार्ट सिटी का बनाया महंगा बाजार कैसे चलेगा। कुछ दर्जन नई चमचमाती और बड़ी दुकानों को चलाने के लिए सैकड़ों गरीबों को बेदखल और बेरोजगार कर दिया गया, और इसे स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर किया गया है। यह पूरा सिलसिला अमानवीय भी है, और तानाशाह भी है, क्योंकि बिना किसी तर्कसंगत और न्यायसंगत आधार के बरसों से सडक़ किनारे कारोबार कर रहे छोटे और गरीब लोगों को इस तरह रातों-रात हटा देना एक सरकारी गुंडागर्दी के अलावा कुछ नहीं है। और ऐसा इसलिए किया गया है कि स्मार्ट सिटी योजना के तहत एक अफसर के मातहत सैकड़ों करोड़ खर्चने का जिम्मा और हक दोनों दे दिया गया है। जिस तरह डीएमएफ को कलेक्टरों का पॉकेटमनी कहा जाता है, और उसके तहत होने वाले खर्च के ठेकों और सप्लाई में जमकर भ्रष्टाचार होता है, ठीक वैसा ही शहरों में स्मार्टसिटी के नाम पर चलते रहता है जहां दसियों करोड़ के शौचालय बनते रहते हैं, और करोड़ों के कचरे के डिब्बे लगते रहते हैं, और कोई जवाबदेही नहीं रहती।
जब देश में पंचायत या म्युनिसिपलों की शक्ल में स्थानीय शासन का संवैधानिक इंतजाम है, तो स्मार्ट सिटी के नाम पर यह अफसरशाही शुरू से ही गलत थी, लेकिन मोदी की विरोधी पार्टियों में इसे समझने की फुर्सत नहीं थी। ऐसे खर्च का एक सामाजिक ऑडिट होना चाहिए, और अदालत में इस पूरी सोच को शिकस्त मिलनी चाहिए कि किसी निर्वाचित म्युनिसिपल से अधिक अधिकार किसी एक अफसर को रहे। स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर अंधाधुंध खर्च करके एक अलोकतांत्रिक व्यवस्था चलाना अपने आपमें बेवकूफी है, और यह उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट लोकतंत्र विरोधी इस सोच को रोक पाएगा।
नफरतजीवी मीडिया से बात की जाए या नहीं?
16 फरवरी 2023
हिन्दुस्तानी मीडिया में नफरत फैलाने की
अधिकतर जिम्मेदारी टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने उठा रखी है क्योंकि अपनी
पुरानी पहचान के मुताबिक टीवी के दर्शकों का अक्ल से अधिक रिश्ता नहीं रह
जाता, और उन्हें नफरत बेचना उसी तरह आसान हो जाता है जिस तरह सडक़ किनारे
कोई तमाशा दिखाकर मंजन बेचना। हिन्दुस्तान में नफरत के ये सौदागर अच्छी तरह
पहचाने हुए हैं, और इन्हें अपने इस काम पर बड़ा फख्र भी दिखता है। इन्हें
हिन्दुस्तान की दिक्कतों पर चर्चा के बजाय यहां के मुकाबले पाकिस्तान में
महंगा बिकता आटा और पेट्रोल चर्चा के लायक लगता है ताकि हिन्दुस्तानी लोग
अपनी दिक्कतों को लेकर किसी बेचैनी से न घिरें। और फिर देश के भीतर, पड़ोसी
देशों से, एक धर्म के खिलाफ दूसरे धर्म को खड़ा करके, मोहब्बत की बात करने
वाले राहुल गांधी को खिलौनों से खेलने वाला पप्पू साबित करते हुए ये लोग
नफरत को दूर-दूर तक और नई ऊंचाईयों तक ले जाने में लगे रहते हैं। ऐसे में
अभी सोशल मीडिया पर कांग्रेस के एक नेता के साथ ऐसे दो नफरतजीवी एंकरों की
तस्वीरों को पोस्ट करते हुए एक महिला पत्रकार ने लिखा- नफरत के इन सौदागरों
को कभी इंटरव्यू न दें, इंटरव्यू देना ही है तो मुझे दे दें, मैं ले
लूंगी। उसने आगे लिखा- नफरत, हिंसा, और राष्ट्र की एकता को तोडऩे वालों के
सामने आना पाप है।
इससे एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या जाहिर तौर पर नफरत फैलाने में लगे हुए ऐसे टीवी एंकरों, या मीडिया के दूसरे लोगों से धर्मनिरपेक्ष और अमन-पसंद लोगों को बात नहीं करना चाहिए? यह सवाल दिलचस्प इसलिए भी है कि बड़े कारोबारी मीडिया का मालिकाना हक इन दिनों तरह-तरह के आर्थिक अपराधियों या विवादास्पद कारोबारियों के पास आ गया है। और अगर जाहिर तौर पर इनकी नीयत पल-पल उजागर न भी होती हो, तो भी उनका वह एजेंडा तो रहेगा ही। कभी-कभी उनके सवाल मासूम लग सकते हैं, लेकिन अपना नाखूनों और दांतों के बिना वे आखिर खाएंगे क्या? इसलिए यह तो तय है कि वे या तो हर बातचीत में नफरत को आगे बढ़ाने का अपना एजेंडा लागू करते होंगे, या फिर वे कुछ भले लोगों से भली या बुरी कैसी भी बातें करके उनकी साख का इस्तेमाल अपनी साख को बनाने और बढ़ाने में करते होंगे। टीवी से परे अखबारों में भी कुछ ऐसे होते हैं जो अपनी सारी साम्प्रदायिकता के बीच किसी एक धर्मनिरपेक्ष लेखक का एक कॉलम छापकर उसकी साख को अपनी साख में तब्दील करने का काम करते हैं। तो ऐसे में लिखने वाले लोगों, बहस में शामिल होने वाले लोगों, और इंटरव्यू देने वाले नेताओं या प्रमुख लोगों को क्या करना चाहिए?
वैसे तो जो लोग सार्वजनिक जीवन में हैं, उनके लिए यह कुछ मुश्किल काम ही होता है कि वे किसी भी माइक्रोफोन और कैमरे को मना कर सकें। और ऐसी मनाही का एक मतलब आगे के लिए दुश्मनी भी होता है। लेकिन भारतीय राजनीति में भी कुछ ऐसे लोग रहे हैं जिन्होंने कुछ चैनलों या कुछ अखबारों के लोगों के सवालों का जवाब देने से साफ मना कर दिया। इस वक्त अर्नब गोस्वामी टाईम्स नाऊ चैनल का मुखिया था, और वहां से नफरत फैलाता था, तो कुछ नेताओं ने भरी प्रेस कांफ्रेंस में भी टाईम्स नाऊ के रिपोर्टर के सवालों का जवाब देने से मना कर दिया था। ऐसा करना आसान नहीं रहता है क्योंकि कई बार नफरत से परे काम करने वाले मीडिया के लोग भी अपने नफरतजीवी साथी का साथ देने के लिए गिरोहबंदी पर उतर आते हैं, और नेता को एक पूरा बहिष्कार झेलना पड़ सकता है। फिर यह भी है कि इंटरव्यू देने वाले या प्रेस कांफ्रेंस लेने वाले लोगों का अपना नैतिक मनोबल भी इतना ऊंचा रहना चाहिए कि वे किसी बुरे मीडिया को मुंह पर साफ-साफ मना करने का हौसला रख सकें, और दिखा सकें।
लेकिन बुनियादी बात पर अभी भी चर्चा बाकी है कि ऐसे बदनाम मीडिया के बदनाम लोगों से बात करनी चाहिए या नहीं? इसका जवाब आसान नहीं हो सकता, लेकिन है जरूर। लोग इंटरव्यू दे सकते हैं, सवालों के जवाब दे सकते हैं, लेकिन उनमें से किस जवाब के किस हिस्से को किस तरह से पेश किया जाएगा, यह तो उसी बदनाम मीडिया के बदनाम रिपोर्टर या एंकर के हाथ में रहेगा। इसलिए ऐसे लोगों से बात करना कम खतरनाक नहीं होता है क्योंकि वे लोग वैचारिक रूप से असहमत लोगों से बात करने, उन्हें जगह देने का दिखावा भी करते हैं, और उनकी बातों को कुल मिलाकर तोड़-मरोडक़र अपने एजेंडा के मुताबिक इस्तेमाल भी कर लेते हैं। अगर पांच उंगलियां एक माईक और एक मुंह होने से ही कोई इंटरव्यू लेने के हकदार हो सकते हैं, तो बदनाम मीडिया के बदनाम लोगों के मुकाबले बेहतर साख वाले छोटे मीडिया के अनजान लोगों से भी बात करना बेहतर है।
नेताओं के मुकाबले सडक़ों पर आम जनता अधिक जागरूक रहती हैं क्योंकि उसका दांव पर कम लगा रहता है। वह कई बार कई बदनाम चैनलों के लोगों से बात करने से मना कर देती है, और उन्हें आईना भी दिखाती है कि उनकी किन हरकतों की वजह से वे उनसे बात करना नहीं चाहते। लेकिन वोटों की राजनीति में लगे हुए लोग हर बार इतना खरा-खरा नहीं बोल पाते। बीच-बीच में ऐसा जरूर होता है कि कोई राजनीतिक पार्टी किसी चैनल का कम या अधिक समय तक पूरा बहिष्कार करती है, वहां पर अपने प्रवक्ता नहीं भेजती है, लेकिन धीरे-धीरे फिर बीच का कोई रास्ता निकाला जाता है, और सार्वजनिक जीवन की इस बात को मान लिया जाता है कि राजनीति में कोई स्थाई शत्रु नहीं होते। लेकिन अभी सोशल मीडिया पर यह सवाल उठना एक बड़ा प्रासंगिक मामला है, और इस पर चर्चा जरूर होनी चाहिए। ऐसी चर्चा से नफरतजीवी लोगों में थोड़ी सी बेचैनी होगी क्योंकि सवाल पूछने के उनके पेशेवर एकाधिकार के खिलाफ जाकर दूसरे लोग भी उनसे सवाल कर सकेंगे। और सवाल करने वालों से सवाल न करना कोई शर्त तो हो नहीं सकती। ऐसी जागरूकता से ही नफरत फैलाने वाले लोगों के हौसले पस्त हो सकते हैं। जो उनका बहिष्कार करना चाहें, वह भी ठीक है, और जो उनसे बात करते हुए कुछ असुविधाजनक सवाल करना चाहें, वह भी ठीक है। लेकिन उन्हें स्वाभाविक मीडिया मानकर उनकी नफरत को अनदेखा करना ठीक नहीं है। वरना नफरत पर टिकी हुई मीडिया आज के लिए नवसामान्य हो जाएगी। आज हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में कई किस्म की नफरत नवसामान्य हो गई है, लेकिन बदनाम मीडिया को नवसामान्य का दर्जा देना देश में नफरत को और फैलाने से कम कुछ नहीं होगा।



