कांग्रेस अब किस मुंह से बात करेगी नैतिकता की, बलात्कार-विरोध की?
19 सितंबर 2024
कांग्रेस के सबसे बड़े नेता, और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अभी अमरीका प्रवास पर भारत में सिक्खों की स्थिति पर एक झूठा बयान देकर अभी-अभी पूरी तरह से अवांछित विवाद खड़ा कर चुके हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की बखेड़े में फंसने की हसरत खत्म होने का नाम नहीं लेती है। अभी कांग्रेस के एक फैसले ने देश के करीब सौ भूतपूर्व बड़े अफसरों को इस पार्टी के खिलाफ खड़ा कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि जम्मू के चुनावों में जहां भाजपा और कांग्रेस भी दो प्रमुख पार्टियां रहेंगी, वहां पर भाजपा के कटु आलोचक, और कांग्रेस के अधिकतर मुद्दों पर समर्थक रहे हुए हर्षमंदर भी कांग्रेस के खिलाफ हो गए हैं। हर्षमंदर एक भूतपूर्व आईएएस हैं जो गुजरात दंगों के पहले से भाजपा और मोदी के खिलाफ रहते आए हैं, लेकिन अभी जिन 96 अफसरों ने कांग्रेस अध्यक्ष को एक कड़ा विरोधपत्र भेजा है, उस पर हर्षमंदर के भी दस्तखत हैं।
यह विरोधपत्र जम्मू के बसोहली विधानसभा क्षेत्र से चौधरी लाल सिंह नाम के एक आदमी को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाने के खिलाफ है। यह आदमी 2018 में भाजपा का मेम्बर था, और जब जम्मू के कठुआ में एक मंदिर में एक गरीब मुस्लिम खानाबदोश बच्ची से पुजारी की अगुवाई में आधा दर्जन से अधिक लोगों ने बलात्कार करके उसे मार डाला था, तो इन तमाम हिन्दू बलात्कारियों को बचाने के लिए जम्मू में तिरंगे और हिन्दू झंडों के साथ जो जुलूस निकलते थे, उनकी अगुवाई चौधरी लाल सिंह करता था। इन भूतपूर्व अफसरों ने कांग्रेस अध्यक्ष को लिखा है कि कठुआ का यह गैंगरेप भारत के ताजा इतिहास का सबसे भयानक नफरती-जुर्म था, और उसके मुजरिमों (बाद में सबको सजा हुई) को बचाने के लिए यही चौधरी लाल सिंह जुलूस निकालता था। उस वक्त भाजपा में रहा हुआ यह आदमी अब इस चुनाव में कांग्रेस का उम्मीदवार बन गया है। इस चिट्ठी में कांग्रेस अध्यक्ष को याद दिलाई गई है कि इस एक घटना ने जनचेतना को ऐसा झकझोरा था जैसा कि बहुत कम साम्प्रदायिक नफरती-जुर्म कर पाते हैं। आज जब देश भर में बलात्कार के जुर्म के खिलाफ जनता बुरी तरह विचलित है उस वक्त इस आदमी को अपना उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस पार्टी अपनी वह नैतिक ताकत खो चुकी है जिसे कि वह नफरत और हिंसा के खिलाफ रखने का दावा करती है। इस चिट्ठी पर सौ के करीब आईएएस, आईएफएस, और अखिल भारतीय सेवाओं के भूतपूर्व अफसरों के नाम हैं। इस पर हर्षमंदर के अलावा नजीब जंग, जॉय ओम्मेन, जैसे नाम भी हैं जो कि अलग-अलग समय पर छत्तीसगढ़-एमपी में काम कर चुके हैं। इस पर भूतपूर्व आईएएस अरूणा रॉय, और एन.सी.सक्सेना का नाम भी दिखता है जो कि हर्षमंदर के साथ-साथ यूपीए सरकार के वक्त सोनिया गांधी की अगुवाई वाली एन.ए.सी. (राष्ट्रीय सलाहकार परिषद) के सदस्य थे।
कांग्रेस के लिए यह नौबत एकदम ही भयानक है। हमारा ख्याल है इसके बाद महिलाओं पर हिंसा, और साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर बोलने का कांग्रेस का हक खत्म ही हो जाता है। इसके बाद कांग्रेस पार्टी किस मुंह से दूसरी पार्टियों के पसंदीदा बलात्कारियों की तरफ उंगली उठा सकेगी? एक बात तो यह भी समझ से परे है कि मुस्लिम खानाबदोश बच्ची के गैंगरेप के मुजरिमों को बचाने वाले को कांग्रेस में दाखिल कराना इस पार्टी की कौन सी मजबूरी थी? देश में यह लगातार तीन चुनाव हार ही चुकी है, जम्मू की एक विधानसभा सीट और हार जाने से इस पार्टी का भविष्य प्रभावित नहीं हो रहा था। न ही यह बलात्कार-समर्थक घोर साम्प्रदायिक-हिंसक नेता संसद में एक वोट से सरकार बचाने की हालत में था कि सरकार बचाने उसका साथ ले लिया जाता। यह तो कांग्रेस उम्मीदवार तय करने की बात थी, और पार्टी ने इस सीट पर अपने सारे स्वघोषित नीति-सिद्धांतों का पिंडदान कर दिया है। हमारा मानना है कि देश के रिटायर्ड अफसर इस पार्टी को इसकी नैतिकता याद दिला रहे हैं, और यह खुद उससे परे हो चुकी है। क्या कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी उम्मीदवार छांटते हुए उनके पुराने सार्वजनिक रिकॉर्ड भी नहीं देखती कि वे क्या-क्या करते आए हैं? क्या भाजपा से एक गंदगी कांग्रेस में लाते हुए भी इस पार्टी के भीतर किसी को गांधी-नेहरू की याद नहीं आई?
जम्मू के जानकार लोगों से बात करने पर यह भी पता लगता है कि कठुआ में बलात्कार की शिकार बच्ची की तरफ से अदालत में उसका केस लडऩे वाली एक हिन्दू महिला वकील, दीपिका को वकील तबके का बहिष्कार झेलना पड़ा था, धमकियां झेलनी पड़ी थीं, और इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू की अदालत से हटाकर पंजाब के पठानकोट की अदालत में भेजा था क्योंकि भारी सामाजिक दबाव और तनाव के चलते जम्मू में इसकी निष्पक्ष सुनवाई मुमकिन नहीं थी। बाद में अदालत ने सात में से छह लोगों को कैद सुनाई थी, तीन को 25-25 बरस और तीन को 5-5 बरस। और एक नाबालिग को अलग से जुवेनाइल कोर्ट में सजा सुनाई गई। कांग्रेस का पाखंड यह है कि जिस दिन कठुआ में इन बलात्कारियों को बचाने के लिए इसी चौधरी लाल सिंह की अगुवाई में जुलूस निकला था, उसके अगले दिन दिल्ली में इस बच्ची के बलात्कार-कत्ल के खिलाफ कैंडल मार्च निकल था जिसमें राहुल और प्रियंका दोनों शामिल हुए थे। अब बलात्कारी-बचाओ जुलूस का नेता कांग्रेस का उम्मीदवार है। यह भी याद रखने की बात है कि जम्मू-कश्मीर की उस वक्त की गठबंधन सरकार में यही चौधरी लाल सिंह भाजपा की तरफ से मंत्री था, उसे और भाजपा के एक और मंत्री को बलात्कारी-बचाओ जुलूस की वजह से पार्टी ने मंत्री पद से हटाया था। अब भाजपा की उस गंदगी को कांग्रेस अपने सीने पर मैडल की तरह टांगकर नैतिकता की शोभायात्रा निकाल रही है। जम्मू के लोगों को अच्छी तरह याद है कि जब भारत जोड़ो यात्रा के तहत राहुल गांधी जम्मू में दाखिल हुए थे, तो इसी चौधरी लाल सिंह ने चारों तरफ बड़े-बड़े होर्डिंग सहित राहुल के स्वागत का इंतजाम किया था। यह एक अलग बात है कि राहुल के मंच पर इस आदमी को नहीं आने दिया गया था।
कांग्रेस की यह बड़ी दुखभरी कहानी है जो कि पार्टी के एक बहुत बुरे पतन का सुबूत है। इस आदमी की विधानसभा सीट बसोहली पर वोट 1 अक्टूबर को डलने हैं। नाम वापिसी की तारीख दो दिन पहले निकल चुकी है, और उसके बाद ही इन भूतपूर्व अफसरों ने निराश होकर कांग्रेस अध्यक्ष को चिट्ठी लिखी है। हम राहुल गांधी को बस इतना याद दिलाना चाहते हैं कि 1952 के आम चुनाव में जब नेहरू अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार करने गए, और उन्हें चुनावी आमसभा के मंच पर ही पता लगा कि उनका उम्मीदवार एक बुरा इंसान है तो उन्होंने वोटरों से अपील की थी कि कांग्रेस उम्मीदवार को वोट न दें। राहुल गांधी में, और कांग्रेस पार्टी में अगर जरा भी नैतिकता बाकी है, तो उन्हें जम्मू जाकर इस सीट पर अपनी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार करना चाहिए। राहुल को अगर नेहरू की मिसाल से कोई सबक नहीं मिल सकता, तो वे राजनीतिक-नैतिकता में पूरी तरह निरक्षर रह जाएंगे।
फिलीस्तीनी झंडों पर गिरफ्तारी, छत्तीसगढ़ पुलिस ने किए दो जुर्म
18 सितंबर 2024
छत्तीसगढ़ ने कल एक अलग किस्म का रिकॉर्ड कायम किया है, अपने ही देश भारत सरकार की घोषित नीतियों के खिलाफ जाकर इसकी पुलिस ने मुस्लिमों के ईद मिलादुन्नबी जुलूस में फिलीस्तीन के झंडे लगाने को लेकर जुर्म कायम किया है, और पांच मुस्लिमों को गिरफ्तार भी कर लिया है। पुलिस ने इन लोगों को नए लागू किए गए भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम की धारा 197 (2) के तहत गिरफ्तार किया है। इस कानून को देखें तो यह राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले, लांछन लगाने, बयान देने, लिखने, या कोई नजारा पेश करने पर लागू होता है। इसका सेक्शन-2 किसी उपासना स्थल में या धार्मिक उपासना या धार्मिक कर्म में लगे हुए किसी जमाव में यही सब काम करने पर लागू होता है, और इसमें पांच बरस तक कैद का प्रावधान है। बिलासपुर के कुछ धर्मान्ध लोगों ने पुलिस में जाकर ईद के मौके पर फिलीस्तीनी झंडे फहराने को देशद्रोह करार करते हुए शिकायत दर्ज कराई थी, और ऐसे वीडियो जारी किए थे कि आतंकियों के हिमायती ऐसे लोगों को बिलासपुर में रहने नहीं दिया जाएगा। पुलिस ने आनन-फानन कुछ मुस्लिम नौजवानों को गिरफ्तार किया, और देश की अखंडता को नुकसान पहुंचाने का यह जुर्म लगा दिया।
यह मौका मुस्लिमों के एक बड़े सालाना त्यौहार ईद मिलादुन्नबी का था, और इस मौके पर फिलीस्तीन के झंडे फहराने का एक संदर्भ भी था। मुस्लिम देश फिलीस्तीन इजराइल के हमलों तले मलबा बन गया है, और 40 हजार से अधिक लोगों को मार डाला गया है। यह बात संयुक्त राष्ट्र संघ पिछले 11 महीनों में सौ से अधिक बार बोल चुका है, और दुनिया के बहुत से देश फिलीस्तीन पर इस जुल्म के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालतों में जा चुके हैं जहां से इजराइल के खिलाफ फैसले हुए हैं। खुद संयुक्त राष्ट्र संघ ने इतने प्रस्ताव इजराइल के खिलाफ पास किए हैं, इतने बार सार्वजनिक रूप से इन हमलों को रोकने की मांग की है कि उसकी गिनती मुमकिन नहीं है। दूरदर्शन की वेबसाइट बताती है कि 22 अक्टूबर 2023 को भारत ने फिलीस्तीनियों के लिए साढ़े 6 टन मेडिकल मदद, और 32 टन आपदा प्रबंधन सामान भारतीय वायुसेना के विमान से भेजा है। फिलीस्तीन घोषित रूप से भारत का एक मित्र देश है, और भारत सरकार की वेबसाइट कहती है कि फिलीस्तीनियों को भारत का समर्थन भारत की नीति का एक अविभाज्य हिस्सा है। 1974 में भारत पहला गैर अरब देश था जिसने फिलीस्तीनी मुक्ति संगठन को मान्यता दी थी, और 1988 में भारत फिलीस्तीनी राज्य को मान्यता देने वाले सबसे पहले देशों में से एक था। इस 15 जुलाई को भारत ने फिलीस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र राहत एजेंसी को 25 लाख डॉलर का योगदान दिया है, और 1974 में भारत ने फिलीस्तीनियों के अधिकारों का समर्थन करते हुए डाक टिकट जारी की थी।
हम यहां पर आज अगर फिलीस्तीन के बारे में गांधी ने क्या-क्या कहा था, उसका जिक्र करेंगे, तो आज देश और इसके कई प्रदेशों की सरकारों को वह बात नहीं सुहाएगी। लेकिन हम इनकी सहूलियत के लिए भारत के विदेश मंत्री बनने के पहले अटल बिहारी वाजपेयी का दिया गया एक ऐतिहासिक भाषण भारत सरकार की संस्था प्रसार भारती के संग्रहालय से लेकर यहां सुनाना चाहते हैं। 1977 के चुनाव की विजय रैली की आमसभा में अटलजी ने मंच और माईक से कहा था- ‘जनता पार्टी की सरकार के बारे में कहा जा रहा है कि वह अरबों का साथ नहीं देगी, इजराइल का साथ देगी, तो इस बारे में प्रधानमंत्री मोरारजी भाई स्थिति को स्पष्ट कर चुके हैं। गलतफहमी को दूर करने के लिए मैं कहना चाहता हूं कि मध्य-पूर्व के बारे में यह स्थिति साफ है कि अरबों की जिस जमीन पर इजराइल कब्जा करके बैठा है वह जमीन उसे खाली करना होगी। आक्रमणकारी आक्रमण के फलों का उपभोग करे, यह हमें अपने संबंध में स्वीकार नहीं है, तो जो नियम हम पर लागू है, वह औरों पर भी होगा। अरबों की जमीन खाली होना चाहिए, जो फिलीस्तीनी है उनके उचित अधिकारों की स्थापना होना चाहिए। इजराइल के अस्तित्व को तो हम भी स्वीकार कर चुके हैं, मध्य-पूर्व का एक ऐसा हल निकालना पड़ेगा जिसमें आक्रमण का परिमार्जन हो, और स्थाई शांति की स्थापना हो, गलतफहमी की गुंजाइश कहां है?’
छत्तीसगढ़ का हाईकोर्ट जिस बिलासपुर शहर में बसा हुआ है, और जहां बैठे जजों ने कल अपने शहर में यह बहुत बड़ा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जुर्म देखा है, अब उनसे इस पर प्रतिक्रिया की हम राह देख रहे हैं। एक छोटे से मुल्क फिलीस्तीन पर लगातार फौजी हमलों से इजराइल ने 40 हजार से अधिक लोगों को मार डाला है, और ये तकरीबन तमाम मुस्लिम लोग हैं। ऐसे फिलीस्तीनियों से एकजुटता दिखाने के लिए पश्चिमी दुनिया में जगह-जगह विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में लोगों ने फिलीस्तीन के झंडे निकालकर उन्हें लहराया, थामकर फोटो खिंचाई। अनगिनत अंतरराष्ट्रीय खेल मुकाबलों में चैम्पियन खिलाडिय़ों ने फिलीस्तीन के झंडे लहराए। सभ्य दुनिया के लोकतांत्रिक लोगों में से कोई भी ऐसे नहीं है जो कि फिलीस्तीनियों के हमदर्द न हों। ऐसे में छत्तीसगढ़ के हाईकोर्ट के शहर में अगर घोर धर्मान्ध ताकतें एक मुस्लिम त्यौहार पर फिलीस्तीनियों से एकजुटता और हमदर्दी दिखाने के लिए उनके झंडे लगाने को राष्ट्रीय अखंडता पर हमला करार देती हैं, तो हमारा मानना है कि ये सुप्रीम कोर्ट में हेट-स्पीच के खिलाफ चल रहे मामले के तहत गुनहगार ताकतें हैं, और बिलासपुर पुलिस को मुस्लिमों और इन झंडों के खिलाफ प्रदर्शन करने वाली साम्प्रदायिक ताकतों पर सुप्रीम कोर्ट के हुक्म के मुताबिक हेट-स्पीच का जुर्म दर्ज करना चाहिए था, लेकिन उसने एक मित्र राष्ट्र के झंडे लगाने पर जुर्म कायम करके गिरफ्तारियां करके खुद ही देश की अखंडता को नुकसान पहुंचाया है, और एक मित्र राष्ट्र के साथ भारत के संबंधों को नुकसान पहुंचाया है। इसलिए हमारा मानना है कि बिलासपुर पुलिस पर 197 (2) के तहत सोच-समझकर राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने का जुर्म तुरंत ही दर्ज किया जाना चाहिए। कल जैसे ही यह खबर आई हमने बिलासपुर के एक बड़े पुलिस अफसर से बात करते हुए यह याद दिलाया कि फिलीस्तीन तो भारत का मित्र राष्ट्र है, उसके झंडे फहराना जुर्म कैसे हो गया, तो उनका कहना था कि यह अदालत को तय करने दीजिए। यह हैरान करने वाली बात है कि अब अदालत यह तय करेगी कि फिलीस्तीन भारत का मित्र राष्ट्र है या नहीं? बिलासपुर पुलिस को अगर धर्मान्ध और साम्प्रदायिक ताकतों की तरफ से कोई शिकायत मिली थी, तो अक्ल का इस्तेमाल करते हुए, कानून के मुताबिक उसे खारिज कर देना था, लेकिन पुलिस ने इस साम्प्रदायिकता के घोड़े पर सवार होकर मुस्लिमों को जिस तरह रौंदा है, वह सुप्रीम कोर्ट के हेट-स्पीच आदेश के तहत भी जुर्म है, और देश की अखंडता को नुकसान पहुंचाना तो है ही।
पिछले कुछ महीनों में मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तरप्रदेश, और जम्मू-कश्मीर में फिलीस्तीनी झंडे फहराने को लेकर तरह-तरह से लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उन पर जुर्म दर्ज हुए हैं। हमें हैरानी इस बात की है कि सुप्रीम कोर्ट खुद होकर इन घटनाओं का नोटिस क्यों नहीं ले रहा है क्योंकि जाहिर तौर पर धर्मान्ध और साम्प्रदायिक ताकतें फिलीस्तीनी झंडे लहराने को इस अंदाज में पेश कर रही हैं कि मानो उन्हें भारतीय झंडे के विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा है। दुनिया के 21वीं सदी के सबसे बड़े जुल्म के शिकार फिलीस्तीन के साथ हमदर्दी दिखाते हुए उनके झंडे को लहराना, टांगना अगर हिन्दुस्तान की अखंडता पर खतरा बताकर लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है, तो सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर इस पर सुनवाई शुरू करनी थी। छत्तीसगढ़ सरकार के लिए आने वाले दिनों में अदालत की टिप्पणी एक बड़ी शर्मिंदगी लेकर आ सकती है। आज पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान के छत्तीसगढ़ को लेकर यह शर्मनाक नौबत है कि 40 हजार लाशों से हमदर्दी दिखाना इस प्रदेश में एक राष्ट्रीय जुर्म माना जा रहा है। दुनिया के सभ्य लोकतांत्रिक देश इस पुलिस कार्रवाई को कैसे देखेंगे, इसका अंदाज प्रदेश सरकार को चाहे न हो, भारत सरकार को तो कम से कम यह अंदाज होना चाहिए जिसे कि दुनिया भर में सवालों का सामना करना पड़ेगा। भारत में फिलीस्तीन का दूतावास है, केन्द्र सरकार उसे एक भाजपा शासित प्रदेश की इस कार्रवाई के बारे में क्या कहेगी? फिलहाल आज की सुबह तो बिलासपुर हाईकोर्ट के लिए एक चुनौती लेकर आई है कि वह अपने साये में एक मित्र राष्ट्र के साथ ऐसा सुलूक बर्दाश्त करते हुए चुप बैठता है, या कुछ करता है?
औसत आय के आंकड़े फरेबी, सिर्फ कामगारों की सरकार से परे की औसत आय ही असली
17 सितंबर 2024
राज्यों की अर्थव्यवस्था को लेकर देश में कई तरह की फिक्र चलती रहती है, और हम भी उस बारे में लिखते रहते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्य हैं जो कि खनिज से भरे-पूरे हैं, और लोहा, कोयला, सीमेंट पत्थर की मेहरबानी से राज्य को मोटी कमाई होती रहती है। कुछ राज्य पर्यटन की अर्थव्यवस्था पर चलते हैं, समंदर के किनारे के कुछ राज्य बंदरगाहों की वजह से माल के आयात-निर्यात का बड़ा फायदा पाते हैं, और तट पर ही कई तरह के उद्योग भी लग जाते हैं, गुजरात की संपन्नता की एक बड़ी वजह यह भी है। फिर बंदरगाह वाले राज्यों में ऐसे कारखाने भी अधिक लगते हैं, जो बाहर से आए हुए कच्चे माल से चलते हैं, या देश में ऐसे सामान बनाते हैं जो कि जहाजों से निर्यात हो जाते हैं। कश्मीर, राजस्थान, यूपी, और दक्षिण के कुछ राज्य बहुत समृद्ध हस्तशिल्प और हाथकरघा परंपराओं के कारोबार से भी संपन्न रहते हैं, और तीर्थ से लेकर दूसरे किस्म के पर्यटन तक का फायदा उन्हें देश-विदेश के सैलानियों की शक्ल में मिलता है। लेकिन ये तमाम चीजें कुदरत की वजह से मिली हुई हैं, किसी को खूबसूरत पहाडिय़ां मिली हैं, किसी को समुद्र तट मिले हैं, किसी को घने जंगलों में ऐसे वन्य प्राणी मिले हैं जिन्हें देखने दुनिया भर से लोग आते हैं।
लेकिन हम किसी राज्य की अर्थव्यवस्था, और उसमें किसी सरकार के योगदान का आंकलन इस हिसाब से भी करते हैं कि कुदरत की दी हुई चीजों से होने वाली कमाई से परे किस राज्य ने अपने इंसानों के हुनर और उनकी मेहनत से उनकी कमाई कितनी बढ़ाई है? खदानों से तो सरकार को कमाई होती ही है, लेकिन राज्य के नागरिकों की दक्षता और क्षमता को बढ़ाना, सिर्फ आम नागरिकों के बीच प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाना, सरकार की रियायत, और मनरेगा जैसे रोजगारों से परे सिर्फ नागरिकों की औसत आय को बढ़ाने का एक हिसाब राज्य सरकारों को लगाना चाहिए। अब अगर किसी राज्य में सोने या हीरे की खदान से कमाई शुरू हो जाए, या चलती हुई कमाई बढ़ जाए, वह एक अलग बात है। लेकिन अगर राज्य के कामगारों की औसत कमाई दस-बीस फीसदी भी बढ़ती है, और वह बाजार में मजदूरी या तनख्वाह में औसत बढ़ोत्तरी से अधिक बढ़ती है, तब हम उसे सरकार का योगदान मानते हैं। हमारा यह पैमाना थोड़ा सा जटिल इसलिए है कि देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था के आंकड़े राज्य के पब्लिक सेक्टर उपक्रमों से लेकर राज्य के कारखानों तक की कमाई को आम मजदूरों की कमाई से जोडक़र औसत निकालने वाले रहते हैं। इन आंकड़ों से यह समझ नहीं पड़ता कि अपने नागरिकों को बेहतर रोजगार या कामकाज के लिए सरकार किस तरह तैयार कर रही है, या उनके लिए बेहतर मौके मुहैया करा रही है। किसी भी सरकार को अपनी उपलब्धि इस पैमाने पर अलग से आंकनी चाहिए कि उसने नागरिकों को कहां से कहां पहुंचाया है, और इसे आंकते हुए धान खरीदी जैसे काम पर भारी सरकारी अनुदान के आंकड़ों को बिल्कुल अलग रखना चाहिए। आज खनिज रायल्टी की कमाई को अगर सरकार धान-किसान को दे देती है, तो इसमें सरकार ने जनता की कमाई में कोई स्वतंत्र बढ़ोत्तरी का योगदान नहीं दिया है।
हमारे ऐसे अलग पैमाने के पीछे हमारा एक मकसद है। इस देश में दक्षिण के तमाम राज्यों ने अपने लोगों को अंग्रेजी पढ़ाकर, टेक्नॉलॉजी सिखाकर, दुनिया भर की मशीनों पर काम करने के लायक उन्हें बनाकर उन्हें अधिक कमाई के लायक बना दिया है। आन्ध्र-तेलंगाना के लोग अमरीका में दसियों लाख की संख्या में काम कर रहे हैं, और अमरीकी पैमानों पर भी वे अधिक कमाई का काम कर रहे हैं। केरल के लोग खाड़ी के देशों में बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं, और वे केरल के अपने गांव-कस्बे या शहर में मुमकिन कमाई के मुकाबले कई गुना अधिक कमा रहे हैं। पंजाब के लोग कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे बहुत से देशों में कामयाबी से बसे हुए हैं। हम राज्य के लोगों की क्षमता में उसी तरह की बढ़ोत्तरी देखना चाहते हैं ताकि वे अपने प्रदेश में उनके लिए मुमकिन कमाई से काफी अधिक कमाई का कोई काम दूसरे प्रदेश में जाकर कर सकें, या दूसरे देश तक भी जा सकें। आज यह बात साफ है कि सरकार की राशन-मदद, मनरेगा जैसी रोजगार योजनाओं, मुफ्त बिजली, महतारी वंदन जैसी अलग-अलग राज्यों की योजनाओं के चलते हुए, लोगों का भूखा मरना बंद हो गया है। लेकिन अगर आबादी का एक बड़ा हिस्सा महज इतने से संतुष्ट होकर बैठे रह जाए, तो उसका मतलब तो यही होगा कि उसकी क्षमता और संभावनाओं को बढ़ाने में राज्य का योगदान नहीं रहा। और साथ-साथ हम यह भी कहना चाहते हैं कि अगर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य से मजदूर बाहर जाकर निर्माण कार्य करते हैं, ईंट भट्ठों पर ठेका-मजदूरी में घर के मुकाबले कुछ अधिक कमा लेते हैं, तो इसे हम राज्य की मानव क्षमता में विकास नहीं मानते।
आज दुनिया के कई देश गिरती हुई आबादी की वजह से परेशान हैं, और वहां पर बहुत बड़ी संख्या में कामगारों की जरूरत आज भी है, जो कि इस बाकी सदी में बढ़ती ही चलेगी। खुद चीन जैसा दुनिया का सबसे बड़ा कारखानेदार देश कामगारों की कमी से जूझ रहा है, और महज कागज पर संभावनाओं को देखें तो ऐसी भी संभावना बनती है कि भारत के मजदूर हुनरमंद हों, तो उन्हें चीनी कारखानों में भी काम मिल सकता है। यह सिर्फ एक काल्पनिक स्थिति है, क्योंकि दोनों देशों के बीच न अभी ऐसे रिश्ते हैं, और न ही सांस्कृतिक वातावरण ऐसा है। फिर भी आज हिन्दुस्तान के भीतर चीन के विकल्प के रूप में दुनिया की बहुत सी बड़ी कंपनियां अपना एक-एक कारखाना डालते चल रही हैं। इन कारखानों के लिए भी ऐसे ही राज्यों को छांटा जा रहा है जहां पर हुनरमंद कामगार हैं, और जो बंदरगाहों के करीब हैं। अब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में बंदरगाह तो लाया नहीं जा सकता, लेकिन सरकार अगर मेहनत करे तो यहां की नौजवान पीढ़ी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के लायक ऐसा हुनरमंद बनाया जा सकता है कि वे सरकारी नौकरी के मोहताज न रहें। ऐसा किसी भी राज्य के लिए इसलिए अच्छा होता है क्योंकि वहां से बाहर गए लोग अगर अधिक कमाते हैं, तो उसका एक हिस्सा अपने खुद के गांव-शहर में खर्च करते हैं, और वहां पर संपत्ति बनाते हैं जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान मिलता है। इसलिए देश के हर राज्य को अपने नौजवानों को काम दिलवाने के लिए अपनी सरहद के भीतर का तंग नजरिया नहीं रखना चाहिए, सरकारों को चाहिए कि नौकरी और रोजगार की अंतरराष्ट्रीय संभावनाओं को देखते हुए ऐसे नए कोर्स बनाएं जिन्हें करने वाले लोग अलग-अलग भाषाएं सीखकर उनके देशों में जाकर काम पा सकें। अपने लोगों को अगर सिर्फ सरकारी नौकरियों के लिए तैयार किया जाएगा, तो उनमें से भी 95 फीसदी लोगों को तो ये नौकरियां मिलेंगी नहीं, और वे राज्य पर ही बोझ बने बैठे रहेंगे। किसी नौजवान के बोझ बन जाने, और कमाऊ बन जाने के बीच का फर्क सरकार ही दूर कर सकती है। देश के भीतर भी जो विकसित राज्य हैं, वहां पर तो अब लगातार कामयाबी की वजह से सरकार से परे भी आम लोग और निजी क्षेत्र के स्कूल-कॉलेज, ट्रेनिंग सेंटर ऐसे रहते हैं कि वे नौजवान पीढ़ी को अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लायक तैयार कर देते हैं। हिन्दुस्तान के राज्यों को अपनी प्रति कामगार, गैर सरकारी अनुदान प्राप्त औसत आय का हिसाब लगाना चाहिए कि पांच बरस के कार्यकाल में लोगों को वह कहां से कहां तक पहुंचा पाई है।
रिकॉर्ड बुक में दर्ज करो ध्वनि प्रदूषण, कोलाहल से परेशान पहली खुदकुशी
16 सितंबर 2024
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पिछले दो बरस में छत्तीसगढ़ में तीन रिकॉर्ड कायम हो गए। पिछले बरस हाईकोर्ट वाले शहर बिलासपुर, हाईकोर्ट के हुक्म के खिलाफ अंधाधुंध डीजे बजाते विसर्जन जुलूस के कानफाड़ू शोर में एक बच्चे की मौत हो गई थी। इस बरस सरगुजा में डीजे के शोर में एक आदमी के दिमाग की नस फट गई, और ब्रेन हेमरेज से वह मर गया। इस पर भी जिस प्रदेश की नींद नहीं खुली है, उसके लिए कल की ताजा खबर है कि भिलाई में एक गणेश पंडाल के अंधाधुंध तेज लाउडस्पीकर से थककर दिल के मरीज एक बुजुर्ग ने उसकी आवाज कम करने को कहा, लेकिन उसे धीमा नहीं किया गया। पुलिस भी आकर कुछ नहीं करवा पाई। और गणेश कमेटी के अध्यक्ष ने आकर एसडीएम की मंजूरी का लेटर दिखाकर धमकी दी। आधी रात बाद गणेश पंडाल से फिर से लाउडस्पीकर का हंगामा शुरू हुआ, और इस वजह से खुदकुशी करने की चिट्ठी लिखकर इस आदमी ने फांसी लगा ली। यह छत्तीसगढ़ की पहली ध्वनि प्रदूषण आत्महत्या है, और इन दिनों जिस तरह भारत की कोई एक औने-पौने रिकॉर्ड दर्ज करने वाली किताब छत्तीसगढ़ में घूम-घूमकर अफसरों की मुसाहिबी के रिकॉर्ड दर्ज कर रही है, उसे प्रदेश की पहली ध्वनि प्रदूषण आत्महत्या भी दर्ज करनी चाहिए। अभी सुबह-सुबह खबर मिली है कि राजनांदगांव के करीब छुरिया में गणेश के लाउडस्पीकर के शोर को लेकर झगड़ा हुआ, और चाकूबाजी में कुछ लोग जख्मी हुए, और यह सब तब हो रहा है जब हाईकोर्ट छत्तीसगढ़ में ध्वनि प्रदूषण को इतनी गंभीरता से ले रहा है कि उसने कहा है कि अब डीजे बजाने पर कोलाहल अधिनियम के तहत मामला दर्ज न करके अदालत की अवमानना का मामला बनाया जाए। अभी तक अफसर दो-चार हजार का जुर्माना करके लोगों का जीना हराम करने का सामान छोड़ देते हैं।
इस मुद्दे पर लिखने का हमारा दिल जरा भी नहीं है क्योंकि हमारे पास दर्जनों बार पहले लिखी जा चुकी बातों के अलावा लिखने को नया कुछ नहीं है। लेकिन फिर भी जब छत्तीसगढ़ के लाउडस्पीकर एक बुजुर्ग इंसान को खुदकुशी करने पर मजबूर कर चुके हैं, तो ऐसे लाउडस्पीकरों के सम्मान में कुछ लिखना तो बनता है। न लिखने का मतलब ऐसे जानलेवा और हत्यारे लाउडस्पीकरों का सम्मान न करना हो जाएगा। और लाशें तो हमेशा ही गिनती की रहेंगी, किसी भी धर्म या जाति, या शादी-ब्याह के लाउडस्पीकरों से जो जीना हराम होता है, उसे लाशों की तरह गिना नहीं जा सकता। और जब तक किसी बात से लोग मर नहीं जाते हैं, उसे गंभीरता से नहीं लिया जाता। छोटे-छोटे बच्चों के सुनने की ताकत घट जाए, बिस्तर पर पड़े हुए बूढ़े लेटे-लेटे मर जाएं, तो उन्हें कौन लाउडस्पीकरों से जोडक़र देखेंगे। ऐसा लगता है कि एक वक्त का कृषि प्रधान देश भारत अब धर्मप्रधान हो गया है, और जब धर्म का कोई कर्म नहीं बचता, तो थोड़े वक्त के लिए लोग खेती कर लेते हैं, या बेरोजगार न हुए तो कोई और काम कर लेते हैं। धर्म जिसे कि निजी आस्था की बात रहना था, वह अब एक आक्रामक सार्वजनिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। और सरकारें इस आक्रामक जीवनशैली का सम्मान कर रही हैं। यह सिलसिला जाएगा कहां तक?
अब जब हाईकोर्ट कह रहा है कि कोलाहल अधिनियम की जगह अदालत की अवमानना दर्ज की जाए, और पूरे प्रदेश में अफसर हर गली-मोहल्ले में ऐसी अवमानना का साथ दे रहे हैं, तो न्यायपालिका का हाल पेनिसिलिन सरीखा हो गया है जो कि दशकों पहले बेअसर साबित होकर चलन से बाहर हो चुकी इतिहास की दवाई है। हमने पहले भी लिखा है कि जिस तरह संपत्ति बच्चों के नाम कर चुके बूढ़े मां-बाप की बात घर में अनसुनी की जाती है, कुछ वैसी ही हालत छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट की है। बरसों हो गए हाईकोर्ट लाउडस्पीकरों की हैवानियत पर हैरान है, परेशान है, और सरकार के पीछे उसी तरह लगा हुआ है जिस तरह भिलाई का वह बुजुर्ग अपने मोहल्ले के गणेश पंडाल के पीछे लगा था, और आखिर में कल उसे खुदकुशी करनी पड़ी क्योंकि पुलिस की कोई भी ताकत शोरगुल की इस गुंडागर्दी को रोक नहीं पाई। थाने तक जाने, और पुलिस के आने के बाद भी जहां गुंडागर्दी जारी है, वहां हाईकोर्ट अवमानना के जुर्म में गणेश पंडाल के आयोजकों को जेल भेजेगा, या इस बुजुर्ग की खुदकुशी में बराबरी की जिम्मेदार पुलिस को भी साथ-साथ उसी कोठरी में रखेगा? ऐसा लगता है कि हाईकोर्ट को अपने पेनिसिलिन बन जाने की हकीकत को मान लेना चाहिए, और किसी नए एंटीबॉयोटिक के बारे में नए मेडिकल-लीगल जर्नल में कुछ पढऩा चाहिए। छत्तीसगढ़ सरीखे राज्य में सार्वजनिक जीवन की अराजकता सिर चढक़र बोल रही है, अमन-पसंद लोगों का जीना हराम है, और शासन-प्रशासन मानो इस खौफ में हैं कि धर्म के नाम पर किए जा रहे ऐसे हिंसक शोरगुल को रोकने से खुद ईश्वर ही खफा हो जाएंगे। जबकि हमारा मानना यह है कि ऐसे कानफाड़ू शोरगुल को बर्दाश्त करना ईश्वर के बस में भी नहीं होगा, और वह चाहे कहीं भी चले जाए, ऐसे लाउडस्पीकरों की पहुंच से तो बहुत दूर रहेगा।
अभी हम ठीक से याद नहीं कर पा रहे हैं कि धार्मिक और दीगर किस्म के नियमित, संगठित, हिंसक, और अराजक लाउडस्पीकरों के खिलाफ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अधिक बार कहा है, या हमने उससे अधिक बार इसी जगह संपादकीय लिखे हैं! लेकिन ऐसा लगता है कि हम दोनों के बीच मुकाबला कड़ा है, और हम दोनों को यह आदत हो गई है कि सरकार और धार्मिक संगठन हमारी बात को कूड़े की टोकरी में डालते रहेंगे, और हम इसके खिलाफ बोलते और लिखते रहेंगे। परिवार के गैरकमाऊ बूढ़े के बड़बड़ाने की तरह हम यह काम किए जा रहे हैं, और सत्ता और समाज मदमस्त जानवर की तरह सब कुछ अनसुना करके लोगों को खुदकुशी का सामान जुटाकर दे रहे हैं।
ऐसा लगता है कि इस देश में डॉक्टरों की राय, वैज्ञानिकों की राय की अब कोई जरूरत नहीं रह गई है। लोगों के कान बचे रहें, यह भी जरूरी नहीं है। लोग सुनने लायक नहीं रह जाएंगे, तो इशारों की जुबान बोलने वाले लोगों को कुछ काम मिल जाएगा। या फिर मोबाइल फोन के साथ ऐसे ईयरपीस आने लगेंगे जो तकरीबन खत्म हो चुके कानों को भी कुछ तो सुना ही सकेंगे। जिस तरह जमीन के नीचे पानी की सतह सैकड़ों फीट नीचे गिरती जा रही है, और अधिक ताकतवर पंप लगाकर पानी खींचना फिर भी जारी है, उसी तरह और अधिक ताकतवर ईयरफोन लगाकर लोगों के खराब कानों को भी कामचलाऊ बना दिया जाएगा, और इसके लिए सरकारी स्वास्थ्य बीमा में अलग से इंतजाम कर दिया जाएगा। कानों की परवाह करते हुए धार्मिक शोरगुल की हिंसा को रोकना ठीक नहीं है, यह आस्था का मामला है। इस देश-प्रदेश में डॉक्टर-वैज्ञानिक, और जज की भी जरूरत क्या है? जज गणेश पूजा का आयोजन कर लें, वही उनका सबसे असरदार काम हो सकता है।
हमको मालूम है ईश्वर की हकीकत लेकिन, दिल के खुश रखने को...
15 सितंबर 2024
उत्तरप्रदेश के अयोध्या
में हिन्दुओं की धार्मिक मान्यता और भावना के मुताबिक जो रामजन्मभूमि है, वहां पर बने
राम मंदिर में सफाईकर्मी 20 साल की दलित युवती से 9 लोगों ने गैंगरेप किया है, और तीन
अलग-अलग मौकों पर इस कॉलेज छात्रा के साथ बलात्कार का सिलसिला चलते रहा। इस बारे में
गिरफ्तार 5 लोगों में से 4 के नाम उन्हें साफ-साफ हिन्दू बताते हैं, इसलिए इस मामले
में साम्प्रदायिक तनाव खड़ा करने की गुंजाइश नहीं दिख रही है। दूसरी तरफ कुछ समय पहले
अजमेर के 1992 के एक सामूहिक बलात्कार और ब्लैकमेलिंग के सैकड़ों लड़कियों तक बिखरे
सिलसिले में उम्रकैद हुई है, और उसमें तमाम बलात्कारी और ब्लैकमेलर मुस्लिम थे, कांग्रेस
के पदाधिकारी थे, और अजमेर की विख्यात दरगाह के खादिम (सेवादार) परिवारों के ताकतवर
लोग थे।
इन दो घटनाओं से परे भी बहुत सी दूसरी घटनाएं हैं जिनमें धार्मिक जगहों से जुड़े हुए लोग थे। अब आसाराम जैसा बलात्कारी तो खुद ही अपने आपमें एक धार्मिक सम्प्रदाय था। लोगों को याद होगा कि 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ के पास एक मंदिर में 6 मर्दों और एक नाबालिग ने 8 बरस की मुस्लिम खानाबदोश बच्ची का अपहरण करके उससे सामूहिक बलात्कार किया, और उसका कत्ल कर दिया। इस मामले में 7 में से 6 लोग कुसूरवार करार दिए जा चुके हैं। उसे एक मंदिर में बंधक बनाकर चार दिन तक उससे बलात्कार किया गया जिसमें पुजारी भी शामिल था, और ग्राम प्रधान भी। बाद में सुबूत नष्ट करके लाखों रूपए रिश्वत लेने के मामले में दो पुलिसवाले भी गिरफ्तार हुए। और ये सारे के सारे हिन्दू थे, और हिन्दू समाज ने कठुआ में इन गिरफ्तारियों के खिलाफ धार्मिक झंडे और देश का तिरंगा झंडा लेकर बड़े-बड़े जुलूस निकाले थे, और इस बच्ची की तरफ से मुकदमा लडऩे वाली हिन्दू वकील को हर किस्म की धमकियां भी दी थीं।
हम धर्म की आड़ में, धर्म के नाम पर, धर्म की जगह पर, या किसी एक धर्म से जुड़े हुए लोगों द्वारा किए गए बलात्कार के बारे में चर्चा करना नहीं चाहते। धर्म से जुड़े हुए इस तरह के जुर्म चौंकाते भी नहीं हैं। चौंकाती सिर्फ एक बात है कि धर्म जिस तरह के कल्याणकारी ईश्वर की धारणा को बेचते हैं, क्या वह धारणा थोड़ी सी हद तक भी सच है? अब अगर देखें तो जो दलित लडक़ी भगवान राम के जन्मस्थान के उनके मंदिर में रोज सफाई का काम करती है, उस पर तो राम की खास मेहरबानी रहनी चाहिए थी। लेकिन हुआ क्या? तकरीबन तमाम हिन्दुओं वाले बलात्कारी-गिरोह ने अछूत समझी जाने वाली दलित लडक़ी से बार-बार गैंगरेप किया। जब बात देह की आ गई, तो फिर कुछ छुआछूत भी नहीं रह गया। लेकिन रामजी कहां थे? क्यों उनके इर्द-गिर्द के लोगों ने एक गरीब और बेबस लडक़ी से ऐसा किया, और उन पर ईश्वर ने मार क्यों नहीं किया? बात कुछ अजीब है क्योंकि ईश्वर को सर्वत्र, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, क्या-क्या नहीं कहा जाता है? इसी तरह कठुआ के मंदिर में जब 8 बरस की गरीब मुस्लिम खानाबदोश बच्ची के साथ 8-8 मर्द बलात्कार कर-करके उसे मार डाल रहे थे, तो कण-कण में विद्यमान रहने वाले भगवान कहां थे? उस बच्ची के नंगे बदन के नीचे उसके लहू और मर्दों की मर्दानगी से भीगे हुए फर्श के हर कण में भी तो भगवान रहे होंगे, लेकिन उन्होंने उस बच्ची को बचाना क्यों जरूरी नहीं समझा? इसी तरह जब अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के खादिम परिवार के नौजवान बेकसूर छात्राओं को फंसाकर, उनसे बलात्कार करके उसकी तस्वीरें खींचकर उनको ब्लैकमेल कर रहे थे, खुदकुशी पर मजबूर कर रहे थे, उनकी जिंदगी जहन्नुम बना रहे थे, तब भी दरगाह की ताकत ने अपने ही खादिमों को क्यों नहीं रोका?
हम अपने आसपास की बातों से कुछ दूर जाएं, और देखें कि किस तरह रोमन कैथोलिक ईसाईयों के धार्मिक मुख्यालय वेटिकन से जुड़े पादरी दुनिया भर में हजारों बच्चों का यौन-शोषण करते रहे, और पोप ने उनके खिलाफ कुछ नहीं किया। यह यौन-शोषण कानून के हवाले भी नहीं किया गया। धर्म की आड़ में यह सिलसिला चलते रहा, और ईसा मसीह के तो हाथ-पैर सलीब पर ठुके हुए थे, इसलिए हो सकता है कि वे उन बच्चों को बचाने के लिए न आ पाए हों। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस यीशु मसीह के आने के नारे चर्चों की दीवारों पर चारों तरफ लिखे जाते हैं कि वह आ रहा है, वह आता क्यों नहीं है? जब पादरी छोटे-छोटे बच्चों से बलात्कार करते रहते हैं, तब भी ऐसे पादरियों के गले में बड़े से क्रॉस पर टंगा हुआ ईसा मसीह उन पादरियों के सीनों को छेद क्यों नहीं देता?
हमारा सवाल बलात्कारियों से बिल्कुल नहीं है, क्योंकि वे मानव प्रजाति के मर्द हैं, जंगली जानवर तो हैं नहीं, इसलिए बलात्कार करना तो उनका मिजाज ही है, और पहला मौका मिलते ही वे बलात्कार तो करेंगे ही। हमारा सवाल ईश्वर की बनाई गई उस धारणा से है, उसे गढऩे वाले लोगों से है जो उसे कण-कण में व्याप्त बताते हैं। इस धारणा के हिसाब से बलात्कारी के बदन का हर कण भी ईश्वर से भरा होना चाहिए, और बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला का भी। फिर जब दोनों तरफ ईश्वर है, कण-कण में है, तो फिर वह इस जुल्म को रोकता क्यों नहीं है? और चूंकि वह हर जगह है, सबकुछ देखता-सुनता है, तो फिर वह ऐसे जुल्म होने क्यों देता है? और अगर वह इन्हें रोकने की ताकत नहीं रखता, तो उसे सर्वशक्तिमान, जनकल्याणकारी क्यों माना जाए? हमारा सवाल ऐसे काल्पनिक ईश्वर से है कि अगर उसकी कोई ताकत है, और वह आसमानी बिजली की तरह कुछ फेंककर भी लोगों को भस्म कर सकता है, तो किसी बच्ची या बच्चे के देह को बदनीयत से छूने वाले धार्मिक लोगों को तो उसे सबसे पहले भस्म करना चाहिए। लेकिन क्या किसी ने किसी बच्ची के बदन पर एक चुटकी राख देखी है जो कि गायब हो चुके बलात्कारी की रही हो?
इंसानों के बलात्कारी मिजाज पर कोई हैरानी नहीं है लेकिन लोगों के ऐसे अंधविश्वास पर हैरानी जरूर होती है जो कि ईश्वर की ऐसी धारणा पर भरोसा करते हुए अपनी आंखों से बलात्कार देखते रहते हैं, और उसके बाद भी आसाराम या बाबा राम-रहीम, या पादरियों, या मौलवियों पर भरोसा भी करते रहते हैं। अपने भक्तों के ऐसे अंधविश्वास को भी जो ईश्वर खत्म नहीं कर सकता, उसकी ताकत का अंदाज लगा लेना चाहिए, और किसी को भी यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह किसी को बलात्कार से बचा सकेगा। वह तो अपने खुद के घर, पूजा-उपासना स्थल पर भी बेकसूर बच्चे-बच्चियों को नहीं बचा पाता, उससे सवाल पूछकर देखिए, अधिक गुंजाइश यही है कि उसका कोई जवाब नहीं मिलेगा।




