जजों की कुर्सियां खाली, और एआई के इस्तेमाल से हिचक, कैसे जनता पा सकेगी इंसाफ?

16 अगस्त 2026  

 

अभी एक पखवाड़े पहले, जुलाई 2026 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हाईकोर्ट जजों के करीब एक तिहाई पद खाली पड़े हैं। कुल 1122 जज होने चाहिए, और अभी 781 ही हैं। जबकि जिस दिन कोई जज बनते हैं, उसी दिन उनकी रिटायरमेंट की तारीख तय हो जाती है, और मामूली से क्लर्क भी यह हिसाब मिनटों में सामने रख सकते हैं कि किसी तारीख को कितनी कुर्सियां खाली हो जाएंगी। जज नियुक्त करने वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम, और केन्द्र सरकार के लिए यह बड़ा आसान रहता है कि समय रहते जज नियुक्त हो जाएं, और बिदाई और स्वागत समारोह एक ही दिन हो जाएं। लेकिन जैसा कि भारत में आम सरकारी ढर्रा है, कई संवैधानिक पदों पर तो कार्यकाल खत्म हो जाने तक नियुक्ति नहीं होती है। आज सुबह जो आंकड़े हमने देखे हैं, उनके मुताबिक कई हाईकोर्ट तो ऐसे हैं जिनमें जजों के स्वीकृत पद से आधे भी जज नहीं हैं। देश के सबसे बड़े हाईकोर्ट इलाहाबाद का यही हाल है, पटना, राजस्थान, तेलंगाना, ओडिशा का यही हाल है। हर चौथा हाईकोर्ट ऐसा है जिनमें कोई नियमित मुख्य न्यायाधीश नहीं हैं। और फिर करीब 65 लाख मामले इन अदालतों में चल रहे हैं, जिनमें से 80 हजार से अधिक मामले तो ऐसे हैं जो 30 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। 

हाईकोर्ट में वही मामले पहुंचते हैं, जो अपनी एक इंसानी पीढ़ी जितनी उम्र निचली अदालतों में गंवा चुके हैं। अगली पीढ़ी की बारी हाईकोर्ट में आती है, और सुप्रीम कोर्ट पहुंचने तक कई मामलों में तीसरी पीढ़ी शुरू हो चुकी रहती है। इनमें से किसी भी अदालत में मुकदमा जब 15-20 साल चलता है, तो वह सिर्फ एक फाइल नहीं रह जाता, किसी मामले में जमीन नहीं बिक पाती, किसी में मकान पर ताला नहीं खुल पाता, कहीं कारखाने में पूंजीनिवेश रूक जाता है, बैंक का कर्ज नहीं मिलता, परिवार बंट जाते हैं, बड़े जुर्म के मामलों में जुर्म के पीडि़त, और जुर्म के आरोपी दोनों के परिवार दशकों तक असमंजस में जीते हैं, कई मामलों में कुछ सौ, या कुछ हजार रूपए की रिश्वत या भ्रष्टाचार के आरोप में किसी कर्मचारी की पूरी जिंदगी निलंबन में निकल जाती है। इसलिए अदालतों में किसी मामले के पेंडिंग रहने का मतलब सिर्फ उस मामले में सजा, या बरी, या जुर्माना, या मुआवजा नहीं होता, उनसे कई-कई जिंदगियां भी जुड़ी रहती हैं। 

अब यह देखें कि क्या जजों की 30 फीसदी कुर्सियों को खाली होने के पहले ही भरने की तैयारी करने से मामला कुछ आसान होगा? आसान तो होगा, लेकिन उससे पूरा इलाज नहीं निकलेगा। आज अदालत में एक फाइल किसी जज तक पहुंचने के पहले वह अदालती नौकरशाही के कई स्तरों से होकर गुजरती है, और जैसी नौकरशाही सरकारी कामकाज में रहती है, उससे अधिक बेअसर अदालती नौकरशाही रहती है। तेज-तर्रार, और घाघ वकीलों से बात करें, तो समझ पड़ता है कि जज के सामने किसी मामले के जाने के पहले अदालती दफ्तरों में ही तिकड़म से बहुत से मामलों को आगे-पीछे किया जा सकता है, धीमा या तेज किया जा सकता है। अब दुनिया के हाथ एक बहुत बड़ा औजार है, ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से इस तरह के बाबूगिरी के बहुत से काम पलक झपकते आसानी से किए जा सकते हैं, जिनमें घाघ अदालती-नौकरशाही मनमानी करती है। एआई किसी भी मामले की सॉफ्ट कॉपी को मिनट भर में पढक़र बता सकता है कि क्या उनमें दस्तावेजों की कुछ कमी है? वह एक किस्म के बहुत सारे मामलों को एक साथ निकालकर अदालत से कह सकता है कि ये एक ही कानून से संबंधित एक ही किस्म के मामले हैं, और इन्हें एक साथ सुना जाना बेहतर होगा, और सभी का वक्त भी बचेगा। एआई बड़ी अदालतों के लिए यह भी तय कर सकता है कि किन मामलों में पेश होने वाले कौन से वकीलों की किस दिन, और किस वक्त की पेशी पहले से किसी और अदालत में लग चुकी है, और तारीखों का ऐसा टकराव एआई बिना किसी मेहनत के टाल सकता है। 

आज न्यायपालिका में एआई को लेकर आशंकाएं भरी हुई हैं। बहुत से लोग यह मानते हैं कि वकील जब एआई की मदद से अपनी पिटीशन तैयार करते हैं, तो एआई कई बार अपनी कल्पना से कई नामौजूद मामलों में अदालतों के ऐसे फैसलों का हवाला दे देता है जो कभी हुए ही नहीं थे। लेकिन यह तो वकील या जज के स्तर पर मामले से जुड़ी बातें हैं, जहां एआई पर भरोसा करने के बजाय इन्हें अपनी बुद्धि का ही इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन मानवीय बुद्धि की अनिवार्य जरूरत वाले दायरों को अगर छोड़ दें, तो एआई अमानवीय, या महामानवीय क्षमता से लैस है, और वह किसी एक हाईकोर्ट में एक जैसे मामलों को निकालकर एक साथ रखकर सुझा सकता है कि अलग-अलग कई जज इनमें अलग-अलग समय बर्बाद करने के बजाय इन्हें एक साथ सुन सकते हैं। अदालती कार्रवाई चलते हुए भी एआई इतना कर सकता है कि वकीलों, और जजों की बातों को सुनते हुए उन बातों से संबंधित पुराने फैसलों के संदर्भ खुद ही निकाल-निकालकर कम्प्यूटर स्क्रीन पर रखते जा सकता है, और उन्हें किताबों में तलाशते हुए वकीलों, और जजों को घंटों या दिनों का लगने वाला वक्त बच सकता है। आज भी अदालतें किसी जटिल मामले में अपनी मदद के लिए किसी निष्पक्ष वकील को न्यायमित्र नियुक्त करती हैं, जो पूरे मामले को समझकर जज या जजों को समझने में मदद करते हैं। इसी तरह अब कम से कम सुप्रीम कोर्ट, और हाईकोर्ट एआई की काबिलीयत से लैस ऐसे वकीलों को न्यायमित्र बना सकते हैं जो संबंधित-संदर्भ सुनवाई के दौरान ही निकालते चलें, और पूछने पर पल भर में पेश कर सकें। इन्हें सुनने के बाद वकील अपने तर्क खुद तय करें, और जज अपने फैसले खुद लें। आज एआई के इस्तेमाल से बहुत से कामचोर लोग एक ऐसी तस्वीर पेश कर चुके हैं कि जिनमें एआई खलनायक दिख रहा है। एआई तो महज एक कलाकार है, उसे नायक बनाना है, या खलनायक, यह तो इंसानों के हाथ है। हम तो इसे एक ऐसे औजार की तरह देख रहे हैं जो कि अदालतों में थक चुकी पीढिय़ों के हाथ-पैर दबाने के काम आए।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति को अपने कॉलेजियम का एकाधिकार बना रखा है, और उसकी सिफारिशों पर केन्द्र सरकार आखिरी फैसला लेती है, नियुक्ति आदेश निकालती है। ऐसे में बड़ी अदालतों की कुर्सियां खाली रखने में सुप्रीम कोर्ट, और केन्द्र सरकार दो ही जिम्मेदार हैं, और कई बार ऐसा सुनाई पड़ता है कि अदालत से गई सिफारिश पर सरकार समय रहते फैसला नहीं लेती है, और सुप्रीम कोर्ट सरकारी वकील को चेतावनी देते रह जाती है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। न सिर्फ ये नियुक्तियां, बल्कि देश-प्रदेश के तमाम संवैधानिक आयोगों की नियुक्तियों को समय रहते पूरा करने का एक फैसला सुप्रीम कोर्ट को देना चाहिए, वरना कहीं सूचना आयोग की कुसियां खाली पड़ी हैं, कहीं महिला आयोग की, और कहीं मानवाधिकार आयोग की। यह बात अच्छी तरह समझने की जरूरत है कि अदालतों में फैसले तेज होने लगेंगे तो उसका सबसे अधिक नुकसान सरकारों को होगा, क्योंकि बहुत बड़ी संख्या में मामले सरकारी फैसलों और नीतियों के खिलाफ चलते रहते हैं। इसी तरह संवैधानिक आयोगों में तो अधिकतर मामले सरकारों के ही खिलाफ रहते हैं। इसलिए सरकारों को इन नियुक्तियों, और मनोनयन को तय करने में हितों का एक बड़ा टकराव आड़े आता है। जैसे ही ये कुर्सियां भरती हैं, सरकारों पर खतरा बढ़ जाता है। इसलिए सरकारें इन्हें खाली रखने में अधिक दिलचस्पी रखती हैं, और इसीलिए हम देश की ऐसी न्यायिक व्यवस्था चाहते हैं कि कोई कुर्सी खाली होने की तय तारीख के पर्याप्त पहले नए नाम तय और घोषित हो जाएं। देखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट अपने अधिकारों, और अपनी जिम्मेदारियों को लेकर इतना चौकन्नापन दिखा पाता है, या नहीं। यह भी हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को रिटायर होने के बाद की उन्हीं के तबके के लिए आरक्षित सरकारी मनोनयन की कुर्सियां दिखती हों, और वे कड़े फैसले न ले पाते हों।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 14 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

आवारा मवेशियों को लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे ग्रामीणों की समस्या से सीखने की जरूरत

 14 अगस्त 2026  

 

छत्तीसगढ़ के सरगुजा मुख्यालय, अम्बिकापुर कलेक्ट्रेट में पास के एक गांव के किसान सौ से अधिक आवारा मवेशी लेकर पहुंचे, और उन्हें ले जाकर कलेक्टर दफ्तर के बाहर अपनी दिक्कत बताई कि शहरी म्युनिसिपल अधिकारी जानवरों को पकडक़र गांवों में छोड़ दे रहे हैं, और वे फसल खा रहे हैं। उनका कहना है कि स्थानीय किसान और ग्रामीण तो अपने जानवर को बांधकर रखते हैं, लेकिन बाहर से छोडक़र लाए गए जानवर बेकाबू बर्बादी कर रहे हैं। म्युनिसिपलों की दिक्कत यह है कि जब हाईकोर्ट या नागरिकों का दबाव बढ़ता है, तो कभी सडक़ों पर से, तो कभी शहरी आबादी के इलाकों से जानवरों को पकडक़र बाहर छोड़ दिया जाता है। शहर के आसपास के गांव ऐसे मवेशियों, और कई बार कुत्तों के भी शिकार होते हैं। 

अधिकारी, और बहुत हद तक भारत के लोग भी, अपने हिस्से का बोझ दूसरे पर डाल देने में महारथ हासिल लोग हैं। अपने घर-दुकान के सामने झाड़ू लगाकर कचरा या तो नाली में फेंक देते हैं, या सडक़ के दूसरी तरफ, सबसे पसंदीदा जगह आसपास का कोई खाली प्लाट रहता है, जो जब बहुत भर जाता है, तो फिर उसमें आग लगाकर सब निपटा दिया जाता है। समस्या का समाधान समस्या को दूसरे पर डाल देने, या जला देने की शक्ल में निकाला जाता है। जैसे ही कोई दुधारू जानवर दूध देना बंद करते हैं, लोग उन्हें सडक़ों पर छोड़ देते हैं, ताकि वे घूरों पर जिंदा रह लें। हाईवे पर तो तेज रफ्तार गाडिय़ोंतले कुचलकर बहुत से जानवर जल्दी छुटकारा पा जाते हैं, लेकिन शहरी घूरों पर खाने के फेर में पॉलीथीन निगल-निगलकर गौमाता और उसके कुनबे के बाकी जानवर पेट में 40-40 किलो प्लास्टिक इकट्ठा कर लेते हैं, और मुश्किल और धीमी मौत मरते हैं। कहने के लिए गायों के भावनात्मक और धार्मिक-राजनीतिक सम्मान का दिखावा होता है, उसे राजमाता बनाने की मांग होती है, लेकिन राजमाता घूरों पर पूरे राज परिवार के साथ किस तरह जिंदा रहती है, यह भी सबको दिखता है।

यह दिक्कत देश भर में है। पशुओं को ले जाते लोगों को जगह-जगह मारा जाता है, कई जगह उनका कत्ल कर दिया जाता है। अभी एक जगह ट्रांसफॉर्मर के पास बिजली के करंट से एक गाय मर गई, तो आसपास के लोगों ने ट्रांसफॉर्मर तोडफ़ोड़ दिया। किसी गाड़ी से गौवंश के किसी भी मवेशी को चोट भी लग जाए, तो उस गाड़ी में तोडफ़ोड़, ड्राइवर को पीट-पीटकर मार डालना, कुछ भी हो सकता है। जगह-जगह से ऐसी खबरें आती हैं, ऐसे वीडियो आते हैं। जाहिर तौर पर राज्य सरकारों ने कहीं भी गौवंश, या दूसरे कुनबे के मवेशियों को रखने के कोई इंतजाम नहीं किए हैं, नतीजा यह है कि वे सडक़ों पर खतरा बने हुए खुद भी मरते हैं, और दूसरों की मौत का सामान भी बनते हैं। सरकारें अपनी इस बुनियादी जिम्मेदारी को छूने के लिए भी तैयार नहीं हैं, और हाईकोर्ट इस मुद्दे पर सरकारों से हलफनामे लेते रह जाते हैं। 

हिन्दुस्तान एक कृषिप्रधान देश रहते आया है, हालांकि अब वह धर्मप्रधान होकर रह गया है। खेती के काम के लिए जानवरों की जरूरत रहती थी, और लोग गाय-बैल पालते थे, उनका उपयोग जब तक रहता था उन्हें रखते थे, उम्रदराज हो जाने पर उन्हें बेचकर नए जानवर ले लेते थे। यही ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था का चक्र था। अब बीते दशकों में एक-एक कर कई राज्यों में गायों से जुड़े कानून इतने कड़े हो गए हैं कि अब बूढ़े गौवंश को बेचना मुमकिन नहीं है, न ही उसे खरीदकर किसी दूसरी जगह ले जाना। अपनी जान गंवाने की जोखिम उठाकर ही कोई ऐसा कर सकते हैं। नतीजा यह हुआ है कि गांव-शहर सभी जगह गौवंश के मवेशियों की खरीदी-बिक्री ठप्प हो गई है, और यह एक रहस्य ही है कि योगी के उत्तरप्रदेश में कैसे देश के सबसे बड़े मीट कारखाने चलते हैं, जहां से एक्सपोर्ट करके भारत विश्व रिकॉर्ड बनाते चलता है। अब चूंकि बूढ़े पशुओं को बेचना तकरीबन नामुमकिन हो गया है, इसलिए धीरे-धीरे गाय पालना भी कम होने लगेगा, और अनुपयोगी हो चुके गौवंश को सडक़ों पर बेसहारा छोड़ देना ही सबसे सुरक्षित रह गया है। जिस तरह शहरों में अब श्राद्ध का भोजन खिलाने के लिए कौवे नसीब नहीं होते, कुछ दिनों बाद गोग्रास की रोटी के लिए गाय भी नसीब नहीं होगी क्योंकि फिलहाल तो अनुपयोगी गौवंश की मौजूदगी बढ़ती जा रही है, लेकिन उसे पालना घटते जा रहा है। उसके बजाय दूध के कारोबार के लिए भैंस पालना न सिर्फ अधिक फायदेमंद है, बल्कि वह अधिक सुरक्षित भी है। 

सडक़ों से लेकर गांवों के खेतों तक, हाईवे से लेकर शहर के भीतर की सडक़ों तक गौवंश का खतरा बना हुआ है, और बढ़ते ही चल रहा है। म्युनिसिपल अपने इलाके से छुटकारा पाने के लिए पशुओं को पकडक़र पास के गांवों में छोड़ देती हैं, और लोग हैं कि उन्हें सडक़ों और घूरों पर छोड़ देते हैं। भारत की ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था में गौवंश के उपयोग की वजह से लोगों के बीच उनके उपयोगी रहने तक जो सम्मान रहता था, वह अब बोझ बन चला है। गौवंश इस देश की अर्थव्यवस्था के एक हिस्से के बजाय धार्मिक उन्माद का एक हिस्सा बना दिया गया है, और हवा में ऐसी उत्तेजना के रहते हुए गौवंश अर्थव्यवस्था में न पुरानी, और न नई कोई जगह पा या बना सकता। ऐसे में खेतों, और सडक़ों को, सार्वजनिक जगहों को गौवंश से बचाने के लिए सरकारों को ही योजना बनानी होगी, और उनके लिए सुरक्षित अहाते बनाकर भीड़ की हिंसा को भी टालना होगा, हादसा मौतों को भी घटाना होगा, और जिसे माँ कहकर उसके बछड़े के हक का भी दूध पी लिया जाता है, उसे रोजाना घूरे के भंडारे से हटाकर चारा देना होगा। 

भारत एक अजीब से दौर से गुजर रहा है। इसकी आज की भावनात्मक उत्तेजना का पेट भरने के लिए बहुत से राज्यों में जो कानून बन गए हैं, उन पर अमल के लिए सरकारों को ही गौवंश के मरने तक उन्हें पालना होगा, और उसके अलावा कोई चारा नहीं है। अदालतों को यह भी गारंटी करनी होगी कि अगर सरकारें अपने कानून पर कायम हैं, और अदालतों को ऐसे कानूनों में कोई दिक्कत नहीं लगती है, तो इनकी वजह से समाज में हिंसा न हो पाए। कानून बनाकर छोड़ देना, उत्तेजना बढ़ाकर छोड़ देना, किसी समस्या का समाधान नहीं है। आज महाराष्ट्र के गांवों में पशु व्यापार कानून की कड़ाई की वजह से बूढ़े बैल किसानों के घर के बाहर, खेत में मरने तक बैठे रहते हैं, और किसान नए बैल खरीदने की हालत में भी नहीं हैं। देश की पशु अर्थव्यवस्था धार्मिक उन्माद में चौपट हो गई है। इन सबके नुकसान सरकारों को ही उठाने होंगे।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 13 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

रोड टैक्स का एक हिस्सा सीधे सडक़सुरक्षा को मिले

13 अगस्त 2026  

 

मुम्बई और रायपुर-नागपुर की 23 युवतियां मोटरसाइकिलों पर रायपुर से बस्तर के लिए रवाना हुईं, और रास्ते में एक ट्रेलर की टक्कर से उनमें से एक युवती की मौत हो गई। उसने जरा ही देर पहले हेलमेट उतारा था। नौजवान बाइक राइडर्स हिन्दुस्तान के अलग-अलग कई प्रदेशों में रोमांचक यात्राएं करते रहते हैं, और लंबे सफर के लिए जरूरी हर तरह की सावधानी भी बरतते हैं। फिर भी सडक़ों पर हादसे भारत में काफी अधिक होते हैं, जिनकी कई जानी-पहचानी आम वजहें हैं। सडक़ों की हालत खराब रहती है, कारोबारी गाडिय़ों की हालत, उनकी रफ्तार, और उनके ड्राइवरों की हालत पर सरकार का कोई काबू नहीं रहता है। नशे में गाड़ी चलाना एक आम बात रहती है, कहीं गाडिय़ां ओवरलोड, तो कहीं गाडिय़ां ओवरस्पीड पर चलती हुईं। फिर यह भी है कि सडक़ों के बेहतर हो जाने, गाडिय़ों की रफ्तार बढ़ जाने की वजह से भी कई बेकाबू हादसे होते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में कई हादसों में थोक में मौतें इसलिए होती हैं कि ग्रामीण इलाकों में गरीब जनता के आसपास के सफर के लिए कोई मुसाफिर गाडिय़ां मौजूद नहीं रहतीं, और मालवाहक गाडिय़ों में लोग बोरियों की तरह लदकर जाते हैं, इससे गाडिय़ों का संतुलन भी बिगड़ता है, और हादसा होने पर मौतें भी बड़ी संख्या में होती हैं। 

एक बार फिर इस ताजा हादसे पर लौटें जिनमें मुम्बई से आई हुई बाइक राइडर युवतियों में से एक साथ ऐसा हादसा हुआ है, तो इससे राज्य की पर्यटन छवि को भी नुकसान पहुंचता है कि यहां की सडक़ें महफूज नहीं हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ कोई अनोखा राज्य नहीं है, हर दिन किसी न किसी प्रदेश की खबर देखने मिलती है जिसमें एक-एक हादसे में पांच-दस मौतें होती हैं। देश सडक़-मौतों के साथ जीने का आदी हो गया है, और भारत में सडक़ सुरक्षा को लेकर किसी को जिम्मेदार भी नहीं ठहराया जाता। सरकारें हैं कि ऐसे हादसों का न कोई व्यापक विश्लेषण करतीं, और न ही उससे सबक लेती हैं।  ऐसा नहीं है कि कोशिश करने पर सडक़-मौतें घटाई न जा सकें, लेकिन जब जनता किसी खतरे और नुकसान के साथ जीने की आदी हो जाती है, तो सरकारें भी लापरवाह होने लगती हैं। गाडिय़ों के बिक्री के आंकड़े हर महीने बताते हैं कि सडक़ों पर नई तेज रफ्तार गाडिय़ां किस तरह लाखों की संख्या में बढ़ रही हैं, सडक़ें उस अनुपात में नहीं बढ़ रहीं, सडक़ों पर सुरक्षा लागू करने की क्षमता उस अनुपात में आगे नहीं बढ़ रहीं। इन सब बातों को एक बड़े पैमाने पर सोचकर एक ऐसी नीति बनाने की जरूरत है जो सरकारों को मनमानी की छूट न दे।

वैसे तो किसी भी नई गाड़ी के बिकने पर उससे मिलने वाले रोड टैक्स की रकम बहुत बड़ी होती है, और उसे आरटीओ टैक्स या रोड टैक्स ही कहा जाता है, लेकिन वह सरकार की बोरी जैसी एक जेब में चली जाती है जिसमें सौ और किस्म की कमाई भी आती है। सरकार कमाई को एक साथ रखती है, और खर्च का बजट अलग से बनाती है। हमारा यह मानना है कि आरटीओ टैक्स का जो पैसा सरकार को मिलता है, उसका एक हिस्सा अपने आप ही सडक़ सुरक्षा के इंतजाम में चले जाना चाहिए। गाडिय़ां बढ़ती जा रही हैं, सडक़-हिफाजत की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं, तो ऐसे में ठीक उसी अनुपात में सुरक्षा इंतजाम भी बढऩे चाहिए। सरकार की बजट प्राथमिकताओं को देखें, तो सडक़ सुरक्षा जैसा अमूर्त मद किसी मतदाता को अलग से आकर्षित नहीं करता, ठीक उसी तरह जिस तरह कि फायरब्रिगेड के लिए रखा गया मद मतदाताओं को आकर्षित नहीं करता। इसलिए बजट में रकम बांटते हुए बचाव के ये मद सौतेली संतान की तरह पीछे छूट जाते हैं। इस सिलसिले को खत्म करने की एक ही गारंटी हो सकती है, आरटीओ टैक्स का एक हिस्सा सीधे-सीधे सडक़ सुरक्षा में चले जाए, और म्युनिसिपल को नए शहरीकरण, नए निर्माण से मिलने वाली रकम, प्रॉपर्टी टैक्स का एक हिस्सा सीधे फायरब्रिगेड के लिए चले जाए। यह तो बहुत सामान्य समझबूझ की बात है कि शहरीकरण बढऩे से दमकल को चुनौतियां बढ़ती ही हैं, और सडक़ पर ट्रैफिक बढऩे से हादसों का खतरा। 

अगर जमीनी स्तर की कुछ बात करें, तो सड़क़ों पर तेज रफ्तार रोकने के लिए अब छोटे और कम पैमाने पर स्पीड रिकॉर्ड करने वाले राडार इस्तेमाल होने लगे हैं, और उनके साथ जुड़े हुए कैमरे कम्प्यूटरों से सीधे ही चालान बनाकर भेजते हैं। यह आसान सी ऑटोमेटिक व्यवस्था जिन प्रदेशों में अधिक इस्तेमाल हो रही है, वहां हादसे भी घट रहे हैं, और वहां सरकार को जुर्माने से कमाई भी अधिक हो रही है। शुरू में ऐसे उपकरण लगाना बहुत महंगा काम नहीं है, और यह सरकार के लिए दुधारू गाय की तरह कमाऊ भी साबित हो सकते हैं। इसके अलावा सरकार को हाईवे पर टोल टैक्स नाकों पर किसी गाड़ी के गुजरने के कम्प्यूटर रिकॉर्ड में आपस में जोड़ देने चाहिए। इससे अगर कोई गाड़ी अगले टोल टैक्स नाके पर निर्धारित रफ्तार से अधिक स्पीड से पहुंचेगी, तो वहां का कम्प्यूटर ही टोल टैक्स के साथ-साथ उसका ओवरस्पीडिंग का चालान भी कर सकेगा। यह इतना आसान सा काम है कि कम्प्यूटर पर काम करने वाले कोई बच्चे भी इसे मुफ्त में डिजाइन कर सकते हैं। अब इंसानी दखल का मामला सामने आता है नशे में गाड़ी चलाने वाले लोगों को पकडऩे के लिए। इसके लिए फिलहाल किसी बड़ी तकनीक का इस्तेमाल किए बिना पुलिस गाडिय़ां रोककर ड्राइवरों की जांच कर सकती है, और कई हादसे बचा सकती है। जो मुसाफिर बसें 50-50 इंसानी जिंदगियां लेकर चलती हैं, उनके ड्राइवरों की तो अनिवार्य रूप से जांच होनी चाहिए, इससे भी कई हादसे रूकेंगे। 

सुप्रीम कोर्ट से लेकर अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट तक सडक़ सुरक्षा के लिए फिक्रमंद हैं, और आए दिन राज्य के सबसे बड़े अफसरों से हलफनामे लेते ही रहते हैं। हादसों की एक बड़ी वजह तेज रफ्तार सडक़ों पर आवारा जानवरों का बैठना भी है। आज हालत यह है कि बारिश की अंधेरी रात में सडक़ों पर बैठे जानवरों से टकराकर अगर कोई हादसा होता है, तो उसके लिए उस ड्राइवर के खिलाफ जुर्म दर्ज हो जाता है। यह नौबत शहर के भीतर भी आती है, और कल ही एक किसी जगह एक जानवर से टकरा गई एक गाड़ी को बुरी तरह तोड़ा-फोड़ा गया, ड्राइवर को बुरी तरह पीटा गया। जुर्म तो जानवरों के मालिकों के खिलाफ दर्ज होना चाहिए, या सरकार के खिलाफ, लेकिन अगर जख्मी होने वाले जानवर गौवंश के हैं, तो गाड़ी वाले की भीड़त्या हो जाने का भी पूरा खतरा रहता है। 

सडक़ सुरक्षा बड़ा व्यापक मुद्दा है, हमने प्रचलित खबरों के आधार पर उसके कुछ पहलुओं को छुआ है, लेकिन यह बातचीत पूरी नहीं है। इससे अलग के भी कुछ, या कई पहलू हो सकते हैं। बेकसूर मौतों को बचाने के लिए सरकारों को सडक़ हादसों पर खुली चर्चा भी रखनी चाहिए, ताकि हमारी तरह की मामूली जानकारी, और मामूली समझ रखने वाले लोग भी कुछ साधारण सुझाव दे सकें।

(Daily Chhattisgarh)   

फूड-कंटेनर में छिपे ट्रम्प को सौ जिंदगियां खतरे में डालने का क्या हक था?

12 अगस्त 2026  

 

अभी अमरीका के कुछ प्रमुख अखबारों से निकलकर यह सनसनीखेज खबर आई है कि अंकारा में नाटो की मीटिंग से निकलने के बाद जब ट्रम्प तुर्की से ब्रिटेन के लिए रवाना हो रहे थे, तो उन्होंने गोपनीय तरीके से अपना विमान बदल लिया। इन अखबारों में छपी हुई खबर का ट्रम्प भी खंडन नहीं कर पाए, और उन्होंने यह माना कि अमरीकी खुफिया अफसरों, और फौज ने उनसे कहा था कि वे दूसरे विमान से रवाना हों, और उन्होंने उनकी बात मान ली। विमान बदलने का यह सिलसिला किसी फिल्म से भी अधिक नाटकीय था। 8 जुलाई को ट्रम्प अमरीकी राष्ट्रपति के निर्धारित विमान, एयरफोर्स-1 में सवार हुए, और बिदाई देने वाले लोगों, और टीवी कैमरों की तरफ हाथ हिलाकर भीतर चले गए। इसके कुछ देर बाद यह विमान उड़ा, लेकिन ट्रम्प इसमें नहीं थे। उन्हें विमान के पीछे के एक दरवाजे से निकाला गया, और खाना चढ़ाने वाली क्रेन पर जो फूड-कंटेनर रहता है, उसमें ट्रम्प को घुसाकर एक दूसरे फौजी विमान तक ले जाया गया, और वहां फिर उस विमान के दरवाजे से कंटेनर को सटाकर ट्रम्प को उसमें भीतर घुसाया गया। किसी भी बाहरी नजर से परे का यह ट्रांसफर इसलिए किया गया कि शायद इजराइल ने यह खुफिया जानकारी दी थी कि ट्रम्प की जान लेने के लिए उनके विमान पर ईरान हमला कर सकता है। इसलिए ट्रम्प घुसे तो एक विमान में, लेकिन उड़े दूसरे विमान से। फिर जब ब्रिटेन में उतरे, तो इसी तरह फूड-कंटेनर से उन्हें एयरफोर्स-1 में पीछे से घुसाया गया, और वे सामने के दरवाजे से हाथ हिलाते हुए सीढिय़ों से उतरे, मानो कुछ हुआ ही नहीं। 

अब राष्ट्रपति को बचाने की इस कार्रवाई के बारे में राष्ट्रपति के विमान में चलने वाले सौ के करीब लोगों को कुछ भी नहीं बताया गया। उसमें एयरफोर्स-1 के पायलट और बाकी कर्मचारी थे, चिकित्सा कर्मचारी थे, फौजी थे, राष्ट्रपति भवन के कर्मचारी थे, और पत्रकार भी थे। इस विशेष विमान की साधारण सीटों पर बैठने वाले इन सारे लोगों से उड़ान भरने के पहले कहा गया था कि वे खिड़कियां बंद रखें। खबरों में एक आशंका यह सामने आई है कि शायद कोई ईरानी या कोई दूसरे हमलावर कंधे पर रखकर मिसाइल-लॉंचर से हमला कर सकते थे। इसलिए ट्रम्प का प्लेन बदलकर उन्हें एक दूसरे प्लेन में पहले रवाना किया गया, और उसके बाद राष्ट्रपति के प्लेन को बाकी लोगों के साथ उड़ाया गया। 

सवाल यह उठता है कि जब राष्ट्रपति को बचाने के लिए उसे छुपाकर गोपनीय तरीके से अलग प्लेन में रवाना कर ही दिया गया था, तो फिर उनके पहचाने गए प्लेन में बाकी सौ लोगों की जिंदगी क्यों खतरे में डाली गई? खुफिया एजेंटों, और सुरक्षा कर्मचारियों की यह प्राथमिकता तो समझ में आती है, कि अगर राष्ट्रपति और साधारण नागरिकों में से किसी एक की जान बचानी है, तो वे पहले राष्ट्रपति की जान बचाएंगे। लेकिन जब राष्ट्रपति को बचाने का काम अलग विमान से हो चुका था, तो फिर एक संभावित दुश्मन को झांसा देने के लिए एयरफोर्स-1 को दिखावे के लिए क्यों इस्तेमाल किया गया? अगर इसमें राष्ट्रपति को मौजूद मानकर कोई हमला किया जाता, तो राष्ट्रपति तो इसमें नहीं रहते, बाकी सौ लोग जरूर मारे जाते। तो इस दिखावे का मकसद राष्ट्रपति को बचाना नहीं हो सकता था, क्योंकि वे तो अलग से निकल ही गए थे। और बाद में इस सरकारी विमान में सवार लोगों को उतारकर उन्हें किसी हमले की आशंका से बचाने का काम हो सकता था। ऐसा करने के बजाय इसे भी उड़ाना, और खुफिया जानकारी में बताए गए खतरे के सामने इस विमान को पेश करना, एक निहायत ही नाजायज खतरा था, जिसमें बेकसूर, अनजान, और राष्ट्रपति की सुरक्षा से परे के लोगों को खतरे में डाला गया था। 

हो सकता है कि ट्रम्प को आपाधापी में पूरी जानकारी समझ में नहीं आई हो, लेकिन क्या वे इस पूरी शिफ्टिंग के बीच अपने खुफिया अफसरों से यह भी नहीं पूछ सकते थे कि एयरफोर्स-1 का क्या होगा? यह एक बहुत बड़ा नैतिक सवाल है कि ब्रिटेन में ट्रम्प के उतरने के वक्त इस दिखावा-विमान की जरूरत सिर्फ उन्हें इसमें से उतरते दिखाने के लिए थी, वरना ब्रिटेन में तो वे सुरक्षित थे ही, और वे वहां एक दूसरे विमान से भी उतर सकते थे। इससे कुछ सनसनी फैलती, कुछ खबरें निकलतीं, लेकिन कोई खतरा तो नहीं रहता, किसी पर भी नहीं रहता, न ट्रम्प पर, न ही दूसरे विमान, एयरफोर्स-1 में सफर करने वाले दूसरे लोगों पर। सिर्फ अपने दिखावे के लिए एयरफोर्स-1 को खतरे में झोंक देना एक पूरी तरह से अनैतिक फैसला था, और ट्रम्प चाहे इसमें हिस्सेदार रहे हों, या न रहे हों, वे पूछताछ की नौबत में भी थे, यह भी कह सकते थे कि उनका विमान उड़ जाने के बाद एयरफोर्स-1 की उड़ान को टाल दिया जाए, उस पर सवार लोगों को खतरे में न डाला जाए। 

अब तक इस पूरी घटना की जितनी जानकारी एकदम पुख्ता सरकारी जानकारी और अखबारों से सामने आ चुकी है, उसका पर्याप्त विश्लेषण करने के बाद हमें यह समझ आ रहा है कि सौ के करीब बेकसूर लोगों को, बिना कोई जानकारी दिए, निहायत गैरजरूरी वजह से खतरे में डाला गया। ट्रम्प अपने आपको महाबली दिखाना चाहते हैं, और उन्हें शायद यह शर्मिंदगी बर्खास्त नहीं होती कि वे प्लेन बदलकर ब्रिटेन पहुंचे हैं, इसलिए उन्होंने उडऩे की जगह, और उतरने की जगह, दोनों देशों में एयरफोर्स-1 को दिखावे की तरह इस्तेमाल किया। किसी भी लोकतांत्रिक नेता को, या उसकी टीम को बिना जरूरत, और कोई जरूरत रहने पर भी सौ लोगों की जिंदगी इस तरह खतरे में नहीं डालनी चाहिए। हम ट्रम्प से तो किसी नैतिकता की उम्मीद नहीं करते, और न ही अपने बॉस की सेवा करने वाले लोगों से भी, लेकिन दुनिया को यह नैतिक सवाल जरूर उठाना चाहिए कि जब इन सौ लोगों की जिंदगी राष्ट्रपति की जिंदगी को बचाने के लिए जरूरी नहीं रह गई थी, राष्ट्रपति की जिंदगी तो अलग विमान में अलग से उड़ चुकी थी, तब फिर जान के खतरे वाले इस विमान को बाद में उड़ाया ही क्यों गया? दुनिया की कोई भी जिंदगी इतनी कीमती नहीं हो सकती कि कैमरों के सामने एक दिखावा पेश करने के लिए उनको चारा बनाकर किसी दुश्मन के सामने पेश कर दिया जाए। असली नेता तो वो होते हैं जो दूसरों के लिए अपनी जिंदगी खतरे में डालते हैं, न कि वे लोग जो दूसरों की जिंदगी अपने नाटक के लिए इस तरह खतरे में डालें। अभी तो खबरें इस नाटकीय ट्रांसफर पर केन्द्रित हैं, लेकिन फूड-कंटेनर में छुपकर आवाजाही की सनसनी जब कम होगी, तब गंभीर लोगों को ट्रम्प से यह सवाल जरूर करना चाहिए कि करीब सौ अमरीकी जिंदगियों को सीढिय़ों के अपने दिखावे के लिए उन्होंने क्यों झोंका?

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 12 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 11 अगस्त 2026


 

स्कूली बच्चों पर जुल्म, और उनके खिलाफ जुर्म से देश, और चुनाव दोनों को खतरे..

11 अगस्त 2026  

 

अभी छत्तीसगढ़ के सरगुजा के एक ग्रामीण बालिका छात्रावास से शिकायत सामने आई है कि वहां पर महिला गार्ड छात्रावासी बच्चियों से अपनी वर्दी धुलवाती है, और मालिश भी करवाती है। कुछ ही दिन हुए हैं इसी राज्य में किसी और छात्रावास से शिक्षिका या अधीक्षिका द्वारा बच्चियों से मालिश करवाने की शिकायत सामने आई थी। कहीं पर शिक्षक अश्लील बातें कर रहे हैं, नाजायज तरीके से छू रहे हैं, तरह-तरह से यौन शोषण कर रहे हैं, ये तमाम खबरें भी हर कुछ हफ्तों में आती ही हैं। भारत के इस हिस्से की सामाजिक स्थितियों की मामूली सी समझ भी बताती है कि सामने आने वाली हर शिकायत के अनुपात दर्जनों शिकायतें दबी रह जाती होंगी। प्रदेश के कई आदिवासी इलाकों में छात्रावासी लड़कियां गर्भवती हो जाती हैं, और कई जगह तो बच्चों को जन्म देने के बाद ही इसका पता लगता है। ऐसे स्कूल और छात्रावास शिक्षा विभाग के तहत भी आते हैं, और आदिम जाति कल्याण विभाग के तहत भी। कई स्कूलों में शिक्षक, हेडमास्टर, और दूसरे विभागों के अधिकारी भी स्कूली छात्राओं से बलात्कार में पकड़ाए गए हैं। हर पखवाड़े कहीं न कहीं से ऐसा वीडियो सामने आता है जिसमें सरकारी स्कूल का शिक्षक दारू पिया हुआ पड़ा रहता है, और इसके साथ ही यह खबर भी आती है कि बच्चे और गांव के लोग लंबे समय से ऐसे शराबी शिक्षक के खिलाफ शिकायत करते आए थे, और किसी ने कार्रवाई नहीं की। 

भारत में पिछड़े हुए इलाकों की बहुलता वाले प्रदेशों में लड़कियों की पढ़ाई में वैसे भी सामाजिक उत्साह कुछ कम रहता है। सरकार और समाज दोनों की अंतहीन कोशिशों से, स्कूल ड्रेस, साइकिल, कॉपी-किताब, दोपहर का भोजन जैसी कई प्रोत्साहन योजनाओं से लड़कियों का स्कूल आना, और वहां टिके रहना बढ़ा है। अभी चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने एक बड़ी घोषणा की कि कई हजार ग्रामीण कन्या शालाओं में कन्याओं की जरूरतों वाले शौचालय बनाने के लिए कुछ सौ करोड़ रूपए मंजूर किए गए हैं। यह एक बड़ी जरूरत है, और सुप्रीम कोर्ट कई बार राज्यों को इसके बारे में निर्देश और चेतावनी देते आया है। छत्तीसगढ़ में इसकी घोषणा भी अभी हुई है, लेकिन इसके साथ-साथ स्कूल शिक्षा को लड़कियों के लिए सुरक्षित, और उत्साहवर्धक भी बनाने की जरूरत है। अब कहीं अधीक्षिका, कहीं शिक्षिका, और कहीं गार्ड बच्चियों से अपने कपड़े धुलवाएं, और कहीं उनसे मालिश करवाएं, तो इसे कई लोग असुरक्षित नहीं कहेंगे, क्योंकि इससे बच्चियों पर कोई हमला नहीं हो रहा है। लेकिन गरीब परिवारों से आई हुई और छात्रावास की असीमित असुविधाओं के बीच रहने वाली बच्चियों पर अगर इस तरह के जुल्म होते हैं, तो यह भी उनके दिमागी हालत को तो असुरक्षित करता ही है। सिर्फ यौन हमले को असुरक्षा मानना तो ठीक नहीं होगा। अगर बच्चियां छात्रावास में सांप के डर से सो नहीं पा रही हैं, तो वह भी एक बड़ी असुरक्षा है, अगर उन्हें माहवारी के वक्त की जरूरतों का इंतजाम नहीं मिलता है, तो वह भी असुरक्षा है। भारतीय समाज में लड़कियां कई तरह के मानसिक दबाव में जीती हैं, वे परिवार से लेकर कारोबार तक, और स्कूल से लेकर वैवाहिक जीवन तक सौ किस्म के मानसिक दबाव, और तनाव झेलते हुए ही बड़ी होती हैं, और अमूमन अवसादग्रस्त होकर मरती हैं। इसलिए कोई बड़ा जुर्म उनके खिलाफ हो या न हो, लडक़ी और महिला की असुरक्षा कई तरह से उनके व्यक्तित्व को प्रभावित करती है। 

हमारा ख्याल है कि समाज को वैसे तो अपने सारे बच्चों के लिए संवेदनशील रहना चाहिए, उनके स्कूल, छात्रावास, मैदान, और पढ़ाई-लिखाई की उनकी जरूरतों को पूरा करना चाहिए, लेकिन लड़कियों के लिए एक अतिरिक्त सावधानी, और अतिरिक्त प्रोत्साहन की जरूरत भी रहती है। छत्तीसगढ़ में कई ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें छात्रावास अधीक्षिका के पति, और उसके साथियों ने लड़कियों पर यौन हमले किए हैं, या शिक्षकों ने ही यह काम किया है। आज जब प्रदेश में लाखों बेरोजगार सरकारी शिक्षक बनने के लिए बरसों से संघर्ष कर रहे हैं, वैसे में अगर किसी को सरकारी नौकरी मिली हुई है, और उसमें उन्हें बच्चियों से मालिश करवाना, दारू पीकर स्कूल आना, या यौन हमले करना सूझता है, तो इनकी बर्खास्तगी भी तुरंत होनी चाहिए, और फास्ट ट्रैक कोर्ट से इनको सजा भी तुरंत होनी चाहिए। लेकिन यह सब तो जुर्म होने के बाद की बात है। जनकल्याणकारी और संवेदनशील सरकार को तो ऐसी नौबत आने से भी बचना चाहिए। सरकार और समाज दोनों अगर कड़ी निगरानी नहीं रखेंगी, तो स्कूलों को जुल्म और जुर्म से बचाना बड़ा मुश्किल रहेगा। फिर स्कूल और हॉस्टल ऐसी जगहें तो हैं नहीं, जहां बच्चों को सुरक्षित रख लेना काफी है। बच्चों का बौद्धिक और मानसिक विकास भी होना जरूरी है, उनके व्यक्तित्व में आत्मविश्वास आना भी जरूरी है, और पढ़ाई के अलावा उनकी दूसरी प्रतिभाओं को भी मौका मिलना जरूरी है। आज तो स्कूल अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी, पढ़ाई-लिखाई को भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, केन्द्र सरकार के सर्वे में जिन राज्यों के बच्चों के पढऩे-लिखने की क्षमता कमजोर आंकी गई है, उनमें बरसों से छत्तीसगढ़ का भी नाम आता है। इसी देश में केरल जैसे कुछ और प्रदेश भी हैं जिन्होंने स्कूली शिक्षा के अधिकतर पैमानों पर अपने आपको देश के औसत स्तर से बहुत ऊपर का साबित किया है, और वे लगातार अव्वल बने हुए हैं। भारत के सभी प्रदेश एक ही किस्म की शासन व्यवस्था से चलते हैं। बस यही है कि सत्ता पर बैठे लोगों की रीति-नीति में फर्क हो सकता है, अलग-अलग राज्यों में अफसरों की जवाबदेही की कसौटी अलग-अलग हो सकती है, लेकिन केन्द्र सरकार जब एक चार्ट पर सारे प्रदेेशों को एक साथ रखती है, तो हर किसी के पास अपने से बेहतर प्रदेश से सीखने की गुंजाइश तो रहती ही है। देखते हैं कि भारत के प्रदेश एक-दूसरे को देखकर, एक-दूसरे से सीखकर, मुकाबले में अपने को अपने-आप से ही बेहतर बनाते हुए कब अपने को दूसरों से बेहतर बना सकते हैं। 

आज देश-प्रदेश की सरकारों को यह भी समझना चाहिए कि जंतर-मंतर से लेकर झारखंड तक कॉलेज छात्रों के जो आंदोलन चल रहे हैं, वे कहीं-कहीं पर स्कूलों तक भी जा रहे हैं, और अलग-अलग स्कूलों के छात्र कहीं घटिया खाने की थाली लेकर कलेक्टर तक पहुंच रहे हैं, तो कहीं जुल्म और ज्यादती के खिलाफ सडक़ों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। आज की जुबान में जेन-जी के बाद की पीढ़ी को जेन-अल्फा जैसा कुछ कहा जा रहा है। सरकारों को सावधान रहना चाहिए क्योंकि स्कूली पीढ़ी भी बहुत जल्दी वोटर बनने जा रही है, और वह अपनी स्कूली बदहाली की बहुत ताजा यादों के साथ सत्ता के प्रति बहुत नर्मदिल तो नहीं रहेगी।

(Daily Chhattisgarh)   

हर किसी की जिंदगी में चीनी चीजें मौजूद, जासूसी का खतरा भी उतना ही...

10 अगस्त 2026  

 

ब्रिटेन की खबर है कि वहां नौसेना के ड्रोन अपनी हलचल की जानकारी चीन को भेज रहे थे। इनमें लगे हुए कैमरों में ऐसे चीनी पुर्जे थे, जो कि ब्रिटेन के हथियार ठेकेदार को किसी और पार्टी ने सप्लाई किए थे, और अभी खुफिया जांच में पता लगा कि वे पुर्जे चीन में मौजूद एक आईपी एड्रेस पर जानकारी भेज रहे थे। इसके बाद ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने इन कैमरों का इंटरनेट संपर्क हटा दिया है। ये ड्रोन वहां की नौसेना में मार्च के महीने से इस्तेमाल हो रहे थे, और अब ब्रिटेन पर यह फिक्र मंडराने लगी है कि इनका इस्तेमाल तो तमाम संवेदनशील जगहों पर होते आ रहा था, अब तक कितनी नाजुक जानकारी चीन जा चुकी होगी। एक खतरा यह भी दिख रहा है कि ड्रोन के इन कैमरों के ट्रांसमिटर क्या उस वक्त भी काम कर रहे थे जब ड्रोन का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था? अब इस देश में यह फिक्र खड़ी हो गई है कि इन ड्रोन को ब्रिटेन की नौसेना की भविष्य की योजनाओं में भी रखा गया था, और अब यह सब खतरे में पड़ गया है। 

यह पहला मौका नहीं है जब चीन के तरह-तरह के उपकरणों को लेकर यह बात सामने आई है कि उनमें ऐसे खुफिया उपकरण या पुर्जे छुपे हो सकते हैं जो कि जानकारी चीन को भेजते रहें। आज दिक्कत यह है कि घरों की रसोई के भी दर्जनभर उपकरण इंटरनेट से जुड़े रहते हैं, और स्पीकर से चलने वाले कंट्रोल से घर-बाहर के बहुत से काम होते हैं। आज दुनिया में ऐसे ही उपकरण अधिक हैं जो या तो सीधे-सीधे चीन के बने हुए हैं, या कम से कम उनमें चीनी पुर्जे तो हैं ही। लोगों को याद होगा कि भारत में कई बरस पहले बंद किए जा चुके टिक-टॉक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर अमरीका में लंबे समय से यह बहस चल रही थी कि इस चीनी कंपनी के चीन में बसे हुए कम्प्यूटरों पर अमरीकी लोगों के वीडियो, उनकी लोकेशन, और उनके संबंधों की जानकारी दर्ज होती है, और उनका बेजा इस्तेमाल चीन कर सकता है। दरअसल चीन का कानून ऐसा है कि वहां काम करने वाली हर कंपनी को सुरक्षा का हवाला देकर सरकार उनकी सारी जानकारी ले सकती है। अमरीका में ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद अब टिक-टॉक कंपनी के मालिकाना हक में अमरीकी हिस्सेदारी को जोड़ा जा रहा है, और यह शर्त भी जोड़ी जा रही है कि टिक-टॉक की जानकारी अमरीका में बसे हुए कम्प्यूटरों पर ही रहेगी। लेकिन इसके अलावा चीन की कई और ऐसी कंपनियां हैं जो संचार उपकरण बनाती हैं, और जिन्हें अमरीका या योरप के देशों में काली सूची में डालकर रखा गया है। अब जब ड्रोन के कैमरे के किसी पुर्जे का ऐसा खुफिया इस्तेमाल हो रहा है कि उसकी जानकारी चीन जा रही है, तो चीनी सामान इस्तेमाल करने वाले हर देश को अपने सुरक्षा इंतजाम तौल लेना चाहिए। इसमें फौजी और खुफिया संस्थानों को तो अधिक सावधान रहना ही चाहिए, उनके अलावा दुनिया भर में कारोबारी-जासूसी करने में भी चीन बहुत माहिर और आगे है। चीन अपने कारोबारियों की मदद करने के लिए दुनिया भर के व्यापारियों, और कारखानेदारों पर नजर रखता है। जहां-जहां चीन से मुकाबले में कोई आगे बढ़ते दिखे, या चीनी एकाधिकार को खत्म करते भी दिखे, तो उनकी हर तरह की जासूसी की जाती है। 

भारत में कुछ बरस पहले के सरहदी टकराव के बाद चीन से व्यापार घटाने की बातें तो बहुत हुई थीं, लेकिन असल में तो चीन से खरीदी बढ़ती चली गई है। आज भारत में कई तरह के उपकरण अगर लोगों की खरीदी-सीमा के भीतर हैं, तो वे चीन से आने वाले सस्ते सामान हैं, या चीनी पुर्जों से भारत में बनने वाले सामान हैं। नौबत यह है कि अगर चीन से कच्चा माल, पुर्जे, या बने हुए सामान लेना भारत बंद कर दे, तो भारत का अपना निर्यात जमीन पर औंधेमुंह गिर पड़ेगा। भारत में बनने वाली दवाइयों, और दूसरे कई किस्म के सामानों का कच्चा माल चीन से ही आता है। चीन से परे अपनी आत्मनिर्भरता विकसित करना, दुनिया के शायद ही किसी देश के बस में हो। आज तो हालत यह है कि अलग-अलग धर्मों की पूजा की मालाओं की सप्लाई भी चीन से होती है, और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी वहीं से बनकर आती हैं। अमरीका जैसा देश जहां पर ट्रम्प जैसा आत्ममुग्ध तानाशाह मेक अमरीका ग्रेट अगेन का नारा लगा रहा है, तो ऐसे नारे वाले कैप और टी-शर्ट भी चीन से बनकर आते हैं, और अमरीकी झंडे, या झंडों के निशान वाले बाकी सौ तरह के सामान भी चीन से ही आते हैं। आज हालत यह है कि अगर अमरीका कोई सामान बनाने भी लगे, और उस पर मेड इन अमरीका का स्टिकर लगाना हो, तो वह स्टिकर भी चीन से बनकर पहुंचेगा। 

आज दुनिया भर के देशों में होने वाले शोधकार्य, वहां की जासूसी, और फौजी गतिविधियां, वहां उद्योग-व्यापार की जानकारी, नेताओं और बड़े अफसरों, बड़े कारोबारियों की निजी जानकारियां कहीं न कहीं चीन में बने हुए सामानों से जुड़ी हुई हैं। भारत में खेतों पर दवा छिडक़ने वाले ड्रोन चीन के बने हुए हैं, मोबाइल फोन या ब्लूटूथ चीनी हैं, कारों में बहुत से पुर्जे चीन के हैं, और कम्प्यूटर-लैपटॉप, वाईफाई जैसे सीधे-सीधे संचार उपकरण चीनी हैं, उनमें चीनी पुर्जे तो हैं ही, चाहे वे भारत में ही असेंबल क्यों न किए गए हों। इस तरह चीनी ड्रैगन के चंगुल में आज पूरी दुनिया जकड़ी हुई है। भारत में बेरोजगार, और फटेहाल हिन्दुस्तानी नौजवानों को मोबाइल ऐप के जरिए आसान कर्ज दे देने वाली कितनी ही चीनी कंपनियों पर भारत में रोक लगाई जाती है, और फिर ऐसे एप्लीकेशन किसी और नाम से सामने आ जाते हैं। लोगों की निजी जानकारियां, मोबाइल फोन पर पूरा कब्जा, उनके फोनबुक के सारे नाम-नंबर लेकर कर्ज देने वाली कंपनियां ब्लैकमेलिंग और उगाही का बहुत बड़ा रैकेट चलाती हैं, और इन सबके पीछे बहुत से मामलों में चीनी कंपनियां, एप्लीकेशन, या उपकरण रहते हैं। 

भारत में सरकार, कारोबार, और परिवार, इन सभी को ऐसी सुरक्षा ऑडिट की जरूरत है कि उनकी कौन-कौन सी संवेदनशील जानकारी किसी न किसी चीनी उपकरण से जुड़ी हुई है? आज चीन के बिना भारत में न दीवाली पर सस्ती रौशनी हो सकती, न सस्ते और रंग-बिरंगे फटाखे आ सकते, न होली पर सस्ती पिचकारियां आ सकतीं, रंग आ सकते, और न ही पतंग के मौसम में चीनी मांजे के बिना पतंगें उड़ सकतीं। देश चाहे चीन को दुश्मन माने, लेकिन हिन्दुस्तानी जनता की जिंदगी में कई चीजें खरीदने की ताकत चीनी सामानों की वजह से ही आती है। चूंकि निजी, सरकारी, या कारोबारी हर तरह की जिंदगी उपकरणों से जुड़ी हुई है, इंटरनेट, फोन, या कम्प्यूटर से जुड़ी हुई है, इसलिए चीनी खतरा सभी जगह है। खुफिया सॉफ्टवेयर सरहद पर वर्दी पहनकर नहीं आता, वह चुपचाप अपना काम करते रहता है। हमने इजराइल के पेगासस नाम के एक सॉफ्टवेयर की पूरी दुनिया में खुफिया घुसपैठ झेली हुई है। चीनी घुसपैठ के विकराल आकार का अभी दुनिया को पूरा अंदाज भी नहीं है। एक प्रयोग के लिए लोग अपनी रोज की जिंदगी के सामानों को देख सकते हैं, और एक-एक सामान की लिस्ट बनाकर यह जांच-परख सकते हैं, जानकारी तलाश सकते हैं कि उनमें चीन का कुछ लगा हुआ है या नहीं?

(Daily Chhattisgarh)