एनडीए के दावों, और एक्जिट पोल में से अधिक बड़ी शिकस्त किसकी?

4 जून 2024

 हिन्दुस्तानी आम चुनाव के नतीजे उन लोगों को तो चौंकाने वाले हैं जो मीडिया, सोशल मीडिया, और एक्जिट पोल का मजा लेते बैठे थे। इन सबके मुताबिक देश में एक मोदी लहर चल रही थी, जिसमें इंडिया नाम का गठबंधन बह जाने वाला था। लेकिन अभी जब नतीजे आ रहे हैं, तो दोपहर 4 बजे के रूझान के आंकड़ों को लेकर हम यह टिप्पणी लिख रहे हैं। सभी 543 सीटों पर वोटों की गिनती चल रही है, और चार सौ पार के एक मुश्किल नारे के साथ देश के इतिहास का सबसे आक्रामक चुनाव अभियान चलाने वाले, एनडीए के चेहरे नरेन्द्र मोदी को दावे और एक्जिट पोल की उम्मीद के मुताबिक कामयाबी मिलते नहीं दिख रही है। इस पल के आंकड़े बता रहे हैं कि एनडीए को पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले भी काफी कम सीटें मिल रही हैं। एनडीए को 295 सीटें मिल रही हैं, जिनमें से भाजपा की सीटें 239 हैं। लोगों को याद होगा कि पिछले आम चुनाव में भाजपा की अपनी कमल छाप सीटें 303 थीं, और इस बार वह 63 सीटें खोते दिख रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस के पास पिछले लोकसभा चुनाव में 52 सीटें थीं, जो कि अब 100 होते दिख रही हैं, यानी कांग्रेस को 48 सीटों का इजाफा हुआ है। इंडिया-गठबंधन पिछले चुनाव में इस शक्ल में नहीं था, और इस बार उसमें दूसरी पार्टियां जुड़ी हैं, और इस गठबंधन को 230 सीटें मिलने का आसार दिख रहा है। ये चुनावी नतीजे बहुत अधिक फेरबदल वाले नहीं दिख रहे हैं, और ऐसा लगता है कि अपने दावों, उम्मीदों, और मीडिया-समर्थन के मुताबिक अधिक होता न देखकर भाजपा में एक निराशा होगी, लेकिन देश की अगली सरकार तो किसी कीर्तिमान से नहीं बनती है, गिनती से बनती है, और गिनती तो यही है कि एनडीए की अगुवाई कर रही भाजपा अपना अगला प्रधानमंत्री बनाने जा रही है। यह रिकॉर्ड भी कोई कम नहीं है, और जीतकर लगातार तीसरी बार पीएम बनने वाले मोदी शायद नेहरू के बाद दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री होंगे। भाजपा को अपना ही नारा खासे वक्त तक चुभते रह सकता है, अबकी बार चार सौ पार अब जमीन पर तीन सौ तक भी पहुंचते नहीं दिख रहा है। इससे अधिक तो भाजपा की अपनी कमल छाप सीटें पिछली बार थीं। 

यह आम चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक था। एक तरफ तो कांग्रेस से लेकर आम आदमी पार्टी तक, तृणमूल से लेकर दक्षिण की पार्टियों तक, उधर कश्मीर में फारूख से लेकर बिहार में लालू तक, अनगिनत मोदी विरोधी नेता और पार्टी लगातार केन्द्रीय जांच एजेंसियों के निशाने पर बने हुए थे। हो सकता है कि इनमें से बहुत से भ्रष्टाचार में शामिल रहे हों, लेकिन इनके मुकाबले देश में एक ऐसी तस्वीर बन रही थी कि भाजपा, और एनडीए के तमाम लोग दूध के धुले हुए हैं। भ्रष्टाचार पर कार्रवाई अच्छी बात है, लेकिन जब 95 फीसदी मामले सिर्फ विपक्ष के लोगों पर हों, तो जनता को भी यह बात कहीं न कहीं दिख रही होगी, और चुभ रही होगी। यही वजह है कि एनडीए गठबंधन ने तो कुल 63 सीटें खोई हैं, लेकिन उसके भीतर भाजपा ने 66 सीटें खोई हैं। अब जब चुनावी नतीजे सामने हैं, तो भाजपा के एजेंडे को भी देखना होगा जिसने इस चुनाव को मुंह से कहे बिना देश में एक धार्मिक जनमत संग्रह में तब्दील कर दिया था। उसके तमाम नारे, मनमोहन सिंह की न कही हुई बात का हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल, मुसलमानों को कहीं घुसपैठिया कहना, कहीं ओबीसी आरक्षण में मुस्लिमों को शामिल करने का विरोध करना, तो कहीं मंगलसूत्र छीन लिए जाने का डर दिखाना, ऐसी इतनी बातें चुनाव प्रचार में खुद प्रधानमंत्री के भाषणों में कही गईं, कि पार्टी के बाकी नेताओं के भाषणों और बयानों में उसी की गूंज चलती रही। और तो और भाजपा ने एक बहुत बड़ा बेबुनियाद, और भडक़ाऊ नारा अपने सर्वोच्च स्तर से चलाया था कि अगर इंडिया-गठबंधन की सरकार बनी तो राम मंदिर पर बाबरी ताला डल जाएगा। यह सुनते हुए भी चुनाव आयोग उसी तरह सोते रहा, जिस तरह अपने पोते के सैकड़ों बलात्कार की शिकायतें सुनते हुए एचडी देवेगौड़ा सो रहे थे, या अपने को पसंद सरकार के भ्रष्टाचार अनदेखे करते हुए अन्ना हजारे सोते हैं। केन्द्र सरकार के एक विभाग की तरह काम करने की तोहमत झेल रहे चुनाव आयोग को भी भाजपा को धर्म के आधार पर बयानबाजी न करने को कहना पड़ा। हालांकि आयोग अपने बाकी फैसलों, और बाकी कार्रवाई से मजाक का सामान बनते रहा, और सोशल मीडिया पर उसके बारे में यह लिखा जाता रहा कि आयोग भाजपा सरकार में शामिल नहीं होगा, वह बाहर से समर्थन जारी रखेगा। भाजपा का नारा तो आज मतगणना के बाद हारा है, चुनाव आयोग अपनी साख बहुत पहले से हार चुका है, और इससे कम विश्वसनीयता वाले लोग इसके पहले कभी चुनाव आयोग पर नहीं बैठे थे। फिर भी जो भी हो, एनडीए गठबंधन लगातार तीसरी बार एक स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता पर आ गया है, और गठबंधन को अपने नुकसान पर आत्मचिंतन करना चाहिए कि कौन सी ऐसी वजहें थीं कि वह चार सौ सीटों के अपने नारे, और पिछली लोकसभा में अपनी 353 सीटों के आंकड़ों से इतना पीछे रह जा रहा है। भारतीय लोकतंत्र में आत्मविश्लेषण न करने, अपने तौर-तरीकों को न सुधारने, किसी की आलोचना बर्दाश्त न करने का पूरा कानूनी हक हर किसी को रहता है। लेकिन ऐसे हक का ऐसा इस्तेमाल लोगों को और गहरे गड्ढे में डालता है। भाजपा के सामने अभी लंबा राजनीतिक जीवन है, और उसे पिछले पांच बरस के अपने तौर-तरीकों के बारे में एक बार फिर सोचना चाहिए कि देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को ध्यान में रखते हुए मुस्लिमों के खिलाफ इस हद तक हमलावर अभियान भी उसे ईडी-आईटी-सीबीआई से जख्मी पार्टियों पर फतह क्यों नहीं दिला पाया? क्या देश की जनता का राजनीतिक और धार्मिक बर्दाश्त उतना अधिक नहीं है जितना कि भाजपा उम्मीद कर रही थी? यह मौका जेल और कटघरों में खड़े इंडिया-गठबंधन के नेताओं के लिए भी चाहे कानूनी राहत का न हो, राजनीतिक राहत का तो है ही कि जनता ने इतने बड़े पैमाने पर सिर्फ विपक्षी नेताओं पर भ्रष्टाचार की कार्रवाई को पसंद नहीं किया, और एनडीए-गठबंधन के भीतर भाजपा की शिकस्त गठबंधन की कुल शिकस्त से अधिक बड़ी हुई। अभी आज यहां पर हम अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों, और राज्यों के नतीजों का विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, और महज राष्ट्रीय स्तर पर सामने आई एक बड़ी तस्वीर पर छोटी सी टिप्पणी कर रहे हैं। 

अब अगर हम छत्तीसगढ़ की बात करें, जहां पर यह अखबार बसा हुआ है, तो यहां की 11 में से 10 सीटों पर भाजपा को जीत मिलते दिख रही है, और यह जीत पिछले लोकसभा चुनाव से एक सीट अधिक ही है। इसलिए यह राज्य की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के लिए एक राहत की बात भी होगी कि उन्होंने भाजपा की सीटों में कुछ इजाफा ही किया है। छत्तीसगढ़ की कोरबा सीट से ज्योत्सना महंत मौजूदा कांग्रेस सांसद हैं, और वे ही कोरबा सीट से भाजपा की दिग्गज नेत्री सरोज पांडेय को हराते हुए दिख रही हैं, वे छत्तीसगढ़ से अकेली कांग्रेस सांसद रहेंगी, अगर आगे की मतगणना में यही रूख कायम रहता है। उनके पति डॉ.चरणदास महंत छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, और प्रदेश कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेता भी हैं, और अपनी सज्जनता के लिए जाने जाते हैं। पति-पत्नी की यह मिलीजुली जीत दोनों के राजनीतिक कद और उनकी ताकत में इजाफा करेगी। खासकर उस हालत में जब पांच बरस प्रदेश के अभूतपूर्व ताकत वाले मुख्यमंत्री रहे भूपेश बघेल चुनाव हारते दिख रहे हैं, और कांग्रेस के कई बड़े-बड़े नेता छत्तीसगढ़ में चुनाव हार रहे हैं। छत्तीसगढ़ के नतीजों का विश्लेषण भी हम अलग से करेंगे, आज मतगणना के आंकड़ों के बीच यह टिप्पणी टीवी स्क्रीन पर बदलते हुए नंबरों का एक विश्लेषण है। बाकी बातें आने वाले दिनों में। दो राज्यों के विधानसभा चुनाव के आंकड़े भी सामने हैं जिनके मुताबिक ओडिशा में पिछले 24 बरस से मुख्यमंत्री चले आ रहे नवीन पटनायक की सरकार को बेदखल करके भाजपा वहां राज्य सरकार बनाने के करीब है। दूसरी तरफ आन्ध्र में एनडीए के साथ की घोषणा कर चुके चन्द्राबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी भारी लीड के साथ सरकार बना रही है, और नायडू ने अभी खुलकर घोषणा की है कि वे एनडीए के साथ रहेंगे।

चलते-चलते बस एक बात और, एक्जिट पोल से देश के मनोरंजन की एक शाम अच्छी गुजरी थी, और जैसी शिकस्त एनडीए की हुई है, उससे बुरी शिकस्त एक्जिट पोल की हुई है।  

दीवारों पर लिक्खा है, 4 जून 2024





 

दीवारों पर लिक्खा है, 3 जून 2024



 

बड़ी फौजी ताकतों ने चक्रव्यूह में घुसना तो सीखा, निकलना नहीं

3 जून 2024

 एक फिलीस्तीनी आतंकी या फौजी संगठन हमास के हमले के बाद इजराइल ने पिछले कुछ महीनों में फिलीस्तीन के गाजा शहर पर हर किस्म के हमले करके अब तक 35 हजार से अधिक लोगों को मार डाला है, और जख्मियों की कोई गिनती नहीं है। लोगों के खाने-पीने का सामान नहीं है, अंतरराष्ट्रीय मदद गाजा में पहुंचने नहीं दी जा रही, और अमरीका जैसे बेईमान देश एक तरफ मदद भेजने का नाटक कर रहे हैं, और दूसरी तरफ इजराइल को बम दिए जा रहे हैं ताकि वह और अधिक फिलीस्तीनी मार सके। दुनिया का सबसे ताकतवर मवाली देश अमरीका अब लगातार यह नाटक कर रहा है कि वह युद्धविराम की कोशिश कर रहा है, और उसने इजराइल को कुछ किस्म के हथियारों की सप्लाई स्थगित की हुई है। ऐसा लगता है कि एक गिरोहबंदी के तहत अमरीका और इजराइल दुनिया के दिखावे के लिए एक नूराकुश्ती लड़ रहे हैं, और इतिहास में अमरीका फिलीस्तीनियों के जनसंहार से अपनी असहमति दर्ज करा रहा है, लेकिन नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के पहले अमरीकी सरकार अमन के लिए काम करते दिखना चाहती है। ऐसा पाखंड दुनिया के कई मोर्चों पर भरा हुआ है, और इसे देखने-समझने की जरूरत है, और यह देखने के लिए अंतरराष्ट्रीय संबंधों के परंपरागत तौर-तरीकों से परे हटकर देखने की ताकत भी चाहिए। 

आज खुद इजराइल की सरकार के भीतर इस बात को लेकर बड़ी असहमति है कि गाजा पर किया गया यह हमला खत्म कैसे होगा? हिन्दुस्तान में एक कहानी कही जाती है कि किस तरह अभिमन्यु ने मां के पेट में रहते हुए चक्रव्यूह को भेदना सीख लिया था, लेकिन उसने चक्रव्यूह में से निकलना नहीं सीखा था, और असल जंग में वह उसी में फंसकर मारा गया था। अमरीका करीब 20 बरस तक वियतनाम पर हमला करके एक जंग चलाते रहा, और फिर इस बेनतीजा जंग को छोडक़र उसे निकलना पड़ा। इस जंग के दौरान करीब 9 बरसों में अमरीका ने वियतनाम पर करीब 26 करोड़ क्लस्टर बम दागे थे। हम इस जंग की पूरी कहानी पर यहां जाना नहीं चाहते हैं, लेकिन अमरीकियों ने वियतनामियों की एक पूरी पीढ़ी को खत्म कर दिया था। अमरीकी सैनिकों ने वियतनामी युवतियों से जितने बच्चे पैदा किए थे, वे अमरीका के सामने एक नई चुनौती पेश करते हुए खड़े थे। दूसरी तरफ अमरीका ने एक वक्त इराक पर हमला किया, बरसों तक वहां के शासन को अपने कब्जे में रखा, और वहां से बेनतीजा निकलना पड़ा। फिर अफगानिस्तान की बारी थी, वहां हमला करके अमरीका ने पूरा शासन अपने कब्जे में रखा, 20 बरस इस देश को हांकने के बाद अमरीका किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से भागा, और अफगानिस्तान को एक बार उन्हीं खूंखार तालिबानों के हवाले करके निकला, जिनसे अफगानिस्तान को आजाद कराने का दावा करते हुए वह वहां घुसा था। 

किसी देश की मौजूदा सरकार को हटाने के लिए उस पर हमला करना, सरकार को बेदखल करना तो कम मुश्किल काम रहता है। अधिक मुश्किल रहता है उस सरकार की जगह नई सरकार कायम करना। और सरकार को बेदखल करने की नीयत न भी हो, तो भी किसी देश में वहां की सरकार और जनता के कंधे पर बंदूक रखकर अपने दूसरे फौजी इरादों को पूरा करना यूक्रेन में देखने मिल रहा है, जहां रूसी हमले का सामना करने के लिए अमरीका और योरप के देश यूक्रेन की फौजी हथियारों से मदद कर रहे हैं, लेकिन यूक्रेन के हाथ उन्होंने पीछे बांध रखे हैं। अभी तक अमरीका और नाटो के बाकी देश जो हथियार यूक्रेन को दे रहे थे, उनके साथ यह शर्त लगा रखी थी कि उनका इस्तेमाल रूस के भीतरी ठिकानों पर वार करने के लिए नहीं किया जाएगा। ऐसा इसलिए रखा गया था कि रूस इससे भडक़कर कोई परमाणु युद्ध न छेड़ दे। लेकिन यूक्रेन को गले-गले तक इस जंग में धंसा देने के बाद नाटो देश यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यह मदद कब तक जारी रखी जाएगी, कब तक रूस को खोखला करने की नीयत पूरी हो सकेगी, और रूसी हमलों के बाद यूक्रेन नाम के बचे हुए खंडहर को किस दाम पर खड़ा किया जा सकेगा। वियतनाम से लेकर इराक, अफगानिस्तान, यूक्रेन, और अब गाजा तक की फौजी कार्रवाईयां उस चक्रव्यूह की तरह हैं जिनमें घुसना तो अभिमन्यु को आता था, लेकिन जिससे निकलना नहीं आता था। यूक्रेन अमरीका और योरप के गले की हड्डी बन गया है, ठीक इसी तरह आज फिलीस्तीन का गाजा इजराइल और अमरीका सहित इस गिरोह के बाकी देशों के सामने आज की दुनिया का सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है कि यह दुनिया फिलीस्तीन का क्या करने जा रही है? इस नौबत का इजराइल के पास भी कोई समाधान नहीं है, और इजराइल आज एक ऐसा देश हो गया है जहां प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार के मुकदमे तैयार खड़े हैं, और जिसने देश के सबसे कट्टरपंथी दलों की मदद लेकर इजराइल के इतिहास की सबसे संकीर्णतावादी सरकार बनाई है। और आज जब फिलीस्तीन के साथ इजराइल के किसी किस्म के युद्धविराम की बात हो रही है, तो ये कट्टरपंथी पार्टियां इजराइली प्रधानमंत्री की सरकार गिरा देने की धमकियां दे रही हैं। आज इजराइल के सामने यह लाख रूपए का सवाल खड़ा हुआ है कि वह फिलीस्तीन का क्या करेगा? जिसकी जमीन पर अवैध कब्जा करके इजराइलियों ने अपना देश बसा लिया है, और फिलीस्तीनियों को उनकी ही जमीन पर शरणार्थी और फौजी बंधक बनाकर रखा है, क्या उस पूरी आबादी के खत्म हो जाने तक फौजी हमले जारी रखने की इजाजत दुनिया उसे देगी, या इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के हुक्म के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक इजराइल का अधिक बड़ा बहिष्कार दुनिया में होने लगेगा? इजराइल के पास फिलीस्तीन पर किए जा रहे जुल्म को खत्म करने का कोई जरिया नहीं है, क्योंकि बीते बरसों में लाखों फिलीस्तीनियों को मार डालने के बाद बचे हुए लाखों फिलीस्तीनियों के जख्म और उनकी नफरत से इजराइल कैसे महफूज रह सकेगा? 

दुनिया में जब कभी बड़े फौजी फैसले लिए जाते हैं, तो उनमें अक्सर ही नागरिक-समझ की कमी रहती है। फौजी फैसले यह नहीं बताते कि जब मोर्चे से फौज हट जाएगी, तो रोजाना का काम कैसे चलेगा? जिस फिलीस्तीन को दुनिया का सबसे बड़ा मलबा बना दिया गया है, जहां दुनिया के इतिहास के सबसे अधिक संख्या के आम नागरिकों को इतने कम वक्त में, संयुक्त राष्ट्र की रोक-टोक के बावजूद मारा गया है, उस फिलीस्तीन पर जंग रोककर इजराइल कैसे अपने आपको बचा सकेगा, यह बहुत बड़ा सवाल उसके सामने खड़ा है। दूसरी तरफ दो बरस से लगातार यूक्रेन की फौजी और दीगर किस्म की मदद करते हुए अमरीका और योरप थके हुए हैं, लेकिन रूस को खोखला करने की अपनी नीयत के चलते वे यूक्रेनी फौजियों और जनता की कुर्बानी दिए जा रहे हैं। अब यह बेनतीजा दिखती जंग यूक्रेन पर किस-किस तरह से भारी पड़ेगी, पड़ रही है, यह एक बहुत बड़ी समस्या है। लेकिन जंग को इतने ऊपर तक ले जाने के बाद अब उसे खत्म करके एक देश को फिर से कैसे बसाया जाए, यह इलाज किसी के पास नहीं है। 

दिक्कत यह है कि ऐसी नौबतों से जूझने के लिए, ऐसी बर्बादी को रोकने के लिए जिस संयुक्त राष्ट्र संघ का असर हो सकता था, उसे दुनिया की महाशक्तियों की वीटो-ताकत ने बेअसर कर रखा है। वरना यह आज के वक्त की एक बड़ी जरूरत की संस्था थी, जिसकी हेठी अमरीका ने इराक और अफगानिस्तान पर हमले वक्त भी की, और फिलीस्तीन के खिलाफ तो अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र को कुछ समझा ही नहीं। आज की यह नौबत दुनिया के सीखने की है कि जंग छेडऩा आसान होता है, उसे खून-खराबा खत्म होने के बाद अमन में तब्दील करना नामुमकिन सरीखा होता है।  


दीवारों पर लिक्खा है, 2 जून 2024



 

जन्नत का झांसा दिखाकर मन्नत! धर्म समझ को आने ही नहीं देता

02 जून, 2024

छत्तीसगढ़ में 46 डिग्री तापमान पर एक धार्मिक प्रवचन चल रहा है, और कुछ दिन पहले इसकी तैयारी में हजारों महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर नंगे पैर शोभायात्रा भी निकाली थी। अभी भी जिस जगह यह प्रवचन चल रहा है, वहां लाखों लोगों की आवाजाही है, और कई किलोमीटर तक ट्रैफिक जाम रहता है। सत्तारूढ़ भाजपा के एक नेता ने कल ही ट्विटर पर यह लिखा है कि इतनी गर्मी में कथावाचक प्रदीप मिश्रा के कार्यक्रम में 8 साल की बच्ची ने दम तोड़ दिया। स्थानीय नागरिकों का दावा है कि अब तक 6 मौतें हो चुकी हैं। तत्काल इस आयोजन पर रोक लगे, प्रशासन इस पर ध्यान दें। और लोगों ने भी इस पर लिखा है कि कथावाचकों को अप्रैल, मई, और जून के महीनों में कार्यक्रम नहीं रखने चाहिए। किसी ने लिखा है कि इस महाराज को खुद ही यह कार्यक्रम रखना नहीं था, या अब बंद कर देना चाहिए, किसी के कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। एक और ने लिखा है कि महाराज को पैसा कमाने से फुर्सत मिले, तो आम नागरिकों की सोचें। इतनी गर्मी में कोई ऐसा आयोजन करता है, जबकि गर्मी का रेड अलर्ट जारी हुआ है। एक व्यक्ति ने तंज कसते हुए कहा है कि दो सौ बेलपत्र चढ़ाने बोलिए, ठीक हो जाएगा। किसी और ने याद दिलाया है कि इसी प्रवचनकर्ता के मध्यप्रदेश में भी रूद्राक्ष वितरण के दौरान बहुत से मौतें देखने मिली थी। कुछ लोगों ने यह याद दिलाया है कि लोगों को अपने घर से ही कथा सुननी चाहिए। एक ने ट्वीट करने वाले भाजपा नेता को याद दिलाया कि इतनी भरी गर्मी में यह जानलेवा आयोजन करने की अनुमति भाजपा सरकार ने ही दी है। एक ने लिखा है कि चलिए बहुत जल्द जाग गए, फिलहाल कथा समाप्त हो चुकी है। एक ने सवाल उठाया है कि 6 मौतों की जिम्मेदार किसे ठहराया जाए। एक व्यक्ति ने लिखा है कि महाराज को होश नहीं है क्या, इसी भीषण गर्मी में अपने प्रवचन रद्द करना चाहिए, मरने वालों को दस-दस लाख मुआवजा देना चाहिए। 

अभी कल की ही एक खबर थी कि डेढ़ बरस पहले राजस्थान से निकले पति-पत्नी 665 किलोमीटर की दंडवत यात्रा करके उज्जैन पहुंचे हैं। इसका वीडियो देखना भी भयानक था जब चारों तरफ तपती सडक़ पर नंगे पैर यह बुजुर्ग जोड़ा चल रहा है, और ये सडक़ों पर लेट-लेटकर आगे बढ़ रहे हैं। 55 बरस उम्र का आदमी एक दिन में करीब डेढ़ किलोमीटर की यात्रा इस तरह कदम-कदम पर दंडवत लेटकर इंच-इंच आगे बढ़ते दिखता है, और पत्नी भी झोले में थोड़ा सा सामान लेकर साथ चल रही है। रास्ते में कभी वे कुछ खरीदकर खा लेते हैं, कभी लोग कुछ खिला देते हैं। अब आज जब सरकार लोगों को गर्मी में घर से बाहर न निकलने की सलाह दे रही है, देश भर में सैकड़ों लोग एक-एक दिन में लू से मर रहे हैं, तब यह बुजुर्ग जोड़ा डेढ़ साल के इस कठिन, तकलीफदेह, और जानलेवा तीर्थयात्रा पर है। नवतपा के बीच सफर इसी तरह जारी है। 

आस्था लोगों की तर्कशक्ति को पूरी तरह खत्म कर देती है। अब इस जोड़े ने डेढ़ बरस का वक्त ऐसी यात्रा पर लगा दिया है, जिससे उनकी निजी आस्था जरूर पूरी हो रही है, कोई मन्नत भी पूरी हो रही है, लेकिन इससे समाज का भला क्या भला हो रहा है? और जहां तक ईश्वर की बात है, तो पत्थर की प्रतिमाओं, लकड़ी के सलीब, या अमूर्त ईश्वरों, धार्मिक ग्रंथों की उपासना और आराधना से किसी ईश्वर का भला होते तो किसी ने देखा नहीं है। बहुत से लोग तरह-तरह के कठिन इरादे तय कर लेते हैं, और फिर बरसों तक उसे पूरा करने में लगे रहते हैं। अगर सचमुच ही कहीं कोई ईश्वर है, तो उसे क्यों ऐसी बातों को बढ़ावा देना चाहिए? अभी कुछ दिन पहले ही हमने अपने पास ही एक व्यक्ति को अपनी जीभ काटकर किसी देवता को चढ़ाते हुए देखा है, और कहीं पर किसी देवता को खुश करने के लिए एक इंसान ने अपने चार बरस के बेटे की बलि दे दी। भला कौन सा ऐसा ईश्वर हो सकता है जो एक नन्हें बच्चे की बलि पाकर खुश हो, और अगर सचमुच ही ऐसा कोई ईश्वर है, तो वह पूजा-उपासना के लायक तो हो भी नहीं सकता। 

इस तरह के अंधविश्वासी आस्थावान लोगों को वह मिसाल दिखाने की जरूरत है जिसमें किसी एक व्यक्ति ने पहाड़ पर से आने-जाने का रास्ता बनाना तय किया, और कई बरस हर दिन खुदाई करके उसने अकेले सडक़ ही बना दी। कई ऐसे लोगों की असल जिंदगी की कहानियां सामने है जिन्होंने किसी बंजर पहाड़ पर पौधे लगाने शुरू किए, और आज 25-30 बरस बाद उस रूखे-सूखे पहाड़ की एक-एक इंच जमीन हरियाली से पट गई है। अकेले अपने दम पर अभियान छेडऩे वाले बहुत से लोग हैं, मुम्बई में एक विख्यात कार्टूनिस्ट आबिद सुरती हैं जो किसी प्लंबर को लेकर घर-घर जाकर दरवाजा खटखटाते हैं, और पूछते हैं कि उनके घर कोई नल तो नहीं टपकता? अपने पैसों पर अपनी मेहनत से कभी प्लंबर ले जाकर, तो कभी खुद औजार चलाकर वे पानी की बर्बादी वाली टोटियों को सुधारने का अभियान चला रहे हैं, और पूरी तरह अकेले चला रहे हैं। कुछ और लोग भी हैं जो जरूरतमंद मरीजों के लिए रक्तदाता जुटाने का काम करते हैं, और हमारे आसपास ही ऐसे कुछ लोग हुए हैं जिन्होंने पूरी जिंदगी अपना भी खून दिया, और दूसरे दानदाता भी जुटाए। 

हमारा ख्याल है कि मन्नत तो किसी भी तरह की मानी जाती है, और लोगों की यह निजी आजादी है। लेकिन अगर इस मन्नत का धरती पर कोई इस्तेमाल भी हो, तो भी वह काम की हो सकती है। डेढ़ बरस का वक्त सिर्फ तकलीफ पाकर एक सफर में गुजार देना, इससे न तो उज्जैन के महाकाल को कुछ हासिल होना है, न ही समाज को इससे कोई फायदा हुआ। इसके बजाय यह जोड़ा अगर 665 दिन अपने शहर के अस्पताल जाकर रोज 8-10 घंटे मरीजों की मदद करता, कहीं व्हीलचेयर धकेलता, कहीं मरीजों के स्ट्रेचर ले जाने में मदद करता, तो उससे समाज का भी भला होता। अलग-अलग बहुत से धर्मों के लोग महीने में या हफ्ते में एक दिन कई घंटे उपासना-आराधना में गुजारते हैं, अगर उन्हें अपने ईश्वर की बनाई हुई इस दुनिया में लोगों के दुख-तकलीफ को दूर करने की बात सूझती, तो उससे उनका ईश्वर भी, अगर कहीं होता तो, खुश हो सकता था। किसी दिन कुछ खाना नहीं, किसी दिन कुछ पीना नहीं, किसी दिन किसी रंग के कपड़े पहनना, किसी दिन उपासना स्थल जाना, इससे किसी को क्या हासिल होता है? यह अपने आपको बेवकूफ बनाने के तरीके रहते हैं। अगर सचमुच ही लोगों को लगता है कि दुनिया उनके ईश्वर की बनाई हुई है, तो उन्हें इस दुनिया के जरूरतमंद लोगों की सेवा करना चाहिए, धरती की बर्बादी रोकना चाहिए। मजे की बात यह है कि कोई भी धर्मगुरू लोगों को ऐसा रास्ता सुझाते नहीं दिखते। भला अपनी दुकान बंद करवाना कौन चाहेंगे? यह तो कुछ वैसा ही होगा कि फास्ट फूड बेचने वाले लोग यह पर्चा छपवाकर आने वालों को थमाते रहें कि फास्ट फूड से सेहत का कितना नुकसान होता है। अब अगर प्रवचनकर्ता या मुल्ला, पुजारी, और पादरी लोगों को ईश्वर की आराधना के लिए कचरा साफ करने, गरीबों की मदद करने, अस्पताल जाकर काम करने की नसीहत देंगे, तो खुद का धंधा बंद ही हो जाएगा। इसलिए धर्म प्रायश्चित, दान, और पाप-मुक्ति के बड़े कामयाब फॉर्मूले पर काम करता है जो कि हिट हिन्दी फिल्में बनाने के फॉर्मूलों सरीखा है। इसलिए ऐसे धर्म को 665 किलोमीटर की दंडवत तीर्थयात्रा को बढ़ावा देना ठीक लगता है, बजाय इतने दिनों के किसी सार्थक उपयोग के।  

मंत्रियों का छात्र बन क्लास में बैठना तो ठीक है, लेकिन छात्र जैसे सीखना भी जरूरी

2 जून 2024

 छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने दो दिन रायपुर के आईआईएम में देश के दूसरे आईआईएम से भी आए हुए विशेषज्ञों के व्याख्यान सुने, और शासन चलाने के बेहतर तरीकों पर उनसे जानकारी हासिल की। सोच थोड़ी नई है क्योंकि प्रदेश चलाने वाले लोग किसी की क्लास में जाकर बैठें, ऐसा कभी नहीं होता है, आमतौर पर निर्वाचित नेताओं को सर्वगुण संपन्न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान मान लिया जाता है। जिस तरह किसी हीरे को और शुद्ध करना मुमकिन नहीं रहता, उसी तरह सत्तारूढ़ पार्टी के निर्वाचित, मनोनीत, या संगठन पर काबिज नेता अपने को समझते हैं। इसलिए अगर छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने यह तय किया कि उसे शासन-प्रशासन के जानकार और विशेषज्ञ लोगों से कुछ सीखना है, तो यह एक अनोखी पहल है जिससे दूसरे देश-प्रदेश भी सीख सकते हैं। इस पर छत्तीसगढ़ के एक कांग्रेस नेता की प्रतिक्रिया हैरान करने वाली थी जिसका कहना था कि भाजपा ने प्रदेश में 15 बरस राज किया है, और अगर आज के भाजपा मंत्रियों को कुछ सीखना था, तो अपने ही भूतपूर्व मंत्रियों से सीखना चाहिए था। यह सलाह किसी विरोधी या दुश्मन को तो दी गई हो सकती है, यह सही नहीं हो सकती। 15 बरस बाद जिस सरकार ने सत्ता इस बुरी तरह गंवाई थी, उससे सीखने की बात कोई दुश्मन ही कर सकते हैं। सच तो यह है कि जिंदगी के बहुत से दायरों में बाहर के लोग ही गलतियां बताने, सुधार सुझाने, और नई बातें सिखाने के लायक हो सकते हैं। इसीलिए बाहरी व्यक्तियों, या आऊटसाइडर्स का एक अलग महत्व होता है क्योंकि उनके स्वार्थ ऐसे भीतरी लोगों से जुड़े हुए नहीं होते हैं जिन्हें सिखाने की जिम्मेदारी मिली है। अब वैसे तो किसी भी राज्य में प्रशासन के मुखिया, मुख्य सचिव मंत्रियों को सिखाने के काबिल हो सकते हैं, लेकिन वे इसी व्यवस्था का हिस्सा रहते हैं, और इन्हीं निर्वाचित मंत्री-मुख्यमंत्री के मातहत काम करते हैं, इसलिए बाहरी विशेषज्ञों और जानकारों से शासन-प्रशासन की कुछ बातों को सीखना काम का हो सकता है। 

दूसरी तरफ किसी भी देश-प्रदेश में कई ऐसे दूसरे तबके रहते हैं जिनसे चाहे सीखने जैसे शब्दों में न कहें, लेकिन जिनसे समझना काम का हो सकता है। किसी भी प्रदेश में गंभीर अखबारनवीस, जनसंगठनों के लोग, जिंदगी के अलग-अलग दायरों के विशेषज्ञ और जानकार ऐसे हो सकते हैं जिनसे बात करके सरकार कुछ सीख सके। यह तो ठीक है कि चुनाव और मतगणना के बीच यह तकरीबन खाली वक्त छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने आईआईएम के विशेषज्ञ प्राध्यापकों को सुनने में लगाया, और अगर हम दुनिया में भारत की विशेषज्ञता का सम्मान देखते हैं, उसकी कामयाबी देखते हैं, तो उनमें आईआईएम और आईआईटी दो सबसे प्रमुख संस्थान हैं। इसलिए चाहे यह शोहरत पाने की एक कसरत हो, है तो सही दिशा में। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और चीजों पर भी सरकार को मेहनत करनी चाहिए, अगर उसकी नजर में विशेषज्ञ का सचमुच ही सम्मान है। 

हम बहुत से विभागों के कामकाज, और म्युनिसिपल जैसी स्थानीय संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों को देखते हैं, तो बहुत तकनीकी मामलों में भी किसी तकनीकी विशेषज्ञ से कोई राय नहीं ली जाती, और निर्वाचित नेता या गिने-चुने प्रशासनिक अफसर तकनीकी फैसले लेते भी रहते हैं। अक्सर यह लगता है कि शिक्षाशास्त्री, इंजीनियर, डॉक्टर या दूसरे विषय विशेषज्ञों की कोई जरूरत नहीं है, और राज्य में हर किस्म के फैसले सत्तारूढ़ निर्वाचित नेता, या उनके चुने गए अफसर ले सकते हैं। इसी का नतीजा रहता है कि कोई सरकार अपने कार्यकाल के आखिरी महीनों तक अपनी पसंद से ऐसी योजनाएं बनाते रहते हैं जो उन्हें वोटों के लिए जरूरी लगती हैं, और जो अगली सरकार को भी पसंद आएं, ऐसी कोई गारंटी नहीं रहती। विशेषज्ञों के सम्मान की सोच बहुत अच्छी है, जो सचमुच ही बड़े नेता से महान नेता बनना चाहते हैं, उन्हें किसी भी तरह के नीतिगत फैसले लेने के पहले, जनकल्याण के कार्यक्रम बनाने के पहले जानकार-विशेषज्ञों से राय लेनी चाहिए, अपनी सोच के विरोधियों से भी विचार-विमर्श करना चाहिए, और उसके बाद सत्ता अपने फैसले लेने को आजाद तो रहती है। 

दरअसल सत्ता लोगों में यह अहंकार भर देती है कि उन्हें कुछ भी सीखने-समझने की जरूरत नहीं है, और वे 24 कैरेट सोने की तरह खरे हैं। यही खुशफहमी उन्हें बड़े नेता से महान नेता बनने नहीं देती। समझदार वे लोग रहते हैं जो कि दूसरों के तजुर्बों से लगातार सीखते चलते हैं, अपनी सोच को लागू करने की ताकत जब हो, तब दूसरों की राय सुनकर एक बेहतर नीति या योजना बनाने की समझदारी निर्वाचित नेताओं में रहनी चाहिए। बहुत आसपास के दूसरे नेता या अफसर तो आमतौर पर ठकुरसुहाती में लग जाते हैं, और अपने नेता के पांव भी जमीन पर नहीं पडऩे देते। हमने किसी दूसरे संदर्भ में पहले यह बात लिखी थी कि जो लोग बिना बात पांव पकड़ते रहते हैं, वे लोग कोई गलती या गलत काम दिखने पर भी हाथ पकडक़र रोक नहीं सकते। इसलिए बाहरी लोगों से सीखना तो महत्वपूर्ण है ही, जिंदगी में रोज के कामकाज में भी जानकार लोगों, विरोधियों, आलोचकों, और विशेषज्ञों से सीखने की कोशिश करनी चाहिए। निर्वाचित और सत्तारूढ़ होने के बाद किसी भी नेता की कोशिश महान काम करके महान नेता बनने की रहनी चाहिए। लेकिन लोग सत्ता से चिपके रहने, अधिक से अधिक कमा लेने को ही सब कुछ समझ लेते हैं। जो लोग इससे उबर पाते हैं, वही लोग सचमुच के नेता बनते हैं। 

इस देश के एक सबसे महान दार्शनिक कबीर ने यह लिखा था, निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।  बड़े-बड़े काबिल और कामयाब नेताओं को हमने ऐसे ही बर्बाद होते देखा है क्योंकि उन्होंने अपने आसपास चापलूसों की फौज इकट्ठा कर रखी थी। और हामी भरने वाले दरबारियों के बीच किसी का कद नहीं बढ़ सकता। राज्य शासन से बाहर के विशेषज्ञों से कुछ सीखने की मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार की यह पहल अच्छी है, और हम उम्मीद करते हैं कि उनकी सरकार में सत्तारूढ़ नेता और अफसर अलग-अलग विषयों और क्षेत्रों के जानकार लोगों के तजुर्बे का फायदा रोजाना के कामकाज में भी लेंगे। पांच बरस के कार्यकाल में कुछ दिनों की यह पहल तो अच्छी है, लेकिन इसका नियमित रूप से इस्तेमाल भी होना चाहिए। मंत्रालय से लेकर म्युनिसिपलों तक जब जानकार विशेषज्ञों का सम्मान होगा, तो ही सत्तारूढ़ नेता भी असल कामयाबी पा सकेंगे। सत्ता पर काबिज बने रहना ही जो लोग कामयाबी मान लेते हैं, वे वहीं थमकर रह जाते हैं, उससे आगे नहीं बढ़ पाते। देखना यह भी रहता है कि सत्तारूढ़ नेताओं के राजनीतिक और प्रशासनिक सहयोगी उन्हें अपनी कैद से कितना बाहर निकलने देते हैं। हमने कई सरकारों में सत्तारूढ़ नेताओं को अपने ही दायरे के कैदी बनते देखा है, और उसका क्या चुनावी नतीजा रहा है, यह भी लोगों को अच्छी तरह याद होगा। फिलहाल प्रदेश के दूसरे स्थानीय निर्वाचित नेताओं के लिए भी ऐसे सत्र आयोजित किए जाने चाहिए जिनसे वे नगरीय विकास, स्थानीय शासन, पंचायती राज, और ग्रामीण विकास के अलग-अलग पहलुओं को बेहतर सीख-समझ सकें। 


दीवारों पर लिक्खा है, 1 जून 2024



 

सूरज की लपटों तले क्यों करवाएं चुनाव?

 1 जून 2024

 भारत के आम चुनाव के आज के आखिरी मतदान में लोकसभा की दस फीसदी से अधिक सीटों पर वोट डल रहे हैं। सात राज्यों, और एक केन्द्र शासित प्रदेश की 57 सीटों पर इस वक्त वोट डल रहे हैं, और देश एक अभूतपूर्व गर्मी का सामना कर रहा है। कल एक दिन में लू से देश भर में करीब तीन सौ लोगों के मरने की खबर है, और बहुत से ऐसे लोग गुजरे होंगे जिनकी मौत इस वजह से दर्ज नहीं हो पाई होगी। पिछले ढाई महीने से चले आ रहा यह आम चुनाव जब एक राज्य बिहार में एक दिन में 15 चुनाव कर्मियों की लू से मौत दर्ज करता है, तो जाहिर है कि वोटरों में से भी बहुत से लोग निकलने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे। यह सही वक्त है कि पांच बरस बाद के अगले आम चुनाव, या उसके बीच किसी बरस में मई-जून में अगर किसी राज्य के चुनाव होने हैं, तो उनकी तारीखों के बारे में अभी से तय कर लिया जाना चाहिए। और आम जनता के लिए चुनाव महज एक-दो घंटे मतदान केन्द्र आना-जाना हो सकता है, लेकिन सरकारी कर्मचारी, सुरक्षा कर्मचारी चुनाव इंतजाम में कई-कई दिन ट्रेनिंग पाते हैं, मतदान और मतगणना की तैयारी करते हैं, और सुरक्षा कर्मचारी तो इस गर्मी में सैकड़ों या हजारों किलोमीटर तक का सफर करके खतरनाक जगहों पर पहुंचते हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब मई-जून के ये महीने भयानक गर्मी के रहते हैं, और हर बरस गर्मी बढ़ते चलती है, तो संसद या विधानसभाएं अपने कार्यकाल और अगले चुनाव को लेकर समय रहते कोई फैसला क्यों नहीं लेती हैं? क्या सांसद और विधायक अब एयरकंडीशंड कारों से बाहर निकलना जरूरी नहीं समझते? अगर आमतौर पर ऐसा होता भी है, तो भी इस बार का पूरा चुनाव अभियान तो गर्मी में ही गुजरा है, और पिछले कई हफ्तों में लगातार ऐसी भयानक गर्मी रही है कि राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी दर-दर भटकने का अपना काम ठीक से नहीं कर पाए होंगे। 

भारत में वैसे तो देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम हमेशा ही बहुत अलग-अलग रहता है, अब जैसे आज जब एक दिन में लू से तीन सौ लोग मरे हैं तो उसी दिन मणिपुर में भयानक बाढ़ आई हुई है, और असम में भी। असम में बाढ़ से आधा दर्जन लोगों के मरने की खबर है, और मणिपुर, मेघालय में भी भूस्खलन और सडक़-पुल डूब जाने या बह जाने की खबरें हैं। लाखों लोग बहुत प्रभावित हुए हैं, और उन्हें राहत शिविरों में रखा गया है। यह देश इतना विशाल है कि एक तरफ बाढ़ है, और दूसरी तरफ सूखे की वजह से बेंगलुरू जैसे शहर को खाली करवाने की सरकारी कोशिश चल रही है। लेकिन इस बीच भी पहाड़ों पर सर्दी खत्म हो जाने के बाद, और गर्मियां शुरू होने के पहले पूरे देश का मौसम कुछ ऐसा रहता है कि उस वक्त के चुनाव सबके लिए सहूलियत के हो सकते हैं, और उन चुनावों में जनता की भागीदारी भी अधिक हो सकती है। अप्रैल-मई-जून के बजाय अगर ये चुनाव फरवरी-मार्च-अप्रैल में हुए रहते, तो तमाम लोगों को बड़ी सहूलियत रहती। इस लोकसभा का कार्यकाल दो महीने कम करके आसानी से हर पांच बरस के चुनावी महीनों को बदला जा सकता था, अब भी बदला जाना चाहिए। 

पता नहीं सुप्रीम कोर्ट इतनी मौतों को देखते हुए भी इस मामले में कोई दखल देने के लिए तैयार होगा या नहीं, न भी हो, वहां पर अगर किसी जनहित याचिका के तहत इस मुद्दे पर बहस ही हो जाए, और सुप्रीम कोर्ट इस मामले को सरकार और संसद के सोच-विचार के लायक कहकर छोड़ दे, तो भी इस पर बहस आगे बढ़ सकती है। देश में चुनाव तैयारी में ही सरकारी और राजनीतिक करोड़ों लोगों को हफ्तों तक काम करना पड़ता है, और उन पर यह जुल्म बंद होना चाहिए। फिर जिस अंदाज में मौतें हो रही हैं उनको देखते हुए किसी तरह की सरकारी या राजनीतिक जिद भी जायज नहीं है कि संसद के 60 महीने के कार्यकाल में से दो महीने कम नहीं किए जा सकते। इस मामले पर फैसला विधानसभाओं को जोडक़र लेना चाहिए क्योंकि इस चुनाव में ही कुछ विधानसभाओं का चुनाव हो ही रहा है। और बीच के बरसों में भी इन महीनों में कुछ और विधानसभाओं के या स्थानीय संस्थाओं के चुनाव होते हों, उन पर भी रोक लगानी चाहिए, क्योंकि चुनाव तो पांच बरस में एक बार ही आते हैं, और उन्हें हर बार झुलसाती हुई गर्मी में क्यों रखा जाए? आज तो हालत यह है कि देश के अलग-अलग प्रदेशों में सरकारें लोगों से यह अपील कर रही हैं कि वे दोपहर 12 से 4 के बीच बहुत जरूरी न हों, तो घरों से न निकलें। अब ऐसे में लोगों से चुनाव प्रचार करने, और वोट डालने निकलने की उम्मीद करना तो बहुत ही नाजायज होगा। 

दुनिया में मौसम की मार बढ़ती चल रही है, हर बरस गर्मी बढ़ती चली जा रही है। आज ही खबरों में यह है कि नागपुर में कल तापमान 56 डिग्री था। आज तो 45 डिग्री पर भी लोग गिरकर मर रहे हैं, 56 डिग्री गर्मी कैसी रही होगी? आज ही की एक दूसरी खबर बताती है कि ईरान में कल 66 डिग्री सेल्सियस तापमान था। एक मेडिकल जानकारी वाला लेख बतलाता है कि 45 डिग्री के ऊपर इंसानों के दिमाग पर किस तरह का असर पडऩे लगता है। दिल्ली में कल 52.9 डिग्री तापमान था, और जो योरप आमतौर पर ठंडा माना जाता है, उसके भी अलग-अलग शहरों में बीते कुछ बरसों से लगातार बड़ी गर्मी दर्ज की जा रही है। मौसम के जानकार लोगों का कहना है कि यह गर्मी तो हर बरस बढ़ती ही चलेगी। सरकार को न सिर्फ चुनावों के लिए अलग महीने तय करने चाहिए, बल्कि सडक़ और भवन निर्माण जैसे बहुत से कामों के लिए यह तय कर लेना चाहिए कि उन्हें गर्मियों के पहले या उसके बाद किस तरह से करवाया जा सकेगा। फिलहाल आज मतदान निपट जाए, 4 तारीख को मतगणना निपट जाए, और अगली सरकार के सामने मई-जून के किसी भी राज्य के चुनावों के साथ-साथ संसद के अगले चुनावों का कैलेंडर बदलने का मुद्दा लाना चाहिए। कायदे से तो हमारे बजाय सांसदों और विधायकों को ही यह बात उठानी चाहिए थी, लेकिन उन पर शायद गर्मी की सीधी मार अब नहीं पड़ती है, इसलिए जनता के बीच से कुछ लोगों को संसद और विधानसभा के लिए, और जरूरत पड़े तो अदालत तक जाकर भी इस मुद्दे को उठाना चाहिए। चुनाव प्रचार, इंतजाम, और हिफाजत, इन तीनों कामों में लगे हुए करोड़ों लोगों में से दो-चार फीसदी लोगों को भी एयरकंडीशनर नसीब नहीं होते हैं, इसलिए कानून बनाकर ही मौतों का यह खतरा घटाया जा सकता है।