सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है?
18 जुलाई 2022
हिन्दुस्तान में आज से रोजमर्रा की चीजों और
कामकाज पर टैक्स का ढांचा बदल रहा है। सामानों की ऐसी लंबी फेहरिस्त है
जिस पर लोगों को अधिक जीएसटी चुकाना होगा। अखबारों की सुर्खियां इस बारे
में बताती हैं कि गेहूं, चावल, आटा, मैदा जैसी अधिकतर चीजें आज से महंगी हो
जाएंगी फिर चाहे वे किसी ब्रांड की चीजें न हों, और सिर्फ पैकेट में बंद
की हुई चीजें हों। खाने-पीने की दूसरी चीजों, जैसे मुरमुरा, दही, पनीर,
मखाना, सोयाबीन, मटर पर भी अब जीएसटी लगना शुरू हो रहा है, और पांच फीसदी
जीएसटी लगेगा। केन्द्र सरकार को पता नहीं कितने छोटे-छोटे सामानों पर गौर
करके जीएसटी लगाने या बढ़ाने की फुर्सत थी, अब चाकू, कागज काटने के चाकू,
और पेंसिल शार्पनर पर भी अठारह परसेंट जीएसटी लगेगा। और तो और शवदाहगृह
बनाने के वर्कऑर्डर पर अठारह फीसदी जीएसटी लगेगा। हजार रूपये से नीचे रोज
वाले होटल कमरों पर भी अब बारह फीसदी जीएसटी लगना शुरू हो रहा है, और पांच
हजार रूपये रोज से अधिक के अस्पताल के कमरों पर भी जीएसटी थोपा गया है।
लोगों का इस बारे में कहना है कि आजादी के बाद पहली बार अनाज पर टैक्स
लगाया गया है।
सरकारों को वैसे तो अपनी मर्जी से टैक्स लगाने की आजादी रहती है लेकिन आज देश वैसे भी महंगाई से कराह रहा है, पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम अकल्पनीय हो चुके हैं, और जो लोग केन्द्र सरकार को धार्मिक भावना से पूजते हैं उनके अलावा कोई भी लोग इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। पूरे देश भर में रेलगाडिय़ां जगह-जगह रद्द हो रही हैं, रेलभाड़ा बढ़ते जा रहा है, प्लेटफॉर्म टिकट और से और महंगी होती जा रही है। और अब खाना-पीना, बिल्कुल ही आम घरेलू और मध्यमवर्गीय खाना-पीना जिस हिसाब से महंगा होते चल रहा है, वह लोगों की बर्दाश्त के बाहर है। देश में बहुत बुरी तरह बेरोजगारी है, लोगों की तनख्वाह जहां-तहां घटा दी गई है, वेतन और मजदूरी का भुगतान समय पर हो नहीं रहा है, और ऐसे में बुनियादी जरूरतों का लोगों की पहुंच से बाहर होते जाना पता नहीं लोग कैसे बर्दाश्त करेंगे। भारत के ठीक बगल में श्रीलंका आज बेकाबू आर्थिक बदहाली के चलते एक अराजक हालत में पहुंच चुका है, पाकिस्तान में भी चीजें सरकार के काबू से बाहर हो गई हैं, और इनके बीच बसा हिन्दुस्तान आज से यह नई तकलीफ भुगतने वाला है। ऐसे में सोशल मीडिया पर तैरते वे तमाम पोस्टर जायज लगते हैं जो कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के वक्त गैस सिलेंडर पांच सौ रूपये के भीतर का रहने पर भी स्मृति ईरानी सिलेंडर लेकर सडक़ों पर चीखती दिखती थीं, और अब वही सिलेंडर ग्यारह सौ रूपये से अधिक का होने के बाद भी सरकार बेफिक्र है क्योंकि जनता धार्मिक, साम्प्रदायिक, और भावनात्मक मुद्दों में डूबी हुई है, और उसे अपनी जिंदगी के दुख-दर्द का अहसास कम होने के लिए एक राष्ट्रवादी एनस्थीसिया मिल गया है।
लेकिन लोगों का क्या होगा? सबसे गरीब तबका तो फिर भी रियायती अनाज पाकर अपनी जरूरतों को बुरी तरह तंग रखकर जी लेता है, लेकिन मध्यमवर्गीय तबके को जो ताजा कोड़ा आज से लगने जा रहा है, उसके लिए उसके पास कोई मरहम भी नहीं है। ऐसा लगता है कि आज से आम हिन्दुस्तानी जिंदगी दस फीसदी महंगी होने जा रही है। यह सोचना अकल्पनीय है कि पेंसिल शार्पनर पर अठारह फीसदी टैक्स लगाने की बात भी कोई सरकार सोच सकती है। सबसे गरीब बच्चे के लिए भी पढ़ाई में जरूरी इस बुनियादी सामान पर टैक्स लगाने का मतलब यह हुआ कि अब करोड़ों की कारों में चलने वाले लोगों पर लगाने के लिए कोई टैक्स बचा ही नहीं है?
आज हिन्दुस्तान की खबरों में जितना हिन्दुस्तान है, उतने का उतना श्रीलंका भी छाया हुआ है। इसलिए यह याद रखने की जरूरत है कि 2019 में अपार बहुमत पाकर जो सरकार सत्ता में आई थी वह आज 2022 में मुंह छुपाकर देश छोडऩे पर मजबूर हो गई है, और जनता वहां राष्ट्रपति भवन में घुसकर कब्जा करके बैठी है, और जनता का एक दूसरा हिस्सा जाकर प्रधानमंत्री के निजी घर को जलाकर खाक कर रहा है। बहुमत से आई सरकार भी भूख और अभाव को किसी सीमा तक ही लाद सकती है, और आज हिन्दुस्तान लगातार ऐसी तस्वीरों और वीडियो से लद गया है जिनमें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोसते हुए रूपये के दाम गिरने को प्रधानमंत्री के गिरने के बराबर बता रहे थे, और आज वह रूपया एक डॉलर में अस्सी से भी अधिक चढ़ रहा है। हो सकता है कि महंगाई को झेलते हुए हिन्दुस्तानी जनता के बीच अगले आम चुनाव के पहले हकीकत का एक ऐसा अहसास लौटकर आए जो कि राष्ट्रवादी उन्माद और झूठे गौरव के चमकते रंगीन बुलबुले में पिन चुभा दे।
देश की
विपक्षी पार्टियों और जनसंगठनों को महंगाई के इस ताजा बोझ के खिलाफ एक होकर
आवाज उठानी चाहिए। एक तरफ जब देश की हर सार्वजनिक सम्पत्ति बेची जा रही
है, जब देश के कुछ चुनिंदा बड़े कारोबारी अपनी दौलत में गुणा करते जा रहे
हैं, तब सबसे आम लोगों की पीठ और कमर तोड़ देने वाला यह बोझ बर्दाश्त करने
लायक नहीं है, और जनता की फिक्र करने वाले जितने भी तबके हैं उन्हें मिलकर
इस ताजा बढ़ोत्तरी को पूरी तरह खारिज करवाने की कोशिश करनी चाहिए। अगर यह
आजाद भारत में बुनियादी जरूरत के अनाज पर, खान-पान पर पहली बार लगने वाला
टैक्स है, तो यह आजादी का किस तरह का अमृत महोत्सव है?
यह नौबत देखकर अदम गोंडवी का लिखा याद आता है- सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है?
आपस के रिश्तों में मशगूल हिन्दुस्तानी कोर्ट और सरकार
10 जुलाई 2022
केन्द्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने अदालतों और देश की न्याय
व्यवस्था से अपील की है कि आजादी की 75वीं सालगिरह, 15 अगस्त 2022 पर अधिक
से अधिक विचाराधीन कैदियों को रिहा करने की कोशिश की जाए। उन्होंने कल
जयपुर में 18वीं अखिल भारतीय कानूनी सेवा अथॉरिटी के आयोजन में न्याय
व्यवस्था से यह अपील की। उन्होंने कहा कि देश के हर जिले में विचाराधीन
कैदियों के मामलों पर विचार करने के लिए जिला जज की अगुवाई में रिव्यू
कमेटी हैं, और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को दिलचस्पी लेकर इस काम को
आगे बढ़ाना चाहिए, और अधिक से अधिक लोगों को रिहा करना चाहिए। उन्होंने यह
भी कहा कि जो लोग पैसे वाले हैं, वे काबिल वकीलों की सेवाएं ले सकते हैं।
अगर वकील एक-एक पेशी का दस-पन्द्रह लाख रूपए तक लेते हैं तो आम लोग यह खर्च
कैसे उठा सकते हैं? उन्होंने कहा कि अदालतें सिर्फ ताकतवर लोगों के लिए
नहीं हो सकतीं, और उनके दरवाजे सभी के लिए खुले रहने चाहिए।
इसी कार्यक्रम में मंत्री की बातों के जवाब में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना ने कहा कि देश में अदालती मामलों के बढऩे की मुख्य वजह अदालती कुर्सियों का खाली रहना है। उन्होंने कहा कि आज कि जजों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और अदालती ढांचे में साधन-सुविधा की कमी भी है, इस वजह से भी सुनवाई और फैसलों में वक्त लगता है, और मामले बढक़र करोड़ों में पहुंच गए हैं। उन्होंने कहा कि आज जजों के मंजूर पद भी दस लाख आबादी पर बीस जजों के हैं, जो कि बहुत ही नाकाफी हैं। जब तक जिला अदालतों का ढांचा मजबूत नहीं होगा, न्याय व्यवस्था की बुनियाद मजबूत नहीं होगी।
कानून मंत्री और मुख्य न्यायाधीश की मंच और माइक से औपचारिक बातों की एक सीमा रहती है, और उनसे बहुत सी सच्चाईयों पर बोलने की उम्मीद नहीं की जा सकती। जो लोग भारत की न्याय व्यवस्था से जूझते हैं, वे जानते हैं कि न्याय व्यवस्था का एक हिस्सा, जांच और मुकदमा चलाने वाली एजेंसियों का भ्रष्टाचार भी अदालती बोझ बढऩे की एक बड़ी वजह है। पुलिस से लेकर दूसरी जांच एजेंसियों तक के काम में भारी भ्रष्टाचार रहता है, और इससे गुजरते हुए भी जब कोई मामला अदालत तक पहुंचता है, तो न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार कोई अनसुनी या अनोखी बात नहीं है। लोगों को याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों के भ्रष्ट होने का आरोप लगाने वाले देश के दो सबसे बड़े वकीलों, शांतिभूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण पर अदालत की अवमानना का मुकदमा भी चलाया गया था, और पिता-पुत्र ने कोई माफी मांगने से इंकार भी कर दिया था। फिर भ्रष्टाचार सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार हो यह भी जरूरी नहीं है, हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के जजों के बीच एक और किस्म का भ्रष्टाचार बड़ा आम है, उनके रिटायर होने के बाद पुनर्वास की उनकी महत्वाकांक्षा। आज देश-प्रदेश में सैकड़ों ऐसी कुर्सियां तय की गई हैं जिन पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों को ही तैनात किया जा सकता है। इन ओहदों पर इन भूतपूर्व जजों को अगले कई बरस के लिए बंगला, गाड़ी, मोटा वेतन, इन सबकी सहूलियत रहती है, और बहुत से जजों की नजरें इन पर टिकी रहती हैं। मानवीय स्वभाव को देखते हुए यह मानने की कोई वजह नहीं है कि सरकारों से ऐसे तोहफे की उम्मीद करने वाले जजों में से कुछ जज अपने आखिरी बरसों में ऐसे फैसले देते होंगे जो कि सरकार को खुश करने वाले रहते होंगे। हमने नौकरी के आखिरी महीनों में ऐसे फैसले देने वाले जज देखे हैं जो कि उसके तुरंत बाद किसी राजभवन में राज्यपाल होकर चले गए, या राज्यसभा चले गए।
जब तक हितों के टकराव का यह मामला निपटाया नहीं जाएगा, तब तक इंसाफ नाम के सिलसिले पर सरकारी असर का खतरा टलेगा नहीं। अदालतें अपने फैसलों में कई मामलों में हितों के टकराव का मुद्दा उठाती हैं, लेकिन खुद जजों के रिटायर होने के बाद उनकी मंजूर की जाने वाली कुर्सियों को लेकर हितों के टकराव की बात कभी नहीं उठती। हमने तो इसी जगह पर कुछ महीने पहले यह सुझाव भी दिया था कि कोई हाईकोर्ट जज जिन राज्यों में काम कर चुके हैं, उन राज्यों में उन्हें रिटायरमेंट के बाद कोई ओहदा नहीं मिलना चाहिए, ताकि वे अपने आखिरी बरसों में सरकार को खुश करने के खतरे से बच सकें। इसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर रिटायर्ड जजों के लिए तय की गई कुर्सियों को भी घटाना चाहिए, और उनके रिटायर होने के बाद कुछ बरस तक उनके किसी भी ओहदे पर जाने पर रोक लगानी चाहिए। यह मामला केन्द्रीय कानून मंत्री और मुख्य न्यायाधीश की कही बातों से अलग है, लेकिन जब देश की न्याय व्यवस्था पर असर रखने वाले ये दो सबसे बड़े लोग बात कर रहे हैं, तो उन्हें जजों के हितों के टकराव, और अदालती भ्रष्टाचार की बात याद दिलाना भी जरूरी है क्योंकि इस पर इन दोनों ने इस कार्यक्रम में कुछ नहीं कहा।
दरअसल सरकार में बैठे लोगों को भी यह बात सुहाती है कि वे जजों को रिटायर होने के बाद कुछ देने का अधिकार अपने पास रखें। जाहिर है कि लोग लेन-देन की मानवीय व्यवस्था को समझते हैं, और आज एक हाथ दिया, कल दूसरे हाथ लिया की व्यवहारिकता को भी जानते हैं। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। आज हिन्दुस्तान में आम लोगों का विश्वास न्याय व्यवस्था पर से पूरी तरह उठ चुका है। अदालत से इंसाफ पाने के बजाय अगर उनके पास मुम्बई के किसी माफिया के घर जाकर वहां से इंसाफ पाने का कोई विकल्प हो, तो शायद बहुत से लोग उसे बेहतर समझेंगे। आज हिन्दुस्तान की अदालतों में प्रक्रिया ही पनिशमेंट हो गई है। फैसला चाहे जो हो, मुकदमे के चलते हुए लोग बरसों तक जो यातना झेलते हैं, वह फैसले के बाद की संभावित सजा से अधिक हो जाती है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। भारत की न्याय प्रणाली में सुधार के लिए सरकार और अदालत को सामाजिक कार्यकर्ताओं और दूसरे लोगों को शामिल करना चाहिए, वरना सरकार और अदालत एक-दूसरे की बातों तक सीमित रह जाएंगे।
बस्तर के लोग नक्सलियों पर भरोसा न करें तो क्या करें?
17 जुलाई 2022
पिछले चार दिनों में दो खबरें विचलित करने
वाली आई हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासियों के बीच काम करने वाले एक
गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार को सुप्रीम कोर्ट में उनकी
लगाई हुई एक जनहित याचिका की सजा दी गई है। 2009 में बस्तर में सत्रह
आदिवासी मारे गए थे, इसे लेकर आदिवासी समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह
शक और आरोप था कि इसके पीछे सुरक्षा बल थे। इस पर उसी इलाके की पुलिस में
रिपोर्ट दर्ज करना निरर्थक मानकर हिमांशु कुमार सुप्रीम कोर्ट गए थे, और
वहां से दस-बारह बरस बाद अब अदालत ने यह जनहित याचिका खारिज कर दी है, और
इसे दायर करने के लिए हिमांशु कुमार पर पांच लाख रूपए का जुर्माना लगाया
है। साथ ही अदालत ने छत्तीसगढ़ सरकार या सीबीआई को यह सुझाव भी दिया है कि
वे याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश रचने, और पुलिस और सुरक्षाबलों पर
झूठा आरोप लगाने के लिए कार्रवाई भी कर सकते हैं, जिनमें दूसरी धाराएं भी
लगाई जा सकती हैं। यह याचिका लगाने वाले हिमांशु कुमार तो थे ही, उनके साथ
इस मानवसंहार में मारे गए लोगों के परिवार के लोग भी थे। इस फैसले के बाद
हिमांशु कुमार ने कहा है कि यह फैसला बेइंसाफ है, और वे इसका विरोध करते
हुए जेल जाएंगे, उनके पास ऐसा जुर्माना पटाने के पैसे नहीं हैं, और वे
जुर्माना पटाना भी नहीं चाहते। उन्होंने गांधी की मिसाल देते हुए कहा है कि
अन्याय का विरोध करना जरूरी है। देश भर से सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच
पैदा बेचैनी सोशल मीडिया और बयानों में सामने आ रही है, इसकी एक दूसरी वजह
यह भी है कि अभी कुछ ही दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के एक दूसरे
मामले में वहां के 2002 के दंगों को लेकर सडक़ से अदालत तक सक्रिय एक
सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ के खिलाफ फैसले में सरकार को सुझाव
दिया था कि वह तीस्ता सीतलवाड़ के खिलाफ मुकदमा चला सकती है, और गुजरात
सरकार ने आनन-फानन, अगले ही दिन तीस्ता के खिलाफ जुर्म दर्ज करके उन्हें
गिरफ्तार भी कर लिया। लोगों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सामाजिक
कार्यकर्ता के खिलाफ इस तरह की बात सुझाना अटपटा भी लगा है, लेकिन हम अभी
उसकी कानूनी बारीकियों पर जाना नहीं चाहते हैं, देश में सामाजिक
कार्यकर्ताओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के रूख से पैदा हुई फिक्र की बात करना
चाहते हैं।
आज के ही एक और समाचार को साथ जोडक़र देखने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में दंतेवाड़ा के एनआईए कोर्ट ने दो दिन पहले एक फैसला सुनाया है जिसमें वहां के 121 आदिवासियों को बरी किया गया है जो कि एक नक्सल हमले में भागीदार होने के आरोप में यूएपीए जैसे कड़े कानून के तहत पांच बरस से जेल में बंद थे। बुर्कापाल हमला नाम का यह बड़ा माओवादी हमला सीआरपीएफ के 25 लोगों को मारने वाला था, और इसी हमले के आरोप में 121 स्थानीय आदिवासियों को भी गिरफ्तार करके जेल में डाला गया था। अब अदालत ने पाया है कि इनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं थे, और यह बात भी याद रखने की है कि इन पांच बरसों में इन्हें जमानत भी नहीं मिली थी। अदालत ने कहा है कि इन लोगों के खिलाफ न तो कोई सुबूत साबित हुए और न ही कोई बयान, और एनआईए यह भी नहीं दिखा पाया कि इन लोगों का नक्सलियों से या इस हमले से कोई लेना-देना था। अब सवाल यह है कि इसी बस्तर में सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच पिसते हुए गरीब आदिवासियों के हक के लिए लडऩे वाले हिमांशु कुमार को भाजपा और कांग्रेस दोनों की राज्य और केन्द्र सरकारें मिलकर नक्सली साबित करने का मुकदमा चलाती हैं, या उनकी जनहित याचिका को खारिज करवाते हुए उन्हें बदनीयत साबित करती हैं, तो फिर देश में और राजनीतिक ताकतें बचती कौन सी हैं जो कि आदिवासियों या सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ रहमदिली दिखाएं? ये दोनों फैसले देश में सामाजिक और सरकारी अन्याय के खिलाफ अदालत तक कोशिश करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का हौसला खत्म करने वाले साबित हुए हैं, और अब लोगों को यह लग रहा है कि सरकारी बेइंसाफी, सरकारी हिंसा के खिलाफ अदालत तक की जाने वाली लोकतांत्रिक कोशिश उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती है। खासकर बस्तर के बारे में देखें तो वहां पर केन्द्र सरकार और राज्य के सुरक्षाबल दोनों ही सरकारों में अलग-अलग पार्टियों का राज रहने पर भी आदिवासियों पर जुल्म के मामले में एक ही सोच चलती आ रही है। जब कोई पार्टी विपक्ष में रहे तब तो उसका मुंह थोड़ा-बहुत खुल भी जाता है, लेकिन सत्ता में रहते हुए पार्टियों का रूख एक सरीखा रहता है, और हालात बहुत भयानक साबित हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ में मौजूदा कांग्रेस सरकार के आने के बाद बस्तर के सार्केगुड़ा में सत्रह बेकसूर आदिवासियों को माओवादी बताकर मुठभेड़ में मारा गया था, और 2019 में एक न्यायिक जांच में उन्हें बेकसूर पाया गया। इसके अलावा 2013 में एड्समेटा में आठ आदिवासियों को नक्सली बताकर मारा गया था, और न्यायिक जांच में 2022 में उन्हें बेकसूर पाया गया। इन दोनों जांच आयोग की रिपोर्ट पर प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की है, और न ही उसका कुछ करने का इरादा दिख रहा है। अब भाजपा के राज के वक्त थोक में बेकसूर आदिवासियों को इस तरह मारने पर भी आज की कांग्रेस सरकार अगर कुछ नहीं करती है, तो फिर लोकतंत्र इंसाफ के लिए डेमोक्रेटिक, रिपब्लिकन, और कंजरवेटिव पार्टियों का आयात तो नहीं कर सकता। जब देश की दोनों बड़ी पार्टियां, या उनकी गठबंधन सरकारें, और देश की अदालतें, इन सबका कुल जमा रूख बेकसूर आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के हक खारिज करने का हो जाए, जब सामाजिक कार्यकर्ता सबकी आंखों में खटकने लगें, जब सामाजिक कार्यकर्ताओं पर पांच लाख जैसा बड़ा जुर्माना लगाया जाए, उनके खिलाफ कार्रवाई करने का सुझाव सरकारों को दिया जाए, तो फिर सामाजिक कार्यकर्ताओं से नफरत करने वाली सरकारों को और चाहिए क्या?
देश की आज की हवा लोकतंत्र के दो बड़े स्तम्भों के बीच एक अभूतपूर्व हमखयाली दिखा रही है। ऐसा लगता है कि लोकतांत्रिक मुद्दों पर सरकार और अदालत की समझ एक हो गई है। यह एकता, एकजुटता, या हमखयाली लोकतंत्र को खत्म करने का माहौल बना चुकी है। इस देश में अब कोई भी महफूज नहीं रह गए हैं, और खासकर वे लोग जो कि कमजोर लोगों के हक के लिए ताकतवर सरकारों, बड़ी-बड़ी पार्टियों, और उनके अन्नदाता कारोबारियों को किसी भी वजह से नाराज करने का काम करते हैं। लोकतंत्र के लिए ये ताजा अदालती फैसले शर्मनाक भी हैं, और हौसला तोडऩे वाले भी हैं।
आपस के रिश्तों में मशगूल हिन्दुस्तानी कोर्ट और सरकार
17 जुलाई 2022
केन्द्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने अदालतों और देश की न्याय
व्यवस्था से अपील की है कि आजादी की 75वीं सालगिरह, 15 अगस्त 2022 पर अधिक
से अधिक विचाराधीन कैदियों को रिहा करने की कोशिश की जाए। उन्होंने कल
जयपुर में 18वीं अखिल भारतीय कानूनी सेवा अथॉरिटी के आयोजन में न्याय
व्यवस्था से यह अपील की। उन्होंने कहा कि देश के हर जिले में विचाराधीन
कैदियों के मामलों पर विचार करने के लिए जिला जज की अगुवाई में रिव्यू
कमेटी हैं, और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को दिलचस्पी लेकर इस काम को
आगे बढ़ाना चाहिए, और अधिक से अधिक लोगों को रिहा करना चाहिए। उन्होंने यह
भी कहा कि जो लोग पैसे वाले हैं, वे काबिल वकीलों की सेवाएं ले सकते हैं।
अगर वकील एक-एक पेशी का दस-पन्द्रह लाख रूपए तक लेते हैं तो आम लोग यह खर्च
कैसे उठा सकते हैं? उन्होंने कहा कि अदालतें सिर्फ ताकतवर लोगों के लिए
नहीं हो सकतीं, और उनके दरवाजे सभी के लिए खुले रहने चाहिए।
इसी कार्यक्रम में मंत्री की बातों के जवाब में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना ने कहा कि देश में अदालती मामलों के बढऩे की मुख्य वजह अदालती कुर्सियों का खाली रहना है। उन्होंने कहा कि आज कि जजों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और अदालती ढांचे में साधन-सुविधा की कमी भी है, इस वजह से भी सुनवाई और फैसलों में वक्त लगता है, और मामले बढक़र करोड़ों में पहुंच गए हैं। उन्होंने कहा कि आज जजों के मंजूर पद भी दस लाख आबादी पर बीस जजों के हैं, जो कि बहुत ही नाकाफी हैं। जब तक जिला अदालतों का ढांचा मजबूत नहीं होगा, न्याय व्यवस्था की बुनियाद मजबूत नहीं होगी।
कानून मंत्री और मुख्य न्यायाधीश की मंच और माइक से औपचारिक बातों की एक सीमा रहती है, और उनसे बहुत सी सच्चाईयों पर बोलने की उम्मीद नहीं की जा सकती। जो लोग भारत की न्याय व्यवस्था से जूझते हैं, वे जानते हैं कि न्याय व्यवस्था का एक हिस्सा, जांच और मुकदमा चलाने वाली एजेंसियों का भ्रष्टाचार भी अदालती बोझ बढऩे की एक बड़ी वजह है। पुलिस से लेकर दूसरी जांच एजेंसियों तक के काम में भारी भ्रष्टाचार रहता है, और इससे गुजरते हुए भी जब कोई मामला अदालत तक पहुंचता है, तो न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार कोई अनसुनी या अनोखी बात नहीं है। लोगों को याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों के भ्रष्ट होने का आरोप लगाने वाले देश के दो सबसे बड़े वकीलों, शांतिभूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण पर अदालत की अवमानना का मुकदमा भी चलाया गया था, और पिता-पुत्र ने कोई माफी मांगने से इंकार भी कर दिया था। फिर भ्रष्टाचार सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार हो यह भी जरूरी नहीं है, हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के जजों के बीच एक और किस्म का भ्रष्टाचार बड़ा आम है, उनके रिटायर होने के बाद पुनर्वास की उनकी महत्वाकांक्षा। आज देश-प्रदेश में सैकड़ों ऐसी कुर्सियां तय की गई हैं जिन पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों को ही तैनात किया जा सकता है। इन ओहदों पर इन भूतपूर्व जजों को अगले कई बरस के लिए बंगला, गाड़ी, मोटा वेतन, इन सबकी सहूलियत रहती है, और बहुत से जजों की नजरें इन पर टिकी रहती हैं। मानवीय स्वभाव को देखते हुए यह मानने की कोई वजह नहीं है कि सरकारों से ऐसे तोहफे की उम्मीद करने वाले जजों में से कुछ जज अपने आखिरी बरसों में ऐसे फैसले देते होंगे जो कि सरकार को खुश करने वाले रहते होंगे। हमने नौकरी के आखिरी महीनों में ऐसे फैसले देने वाले जज देखे हैं जो कि उसके तुरंत बाद किसी राजभवन में राज्यपाल होकर चले गए, या राज्यसभा चले गए।
जब तक हितों के टकराव का यह मामला निपटाया नहीं जाएगा, तब तक इंसाफ नाम के सिलसिले पर सरकारी असर का खतरा टलेगा नहीं। अदालतें अपने फैसलों में कई मामलों में हितों के टकराव का मुद्दा उठाती हैं, लेकिन खुद जजों के रिटायर होने के बाद उनकी मंजूर की जाने वाली कुर्सियों को लेकर हितों के टकराव की बात कभी नहीं उठती। हमने तो इसी जगह पर कुछ महीने पहले यह सुझाव भी दिया था कि कोई हाईकोर्ट जज जिन राज्यों में काम कर चुके हैं, उन राज्यों में उन्हें रिटायरमेंट के बाद कोई ओहदा नहीं मिलना चाहिए, ताकि वे अपने आखिरी बरसों में सरकार को खुश करने के खतरे से बच सकें। इसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर रिटायर्ड जजों के लिए तय की गई कुर्सियों को भी घटाना चाहिए, और उनके रिटायर होने के बाद कुछ बरस तक उनके किसी भी ओहदे पर जाने पर रोक लगानी चाहिए। यह मामला केन्द्रीय कानून मंत्री और मुख्य न्यायाधीश की कही बातों से अलग है, लेकिन जब देश की न्याय व्यवस्था पर असर रखने वाले ये दो सबसे बड़े लोग बात कर रहे हैं, तो उन्हें जजों के हितों के टकराव, और अदालती भ्रष्टाचार की बात याद दिलाना भी जरूरी है क्योंकि इस पर इन दोनों ने इस कार्यक्रम में कुछ नहीं कहा।
दरअसल सरकार में बैठे लोगों को भी यह बात सुहाती है कि वे जजों को रिटायर होने के बाद कुछ देने का अधिकार अपने पास रखें। जाहिर है कि लोग लेन-देन की मानवीय व्यवस्था को समझते हैं, और आज एक हाथ दिया, कल दूसरे हाथ लिया की व्यवहारिकता को भी जानते हैं। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। आज हिन्दुस्तान में आम लोगों का विश्वास न्याय व्यवस्था पर से पूरी तरह उठ चुका है। अदालत से इंसाफ पाने के बजाय अगर उनके पास मुम्बई के किसी माफिया के घर जाकर वहां से इंसाफ पाने का कोई विकल्प हो, तो शायद बहुत से लोग उसे बेहतर समझेंगे। आज हिन्दुस्तान की अदालतों में प्रक्रिया ही पनिशमेंट हो गई है। फैसला चाहे जो हो, मुकदमे के चलते हुए लोग बरसों तक जो यातना झेलते हैं, वह फैसले के बाद की संभावित सजा से अधिक हो जाती है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। भारत की न्याय प्रणाली में सुधार के लिए सरकार और अदालत को सामाजिक कार्यकर्ताओं और दूसरे लोगों को शामिल करना चाहिए, वरना सरकार और अदालत एक-दूसरे की बातों तक सीमित रह जाएंगे।
सार्वजनिक जगहों पर राजनीतिक गुंडागर्दी के खिलाफ उठने की जरूरत
16 जुलाई 2022
बाम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से
पूछा है कि वह राजनेताओं से यह क्यों नहीं कह सकती कि वे अवैध होर्डिंग्स
पर अपनी तस्वीर न लगवाएं। पूरे प्रदेश में अवैध होर्डिंग और बैनर ने
सार्वजनिक जगहों को तबाह कर रखा है, खूबसूरती तो खत्म हुई ही है, कई जगहों
पर ऐसे होर्डिंग और बैनर से फंसकर दुर्घटनाएं भी होती हैं। मोटेतौर पर
राजनीतिक दलों का नाम और उनके नेताओं का चेहरा उन पर दिखता है। हाईकोर्ट ने
इनके खिलाफ सरकार को आदेश दिया था लेकिन सरकार ने उस पर कोई अमल नहीं
किया। सार्वजनिक जगहों पर बैनर-होर्डिंग के अलावा जगह-जगह पोस्टर, स्वागत
द्वार, और इश्तहार के दूसरे तरीकों के बारे में भी इस मामले में सुनवाई हो
रही है। लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले चेन्नई में 23 बरस की एक युवती
पर सडक़ के डिवाइडर पर लगाया गया एक होर्डिंग गिर गया था, और इसके बाद वह
सडक़ पर गिरी तो एक ट्रक ने उसे कुचल दिया, और उसकी मौत हो गई। उस वक्त
मद्रास हाईकोर्ट ने यह कहा था कि अवैध होर्डिंग्स के खिलाफ आदेश दे-देकर वह
थक गया है।
इन दो महानगरों के हाईकोर्ट का अफसोस देखकर यह बात समझ आती है कि अपने चेहरों के अवैध होर्डिंग लगाने वाले नेताओं की सेहत पर हाईकोर्ट के किसी ऑर्डर का कोई फर्क नहीं पड़ता। ठीक उसी तरह जिस तरह कि जिला प्रशासन के आदेश का शादियों और बारातों पर कोई फर्क नहीं पड़ता, लाउडस्पीकरों पर हाईकोर्ट के आदेश का कोई फर्क नहीं पड़ता, ठीक उसी तरह कि चुनाव आयोग की खर्च सीमा का चुनावी खर्च पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यह लोकतंत्र कतरे-कतरे में धीरे-धीरे नाकामयाब और बेअसर होते चल रहा है। आज सार्वजनिक जीवन में साम्प्रदायिक ताकतें जिस हमलावर अराजकता के साथ हावी हो चुकी हैं, उनसे निपटने के लिए पूरे देश की पुलिस कम पड़ेगी। आज हिंसक हमलावरों की मेहरबानी यही है कि वे किसी प्रदेश में एक साथ हमला नहीं कर रही हैं, वरना देश का कोई प्रदेश इन ताकतों से न जूझ सके। इसी तरह सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार की अराजकता, सडक़ों पर गैरकानूनी गाडिय़ों, खूनी रफ्तार, और ओवरलोड की अराजकता, खुद सरकारों की बदनीयत की कार्रवाई की अराजकता देश को आज तबाह कर रही हैं। ऐसे में शहरी सार्वजनिक जगहों पर गैरकानूनी होर्डिंग्स का मामला बाकी चीजों के मुकाबले छोटा जुर्म है, और कम हिंसक है, लेकिन यह हजारों करोड़ सालाना का दो नंबर का धंधा है। जिन होर्डिंग्स से म्युनिसिपलों या सरकारी संपत्तियों को मोटी रकम मिलनी चाहिए, उनका नाम भी सरकारी रिकॉर्ड में नहीं आता, क्योंकि उनके पीछे नेताओं का हाथ रहता है, और सामने उनका चेहरा। देश के कमोबेश हर राज्य में ऐसा ही ढर्रा चला हुआ है, और जब तक अदालत से किसी अफसर को सजा मिलने का खतरा न हो, किसी अफसर को अदालत का कोई डर नहीं रहता।
आज सार्वजनिक अराजकता को बचाना और बढ़ाना स्थानीय नेताओं के बाहुबल का एक सुबूत रहता है कि वे अपनी कितनी मनमानी कर सकते हैं। उनके समर्थकों के लिए यह शक्तिप्रदर्शन का एक जरिया रहता है जिससे वे इलाके के कारोबारियों और सरकारी अफसरों के सहम जाने की उम्मीद करते हैं। लोगों को जिस सरकारी दफ्तर पर दबाव बनाने की जरूरत रहती है, उसी के आसपास वे उस विभाग के मंत्री के साथ अपनी तस्वीर के होर्डिंग लगाते हैं, ताकि उनके जाने पर अफसर को यह पता रहे कि वे मंत्री के किसी करीबी से बात कर रहे हैं। महाराष्ट्र तो फिर भी जागरूक जनता का प्रदेश है, और लोग सार्वजनिक मुद्दों को लेकर अदालत तक जाते हैं, और इलाके के मवाली-नेताओं से हिंसा का खतरा भी उठाते हैं। छत्तीसगढ़ सरीखे प्रदेश सार्वजनिक जनचेतना से पूरी तरह मुक्त हैं, और यहां पर अराजकता सिर चढक़र बोलती है। इक्का-दुक्का जनसंगठन किसी मामले में हाईकोर्ट तक पहुंचते भी हैं, तो भी वहां का हुक्म अफसर रद्दी की टोकरी में डालते हैं। अगर जनता के भीतर जागरूक लोगों के संगठन या अकेले जागरूक नागरिक भी सार्वजनिक मुद्दों को लेकर सरकार और अदालत तक पहुंचने का सिलसिला चलाएंगे, तो ऐसे प्रदेश भी राजनीतिक ताकत की गुंडागर्दी से आजाद हो सकेंगे। आज सार्वजनिक जगहों पर धर्म, राजनीति, सामाजिक संगठनों के नाम पर जिस तरह गुंडागर्दी दिखती है, उसमें कानून की इज्जत करने वाले आम लोग सबसे अधिक पिसते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। सत्ता पर काबिज लोग वोटों के फेर में लोगों में अराजकता को बढ़ाते चलते हैं, और उनके बीच अपनी ताकत भी दिखाते चलते हैं। जनता के बीच के लोग इसके खिलाफ जनहित याचिकाएं दायर करें, तो धीरे-धीरे नेताओं और अफसरों की बददिमागी खत्म हो सकती है। और फिर एक बात समझने की जरूरत है कि जब जागरूकता आती है, तो वह सहेलियों सहित आती है। एक जागरूक समाज सरकारी तालाबों, बगीचों, और खेल मैदानों के कारोबारी इस्तेमाल के खिलाफ भी उठ खड़ा होगा, सरकारी पैसों की बर्बादी के खिलाफ भी आवाज उठाएगा, और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी लोग संगठित होंगे। जैसा कि लोकतंत्र के बारे में कहा जाता है कि लोगों को वैसी ही सरकार हासिल होती है, जैसी सरकार के वे हकदार होते हैं। इसलिए लोगों को हकदार बनकर दिखाना होगा, तो उन्हें कोई काबिल सरकार मिलेगी, और बेहतर सरकारी काम मिलेगा, और सार्वजनिक जगहें बेहतर होंगी। आज का मुर्दा समाज अपने बच्चों के लिए निजी घर-दुकान तो छोडक़र जा सकता है, लेकिन यह समाज शहर को एक कब्रिस्तान की तरह मुर्दा छोडक़र भी जाएगा। अराजकता के खिलाफ लोगों को खड़ा होने की जरूरत है। दुनिया का इतिहास यह बताता है कि बिना किसी स्वार्थ के जब लोग जुल्म के खिलाफ जुटते हैं, तो उनके साथ धीरे-धीरे उम्मीद से अधिक लोग आ जाते हैं। हर प्रदेश और हर शहर में लोगों को सार्वजनिक जगहों के ऐसे बाहुबली इस्तेमाल के खिलाफ पहले सरकार को लिखना चाहिए, और फिर वहां असर न हो, तो अदालत जाना चाहिए।




