किसी धर्म या नस्ल के लोगों को कम बच्चे सुझाने का मतलब?

 19 मई, 2024

अमरीका की समाचार पत्रिका, टाईम, ने वहां के कई शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों से बात कर यह नतीजा निकाला है कि वहां अल्पसंख्यक कहे जाने वाली नस्लों, रंगों, और राष्ट्रीयता की महिलाओं पर परिवार नियोजन के लिए दबाव अधिक रहता है। अमरीका में आबादी कोई बड़ी दिक्कत नहीं है, और वहां कागजों पर संवैधानिक अधिकार पूरी तरह बराबर हैं, लेकिन फिर भी जगह-जगह से नस्लीय भेदभाव की शिकायतें आती हैं, और काले लोग, या लैटिन, मैक्सिकन, दूसरे अश्वेत समुदाय भेदभाव अधिक झेलते हैं। योरप के एक देश ग्रीनलैंड के बर्फीले इलाके में रहने वाले एक समुदाय की आबादी बढऩे से रोकने के लिए दूर राजधानी से अफसरों ने यह तय किया था कि इस इलाके की छोटी-छोटी स्कूली लड़कियों के बदन में भी गर्भनिरोधक फीट कर दिए जाएं। 1960 और 70 के दशक में एक समुदाय की आबादी को रोकने के लिए अफसरों और डॉक्टरों ने यह तय किया था, और छोटी-छोटी नाबालिग लड़कियों के मां-बाप की जानकारी के बिना, इन लड़कियों को कुछ समझाए बिना, उनके बदन में गर्भनिरोधक फीट कर दिए गए थे। अब बीते कुछ बरसों में जबसे इस शादी का भांडाफोड़ हुआ है, वहां की सरकार इस मामले की जांच करा रही है। दूनिया के कुछ और देशों में भी आदिवासी, मूलनिवासी, या दूसरे कमजोर तबकों के साथ ताकतवर, शहरी, शिक्षित तबके ऐसा ही करते आए हैं। अब अमरीका से आई यह खबर इसलिए कुछ चौंकाती है कि वहां की भाषा में जो लोग अल्पसंख्यक हैं, उनके खिलाफ अगर वहां की गोरी और ताकतवर आबादी इस तरह के भेदभाव की हिंसा करते आई है, तो वह अमरीका के अपने मानवाधिकार के दावों के खिलाफ जाने वाली बात है। 

लेकिन जरा सी देर के लिए यह सोचें कि डॉक्टर तबका ऐसा करता क्यों होगा? क्या इसके पीछे डॉक्टरों की यह सामाजिक जागरूकता और जवाबदेही भी हो सकती है कि कैसे उनके पास आने वाली महिलाएं अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद और बच्चे पैदा करने पर रोक नहीं लगा रही हैं? डॉक्टरों में हर कोई नस्लवादी या गैरजिम्मेदार हों ऐसा भी जरूरी नहीं है। दूसरी तरफ हर डॉक्टर को अपने देश के अल्पसंख्यक तबकों के साथ ऐसा बर्ताव करने से कोई फायदा होता हो यह भी जरूरी नहीं है। इसलिए हो सकता है कि कुछ डॉक्टर अपने मरीज के भले के लिए, उसके पारिवारिक और सामाजिक भले के लिए भी उसे गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित करते हों। जिस अमरीका से यह शोध निष्कर्ष सामने आया है, उस अमरीका में भी यही तमाम तबके अधिक गरीबी के शिकार हैं। ऐसे में उन्हें कम बच्चे की सलाह देने के पीछे कोई डॉक्टरी विशेषज्ञता होना जरूरी नहीं रहता, सामान्य समझबूझ और सद्भावना से भी ऐसी सलाह दी जा सकती है। 

अब हिन्दुस्तान में शाहरूख खान जैसे लोग सरोगेसी से तीसरा बच्चा पाते हैं, लेकिन उसे पालने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। दूसरी तरफ किसी गरीब परिवार में तीसरे बच्चे उस परिवार पर बहुत बड़ा बोझ रहते हंै, तब तक जब तक कि वे पढ़-लिखकर या कोई हुनर सीखकर किसी काम-धंधे में न लग जाएं। लेकिन हिन्दुस्तान के आम मुस्लिम परिवार की गरीबी तीसरे बच्चे की वकालत नहीं कर सकती। और चूंकि देश में दलित, आदिवासी, मुस्लिम ऐसे तबके हैं जिनमें गरीबी अधिक है, तो यह बात जाहिर है कि ऐसे तबकों को परिवार नियोजन की, नसबंदी या गर्भनिरोधकों की जरूरत आर्थिक और सामाजिक कारणों से भी अधिक है। यह बात पूरे देश पर आबादी के बोझ से कहीं अधिक इन परिवारों के अपने बोझ से जुड़ी हुई अधिक है कि क्या ये सचमुच एक और बच्चे का खर्च उठा सकते हैं? क्या ये इतने बच्चों के खानपान, पढ़ाई-लिखाई, इलाज, और व्यक्तित्व विकास का खर्च ढो सकते हैं ?

अमरीका की पूरी शोध को देखे बिना हम इस बात को लिख रहे हैं, इसलिए इसे अमरीका के इस निष्कर्ष से जोडक़र न देखा जाए। इसे दुनिया के उन तमाम देशों पर लागू करके देखा जाए जहां पर गरीबी हैं, या जिस धर्म और जाति के लोग, रंग और नस्ल के लोग अधिक गरीब हैं, उनसे जोडक़र देखा जाए। हमारा ख्याल है कि डॉक्टर भी अपने मरीज के बदन के साथ-साथ उसकी पारिवारिक और सामाजिक स्थिति को भी देखते हैं। हम अपने आसपास ही ऐसे डॉक्टर देखते हैं जो मरीज की आर्थिक स्थिति देखते हुए कई बार कम दाम की दवाईयां लिखते हैं, कम खर्चीले इलाज बताते हैं। अब ऐसे गरीब मरीजों के धर्म और उनकी जाति को लेकर एक निष्कर्ष यह भी निकल सकता है कि वे दलित-आदिवासी, या धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव कर रहे हैं। लेकिन अगर उनकी फिक्र मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए तो है, जैन अल्पसंख्यकों के लिए नहीं है, तो इसकी एक वजह यह हो सकती है कि जैन समाज आमतौर पर संपन्न रहता है, उसे परिवार को छोटा रखने की नसीहत देना उतना जरूरी नहीं रहता, जितना कि एक गरीब परिवार को देना रहता है। 

आज हिन्दुस्तान जैसे देश में कुछ लोग मुस्लिमों की आबादी बढऩे के आंकड़ों को लेकर एक भयानक तस्वीर दिखाने की कोशिश करते हैं। आंकड़े अपने आपमें कुछ नहीं बोलते, उन्हें अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल करके उनसे कई तरह के मतलब निकाले जाते हैं। इनमें से एक भारत में मुस्लिम आबादी की दहशत पैदा करने का भी है। अब ऐसी किसी मुस्लिम-विरोधी नीयत के बिना भी अगर कोई आमतौर पर, अमूमन गरीब मुस्लिम समाज को कम बच्चों की सलाह दे, तो वह साम्प्रदायिक मानने के बजाय उस समुदाय के भले की सलाह मानना बेहतर होगा क्योंकि कम बच्चों का ख्याल मुस्लिम परिवार बेहतर तरीके से रख सकेंगे, उन्हें अधिक दूर तक आगे बढ़ा सकेंगे। दूसरी तरफ मुस्लिम आबादी का मुकाबला करने के लिए जो हिन्दू नेता हर हिन्दू परिवार को चार, छह, या दस तक बच्चे पैदा करने का फतवा देते हैं, वे हिन्दुओं के दुश्मन के अलावा और कुछ नहीं है क्योंकि आज बहुत संपन्न परिवार भी दस बच्चों का खर्च नहीं उठा सकते, और आम परिवार में दस बच्चों का मतलब हर बच्चे का कुपोषण का शिकार होना, और अधिक से अधिक एक मजदूर बनने जितना काबिल बनना हो जाएगा। 

जो लोग आबादी बढ़ाने की बात करते हैं, या बढ़ाते हैं, वो खुद अपना नुकसान सबसे अधिक करते हैं। अमरीका में भी जो समुदाय आज गोरों के मुकाबले गरीब हैं, उनमें अधिक बच्चे पैदा करने से उनका कुछ भला नहीं होता है। अब वहां के डॉक्टर अगर किसी साम्प्रदायिक आधार पर इन नस्लों की आबादी बढऩे देने के खिलाफ हैं, तो वह एक अलग जांच और कार्रवाई का मुद्दा है। हम इस खबर की बड़ी सीमित जानकारी के आधार पर आज सिर्फ इतना कहना चाहेंगे कि जो तबके कमजोर हैं, उन्हें बहुत अधिक बच्चे पैदा करने के खिलाफ समझाना उन तबकों का नुकसान करना नहीं है, उनका फायदा करना ही है। अब ऐसे फायदे के साथ-साथ अगर कोई साम्प्रदायिक या नस्लभेदी नजरिया है, तो वह एक अलग बात है, लेकिन हम आमतौर पर आर्थिक रूप से कमजोर किसी भी समाज में बच्चों की सीमित संख्या के हिमायती हैं, और इसे उस समुदाय के खिलाफ साजिश मानना गलत होगा। 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 मई 2024



 

किस्म-किस्म के प्रेम और सेक्स संबंधों से पैदा हिंसा

19 मई 2024

 

 इन दिनों दुतरफा प्रेमसंबंधों, या इकतरफा आकर्षण, शादीशुदा जिंदगी के भीतर, या विवाहेत्तर संबंधों को लेकर इतने किस्म के कत्ल हो रहे हैं कि अखबार निचोड़ें तो उसमें से खून टपकने लगे। खबरें डराती हैं कि इस कदर बढ़ा हुआ व्यक्तिगत और सामाजिक तनाव कहां जाकर खत्म होगा। यह तो हुई हिंसा की बात, लेकिन हिंसा से परे भी इतने किस्म के जुर्म रोज दर्ज हो रहे हैं कि पुलिस जाने कैसे इन तमाम मामलों को अदालत में फैसले तक पहुंचा सकेगी। हर दिन आसपास से ही कई ऐसी गिरफ्तारियां सामने आ रही हैं जिनमें कहा जा रहा है कि नाबालिग को शादी का धोखा देकर उससे बलात्कार किया, और ऐसा करने वाला बालिग गिरफ्तार हुआ। इन मामलों से परे बहुत से और किस्मों के सेक्स-जुर्म सामने आ रहे हैं जो कि अलग-अलग किस्म की कहानियां बताते हैं। 

अब जो बात समझ नहीं पड़ती है, वह यह कि नाबालिग लड़कियों को ऐसे देहसंबंध में पडऩे की क्या हड़बड़ी है जिसमें उनसे शादी का कोई वायदा किया गया है? यह बात भी लडक़ी के बयान में ही सामने आती है, और हम किसी एक मामले में कोई शक किए बिना यह सोचते हैं कि क्या ये तमाम शिकायतें सही रहती हैं, या संबंध आपसी रजामंदी से बनते हैं, और चूंकि नाबालिग की सहमति का कोई मतलब नहीं होता, इसलिए बालिग नौजवान तुरंत गिरफ्तार भी हो जाते हैं। नाबालिग लड़कियों से देहसंबंध बनाने वाले बालिग नौजवानों से हमारी कोई हमदर्दी नहीं है, इसलिए उनके जेल जाने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन ऐसे मामलों से लड़कियों का भी जो नुकसान होता है उसे तो उन्हीं को झेलना पड़ता है। वैसे प्रसंग से हटकर एक बात हम यहां कहें जो कि हम बार-बार लिखते हैं, तो बलात्कारी की संपत्ति का एक हिस्सा बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला को मिलना चाहिए, ऐसा अगर होने लगे तो बलात्कारी कुछ हद तक तो हिचकना शुरू हो जाएंगे कि जेल से छूटने के बाद भी परिवार की धिक्कार और अधिक जारी रहेगी, क्योंकि बाकी परिवार संपत्ति का एक हिस्सा खो बैठेगा। 

कल छत्तीसगढ़ में सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एक गांव में एक नौजवान ने एकतरफा प्रेम में एक शादीशुदा, एक बच्चे की मां, और गर्भवती युवती को मार डाला क्योंकि वह एक वक्त उससे प्रेम करता था, शादी करना चाहता था, और लडक़ी के परिवार ने उसकी शादी कहीं और कर दी थी। तब से जब लडक़ी मायके आती थी, वह उसे परेशान करता था, और ऐसे ही एक हमले में उसे कैद भी हो चुकी थी। अब वह कैद से छूटकर आया था, और युवती अपने तीन बरस के बेटे सहित मां के घर आई हुई थी। इस हत्यारे ने इस परिवार में जाकर युवती के साथ-साथ उसके मां-बाप, बहन, बेटे को मार डाला, और इस खूनी मंजर के बीच खुदकुशी भी कर ली। एकतरफा प्रेम में ऐसा भयानक खूनखराबा हमें हाल-फिलहाल में याद नहीं पड़ रहा है, और एक साथ पांच कत्ल और एक खुदकुशी की खबर से सबका दिल भी दहल गया है। छठवां कत्ल अजन्मे बच्चे का हुआ है। एकतरफा कहे जा रहे इस प्रेम की हिंसा देखते हुए अब यह सोचने की जरूरत पड़ रही है कि समाज में प्रेम, देह, और शादी की ऐसी कितनी कमी हो गई है कि उसके लिए इस तरह की, इतनी बड़ी हिंसा की नौबत आ रही है? 

इसे सिर्फ एक सिरफिरे आशिक का काम मानकर पुलिस के अंदाज में मामले को बंद कर देना ठीक इसलिए नहीं होगा कि इससे समाज की व्यापक बीमारी पकड़ में नहीं आएगी। हिन्दुस्तानी समाज में प्रेम की जगह और संभावना जिस हद तक घटती चल रही है, उससे भी ऐसी हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है। लोगों को किसी एक से प्रेम होता है तो उसे ही वे जिंदगी का अंत मान लेते हैं, और दोनों तरफ के परिवार सहमत न हो तो ऐसे प्रेमीजोड़े आए दिन अपनी जिंदगी का अंत करते रहते हैं। यह पूरा सिलसिला समाज के इस प्रतिरोध से भी बढ़ रहा है जो कि दूसरे धर्म, दूसरी जाति, दूसरी आर्थिक संपन्नता में अपने परिवार का रिश्ता नहीं होने देना चाहते। नौजवान दिल हैं कि तन और मन की उनकी जरूरतें, परिवार की रोक-टोक से परे खड़ी होती हैं, और बढ़ती हैं। भारत का आम समाज जब तक प्रेम का दुश्मन बने रहेगा, तब तक आत्मघाती या जानलेवा हिंसा बनी रहेगी। 

आपसी रिश्तों में हिंसा के एक दूसरे किस्म के मामले कुछ अलग तरीके से चौंका रहे हैं। इन दिनों लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि कहां पर किसी पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर या भाड़े के हत्यारे जुटाकर अपने पति का कत्ल करवा दिया। अभी तक इसका उल्टा तो होते आया था कि पति कत्ल करवाते थे, और पत्नियों की जान जाती थी। हाल के बरसों में ये दूसरी किस्म की खबरें भी लगातार बढ़ रही हैं, और कुछ मामलों में तो बिना किसी प्रेमी के भी अपने शराबी या बदचलन पति से थकी हुई महिला खुद भी उसका कत्ल कर दे रही है, या भाड़े के हत्यारे जुटा रही है। हम इसे हाल के बरसों में भारतीय महिला का एक अलग किस्म का सशक्तिकरण भी देख रहे हैं जिनमें वह अपने पर होते जुल्म को और अधिक बर्दाश्त करने से मना कर दे रही है, और प्रतिरोध, प्रतिकार, या प्रतिहिंसा पर उतर आ रही है। अगर भारतीय महिलाओं में अपने अधिकारों के लिए इस किस्म की हिंसक जागरूकता आती है, तो इससे परिवारों के भीतर हिंसा की घटनाओं में एकदम से इजाफा होगा क्योंकि अभी तक तो महिलाएं हिंसा झेलते ही आई हैं। 

हमारा ख्याल है कि समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक अध्ययन करने वाले लोगों को ऐसी पारिवारिक और निजी हिंसा की वजहों पर शोध करना चाहिए। यह सामाजिक अध्ययन इसलिए भी जरूरी है कि परिवारों और समाज के भीतर की हिंसा को बढऩे से रोकने के कुछ तरीके सोचे जा सकें, और परामर्शदाताओं को भी ऐसी शोध से मदद मिल सके। फिलहाल चारों तरफ फैल रही अभूतपूर्व और असाधारण दिख रही हिंसा से बचने के तरीके सोचने चाहिए, और आसपास के लोगों में अगर हिंसक भावना दिखे तो उन्हें समझाने की कोशिश होनी चाहिए। बहुत बड़ी हिंसक भावना बिना किसी लक्षण के अचानक खड़ी नहीं हो जाती, इसलिए करीबी लोगों को ऐसी नौबत का अंदाज पहले से लग सकता है, और वे चाहें तो विचलित व्यक्ति को समझा-बुझाकर, और बाकी परिवार के साथ परामर्श करके हिंसा के खतरे को घटा सकते हैं।  

(Daily Chhattisgarh) 


...नीट का पर्चा एनडीए राज्यों में ही आऊट क्यों?

18 मई 2024

 

भारत के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए होने वाले इम्तिहान, नीट, के पर्चे लीक करके उसे आधा-पौन करोड़ तक में एक-एक छात्र को बेचने, और उसके आधार पर तैयारी करवाकर इम्तिहान दिलवाने का भांडा फोड़ हुआ है। इस पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका में अदालत ने इम्तिहान पर रोक तो नहीं लगाई है, लेकिन केन्द्र सरकार को नोटिस जरूर जारी किया है जो कि नीट इम्तिहान आयोजित करती है। इस जनहित याचिका में अदालत से कहा गया है कि इसका एक पर्चा लीक हुआ है, और उसके आधार पर अगर इम्तिहान होता है तो उससे दाखिला प्रभावित होगा, और प्रतिभाशाली छात्रों का हक मारा जाएगा। याचिका में कहा गया है कि मोटी रकम देकर ऐसे पर्चे खरीदने वाले लोगों से बाकी छात्रों का समानता और बराबरी के अवसरों का बुनियादी हक मारा जा रहा है, और कुछ संपन्न छात्रों को इससे नाजायज फायदा मिल रहा है। खबरें बताती हैं कि गुजरात और बिहार में संगठित शिक्षा-माफिया इस पर्चा-लीक के पीछे है, और बहुत से ऐसे बयान मिल गए हैं जिन्होंने बताया कि उनके मां-बाप ने लीक हो चुके पर्चे का इंतजाम किया था, और उन्हें रात भर इन्हीं सवालों की तैयारी करवाई गई, और अगले दिन यही पर्चा आया भी। 

अब देश भर में कुछ अलग-अलग मेडिकल-दाखिला इम्तिहान होते थे जिनको सबको खत्म करके राष्ट्रीय स्तर पर नीट लेना शुरू किया गया, और उस वक्त भी दक्षिण भारत के तमिलनाडु जैसे राज्य नीट का जमकर विरोध कर रहे थे। जबकि आम धारणा यह है कि दक्षिण में पढ़ाई का स्तर बेहतर है, और राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी दाखिला इम्तिहान में दक्षिण भारत के राज्य, और महाराष्ट्र जैसे बेहतर पढ़ाई वाले राज्य के छात्र-छात्राओं का दबदबा रहेगा। लेकिन अब अगर गुजरात और बिहार के करोड़पति मां-बाप पर्चे खरीदकर अपने बच्चों के पास होने की गारंटी करवा ले रहे हैं, तो इससे पूरे देश में ही प्रतिभाशाली बच्चों की संभावनाएं खत्म होती हैं। यह सिलसिला कई तरह से खतरनाक है, एक तो इससे देश की सरकार और लोकतंत्र पर लोगों का भरोसा खत्म होता है, और फिर गरीब बच्चों के मन में यह निराशा स्थाई रूप से बैठ जाएगी कि वे कुछ भी कर लें, दाखिला तो करोड़पतियों के पर्चे-खरीदे बच्चों का ही होगा। गरीब बच्चों के मनोबल टूटने का एक लंबा नुकसान होगा जिससे उबरना भी मुश्किल होगा। और फिर ऐसे बच्चे आगे चलकर सरकार, कानून, और लोकतंत्र के लिए मन में हिकारत पाल लेंगे, और देश के लिए यह भारी पड़ेगा। 

सिर्फ यही दाखिला इम्तिहान नहीं, अलग-अलग राज्यों में, और केन्द्र सरकार की नौकरियों के लिए जितने तरह की चयन-परीक्षाएं होती हैं, उनमें भी जहां-जहां बेईमानी होती है, राजनीतिक या आर्थिक आधार पर लोगों को चुना जाता है, उससे भी गरीब और मेहनती बच्चों में डिप्रेशन भर जाता है। उनकी पढ़ाई-लिखाई में दिलचस्पी भी घट जाती है कि आगे जाकर स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई से तो नौकरी भी नहीं मिल पाएगी, और नौकरी तो खरीदनी ही पड़ेगी। जब देश की नौजवान पीढ़ी और उससे भी कम उम्र के बच्चों में यह धारणा घर कर जाएगी तो लोगों के मन में पढ़ाई का महत्व खत्म हो जाएगा। यह कुछ उसी किस्म का होगा जिस तरह कि जब सरकारें बहुत भ्रष्ट हो जाती हैं, तो लोगों की टैक्स देने में दिलचस्पी खत्म हो जाती है। लोगों को लगता है कि हम ईमानदारी से टैक्स दें, और उस पैसे को खर्च करते हुए सत्ता पर बैठे नेता और अफसर बेईमानी करते रहें, तो फिर ऐसा टैक्स दिया ही क्यों जाए? आज वैसे भी हिन्दुस्तान में स्कूलों की पढ़ाई एक नकली पुतले की तरह बन गई है, और पैसे वाले मां-बाप अपने बच्चों के लिए किसी महंगे कोचिंग सेंटर में दाखिला जुटाते हैं, और वह कोचिंग सेंटर बच्चों को स्कूल के बोझ से बचाने के लिए अपनी किसी डमी स्कूल में उनका दाखिला दिखा देते हैं, और बिना क्लास में गए उन्हें हाजिरी मिलती रहती है। दशकों से यही सिलसिला चले आ रहा है, और अब जाकर किसी एक स्कूल शिक्षा बोर्ड ने ऐसे स्कूलों की मान्यता खत्म की है जो छात्र-छात्राओं को दिखावे का एडमिशन दिखाती हैं। 

भारत की शिक्षा व्यवस्था वैसे भी गरीब और अमीर के बीच, सरकारी और निजी के बीच, हिन्दी और अंग्रेजी के बीच, तरह-तरह के विरोधाभासों से भरी हुई है, और ये विसंगतियां बढ़ती ही चली जा रही हैं। जिस तरह से निजी महंगी स्कूलों के बाद अब निजी महंगे विश्वविद्यालय हावी हो गए हैं, उनसे भी यह समझ पड़ता है कि आगे की ऊंची पढ़ाई में दाखिले के लिए पैसों का बोलबाला काम आता है क्योंकि महंगी कोचिंग पाने वाले बच्चों की संभावना मुकाबले में बढ़ जाती है। अब इससे भी सौ कदम आगे जाकर अगर खरीदे गए पर्चों से तैयारी करके कुछ अतिसंपन्न बच्चे दाखिला पा जाएंगे, तो इससे नीट जैसी राष्ट्रीय स्तर की दाखिला-परीक्षा शुरू करना ही नाजायज होगा। जिन दो राज्यों गुजरात और बिहार में साजिश करके नीट का पर्चा लीक किया गया है, दोनों ही जगहों पर भाजपा-एनडीए की सरकारें हैं, और केन्द्र सरकार को इस भयानक जुर्म को अपनी राज्यों की सत्ता के साथ जोडक़र भी देखना चाहिए। कहने के लिए जिस इम्तिहान का इंतजाम बड़ा सख्त है उसके पर्चे जुटाने और बेचने में अगर गुजरात और बिहार इस तरह उजागर हुए हैं, तो यह बात वहां की राज्य सरकार के भी फिक्र करने की है जिसकी कि इज्जत इससे खराब हो रही है। 

हमारा ऐसा ख्याल है कि दाखिला-इम्तिहानों से लेकर नौकरियों तक अगर कोई संगठित जुर्म हो रहा है, तो उसके लिए अधिक सजा का प्रावधान भी किया जाना चाहिए। क्योंकि ऐसी एक-एक परीक्षा को प्रभावित करने का काम लाखों बच्चों की जिंदगियां प्रभावित करता है, और फिर कॉलेजों में दाखिले से लेकर सरकारी नौकरियों तक में अगर कम प्रतिभाशाली बच्चे चुन लिए जाते हैं, तो आगे की पढ़ाई और नौकरी दोनों की क्वालिटी खराब होना तय है। केन्द्र सरकार को अपने इस इम्तिहान की साख बचाने के लिए भी इस बार की पूरी साजिश का भांडाफोड़ करना चाहिए, और आगे ऐसा न हो उसके लिए बेहतर इंतजाम करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 18 मई 2024


 

केजरीवाल की रफ्तार से किसी और का उत्थान और पतन नहीं हुआ था..

 17 मई 2024

 

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल निर्वाचित जनप्रतिनिधि होने के नाम पर लोकसभा चुनाव प्रचार के बीच सुप्रीम कोर्ट से एक असाधारण जमानत पाकर चुनाव प्रचार तक बाहर तो आ गए, लेकिन उनकी बोलती बंद है। इसके पहले कि वे चुनाव प्रचार के लिए निकल पाते, उनकी एक सबसे पुरानी सहयोगी और पार्टी की राज्यसभा सदस्य स्वाति मालीवाल पर उन्हीं के घर के ड्राईंग रूम में उन्हीं के निजी सहायक ने हमला किया, और स्वाति को पीटा। स्वाति की रिपोर्ट पर दिल्ली पुलिस ने उनका मेडिकल करवाया है, और अब केजरीवाल के इस बहुत पुराने निजी सहायक विभव कुमार की तलाश जारी है। इस हमले को चार दिन हो चुके हैं, आम आदमी पार्टी के सांसद-प्रवक्ता संजय सिंह ने मीडिया के सामने मंजूर किया है कि अरविंद केजरीवाल के सीएम आवास पर उनसे मिलने पहुंचीं स्वाति से ड्राईंग रूम में केजरीवाल के निजी सहायक ने बहुत बुरा सुलूक किया है जो शर्मनाक है, और मुख्यमंत्री इस पर कार्रवाई करेंगे। बात-बात में सार्वजनिक आरोप उछालने वाले और सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाने वाले अरविंद केजरीवाल अपने खुद के घर में एक महिला सांसद की पिटाई पर चार दिन में मुंह भी नहीं खोल पा रहे हैं, और यह हमलावर उनका निजी सहायक उसके बाद भी लखनऊ एयरपोर्ट पर देखा गया है। स्वाति मालीवाल का कहना है कि इस निजी सहायक ने उन्हें चेहरे पर थप्पड़ें मारीं, गंदी गालियां दीं, और कहा कि वह उन्हें तबाह कर देगा। उन्होंने पुलिस को यह भी कहा है कि उनकी छाती पर और उनके बदन के निचले हिस्से में भी विभव कुमार ने वार किए। स्वाति के फोन से सीएम हाऊस के भीतर से ही दिल्ली पुलिस को फोन करके बताया गया था कि सीएम की पीए ने उन पर हमला किया है। 

नीति और सिद्धांत की बात करने वाला कोई नेता न भी हो, दिल्ली का सीएम या अपनी पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक न भी हो, कोई आम इंसान भी अपने घर पहुंची महिला को अपने पीए से पिटवाने की हिंसानियत नहीं दिखा सकते। अब यह केजरीवाल परिवार के भीतर की बात है कि स्वाति मालीवाल को अरविंद केजरीवाल ने पिटवाया है, या राजनीति में अभी सक्रिय हुईं उनकी पत्नी ने। दिल्ली की अफवाहें यह भी कहती हैं कि सुनीता केजरीवाल स्वाति मालीवाल को नापसंद करती हैं, और वे भी इस हमले के पीछे हो सकती हैं। जो भी हो, अगर सीएम की बीवी उनके सरकारी निवास पर एक महिला राज्यसभा सदस्य पर हमला करवा रही है, तो यह भी केजरीवाल की जिम्मेदारी बनती थी कि वे अपने पीए और पत्नी के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाते। अब हो सकता है कि केजरीवाल को यह मलाल हो रहा हो कि वे सुप्रीम कोर्ट से जमानत लेकर बाहर आए ही क्यों कि उनके सार्वजनिक जीवन का यह सबसे बड़ा बवाल खड़ा हो गया जो कि उन्हें सिर्फ धिक्कार का हकदार बनाता है। गिने-चुने दिनों के चुनाव प्रचार के लिए इतनी लड़ाई के बाद मिली जमानत मानो नाली में बह जा रही है, और केजरीवाल किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं बचे। लखनऊ में अखिलेश यादव के साथ उनकी प्रेस कांफ्रेंस में उनसे सिर्फ स्वाति मालीवाल पर सवाल किए गए, उनके होंठ सिले रहे, और उनकी तरफ से संजय सिंह मणिपुर से लेकर कर्नाटक के रेवन्ना सेक्सकांड तक को गिनाते रहे, सिवाय स्वाति मालीवाल मामले पर जवाब देने के। 

बाजार में दो तरह की चर्चाएं हैं, एक तो यह कि अपने को जमानत दिलवाने वाले, और ईडी के खिलाफ बाकी मामले लडऩे वाले दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी को राज्यसभा भेजने के लिए केजरीवाल की तरफ से स्वाति मालीवाल पर दबाव डाला जा रहा था कि वे इसी बरस राज्यसभा में पाई अपनी सीट खाली कर दें। दूसरी अप्रिय निजी जीवन की चर्चा का जिक्र हम ऊपर कर चुके हैं कि केजरीवाल के जेल रहने पर उनकी पत्नी ने किस तरह राजनीतिक मामलों में अगुवाई शुरू की थी, और सोनिया गांधी के साथ मंच पर दिखी थीं। यह पूरा सिलसिला किसी डबरे के पानी में कीचड़ घुल जाने से गंदला हो गया लगता है। जिस केजरीवाल ने नैतिकता की दुहाई देते हुए अन्ना हजारे नाम के खादी की खाल ओढ़े एक पाखंडी के साथ मिलकर मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार हराने का काम किया था, वही केजरीवाल अब ईमानदारी और नैतिकता के हर पैमाने पर खोटा साबित हो रहा है। सिर्फ दिल्ली और पंजाब की चुनावी कामयाबी सब कुछ नहीं होती। देश की कुछ और पार्टियां भी सारी नैतिकता और ईमानदारी, सारा लोकतंत्र छोडक़र चुनावी कामयाबी पा रही हैं, ऐसे में केजरीवाल और उनकी पार्टी का औरों से कोई फर्क नहीं रह गया है। अपनी पार्टी और अपने घर के इस भयानक विस्फोटक, अभूतपूर्व और शर्मनाक जुर्म के बारे में वो मुंह खोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं, और ऐसा लगता है कि उन्हें लोकतंत्र के नाम पर जमानत देने वाले सुप्रीम कोर्ट जजों को भी शायद निजी हैसियत में यह मलाल हो रहा होगा कि उन्होंने भला यह किस आदमी के लिए इतने बड़े लोकतांत्रिक मूल्यों का आधार लेकर जमानत दे दी। 

इस पूरे मामले से केजरीवाल एक बहुत ही घटिया नेता और इंसान की तरह सामने आए हैं, इसके साथ-साथ यह बात भी भयानक है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से राजनीतिक दल में बदला यह एनजीओ भी डेढ़ दशक के भीतर ही एक कुनबापरस्त और तानाशाह पार्टी में बदल गया है। आज इस मौके पर यह भी याद पड़ता है कि किस तरह प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, आशुतोष जैसे कितने ही लोग केजरीवाल को छोडक़र चले गए, और आम आदमी पार्टी से बाहर हो गए। इतन कम दौर में इतने उत्थान और ऐसे पतन वाले केजरीवाल शायद अकेले ही नेता होंगे। बड़ी बात यह नहीं है कि केजरीवाल के बंगले पर उनकी राज्यसभा सदस्य पर उनके पीए ने शारीरिक हमला किया, बड़ी बात यह है कि इस पर चार दिन बाद भी मुख्यमंत्री को कुछ करना जरूरी नहीं लगा है। यह तो मुख्यमंत्री के रूप में संविधान की ली गई शपथ के भी खिलाफ है। यहां पर यह चर्चा करना भी जरूरी है कि यह मामला सिर्फ राष्ट्रीय महिला आयोग की जांच का नहीं है, जो कि बड़े उत्साह से ओवरटाईम कर रहा है, बल्कि यह राज्यसभा के सभापति की दखल का मामला भी है क्योंकि स्वाति मालीवाल राज्यसभा सदस्य हैं। 

हम शराब घोटाले में केजरीवाल सरकार और आम आदमी पार्टी पर साढ़े तीन सौ करोड़ रिश्वत के आरोपों को भी राजनीतिक या सरकारी मानकर अदालती फैसले तक उसे सीमित महत्व का मान सकते थे, लेकिन एक महिला के साथ केजरीवाल परिवार द्वारा करवाई गई ऐसी भयानक हिंसा को शराब घोटाले के मुकाबले अधिक अनैतिक काम मान रहे हैं जिसका कोई बचाव नहीं हो सकता। इस घटना के बाद केजरीवाल की चुप्पी जितनी लंबी खिंचती चली जाएगी, उनकी नाक उतनी ही कटती चली जाएगी। यह मामला देश की हर पार्टी के लिए एक मिसाल रहेगा, और सबके लिए यह सबक भी रहेगा कि एक महिला राज्यसभा सदस्य को इस तरह पिटवाकर कोई बच नहीं सकते। अब दिल्ली सीएम के बंगले में लगे हुए सारे कैमरे जो कि लगाए तो उनकी हिफाजत के लिए गए थे, अब वे काम आएंगे उनके खिलाफ सुबूत जुटाने में। हमें उम्मीद है कि केजरीवाल के काबिल वकील अभिषेक मनु सिंघवी उन्हें यह सलाह देंगे कि सीएम हाऊस के कैमरों की रिकॉर्डिंग को मिटाना एक जुर्म के सुबूत नष्ट करने का एक और जुर्म होगा। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 मई 2024

 


बिना लंगोट वाले राज्यपालों को संवैधानिक-सुरक्षा गलत

  16 मई 2024

  

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के खिलाफ वहां राजभवन की एक अस्थाई महिला कर्मचारी ने यौन शोषण का आरोप लगाया था जिसकी जांच बंगाल की पुलिस कर रही है, और उसने राजभवन कर्मचारियों से पूछताछ की इजाजत के अलावा राजभवन का सीसीटीवी फुटेज मांगा है। भारत की संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक राज्यपाल के खिलाफ कोई एफआईआर नहीं हो सकती, इसलिए वे अभी तक बचे हुए हैं। लेकिन राज्यपाल सी.वी.आनंद बोस ने इस महिला की शिकायत पर पुलिस जांच के बाद करीब सौ चुनिंदा पत्रकारों को राजभवन में इकट्ठा करके शिकायत में बताए गए घटना के दिन के सीसीटीवी फुटेज में से चुनिंदा हिस्सा उनके सामने अपने को बेकसूर साबित करने की कोशिश में रखा। खबरें बताती हैं कि इस फुटेज में शिकायतकर्ता महिला को भी दिखाया गया, जिससे उसकी निजता भंग हुई। यौन शोषण की शिकायत पर किसी भी महिला की पहचान, उसका नाम, कुछ भी उजागर करने पर कानूनी रोक है, और राज्यपाल ने ठीक यही किया। राज्य का संवैधानिक प्रमुख अगर ऐसी हरकत करता है, और उसे संवैधानिक सुरक्षा हासिल है, तो फिर ऐसी सुरक्षा के बारे में एक बार और सोचना चाहिए। लोगों को याद होगा कि आन्ध्रप्रदेश के राजभवन में कुछ दशक पहले उस वक्त राज्यपाल रहे नारायण दत्त तिवारी के भी कुछ वीडियो सामने आए थे जिनमें वे राजभवन के किसी कर्मचारी के साथ तो नहीं थे, लेकिन वहां के अतिथिगृह में आकर ठहरी एक महिला के साथ थे। ऐसे वीडियो के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। देश में अलग-अलग कई राजभवनों में राज्यपाल जितने छिछोरे किस्म के मामलों में उलझे हुए दिखते हैं, उनसे लगता है कि उन्हें मिली हुई ऐसी संवैधानिक सुरक्षा खत्म करनी चाहिए। वैसे भी किसी भी ओहदे पर बैठे हुए व्यक्ति को सिर्फ उसकी जिम्मेदारी के कामकाज से जुड़ी हुई कोई सुरक्षा देना शायद जायज होता हो, लेकिन निजी चाल-चलन, निजी भ्रष्टाचार, यौन शोषण जैसे मामलों में किसी को संवैधानिक हिफाजत देना पूरी तरह अलोकतांत्रिक है। अब राज्यपाल आनंद बोस के खिलाफ मानो यह शिकायत काफी नहीं थी कि एक ओबीसी नृत्यांगना ने बंगाल राज्यपाल के खिलाफ बंगाल पुलिस को एक शिकायत की थी जिसकी जांच अब पुलिस ने पूरी की है, और राज्य शासन को रिपोर्ट दे दी है। इस नृत्यांगना ने दिल्ली के एक होटल में ठहरने के दौरान उनसे मिलने के लिए दिल्ली का बंग भवन छोडक़र बिना सुरक्षा अकेले पहुंचे हुए राज्यपाल का जिक्र किया था, और शिकायत की थी कि उन्होंने होटल में उसका यौन उत्पीडऩ किया था। बंगाल पुलिस के मुताबिक बंग भवन में राज्यपाल के ठहरने, निकलने, और होटल में आने, वहां से जाने का सीसीटीवी फुटेज देख लिया गया है, और पहली नजर में इस महिला की शिकायत पुलिस ने सही पाई है। 

अब भारत में किसी भी व्यक्ति को ऐसी संवैधानिक सुरक्षा मिलना पूरी तरह अलोकतांत्रिक है जो कि उसके काम से जुड़ी हुई नहीं है। यही शिकायत अगर किसी छोटे सरकारी कर्मचारी या आम नागरिक के खिलाफ होती, तो उन्हें तो कोई हिफाजत नहीं मिल सकती थी। ऐसे में आम और खास के बीच यौन शोषण जैसे आरोप, या मध्यप्रदेश में एक वक्त राज्यपाल रहते हुए रामनरेश यादव के व्यापमं घोटाले में शामिल होने के आरोप सामने आए थे, लेकिन उनके रिटायर होने के बाद पुलिस कोई कार्रवाई पाती, उसके पहले ही वे गुजर गए, और कई किस्म की कानूनी परेशानियों से बच भी गए। अब ऐसे मामलों में किसी को कानूनी कार्रवाई से हिफाजत देना पूरी तरह अलोकतांत्रिक और नाजायज है। 2015 में जब यह मामला सामने आया था उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर हुई थी जिसमें एमपी के गवर्नर को हटाने की मांग की गई थी, और उस वक्त अदालत ने केन्द्र सरकार से इस पर जवाब भी मांगा था। उस वक्त की खबर बताती है कि सुप्रीम कोर्ट ने रामनरेश यादव को भी नोटिस जारी किया था जो कि अपने किस्म का एक असाधारण मामला था। 

लोकतंत्र में जनता के ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोगों को इतना तो ख्याल रखना चाहिए कि ऐसी शर्मिंदगी और कानूनी कार्रवाई झेलने के बजाय, ऐसे आरोप लगने पर वे कम से कम राजभवन की हिफाजत को छोडक़र घर तो चले जाएं। लेकिन ऐसे लोग इस दहशत में रहते होंगे कि राजभवन छोड़ते ही उन पर कार्रवाई हो सकती है, और इसीलिए वे कुर्सी से अधिक से अधिक वक्त तक चिपके रहना चाहते होंगे। और रिटायर होने के पहले ही गुजर जाने वाले राज्यपाल की तरह बाकी लोग भी उम्मीद करते होंगे कि हो सकता है कि रिटायरमेंट आने के पहले मौत ही आ जाए, तो किसी कार्रवाई का कोई टंटा ही नहीं रहेगा। और इस देश में तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक बेमिसाल मिसाल छोड़ी है कि बंगले के दफ्तर में मातहत कर्मचारी के यौन शोषण का आरोप लगने पर वे खुद ही इसकी सुनवाई के लिए बनी बेंच के मुखिया बनकर बैठ गए थे। इससे अधिक शर्मनाक कोई मिसाल देश के इतिहास में आज तक नहीं हुई है, और हमने यह बेंच बनने के दिन से ही इसे शर्मनाक करार देना शुरू किया था, यह एक अलग बात है कि साल-दो साल बाद जब रंजन गोगोई की किताब प्रकाशित हुई थी तो उन्होंने इस बेंच में खुद के बैठने को गलत फैसला माना था, तब तक हम दर्जन भर बार से अधिक अपने संपादकीय और कॉलम में इसे धिक्कार चुके थे। 

हम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के हर राज्यपाल के साथ वहां चलने वाले स्थाई टकराव को अनदेखा करना नहीं चाहते। लेकिन अगर एक के बाद एक महिलाएं राज्यपाल पर यौन शोषण का आरोप लगा रही हैं, तो हम इनके पीछे कोई राजनीति मानने से इंकार करते हैं, और उन महिलाओं का जांच और कार्रवाई का हक राजनीति से ऊपर मानते हैं। ऐसे में देश के संविधान में यह फेरबदल करना चाहिए कि निजी आचरण, भ्रष्टाचार, यौन शोषण जैसी शिकायतों पर किसी राज्यपाल, राष्ट्रपति, या जज, देश में किसी को भी कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए। लोकतंत्र जरा भी सभ्य होता तो बंगाल सरीखे राज्यपाल इस्तीफा देते, और फिर चाहे अपनी मोटी पेंशन से थाईलैंड आते-जाते रहते। लेकिन कुकर्मों को संवैधानिक हिफाजत देना पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, और हमारा ख्याल है कि एक व्यापक मुद्दा बनाकर अगर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाई जाएगी, तो उसकी सुनवाई की संभावना बनती है। देश में किसी वकील को, या जागरूक नागरिक को यह पहल करनी चाहिए। और क्या होगा, अधिक से अधिक सुप्रीम कोर्ट पिटीशन को खारिज करके लाख-पचास हजार रूपए जुर्माना लगा देगा, उसके लिए भी जनता के बीच से क्राउड फंडिंग से पैसा इकट्ठा किया जा सकता है।

दीवारों पर लिक्खा है, 16 मई 2024