एक ट्रेन में भगवान बैठे, देश की बाकी रेलगाडिय़ों में भी तब्दीली की जरूरत
संपादकीय
17 फ़रवरी 2020

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र बनारस से काशी महाकाल नाम की एक मुसाफिर ट्रेन शुरू हुई है जो कि इंदौर तक जाएगी। स्थानीय सांसद होने के नाते मोदी ने इसे झंडी दिखाई, और भीतर एसी-3 के एक डिब्बे में एक बर्थ स्थाई रूप से भगवान शंकर को अलॉट करके वहां मंदिर बना दिया गया है, और ट्रेन में धार्मिक संगीत बजेगा, उसकी सजावट धर्म के हिसाब से होगी। अब यह एक नया सिलसिला सरकार ने एक फैसले के तहत लिया है जो कि मुम्बई जैसे शहर में लोकल ट्रेन में मुसाफिरों की बहुतायत पहले से बलपूर्वक लागू करते आई है। वहां लोकल में गणेशोत्सव के समय रोज के मुसाफिर एक डिब्बे में गणेश प्रतिमा बिठाते हैं, पूजा-आरती करते हैं, और ढोल-मंजीरे संग संगीत भी करते हैं। अब इस ट्रेन के साथ यह काम सरकारी स्तर पर शुरू कर दिया गया है, जिसका अंत पता नहीं कहां जाकर होगा।
अब केन्द्र की मोदी सरकार के सबसे मजबूत भागीदार, अकाली दल के सामने यह चुनौती होगी कि अमृतसर तक जाने वाली मुसाफिर रेलगाडिय़ों में वह स्वर्ण मंदिर के तीर्थयात्रियों के हिसाब से कैसी सजावट करवाए, और कैसा संगीत बजवाए। हिन्दुस्तान में अकेले अमृतसर में शुरू से ही आकाशवाणी से स्वर्ण मंदिर की सुबह की गुरूवाणी का जीवंत प्रसारण होते आया है। इसके बाद नीतीश कुमार भी एनडीए के एक बड़े भागीदार हैं, और बिहार में इसी बरस चुनाव भी है, ऐसे में नीतीश कुमार की यह जिम्मेदारी हो जाती है कि उनके राज्य के बोधगया के हिसाब से उन्हें कुछ रेलगाडिय़ों को बुद्ध को समर्पित करवाना चाहिए, और आसपास से निकलने वाली ट्रेनों में एसी-3 नहीं, बल्कि एसी-1 में बुद्ध को बर्थ दिलवानी चाहिए, और बौद्ध संगीत भी बजना चाहिए। इसके बाद कई बार भाजपा की सरकार बनवाने वाले राजस्थान के अजमेर जाने वाली ट्रेन में वहां की दरगाह के हिसाब से साज-सज्जा होनी चाहिए, और पूरे रास्ते उसमें ख्वाजा की कव्वाली भी बजनी चाहिए। इससे कम में राजस्थान का सम्मान नहीं होगा, और प्रधानमंत्री मोदी के लोग बार-बार देश को याद दिलाते हैं कि वे केवल भाजपा के प्रधानमंत्री नहीं हैं, वे पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं इसलिए अब मौका है कि देश भर के लोग अपने-अपने तीर्थस्थानों के हिसाब से रेलगाडिय़ां बनवा लें। कोलकाता जाने वाली गाडिय़ों में काली मंदिर बनाए जा सकते हैं, और प्रधानमंत्री की निजी आस्था के हिसाब से बेलूर मठ की साज-सज्जा वाली कुछ गाडिय़ां भी बनाई जानी चाहिए। तिरूपति जाने वाली गाडिय़ों की साज-सज्जा कैसी होगी यह एकदम साफ है, और उस ट्रेन में खाने की जगह तिरूपति के प्रसाद के विख्यात लड्डू मिलने चाहिए। मुम्बई की कुछ गाडिय़ां हाजी अली के हिसाब से, कुछ गाडिय़ां पारसियों के अग्नि-मंदिरों के हिसाब से, कुछ गाडिय़ां सिद्धि विनायक के गणेश की साज-सज्जा की होनी चाहिए। शिरडी के सांई बाबा के हिसाब से भी पास के स्टेशन से गुजरने वाली गाड़ी बननी चाहिए, और असम में भाजपा की सरकार है, वहां की कामाख्या के हिसाब से भी गाडिय़ां सजनी चाहिए।
फिर जब इतनी धार्मिक भावना से सब कुछ हो रहा है, तो इन ट्रेनों में जैमर लगाकर मोबाइल-इंटरनेट बंद करवाने चाहिए, क्योंकि जो ईश्वर की ट्रेन में बैठे हैं, उन्हें इधर-उधर की बात करने, नेट-सर्फिंग करने के बजाय केवल कीर्तन पर ध्यान देना चाहिए। यह भी याद रखना होगा कि जिस ट्रेन में खुद ईश्वर को बर्थ अलॉट की गई है, उसमें से शौचालयों को तो हटाना ही होगा क्योंकि ईश्वर के आसपास ऐसा रहना ठीक नहीं है। बल्कि बेहतर तो यह होगा कि जिन पटरियों से यह ट्रेन गुजरेगी, वहां पूरे रास्ते लोगों को पखाने से रोकना होगा, ठीक उसी तरह जिस तरह आज गुजरात के अहमदाबाद में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की नजरों से झोपडिय़ों को रोकने के लिए ऊंची दीवार बनाई जा रही है। अभी तक तो ईश्वर मंदिर-मस्जिद या चर्च-गुरूद्वारे में रहते थे, इसलिए केवल उन जगहों को शौचालय-मुक्त कर देना काफी रहता था, लेकिन अब महाकाल काशी से इंदौर जाएंगे, और उनके गुजरते हुए पटरियों के किनारे शौच से धार्मिक भावनाएं बहुत बुरी तरह आहत होंगी। इसलिए पटरियों से पांच सौ मीटर दूर ही ऐसे गंदे काम की इजाजत देनी चाहिए जिस तरह कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईवे से पांच सौ मीटर दूर शराबखानों को इजाजत दी थी।
भारत चूंकि एक धर्मनिरपेक्ष देश है, और यहां पर सर्वधर्म समभाव की बात कही जाती है, इसलिए देश की बाकी ट्रेनों को भी उनकी मंजिलों के तीर्थस्थानों के हिसाब से ढालने की जरूरत है, क्योंकि आज देश के बहुत से लोगों को यह लग रहा है कि इस देश का अब भगवान ही मालिक है। लेकिन चूंकि देश धर्मनिरपेक्ष है और भगवान शब्द केवल हिन्दुओं के हिसाब से रहता है, इसलिए बाकी धर्मों को भी बराबरी का सम्मान देते हुए इस नौबत को बदलना चाहिए, ताकि लोगों को लगे कि इस देश का अब ईश्वर ही मालिक है, ईश्वर शब्द में सभी धर्म आ जाते हैं। रेलगाडिय़ां पूरे भारत की एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है, और उसे ही सभी लोगों की भावनाओं का, खासकर धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने में जोता जा सकता है, इसलिए देश के बाकी तीर्थस्थानों के लिए भी गाडिय़ों को चलाया जाए, वर्तमान गाडिय़ों को बदला जाए, और देश में आस्था के एक नए युग को शुरू किया जाए। ईश्वर के आशीर्वाद से ही यह देश पटरी पर लौट सकता है, और लौटेगा। देश की मोबाइल कंपनियां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वैसे भी दुकानें बंद कर सकती हैं, ऐसे में लंबे-लंबे सफर में कीर्तन, कव्वाली, और दूसरे धर्मों की आराधना का बड़ा सहारा रहेगा।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
अखबार निचोड़ेंगे तो लहू टपकेगा...
संपादकीय
16 फ़रवरी 2020

आज एक हिन्दी अखबार की दो-तीन पन्नों पर छाई हुई सुर्खियां देखना भी भयानक है, उनके भीतर की जानकारी पढऩा तो और अधिक भयानक होगा ही। खबरों की हैडिंग्स हैं- शराबी पति ने इतना पीटा कि मौत, बेटे-बेटी के सामने बीवी को मौत के घाट उतारा, चरित्र पर संदेह हुआ तो मार डाला पत्नी को, बेटी करती थी मोबाइल पर ज्यादा बात, दूसरी जात में शादी के डर से बाप ने कर दी हत्या, अवैध संबंध के शक में बीवी को मार डाला (ऊपर की खबर से अलग, दूसरे शहर की खबर)। छत्तीसगढ़ में एक दिन में एक अखबार के एक संस्करण की इन खबरों से परे दूसरे इलाकों तक सीमित संस्करणों में और भी ऐसी खबरें हो सकती हैं। लेकिन इसमें एक अजीब और हैरान करने वाली बात यह है कि ये सारे जुर्म, ये तमाम हिंसा, अपने ही परिवार के लोगों के खिलाफ है। मतलब यह कि परिवार में एक की मौत, और दूसरे को जेल। ऐसे में घर पर अगर बच्चे ही बच गए, तो उनकी जिंदगी जीते जी ही खत्म सरीखी, और समाज की हिंसा को न्यौता देती हुई रह जाएगी।
पारिवारिक हिंसा के बारे में अभी कुछ दिन पहले ही हमने इसी जगह पर लिखा भी था जब एक आदमी ने अपनी बीवी की हत्या कर दी, जेल चले गया, और दो, चार, और छह बरस की तीन बेटियों को कचरा बीनने वाले रिश्तेदारों के साथ रहने के अलावा और कोई चारा नहीं रहा। इसी अखबार में इन बच्चियों की खबर छपने के बाद ऐसे बेसहारा बच्चों के लिए चलने वाले एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के स्थानीय केन्द्र के लोग इन बच्चियों की मदद को पहुंचे, लेकिन गरीब परिवार ने उन्हें इस सुविधाजनक केन्द्र में भेजने से भी मना कर दिया। परिवार के भीतर हिंसा से नुकसान दोहरा होता है, एक या अधिक की मौत, और एक या अधिक को कैद। फिर हिन्दुस्तान में जिस तरह अदालतों का हाल है, परिवार के बचे हुए लोग उनमें तबाह हो जाते हैं। अब सवाल यह उठता है कि परिवार के भीतर होने वाली ऐसी हिंसा को पुलिस भी कैसे रोक सकती है, अगर पहले से उसके पास पारिवारिक तनाव या हिंसा की शिकायत न आई हो, और पहली बार में ही इतनी बड़ी हिंसा हो जाए, तो पुलिस के करने का कुछ नहीं रहता।
लेकिन समाज में हिंसा पर काबू तो लगना ही चाहिए, इसलिए यह सोचने की जरूरत है कि इसे कम कैसे किया जा सकता है। सबसे पहले तो परिवार के भीतर ही दूसरे लोग इस तनातनी को घटा सकते हैं, और बीच-बचाव कर सकते हैं। अगर परिवार के भीतर ऐसी क्षमता नहीं है, तो अड़ोस-पड़ोस के लोग या साथ में काम करने वाले लोग, लोगों की हिंसक सोच को रोक सकते हैं। लेकिन जो एक बात ऐसी तमाम हिंसा के पीछे हावी दिखती है वह नशे की है। ऐसे अधिकतर मामले नशे में होते हैं, और गरीबों के बीच अपनी तमाम गरीबी के बावजूद अधिक नशा करने का चलन अधिक दिख रहा है। अब किसी की नशे की लत तो रातों-रात लगती नहीं है, इसलिए घर-परिवार, सहकर्मी और पड़ोस के लोग, लोगों को नशे से रोकने की कोशिश कर सकते हैं। इन दिनों समाज में बहुत सारे संगठन तरह-तरह से लोगों की मदद करते दिखते हैं, और ऐसे लोग भी अलग-अलग बस्तियों में जाकर, या शराब दुकानों पर जाकर लोगों को नशे के नुकसान समझा सकते हैं, हो सकता है कि कुछ लोग धीरे-धीरे समझ की तरफ लौटें।
समाज और सरकार की यह मिलीजुली जिम्मेदारी रहनी चाहिए कि परिवार के भीतर नौबत हिंसा तक पहुंचने, या नशे की लत खतरनाक हद तक पहुंचने के खिलाफ परामर्श की सहूलियत उपलब्ध कराई जाए। आज तो देश में मनोचिकित्सक, परामर्शदाता इतने कम हैं कि वे अपने चैंबरों में मोटी फीस देने वाले लोगों को भी मुश्किल से नसीब हैं। विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे सामाजिक-पारिवारिक, या वैवाहिक परामर्श के कुछ छोटे कोर्स भी चलाए जिन्हें पूरा करने वाले लोग चाहे उससे कमा-खा न सकें, आसपास कुछ लोगों की मदद तो कर सकें। एक बात यह भी लगती है कि आज हिन्दुस्तान की हवा में जितने किस्म की हिंसा फैलाई जा रही है, फिर चाहे वह किसी धर्म या जाति के लोगों के खिलाफ क्यों न हों, उस हिंसक सोच का असर लोगों की दिमागी हालत पर होता है, और जब मारने को दूसरे धर्म के लोग न मिलें, तो हो सकता है कि लोग घर पर भी अपनी हिंसक सोच को पूरा करते हों। सजा पाने लायक हिंसा करने वाले लोगों के दिल-दिमाग पर सजा का खतरा कम दिखता है, और उनकी हिंसक भावना अधिक हावी दिखती है। आज समाज के जिम्मेदार लोगों को आसपास के ऐसे पारिवारिक तनाव में दखल देकर बीच-बचाव की कोशिश करनी चाहिए। आज की यह बात बहुत विचारोत्तेजक नहीं है, लेकिन यह गंभीर बात करना बहुत जरूरी है क्योंकि इसके बारे में अखबारी सुर्खियों से परे सोचना शुरू हो, कुछ करना शुरू हो।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
अपने ही पौराणिक इतिहास को नकारता आज का हिन्दुस्तान...
संपादकीय
15 फ़रवरी 2020

हिन्दुस्तान की 21वीं सदी 18वीं सदी से भी अधिक पाखंड से भरी हुई है। देश के पौराणिक इतिहास को देखें तो सदियां शुरू होने के पहले की कहानियां बताती हैं कि किस तरह कृष्ण और राधा का प्रेम था जो कि विवाह से परे का था, किस तरह कृष्ण गोपियों के साथ श्रंगार रस में डूबी रासलीलाएं करते थे, और किस तरह हर पौराणिक काल में प्रेम की कहानियां भरी हुई थीं। आज झंडा-डंडा गिरोह प्रेम के पर्व, वेलेंटाइन डे पर जिस तरह हिंसा करते घूमता है, वही गिरोह इस देश में स्टेशनों के नाम संस्कृत में लिखने की मांग करता है, उर्दू में लिखे गए नाम हटाने की मांग करता है, और इस बात को अनदेखा करता है कि हिन्दुस्तान का संस्कृत-साहित्य किस तरह प्रेम और देह के श्रंगार रस से भरा हुआ रहा है।
प्रेम की देसी कहानियों से भरे हुए इस देश में आज प्रेम किसी कुंवारी लड़की की अवैध कही जाने वाली, और अवांछित समझी जाने वाली संतान की तरह का अनचाहा काम हो गया है। आज नफरत का बोलबाला है, और प्रेम को देशनिकाला है। ऐसे देश में महाराष्ट्र के अमरावती जिले में कल प्रेमपर्व वेलेंटाइन-डे पर एक कॉलेज में छात्राओं को इक_ा करके उनको सार्वजनिक रूप से यह शपथ दिलवाई कि वे कभी प्रेम नहीं करेंगी, और प्रेम-विवाह भी नहीं करेंगी, वे माता-पिता की मर्जी से ही शादी करेंगी। कॉलेज का यह फैसला और उसकी हरकत देश के आज के माहौल में बड़ी तारीफ की हकदार है क्योंकि यह माहौल कट्टरता और नफरत से भरा हुआ है, और इसमें प्रेम की कोई गुंजाइश छोड़ी नहीं गई है। यह एक अलग बात है कि केन्द्र सरकार के बनाए हुए कानून देश में सवर्णों के दलित-आदिवासियों से शादी पर लाखों का नगद पुरस्कार देते हैं, और समाज यह सोचता है कि ऐसी शादियां बिना प्रेम के ही हो जाएंगी। यह पूरा पाखंड सिर्फ धिक्कार के लायक है, और नौजवान पीढ़ी में ऐसी अवैज्ञानिक सोच भरने वालों के खिलाफ देश-प्रदेश के मानवाधिकार आयोगों को, महिला आयोगों को कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे कॉलेजों की मान्यता खत्म करनी चाहिए।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ऐसा दुराग्रह महज हिन्दुस्तान में हो। इस देश के लोगों की नजरों में जो असली पश्चिम है, उस अमरीका में भी ऐसा देखने मिलता है, और वहां ईसाई बिरादरी के बड़े-बड़े जलसे किए जाते हैं जिनमें किशोरियां अपने माता-पिता की मौजूदगी में ऐसी कसमें खाती हैं कि शादी के पहले तक वे अपना कौमार्य बनाए रखेंगी, और उनके पिता उनकी हिफाजत करेंगे, वे अपने पिता के प्रति जवाबदेह रहेंगी। यह सोच खुद अमरीका के भीतर एक बहुत ही छोटे तबके की सोच है, और वहां के आज के सामाजिक वातावरण के भीतर इसे एक बीमार सोच भी माना जाता है, लेकिन यह सोच वहां है तो सही। यह सोच किसी लड़के को ऐसी कसम नहीं दिलाती, न अमरावती में, न अमरीका में। कौमार्य का सारे का सारा बोझ महज लड़कियों पर है, और लड़के तो मानो अंगूठी में लगे हुए हीरे की तरह हैं जिनका कि कुछ नहीं बिगड़ सकता। हिन्दुस्तानी समाज की यही सोच बलात्कार की शिकार लड़की के बारे में लिखती है कि उसकी इज्जत लुट गई। समाज यह नहीं कहता कि जुर्म करने वाले बलात्कारी की इज्जत लुटी है जो कि सजा पाएगा, जेल जाएगा, और अपने परिवार को मुसीबत में छोड़ जाएगा, एक बेकसूर लड़की या महिला के साथ ऐसी हिंसा कर चुका है। बलात्कारी की इज्जत नहीं लुटती, बलात्कार की शिकार लड़की की इज्जत लुटना कहा जाता है! ऐसी ही मर्दाना सोच लड़कियों को प्रेम करने से रोक रही है, प्रेम विवाह करने से रोक रही है। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले अपने आपको बापू कहने वाला आसाराम छत्तीसगढ़ आया था, और उस वक्त वह बड़ा इज्जतदार माना जाता था। उस वक्त उसने रमन सिंह की भाजपा सरकार पर असर डालकर वेलेंटाइन-डे को मातृ-पितृ दिवस में बदलवा दिया था, और सरकारी स्कूल-कॉलेज में भी यह नया त्यौहार मनाया जाने लगा था। यह एक अलग बात है कि बाद में यही बलात्कारी बापू अपने एक भक्त परिवार की नाबालिग लड़की से बलात्कार के बाद कैद भुगत रहा है, और वैसा ही जुर्म उसके बलात्कारी बेटे ने भी किया, और जेल गया। नौजवान पीढ़ी की प्राकृतिक भावनात्मक और देह की जरूरतों को कुचलकर इस किस्म की एक पाखंडी नैतिकता को थोपकर लोगों को लगता है कि वे हिन्दुस्तान का भला कर रहे हैं। वे दरअसल सड़कों पर हिंसा बढ़ा रहे हैं, नौजवान पीढ़ी को अपनी मर्जी की जिंदगी जीने से रोक रहे हैं। ऐसे बीमार दिमागवाले कॉलेज संचालकों के खिलाफ अदालतों में केस चलना चाहिए कि उन्होंने संविधान के किस प्रावधान के तहत ऐसी शपथ दिलवाई है।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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