पिछले चुनाव में मोदी को जिताने वाली कांग्रेस इस बार भी लगी हुई है..

संपादकीय
17 जून 2018


कांग्रेस पार्टी के साथ दो दिक्कतें दिखती हैं। एक तो यह कि देश की लीडरशिप उसके पास रहे, इससे परे वह कुछ सोच नहीं पाती है। हालत उसकी ऐसी है कि घर में नहीं दाने, अम्मा चलीं भुनाने। उसका अतीत चाहे कितना ही गौरवशाली रहा हो, उसका वर्तमान मटियामेट है, और ऐसे में भी उसकी जो बददिमागी जारी है, उसके चलते उसका भविष्य भी कोई बेहतर नहीं लगता। लेकिन इससे परे एक दूसरी बात भी है कि कांग्रेस ने हाल के बरसों में बेमौके की बकवास करने की कला में महारथ हासिल कर ली है। जब कभी देश में ऐसा माहौल बनता है कि कांग्रेस कुछ विपक्षी दलों के साथ मिलकर अगले आम चुनाव के लिए मोदी के खिलाफ एक बेहतर तालमेल बना सकती है, कांग्रेस के कोई न कोई नेता उस माहौल को खराब करने में जुट जाते हैं। 
अब आज जब दिल्ली में वहां के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मोदी सरकार के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा खोलकर लड़ रहे हैं, तो कांग्रेस पार्टी ने मानो इस नाजुक मोड़ पर अपना फैसला दिल्ली के उन स्थानीय कांग्रेस नेताओं पर छोड़ दिया है जिनका अपना अस्तित्व केजरीवाल की वजह से खत्म हो चुका है। ऐसे नेता कांग्रेस की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और संभावित राष्ट्रीय भूमिका को अनदेखा करके अपने शहर का हिसाब चुकता करने में लगे हुए हैं। यह उस वक्त हो रहा है जब देश के चार प्रमुख गैरभाजपाई मुख्यमंत्री दिल्ली पहुंचकर केजरीवाल का साथ देना घोषित कर चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस मोदी से निपटने के एक मौके की संभावना तलाश करने के बजाय केजरीवाल को नुकसान पहुंचाने की संभावना तलाश रही है। इससे कांग्रेस की इज्जत देश के बाकी गैरकांग्रेसी-गैरभाजपाई लोगों के बीच चौपट हो रही है। 
दूसरी तरफ आज ही यह खबर है कि कांग्रेस के बिहार राज्य के संगठन प्रभारी ने नीतीश कुमार को न्यौता दिया है कि वे अगर भाजपा का साथ छोड़ते हैं, तो उन्हें महागठबंधन में वापस लेने के लिए वह सहयोगी दलों के साथ विचार-विमर्श करेगी। कांग्रेस के इस बिहार प्रभारी ने कहा है कि पिछड़ों और अतिपिछड़ों की राजनीति करने वालों के पास भाजपा का साथ छोडऩे के सिवाय कोई विकल्प नहीं है, और अगले चुनाव में भाजपा के खिलाफ गठबंधन की अगुवाई कांग्रेस के पास रहेगी, और देश की जनता राहुल गांधी के नेतृत्व में नरेन्द्र मोदी को हराएगी। अब कांग्रेस के कमअक्ल नेताओं को यह समझ भी नहीं है कि अभी तो नीतीश कुमार और भाजपा के बीच तनातनी शुरू भी नहीं हुई है, और कांग्रेस एक तरफ नीतीश पर डोरे भी डाल रही है, और उन्हें यह भी बता रही है कि आकर राहुल की लीडरशिप में काम करना होगा। यह नौबत कुछ वैसी है कि अभी किसी आदमी की जिंदगी की उम्मीद डॉक्टरों ने छोड़ी भी नहीं है, और कांग्रेस उसकी बीवी पर डोरे डाल रही है, साथ-साथ यह भी कह रही है कि आकर घर में झाड़ू-पोंछा करना होगा। 
नरेन्द्र मोदी की लीडरशिप में अगर अगला चुनाव एनडीए और भाजपा जीतते हैं, तो उसमें ठीक पिछले आम चुनाव की तरह एक बड़ा योगदान कांग्रेस का भी रहेगा, जो कि वक्त-जरूरत पर मुंह खोलने का मौका लगातार चूकती है, और बेवक्त बकवास में पीछे नहीं रहती है। आज जब उत्तर-पूर्व की बाढ़ को लेकर लोग देश के बड़े नेताओं से बयान या किसी काम की उम्मीद कर रहे हैं, तब राहुल गांधी मोदी की कसरत पर बयान दे रहे हैं। गूगल पर अगर उत्तर-पूर्व की बाढ़ के साथ राहुल गांधी का नाम ढूंढें, तो 3 अगस्त 2017 की खबरें ही सबसे ताजा दिखती हैं। कांग्रेस को लोगों की संवेदनशीलता से इस लापरवाही से खेलना बंद करना होगा, वरना वह इतिहास में दर्ज एक पार्टी रह जाएगी। पिछले महीनों और बरसों में जब-जब कुछ दूसरी पार्टियां देश के लोगों की भावनाओं को उकसाने और भड़काने में लगी रहती हैं, तब उसी माहौल के बीच कांग्रेस पार्टी के कोई न कोई बड़बोले नेता ऐसी गैरजरूरी और गैरवाजिब बात करते हैं कि जिससे पूरी पार्टी की इज्जत चौपट होती है। ऐसा लगता है कि इस पार्टी में औपचारिक प्रवक्ताओं को छोड़कर बाकी तमाम प्रवक्ताओं का राज है, और उन्हें उनके बयान कांग्रेस विरोधी बनाकर देते हैं, और बताते हैं कि इन्हें कब जारी करना है। ऐसे तौर-तरीकों के साथ कांग्रेस अगले चुनाव में भी मोदी को जिताने का काम करने जा रही है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 जून

पेट्रोलियम रेट अधिक युक्तिसंगत, न्यायसंगत बनाने की जरूरत...

संपादकीय
16 जून 2018


पिछले एक बरस में शायद सौ से अधिक बार डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़े हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों से इसे जोड़ दिया गया है, और वहां भाव बदलते हैं तो हिन्दुस्तान में सरकार कई किस्म के अपने टैक्स और ड्यूटी कम-ज्यादा करके लोगों की जेब से अधिक से अधिक उगाही करने की तरकीब निकाल लेती है। इसके बाद राज्यों के टैक्स की बारी आती है और कुल मिलाकर पेट्रोल डीजल को सीधे या सामानों के लिए इस्तेमाल करने वाली जनता की कमर टूट रही है। लेकिन इस सिलसिले के चलते हुए भी जो दूसरी बड़ी परेशानी है, वह है रोजाना बदलने वाले रेट की। जो लोग पेट्रोल पंप पर जाकर ईंधन डलवाना चाहते हैं, उन्हें खुद यह पता नहीं होता कि उस दिन का रेट क्या है, और सीमित पैसों वाले लोग लीटर के बजाय रकम का पेट्रोल डलवाते हैं। 
इस सरकारी बेवकूफी को खत्म करके एक आसान रास्ता निकालने की जरूरत है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार के भाव कम-ज्यादा होने से भारत में खुदरा बिक्री के रेट बदलने हैं, तो उसके लिए हफ्ते का एक दिन तय कर देना चाहिए। हर सोमवार उस हफ्ते के लिए नए रेट आ जाएं, और लोग शनिवार-इतवार के खाली वक्त में चाहें तो पेट्रोल पम्प हो आएं। पेट्रोलियम से नफा-नुकसान रोजाना की बिक्री से जुड़ी हुई बात नहीं है। कई लाख करोड़ रूपए का एक आईलपूल पहले से चले आ रहा है जिसमें नफा या नुकसान इक_ा होते रहता है। सरकार को यह चाहिए कि एक हफ्ते के लिए रेट तय करना शुरू करे, और इस पर भी केन्द्र और राज्य के टैक्सों का ढांचा ऐसा होना चाहिए कि वह कुछ-कुछ पैसे कम-ज्यादा होने के बजाय सीधे रूपयों में कम-ज्यादा हो। अगर सरकार को इससे बचत होती हो, तो अगले हफ्ते रेट कम बढ़ें, और अगर इस हफ्ते नुकसान हो गया हो, तो अगले हफ्ते रेट ज्यादा बढ़े। 
रोज डीजल-पेट्रोल के रेट बढ़ाना-घटाना एक परले दर्जे की बेवकूफी के अलावा और कुछ नहीं है। लोगों को, खासकर गरीब लोगों को अपने खर्च का अंदाज नहीं लगता, जेब में रखे हुए सीमित पैसे बार-बार टटोलने होते हैं। देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज डीजल-पेट्रोल का सीधा ग्राहक है। ऐसे में जनता की सुविधा को देखते हुए भी सरकार अपनी कमाई जारी रख सकती है। समझदार सरकार तो तेल कंपनियों को महीने में एक बार भाव घटाने-बढ़ाने के लिए कहती, और हर महीने अगले-पिछले महीनों का नफा-नुकसान बराबर कर लिया जाता। 
आज देश की जनता को एक होकर यह मांग भी करनी चाहिए कि राज्य सरकारें डीजल-पेट्रोल पर अपना टैक्स घटाएं। केरल ने ऐसा किया है, और हर राज्य ऐसा कर सकते हैं। आज दिक्कत यह है कि सस्ते तेल पर भी केन्द्र सरकार लूट के अंदाज में टैक्स-ड्यूटी लगा रही है, और उसके लग जाने के बाद जो रेट बनता है, उस पर राज्य सरकार का टैक्स लग जाता है, और राज्यों को बिना किसी कोशिश के, बिना किसी जायज हक के, यह अतिरिक्त टैक्स मिल जाता है। गरीबों से ईंधन पर इतना टैक्स लेने के बजाय महंगी गाडिय़ों और दुपहियों पर खरीदी के वक्त ही इतना सालाना टैक्स तय कर देना चाहिए जो कि उनकी औसत खपत के आधार पर हो। महंगी गाडिय़ों को पेट्रोल पंप से तो डीजल-पेट्रोल महंगा अलग से बेचना मुमकिन नहीं है, लेकिन उनसे गाड़ी खरीदते समय ही अधिक टैक्स लिया जा सकता है। इसे लेने का एक दूसरा तरीका उन महंगी गाडिय़ों पर आयकर की छूट को खत्म करके निकाला जा सकता है जो ईंधन का खर्च बताकर आयकर में छूट पाती हैं। आयकर में छोटी गाडिय़ों पर ही ईंधन छूट मिलनी चाहिए, और बड़ी गाडिय़ों को इससे बाहर कर देना चाहिए। इससे भी सरकार बड़ी गाडिय़ों से ईंधन पर एक किस्म से वसूली कर सकेगी। डीजल और पेट्रोल की बिक्री की जगहों पर कोई फर्क करना मुमकिन नहीं है, लेकिन लाखों रूपए दाम की मोटरसाइकिलों को छोटे दुपहियों के दाम पर ईंधन क्यों दिया जाए? केन्द्र सरकार आज मनमाने तरीके से डीजल-पेट्रोल से उगाही कर रही हैं। इसे अधिक युक्तिसंगत और न्यायसंगत बनाने की जरूरत है।(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 जून

इस डिजिटल जमाने में चाल-चलन ठीक रखें

संपादकीय
15 जून 2018


मध्यप्रदेश में आत्महत्या करने वाले, संत कहे जाने वाले, भय्यूजी महाराज के टेलीफोन से तीन नंबरों पर सौ-सौ बार बात होने की खबर आई है। पुलिस की जांच इन दिनों कुछ आसान हो गई है क्योंकि इंसानों ने बिना फोन, बिना सोशल मीडिया, बिना इंटरनेट, या बिना मैसेंजर जीना ही बंद कर दिया है। और पुलिस कमरे के भीतर बैठे-बैठे इन तमाम चीजों को पुख्ता सुबूत आसानी से जुटा लेती है। लोगों के सिमकार्ड या मोबाइल फोन से यह भी पता लग जाता है कि वे किस वक्त कहां पर थे। इसके अलावा लोगों की बातचीत या संदेश भी पुलिस हासिल कर लेती है। इससे परे शहरों में कैमरे बढ़ते चल रहे हैं, और भय्यूजी महाराज के बारे में ही यह जानकारी और तस्वीरें सामने आई कि वे कितनी देर किस रेस्त्रां में किसी महिला के साथ बैठे, और शायद उनके बीच कुछ विवाद भी हुआ। 
इस चर्चा का मकसद इस एक मौत के बारे में बात करना नहीं है, बल्कि जिंदा लोगों को चौकन्ना करना है कि आज वे फोन, कम्प्यूटर, या सोशल मीडिया पर जो कुछ करते हैं, वे सब बाकी जिंदगी के लिए एक पुख्ता सुबूत बन जाते हैं। इसलिए लोगों को अपना चाल-चलन ठीक रखना चाहिए, महज चौकन्ना रहना काफी नहीं है। लोग अपने फोन या कम्प्यूटर पर कुछ मिटा सकते हैं, लेकिन दुनिया के कम्प्यूटरों पर वह बात कहीं न कहीं दर्ज रह जाती है। मतलब यह कि लोग अगर अनायास आत्महत्या करने, या उन्हें कोई मार डाले, या वे किसी हादसे के शिकार हो जाएं, और उसमें किसी जांच की नौबत आए, तो तमाम निजी या गोपनीय बातें सामने आ जाती हैं। और फिर हो सकता है कि इससे लोगों की साख चौपट हो, परिवार का सुख-चैन खत्म हो जाए, या आसपास के लोगों का भरोसा टूट जाए। बिना जिंदगी गए भी अगर लोगों को फोन गुम जाएं, या लैपटॉप चोरी हो जाएं, तो भी लोग एकदम से नंगे हो सकते हैं। इन दिनों लोग कभी सिम बदलवाने, तो कभी फोन बदलवाने, या कुछ सुधरवाने के लिए बाजार जाते हैं, और वहां फोन को मैकेनिक या दुकानदार के पास छोडऩा होता है। ऐसे में उसकी जानकारी आसानी से निकाली जा सकती है, और जो लोग इंटरनेट पर पोर्नो ढूंढते हैं, उन्हें असल जिंदगी की वीडियो क्लिपिंग आसानी से देखने मिल जाती हैं। ये तमाम ऐसी रिकॉर्डिंग रहती हैं जो कि लोग आमतौर पर खुद ही बनाते हैं, और किसी चूक या गलती से उनके फोन या कम्प्यूटर से कोई और इन्हें निकाल लेते हैं। 
डिजिटल जिंदगी एक किस्म से शीशे के मर्तबान में जीती और तैरती हुई मछली की जिंदगी सरीखी होती है। इसमें चाल-चलन ठीक रखने के अलावा और कोई चारा नहीं है। लोगों को ऐसा इसलिए भी करना चाहिए कि वे अगर दुनिया और जिंदगी से आजाद भी हो जाते हैं, तो भी उन्हें अपने परिवार और मित्रों की साख, उनके सुख-चैन का ख्याल रखते हुए अपने तौर-तरीके ठीक रखने चाहिए। जाने वाला तो चले गया, लेकिन घरवालों के लिए बदनामी दे गया, ऐसी स्मृतियां ठीक नहीं हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 जून

भिलाई की मिसाल बाकी देश में भी याद रखने की जिम्मेदारी

संपादकीय
14 जून 2018


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस वक्त छत्तीसगढ़ के भिलाई में इस्पात संयंत्र देख रहे हैं, और यह कारखाना देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सपनों पर बना हुआ देश के सबसे पहले सार्वजनिक कारखानों में से एक था। इसने भारत को फौलाद के मामले में आत्मनिर्भर भी बनाया, दुनिया भर में एक कारोबार भी खड़ा किया, लाखों लोगों को सीधे नौकरी और स्वरोजगार दिए, और कई गुना लोगों को जुड़े हुए उद्योगों में काम का मौका दिया। लेकिन इससे परे एक दूसरी बात भी मोदी के आने के मौके पर कही जा रही है कि वे एक मिनी भारत में आ रहे हैं। भिलाई सचमुच ही अपने पहले दिन से एक मिनी भारत रहा जहां पर देश के हर हिस्से से आए हुए लोगों ने कंधे से कंधा भिड़ाकर काम किया, और साथ-साथ रहना सीखा। सोवियत मदद से बना हुआ यह कारखाना, और इसकी आबादी के रहने का शहर, देश के लिए आज भी एक आदर्श मिसाल हैं। कारखाने के कामगारों के रहने के लिए भी किस किस्म की खुली और हरी-भरी कॉलोनियां होनी चाहिए, अच्छे स्कूल और अस्पताल कैसे होने चाहिए, इन सबका एक बहुत अच्छा उदाहरण भिलाई ने पेश किया। 
लेकिन देश में भिलाई का सबसे बड़ा योगदान एक सांस्कृतिक संगम की शक्ल में रहा जहां रहने से लेकर खाने तक, और हर त्यौहार साथ-साथ मनाने पर लोगों ने न सिर्फ सीखा, बल्कि जारी भी रखा। यह भी याद रखने की जरूरत है कि भिलाई की टाऊनशिप उस वक्त बनी और बसी जब देश में जगह-जगह साम्प्रदायिक दंगे होते थे, देश आजाद हुआ ही था, और लोगों ने लोकतंत्र की बहुत सी बातों को ठीक से सीखा-समझा नहीं था। वैसे वक्त देश के हर प्रदेश से आए हुए लोगों का साथ रहना, अलग-अलग धर्म और खानपान के लोगों का बिना किसी विवाद साथ उठना-बैठना, अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों का आदान-प्रदान जिस तरह भिलाई में हुआ, उसका एक असर बाकी छत्तीसगढ़ पर भी पड़ा, और देश पर भी। भिलाई ने न सिर्फ फौलाद बनाया, बल्कि देश में सद्भावना की फौलादी परंपरा भी शुरू की, आगे बढ़ाई। 
जिन जानकार शोधकर्ताओं ने भिलाई के कामगारों के बीच समाजशास्त्रीय शोध किया है, उन्होंने इस बात को अच्छी तरह दर्ज किया है कि भिलाई इस्पात कारखाने के भीतर अलग-अलग जाति और धर्म के लोग एक साथ बैठकर खाते हैं, और ऐसा नजारा भिलाई के बाहर के निजी कारखानों में देखने नहीं मिलता। और यह कोई एक मिसाल पर टिका हुआ निष्कर्ष नहीं है, यह भिलाई की एक नियमित और निरंतर संस्कृति रही है जो जारी है। भिलाई एक ऐसी मिसाल भी रहा जो कि मजदूर-कामगारों के बच्चों को आगे बढऩे के लिए बराबरी के मौके देते रहा, और वहां इस्पात संयंत्र की अपनी स्कूलें भी देश के मुकाबलों में शानदार प्रदर्शन करते आई हैं। हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में बाकी छत्तीसगढ़ में जितनी कामयाबी हासिल नहीं होती, उससे अधिक कामयाबी अकेले भिलाई से सामने आती है। इसलिए आज जब प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की छत्तीसगढ़ सरकार भिलाई में आईआईटी का शिलान्यास करने का जलसा मना रही है, तो अनेकता में एकता और सद्भावना की यह अनोखी राष्ट्रीय मिसाल अपनी सामाजिक सफलता की वजह से भी सबको खुश होने और गौरव करने का मौका दे रही है। हम यह चाहेंगे कि भिलाई को फौलाद के उत्पादन के रिकॉर्ड के लिए तो जाना ही जाए, लेकिन साथ-साथ देश में सद्भावना का जो फौलादी ढांचा भिलाई के समाज ने पेश किया है, वह भी तमाम लोगों को याद रहे, यह न सिर्फ एक मिसाल है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी भी है कि बाकी देश में इस बात को याद रखा जाए।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 जून

एक आत्महत्या से उठे कुछ सवाल

संपादकीय
13 जून 2018


मध्यप्रदेश के बहुत से लोगों के लिए बीती दोपहर एक सदमा लेकर आई जब इस राज्य के एक प्रमुख संत कहे जाने वाले भय्यूजी महाराज ने खुदकुशी कर ली। उनकी सेहत अच्छी थी, कोई ऐसी बीमारी नहीं थी जिससे थककर वे आत्महत्या करते, लेकिन शायद दिमागी सेहत ठीक नहीं थी, और बिना खुलासे वाले एक तनाव का जिक्र करते हुए उन्होंने दो लाईनें लिखीं, और पिस्तौल से खुदकुशी कर ली। उनके नाम की चर्चा मध्यप्रदेश के बाहर के लोगों के बीच राजनेताओं के बीच मध्यस्थता के लिए, या कि अन्ना हजारे जैसे चर्चित लोगों की भूख हड़ताल खत्म करवाने के लिए होती थी। वे मोटे तौर पर आरएसएस या भाजपा के लोगों के करीब थे, लेकिन कांग्रेस के लोगों के बीच भी उनके अच्छे संबंध थे। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आत्महत्या के बाद कहा कि भय्यूजी महाराज का उनके पास फोन आया था, और वे इस बात से परेशान थे कि मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी के किनारे शिवराज सरकार द्वारा अवैध खुदाई की जा रही है। दिग्विजय ने कहा कि उन्हें मुंह बंद रखने के लिए मंत्री पद का ऑफर भी दिया गया था, और इस बारे में उन्होंने (भय्यूजी महाराज) ने फोन पर बताया था कि उन्होंने यह ऑफर ठुकरा दिया था। दूसरी तरफ भय्यूजी महाराज की पहली पत्नी के गुजर जाने के बाद उन्होंने दूसरी शादी की थी, और पहले की बेटी की दूसरी पत्नी के साथ पट नहीं रही थी, और यह तनाव सार्वजनिक बयानों में भी सामने आया है। 
अब एक गृहस्थ संत की आत्महत्या के पीछे चाहे जो वजहें रही हो, इसके दो पहलुओं पर चर्चा की जरूरत है। पहली बात तो यह कि धर्म या आध्यात्म में गहरी जड़ें होने पर भी कोई व्यक्ति अपने आपको तनाव से बचा नहीं सका, और उसने जान दे देना बेहतर समझा। दूसरी बात यह कि मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की सरकार ने एक हैप्पीनेस मंत्रालय बनाया हुआ है ताकि प्रदेश की जनता को खुश रखा जा सके। इसी सरकार ने कोई आधा दर्जन साधु-संतों को मंत्री का दर्जा देकर कुछ महीने पहले एक बहुत बुरी परंपरा डाली, और इसके लिए उसकी खासी आलोचना भी हुई। ऐसे मंत्रालय के बनने के बाद न तो कर्ज में डूबे किसानों की खुदकुशी बंद हुई, न ही बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं की जिंदगी में खुशी की कोई किरण आई, और न ही वहां जगह-जगह पिटते हुए दलितों की जिंदगी बदली। सरकार का ऐसा मंत्रालय उसका ही मुंह चिढ़ा रहा है। और अब भाजपा और आरएसएस के एक बड़े समर्थक और सहारा माने जाने वाले भय्यूजी महाराज की आत्महत्या और उसे लेकर दिग्विजय सिंह की बात से एक नया बखेड़ा शुरू होता है। क्या वे सचमुच ही नर्मदा के किनारे अवैध रेत खुदाई को लेकर परेशान थे? क्योंकि ऐसी ही बात कुछ दूसरे साधुओं और बाबाओं ने उठाई थी, और जिनका मुंह बंद करने के लिए, जिनका घोषित आंदोलन रोकने के लिए शिवराज सरकार ने उन्हें रातोंरात मंत्रियों का दर्जा दे दिया था। 
कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, और भी बहुत से राजनीतिक पार्टियों में तरह-तरह के संतों और साधुओं, बाबाओं और स्वामियों का बोलबाला हमेशा से रहते आया है। ऐसे लोगों को अपने से कोसों दूर रखने वाले नेहरू की बेटी की वह तस्वीर लोगों को भूले नहीं भूलती जिसमें वे मचान पर टंगे हुए देवरहा बाबा के टंगे हुए पैर के नीचे खड़ी होकर अपना सिर उनके पैरतले रख रही हैं। नेहरू के साथ ही देश में वैज्ञानिक सोच को सोच-समझकर खत्म किया गया, और आज हाल यहां तक पहुंच गया। जो लोग यह मानकर चलते हैं कि धर्म और आध्यात्म की जिंदगी लोगों को खुद को तनाव से मुक्त रखती है, उन लोगों की धारणा तोडऩे के लिए यह ताजा हादसा काफी होना चाहिए। बाकी जिन लोगों की जैसी श्रद्धा हो, भक्ति हो, वे उसी तरह से जिसे चाहें उसे मानें, लेकिन जिस तरह मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार जनता के पैसों का बेजा इस्तेमाल करते हुए बाबाओं को मंत्रियों का दर्जा दे चुकी है, वह लोकतंत्र का एक बड़ा मखौल है। धर्म को राजनीति से दूर रखना चाहिए, और सरकार को भी धर्म के चंगुल में नहीं आने देना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)