अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आरक्षण पर कुछ चर्चा हो जाए

संपादकीय
8 मार्च 2017


आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दुनिया भर में महिलाओं के बारे में अच्छी-अच्छी बातें कही जा रही हैं, और भारत भी इसमें पीछे नहीं है। ट्विटर पर माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने लिखा है कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए। इस बात से याद पड़ता है कि इस देश में महिला आरक्षण की चर्चा भी अब साल में एक दिन भी यह अकेली पार्टी कर रही है, और खुद महिलाएं इस मुद्दे को भूल सी गई हैं, या कि समाज ने उन्हें भूलने को मजबूर कर दिया है। जो भी हो हम इस मुद्दे को इसलिए बार-बार उठाते हैं कि यह हमें देश में लैंगिक समानता का एक पैमाना दिखता है कि यह समाज महिलाओं को उनका हक देना चाहता है या नहीं।
मजे की बात यह है कि पूरे देश में पंचायतों और म्युनिसिपलों में वार्ड और पंच-सरपंच से लेकर महापौर तक के लिए महिला आरक्षण लागू है, और इनमें से हर जगह जाति के आधार पर आरक्षित तबकों में भी महिलाएं मिल जाती हैं, जीतकर आती हैं, और धीरे-धीरे स्थानीय शासन का काम सीख और सम्हाल रही हैं। जब एक विधानसभा सीट के भीतर ऐसी सैकड़ों महिलाएं छोटे-छोटे वार्ड में भी मिल जाती हैं, तो फिर पूरे विधानसभा सीट में एक महिला क्यों नहीं मिलेगी जो कि विधायक बनने के लायक हो? इसी तरह एक लोकसभा सीट में औसतन सात-आठ विधायक होते हैं, और इनके बीच से सांसद बनने लायक एक महिला नहीं मिल पाएगी, यह सोचना एक बहुत ही पुरूषवादी हिंसक सोच का नतीजा है।
आज दिक्कत यह है कि भारत की राजनीति में जिन पार्टियों की मुखिया महिलाएं हैं, उनके भीतर भी महिला आरक्षण को लेकर कोई हसरत नहीं दिखती। सोनिया गांधी से लेकर मायावती, ममता बैनर्जी, और अब शशिकला तक कई महिलाएं बड़ी-बड़ी पार्टियों की मुखिया हैं, लेकिन संसद के भीतर महिला आरक्षण का नाम भी कोई नहीं लेतीं। जब तक यह तस्वीर नहीं बदलेगी, भारतीय राजनीति से बेइंसाफी खत्म नहीं होगी। इसी किस्म की एक दूसरी बेइंसाफी एक दूसरे आरक्षण से जुड़ी हुई है, और इसे लेकर भी हम बार-बार लिखते हैं। जातिगत आरक्षण के कोटे के भीतर के मलाईदार तबके को जब तक आरक्षण की पात्रता से हटाया नहीं जाएगा, तब तक उन तबकों के गरीब और कमजोर, आरक्षण के सचमुच के हकदार लोगों को मौका नहीं मिल पाएगा। जब दलित या आदिवासी, या ओबीसी के छात्र-छात्रा या बेरोजगार नौजवान किसी कुर्सी को पाने की कोशिश करते हैं, तो उनका मुकाबला अपने ही तबके के उन लोगों से होता है जिनके मां-बाप बड़े-बड़े सरकारी या राजनीतिक ओहदों पर रहते आए हैं, और वे आर्थिक और सामाजिक ताकत से इतने मजबूत हैं कि किसी मुकाबले की उनकी तैयारी के सामने गरीब दलित-आदिवासी के ठहरने की संभावना खत्म सी हो जाती है। लेकिन क्रीमीलेयर को हटाने के इस मुद्दे को सत्ता पर काबिज तबकों ने इसलिए बड़ी सहूलियत से भुला दिया है क्योंकि अगर इनको आरक्षण के फायदों से हटाया जाएगा, तो सारे सांसद-विधायक, अफसर-जज, संपन्न लोग अपने बच्चों के लिए आरक्षण का फायदा खो बैठेंगे। इसलिए जिन सांसदों-विधायकों और अफसरों को क्रीमीलेयर हटाने के न्यायसंगत कारण बताने हैं, वे सारे के सारे अपने निजी हित में इसके खिलाफ हैं। यह सैद्धांतिक रूप से एक बहुत बड़ा हितों का टकराव है, और पता नहीं सुप्रीम कोर्ट में कोई जाकर इसे साबित क्यों नहीं कर पा रहे।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय महिला आरक्षण दिवस पर सूझे इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए, और इन दोनों किस्म के आरक्षण पर अलग-अलग मंचों पर लोगों को खुद ही बात करके ऐसा जनमत बनाना चाहिए कि महिला आरक्षण भी लागू हो, और क्रीमीलेयर के लोग आरक्षण के फायदों से बाहर भी हों। हमको सीपीएम के 33 फीसदी के सुझाव पर हैरानी होती है कि कम से कम वामपंथियों को तो महिलाओं को आधा हक दिलाने की वकालत करनी चाहिए थी।

छत्तीसगढ़ में स्मार्टफोन के ऐसे विस्तार के साथ आने वाली चुनौतियां

संपादकीय
7 मार्च 2017


छत्तीसगढ़ सरकार के कल के बजट में सबसे आसानी से समझ और नजर आने वाली बात पैंतालीस लाख लोगों को स्मार्टफोन और इंटरनेट तक पहुंच देने की है। पैंतालीस लाख इस छोटे राज्य के लिए एक बड़ी गिनती है, और सवा दो करोड़ की आबादी में गरीबी की रेखा के नीचे के हर परिवार को फोन और नेट मिल जाएगा। सरकार का यह कहना है कि उसकी बहुत सारी योजनाएं, और बहुत सी सहूलियतें इंटरनेट के रास्ते आसानी से पहुंची जा सकती हैं।
आज हालांकि फोन और इंटरनेट बहुत बड़ी बात नहीं हैं, लेकिन फिर भी इस देश में एक डिजिटल-डिवाइड चले आ रहा है जिसे पाटने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के इस एक काम से हो सकता है कि गरीबों की पहुंच एक स्मार्टफोन और उससे जुड़ी हुई सुविधाओं तक हो जाए, और उसका काम आसान हो। साथ ही हम कम्प्यूटर या इंटरनेट को कोई तिलस्मी ताबीज मानने से इंकार करते हैं कि यह औजार अपने आपमें कोई करिश्मा कर सकता है। आज जब सरकार के लिए सबसे अधिक कमाई करने वाले रजिस्ट्री ऑफिस और आरटीओ ऑफिस में टैक्स जमा करने का काम भी कम्प्यूटर और सर्वर की खामी से कई-कई दिन ठप्प रहता है, तो सरकारी रियायत देने के काम में इनके ठीक रहने की क्या गारंटी हो सकती है? और फिर सरकार इस बात पर आत्मसंतुष्ट हो सकती है कि उसने अधिक से अधिक सुविधाओं को ऑनलाईन कर दिया है, और हकीकत में ये काम न करें।
लेकिन हम छत्तीसगढ़ सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना की संभावनाओं को नहीं नकारते हुए इससे जुड़ी तीन बातों को याद दिलाना चाहते हैं। पहली बात यह कि डिजिटल ट्रेनिंग के बिना ऐसे औजार लोगों के काम के नहीं रहेंगे। दूसरी बात यह कि डिजिटल या साइबर निगरानी के बिना साइबर-जुर्म बढ़ते चले जाएंगे, लोग लुटते चले जाएंगे, और लुटेरे भाग जाने के बाद सरकार देखती रह जाएगी। तीसरी बात यह कि डिजिटल-जुर्म सामने आने पर भी क्या यह छत्तीसगढ़ सरकार किसी साइबर-जांच की क्षमता रखती है? आज की हकीकत तो यह है कि पिछले कई बरसों में प्रदेश का पहला साइबर-थाना ही सरकार नहीं खोल पाई है, और उसकी आज की जांच की ताकत दस-बीस बरस पुराने मोबाइल फोन तक सीमित है। किसी नई टेक्नॉलॉजी के साथ यह सरकार नहीं चल पा रही, और पुलिस मुख्यालय और मंत्रालय के बीच साइबर-मंजूरी की फाईलें मानो घोंघे की पीठ पर बंधी हुई चल रही हैं।
अभी पिछले ही हफ्ते छत्तीसगढ़ में एक ऐसी ठगी हुई है जिसमें किसी ने फोन करके आधार कार्ड नंबर पूछा, और उससे खाते से 63 हजार रुपये निकाल लिए। केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक आधार कार्ड को अनिवार्य करने के लिए दीवानगी की रफ्तार से जुटी हुई हैं। लेकिन आधार कार्ड से जुड़ी हुई अनगिनत जानकारियों की हिफाजत कैसे होगी, यह आज केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं समझा पा रही है। दूसरी तरफ पूरे देश में लगातार लोगों के बैंक खातों से ठगी चल रही है, और ऐसे जुर्म के खिलाफ आम तो आम, खासे पढ़े-लिखे लोगों में भी कोई चौकन्नापन नहीं है। इसलिए जब छत्तीसगढ़ के हर साक्षर-अनपढ़ हाथ में एक मोबाइल फोन होगा, और उससे उसके हक की बहुत सी सहूलियतें, और रियायतें जुड़ी रहेंगी, उसकी मजदूरी या उसका बैंक खाता उससे जुड़ा रहेगा, उसे मोबाइल बैंकिंग की तरफ धकेला जाएगा, तो फिर उसके सामने खड़े खतरों से बचाव का जिम्मा भी छत्तीसगढ़ सरकार का ही होगा।
इसलिए लोगों को डिजिटल कामकाज में सावधानी सिखाने की पहली जरूरत है, और दूसरी जरूरत सरकार के अपने एक ऐसे खुफिया ढांचे की है जो कि फोन, नेट, और कम्प्यूटर से होने वाले जुर्म पर नजर रख सके। तीसरी, लेकिन शायद आखिरी नहीं, जरूरत यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार फोन या नेट से होने वाले अपराध की तुरंत जांच करने की अपनी क्षमता विकसित करे। हमारा मानना है कि आज सरकार ने पैंतालीस लाख स्मार्टफोन-इंटरनेट कनेक्शन के लिए जो बजट रखा है, उसका ही एक हिस्सा इन तीन क्षमताओं को विकसित करने के लिए रखना चाहिए, क्योंकि प्रदेश के पुलिस विभाग और राज्य शासन के बीच कई बरसों में मिलकर भी एक साइबर-थाना खड़ा करने की सहमति नहीं जुट पाई है। सरकार को किसी भी बड़ी योजना के साथ-साथ ऐसी सावधानी के पहलुओं को अनिवार्य रूप से जोड़ लेना चाहिए क्योंकि प्रदेश में सिर्फ पैंतालीस लाख औजार नहीं बढऩे वाले हैं, ठगों और जालसाजों के लिए पैंतालीस लाख संभावनाएं भी बढऩे वाली हैं।

बजट का बढऩा काफी नहीं है, भ्रष्टाचार घटना भी जरूरी...

संपादकीय
6 मार्च 2017


छत्तीसगढ़ सरकार का बजट इस वक्त पेश हो रहा है, और वित्तमंत्री के रूप में  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक बार फिर विधानसभा के सामने प्रदेश के अगले बरस की एक संभावित तस्वीर पेश कर रहे हैं। एक वक्त प्रदेश में वित्त मंत्री के काम को पूर्णकालिक से भी अधिक माना जाता था, लेकिन पिछले कई बरसों से रमन सिंह अपने कुछ और विभागों के साथ-साथ वित्त मंत्री का काम भी बखूबी कर रहे हैं, और इस बार का बजट सभी चुनाव निपट जाने के बाद का बजट है, फिर भी वह करीब-करीब हर विभाग में विस्तार और विकास का है, और राज्य भर में हर किस्म के बहुत से नए कामों का इसमें जिक्र है। ये लाईनें लिखते हुए अभी बजट आ ही रहा है इसलिए उसकी बारीकियों पर आज हम नहीं जा रहे, लेकिन पहली नजर में जो बातें दिख रही हैं, उनसे लगता है कि देश में कम ही राज्यों में ऐसी आर्थिक सम्पन्नता और उदारता के बजट आएंगे।
इस बजट के साथ-साथ आज हवा में यह बात भी तैर रही है कि राज्य में सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार पकड़ाते भी जा रहा है, और कम भी नहीं हो रहा है। आज जब राज्य विधानसभा की अधिकारी दीर्घा में सारे बड़े अफसर बैठकर मुख्यमंत्री को बजट पढ़ते देख रहे थे, तब एक प्रमुख सचिव बाबूलाल अग्रवाल दिल्ली की जेल में सीबीआई की गिरफ्तारी के बाद बैठे हुए हैं, और छत्तीसगढ़ सरकार में बड़े अफसरों के स्तर पर भ्रष्टाचार इस मामले को लेकर कुछ हफ्तों से खबरों में बना हुआ है। ऐसे में सरकार का बजट चाहे जितना हो, उसमें भ्रष्टाचार और चोरी-डकैती में कितना बड़ा हिस्सा चले जाएगा, इसका अंदाज लगाना हमारे लिए मुश्किल है, लेकिन सरकार के अलग-अलग विभागों में जो लोग काम करते हैं, उनके लिए यह अंदाज आसान भी है। हम पहले भी बजट के मौके पर इस जरूरत को गिना चुके हैं कि सरकार अपनी संपन्नता की वजह से आज अधिक किफायत की बात नहीं करती है, और कोयला-सम्पन्न राज्य होने की वजह से अगले तीस बरस तक इस राज्य में कमाई बरसनी है, लेकिन उसके साथ-साथ हम इस बात को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं कि सरकार अपने कामकाज में ईमानदारी लाने की कोशिश करे, भ्रष्टाचार को रोकने की कोशिश करे। ऐसा न होने पर बजट जितना बढ़ते चले जाएगा, भ्रष्ट लोग उतने ही अधिक संपन्न और ताकतवर होते चले जाएंगे।
न सिर्फ इस राज्य में, बल्कि बाकी देश में भी भ्रष्टाचार एक बहुत ही मजबूत खतरा बन गया है, और इसे दूर करने की जरूरत है। हमने दूसरे कई राज्यों में मुख्यमंत्रियों को जेल जाते देखा है, और कई राज्यों में बड़े-बड़े अफसर जेल में हैं, फरार हैं। छत्तीसगढ़ को यह तसल्ली हो सकती है कि यहां का भ्रष्टाचार इतना अधिक नहीं है, और ऐसी कोई नौबत यहां पर नहीं आई है, लेकिन फिर भी सरकार के भीतर के लोग ही इस बात की गारंटी लेते हैं कि राज्य सरकार के कामकाज में, केन्द्र सरकार की योजनाओं पर इस राज्य में अमल में परले दर्जे का भ्रष्टाचार है। पिछले बरसों में एक-एक अफसर के यहां छापे में जिस तरह से करोड़ों की नगदी बरामद हुई है, उससे यह साफ है कि सरकार के बजट का कितना बड़ा हिस्सा नेता-अफसर-ठेकेदार की जेब में जा रहा है। राज्य सरकार को एक ऐसा खुफिया निगरानी तंत्र बनाना चाहिए जो कि अफसरों के करोड़पति और अरबपति होने के पहले ही भ्रष्टाचार को रोक सके। जब पंछी खेत चर जाए, उसके बाद उसके पीछे दौडऩे से कुछ हासिल नहीं होता। सरकार को भ्रष्टाचार विरोधी मशीनरी को मजबूत करना चाहिए, और उसका विस्तार करना चाहिए। दूसरी तरफ सरकार के कामकाज के भीतर काम करने के तरीकों को ऐसा पारदर्शी बनाना चाहिए कि संगठित बड़ा भ्रष्टाचार टूट सके। जैसे-जैसे भ्रष्ट लोग मजबूत होते जाते हैं, वैसे-वैसे वे लोग राजनीतिक ताकत भी खरीदने लगते हैं। इस पूरे सिलसिले को थामने की जरूरत है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले बरसों में एक अच्छा काम यह किया था कि भ्रष्ट अफसरों की दौलत को जब्त करने के लिए एक अलग कानून बनाया, और उसके लिए अलग अदालती कार्रवाई भी तय की थी, लेकिन उस पर कोई अमल अब तक तो दिखा नहीं है। कानून तो बहुत से अच्छे होते हैं, लेकिन उन पर अमल की नीयत जब तक न हो, तब तक वे कानून न सिर्फ बेअसर हो जाते हैं, बल्कि लोग उनके खिलाफ एक दुस्साहस भी विकसित कर लेते हैं। राज्य सरकार को बहुत तेजी से उसके पास बरसों से पड़े हुए भ्रष्टाचार के मामलों को हर किस्म की अदालती कार्रवाई की मंजूरी देनी चाहिए, और संपत्ति जब्त करने की कार्रवाई भी तेजी से करनी चाहिए। इसमें देर होने से सारी जमीन-जायदाद लोग दूसरों के नाम पर कर देते हैं और जनता के खजाने में कुछ लौट नहीं सकता। राज्य सरकार को इस नए कानून के साथ-साथ पहले से मौजूद कानूनों का इस्तेमाल तेजी से और बड़े पैमाने पर करना चाहिए, उसके बिना इस बढ़े हुए बजट से भ्रष्ट लोगों की कमाई और बढ़ जाएगी।
फिलहाल बजट की बारीक बातों के खुलासे तक, उसके विश्लेषण तक हम अभी अपनी इसी पुरानी सलाह को आज यहां दुहरा रहे हैं कि बजट के आकार का बढ़ते चले जाना काफी नहीं है, इसके साथ-साथ अगर भ्रष्टाचार का आकार घटना नहीं हो पाएगा, तो जनता तक फायदे नहीं पहुंच पाएंगे।

हत्या की धमकी और फतवा देने वाले अफसरों के खिलाफ ही कार्रवाई काफी नहीं होगी...

संपादकीय
5 मार्च 2017


छत्तीसगढ़ के अखबारों सहित सोशल मीडिया इस बात से भरे पड़े हैं कि किस तरह बस्तर के पूर्व आईजी एस.आर.पी. कल्लूरी को राज्य सरकार ने दो नोटिस जारी किए हैं। इनमें से एक इस बात के लिए है कि वे अपने पिछले कार्यक्षेत्र बस्तर में एक निजी कारोबारी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में कैसे शामिल हुए, और सरकार के यह निर्देश हैं कि शासकीय अधिकारी इस तरह के निजी कार्यक्रमों में न जाएं, तो ऐसे में क्यों न उनके खिलाफ इसके लिए कार्रवाई की जाए। कल की ही तारीख का पुलिस महानिदेशक के ही दस्तखत का दूसरा नोटिस है जिसमें कल्लूरी को कहा गया है कि बस्तर में अभी हुए तबादलों के बारे में सोशल मीडिया पर कल्लूरी ने जो ट्वीट किए हैं उनका प्रसारण टीवी चैनलों पर हो रहा है, और अभी फरवरी में ही राज्य शासन ने सोशल मीडिया पॉलिसी जारी की है जिसमें ऐसी कार्रवाई की मनाही है, तो क्यों न इसके लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।
जिस कार्यक्रम को लेकर प्रदेश के पुलिस प्रमुख ने ये नोटिस जारी किए हैं, उस कार्यक्रम की असलियत कुछ और है, और उसका मुद्दा ही कुछ और है। उसे अनदेखा करते हुए कल्लूरी को ये दो नोटिस जारी करना कुछ उसी तरह का है कि किसी गाड़ी से कोई सोच-समझकर कुचलकर किसी की हत्या कर दे, और उसे इस बात का नोटिस दिया जाए कि गाड़ी में नंबर प्लेट पर लिखे गए अंक सही आकार के नहीं हैं। कल्लूरी के साथ प्रदेश के पुलिस प्रमुख की रियायत इन दो नोटिसों के बाद भी समझने वालों को साफ समझ आती है कि असल मुद्दे को अलग धरकर ये नोटिस ऐसी बात के लिए जारी किए गए हैं जो कि महत्वहीन हैं। अभी तक ऐसा कोई नोटिस पुलिस ने, या कि गृह विभाग ने जारी नहीं किया है जो कि बताए कि ऐसा बयान देने वाले एसपी के खिलाफ पुलिस में केस क्यों दर्ज नहीं किया जा रहा है? कल्लूरी और उनके वफादार अफसरों की इस टीम ने इस पूरी सरकार के लोकतांत्रिक बर्दाश्त को जिस परले दर्जे की चुनौती दी है, उसे कोई बच्चा भी समझ सकता है, लेकिन इस सरकार में बैठे लोग उसे समझने से इंकार कर रहे हैं।
बस्तर की खबरें बताती हैं कि एक आटोमोबाइल एजेंसी के कारोबारी कार्यक्रम में कल्लूरी पहुंचे जो कि वहां घोषित रूप से मुख्य अतिथि थे। दर्जनों मीडिया में आए एक जैसे समाचारों के मुताबिक उनके अलावा बस्तर के दो पुलिस अधीक्षक वहां मौजूद थे, इनमें से एक एसपी ने अपने भाषण में बस्तर में काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ताओं का नाम लेकर कहा कि ऐसी नई गाडिय़ों से इन कार्यकर्ताओं को सड़क पर कुचलकर मार देना चाहिए। पिछले तीन दिनों से लगातार यह बयान खबरों में आया है, लेकिन संबंधित अधिकारी ने इसका कोई खंडन नहीं किया है, और बोलने की आजादी के अपने अधिकार की वकालत की है। इसलिए आज इस पर लिखते हुए हमको इस बात में कोई शक नहीं है कि एसपी ने यह बात कही है, क्योंकि हत्या करने की ऐसी बात एक इतना बड़ा जुर्म है कि वह जिसके नाम के साथ चिपके, और वह इंसान मौजूद रहते हुए भी उसका खंडन न करे, तो वह बात सच मानने के अलावा और कोई जरिया नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि पुलिस तो राज्य शासन का महज एक विभाग है, और पुलिस प्रमुख प्रदेश शासन के गृह सचिव के लिए जवाबदेह रहते हैं। मतलब यह कि गृह सचिव भी अपने ऊपर सरकार या मीडिया, या संसद और विधानसभा, या अदालत और मानवाधिकार आयोग जैसी हर संस्था के लिए संवैधानिक रूप से जवाबदेह हैं। जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है तो पिछले बरसों में यह बात बार-बार और हर जगह स्थापित हुई है कि गृह सचिव बी.वी.आर. सुब्रमण्यम और डीजीपी ए.एन. उपाध्याय लगातार कल्लूरी के रक्षक बने हुए डटे रहे, और उन्होंने राज्य की सबसे बुरी बदनामी करवाने के जिम्मेदार कल्लूरी का बाल भी बांका नहीं होने दिया। आज का यह मौका यह बात भी लिखने का है कि एक मीडिया संस्थान के रूप में हमारा या तजुर्बा रहा कि छत्तीसगढ़ का कोई भी हिस्सा कितना भी लहूलुहान हो जाए, गृह सचिव मीडिया की पहुंच से स्थायी रूप से बाहर रहते हैं, और मुख्यमंत्री सारी बदनामी झेलते हुए अकेले जवाबदेह रहते हैं।
अब सरकार के ढांचे को जो लोग समझते हैं, वे जानते हैं कि जिम्मेदारी और अधिकार के अलग-अलग दर्जे होते हैं। कल्लूरी के मातहत एसपी ने कत्ल की धमकी दी, और फतवा दिया, तो इसके लिए वहां मौजूद कल्लूरी जवाबदेह है। दूसरी तरफ कल्लूरी ने इन बरसों में बस्तर में जिस तरह कत्ल और रेप के दौर को बढ़ाया, उसके लिए डीजीपी और गृह सचिव सीधे जिम्मेदार हैं। लेकिन इससे ऊपर एक सवाल यह खड़ा होता है कि डीजीपी और गृह सचिव की तैनाती करने वाले मुख्यमंत्री की जवाबदेही क्या है? वे महज तैनाती के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए बिना किसी जिम्मेदारी के नहीं रह सकते। राज्य के प्रशासनिक प्रमुख के रूप में मुख्य सचिव और निर्वाचित मुखिया के रूप में मुख्यमंत्री ने कल्लूरी के मातहतों से लेकर कल्लूरी के ऊपर के उसके  रक्षकों तक पर क्या कार्रवाई की? भारत जैसे लोकतांत्रिक प्रशासनिक ढांचे में अब बात महज एक एसपी, एक आईजी, या एक डीजीपी तक सीमित नहीं रह जाती, अब शासन के प्रशासनिक प्रमुखों, और सीधे मुख्यमंत्री तक इस बात की आंच आती है कि अपनी जिम्मेदारियों को देखते हुए उन्होंने अपने अधिकारों का कोई इस्तेमाल क्यों नहीं किया?
कहने के लिए सरकार यह सफाई दे सकती है कि उसने ऐसे बयान छपने के तुरंत बाद उसके पीछे के एसपी को एक दिन के भीतर बस्तर से हटा दिया, लेकिन दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ ने यह बात भी अच्छी तरह  दर्ज की है कि विधानसभा में विपक्ष ने जब एसपी की इस धमकी को पूरी ताकत से उठाया, तो उसके घंटों बाद जाकर सरकार को शायद बेबसी में ऐसा करना पड़ा, क्योंकि सरकार खुद अगर चाहती, तो कुछ घंटों में ही एसपी के बयान को जांच-परखकर उसे वहां से हटा सकती थी, सरकार को ऐसा करना चाहिए था, और सरकार ऐसा करने की अपनी जिम्मेदारी दर्ज करवाने का मौका खो चुकी है।
आज यह लिखने की वजह यह है कि लगातार लोकतंत्र के खिलाफ जाकर, सरकारी सेवा नियमों के खिलाफ जाकर तरह-तरह के भयानक जुर्म करने वाले अफसरों का तबादला जो लोग काफी समझते हैं, वे लोग आज भी मुख्यमंत्री को उनकी जिम्मेदारी याद नहीं दिला रहे। राज्य के हित में जिम्मेदार लोगों को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र की जिम्मेदारियों को पूरा करना ही होगा, क्योंकि ऐसा न करने पर किसी इतिहासकार की जरूरत नहीं पड़ेगी, अदालतें, मीडिया, और मानवाधिकार आयोग इसे दर्ज करते चल रहे हैं। आज की जरूरत यह है कि सरकार अपने घर को सुधारे, और राज्य पुलिस की इस गिरावट को महज पुलिस की गिरावट न माने, यह गिरावट शासन की गिरावट है, और इसके लिए मुख्यमंत्री को आज के मौजूदा ढांचे में मजबूती से फेरबदल करना चाहिए क्योंकि ऐसा न करने पर उनके पास दो बरस बाद प्रदेश की जनता को देने के लिए कोई जवाब नहीं रहेगा। आज भी हत्या की ऐसी धमकी के खिलाफ पुलिस विभाग और राज्य शासन का गृह विभाग, और राज्य शासन, और मुख्यमंत्री कोई कार्रवाई करते नहीं दिख रहे हैं, और ऐसे में आंच सीधे-सीधे मुख्यमंत्री पर आ रही है, और अगर वे ऐसी नौबत में भी फैसला नहीं लेंगे, तो कब लेंगे?

चुनावी साजिश में भागीदार मीडिया लोकतंत्र का स्तंभ कैसे हो सकता है

संपादकीय
4 मार्च 2017


मणिपुर के चुनाव में वहां के 8 अखबारों और भाजपा नेताओं के खिलाफ चुनाव आयोग ने पुलिस रिपोर्ट का आदेश दिया है, क्योंकि उन्होंने आयोग की इजाजत के बिना मतदान के ठीक पहले विज्ञापन छापे हैं। इसके कुछ हफ्ते पहले उत्तर प्रदेश के एक सबसे बड़े अखबार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई, और उसके ऑनलाइन संपादक को गिरफ्तार किया गया, क्योंकि इसने एक ऐसा सर्वे प्रकाशित किया जो कि चुनाव आयोग के नियमों के ठीक खिलाफ था, और वह जाहिर तौर पर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने की नीयत वाला दिख रहा था। इन दोनों ही मामलों में यह बात साफ है कि ये मतदान को प्रभावित करने की नीयत से सोच-समझकर आयोग के निर्देशों के खिलाफ किए गए काम थे, और इनमें राजनीतिक दल और उनके नेता तो शामिल थे ही, इनमें मीडिया भी खुलकर साजिश में हिस्सेदार था।
लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के पक्ष में माहौल बनाने के लिए वहां के बहुत से प्रमुख अखबारों में अशोक पर्व नाम से कई-कई पेज की प्रायोजित रिपोर्ट छापी थी और यह मामला चुनाव आयोग से होते हुए, प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया से होते हुए कचरे की टोकरी में पहुंच गया, जबकि इसकी जांच रिपोर्ट में यह बात खुलकर सामने आई थी कि इन सारे बड़े-बड़े अखबारों ने भारी भ्रष्टाचार के तहत ऐसी रिपोर्ट छापी थीं। जब उस पूरे मामले में जांच के बाद भी कुछ नहीं हो पाया, तो अब चुनाव आयोग ने खुद पुलिस रिपोर्ट लिखवाना शुरू किया है, और भारतीय न्याय व्यवस्था में अगले बरस में जाकर यह पता लगेगा कि इस पर कोई कार्रवाई होती है या नहीं।
अब सवाल यह उठता है कि भारत के मीडिया को भ्रष्ट करना तो राजनीतिक दलों के लिए एक मामूली बात हो सकती है, क्योंकि राजनीति और चुनाव, दोनों ही भ्रष्टाचार से लदे हुए हैं, लेकिन जो मीडिया अपने आप को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहते हुए थकता नहीं है, वह चौथा स्तंभ अपनी आत्मा को बड़ी आसानी से बेचने पर उतारू रहता है। जिस तरह कोई चुनावी उम्मीदवार चुनावी भ्रष्टाचार करने के लिए नियम-कानून में छेद ढूंढ-ढूंढकर अपना काम करते रहते हैं, ठीक उसी तरह का भ्रष्ट काम भारत का मीडिया भी करने लगा है, बल्कि लंबे समय से करते आया है, और इसीलिए इस मीडिया को कोई लोकतांत्रिक दर्जा देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
बड़े राजनीतिक दलों को अपने बड़े खजाने के साथ यह बात आसान पड़ती है कि वे मीडिया को खरीद लें। और भारत में अब धीरे-धीरे मीडिया जिस तरह से एक महंगा कारोबार बन गया है, उसमें अपना खर्च निकालने के लिए, और दूसरों के मुकाबले टिके रहने के लिए यह जरूरी भी हो गया है कि वह अपनी आत्मा नियमित रूप से बेचता चले। यह सब चुनाव आयोग और अदालतों से लुका-छिपी का खेल है, और इस खेल में बदनाम हो चुके मीडिया को एक तबके के रूप में भी अब लोकतंत्र के किसी स्तंभ का दर्जा पाने का दावा खुद छोड़ देना चाहिए।

सार्वजनिक जीवन के लोग तो दावतों पर खर्च सीमित रखने जितनी समझदारी दिखाएं...

संपादकीय
3 मार्च 2017


महाराष्ट्र में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के विधायक बेटे की शादी में बड़े शाही इंतजाम को लेकर खबरें आ रही हैं। लेकिन यह पहला मौका नहीं है कि महाराष्ट्र में ऐसा हुआ हो, या कि किसी और राज्य में ऐसा न हुआ हो। बहुत से बड़े नेताओं के परिवारों में शादियां इसी अंदाज में करोड़ों के खर्च से की जाती हैं, और उनकी खबरें बनती ही हैं। लेकिन इसी बीच एक महिला सांसद ने संसद में एक निजी विधेयक पेश करने की घोषणा की है कि शादियों पर बेतहाशा खर्च पर रोक लगाया जाए। अभी यह पेश नहीं हुआ है, और इस पर चर्चा बाद में होगी, लेकिन देश में जगह-जगह सतह पर ऐसी कुछ चर्चा शुरू हो रही है। इस बीच जम्मू-कश्मीर की चर्चा जरूरी है जहां सरकार ने एक आदेश निकालकर शादियों में मेहमानों की संख्या, और ऐसी दावतों में खिलाए जाने वाले सामानों की संख्या सीमित कर दी है।
लोगों को याद होगा कि बहुत पहले भी एक गेस्ट कंट्रोल एक्ट हुआ करता था, जो कि शादी के मेहमानों को सीमित करना था, बाद में आर्थिक उदारीकरण की आंधी में उस एक्ट के पन्ने कहां गए, यह भी लोगों को याद नहीं है। लेकिन आज इस पर चर्चा की फिर से जरूरत है क्योंकि देश में आर्थिक असमानता इतनी बढ़ रही है कि बड़े लोगों की देखा-देखी मध्यम वर्ग भी अपनी ताकत से बाहर का खर्च करने लगा है, और दिखावे में देश की उत्पादकता तो खत्म हो ही रही है, सार्वजनिक जगहों पर ऐसे आयोजनों से दूसरे लोगों का जीना भी हराम हो रहा है।
अभी महाराष्ट्र से जो खबर आई है, उसका एक दूसरा पहलू भी है। जब सत्ता में बैठे हुए नेता या अफसर इतना बड़ा खर्च करते हैं, तो वे समाज की गरीबी को भी अनदेखा करते हैं, और लोगों को यह भी लगता है कि यह सत्ता से जुटाई गई काली कमाई है जिसके चलते इस दर्जे का खर्च हो रहा है। इससे एक तरफ तो नेताओं की समाज के प्रति संवेदनशून्यता दिखाई पड़ती है, और दूसरी तरफ सार्वजनिक जीवन की साख भी चौपट होती है। हम इसे एक बड़ी बेशर्मी का काम मानते हैं कि जहां कुपोषण से देश-प्रदेश का बुरा हाल हो, वहां पर एक-एक शादी के लिए दर्जनों विमान उतरें, और हजारों मेहमान आएं, महलों से सजावट हो, और संपन्नता के ऐसे टापू आसपास के विपन्नता के समंदर से अछूते रहे। सार्वजनिक जीवन में लोगों को इतनी बेशर्मी नहीं करनी चाहिए, इसके साथ-साथ अगर लोकतंत्र में किसी तरह की कानूनी गुंजाइश बनती है, तो किसी भी दावत में मेहमानों की गिनती, और उस पर खर्च की सीमा तय करनी चाहिए, और सरकार को देश में आर्थिक असमानताओं के चलते हुए जो बेचैनी बढ़ रही है, उसको और बढऩे देने से रोकना चाहिए।

अमिताभ की वसीयत, एक सीमित तारीफ की हकदार

संपादकीय
2 मार्च 2017


वैसे तो फिल्मी सितारों के बयानों को लेकर यह शक हमेशा ही रहता है कि वे अपनी कौन सी ताजा फिल्म को बढ़ावा देने के लिए वे कौन सी नौटंकी कर रहे हैं, लेकिन फिर भी मशहूर लोगों की कही हुई बातों का लोगों पर असर तो होता ही है, और हम भी उन बातों की खबर बनाते हैं, और ऐसी ही एक खबर आज अमिताभ बच्चन ने मुहैया कराई है। उन्होंने एक तख्ती लेकर तस्वीर खिंचवाई है कि उनके मरने के बाद उनकी छोड़ी गई सम्पत्ति उनकी बेटी और बेटे के बीच बराबर बांट दी जाएगी क्योंकि वे लड़के-लड़की की समानता में भरोसा रखते हैं।
अब यह तो जाहिर है कि हिन्दुस्तान के सबसे व्यस्त फिल्मी सितारे, और देश के सबसे व्यस्त मॉडल भी रहते हुए अमिताभ ने हजारों करोड़ की जायदाद जुटाई होगी, और उनके बेटा-बेटी अपनी-अपनी हैसियत में भी खासे पैसे वाले होंगे, इसलिए अमिताभ की इतनी बड़ी विरासत के बंटवारे से भी बेटा-बेटी को अलग-अलग अरबों की दौलत मिलेगी, और बिना किसी खींचतान के इसमें सब लोग खुश रह सकते हैं। लेकिन फिर भी यह मानना गलत होगा कि खींचतान वहीं पर होती है जहां पर परिवार के लोगों के पास पैसों की कमी होती है, हम अपने इर्द-गिर्द भी अरबपतियों को देखते हैं कि किस तरह भाई-बहनों के बीच भी सांप-नेवले में मशहूर दुश्मनी के अंदाज में अदालती झगड़े चलते हैं, और पूरी-पूरी उम्र बंटवारे के मुकदमे में निकल जाती है। ऐसे में अमिताभ बच्चन ने आज अपनी अच्छी सेहत रहते हुए ही अपनी वसीयत कर दी, और बेटे-बेटी को बराबर का हक दिया, तो इससे देश में एक चर्चा तो होगी, और लोगों को यह लगेगा कि बेटी का हक भी कम नहीं होता है, या कम नहीं होना चाहिए।
इस पर हम चर्चा भी अमिताभ के लिए नहीं कर रहे, बल्कि बेटे और बेटी की बराबरी के लिए कर रहे हैं, जो कि हिन्दुस्तानी समाज में अधिकतर जगहों पर नहीं दिखती है। यहां की सांस्कृतिक बोलचाल में बेटी को बिदा करते हुए कह दिया जाता है कि डोली पर ससुराल जा रही है, अब वहां से अर्थी पर ही निकलना। मतलब यह रहता है कि बेटी के लिए मायके के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं, और उसे बता दिया जाता है कि ससुराल में सुखी रहे या न रहे, अब वही उसका घर है। पुराने दकियानूसी खयालों के लोग यह कह सकते हैं कि ऐसी सोच के बाद लड़की अपनी ससुराल में बेहतर तरीके से सामंजस्य के साथ जीने की कोशिश करती है, और वह एक सफल वैवाहिक जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण बात होती है। लेकिन इस सोच के ठीक खिलाफ हकीकत यह रहती है कि ससुराल में ही जीने या मरने की एक बेबस सोच जब लड़की पर थोप दी जाती है, तो वह अपने बुनियादी मौलिक अधिकारों को भी  भूलकर तमाम किस्म की ज्यादतियों को बर्दाश्त करते हुए ससुराल में जिए और मरे। बहुत कम परिवार ऐसे रहते हैं जो कि अपनी बेटी को इस हौसले के साथ ससुराल भेजते हैं कि किसी जुल्म को बर्दाश्त करने की जरूरत नहीं है।
परिवारों में बेटे और बेटी के बीच जायदाद के बंटवारे के वक्त भारतीय समाज में जो बातें कही जाती हैं, उनमें से एक यह कि लड़की पराए घर चली जाती है, उसकी शादी पर अधिक खर्च करना होता है, दहेज देना पड़ता है, पूरी जिंदगी उसके ससुराल कुछ न कुछ भेजना होता है, और उसकी सारी उत्पादकता उसके ससुराल के ही काम आती है, इसलिए उसे शादी के बाद अपने पिता से और कुछ पाने का हक नहीं रहता। दूसरी तरफ बेटे के बारे में माना जाता है कि वह माता-पिता के साथ ही रहता है, और उनका घर-बार, कारोबार चलाता है, इसलिए पिता की सम्पत्ति पर उसी का हक रहना चाहिए। अमिताभ बच्चन ने आज जो चर्चा छेड़ी है, उससे हो सकता है कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर कोई फर्क न पड़े, और शायद पैसे वालों के बीच ही यह सुगबुगाहट रहे, लेकिन हमारा मानना है कि समाज में फेरबदल कई बार ऊपर से नीचे की तरफ आता है। इसलिए अधिक संपन्न लोग अगर कोई परंपरा शुरू करते हैं, तो धीरे-धीरे उनसे कम संपन्न तबके भी उसे मानने लगते हैं। अमिताभ बच्चन की इस घोषणा पर सारे समझदार लोगों को चर्चा आगे बढ़ानी चाहिए, और अपने-अपने दायरे में लोगों का हौसला बढ़ावा चाहिए कि वे सारा बंटवारा बेटे और बेटियोंं में बराबरी से करें। यह एक अलग बात है कि कमाने वाले लोगों को अपनी औलाद से परे भी कमाई को बांटने की सोच रखनी चाहिए, जैसा कि हिन्दुस्तान में टाटा उद्योग समूह करता है, या जैसा कि अमरीका में वारेन बफे और बिल गेट्स जैसे सैकड़ों खरबपति कर रहे हैं, फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग कर रहे हैं, कि अपनी जायदाद का बड़ा हिस्सा समाज के लिए दे रहे हैं। अमिताभ बच्चन की वसीयत की समाज के लिए एक धेला भी नहीं दिख रहा है, उनको इसका हक तो है, लेकिन एक सामाजिक सरोकार के तहत वे इस हालत में भी थे कि हिन्दुस्तान के खरबपतियों के लिए एक मिसाल कायम कर जाते। लेकिन हमको मंदिरों से परे अमिताभ का कोई दान याद नहीं पड़ता, और अपने आखिरी दस्तावेज में भी उन्होंने सब कुछ महज बेटे और बेटी के लिए रखा है, इसलिए सामाजिक नजरिए से वे एक सीमित तारीफ के ही हकदार हैं, बेटे और बेटी को बराबर मानने के लिए। बाकी उनका सामाजिक सरोकार शून्य दिखाई पड़ता है।

शराबबंदी के वायदों और बातों को करते-करते राज्य सरकार बन गई शराब-कारोबारी!

संपादकीय
1 मार्च 2017


छत्तीसगढ़ मेेंं दारू सिर चढ़कर बोल रही है। आमतौर पर तो पीने वाले लोगों पर ही ऐसा असर होता है, लेकिन अभी इस धंधे के सरकारीकरण की वजह से बहस छिड़ गई है कि सरकार को दारू का कारोबार करना चाहिए, या नहीं? खुद भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में शराबबंदी का वायदा था, और हर बरस शराब की खपत या उससे कमाई बढ़ती ही जा रही है। अब सरकार ने खुद बिक्री करना तय किया है, और भाजपा, संघ परिवार के बाकी संगठन, और जनता के बहुत से लोग इस फैसले से हक्का-बक्का हैं कि शराबबंदी करने चली सरकार यह क्या कर रही है? भाजपा के बहुत से लोगों को यह आशंका है कि अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी के खिलाफ यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहेगा, और हो सकता है कि सबसे बड़ा मुद्दा यही रहेगा। दूसरी तरफ आरएसएस के छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख नेता ने खुलकर इसका विरोध किया है, और भाजपा के सांसद-विधायक भी इस फैसले से परेशान हैं, इसलिए भी कि बदनामी से कैसे निपटेंगे, और इसलिए भी कि अगले चुनाव में बांटने के लिए दारू कौन देगा?
भाजपा के देश के सबसे बड़े नेता, और गुजरात में लगातार मुख्यमंत्री रह चुके, लगातार राज्य को जीतने वाले नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, और हाल ही में उन्होंने अपनी आमसभाओं में बिहार में अपने धुर-विरोधी नीतीश कुमार की लगाई हुई शराबबंदी की तारीफ भी की है। ऐसे में भाजपा के बाकी राज्यों से यह उम्मीद की जाती थी कि वे दारूबंदी के बारे में सोचेंगे, लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार खुद ठेकेदार बन गई है, और लोगों का अंदाज है कि इससे पार्टी फंड में अगले दो बरस में हजार-दो हजार करोड़ रूपए तो जुट जाएंगे, लेकिन इज्जत चली जाएगी। आज प्रदेश में आबकारी मंत्री सहित सत्ता के कुछ लोगों ने यह रूख बना लिया है कि सरकार के इस फैसले का जो लोग विरोध कर रहे हैं, वे सारे के सारे अब बेरोजगार हो रहे शराब कारोबारियों के दलाल हैं, या उनके भोंपू की तरह काम कर रहे हैं। जबकि छत्तीसगढ़ में सत्ता पर बैठे लोग चारों तरफ से दारू-कारोबारियों से घिरे हुए हैं, और रमन सरकार के शायद शुरू से ही अमर अग्रवाल लगभग लगातार आबकारी मंत्री भी बने हुए हैं।
हम इस बहस में पडऩा नहीं चाहते कि दारू कौन बेचे, ठेकेदार बेचे, या सरकार बेचे। इससे फर्क महज इतना पड़ेगा कि कमाई का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदार की जेब में जाएगा, या कि सत्ता में बैठे हुए नेता-अफसर की जेब में जाएगा। सरकार की जायज और घोषित कमाई तो तकरीबन वैसी ही बनी रहेगी। इस मौके पर हमको इस बात को लेकर हैरानी होती है कि अगले विधानसभा चुनाव के दो बरस पहले छत्तीसगढ़ सरकार कारोबार का यह नया प्रयोग करने जा रही है, और उस वक्त कर रही है जब उससे शराबबंदी की उम्मीद की जाती थी। बिहार के मुख्यमंत्री ने यह बार-बार कहा है कि शराब से होने वाली कमाई से सरकार की जेब जितनी भरती है, उससे अधिक खाली हो जाती है, जब उसे शराब से लोगों पर पडऩे वाले बुरे असर से निपटना पड़ता है। लोगों की सेहत खराब होती है, और घरेलू अर्थव्यवस्था चौपट होती है। पता नहीं क्यों छत्तीसगढ़ सरकार यह हिम्मत नहीं जुटा पाई कि अगर दारू ठेकेदारों की मनमानी को खत्म करना है, तो वह शराबबंदी का फैसला लेती, मनमानी करने वाले ठेकेदार एक बार में बेरोजगार भी हो जाते, और जनता भी इससे आजाद होती, और गरीबों के घर बर्बाद होने से बचते।
आज छत्तीसगढ़ में कोई हफ्ता ऐसा नहीं गुजरता जब दारू पीने वाले लोग परिवार के भीतर बलात्कार या हत्या न करते हों। और यह पारिवारिक हिंसा तो बड़ी वारदात होने के बाद ही खबरों में आती है, लोग जानते हैं कि शराब परिवार को किस तरह बर्बाद करती है। आज ही रायपुर के एक प्रमुख अखबार में बस्तर की एक तस्वीर छपी है जिसमें तीन बहुत ही छोटे बच्चे अपनी झोपड़ी में कुछ पका रहे हैं, क्योंकि मां मर चुकी है, और बाप दारू पीकर कहीं पड़े रहता है। ऐसे में ये बच्चे गांव के लोगों से मांगकर कुछ लाते हैं, और पका लेते हैं। इस अकेली तस्वीर को देखें तो समझ आता है कि शराबबंदी क्यों होनी चाहिए। लेकिन शराबबंदी करने के बजाय सरकार जिस तरह युद्धस्तर पर शराब कारोबारी बन रही है, वह प्रचलित भारतीय संस्कृति के हिसाब से अनैतिक काम भी लगता है, और सरकार का एक कमजोर फैसला भी लगता है कि अगर गांव-गांव में बिकने वाली अवैध शराब की वजह से होती बर्बादी को सरकार रोकना चाहती थी, तो उसे इस धंधे को ही बंद करना था, बजाय इस धंधे में उतरने के। शराबबंदी के सिवाय इस सरकार के पास अगले विधानसभा चुनाव तक और कोई रास्ता भी नहीं बचेगा, लेकिन विपक्ष की इस मांग को मानने में सरकार अगर समय बर्बाद करती रहेगी, तो शराबबंदी के फैसले का अगले चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी को फायदा तो नहीं होगा, बल्कि इस कारोबार के शर्तिया और अनिवार्य भ्रष्टाचार की कालिख जरूर इस सरकार पर लग जाएगी। हमको नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ की सत्तारूढ़ पार्टी को अगला चुनाव लडऩे के लिए दारू की अवैध कमाई की जरूरत पडऩे वाली थी, ऐसे में शराबबंदी के बजाय शराब के धंधे का फैसला इस सरकार के लिए नुकसानदेह है, और जनता के लिए तो जितना नुकसानदेह था, उतना ही नुकसानदेह बने रहेगा। छत्तीसगढ़ सरकार इस मोर्चे पर अपनी जनकल्याणकारी जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर पाई है, और यह निराश करने वाली बात है।

धर्म की हिंसा के खिलाफ इंसाफपसंद धर्मालुओं को आगे आने की जरूरत

संपादकीय
28 फरवरी 2017


केरल के एक पादरी का बयान आया है कि जींस और टी शर्ट में चर्च पहुंचने वाली लड़कियों की वजह से लोगों का ध्यान उपासना से हटता है, और ऐसा करने वाली लड़कियों को समंदर में डूबा देना चाहिए। इस पादरी का यह भी कहना है कि इस तरह की लड़कियां केवल आकर्षण का केंद्र बनने के लिए ऐसा करती हैं।
केरल देश का सबसे अधिक पढ़ा-लिखा राज्य है, और यहां पर महिलाओं की स्थिति बाकी देश के मुकाबले बेहतर है और यह शायद देश का अकेला राज्य है जहां पर लड़कों के मुकाबले लड़कियों की जन्म संख्या अधिक है। ऐसे राज्य में जब ऐसी दकियानूसी बात सामने आती है, तो यह धर्म के मुंह से ही निकलकर आ सकती है। भारत में हम लगातार इस बात को देखते हैं कि हिंदू, मुस्लिम, या ईसाइ धर्मगुरू लगातार महिलाओं के खिलाफ अन्याय की, गैरबराबरी की, और हिंसा की बातें करते हैं। उत्तर भारत में जगह-जगह जाति और धर्म से परे शादी करने वाले लड़के-लड़कियों को उनके मां-बाप ही मरवा डालते हैं, और ऐसी हत्याएं धर्म और जाति से उपजी हुई कटरता की वजह से होती हैं। धर्म ने न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया के दर्जनों देशों में लाखों हत्याओं को जारी रखा है, और धर्म का नाम लेकर अनगिनत मुस्लिम देशों में लगातार सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं, और महिलाओं और लड़कियों को खरीदा-बेचा जा रहा है, इसके लिए धर्म का तर्क भी दिया जा रहा है कि धर्म में यह किस तरह जायज है।
धर्म पूरी दुनिया में खूनखराबे और अन्याय के लिए जिम्मेदार अकेला सबसे बड़ा कारण है, और दुनिया के नक्शे से धार्मिक-कत्ल हटा दिए जाएं, तो शायद 90 फीसदी कत्ल थम जाएंगे। ऐसा कातिल धर्म पढ़े-लिखे लोगों के दिल दिमाग पर भी राज करता है, और विज्ञान को पैर जमाने ही नहीं देता। इसके सबसे बड़े शिकार सारे कमजोर तबके होते हैं, गरीब, दिव्यांग, महिलाएं, बच्चे और परंपरागत रूप से नीची समझी जाने वाली जातियों के लोग होते हैं। ऐसे में आस्थावान लोगों में, धर्मालु लोगों में जो लोग न्यायसंगत हैं, उन्हीं को पहल करनी होगी और धर्म को सार्वजनिक जगह से हटाकर घर के भीतर ले जाना होगा। जब धर्म निजी जिंदगी के बाहर आता है और एक संगठित ताकत की तरह होता है, तो वह किसी भी मुजरिम-बाहुबली की तरह का हो जाता है। नतीजा यह है कि हिंदुस्तान में आज इस बाहुबली की ताकत का इस्तेमाल चुनाव में करते हैं, किसी जमीन को खाली करवाने में करते हैं, बलात्कार और तस्करी में करते हैं।
भारत के सभी प्रमुख धर्मों के भीतर से जिस तरह की हिंसक बातें निकलती हैं, उनका विरोध करना अकेले नास्तिकों के बस का नहीं है। धर्म को मानने वाले लोगों के बीच से सुधार की आवाज उठनी चाहिए, और लोगों को याद होगा कि हर धर्म से कुछ लोग ऐसे पाखंड और ऐसी हिंसा के खिलाफ समय-समय पर खड़े हुए भी हैं। भारत में तो सती प्रथा और बाल विवाह को खत्म करवाने का काम धर्म से जुड़े हुए आस्थावान लोगों ने ही किया था, मुस्लिमों के बीच से असगर अली इंजीनियर जैसे सुधारवादी खड़े हुए थे, और ईसाईयों के बीच भी उदारवादी आंदोलनकारी हैं। इन सबके साथ समाज के उस मौन बहुमत को आगे आने की जरूरत है जो कि इंसाफपसंद तो है, लेकिन चुप है।

शहीद की बेटी को बलात्कार की धमकी देता हिंसक राष्ट्रवाद...

आजकल
27 फरवरी 2017  
दिल्ली के एक कॉलेज में होने जा रहे कार्यक्रम में कश्मीरी मुद्दों को उठाने वाले जेएनयू के छात्र उमर खालिद को भी बोलने के लिए बुलाया गया था। उमर खालिद को अलगाववादी करार देते हुए कुछ संगठन लगातार उसे देशद्रोही कहते आ रहे थे। इस कार्यक्रम में भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी के नेताओं ने पहुंचकर खूब जमकर मारपीट की, और वहां मौजूद पुलिस उम्मीद के मुताबिक उसे देखती रही। अब इसे लेकर सोशल मीडिया पर एक बार फिर देश के कुछ लोगों को गद्दार और देशद्रोही करार देने का सिलसिला शुरू हो गया है।
कारगिल में शहीद हुए एक हिन्दुस्तानी सैनिक की बेटी ने एबीवीपी की इस गुंडागर्दी के खिलाफ एक पोस्टर लेकर अपनी तस्वीर अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट की, और इस पोस्टर में लिखा था कि वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की गुंडागर्दी से नहीं डरती है, और पूरे देश के छात्र उसके साथ हैं। यह कारगिल में शहीद हुए एक फौजी कैप्टन की बेटी है, और अपनी इस तस्वीर के बाद से लगातार उसके फेसबुक पेज पर उसे गद्दार लिखा जा रहा है, देशद्रोही लिखा जा रहा है, और उसे बलात्कार की धमकियां दी जा रही हैं।
बलात्कार की धमकी उन लोगों का बड़ा पसंदीदा हथियार है जो कि इस देश की संस्कृति को जिंदा रखने का दावा करते हैं। हिन्दूवादी, राष्ट्रवादी, साम्प्रदायिक, और हिंसक सोच के ठेकेदार लगातार उन सारे लोगों को देशद्रोही करार देते आ रहे हैं जो हिंसक-राष्ट्रवाद, धर्मान्धता, और युद्धोन्माद पर भरोसा नहीं रखते। ऐसे लोग कश्मीर की आजादी के नारे को तो गद्दारी मानते ही हैं, ऐसे लोग विचारों की आजादी, असहमति की आजादी को भी देशद्रोह मानते हैं, और यह सिलसिला सरकार की मंजूरी से हो रही हिंसा तक फैले चले जा रहा है। कहीं दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के एक बहुत ही प्रतिष्ठित वकील प्रशांत भूषण का मुंंह काला करने तक यह सिलसिला फैल रहा है, तो कहीं कश्मीर में शांतिवार्ता के हिमायती दूसरे लोगों को पाकिस्तानी करार देने तक जा रहा है।
आज ही एक अंग्रेजी अखबार में नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का एक लंबा साक्षात्कार छपा है जिसमें उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालयों में, और भारत में वैचारिक विविधता पर आधारित बहस के खात्मे पर फिक्र जाहिर की है। और यह फिक्र अकेले अमर्त्य सेन की नहीं है, सोचने-विचारने वाले, लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले, अंधविश्वासी पाखंड का विरोध करने वाले, इंसानियत पर भरोसा रखने वाले तमाम लोगों में है। आज असहमति का विरोध इतने हिंसक और इतने आक्रामक तरीके से हो रहा है कि बहुत से कमजोर दिल लोग मुंह खोलने या कि कुछ लिखने का हौसला भी नहीं जुटा पाते हैं।
दुनिया के ऐसे कोई देश लोकतंत्र के साथ महानता तक नहीं पहुंच पाते, जहां पर वैचारिक विविधता नहीं होती। जो लोग अपनी संस्कृति की बात करते हैं, जो हिन्दुस्तान में हिन्दुत्व से परे और कुछ न सोच पाते हैं, न बर्दाश्त कर पाते हैं, उन तमाम लोगों को कुदरत से भी कुछ सीखने की जरूरत है। जब धरती पर हिन्दुस्तान की कोई सरहद नहीं थी, और जब हिन्दू तो दूर, इंसान भी नहीं थे, और जब धरती पर कुदरत ने कदम रखा था या जन्म लिया था, जब पेड़-पौधे बने, और तरह-तरह के पशु-पक्षी और पानी के जानवर बने, जब नदियां बनीं, पहाड़ बने, और पानी बहा, तब से यह बात साफ है कि विविधता के बिना न कुदरत है, न धरती है, और न जीवन है। औरत और मर्द की विविधता न होती, तो इंसानी जिंदगी ही आगे न बढ़ी होती। ऐसी विविधता जिंदगी को लाने और बढ़ाने की पहली अनिवार्य शर्त रही है, और ऐसी विविधता को आज सिर्फ धर्म के आधार पर खत्म करने की यह सोच अप्राकृतिक है, और इससे विविधता की सारी संपन्नता तो खत्म हो ही रही है, पूरी तरह से अवैज्ञानिक, अमानवीय, अन्यायपूर्ण यह जिद, यह कट्टरता, खुद उस समाज को खत्म करने जा रही है, जिसकी शुद्धता का दावा करते हुए, जिसकी शुद्धता को बनाए रखने के लिए हिटलर के नस्लवादी अंदाज में भारत में असहमति को खत्म किया जा रहा है।
यह वह देश है जिसके हिन्दुत्व के दौर के इतिहास में भी शास्त्रार्थ की एक लंबी परंपरा रही है, और वैचारिक मतभेद पर खुलकर चर्चा यहां का इतिहास रहा है। असहमति की वजह से एक-दूसरे के सिर काटने का काम नहीं हुआ है, वह काम धर्म ने आकर जरूर शुरू किया, और धर्म से पहले तक असहमति से सिर नहीं कटे थे। अब ऐसे में आज इक्कीसवीं सदी में आकर मंगलयान भेज देने के बाद, पूरी दुनिया में हिन्दुस्तानियों को बसा देने के बाद, पूरी दुनिया में जगह-जगह भारतवंशियों के बीच भारतीय प्रधानमंत्री के अभूतपूर्व भाषणों के बाद जब इस देश की राजधानी में तंगदिल और तंगदिमाग लोग नफरत और कट्टरता से असहमति का गला घोंट देते हैं, तो उनको यह अंदाज ही नहीं है कि वे आज की पूरी दुनिया के बीच हिन्दुस्तान का कितना नुकसान कर रहे हैं।
आज अमरीका जैसा देश अगर कामयाब है तो उसके पीछे महज वहां के मूल निवासियों का राज नहीं है, पूरी दुनिया से वहां पहुंचे हर राष्ट्रीयता, हर नस्ल, हर धर्म और हर रंग के लोगों को तकरीबन बराबरी से बढ़ावा देने का दौर जब से अमरीका में बढ़ा, तब से अमरीका एक कामयाब मुल्क हुआ। धीरे-धीरे वहां पर आधुनिक लोकतंत्र ने मूल निवासियों को जरूर कुचलकर रख दिया, लेकिन वह काम तो आज हिन्दुस्तान में भी हो रहा है, और ऑस्ट्रेलिया से लेकर दक्षिण अमरीकी देशों में भी हो रहा है। अमरीका में जो सकारात्मक बात पिछली आधी सदी में हुई है, और जिसने अमरीका को चांद तक पहुंचाया, अमरीकी आंतरिक जीवन शैली को सबसे अधिक लोकतांत्रिक बनाया, उसके पीछे वहां की विविधता रही। अब जब मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उनके हिमायती लगातार भेदभाव करके समाज के भीतर नफरत फैला रहे हैं, और जिस नफरत की हिंसा का शिकार दो दिन पहले वहां पर एक भारतवंशी नौजवान हुआ है, उस हिंसा को अगर हिन्दुस्तान में एक जुड़वां भाई मिल रहा है, तो इससे हिन्दुस्तान का नुकसान छोड़ और कुछ नहीं होगा।
और तो और एक नामीगिरामी क्रिकेट सितारे वीरेन्द्र सहवाग ने इस हौसलामंद युवती के पोस्टर वाली फोटो का मजाक उड़ाते हुए एक घटिया हरकत की है, और अपनी फोटो सहित एक जवाबी पोस्टर अपने ट्विटर खाते पर डाला है। शहीद की इस बेटी ने करीब तीन दर्जन पोस्टर अलग-अलग नारों के साथ पोस्ट किए थे जिसमें से एक यह था कि उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं मारा, जंग ने मारा है। जो लोग जंग के खिलाफ हैं, वे इस हकीकत को जानते हैं। लेकिन जो लोग जंगखोर हैं, उनको यह बात समझ नहीं आएगी, और सहवाग उन्हीं में एक साबित हुए। लेकिन जैसा कि किसी भी मशहूर सितारे के साथ होता है, सहवाग की कही हुई बात लोगों को बड़ी सुहा रही है, और उनके उकसावे के बाद इस हौसलामंद लड़की को कोसने वाले लोगों में खासी बढ़ोत्तरी हो गई है।
अमरीका तो अपने भीतर के मजबूत लोकतंत्र, संघीय ढांचे में राज्यों की मजबूत आजादी, और लोगों के बीच लोकतांत्रिक लड़ाई के एक बेहतर हौसले के चलते ट्रंप से उबर जाएगा, लेकिन भारत लगातार दकियानूसी सोच का नुकसान झेल रहा है। आज सरहद के शहीदों का नाम लेकर राष्ट्रवादी उन्माद फैलाने वाले लोग एक शहीद की बेटी को बलात्कार की धमकी दे रहे हैं। अगर इनके कहे मुताबिक ये देश की संस्कृति के रखवाले हैं, तो इस देश को ऐसी संस्कृति और ऐसे रखवालों की कोई जरूरत भी नहीं है। दिक्कत यह है कि ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार सक्रिय रहते हैं, वहां पर उनके ट्विटर खातों से वे ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं जो चारों तरफ बलात्कार की धमकी को चौराहों पर बंटने वाले पर्चों की तरह बांटते रहते हैं। प्रधानमंत्री को कौन फॉलो करे, इस पर तो प्रधानमंत्री का काबू शायद नहीं हो सकता, लेकिन वे किस-किस को फॉलो करें, यह तो उनकी मर्जी और पसंद की बात रहती है। अगर वे ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं जो नियमित रूप से बलात्कार की धमकियां देते हैं, हत्या की धमकियां देते हैं, तो उनकी ऐसी पसंद से देश में नफरतजीवी लोगों की हौसलाअफजाई होती है, और अमन-पसंद लोग पस्त होते हैं।
लोकतंत्र में एक मुखिया को देश को एक राह भी दिखानी होती है, आज हिन्दुस्तान में ऐसे असरदार नेता रह नहीं गए हैं जो कि नफरत के खिलाफ एक लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दें, जो इंसाफ को बढ़ावा दें, और बराबरी को बढ़ावा दें। ऐसे में जब देश में वैचारिक असहमति का जवाब हिंसा से दिया जा रहा है, तो देश पर असर रखने वाले ऐसे नेता रह नहीं गए हैं जो कि लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत के मुताबिक, और उसके लिए, असहमति का सम्मान करें।
फिलहाल यह बात अच्छी है कि असहमति पर हिंसा करने वाले लोग एक शहीद की बेटी को बलात्कार की धमकी देकर अपने असली तेवर, अपना असली चाल-चलन उजागर कर चुके हैं, और इनके इस हिंसक पाखंडी राष्ट्रवाद का भांडफोड़ इसी तरह होगा।