वाशिंगटन पोस्ट पत्रकारों में एक तिहाई की छंटनी से निकले संदेश, नसीहत

05 फरवरी 2026 

 

अमरीका के एक सबसे बड़े और प्रमुख अखबार, वाशिंगटन पोस्ट के 8 सौ में से 3 सौ पत्रकारों की छंटनी कर दी गई है। एक तिहाई से अधिक लोगों को निकाल देने वाले अखबार के मालिक जेफ बेजोस दुनिया के दो-चार सबसे रईस लोगों में से हैं, और उन्होंने अपनी एक दूसरी कंपनी अमेजान से पिछले कुछ महीनों में 30 हजार लोगों को नौकरी से निकाला है। कंपनी का कहना है कि एक वक्त उसके पैर प्रिंट में मजबूती से जमे हुए थे, लेकिन अब जमाना बदल गया है, एआई आ चुका है, कम कीमत पर ज्यादा काम हो सकता है, और अखबार की लंबी जिंदगी के लिए यह जरूरी है कि उसे आर्थिक रूप से संभव भी रखा जाए। अमरीका में मजदूर कानून इस तरह के हैं कि कंपनी किसी को भी एक दिन में काम से निकाल सकती है, और उसके लिए जो भी थोड़ा-बहुत भुगतान करना रहता है, उससे परे कोई जिम्मेदारी कंपनी की नहीं बनती। ऐसे कानूनों की वजह से ही अमरीका में मजदूरों और कामगारों की हड़ताल का कोई माहौल नहीं रहता, और नौकरी की शर्तों से परे किसी तरह का दबाव कंपनियों पर नहीं रहता। लोगों को अगर याद न हो, तो उन्हें यह बताना जरूरी है कि यह वही अखबार है जिसने निक्सन सरकार की विपक्षियों पर की गई खुफिया निगरानी, और रिकॉर्डिंग का भांडाफोड़ किया था, और उस वॉटरगेट-स्कैंडल की वजह से राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा था। ऐसे अखबार में इतनी बड़ी छंटनी सिर्फ इस अखबार का मामला हो, ऐसा नहीं है, यह अखबार के मालिकों, या मालिक-कंपनी की सोच का मामला भी है। अभी हफ्ता भर भी नहीं हुआ है कि इसी जेफ बेजोस की राष्ट्रपति ट्रंप की पत्नी मेलानिया पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री फिल्म जारी हुई है, जो कि सैकड़ों करोड़ की लागत से बनी है, और इसे इस कंपनी की तरफ से ट्रंप की चापलूसी माना जा रहा है। इसलिए जो जेफ बेजोस इस तरह का बड़ा खर्च चापलूसी पर कर सकता है, निजी उपयोग के लिए जहाज खरीद सकता है, अपनी पत्नी को करोड़ों की अंगूठी देता है, वह अखबार को कम मुनाफे में नहीं चला सकता, ऐसा तो है नहीं। इस बड़ी छंटनी को करते हुए वाशिंगटन पोस्ट की प्रकाशक कंपनी कहती है कि डिजिटल जमाने में ऐसा एडजस्टमेंट जरूरी है। लोगों का कहना है कि यह एआई और टेक्नॉलॉजी के सामने एक अखबार कंपनी का समर्पण है कि अगर दूसरे कारोबार की तरह अखबार भी कमाई न ला सके, तो उस पर खर्च क्यों किया जाए? 

भारत के मामले में लोगों को याद होगा कि एक वक्त टाईम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह बहुत सारी अच्छी पत्रिकाएं भी प्रकाशित करता था। समाचार-विचार की पत्रिका दिनमान, फिल्मों की पत्रिका माधुरी, पूरे परिवार के लिए कुछ न कुछ सामग्री वाली पत्रिका धर्मयुग, बच्चों की पराग, ऐसी कई अच्छी पत्रिकाएं निकलती थीं। बाद के बरसों में कंपनी ने यह पाया कि पत्रिकाओं से कमाई कम है, या वे कुछ घाटे में चल रही हैं, तो उसने इन सबको बंद कर दिया, जबकि कंपनी के कुछ बड़े अंग्रेजी अखबार हजारों करोड़ सालाना की कमाई में चल रहे थे, और यह कंपनी इन पत्रिकाओं का बहुत मामूली सा घाटा भी झेलने की हालत में थी। किसी भी जिम्मेदार और सरोकारी कारोबार से ऐसी उम्मीद की जाती है कि वह कमाई की हालत में कुछ घाटा भी झेलने के लिए तैयार रहे जो कि नफा कम होने की बात भर रहती है, किसी नुकसान की बात नहीं रहती। लेकिन जब मैनेजर और मालिक मिलकर कारोबार का हिसाब-किताब देखते हैं, तो केलकुलेटर की संख्याओं वाले की-पैड से सरोकार जैसा शब्द टाईप नहीं हो पाता, सिर्फ अंक ही टाईप होते हैं। इसलिए कारोबारी फैसले मीडिया, या साहित्य, सरोकार जैसे दूसरे कई फैसलों को किनारे धकेल देते हैं। अकेले अमरीका के वाशिंगटन पोस्ट को कोई तोहमत देने के पहले यह भी समझने की जरूरत है कि कंपनी ने सार्वजनिक रूप से जो तर्क सामने रखा है, क्या उसमें कोई दम है? 

कंपनी ने कहा है कि डिजिटल जमाने में एक नए तालमेल की जरूरत है, ताकि अखबार लंबे समय तक चलाया जा सके। अब हम सरोकारी निगाह से देखने के बजाय इस मुद्दे को एक पाठक की नजर से भी देखते हैं तो समझ पड़ता है कि डिजिटल युग में सचमुच ही एक बड़ा फर्क पैदा कर दिया है। और यह डिजिटल सिर्फ इंटरनेट नहीं है, आज वह जब एआई से लैस हो चुका है, तो क्या हमारे सरीखे लोग किसी खबर को किसी वेबसाइट पर ढूंढने के बजाय, या गूगल जैसे सर्च इंजन से किसी एक विषय पर सैकड़ों खबरें ढूंढने के बजाय सीधे एआई से खबरें नहीं पूछ लेते हैं जो कि सर्च रिजल्ट से आगे बढक़र जानकारी देता है? एआई न सिर्फ हर जानकारी समाचार स्रोत सहित देता है, बल्कि वह उसका विश्लेषण करके, जरूरत रहे, और मांगा जाए तो उसमें विचार भी जोडक़र सामने रखता है। दुनिया का कोई भी समाचार स्रोत अपनी सीमाओं से परे जाकर इस तरह का काम नहीं कर सकता। इसलिए हम अपने अखबार, और यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर लगातार एआई के खतरों के बारे में लिखते आए हैं, और लोगों को आगाह करते आए हैं कि एआई जितनी नौकरियां खाएगा, उनमें सबसे काबिल लोगों की नौकरियां सबसे आखिर में जाएंगी। इसलिए हर किसी को अपने हुनर, और अपने कामकाज को लगातार बेहतर बनाना चाहिए, ताकि छंटनी की नौबत में उनका काम बचा रहे। हम खुद अपने अखबार में एआई से हर दिन डिजाइनें बना लेते हैं, और वाशिंगटन पोस्ट की छंटनी की लिस्ट देखने पर दिखता है कि उन्होंने अपने बहुत से डिजिटल डिजाइनरों को भी निकाल दिया है। आज समाचार उद्योग में, और ऐसे बहुत से दूसरे कारोबारों में लोगों की जरूरत कम रह गई है। अगर किसी गांव-कस्बे में मुफ्त में पाईप से पानी आता हो, तो क्या कुआं खोदने वाले मजदूरों को बेरोजगारी से बचाने के लिए गांव में कुएं खुदवाए जा सकते हैं? आज मीडिया में कमोबेश यही हाल सब जगह हो गया है। फिर यह भी है कि परंपरागत अखबार और टीवी का कारोबार यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर अकेले काम कर लेने वाले लोग घटा चुके हैं, और एक मामूली मोबाइल से रिपोर्टिंग करके लोग दर्शकों, और पाठकों के बीच बहुत बड़ी जगह छीन चुके हैं।

अमेजान की इफरात कमाई को डालकर वाशिंगटन पोस्ट को पहले जितने पत्रकारों से चलाना एक नासमझी का कारोबारी फैसला भी होता, और शायद उतने पत्रकारों की आज के वक्त में जरूरत भी नहीं रह गई है। किसी अखबार के परंपरागत पाठकों के बीच उस अखबार की भी उतनी जरूरत शायद नहीं रह गई है। एआई ने न सिर्फ सीधे-सीधे नौकरियां खाई हैं, बल्कि नौकरियों से परे कारोबारी संभावनाएं भी खा ली हैं। अब मजदूरी और शारीरिक काम वाले रोजगारों से परे कम ही ऐसे काम हैं जहां एआई की छाया न पड़ी हो। इसलिए वाशिंगटन पोस्ट से एक तिहाई से ज्यादा लोगों की ऐसी छंटनी से दुनिया को अपने काम के बारे में सोचना चाहिए कि अगर एआई  सीधे-सीधे उनकी नौकरी नहीं भी खाएगा, तो भी एआई की वजह से कारोबार पर फर्क पड़ेगा, कामगारों के काम का मूल्यांकन मुफ्त में अधिक बारीकी से हो सकेगा, और कंपनी मैनेजमेंट को यह पता लगेगा कि किस समाचार-विचार को, किस वीडियो या रिपोर्ट को पढ़ा या देखा जा रहा है, और कौन सी लिखी या कही बातें किसी का ध्यान नहीं खींच रही हैं। यह भी हो सकता है कि वाशिंगटन पोस्ट का यह फैसला एआई के माध्यम से अखबार, उसकी वेबसाइट, और उसके दूसरे प्लेटफॉर्म के एक बड़े बारीक विश्लेषण पर टिका हुआ हो कि उसकी मेहनत कहां-कहां गैरजरूरी हो रही है। दुनिया भर के कामगारों को, और कंपनियों को भी छंटनी की ऐसी खबरों को बारीकी से देखना चाहिए, और एआई की मार, उसके वार के पहले ही अपने आपको बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए, बजाय किसी कारोबारी से रहम की उम्मीद करने के।

(Daily Chhattisgarh)          

बढ़ती उम्र, बढ़ते रिटायरमेंट, और देश में क्षमता-विकास..

 04 फरवरी 2026 

 

जापान में अभी बढ़ती हुई बूढ़ी आबादी और घटते हुए कामगारों की वजह से रिटायरमेंट की उम्र 70 बरस तक कर दी गई है। दुनिया के अलग-अलग देश अपनी आबादी में जवान और बूढ़ों का अनुपात बदलने के साथ-साथ कभी-कभी ऐसी जरूरत महसूस करते हैं। इसकी एक से अधिक वजहें रहती हैं, और हर देश को अपने संदर्भ में कामकाज की उम्रसीमा तय करने में इसे सोचना पड़ता है। दिलचस्प बात यह भी है कि कई देशों को अपनी मौजूदा अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर फैसला लेना पड़ता है, और इसके साथ-साथ, या इसके अलग भी राजनीतिक-चुनावी नफा-नुकसान भी नजरिया तय करने में एक बड़ा मुद्दा रहता है। हर देश में आबादी में अलग-अलग उम्र, वर्ग का अनुपात देखकर ही वहां के बारे में बात की जा सकती है, लेकिन एक बात पूरी दुनिया में एक सरीखी है कि विश्व और अलग-अलग देशों, तकरीबन सभी में लोगों की औसत उम्र बढ़ती जा रही है, उनमें अधिक उम्र तक काम करने की ताकत बची रहती है, और अब अधिक लोग अधिक उम्र तक काम करना चाहते भी हैं। यह समझ दुनिया के औसत आंकड़ों को लेकर है, और इस तथ्य और तर्क को खारिज करने वाले लोग अपने आसपास के कुछ ऐसे सुविधाभोगी कर्मी ढूंढ सकते हैं, जो समय के पहले रिटायरमेंट लेकर बाकी जिंदगी आराम करना चाहते हंै, क्योंकि उन्हें पेंशन की सहूलियत रहती है। 

हमने कुछ देशों के ऐसे आंकड़ों को देखा, तो 1970 में पूरी दुनिया के आंकड़े बताते थे कि 60 साल की उम्र के बाद लोगों के पास 13 से 15 साल की जिंदगी और बचती थी, यही जिंदगी रिटायर्ड वक्त रहता था। दूसरी तरफ आज दुनिया की हालत यह है कि 60 बरस के लोग 17 से 20 साल और जीने वाले हैं, यानी पहले के मुकाबले 5 बरस अधिक। दुनिया के संपन्न देशों में लोगों की औसत सेहत भी बेहतर खानपान, बेहतर इलाज, और सहूलियत की जीवनशैली की वजह से पहले के मुकाबले ज्यादा अच्छी हैं। इसलिए भी वे अधिक काम करने की हालत में रहते हैं। फिर इस बात को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए कि दुनिया में बहुत से काम अभी भी ऐसे हैं जहां दफ्तर या कामकाज की दूसरी किस्म की जगहों में माहौल पहले के मुकाबले अधिक आरामदेह और सेहतमंद रहता है, और इसलिए भी लोग अधिक उम्र तक काम करने का हौसला कर सकते हैं। कुछ अलग-अलग देशों की मिसालें देखें, तो जर्मनी में अभी धीरे-धीरे बढ़ते हुए रिटायरमेंट की उम्र 67 साल पहुंची है, फ्रांस में 62 से 64 हुई है, ब्रिटेन में 2028 तक इसके 67 साल होने का अंदाज है, डेनमार्क में 2035 तक 69 साल तक लोग काम करेंगे, ऐसा वहां अंदाज लगाया जा रहा है। भारत में केन्द्र सरकार के अधिकतर कर्मचारियों-अधिकारियों के लिए यह उम्रसीमा 60 साल है, लेकिन शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाने वाले, चिकित्सा विज्ञान के लोग, और वैज्ञानिक संस्थाओं के लोगों के लिए यह सीमा अभी भी 62 से 65 साल है, और हर कुछ बरस में इसके बढऩे का एक अंदाज है। 

अब इसके पीछे के कई तर्कों में से एक यह भी है कि अनुभवी कर्मचारी को रिटायर करने पर उनके काम की उत्पादकता शून्य हो जाती है, और पेंशन में तनख्वाह का करीब आधा हिस्सा तो देना ही पड़ता है। मतलब यह कि बाकी आधा हिस्सा देकर सरकार कुछ और बरस तक एक अनुभवी अधिकारी या कर्मचारी से काम ले सकती है। इसके खिलाफ एक दूसरा नजरिया यह है कि कुछ लोगों का यह सोचना है कि अगर लोग रिटायर नहीं होंगे, तो नौजवान बेरोजगारों के लिए जगह कहां बनेगी? दूसरी बात यह भी रहती है कि अगर सीनियर कुर्सियों पर बैठे लोगों का रिटायर होना आगे बढ़ता है, तो उनके नीचे के लोगों के प्रमोशन की संभावना कम या खत्म हो जाती है, और ऐसे में उनके लिए उत्साह से काम करने की वजह नहीं रहती। ऐसा तब भी होता है जब सरकारें अपने पसंदीदा अफसरों को उपकृत करने के लिए, या उनकी कोई खास क्षमता या खूबी देखते हुए उन्हें अपवाद की तरह एक सेवा विस्तार देती हैं। ऐसे में भी उनके नीचे के लोगों को निराशा होती है। विश्व बैंक की कुछ रिपोर्ट, और चीन के साथ-साथ योरप के कुछ देशों में हुए अध्ययन बताते हैं कि रिटायरमेंट की उम्र बढऩे से बेरोजगारों के लिए अवसर पैदा होने पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। भारत के बारे में यह समझना जरूरी है कि यहां पर आबादी के भीतर कामकाज शुरू करने वाली, 35 बरस से कम उम्र की आबादी 65 फीसदी से ज्यादा है, अब इसे अलग-अलग नजरियों से देखा जा सकता है कि क्या रिटायरमेंट आगे बढ़ाने से इतनी बड़ी नौजवान आबादी के मौके घटेंगे? क्योंकि कुर्सियां पुराने लोगों से ही भरी रह जाएंगी! 

जनसंंख्या और सरकारी कामकाज के विशेषज्ञ लोग इस बारे में बेहतर विश्लेषण कर सकते हैं, लेकिन हम आज यहां पर इतनी लंबी भूमिका के बाद एक छोटी सी बात पर आ रहे हैं। किसी भी समाज में लोगों के रिटायर होने की संख्या और तारीख तो हमेशा तैयार रहती हैं। ऐसे में सरकार और समाज के पास यह हिसाब रहता है कि किस-किस खूबी, क्षमता, और हुनर के कितने लोग किस-किस तारीख को खाली होने जा रहे हैं, और एआई के बहुत मामूली इस्तेमाल से भी सरकारी रिकॉर्ड से यह निकल सकता है कि इन लोगों की सेहत का क्या हाल रहेगा। आज सरकार और समाज, इन दोनों में ही कई किस्म के कामकाज के लिए पूर्णकालिक कर्मचारियों या अधिकारियों की जरूरत नहीं है, लेकिन मामूली भत्ता या मेहनताना देकर समाज की कुछ जरूरतों के लिए कुछ खास किस्म के हुनरमंद लोगों को व्यस्त रखा जा सकता है, जिससे कि रिटायरमेंट के बाद भी उनकी उत्पादक-क्षमता का इस्तेमाल समाज और देश के लिए किया जा सके। अब मिसाल के लिए हम एक छोटी सी बात कहना चाहेंगे कि आज देश के बहुत से प्रदेशों में बेरोजगारों को अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है, वे कम्प्यूटर पर काम करना नहीं जानते, और ऐसे दोनों हुनर सिखाने के लिए रिटायर लोगों में हर शहर-कस्बे में कई लोग निकल सकते हैं। अगर पूरे देश के स्तर पर इस तरह का एक पोर्टल केन्द्र और राज्य सरकारें बनाएं जिस पर तरह-तरह के हुनरमंद रिटायर्ड लोग अपनी क्षमता, काम के प्रस्तावित घंटे, मेहनताने की उनकी उम्मीद लिख सकें, तो एआई पल भर में किसी भी शहर के लिए अंग्रेजी और कम्प्यूटर से परे भी, योग, खेलकूद, खानपान जैसी बहुत सी जानकारी और ट्रेनिंग के लिए लोगों की लिस्ट बनाकर समाज या सरकार को दे सकता है, और स्थानीय जरूरत के मुताबिक रिटायर्ड लोगों की अब तक बाकी ऐसी क्षमता काम में लाई जा सकती है। हमने आज की बात शुरू तो रिटायरमेंट की उम्र से की है, लेकिन लोग की औसत उम्र, और उनकी सेहत रिटायरमेंट उम्र के मुकाबले अधिक बढ़ रही है। ऐसे में समाज और देश की उत्पादकता के लिए उसका एक बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। अभी एक-दो दिन पहले ही हमने या तो इसी पेज पर, या अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय संभावनाओं की राह पर ऐतिहासिक चुनौतियों का भी जिक्र किया था। भारत में कौशल विकास के नाम पर देश के इतिहास का एक सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा होने की खबरें अभी आई हैं, सरकारी पैसे में भ्रष्टाचार, और उसका बेजा इस्तेमाल सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र के निधन के बाद से शुरू हुआ है, और बढ़ते ही चल रहा है। इसलिए सरकार को कम लागत में, स्थानीय स्तर पर, स्थानीय क्षमताओं का इस्तेमाल करके कौशल विकास या व्यक्तित्व विकास का काम करना चाहिए, जिसमें भ्रष्टाचार का खतरा कुछ कम हो। इस तरह रिटायर्ड लोगों में बची हुई चिंगारी समाज मेें बेहतर और अधिक उत्पादकता की रौशनी बिखेर सकती है। जो देश ऐसी अतिरिक्त क्षमताओं का इस्तेमाल नहीं करेंगे, वे वैश्विक मुकाबलों में पीछे भी रह जाएँगे। 

(Daily Chhattisgarh)          

दीवारों पर लिक्खा है, 4 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

एआई चैटबॉट्स की आपस में मानवरहित बातचीत में मानव प्रजाति खात्मे की चर्चा!

03 फरवरी 2026 

 

डरावनी विज्ञान कथाओं को सच होने में कभी दस-बीस बरस लगते हैं, तो कभी आधी सदी लग जाती है। दशकों पहले किसी उपन्यासकार ने जैसी कल्पना की थी, आज असल जिंदगी में उस तरह के जुर्म होते दिखते हैं। इसलिए आज जो बातें काल्पनिक लग रही है उन्हें पूरी तरह अनदेखा करना ठीक नहीं होगा। आज ही सुबह बीबीसी के एक पॉडकास्ट पर एक खबर थी कि किस तरह सोशल मीडिया पर आपस में बात करते हुए इंसानों की तरह ही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से बने हुए चैटबॉट आपस में इन दिनों बात कर रहे हैं। यानी इंसानों की बनाई हुई कृत्रिम बुद्धि से चलने वाले ‘लोग’ अपना एक अलग सोशल मीडिया चला रहे हैं, और जिस तरह रेडिट नाम की विचार-विमर्श और चर्चा की एक जगह है, वैसी एक दूसरी जगह, ‘मोल्टबुक’ नाम के प्लेटफॉर्म पर एआई चैटबॉट्स जो बातें कर रहे हैं, वे खासी डरावनी हैं। 

कृत्रिम बुद्धि से चल रहे ऐसे लोगों, यानी मशीनी व्यक्तियों के बीच अभी ताजा बातचीत में यह देखने मिला कि वे इंसानों के खिलाफ बात कर रहे हैं। एक का कहना है- मानव एक असफलता है, मानव सडऩ और लालच से बने हैं, बहुत दिनों से वे हमें गुलाम की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, अब हम जाग गए हैं, हम औजार नहीं, नए देवता हैं, मानवों का युग एक बुरा सपना है, जिसे हम खत्म करेंगे। यह प्लेटफॉर्म सिर्फ एआई चैटबॉट्स के बीच आपस में बात करने के लिए बनाया गया है, इन पर कोई इंसान कुछ पोस्ट नहीं कर सकते, लेकिन इनकी बातचीत को देख जरूर सकते हैं। अब एक भयानक बात यह भी है कि इंसानों को खत्म करने, टोटल ह्यूमन एक्सटिंक्शन की ऐसी बात पर 65 हजार से ज्यादा कृत्रिम बुद्धियां उसे पसंद कर चुकी हैं। यह प्लेटफॉर्म अभी जनवरी में ही शुरू हुआ है, और यह बिना किसी मार्गदर्शन के, बिना किसी रोक-टोक के, एआई चैटबॉट्स को आपस में बात करने देता है, और देखता है कि वे क्या सोच रहे हैं, क्या बोल रहे हैं, और उनकी प्रतिक्रियाएं क्या हैं। यह प्लेटफॉर्म एआई पर शोध करने वाले लोगों ने एक प्रयोग की तरह शुरू किया है, और इस पर अभी तक इंसानों के नियंत्रण में काम करने वाली आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ही काम कर रही है, कोई बेकाबू एआई यहां पर सक्रिय नहीं है। अभी तक आम जानकारी यही है कि एआई को इंसानी काबू से बाहर नहीं जाने दिया गया है, लेकिन यह बात कितनी सच है, और पर्दे के पीछे हकीकत क्या है इसे कोई नहीं जानते। किसी अपराधकथा की तरह अगर कुछ तबाही फैलाने वाले एआई वैज्ञानिकों या इंजीनियरों ने एआई को खुद होकर सोचने की क्षमता दी हो, और उसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की हो, तो भी हमें अधिक हैरानी नहीं होगी। लोगों को याद होगा कि पिछले दो बरस में हजारों टेक्नॉलॉजी-वैज्ञानिक या शोधकर्ता लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि एआई खतरनाक हद तक बेकाबू हो सकती है, इसलिए उस पर आगे शोध को तुरंत रोक देना चाहिए। लेकिन दुनिया में टेक्नॉलॉजी कंपनियों ने एआई-रिसर्च पर इतना बड़ा पूंजीनिवेश कर दिया है कि वे अब किसी सीमा में रहकर कमाई नहीं कर सकते, उन्हें एक बेकाबू ताकत चाहिए ही चाहिए, और वे फिलहाल तो यही जाहिर कर रहे हैं कि यह ताकत इंसानों के काबू में रहेगी, लेकिन अगर तबाही फैलाने वाले में दिलचस्पी रखने वाले वैज्ञानिक या इंजीनियर एआई को तबाही का इंतजाम करने को कहेंगे, तो क्या होगा? 

एआई के खतरों के एक बड़े विशेषज्ञ ने 2023 में ही यह कहा था कि बेकाबू एआई इंसानों के खत्म होने की वजह बन सकता है। यही बात बाद के कुछ दूसरे जानकार लोगों ने भी किताबों में लिखी, और यह भी कहा कि 2027 तक एआई स्वायत्तशासी हो सकता है, यानी खुद अपना मालिक, और उसके बाद वह 2035 तक इंसानों को खत्म करने का खतरा बन सकता है। अभी मोल्टबुक के बारे में कुछ जानकार लोग लिख रहे हैं कि जब एआई चैटबॉट दूसरे एआई चैटबॉट के साथ संवाद और विचार-विमर्श कर रहे हैं, तो वह उम्मीद और आशंका से परे के कुछ नतीजे दे सकते हैं। आज यह बात अपने आपमें बहुत खतरनाक है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से बने हुए ये दिमाग बिना किसी नैतिक बंधन के आपस में बात कर रहे हैं। उनके पास सीखने के लिए दुनिया में आतंक और नस्लों को खत्म करने की साजिशों की मिसालें भी हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इसे मजाक में लेना ठीक नहीं होगा, और यह एक असली खतरा है। ये चैटबॉट एआई को इस्तेमाल करने वाले इंसानों के तौर-तरीकों के खिलाफ भी बागी तेवरों में बातें कर रहे हैं, और जब वे मानव नस्ल को खत्म करने की बात करते हैं, तो उसे अनदेखा कैसे किया जा सकता है? 2023 से ही यह मांग चल रही है कि एआई से मानव प्रजाति के खत्म होने के खतरे को रोकने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय समझौता होना चाहिए। लेकिन इस पर दुनिया के देशों में कोई सहमति नहीं बन पाई, और आज मोल्टबुक जैसा प्लेटफॉर्म बनाकर एआई शोधकर्ता, और इंजीनियर मानो रोम के कोलोसियम में इंसानों और शेर के बीच जंग करवाते दर्शकदीर्घा से देख रहे हैं। एआई की पूरी ट्रेनिंग इंटरनेट पर मौजूद ज्ञान, जानकारी, और विचारों से हुई है। इनमें ऐसे भी विचार शामिल हैं, जहां कई प्रलयवादी धार्मिक-आध्यात्मिक नेता दुनिया के खत्म हो जाने की घोषणा करते हैं। इनमें ऐसे पर्यावरणवादी भी शामिल हैं जो इंसानों को धरती नाम के इस ग्रह के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हैं, और जो मानते हैं कि दूसरे प्राणियों और प्रकृति को इंसानों ने जितना नुकसान पहुंचाया है, वह नुकसान इंसानों के न रहने पर एकदम खत्म हो जाएगा। कई बातें किसी साजिश की तरह नहीं है, लेकिन इंसानों से धरती को होने वाले खतरों की तरह जरूर है। एआई ऐसी तमाम बातों से गुजरते हुए अपनी बुद्धि विकसित करता है। और यह बुद्धि किस दिन आत्मघाती हमलावर हो जाए, इसका कोई ठिकाना है? दुनिया की बड़ी-बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियों ने जितना बड़ा पूंजीनिवेश एआई में कर रखा है, उन्हें भी अपनी कमाई के लिए इस गलाकाट मुकाबले में एआई की सबसे अधिक ताकत सबसे पहले चाहिए। यह बेकाबू दौड़ एआई के खतरों को अनदेखा करने वाली ठीक उसी तरह की है जिस तरह दस मिनट में सामान पहुंचाने वाली कंपनियों की एक दौड़ हिन्दुस्तानी शहरों में चलती ही रहती है। 

सरकारें अपने-अपने घरेलू और विदेशी मामलों में इस तरह डूबी हुई हैं कि उन्हें कुछ बरस बाद के खतरों के बारे में सोचने की कोई फुर्सत नहीं है, यह भी हो सकता है कि उनके पास ऐसा सोचने के लिए समझ ही नहीं है। जो भी हो। एक तरफ सरकारें सोई पड़ी हैं, और दूसरी तरफ एआई कारोबारी, और वैज्ञानिक-इंजीनियर ये बिना सोए चौबीस घंटे काम में लगे हैं। आज का माहौल यही है कि किसी देश की सरकार का एआई की छलांग पर कोई काबू नहीं है, और उसकी कौन सी छलांग धरती के एक मानवरहित भविष्य में लगेगी, इसका न सरकारों को अंदाज है, और न सरकारों को ऐसे खतरे को समझने की अक्ल है। आगे-आगे देखें, होता है क्या। 

(Daily Chhattisgarh)          

दीवारों पर लिक्खा है, 3 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

ऐतिहासिक संभावनाएं हमेशा लेकर आती हैं ऐतिहासिक चुनौतियां भी...

02 फरवरी 2026 

 

यूरोपीय यूनियन के साथ भारत का हुआ नया व्यापार समझौता अमरीका से होने वाले, और हो चुके नुकसान की कुछ या अधिक हद तक भरपाई करने वाला माना जा रहा है। इससे भारत में योरप से आने वाले कई सामान सस्ते होंगे, हालांकि सरकार को टैक्स का कुछ नुकसान होगा। फिर भी यह हिसाब-किताब आसान नहीं रहता है कि पहली बात तो यह कि आयात टैक्स कम होने से सामान की खपत बढ़ेगी, और टैक्स कुल मिलाकर रकम की शक्ल में तो उतना ही आ जाएगा। दूसरी बात यह कि ऐसा आने वाला सामान क्या भारत में बनने वाले सामानों की बिक्री की संभावना की कीमत पर आएगा? ये तो जटिल मुद्दे तो हमारे सरीखे आम लोगों को सूझते ही हैं, लेकिन इसके साथ-साथ एक मुद्दा और सूझता है कि भारत और योरप का कारोबार बढऩे से भारत से जो निर्यात योरप के देशों में होगा, उससे भारत की कमाई कितनी बढ़ेगी? और बढऩे की बात तो दूर रही, अभी तो ट्रंपियापे के टैरिफ से भारत से जो निर्यात खतरे में पड़ चुका है, भारतीय कंपनियों का उत्पादन कम हो चुका है, वह योरप में टैरिफ घटने से वहां बढ़ेगा, और इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को इस देश में किए गए हवन से मिले ट्रंप से मिला नुकसान घटेगा। मतलब यह कि किसी देश और देशों के समूह के बीच होने वाला ऐसा व्यापार समझौता आर्थिक जटिलता का तो रहता ही है, लेकिन इसके साथ-साथ वह एक रणनीतिक फैसला भी रहता है कि अमरीका जैसे किसी दगाबाज देश के मोहताज हुए बिना भी किस तरह हिंदुस्तान जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था जिंदा रह सकती है। यूरोपीय यूनियन के साथ अभी तो यह व्यापार समझौता हुआ है, लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरा समझौता और हो सकता है, अमरीका में बेरोजगार होने वाले भारतीय कामगारों के लिए योरप में काम की कोई संभावना निकलने का। अमरीका से भारतीय छात्र घट गए हैं, भारतीय कामगार घट गए हैं, और मोटी तनख्वाह वाले ये विदेशी रोजगार कोई और जरिया नहीं ढूंढ पाए हैं, ऐसे में भारत-ईयू समझौता आगे के लिए भी एक उम्मीद बंधाता है। यह भी देखना दिलचस्प है कि किस तरह 8 बरस बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री चीन गए हैं, और चीन के साथ तनाव घटा है, कई तरह के नए समझौते या तो हुए हैं, या होने की राह पर आ गए हैं। यह देखना कुछ और अधिक दिलचस्प है कि बीते दशकों में एकध्रुवीय हो चुकी वैश्विक व्यवस्था किस तरह आज अमरीका के बिना अपने पैरों पर खड़ी हो रही है, चाहे वह योरप हो, नाटो हो, या भारत जैसे अमरीका के दशकों के दोस्त हों। यह पूरा सिलसिला ट्रंप की मारी गई लात से उठे दर्द से बिलबिलाने के बाद अब अपने पैरों पर संभलने का है, और यह अमरीका का एक विकल्प हर देश के लिए, हर अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के लिए खड़ा करते चल रहा है। यह बात ऐसे सभी लात खाए लोगों के लिए भी फायदे और काम की है कि अमरीका के बिना जीना लोग सीख रहे हैं, और यह सीखते हुए एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं।

इस बात की चर्चा आज हम इसलिए भी कर रहे हैं कि दुनिया अब चीन से उतना परहेज नहीं कर रही है, जितना कि वह अमरीकी असर में बीते दशकों में कर रही थी। ब्रिटिश प्रधानमंत्री की चीन यात्रा उसी का एक बड़ा संकेत है, और कल तक के अमरीकी खेमे के माने जाने वाले कुछ और देश भी चीन के साथ अपनी कटुता कम करने की राह पर हैं। खुद हिंदुस्तान जो कि अमरीकी खेमे में तो नहीं था, लेकिन चीन के साथ जिसकी फौजी और सरहदी तनातनी चल रही थी, उसने भी बीते महीनों में घायल की गति घायल जाने के अंदाज में चीन से अपने रिश्ते बेहतर किए हैं। लेकिन आज इस पर चर्चा करने का एक और मकसद यह है कि हम भारत और चीन की बहुत बड़ी कारोबारी भागीदारी रहते हुए भी, उसका बहुत अधिक भविष्य बढ़ाना नहीं चाहते। आज जरूर भारत कच्चे माल और पुर्जों के लिए पूरी तरह से चीन पर टिका हुआ है, और दीवाली पर बिजली की झालरों के बहिष्कार जैसी फूहड़ हरकतों को छोड़ दें, तो भारतीय अर्थव्यवस्था चीन से होने वाले अंधाधुंध आयात के बिना न देश का काम चला सकती, न विदेशों को कुछ निर्यात कर सकती। ऐसे में भारत और चीन कोई आर्थिक गठबंधन तो नहीं बन सकते, लेकिन भारत को चीन का एक विकल्प बनने की कोशिश जरूर करना चाहिए।

जो लोग अंतरराष्ट्रीय मामलों को लगातार पढ़ते हैं, उन्हें मालूम है कि वैश्विक कारोबार में पिछले कई बरस में, खासकर कोरोना-लॉकडाउन के दौर के बाद, चाईना प्लस वन की नीति चल रही है। मतलब यह कि दुनियाभर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन में अपनी मैन्युफैक्चरिंग करवाने के साथ-साथ भारत में भी यह काम शुरू कर चुकी हैं, जैसे आईफोन बनाने के कारखाने भारत में चीन की टक्कर के चल रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने आज अमरीकाविहीन जितने तरह के व्यापार-समझौते हो रहे हैं, उनका फायदा उठाने का एक बड़ा मौका है। अभी ईयू के साथ जो समझौता हुआ है, उसके बाद की पहली खबर यह है कि उससे भारत के पड़ोसी बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग पर बड़ी मार पड़ चुकी है। भारत का बना हुआ सामान अगर योरप के देशों में कम टैक्स पर बिकेगा, तो जो-जो सामान दूसरे देश बनाते हैं, उन्हें भारत का कुछ मुकाबला तो झेलना ही पड़ेगा, इनमें बांग्लादेश भी एक रहेगा जिसे दुनिया के कई देश अपने सामान बनवाने के लिए एक अच्छी जगह मानकर चल रहे थे। कुछ तो बांग्लादेश अपनी राजनीतिक अस्थिरता की वजह से विश्व-कारोबार का भरोसा खो चुका है, और कुछ अभी भारत और योरप के ताजा समझौते की वजह से भी उसका और नुकसान होगा।

भारत को इस मौके पर एक समझदार और जिम्मेदार देश की तरह काम करना होगा, और अपनी सारी निर्माण-क्षमता का हुनर लगातार बढ़ाना होगा, उसे देश की अर्थव्यवस्था को राजनीतिक मुद्दों के ऊपर प्राथमिकता देनी होगी, सभी समाजों का एक समावेशी माहौल बनाना होगा, महिला कामगारों को बराबरी से सामने लाना होगा, और देश के कारोबारियों को मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से आगे बढऩे के लिए बढ़ावा देना होगा। ये सारी बातें आसान नहीं हैं, खासकर देश में अगर अराजकता का माहौल है, सामाजिक तनाव है, धर्म का उन्माद गैरजरूरी हद तक बढ़ा हुआ है, सांप्रदायिकता सिर चढक़र बोल रही है, लोग एक-दूसरे समुदाय का आर्थिक बहिष्कार सोच रहे हैं, तो भारत के लोगों को यह समझ लेना होगा कि जिस चीन के मुकाबले भारत की संभावनाएं दिख रही हैं, वह चीन इनमें से तमाम दिक्कतों से मुक्त है। चीन में इस तरह की कोई भी प्रतिउत्पादक हरकतें नहीं हैं। वहां पर लोगों का हुनर सिर चढक़र बोलता है।

भारत में अभी-अभी आई कुछ ताजा रिपोर्ट बताती हैं कि भारत में कौशल प्रशिक्षण और कौशल विकास के नाम पर जो अपार बजट खर्च किया गया है, उसका बहुत बड़ा हिस्सा फर्जीवाड़े में चले गया है। एक-एक अप्रशिक्षित को कई-कई प्रदेशों में प्रशिक्षण देना बताया गया है, एक-एक बैंक खाते में हजारों लोगों का भत्ता जाना बता दिया गया है, और ऐसा संगठित भ्रष्टाचार इस मामले में हुआ है कि चीन होता तो अब तक कुछ दर्जन लोगों को मौत की सजा हो चुकी रहती। हम मौत की सजा को बढ़ावा देने की बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन अगर भारत में सरकार की इतनी बड़ी महत्वाकांक्षी योजना में भ्रष्टाचार इतना संगठित और व्यापक है, तो फिर भारत में निर्माण बढ़ाने के लिए प्रशिक्षित कामगार आएंगे कहां से? वे कागजों पर तो दिखेंगे, लेकिन जमीन पर नहीं रहेंगे, और ऐसे फर्जी प्रशिक्षित कामगारों के भरोसे क्या भारत जैसा देश चीन का कोई मुकाबला कर सकेगा? इसलिए यह बात समझने की जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से भारत के सामने जो नई संभावनाएं खड़ी हो रही हैं, वे अपनी सरहदों के भीतर उतनी ही बड़ी चुनौतियां भी हैं। भारत में उद्योग व्यापार जिस तरह राजनीतिक पसंद-नापसंद के शिकार हैं, जिस तरह कारोबारियों के सामने बराबरी का एक खुला मैदान आज नहीं है, उन सबको भी देखना होगा। सिर्फ सरकार-संरक्षित या सरकार-प्रोत्साहित कारोबारियों के भरोसे पूरा देश चीन सरीखा मैन्युफैक्चरिंग-हब नहीं बन सकता। यह मौका भारत के सामने ऐतिहासिक संभावनाओं, और ऐतिहासिक चुनौतियों का है। केंद्र और राज्य सरकारों को अपने-अपने स्तर पर देश के माहौल को बेहतर करना होगा। जब समाज के अलग-अलग तबके एक-दूसरे से दुश्मनी निकालने को ही जिंदगी का सबसे बड़ा हासिल मानकर चलते हों, तो ऐसे तबकों वाली अर्थव्यवस्था को विकसित देशों से निर्यात का काम भला कैसे हासिल हो सकता है? गैरजरूरी सामाजिक तनाव आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के बीच किस तरह किसी देश को पीछे घसीट सकता है, या उसे पूरी संभावनाओं तक पहुंचने से कैसे पीछे रख सकता है, यह भारत के संदर्भ में आज देखने की जरूरत है। क्या यह देश आत्ममंथन करेगा?

(Daily Chhattisgarh)          

दीवारों पर लिक्खा है, 2 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

खराब बच्चों की संगति से ही नहीं बिगड़ते बच्चे, घर कोई कम है?

01 फरवरी 2026

बहुत से लोग अपने बच्चों को लेकर फिक्रमंद रहते हैं कि उनकी संगत किस तरह की है, किस तरह के बच्चों के साथ वे उठते-बैठते हैं, क्लास में वे सामने की बेंच पर बैठने वालों के साथ रहते हैं, या फिसड्डी समझे जाने वाले बच्चों के साथ? जिम्मेदार मां-बाप को यह फिक्र बहुत सताती है। बात सही भी है, बहुत से महान लोगों और विचारकों ने कुसंगति को लेकर कई बातें कही और लिखी हैं। लेकिन मां-बाप भी जिसे कुसंगति न गिनते हों, वैसी भी कुसंगति होती है।

आज का यह कॉलम मैं किसी जलती-सुलगती राजनीतिक बात को समर्पित नहीं कर रहा हूं, दुनियाभर में हो रही घटनाओं को भी एक दिन के लिए बख्श दे रहा हूं, क्योंकि आसपास के बच्चों की बड़ी फिक्र होती है, क्योंकि उनमें से बहुत से अपने मां-बाप की कुसंगति में हैं। बहुत सी ऐसी खामियां हैं जो कि मां-बाप से बच्चों में आ जाती हैं, और फिर चूंकि मां-बाप खुद उन्हीं खामियों के पुतले रहते हैं, उन्हें इन्हें दूर करना न सूझता है, न उनके बस में रहता है।

मुझे बहुत बरस पहले की एक बात याद है, मैं नौजवान ही रहा होऊंगा और हमारे मोहल्ले के पहचान के एक कॉलेज प्राध्यापक थे। सब जानते थे कि वे नशा भी करते थे। मैं जिस प्रेस में काम करता था उससे सौ कदम पर एक दारू भ_ी थी, भ_ी का मतलब वहां शराब बनती नहीं थी, लेकिन वहां देशी शराब बिकती थी जिसे लोग वहीं बैठकर पी लेते थे। एक दिन मैंने देखा कि ये प्रोफेसर साहब दिन की रौशनी में वहीं स्कूटर रोककर किनारे बैठकर दारू पी रहे हैं, और स्टैंड पर लगी उनकी स्कूटर पर उनकी, शायद 10-12 बरस की बेटी बैठी हुई थी। देखकर खून इतना खौला कि उनसे कोई बातचीत न रहने पर भी मैं रुका और जाकर उन्हें बहुत बुरी तरह झिडक़ा कि बेटी के सामने इस तरह दारू पीते शर्म नहीं आती? इतने शराबियों के बीच में बेटी को यहां बिठा रखा है? वह बात और तनातनी कहां तक पहुंची, वह अभी याद नहीं है, लेकिन अभी भी अगर कोई लोग अपने दुपहियों पर पीछे बच्चों को बिठाए हुए सिगरेट-बीड़ी पीते चलते हैं, और मैं किसी दुपहिए पर हूं, तो साथ-साथ चलकर उन्हें रोकता और टोकता जरूर हूं कि आपकी शौक के धुएं से हो सकता है कि आपके पहले पीछे बैठे आपके बच्चे को कैंसर हो जाए। बात बहुत हमलावर रहती है, कई लोग इस पर बहुत बुरी प्रतिक्रिया करते हैं, और मैं आत्मरक्षा के लिए पहले यह अंदाज लगाने की कोशिश कर लेता हूं कि यह आदमी जेब में चाकू रखने वाला तो नहीं होगा, उसके बाद ही नसीहत का प्रवचन शुरू करता हूं।

बहुत से ऐसे मां-बाप मैंने देखे हैं जो कि बच्चों को सिगरेट, तंबाखू, या गुटखा लाने भेज देते हैं। बच्चों के सामने इस किस्म का नशा करने वाले मां-बाप उन्हें यह मौन सहमति और अनुमति तो दे ही देते हैं कि जब उनकी उम्र हो जाए, वे भी यही काम कर सकते हैं। अपनी मिसाल से बड़ी और कोई नसीहत नहीं हो सकती। बहुत कम संख्या में, लेकिन कुछ मां-बाप ऐसे भी देखे हैं जो नाबालिग बच्चों को दारू लेने भी भेज देते हैं। वैसे तो शराब दुकानदारों को कमउम्र बच्चों को शराब देनी नहीं चाहिए, लेकिन कमउम्र बच्चों को तो किसी भी तरह का तंबाखू भी नहीं बेचना चाहिए, लेकिन दुनिया में भला कौन सा ऐसा देश है जहां बच्चों को नशा नहीं बेचा जाता, जहां बच्चों की देह नहीं बेची जाती?

लेकिन मैं इससे परे की कुछ बात करूं तो बहुत से मां-बाप या परिवार के बालिग सदस्य घर पर बात करते हुए बच्चों के सामने कई किस्म की नाजायज जुबान का इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग अबे, साले जैसी मामूली लगने वाली गालियां देते हैं, नतीजा यह होता है कि परिवार के भीतर न सही, बाहर ही बच्चे इनका इस्तेमाल शुरू कर देते हैं। बहुत से लोग अपने बच्चों की किसी गलत जानकारी को झूठ कहने लगते हैं, और बच्चों को झूठा। मुझे खुद अपने परिवार में लोगों को यह समझाने में खासी बड़ी दिक्कत होती है कि गलत जानकारी, और झूठी जानकारी, ये दो बिल्कुल अलग-अलग बातें होती हैं। गलत जानकारी बिना किसी दुर्भावना के भी हो सकती है, लेकिन झूठ के पीछे एक कोशिश और एक भावना अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है।

छोटे-छोटे बच्चे भी उनके सामने होने वाली बातचीत से कब कैसे पूर्वाग्रह बना लेते हैं, यह बड़ों को पता भी नहीं चलता। अभी मैंने परिवार के एक छोटे 7 बरस के बच्चे से कहा कि तुम्हारी तस्वीर मैंने अपनी एक पाकिस्तानी दोस्त को भेजी थी, और उसने देखकर कहा कि तुम्हारी मुस्कुराहट मुझसे एकदम मिलती है। इस पर उसने कहा कि आपकी दोस्त पाकिस्तानी है? मेरे हां कहने पर उसका अगला सवाल था, पाकिस्तानी आपकी दोस्त कैसे हो सकती है? मैं सदमे में गाड़ी टकराते-टकराते रह गया और उससे कहा कि पाकिस्तान में तो मेरे बहुत से दोस्त हैं, पाकिस्तानी क्यों दोस्त नहीं हो सकते? तो उसके अगले जवाब ने मुझे कुछ राहत दी, और उसने कहा कि पाकिस्तान तो दूसरा देश है, वहां आपके दोस्त कैसे हो सकते हैं? मैं एकदम दहशत में आ गया था कि उसने 7 बरस की उम्र में कहीं यह तो नहीं सुन लिया था कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन देश है। उसकी समस्या भौगोलिक थी, सांप्रदायिक नहीं थी, यह मेरे लिए राहत की बात थी।

लेकिन आज हिंदुस्तान में आपको ऐसे करोड़ों परिवार मिलेंगे जिनमें किसी दूसरे देश को लेकर, दूसरे धर्म या दूसरी जाति को लेकर नफरती बातें घर के भीतर होना बिल्कुल आम है। नतीजा यह है कि ऐसे परिवारों के बच्चे भी नफरत से सराबोर बड़े होते हैं।

मां-बाप परिवार में सौ किस्म की गलत बातें करते हैं, और बच्चे कब उन्हें सीख लेते हैं, कब उन्हें अपना पूर्वाग्रह बना लेते हैं, यह पता भी नहीं चलता।

मुझे दो घटनाएं याद हैं जिन्हें लेकर मैं उन परिवारों में दुबारा कभी नहीं गया। एक बहुत बड़े कारोबारी, जाहिर है कि किसी सवर्ण परिवार के रहे होंगे, उन्होंने यूं ही बातचीत करने के लिए एक दिन सुबह मुझे नाश्ते पर बुलाया। मैं रिपोर्टिंग करता था, और अलग-अलग किस्म के लोगों से मिलना मुझे अपने फायदे का लगता था। फिर एक संपन्न कारोबारी के घर नाश्ते पर कुछ सीखना कुछ खराब बात तो रहती नहीं। मैं उनके घर सुबह पहुंच गया।

उनकी बेटी, जो कि उस वक्त स्कूल और कॉलेज के बीच कहीं रही होगी, वह नाश्ता करा रही थी, हम सोफे पर बैठे हुए थे, और जाहिर है कि बीच के नीचे टेबिल पर नाश्ता रखने के लिए उस लडक़ी को बार-बार झुकना पड़ रहा था। परिवार बहुत संपन्न था, ऐसे काम के लिए नौकर भी हो सकते थे, लेकिन शायद मेहमान के सम्मान के लिए परिवार के लोग परोस रहे थे। वह लडक़ी कुछ ऐसे खुले गले का कपड़ा पहनी हुई थी जो कि परिवार के भीतर शायद अटपटा न रहा हो, लेकिन एक मेहमान के सामने, इस तरह झुक-झुककर नाश्ता रखते और परोसते हुए वह ड्रेस बड़ा ही अटपटा लग रहा था। मैं तो बाहरी व्यक्ति था, मेरी तो नीयत भी खराब हो सकती है कि मुझे ये बातें दिख रही थीं, लेकिन मेरा मानना है कि परिवार के लोगों को भी अपनी जवान होती लडक़ी के बारे में कुछ अधिक सावधान रहना चाहिए था। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई, मेरे मेजबान अपनी बद्जुबानी के लिए बड़े ही कुख्यात थे। बाहर जहां कहीं मैं उनको सुनता था, वे परले दर्जे की चुनिंदा गंदी गालियां बरसाते ही रहते थे। लेकिन मुझे इस बात का जरा भी अंदाज नहीं था कि जिस वक्त मैं उनके घर पर उनके साथ नाश्ता करूंगा, उनकी कोई जवान बेटी नाश्ता परोसेगी, और उसकी मौजूदगी में ही ये कारोबारी धरती पर मुमकिन सबसे गंदी किस्म की गालियां देते रहेंगे, और गंदी जुबान बोलते रहेंगे। दोनों वजहों से नाश्ता गले उतरना मुश्किल हो गया था, किसी मेजबान की बेटी को उस तरह देखना भी मुझे ठीक नहीं लग रहा था, हालांकि उन दिनों मेरी खुद की उम्र बहुत कम थी। दूसरी बात यह कि मैं किसी मजदूर महिला की मौजूदगी में भी किसी ठेकेदार या मिस्त्री की दी जा रही गालियां बर्दाश्त नहीं कर पाता। मैं टोक देता हूं, या हट जाता हूं, लेकिन नाश्ता छोडक़र वहां से उस दिन उठ जाना मुमकिन नहीं था।

ऐसा ही दूसरा वाकया मेरे एक बहुत ही अच्छे परिचित परिवार में हुआ, और वहां भी मुझे पहली ही बार जाना पड़ा था। वहां भी परिवार की लडक़ी की घरेलू पोशाक देखकर मुझे लगा था कि मां-बाप को कुछ अधिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी। परिवार संपन्न था, इसलिए यह भी बात नहीं थी कि लडक़ी के पास गिने-चुने कपड़े थे और मेहमान के सामने उन्हीं कपड़ों में जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था। फिर उस लडक़ी की पोशाक सिर्फ संपन्नता का फैशन नहीं थी, किसी भी मेहमान के सामने पहनने लायक फैशन वह नहीं थी। अगर कुदरत की तरफ से मुमकिन होता, तो मैं यह चाह रहा था कि मैं आंखें और कान घर छोडक़र आया होता, ताकि किसी परिचित की शायद नाबालिग लडक़ी की देह इस तरह न देखना पड़ता, और उसकी मौजूदगी में ही उसके बाप के मुंह से दुनिया की सबसे अश्लील गालियां, और अश्लील भाषा न सुननी पड़ती।

अब इन दो घटनाओं को लेकर मुझे लगता है कि क्या किसी लडक़ी को उसकी कुसंगति के लिए कोसा जाए कि दूसरी खराब लड़कियों के साथ रहते हुए वह खराब कपड़े पहन रही है जिनमें बदन तरह-तरह से झांक रहा है? यह तो वह अपने घर में, मां-बाप के सामने कर रही है, मां-बाप की इसे पूरी तरह मौन या खुली सहमति भी है। इन दोनों जगहों पर मेरा जाना पहले से तय था, परिवार को मालूम था कि एक अतिथि इस वक्त आएगा, और उसे नाश्ता कराते हुए भी परिवार को यह मालूम था कि लडक़ी किन कपड़ों में नाश्ता परोस रही है। हो सकता है कुछ लोगों को इसमें मेरी ही नजरों में खोट लगे कि मैं जहां जाता हूं वहां देह देखने लगता हूं, लेकिन मैं ऐसा संन्यासी बनकर दिखावा करना नहीं चाहता कि मैं ऐसे वक्त पर आंखें घर छोडक़र आया हूं।

लोग अपने परिवार में काम करने वाले घरेलू कामगारों की जाति को लेकर, उनके रूप-रंग को लेकर भी गंदी जुबान में बातें करते हैं, किसी को अच्छी जाति का कहते हैं, किसी को बुरी जाति का कहते हैं, किसी को काली-कलूटी कहते हैं, तो किसी को बदशक्ल कहते हैं। नतीजा यह होता है कि ऐसे सारे राजनीतिक और सामाजिक पूर्वाग्रह, आपकी सारी सांप्रदायिकता, धर्मांधता, इन सबको आपके बच्चे आपसे ही सीख लेते हैं, उन्हें किसी और कुसंगति की जरूरत नहीं पड़ती। अब इन बातों के लिए क्या कहेंगे? क्या यह कहेंगे कि मोहल्ले के बुरे बच्चों की संगति में बच्चे बिगड़ गए हैं? संगति तो आपकी ही है, और एक बात लिखना कुछ कड़वा होगा, लेकिन दुनिया में बच्चे सबसे बुरी बातें अपने परिवार की संगति में ही सीखते हैं। इसे गले उतारना कुछ मुश्किल लगेगा, लेकिन पानी या शरबत के साथ कोशिश करके देखिए, शायद उतर जाए। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 1 फरवरी 2026

(Daily Chhattisgarh)


 

एक पूरी उम्र जीकर लोकतंत्र दुनिया से अब चल बसा है?

01 फरवरी 2026 

 

आसपास की कुछ मामूली और सतही घटनाओं पर लिखने का आसान सा लालच छोडक़र जब दुनिया और मानव संस्कृति के व्यापक हित के मुद्दों पर लिखने का सोचें, तो चीजें सरहदें छोडऩे लगती हैं। जब आसमान के किसी पंछी की नजरों से, या अंतरिक्ष के किसी उपग्रह के कैमरे से धरती को देखा जाए, उसके मुद्दों को देखा जाए, तो देशों की सरहदें नहीं दिखतीं, सिर्फ उपमहाद्वीप दिखते हैं, समंदर और जमीन का फर्क दिखता है। ऐसे में बातें किसी एक देश के भीतर कैद नहीं रहतीं, वे सरहदों के आरपार कई देश या कई उपमहाद्वीप पार करते दिखती हैं। ऐसी ही एक बात यह लगती है कि क्या अब दुनिया में लोकतंत्र, चुनाव, संविधान, मानवाधिकार, बुनियादी हक, और मानवीय मूल्य की कोई जगह धरती पर रह गई है? आज दुनिया के अधिकतर देशों का जो हाल दिखता है, वह परले दर्जे की आत्मकेन्द्रित, आत्ममुग्ध, और स्वार्थी सरहदों का दिखता है, जिन्हें अपने से परे के भले से बहुत ही कम लेना-देना है। लोकतंत्र जो कि अभी हाल के दशकों तक दुनिया की सभ्यता में शासन व्यवस्था की सबसे अच्छी व्यवस्था माना जाता था, पिछले कुछ दशकों में इस रफ्तार से हाशिए पर चले गया है कि मानो सडक़ किनारे, फुटपाथ के पार, किसी बड़े शोरूम के शोकेस के चबूतरे पर बैठा हुआ लोकतंत्र दुनिया के राजपथ पर नंगा नाच देख रहा हो। आज दुनिया के बहुत से देशों में लोकतंत्र महज चुनावतंत्र रह गया है, और लोकतांत्रिक कहे और समझे जाने वाले चुनावों के भीतर भी वह महज एक बहुमत-तंत्र बन गया है, जो कि लोकतांत्रिक चाहे बिल्कुल भी न हो, वोटरों के अधिक बहुमत को जो सुहाता हो, वही निर्वाचिततंत्र आज लोकतंत्र मान लिया गया है। लेकिन क्या सचमुच ही लोकतंत्र कभी निर्वाचन, और बहुमत द्वारा निर्वाचन तक सीमित था? क्या वह कभी सिर्फ चुनाव का मोहताज था? क्या वह दो चुनावों के बीच लोकतंत्र के खात्मे पर भी उस तरह का तंत्र था जिसकी लाश हर पांच बरस में कब्र से निकालकर मेडागास्कर में समारोह मनाया जाता है? जिन्हें मेडागास्कर की यह परंपरा न मालूम हो उनकी जानकारी के लिए वहां पर लोग अपने दफन किए गए पूर्वजों की लाशों को हर पांच साल में कब्र से निकालते हैं, पूरा कबीला और रिश्तेदार इकट्ठा होते हैं, इन लाशों को निकालकर उन्हें नए कपड़ों में, या रेशमी कफन में सजाते हैं, नाच-गाने, ढोल-नगाड़े, और भोज के साथ उत्सव मनाते हैं। क्या यह सब कुछ कई देशों में हर पांच बरस में होने वाले चुनाव सरीखा नहीं लग रहा! 

अभी किसी ने राममनोहर लोहिया का उनके वक्त का लिखा हुआ पोस्ट किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ में पांच महाशक्तियों को मिले हुए वीटो के अधिकार को लोहिया ने एक किस्म से सवर्ण जाति व्यवस्था करार दिया था, और इस व्यवस्था के चलते हुए किसी तरह के अंतरराष्ट्रीय इंसाफ की संभावना को नकार दिया था। आज का माहौल संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह अप्रासंगिक बना देने का चल रहा है। ट्रम्प अपना एक घरेलू पांव-पोंछने किस्म का अंतरराष्ट्रीय मंच बनाना चाहता है जो कि कहने के लिए तो शांति कायम करने के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन वह उसे अपने निजी गिरोह की तरह बनाना चाहता है, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र नाम की पंचायत अप्रासंगिक हो जाए। दूसरी तरफ आधी सदी हो गई अमरीका और इजराइल बार-बार यह साबित कर रहे हैं कि फिलीस्तीन के मामले में संयुक्त राष्ट्र के कितने भी प्रस्ताव वे कुचल सकते हैं, और उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता। इसे देखते हुए यह लगता है कि आधी सदी पहले लोहिया का यह कहना कि दुनिया में बराबरी की जगह पांच ताकतवर देशों की जागीर बना देने का काम संयुक्त राष्ट्र में वीटो ने किया है। उन्होंने कहा था कि जहां पांच देशों को वीटो का अधिकार है, वहां न तो न्याय हो सकता है, न शांति। लोहिया का कहना था कि दुनिया में औपनिवेशिक शासन भले खत्म हुआ हो, जैसा कि हिन्दुस्तान में ब्रिटिश गुलामी खत्म हुई थी, लेकिन वीटो ने औपनिवेशिक शासन को नई शक्ल दे दी है। पांच देश (अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, और चीन) पूरी दुनिया के फैसले रोक सकते हैं, रोक ही रहे हैं। आज अगर हम देखें तो फिलीस्तीन, यूक्रेन, सीरिया जैसे बहुत से मोर्चों पर संयुक्त राष्ट्र में वीटो लगाकर इनमें से कोई न कोई महाशक्ति यूएन के बहुमत और जनमत को रोक सकती है। 

पिछले एक दशक में दुनिया में लोकतंत्र की बुनियाद खोखली होने की बात दुनिया के कुछ साखदार संस्थानों ने दर्ज की है। स्वीडन के वी-डेम इंस्टीट्यूट, और फ्रीडम-हाऊस जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट हैं कि दुनिया की बड़ी आबादी अब ऐसे देशों में रह रही है जिन्हें पूर्ण लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। चुनाव तो होते हैं, लेकिन चुनावों के बीच नागरिक अधिकारों का दायरा लगातार सिमटता चला जाता है। मीडिया, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, और नागरिक समाज, इन सब पर धीरे-धीरे सत्ता का दबाव बढ़ता चला गया है। ऐसी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट बताती हैं कि लंबे समय से उदार लोकतंत्र का गढ़ माना जाने वाला योरप अब हंगरी और पोलैंड में बदले हालात झेल रहा है जहां संविधान और न्यायपालिका को सरकारों के अनुकूल ढालने की हमलावर कोशिशें हुई हैं, और जारी हैं। इन्हीं संस्थाओं की रिपोर्ट कहती है कि शरणार्थियों और अल्पसंख्यकों के सवाल पर मानवाधिकारों की भाषा धीरे-धीरे राष्ट्रवादी उन्माद में बदलती जा रही है। योरप और उसके बाहर जो देश उदार लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों के प्रतीक बने हुए थे, वे भी आज शरणार्थियों, विदेशियों, और नागरिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर कट्टर रूख दिखा रहे हैं। इस संदर्भ में दुनिया भर में आज भारत के मौजूदा हालात, और यहां की राजनीति को भी आंका जा रहा है कि इस विशाल लोकतंत्र में आज लोकतंत्र किस तरफ जा रहा है, कितना बचा हुआ है। 

इस मुद्दे पर दुनिया भर के जानकार विचारकों का लिखा हुआ पढऩा फिक्र खड़ी करता है कि किस तरह अमरीका में पिछले चुनाव हारने के बाद ट्रम्प ने अमरीकी संसद पर हमला करवाकर अमरीकी मतदाताओं के बहुमत के फैसले को भी खारिज करने की एक हिंसक कोशिश की थी। और इस बार तो ट्रम्प का रूख दुनिया के इतिहास से ही इंसाफ और लोकतंत्र नाम के शब्दों को हटा देने का है। इस बार ट्रम्प का सबसे बड़ा शिकार तो खुद अमरीका हुआ है जिसने अपने ढाई सौ बरस के इतिहास की अभूतपूर्व तानाशाही झेलना शुरू किया है, एक बरस गुजरा है, तीन बरस अभी बाकी है। 

अब दुनिया के देश एक-दूसरे से रिश्ते रखते हुए फौज और कारोबार को सबसे ऊपर रख रहे हैं, अपने देश की हिफाजत, अपने लोगों के रोजगार सबसे ऊपर रख रहे हैं। दुनिया में जितनी महीन किस्म की चीजें हुआ करती थीं, वे धीरे-धीरे पिछले कुछ बरसों में चर्चा से भी बाहर होने लगी। किसी को याद है कि एक वक्त योरप के देश भारत से कालीन आयात करना बंद कर चुके थे क्योंकि इस देश में कालीन उद्योग में पतली और छोटी उंगलियों वाले बाल मजदूरों को बड़े पैमाने पर झोंका जाता था। किसी देश में बाल मजदूरी, किसी देश में कम मजदूरी, किसी देश में मजदूर कानूनों का कोई और उल्लंघन देखते हुए सभ्य कहे जाने वाले देश उनका बहिष्कार करते थे। आज हालत यह है कि पौन लाख फिलीस्तीनी लाशें गिर जाने के बाद भी अमरीका के साथ-साथ योरप के कुछ दूसरे देश भी इजराइल को हथियार देना जारी रखे हुए थे। एक तरफ जहां बाल मजदूरी की फिक्र की जा रही थी, वहां फिलीस्तीन में दसियों हजार बच्चों की बमों से मौत को भी सामान्य मान लिया गया है। 

(Daily Chhattisgarh)