हुकूमत और जंग से जुड़ी हुई न दिखने वाली मौतों की कहानी

  17 अप्रैल 2022


इंटरनेट पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर का एक वीडियो मौजूद है जिसमें वे ब्रिटेन के एक सबसे बड़े विश्वविद्यालय में एक विषय पर वाद-विवाद करते दिख रहे हैं। उन्होंने ऑक्सपोर्ड विश्वविद्यालय के एक मशहूर वाद-विवाद में अपने इस तर्क को सामने रखा कि ब्रिटिश राज में किस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट किया। यह बहस 2015 में ऑक्सपोर्ड में हुई थी, जिसकी एक पुरानी गौरवशाली परंपरा है। लेकिन इस ब्रिटिश विश्वविद्यालय की बहस की इस गौरवशाली परंपरा वाला गौरव हिन्दुस्तान के ब्रिटिश राज में नहीं था, और अंग्रेजों ने सोच-समझकर भारत का औद्योगिकीकरण रोका और तबाह किया था ताकि भारत ब्रिटिश कारखानों के सामानों का मोहताज रहे। इस बहस के अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हुए थरूर ने एक किताब भी लिखी जिसे अंग्रेजी राज की कटु आलोचना कहा जा सकता है।

लेकिन उस 2015 की बहस पर लिखना आज का मकसद नहीं है। अभी इसी पखवाड़े एक मेडिकल अध्ययन का नतीजा सामने रखा गया है जिसका मानना है कि आज के हिन्दुस्तानी, बांग्लादेशी, और पाकिस्तानी, डायबिटीज का अधिक खतरा रखते हैं, और इसका जिम्मेदार इस इलाके पर रहा ब्रिटिश राज है। इतिहास बताता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राज के दौरान इन तीनों देशों के लोगों को इतने अधिक अकालों का सामना करना पड़ा कि  लोगों के बदन भूख का शिकार हो-होकर डीएनए या जींस में ऐसा फेरबदल करते चले गए कि आने वाली पीढिय़ों को जब जो खाने मिला, उन्होंने खाना शुरू कर दिया कि पता नहीं कब खाना मिलना बंद हो जाए।

एक रिपोर्ट बतलाती है कि भारतीय उपमहाद्वीप ने ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजी राज के शासन में 31 अकाल झेले, जिनमें से अकेले बंगाल के अकाल में 30 लाख लोग भूख से मारे गए थे। आज पश्चिम के एक बड़े विश्वविद्यालय के अध्ययन का नतीजा बतला रहा है कि दक्षिण एशिया के लोगों को डायबिटीज का खतरा बाकी दुनिया के मुकाबले 6 गुना अधिक है। यह अध्ययन बताता है कि भूख से मौत तक पहुंचते हुए ऐसे बदन अगली पीढ़ी तक जो जींस दे जाते हैं, वे जींस एक भूखे इंसान को बनाते हैं जो कि खाने को कुछ मिलते ही पेट भर लेने के चक्कर में रहते हैं। नतीजा यह होता है कि अमरीकियों के मुकाबले बहुत कम खाने वाले हिन्दुस्तानी भी बिना वजन अधिक हुए डायबिटीज के शिकार अधिक होते हैं। वैज्ञानिकों का यह निष्कर्ष है कि अविभाजित भारत के इन तीनों देशों की आबादी का बदन अपने भीतर चर्बी को बचाए रखता है, जमा करते रहता है कि जाने कब भूखे रहने की नौबत आ जाए, और उस वक्त यही चर्बी बदन को कुछ वक्त चलाने के काम आएगी, और इसी का एक नतीजा यह है कि लोग डायबिटीज के शिकार होते हैं।

हिन्दुस्तान के जो लोग आज भी अंग्रेजों की छोड़ी गई सामंती प्रथा को पोशाक और खानपान में, सामाजिक रीति-रिवाजों में ढो रहे हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जिस गोरी नस्ल की छोड़ी गई ऐसी गंदगी का टोकरा वे सिर पर ढोते हैं, उस गोरी सरकार ने इन देशों की आबादी को पीढ़ी-दर-पीढ़ी तबाह करके छोड़ा है।

लेकिन इस मामले पर भी हम आज बात को खत्म करना नहीं चाहते हैं। आज की दूसरी खबर यह है कि दुनिया की डबलरोटी की टोकरी कही जाने वाला यूक्रेन आज रूसी हमले के बाद एक जंग में फंसकर अनाज बाहर भेजने का अपना कारोबार खो बैठा है, और बाजार में अनाज की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं। गेहूं और मक्का जैसे अनाज यूक्रेन और रूस से ही सबसे अधिक निर्यात होते हैं, और आज वहां से कारोबार बंद हो चुका है। इसका जो असर यूक्रेन पर पडऩा है वह तो अलग है, लेकिन दुनिया से बहुत से भूखे देशों में यूक्रेन से आया हुआ अनाज जाता था, जो कि आज अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को भी नहीं मिल रहा है। नतीजा यह है कि अफ्रीका के गरीब और भूखे, कुपोषण के शिकार देशों में अंतरराष्ट्रीय मदद से दिया जाने वाला अनाज भूखों तक आधा दिया जा रहा है। जो पहले से कुपोषण के शिकार थे, उन्हें मिलने वाला अनाज अब आधा हो गया है, और आगे जाकर यह कितना मिल पाएगा इसका कोई ठिकाना नहीं है क्योंकि रूस को कमजोर करने की नीयत से पश्चिमी देश यूक्रेन को किस हद तक हथियार देते रहेंगे इसका कोई ठिकाना नहीं है, और इन हथियारों के चलते यूक्रेन कब तक रूस के सामने डटा रहेगा, इसका भी कोई ठिकाना नहीं है। नतीजा यह है कि जब तक रूस के हमले के सामने यूक्रेन को डटाए रखा जा सकता है, तब तक पश्चिम अपनी जेब खाली करके भी रूस को कमजोर करना जारी रखेंगे, फिर चाहे इसके लिए यूक्रेन के आखिरी नागरिक का खून भी बह जाए।

यह बड़ी अजीब बात है कि दुनिया में भूख और रंग का इतना गहरा रिश्ता दिखता है। अफ्रीका के जो देश सबसे अधिक काले लोगों के हैं, वे भूख और कुपोषण के सबसे बुरे शिकार भी हैं। हिन्दुस्तान में भी अगर देखें तो अधिक गरीब लोग अधिक काले रंगों के हैं। अब दुनिया के और मानव जाति के इतिहास के अधिक जानकार लोग शायद इस बात को बेहतर जानते हों कि इंसानों के बदन के रंग का उनकी गरीबी से क्या इस तरह का कोई रिश्ता सचमुच ही है, या फिर आज हमें ही सदियों से अकाल के शिकार चले आ रहे देशों के काले लोगों को देख-देखकर यह बात सूझ रही है?

ये बातें टुकड़ा-टुकड़ा हैं, लेकिन जब कभी दुनिया का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें इन्हें जोडक़र शायद ही लिखा जाएगा, जंग को लेकर मौतों के आंकड़े अलग लिखे जाएंगे, और भूख से, कुपोषण से मौतों के आंकड़े अलग लिखे जाएंगे। लेकिन अविभाजित हिन्दुस्तान पर विदेशी हमलों की वजह से, और विदेशी हुकूमत के मातहत जीते हुए जिस तरह दसियों लाख लोग भूख से मरे, और उनके बाद दसियों करोड़ लोग पुरखों की उस भूख के चलते डायबिटीज के शिकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते चल रहे हैं, उसका रिश्ता कम ही लोग कायम करेंगे। आज यूक्रेन या रूस से अनाज बाहर न निकलने की वजह से यमन, इथोपिया जैसे बहुत से देशों में अनाज की सप्लाई बहुत बुरी तरह गिरी है, और इसी अनुपात में वहां पर इंसानों की सांसें भी गिरेंगी। जंग से मौतों के साथ इन मौतों को भी जोडक़र देखने की जरूरत है, और जंग की लागत गिनते हुए भुखमरी से मौतों की इन इंसानी जिंदगियों की कीमत भी जोडऩा चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 अप्रैल 2022


 (Daily Chhattisgarh)

शरणार्थियों की जिम्मेदारी आऊटसोर्स करने की सोच क्या खारिज करने लायक?

  16 अप्रैल 2022

 

सदी के शुरू होने से अब तक पिछले बीस बरसों में दुनिया के कुछ देशों से वहां के गृहयुद्ध की वजह से, या वहां पर अमरीकी हमलों की वजह से लाखों लोग देश छोडक़र निकले, और समंदर की लहरों पर जान पर खेलते हुए योरप के अलग-अलग देशों पर पहुंचने की कोशिश की। खुद को और बच्चों को बचाने का संघर्ष भी था, और एक बेहतर जिंदगी की उम्मीद भी थी। योरप के अधिकतर देशों ने कम या अधिक संख्या में ऐसे शरणार्थियों को अपने यहां जगह दी, हालांकि ऐसा फैसला लेने वाली सत्तारूढ़ पार्टियों को वोटरों के एक ऐसे तबके की नाराजगी भी झेलनी पड़ी जो कि अपनी सरहदों को अपनी संस्कृति के लोगों के लिए बंद रखना चाहता है। ऐसे लोग योरप के हर देश में हैं, और योरप ही क्यों, हिन्दुस्तान में भी ऐसे लोग हैं जो कि आज रोहिंग्या शरणार्थियों को इस जमीन पर पांव भी रखना नहीं देना चाहते। खैर, अभी बात योरप की चल रही है जहां पर यूक्रेन पर रूसी हमले के चलते दसियों लाख यूक्रेनी शरणार्थियों का दबाव आसपास के देशों पर पड़ रहा है, और यह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बड़ा शरणार्थी मोर्चा बन चुका है।

दुनिया जब सभ्य होने का दावा करती है तो सभ्यता का यह तमगा कई जिम्मेदारियों के साथ आता है, इनमें से एक शरणार्थियों को जगह देना भी है। श्रीलंका से गए हुए तमिल शरणार्थी भी योरप के बहुत से देशों में जगह पाकर वहां बसे हुए हैं, और काम कर रहे हैं। बहुत से मुस्लिम देशों से शरणार्थी योरप पहुंच रहे हैं, और वहां के शरण के नियमों के मुताबिक वे अगर यह साबित कर पाते हैं कि अपने देश लौटने पर उनकी जान को खतरा है, तो उन्हें वहां जगह मिलने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में अभी ब्रिटेन में एक नया मसला उठ खड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने वहां पहुंचने वाले शरणार्थियों को एक अफ्रीकी देश रूआंडा भेजने की योजना बनाई है जहां पर ब्रिटिश खर्च से शरणार्थी कैम्प बनाए जा रहे हैं, और ब्रिटेन की सरहद तक पहुंचे हुए लोगों को रूआंडा भेजा जा रहा है जहां उनके रहने-खाने की लागत ब्रिटिश सरकार उठाएगी। इस बात को लेकर संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी ने इस योजना को खारिज कर दिया है, और कहा है कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। इसके खिलाफ तर्क बहुत से हैं। पहला तर्क तो यही है कि रूआंडा का मानवाधिकार का रिकॉर्ड बहुत ही खराब रहा है, और ऐसे देश में शरणार्थी कैम्प बनाकर या बनवाकर ब्रिटेन जैसा देश रूआंडा को एक अनैतिक मान्यता दे रहा है। जानकार लोग रूआंडा को एक खतरनाक जगह भी मान रहे हैं लेकिन बोरिस जॉनसन का कहना है कि वह दुनिया में एक सबसे सुरक्षित देश है, और ब्रिटिश सरकार ने रूआंडा की सरकार के साथ एक अनुबंध भी किया है जिसके तहत मोटरबोट से ब्रिटिश सरहद से शरणार्थियों को रूआंडा पहुंचाना शुरू भी हो गया है। एक ब्रिटिश अखबार ने जब सरकार की इस योजना के बारे में अपने पाठकों के बीच सर्वे किया तो पता लगा कि 47 फीसदी पाठक इससे सहमत हैं, और कुल 26 फीसदी इसके खिलाफ हैं। यह बात सही है कि दुनिया के कई देशों में पिछले दशकों में जिस तरह बहुत से आतंकी हमलों में ऐसे शरणार्थी शामिल रहे हैं, उनकी वजह से पश्चिम के देशों में इन्हें जगह देने के खिलाफ एक जनमत बना हुआ है। यह बात भी है कि मुस्लिम देशों से आने वाले इन शरणार्थियों का धर्म और लोकतंत्र के प्रति, महिलाओं के प्रति, मानवाधिकार के प्रति नजरिया पश्चिम की स्थानीय संस्कृति से बिल्कुल ही अलग है, और उन्हें वहां जगह देकर लोग अपने आपको खतरे में भी महसूस करते हैं। इसलिए भी शरणार्थियों के खिलाफ इन अपेक्षाकृत विकसित देशों में एक माहौल बना हुआ है, और आज जब फ्रांस में राष्ट्रपति का चुनाव चल रहा है, तो वहां भी शरणार्थी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बने हुए हैं।

आज जब पश्चिम के कुछ देशों में संकीर्णतावादी, कट्टर और राष्ट्रवादी पार्टियां शरणार्थियों के मुद्दे पर बेहतर चुनावी संभावनाएं पा रही हैं, तब इन देशों की सत्तारूढ़ पार्टियों को भी यह सोचना पड़ रहा है कि शरणार्थियों का लगातार बना हुआ दबाव उन्हें किस हद तक मंजूर करना चाहिए, और कब जाकर इसके लिए मनाही कर देनी चाहिए। जब अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को अपनी घरेलू चुनावी संभावनाओं के साथ रखकर तौलकर देखना होता है, तो मुश्किल फैसले लेना कोई आसान काम नहीं होता है। यह सिलसिला अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों पर एक बड़ा तनाव भी डाल रहा है। आज यूक्रेन से जिस तरह दसियों लाख लोग घरबार, और सभी कुछ खोकर निकल चुके हैं, तो उसका दबाव दूर बसे अमरीका तक भी पड़ रहा है जिसने एक लाख शरणार्थियों को मंजूर करने की घोषणा की है।

अब चूंकि किसी देश की यह कोई जिम्मेदारी नहीं होती है कि वे शरणार्थी मंजूर करें, या कितने शरणार्थी मंजूर करें, तो ऐसे में इस बारे में भी सोचने की जरूरत है कि किन देशों में शरणार्थियों के लिए ऐसे कैम्प बनाए जा सकते हैं जिनका खर्च विकसित और संपन्न देश उठाएं, और जो एक किस्म से कमजोर देशों के लिए एक कमाई का जरिया भी बन सके। अब रूआंडा में अगर ब्रिटिश खर्च से ऐसे शरणार्थी बसाए जा रहे हैं, तो दुनिया के दूसरे देश भी इस बारे में सोच सकते हैं। आज भी दुनिया का संपन्न हिस्सा, कई किस्म के प्रदूषण वाले कारखानों को दुनिया के विपन्न हिस्से में खिसकाते चलता है, और अधिक मजदूरी, अधिक प्रदूषण वाले बहुत से काम अब गरीब देशों में ही होते हैं, और वहां से सामान बनकर संपन्न दुनिया में जाता है। इसलिए अगर अपने देशों में शरणार्थियों को जगह देने के बजाय कुछ देश कुछ तीसरे देशों में उनके लिए इंतजाम करते हैं, तो यह एकदम से खारिज कर देने वाली सोच नहीं है, फिर चाहे संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी इसे खारिज क्यों न करती रहे। हर देश के लिए शायद यह मुमकिन नहीं होगा कि वह बाहर से आते शरणार्थियों को अपने देश में अंतहीन जगह देता चले। अपने लोगों की हिफाजत से लेकर अपनी सामाजिक संस्कृति की हिफाजत तक, बहुत से ऐसे मुद्दे हो सकते हैं जिन पर किसी देश की सरकार को अपनी अंतरराष्ट्रीय नैतिक जिम्मेदारी छोडक़र भी फैसला लेना पड़े। इस बारे में सोचना चाहिए कि क्या कुछ देशों की अर्थव्यवस्था में ऐसे शरणार्थियों से कोई मदद मिल सकती है जिनका अपना देश जिंदा रहने लायक नहीं रह गया है, लेकिन जिन्हें मंजूर करना पश्चिम के देशों के लिए मुमकिन भी नहीं रह गया है। इसे एकदम से खारिज करने के बजाय सभी पक्षों के फायदे के बारे में सोचना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 अप्रैल 2022


 (Daily Chhattisgarh)

सबको मालूम है दोजख की हकीकत लेकिन दिल के बहलाने को भागवत का खयाल अच्छा है...

15 अप्रैल 2022

 

मध्यप्रदेश के खरगोन में पहले कई बार साम्प्रदायिक हिंसा हो चुकी है। अब वहां संजय नगर नाम के एक इलाके में कई हिन्दू परिवारों ने अपने घरों के बाहर यह मकान बिकाऊ है लिख दिया है। बड़े अफसरों का कहना है कि यह बाहरी लोगों की करतूत है जो इस इलाके में साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाडऩा चाहते हैं लेकिन उनके सामने ही ऐसे मकान मालिक बतलाते हैं कि उन्होंने खुद ने यह लिखा है। लिखने वाले हिन्दू परिवारों के लोग हैं जो बतलाते हैं कि हर कुछ बरस में यहां साम्प्रदायिक तनाव होता है, और कभी दंगाई आग लगा देते हैं, तो कभी घर का सामान लूटकर ले जाते हैं इसलिए इसे बेचने के अलावा अब और कोई रास्ता नहीं है। अभी रामनवमी के समय हुए साम्प्रदायिक तनाव में लोगों के घरों को जला दिया गया, और सामान लूट लिया गया। यह इलाका एक मुस्लिम बहुल इलाका है जिसमें 20-25 गरीब हिन्दू परिवार रहते हैं। हर कुछ बरस में होने वाले साम्प्रदायिक तनाव ने इन गरीबों की जिंदगी तबाह कर दी है। मध्यप्रदेश में हाल ही में हुए साम्प्रदायिक तनाव को लेकर सरकार सडक़ों पर इंसाफ करते हुए वीडियो देख-देखकर हमलावर दिखते लोगों के घर-दुकान पर बुलडोजर चलवा रही है, और यह नौबत 15 बरस के भाजपा शासन के बाद आई है।

आज देश में जगह-जगह साम्प्रदायिक तनाव बढ़ा हुआ दिख रहा है। कर्नाटक और उत्तरप्रदेश के बारे में हम पिछले दिनों यहां पर एक से अधिक बार लिख भी चुके हैं, और अभी मुम्बई में राज ठाकरे मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटवाने के लिए एक मुहिम छेड़े हुए हैं, और उत्तरप्रदेश में हिन्दू संगठन पांच वक्त की नमाज के वक्त मस्जिदों के लाउडस्पीकरों के मुकाबले लाउडस्पीकर लगाकर हनुमान चालीसा पढऩा शुरू कर चुके हैं। दो दिन पहले ही आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने बिना किसी प्रसंग के यह कहा है कि अगले 15 बरस में भारत अखंड भारत बन चुका रहेगा। अखंड भारत की संघ की धारणा में 1947 के पहले का भारत तो है ही, उसमें अफगानिस्तान तक शामिल है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह लिखा भी है कि आज के 22 करोड़ हिन्दुस्तानी मुस्लिमों के मुकाबले भागवत के ऐसे अखंड भारत में 60 करोड़ मुस्लिम होंगे, और तालिबान भी उसमें शामिल रहेंगे। आरएसएस केन्द्र की मोदी सरकार का करीबी संगठन है, और भाजपा का वैचारिक मार्गदर्शक भी माना जाता है, लेकिन भागवत की हर कुछ महीनों में कही जाने वाली अखंड भारत की इस बात पर सात बरस की मोदी सरकार की तरफ से कभी कुछ नहीं कहा गया है, इसलिए लोगों का यह मानना है कि यह हिन्दुस्तान के हिन्दुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ का एक तरीका है, और इसका भारत की विदेश नीति से कभी कोई रिश्ता नहीं हो सकता।

लेकिन आज देश में चारों तरफ बढ़ते हुए धार्मिक और साम्प्रदायिक तनाव की खबरों के साथ हम भागवत के बयान को जोडक़र इसलिए देख रहे हैं कि अगले 15 बरस में यह अखंड भारत तो नहीं बनते दिख रहा, लेकिन उसके बहुत पहले ही यह खंड-खंड भारत बनते जरूर दिख रहा है। किसी देश के खंड-खंड होने के लिए उसकी सरहदों का बदलना जरूरी नहीं होता, जब किसी देश के लोगों के बीच एक गहरी खाई खुद जाती है, और अलग-अलग धर्मों के, जातियों के, प्रदेशों के लोग जब अपने आपको अपने ही देश के दूसरे लोगों से अलग गिनने लगते हैं, मानो टापुओं पर रहने लगते हैं, तो वह देश खंड-खंड हो जाता है। इसके लिए देश के टुकड़े होना जरूरी नहीं है, इसके लिए समाज के टुकड़े होना काफी होता है, और वह आज बड़ी मेहनत से किया जा रहा है, और होते चल रहा है।

कर्नाटक हमलावर हिन्दुत्व की एक तेज रफ्तार प्रयोगशाला बना हुआ है, और भाजपा के शासन में, साम्प्रदायिक संगठनों और भाजपा की मिलीजुली कोशिशों से यहां पर मुस्लिमों के सामाजिक बहिष्कार की, उनकी आर्थिक नाकेबंदी की, उनको बेकाम करने की बड़ी और भारी कोशिशें चल रही हैं। मुस्लिमों से कोई मांस न खरीदे, मुस्लिमों की चलाई टैक्सी में सफर न करे, मुस्लिमों को फल-सब्जी की मंडियों से निकाला जाए जैसे साम्प्रदायिक फतवे और अभियान वहां पर सरकार की मेहरबानी से उसके साम्प्रदायिक मुखौटे चला रहे हैं, और एक अखंड कर्नाटक आज खंड-खंड किया जा रहा है। कुछ ऐसा ही हाल मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश का हो रहा है जहां पर पोशाक देखकर लोगों की शिनाख्त हो रही है, और कोड़े लगाने या फांसी चढ़ाने वाले जल्लाद की तरह बुलडोजर तैनात करके पुलिस ही जज बन बैठी है, सजा सुना रही है, सजा पर अमल कर रही है।

इन दो बातों में बड़ी गहरी विसंगति है। मोहन भागवत की बात का कोई भी वजन किसी सरकार की नजर में चाहे न हो, उनको मानने वाले लोग उन्हें गंभीरता से सुनते हैं, और गंभीरता से उन्हें सच मान लेते हैं। उन्हीं के साथ के कुछ दूसरे भगवाधारी हिन्दुओं को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की नसीहत दे रहे हैं, और 15 बरस बाद के अखंड भारत में हिन्दुओं का अनुपात अगर ठीक रखना है तो बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान के मुस्लिमों के अखंड भारत में आ जाने की हालत में हिन्दू आबादी को बढ़ाना तो जरूरी हो ही जाएगा।

यह भी समझने की जरूरत है कि आज जब भारत खंड-खंड हो रहा है, बस्तियों में हिन्दू और मुस्लिम आसपास रहने में खतरा महसूस कर रहे हैं, उस हालत में महंगाई और दूसरे जरूरी जलते-सुलगते मुद्दों की तरफ से ध्यान हटाने के लिए हर कुछ दिनों में अखबारी सुर्खियों को लूट लिया जाता है। कोई ऐसा शिगूफा छोड़ा जाता है कि सोशल मीडिया दो-चार दिन उसी में व्यस्त रहता है। देश के समझदार तबके को ध्यान बंटाने वाले ऐसे जाल को देखना और पहचानना सीखना चाहिए। जब कभी कोई इस किस्म की बातें करें, तो उनसे पूछना चाहिए कि महंगाई, बेरोजगारी, मंदी, और बढ़ती आर्थिक असमानता के बारे में उनका क्या कहना है। जब जमीन पर दिक्कतें ही दिक्कतें बिखरी रहती हैं, तो कुछ लोग इन्द्रधनुष दिखाने लगते हैं तो कुछ लोग अखंड रामधुन सुनाने लगते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि जिन लोगों की भावनाएं अखंड भारत, इन दो शब्दों से उत्तेजना से भर जाती हैं, उनकी उत्तेजना को शांत करने के लिए यह बताना जरूरी है कि ऐसे अखंड भारत में किस धर्म के कितने लोग रहेंगे, कितने आतंकी संगठन रहेंगे, और आज के हिन्दुस्तान की प्रति व्यक्ति आय घटकर कितनी रह जाएगी। आज अगर हिन्दुस्तान से कोई अश्वमेध यज्ञ करके उसके घोड़े को छोड़े, और वह पाकिस्तान-अफगानिस्तान जाकर अपना झंडा फहराकर आ भी जाए तो वह आज के हिन्दुस्तान के लिए सिवाय खतरे और दिक्कतों के कुछ लेकर नहीं लौटेगा। इसलिए जो लोग आज अखंड भारत का सपना दिखाते हैं, उन्हें तथ्यों को बताकर उन पर जवाब मांगना चाहिए।

आज हिन्दुस्तान बढ़ाए हुए साम्प्रदायिक तनाव की वजह से, धार्मिक भेदभाव की वजह से, और कट्टरता की वजह से जाति और धर्म के कई टापुओं में बंट चुका है। इस खंड-खंड भारत को एक बनाए रखने में ही अभी 15 बरस कम पडऩे वाले हैं, इसलिए मोहन भागवत का अखंड भारत हिन्दुस्तानियों के लिए एक बुरे सपने के अलावा कुछ नहीं हो सकता, फिर भी अगर कुछ लोगों के आक्रामक राष्ट्रीयता के उन्मादी अहंकार का पेट अगर अखंड भारत शब्द सुनकर भरता है, तो उन्हें तालिबानियों के पड़ोस के घर में रहने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 14 अप्रैल 2022


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जनसुनवाई में नक्सल-हत्या की तरह यूपी-एमपी में हिन्दू बुलडोजरों का फुटपाथी इंसाफ

14 अप्रैल 2022

 

उत्तरप्रदेश के चुनाव में बुलडोजर भी एक मुद्दा था, और सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की तरफ से उनकी भाजपा ने बार-बार यह तर्क दिया कि अपराधियों के अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलाए जाएंगे। उत्तरप्रदेश में भाजपा को जितनी बड़ी जीत मिली है, उसके चलते हुए योगी आदित्यनाथ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के मुकाबले बहुत बड़े कद के नेता हो गए हैं, और मानो योगी आदित्यनाथ की यह बड़ी जीत बाकी भाजपा मुख्यमंत्रियों के लिए बड़ी चुनौती भी बन गई है। कर्नाटक के भाजपा मुख्यमंत्री लगातार हिन्दुत्व के फतवों को बढ़ाते जा रहे हैं, जिसे हमने इसी जगह हमलावर हिन्दुत्व की प्रयोगशाला लिखा है। अब मध्यप्रदेश में बुलडोजर का इस्तेमाल इस साम्प्रदायिक अंदाज में हो रहा है कि जिसे देखकर बुलडोजर बनाने वाले को हैरानी हो रही होगी कि उसकी बनाई मशीन में भी साम्प्रदायिकता की संभावना कैसे ढूंढ निकाली गई है। हाल ही में रामनवमी और दूसरे धार्मिक जुलूसों में जिस तरह हिन्दू-मुस्लिम टकराव मध्यप्रदेश में सामने आया है, उसके बाद प्रदेश सरकार ने मुस्लिम समुदाय के लोगों को हमलावर करार देते हुए, पथराव के वीडियो पर निष्कर्ष निकालते हुए उनके मकान-दुकान बुलडोजर से जमीन में मिला दिए हैं। एमपी के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने एक टीवी चैनल, एनडीटीवी, के सवाल के जवाब में जिस तरह साफ-साफ कहा कि जो लोग वीडियो में हमला करते दिख रहे हैं वे आरोपी कहां से हो गए, वे तो अपराधी हैं, और सरकार ऐसे अपराधियों के निर्माण गिरा रही है। हालांकि उन्होंने यह कहा है कि जो निर्माण अवैध पाए गए हैं, उन्हीं को गिराया जा रहा है, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या सिर्फ मुस्लिमों के निर्माण अवैध हैं, या उनमें से कुछ लोग पथराव करते कैमरों पर कैद हुए हैं तो उनके मकान-दुकान गिराना एक लोकतांत्रिक तरीका है? यह सवाल छोटा नहीं है क्योंकि किसी के किसी जुलूस पर हमलावर होने से छांटकर उसी के मकान-दुकान को गिराया जाए, तो यह साफ-साफ अदालत के बाहर एक फर्जी अदालती इंसाफ के अलावा कुछ नहीं है। ऐसा ही इंसाफ बस्तर के जंगलों में नक्सली करते हैं जहां वे किसी को पुलिस का मुखबिर साबित करते हुए उसका गला काट देते हैं, और वे यह काम एक भीड़ भरी तथाकथित जनसुनवाई के बीच करते हैं, ताकि बाकी लोगों तक भी धमकी पहुंच जाए। यूपी और एमपी में बुलडोजर के रास्ते दिया जा रहा फैसला कुछ इसी किस्म का है। इसके बाद बाकी राज्यों को भी चाहिए कि वे भी अपने इलाकों में बुलडोजर खरीदें, और अपने को नापसंद लोगों के साथ इसी तरह का इंसाफ कर डालें। ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान की छोटी अदालतों में जो करोड़ों मामले चल रहे हैं, उनकी फाइलों के ढेर को बुलडोजर से ही धकेलकर इस तरह कम किया जा सकता है।

चूंकि उत्तरप्रदेश की योगीपीठ ने ऐसा बुलडोजरी इंसाफ कर दिखाया है, और इसके बाद वह बहुसंख्यक वोटों के आधार पर चुनाव जीतकर भी आ गई है इसलिए भारत की राजनीति अब वोटों की गिनती के बजाय धार्मिक जनगणना की तरफ बढ़ती हुई दिख रही है। ऐसे में जिस तबके की गिनती कम है, उस तबके पर बुलडोजर चलाना चुनावी फायदे का काम दिख रहा है, और इसीलिए एमपी यूपी के पदचिन्हों पर चलते हुए बुलडोजर की सवारी कर रहा है। देश में बहुत से प्रदेशों में, और केन्द्र सरकार के मातहत चल रही दिल्ली में मुस्लिमों के अलावा बड़ी संख्या में हिन्दू भी साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाते, हिंसा करते, और सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाते रिकॉर्ड हुए हैं, लेकिन उन पर कोई बुलडोजर चला हो ऐसा सुनाई नहीं पड़ा है। उत्तरप्रदेश के मामलों में तो यह भी याद पड़ रहा है कि देश की एक बड़ी अदालत ने राज्य सरकार को सार्वजनिक उपद्रव का आरोप लगाते हुए जिन अल्पसंख्यकों से वसूली की गई थी, उसे भी वापिस करने का हुक्म दिया है।

देश की सरकारों के साम्प्रदायिक होने का मुद्दा एकदम नया भी नहीं है। ऐसा पहले भी होते आया है, लेकिन इसमें नई बात यह जुड़ गई है कि सरकार किसी को आरोपी बनाने के बजाय, उसे सीधे मुजरिम करार दे रही है, और उसके मकान-दुकान पर बुलडोजर चलाकर नक्सली जनसुनवाई के अंदाज में फैसला सुना रही है, और सजा भी दे दे रही है। इस सिलसिले में न तो जज की जरूरत बच गई है, और न ही किसी जल्लाद की। यह सिलसिला इसलिए खतरनाक है कि यह कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच का फासला खत्म कर रहा है। कार्यपालिका और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के बीच कोई फासला वैसे भी नहीं रह गया है। सरकारें इन दिनों संविधान और सरकारी नियमों के बजाय अपनी पार्टी के घोषित और अघोषित एजेंडे पर चल रही हैं। अब सत्ता की मनमानी का बुलडोजर अगर धर्म के आधार पर अपने दुश्मन तय करके उन्हें खाक में मिला देने का काम कर रहा है, तो इस माहौल में लोकतंत्र की गुंजाइश बिल्कुल भी नहीं रह जाती है।

मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा को पिछले महीनों में जिन लोगों ने चर्चित चेहरों के कहे एक-एक शब्द पर एफआईआर करने की धमकी देते हुए देखा है, वे इस बात को समझ सकते हैं कि गृहमंत्री किस तरह अपने आपको मुख्यमंत्री से अधिक हमलावर हिन्दुत्ववादी साबित करने पर आमादा हैं, और ऐसा लगता है कि वे मुस्लिमों पर बुलडोजर चलाते हुए असल में बुलडोजर से अपने लिए मुख्यमंत्री निवास तक का रास्ता बना रहे हैं। देश के बहुत से लोग इस बात को लेकर हैरान हैं कि ऐसे वक्त पर इन राज्यों की हाईकोर्ट या देश की सुप्रीम कोर्ट की क्या जिम्मेदारी बनती है? क्या अपने सम्मान और अपनी सहूलियतों से जुड़े हुए छोटे-छोटे मामलों पर अवमानना की सुनवाई शुरू करने वाले बड़े-बड़े जजों को देश के अल्पसंख्यक तबके के अस्तित्व पर खतरा नहीं दिख रहा है? क्या यह लोकतंत्र की अवमानना नहीं है? आज का यह वक्त सुप्रीम कोर्ट की सीधी दखल का है ताकि साम्प्रदायिक सरकारों का धर्मान्ध बुलडोजर रोका जा सके, और देश को टूटने से बचाया जा सके।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 13 अप्रैल 2022


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जब मंत्री का कमीशन ही 40 फीसदी होगा तो जमीन पर काम कितने का होगा?

13 अप्रैल 2022

 

कर्नाटक में एक सरकारी काम करने वाले ठेकेदार ने कल आत्महत्या कर ली, और वह चिट्ठी छोडक़र मरा है कि प्रदेश पंचायत राज मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता के.एस. ईश्वरप्पा की रिश्वत की मांग से थककर वह आत्महत्या कर रहा है। उसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पिछले भाजपा मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के प्रति अपार सम्मान के साथ लिखते हुए यह अपील की है कि उसके परिवार का ख्याल रखा जाए। उसने अपनी चिट्ठी में यह लिखा है कि यह मंत्री उसकी मौत के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार है, और उसे इसकी सजा मिलनी चाहिए। चिट्ठी के मुताबिक इस ठेकेदार को पंचायत विभाग के तहत सडक़ों का ठेका मिला था, और मंत्री चार करोड़ के काम में चालीस फीसदी रिश्वत मांग रहा था। पुलिस ने आत्महत्या के बाद जो जुर्म दर्ज किया है उसमें मंत्री का नाम है। लोगों को याद होगा कि कुछ समय पहले कर्नाटक के सरकारी निर्माण के ठेकेदारों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखकर राज्य में चालीस फीसदी कमीशन के चलन के शिकायत की थी, और उसकी भी खबरें खूब छपी थीं।

सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार कोई बहुत अनोखी बात नहीं है, और न ही यह कर्नाटक तक सीमित बात है। अधिकतर प्रदेशों में सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार बहुत ही आम है, और मंत्रिमंडल में किसी मंत्री की ताकत का अंदाज इसी बात से लगता है कि उसे कितने अधिक बजट वाले और कितने अधिक कमाई वाले विभाग मिले हैं। लेकिन कर्नाटक में यह भ्रष्टाचार जितने बड़े पैमाने पर और जितना अधिक सुनाई पड़ रहा है, वह कुछ अभूतपूर्व लगता है। अगर मंत्री ही चालीस फीसदी कमीशन लेने लगे, और बाकी विभाग का कमीशन भी बंधा हुआ रहता है, फिर ठेकेदार की अपनी कमाई, इन सबको देखें तो लगता है कि सरकार के खर्च का आधे से भी कम जमीन पर लगता होगा। भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए ही अभी यह भी याद पड़ता है कि पिछले कुछ दिनों से लगातार पंजाब के नए मुख्यमंत्री आम आदमी पार्टी के भगवंत सिंह मान का इश्तहार टीवी पर चल रहा है जिसमें उन्होंने प्रदेश की जनता से सरकारी दफ्तरों में मोबाइल फोन लेकर जाने कहा है, जो कि अभी तक कई जगहों पर प्रतिबंधित था, और कहा है कि कोई भी रिश्वत मांगे तो उसकी ऑडियो या वीडियो रिकॉर्डिंग करें, और मुख्यमंत्री को भेजें।

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम सरकारी कामकाज में गलत निर्देशों को लेकर, या गलत मांग को लेकर बरसों से यह बात लिखते आ रहे हैं कि लोगों को इसकी रिकॉर्डिंग करना चाहिए ताकि वह सुबूत की शक्ल में हिफाजत से रहे। लोगों को उनके वरिष्ठ मंत्री या अफसर कई गलत निर्देश देते हैं जो कि कागजों पर लिखे हुए नहीं रहते, और दबाव डालकर गलत काम करवाए जाते हैं। ऐसी तमाम किस्म की बीमारियों का एक आसान इलाज रिकॉर्डिंग हो सकती है, और यह मोबाइल फोन पर बातचीत हो, या रूबरू कही जा रही बात हो, अगर यह सरकारी कामकाज से जुड़ी हुई बात है, तो उसकी सारी रिकॉर्डिंग जायज होनी चाहिए। ऐसा न हो कि इसे सरकार के भ्रष्ट लोग अनुशासनहीनता करार देकर रिकॉर्डिंग करने वाले लोगों का नुकसान करें। अभी तक ऐसा कोई मामला सामने आया नहीं है इसलिए किसी अदालत का कोई फैसला भी इसे लेकर नहीं है। लेकिन यह पारदर्शिता के लिए और सरकारी कामकाज से भ्रष्टाचार को हटाने के लिए एक असरदार औजार हो सकता है। आम आदमी पार्टी और पंजाब सरकार की दूसरी सौ बातों से असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उसका यह फैसला ठीक है कि सरकारी दफ्तर में मोबाइल लेकर जाने पर अब कोई रोक नहीं रहेगी, और कोई नाजायज मांग होने पर लोग उसकी रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। सरकारी दफ्तर में सरकारी समय पर सरकारी कामकाज से जुड़ी हुई बातों को रिकॉर्ड करने पर कोई रोक क्यों होनी चाहिए?

अभी छत्तीसगढ़ में लगातार ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें पुलिस कर्मचारियों और अधिकारियों ने एक संगठित मुजरिम गिरोह की तरह लोगों से उगाही और वसूली की है, वरना उन्हें तरह-तरह के खतरनाक जुर्म में फंसाने की धमकी दी है। ऐसी रिकॉर्डिंग सामने आने के बाद जिला पुलिस ने ऐसे लोगों को लाइन अटैच भी किया गया है। अगर ऐसी रिकॉर्डिंग न होती, तो इनकी बात भला कौन मानते? इसलिए आज हर जेब में रहने वाले इस मामूली से औजार को भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया ही जाना चाहिए। जो लोग जनता के पैसों से तनख्वाह पाते हैं, और सरकार में अधिकार संपन्न हैं, उन्हें ईमानदार होने के साथ-साथ जनता से अपना बर्ताव भी ठीक रखना चाहिए। बहुत से अफसर और कर्मचारी ऐसे रहते हैं जो अपनी बदजुबानी और बदतमीजी के लिए जाने जाते हैं, इन सबका इलाज भी ऐसी रिकॉर्डिंग हो सकती है। आज भी सरकार का कोई कानून इसके खिलाफ नहीं है, लेकिन भ्रष्ट और बददिमाग अफसरों ने अपने स्तर पर अपने दफ्तरों में ऐसे नोटिस लगा रखे हैं, इन्हें भी गैरकानूनी करार देना जरूरी है। हर व्यक्ति का यह हक है कि उसके साथ सरकारी दफ्तर में कैसा बर्ताव होता है, उसे रिकॉर्ड करके रखे।

कर्नाटक के जिस मंत्री के बारे में भाजपा के ही इस समर्थक या सदस्य ठेकेदार ने आत्महत्या की चिट्ठी में लिखा है, उसका इस्तीफा तुरंत ही लिया जाना चाहिए। अब तक मुख्यमंत्री भी इस बारे में कुछ बोल नहीं रहे हैं, और न ही सत्तारूढ़ भाजपा ने कुछ कहा है। लेकिन जिस तरह वहां के ठेकेदारों ने कुछ अरसा पहले सीधे प्रधानमंत्री को लिखकर इसकी शिकायत की थी, और जिस तरह इस खुदकुशी करने वाले ने भी प्रधानमंत्री के बारे मेें लिखा है, तो उसे देखते हुए भाजपा का इस पर चुप रहना जिम्मेदारी का बर्ताव नहीं है।

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