एनडीए के दावों, और एक्जिट पोल में से अधिक बड़ी शिकस्त किसकी?
4 जून 2024
बड़ी फौजी ताकतों ने चक्रव्यूह में घुसना तो सीखा, निकलना नहीं
3 जून 2024
जन्नत का झांसा दिखाकर मन्नत! धर्म समझ को आने ही नहीं देता
02 जून, 2024
छत्तीसगढ़ में 46 डिग्री तापमान पर एक धार्मिक प्रवचन चल रहा है, और कुछ दिन पहले इसकी तैयारी में हजारों महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर नंगे पैर शोभायात्रा भी निकाली थी। अभी भी जिस जगह यह प्रवचन चल रहा है, वहां लाखों लोगों की आवाजाही है, और कई किलोमीटर तक ट्रैफिक जाम रहता है। सत्तारूढ़ भाजपा के एक नेता ने कल ही ट्विटर पर यह लिखा है कि इतनी गर्मी में कथावाचक प्रदीप मिश्रा के कार्यक्रम में 8 साल की बच्ची ने दम तोड़ दिया। स्थानीय नागरिकों का दावा है कि अब तक 6 मौतें हो चुकी हैं। तत्काल इस आयोजन पर रोक लगे, प्रशासन इस पर ध्यान दें। और लोगों ने भी इस पर लिखा है कि कथावाचकों को अप्रैल, मई, और जून के महीनों में कार्यक्रम नहीं रखने चाहिए। किसी ने लिखा है कि इस महाराज को खुद ही यह कार्यक्रम रखना नहीं था, या अब बंद कर देना चाहिए, किसी के कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। एक और ने लिखा है कि महाराज को पैसा कमाने से फुर्सत मिले, तो आम नागरिकों की सोचें। इतनी गर्मी में कोई ऐसा आयोजन करता है, जबकि गर्मी का रेड अलर्ट जारी हुआ है। एक व्यक्ति ने तंज कसते हुए कहा है कि दो सौ बेलपत्र चढ़ाने बोलिए, ठीक हो जाएगा। किसी और ने याद दिलाया है कि इसी प्रवचनकर्ता के मध्यप्रदेश में भी रूद्राक्ष वितरण के दौरान बहुत से मौतें देखने मिली थी। कुछ लोगों ने यह याद दिलाया है कि लोगों को अपने घर से ही कथा सुननी चाहिए। एक ने ट्वीट करने वाले भाजपा नेता को याद दिलाया कि इतनी भरी गर्मी में यह जानलेवा आयोजन करने की अनुमति भाजपा सरकार ने ही दी है। एक ने लिखा है कि चलिए बहुत जल्द जाग गए, फिलहाल कथा समाप्त हो चुकी है। एक ने सवाल उठाया है कि 6 मौतों की जिम्मेदार किसे ठहराया जाए। एक व्यक्ति ने लिखा है कि महाराज को होश नहीं है क्या, इसी भीषण गर्मी में अपने प्रवचन रद्द करना चाहिए, मरने वालों को दस-दस लाख मुआवजा देना चाहिए। मंत्रियों का छात्र बन क्लास में बैठना तो ठीक है, लेकिन छात्र जैसे सीखना भी जरूरी
2 जून 2024
सूरज की लपटों तले क्यों करवाएं चुनाव?
1 जून 2024
भारत में वैसे तो देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम हमेशा ही बहुत अलग-अलग रहता है, अब जैसे आज जब एक दिन में लू से तीन सौ लोग मरे हैं तो उसी दिन मणिपुर में भयानक बाढ़ आई हुई है, और असम में भी। असम में बाढ़ से आधा दर्जन लोगों के मरने की खबर है, और मणिपुर, मेघालय में भी भूस्खलन और सडक़-पुल डूब जाने या बह जाने की खबरें हैं। लाखों लोग बहुत प्रभावित हुए हैं, और उन्हें राहत शिविरों में रखा गया है। यह देश इतना विशाल है कि एक तरफ बाढ़ है, और दूसरी तरफ सूखे की वजह से बेंगलुरू जैसे शहर को खाली करवाने की सरकारी कोशिश चल रही है। लेकिन इस बीच भी पहाड़ों पर सर्दी खत्म हो जाने के बाद, और गर्मियां शुरू होने के पहले पूरे देश का मौसम कुछ ऐसा रहता है कि उस वक्त के चुनाव सबके लिए सहूलियत के हो सकते हैं, और उन चुनावों में जनता की भागीदारी भी अधिक हो सकती है। अप्रैल-मई-जून के बजाय अगर ये चुनाव फरवरी-मार्च-अप्रैल में हुए रहते, तो तमाम लोगों को बड़ी सहूलियत रहती। इस लोकसभा का कार्यकाल दो महीने कम करके आसानी से हर पांच बरस के चुनावी महीनों को बदला जा सकता था, अब भी बदला जाना चाहिए।
पता नहीं सुप्रीम कोर्ट इतनी मौतों को देखते हुए भी इस मामले में कोई दखल देने के लिए तैयार होगा या नहीं, न भी हो, वहां पर अगर किसी जनहित याचिका के तहत इस मुद्दे पर बहस ही हो जाए, और सुप्रीम कोर्ट इस मामले को सरकार और संसद के सोच-विचार के लायक कहकर छोड़ दे, तो भी इस पर बहस आगे बढ़ सकती है। देश में चुनाव तैयारी में ही सरकारी और राजनीतिक करोड़ों लोगों को हफ्तों तक काम करना पड़ता है, और उन पर यह जुल्म बंद होना चाहिए। फिर जिस अंदाज में मौतें हो रही हैं उनको देखते हुए किसी तरह की सरकारी या राजनीतिक जिद भी जायज नहीं है कि संसद के 60 महीने के कार्यकाल में से दो महीने कम नहीं किए जा सकते। इस मामले पर फैसला विधानसभाओं को जोडक़र लेना चाहिए क्योंकि इस चुनाव में ही कुछ विधानसभाओं का चुनाव हो ही रहा है। और बीच के बरसों में भी इन महीनों में कुछ और विधानसभाओं के या स्थानीय संस्थाओं के चुनाव होते हों, उन पर भी रोक लगानी चाहिए, क्योंकि चुनाव तो पांच बरस में एक बार ही आते हैं, और उन्हें हर बार झुलसाती हुई गर्मी में क्यों रखा जाए? आज तो हालत यह है कि देश के अलग-अलग प्रदेशों में सरकारें लोगों से यह अपील कर रही हैं कि वे दोपहर 12 से 4 के बीच बहुत जरूरी न हों, तो घरों से न निकलें। अब ऐसे में लोगों से चुनाव प्रचार करने, और वोट डालने निकलने की उम्मीद करना तो बहुत ही नाजायज होगा।
दुनिया में मौसम की मार बढ़ती चल रही है, हर बरस गर्मी बढ़ती चली जा रही है। आज ही खबरों में यह है कि नागपुर में कल तापमान 56 डिग्री था। आज तो 45 डिग्री पर भी लोग गिरकर मर रहे हैं, 56 डिग्री गर्मी कैसी रही होगी? आज ही की एक दूसरी खबर बताती है कि ईरान में कल 66 डिग्री सेल्सियस तापमान था। एक मेडिकल जानकारी वाला लेख बतलाता है कि 45 डिग्री के ऊपर इंसानों के दिमाग पर किस तरह का असर पडऩे लगता है। दिल्ली में कल 52.9 डिग्री तापमान था, और जो योरप आमतौर पर ठंडा माना जाता है, उसके भी अलग-अलग शहरों में बीते कुछ बरसों से लगातार बड़ी गर्मी दर्ज की जा रही है। मौसम के जानकार लोगों का कहना है कि यह गर्मी तो हर बरस बढ़ती ही चलेगी। सरकार को न सिर्फ चुनावों के लिए अलग महीने तय करने चाहिए, बल्कि सडक़ और भवन निर्माण जैसे बहुत से कामों के लिए यह तय कर लेना चाहिए कि उन्हें गर्मियों के पहले या उसके बाद किस तरह से करवाया जा सकेगा। फिलहाल आज मतदान निपट जाए, 4 तारीख को मतगणना निपट जाए, और अगली सरकार के सामने मई-जून के किसी भी राज्य के चुनावों के साथ-साथ संसद के अगले चुनावों का कैलेंडर बदलने का मुद्दा लाना चाहिए। कायदे से तो हमारे बजाय सांसदों और विधायकों को ही यह बात उठानी चाहिए थी, लेकिन उन पर शायद गर्मी की सीधी मार अब नहीं पड़ती है, इसलिए जनता के बीच से कुछ लोगों को संसद और विधानसभा के लिए, और जरूरत पड़े तो अदालत तक जाकर भी इस मुद्दे को उठाना चाहिए। चुनाव प्रचार, इंतजाम, और हिफाजत, इन तीनों कामों में लगे हुए करोड़ों लोगों में से दो-चार फीसदी लोगों को भी एयरकंडीशनर नसीब नहीं होते हैं, इसलिए कानून बनाकर ही मौतों का यह खतरा घटाया जा सकता है।




